Asian Market Today: AI क्रैश के डर से एशिया में भी भारी गिरावट, निक्केई ‘बियर मार्केट’ में पहुंचा, कोस्पी में लगा सर्किट ब्रेकर

Asian Market Today: AI क्रैश के डर से एशिया में भी भारी गिरावट आई। कोरिया के बाजार कोस्पी में 9% की भारी गिरावट आई। ट्रेडिंग 20 मिनट के लिए रोकनी पड़ी। जापान का बाजार निक्केई भी 7% टूटा है। ताइवान का मार्केट भी 9% नीचे है।

वॉल स्ट्रीट पर चिप बनाने वाली कंपनियों के शेयरों में आई भारी गिरावट के बाद, निवेशकों ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़े शेयरों को धड़ाधड़ बेचना शुरू कर दिया। ट्रेडरों को इस बात का डर था कि अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में कांग्रेस (संसद) पर कब्जा जमाने वाली डेमोक्रेटिक पार्टी, AI उद्योग के लिए कड़े नियम लागू करने की दिशा में कदम उठा सकती है।

जून के अंत से निक्केई (Nikkei) में भारी गिरावट आई है और अब यह अपने उच्चतम स्तर से 20% नीचे आने की कगार पर है – यह वह स्तर है जिसे ‘टेक्निकल बियर मार्केट’ माना जाता है। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार, टेक-हैवी निक्केई और व्यापक टॉपिक्स (Topix) के प्रदर्शन के बीच का अंतर दशकों में सबसे ज्यादा हो गया है, जो यह बताता है कि बिकवाली मुख्य रूप से टेक्नोलॉजी शेयरों में केंद्रित रही है।

दक्षिण कोरिया के टेक-हैवी कोस्पी (Kospi) में शुरुआती कारोबार के दौरान 8.55% की गिरावट आई, जिससे ‘सर्किट ब्रेकर’ लग गया। सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स और एसके हाइनिक्स (SK Hynix) दोनों के शेयरों में 9% से ज्यादा की गिरावट देखी गई। निक्केई 225 में 5.86% की गिरावट आई, जबकि MSCI एशिया पैसिफिक इंडेक्स 2.9% नीचे आ गया।

फ्यूचर्स के संकेत ताइवान, हांगकांग और मुख्य भूमि चीन में नुकसान की ओर इशारा कर रहे हैं, जबकि हैंग सेंग फ्यूचर्स में 1.6% की गिरावट आई है।

AI से जुड़े शेयरों में हुई भारी बिकवाली का सबसे ज्यादा असर सैमसंग, एसके हाइनिक्स और ताइवान सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कंपनी (TSMC) पर पड़ा। ब्लूमबर्ग के अनुसार, हांगकांग का बाजार इस रुझान से कुछ अलग रहा, क्योंकि निवेशकों ने AI सप्लाई-चेन शेयरों से पैसा निकालकर चीनी इंटरनेट प्लेटफॉर्म्स में निवेश किया, जो अभी कम कीमत (डिस्काउंट) पर मिल रहे हैं।

भारत में, GIFT निफ्टी – जो यह संकेत देता है कि देश का शेयर बाजार दिन के कारोबार में कैसे खुल सकता है – ने बाजार की कमजोर शुरुआत (गैप-डाउन ओपनिंग) के संकेत दिए हैं।

जापानी येन में कोई खास बदलाव नहीं दिखा और यह 157.65 प्रति डॉलर पर रहा, जबकि ऑफशोर युआन भी 6.6643 प्रति डॉलर के आसपास स्थिर रहा।

बाजार की दिशा वॉल स्ट्रीट ने तय की, जहां गुरुवार को S&P 500 में 4.4% की भारी गिरावट आई। यह अप्रैल 2025 में टैरिफ से जुड़ी गिरावट के बाद से इसका सबसे खराब दिन रहा। नैस्डैक 100 (Nasdaq 100) 6.4% गिर गया, जिससे बाजार मूल्य में 2.3 ट्रिलियन डॉलर की कमी आई; मार्च 2020 के बाद से यह एक दिन की सबसे बड़ी गिरावट है। चिप बनाने वाली बड़ी कंपनियों का सूचकांक 12% गिर गया, जिसमें एनवीडिया (Nvidia), क्वालकॉम (Qualcomm) और आर्म होल्डिंग्स (Arm Holdings) सबसे ज्यादा नुकसान उठाने वाली कंपनियों में शामिल रहीं।

Market Outlook: बाजार में जारी रही तेजी, जानिए 6 नवंबर को कैसी रह सकती है सेंसेक्स-निफ्टी की चाल

Market Outlook : 5 नवंबर को भारतीय बेंचमार्क इंडेक्स लगातार छठे सत्र में बढ़त के साथ बंद हुए। निफ्टी 24,500 के स्तर के ऊपर सेटल हुआ। बाजार बंद होने पर सेंसेक्स 2,008.61 अंक या 2.60 प्रतिशत की तेजी के साथ 79,310.01 पर और निफ्टी 576.00 अंक या 2.40 प्रतिशत की तेजी के साथ 24,536.60 पर बंद हुआ। आज लगभग 2,868 शेयरों में तेजी आई, 1,384 शेयरों में गिरावट दर्ज की गई और 169 शेयरों में कोई बदलाव नहीं हुआ।

निफ्टी में सबसे ज्यादा तेजी दिखाने वाले शेयरों में बजाज फाइनेंस, श्रीराम फाइनेंस, इंटरग्लोब एविएशन, मारुति सुजुकी और टाटा मोटर्स पैसेंजर व्हीकल्स शामिल रहे। जबकि अपोलो हॉस्पिटल्स, ओएनजीसी, एनटीपीसी, डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज और कोल इंडिया के शेयरों में गिरावट रही। निफ्टी मिडकैप इंडेक्स में 1.8% और स्मॉलकैप इंडेक्स में 0.5% की तेजी आई।

एनर्जी (0.3% की गिरावट) और मीडिया (0.8% की गिरावट) को छोड़कर, अन्य सभी सेक्टोरल इंडेक्स बढ़त के साथ बंद हुए। ऑटो सूचकांक में 4% की तेजी आई। रियल्टी, पीएसयू बैंक, निफ्टी बैंक और प्राइवेट बैंक इंडेक्स में 3-3% की तेजी रही। जबकि कंज्यूमर ड्यूरेबल्स और आईटी इंडेक्स में 2% से अधिक की बढ़त दर्ज की गई।

बाजार में उतार-चढ़ाव बने रहने की उम्मीद

PL कैपिटल में एडवाइजरी और डीलिंग के चीफ बिजनेस ऑफिसर विक्रम कसाट का कहना है कि अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के नतीजों के बाद ग्लोबल सेंटीमेंट में सुधार और भू-राजनीतिक चिंताओं में कमी आने से भारतीय शेयर बाजारों में तेजी जारी रही। सेंसेक्स में लगभग 2.3% और निफ्टी में 2% से अधिक की बढ़त दर्ज की गई।

ब्रेंट क्रूड लगभग 9% गिरकर 95 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया, जबकि WTI 8% से अधिक गिरकर लगभग 88 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया। इससे भारत के आयात बिल और महंगाई को लेकर चिंताएं कुछ कम हुई हैं।

डॉलर के मुकाबले रुपया मजबूत होकर लगभग 94.36 के स्तर पर पहुंच गया। वहीं, सोने का भाव 4,100 डॉलर प्रति औंस के ऊपर रहा और चांदी लगभग 52 डॉलर प्रति औंस के आसपास कारोबार करती दिखी। हालांकि, दिसंबर में अमेरिकी फेड द्वारा ब्याज दरें बढ़ाए जाने की संभावना और अमेरिका के आगामी रोजगार आंकड़ों के कारण ग्लोबल बाजारों में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है।

आगे कच्चे तेल की कीमतों में नरमी, करेंसी में स्थिरता और कॉर्पोरेट अर्निंग्स यह तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे कि बाजार की यह तेजी कितनी टिकाऊ रहती है।

बाजार में दिख रहा सेक्टर रोटेशन

स्टॉक्सकार्ट के डायरेक्टर और CEO, प्रणय अग्रवाल ने कहा कि भारतीय इक्विटी बाजारों में आई हालिया रिकवरी निवेशकों के बेहतर होते सेंटीमेंट को दिखाती है। इसे विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की फिर से बढ़ती भागीदारी, कच्चे तेल की कीमतों में नरमी और कुछ चुनिंदा सेक्टरों में खरीदारी के रुझान का सपोर्ट मिला है। हालांकि,यह ट्रेंड आगे भी बना रहेगा या नहीं यह ग्लोबल आर्थिक घटनाओं, कंपनियों की कमाई और घरेलू लिक्विडिटी की स्थिति पर निर्भर करेगा। मेटल और रियल्टी शेयरों में मजबूती, जबकि IT शेयरों में कमजोरी यह बताती है कि निवेशकों की पसंद में सेक्टर-स्पेसिफिक बदलाव आ रहे हैं,न कि पूरे बाजार में एक समान रिकवरी आ रही है।

FII की ओर से फिर से खरीदारी शुरू होना एक पॉजिटव संकेत है। हालांकि ग्लोबल अनिश्चितताओं के बीच इस तेजी का लगातार बने रहना अहम होगा। वहीं, कच्चे तेल की कीमतों में नरमी और रुपये में स्थिरता से आयातित महंगाई को कम करने में मदद मिल सकती है, जिससे कंपनियों की इनपुट लागत (लागत खर्च) में कुछ राहत मिल सकती है। आगे निवेशक वैश्विक ब्याज दरों के अनुमान, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, करेंसी के रुझान और कंपनियों के नतीजों पर बारीकी से नजर रखेंगे। बाजार में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है,इसलिए एक अनुशासित और जोखिम को ध्यान में रखने वाला नजरिया अपनाना तथा कंपनियों के फंडामेंटल्स पर ध्यान देना जरूरी होगा।

निफ्टी में इन अहम लेवल्स पर रहे नजर

LKP सिक्योरिटीज में टेक्निकल एनालिस्ट वत्सल भुवा का कहना है कि निफ्टी ने डेली चार्ट पर सभी अहम मूविंग एवरेज को फिर से हासिल करके अपने टेक्निकल आउटलुक को मजबूत किया है, जो एक बुलिश ट्रेंड रिवर्सल का संकेत है। RSI 75 के करीब ‘ओवरबॉट’ जोन में पहुंच गया है, जो निकट भविष्य में प्रॉफिट बुकिंग या कंसोलिडेशन की संभावना का संकेत देता है। हालांकि, कुल मिलाकर मोमेंटम अभी भी पॉजिटिव बना हुआ है।

24,200 के स्तर की ओर कोई भी गिरावट तत्काल सपोर्ट का काम कर सकती है, जबकि 24,000 एक महत्वपूर्ण पोजीशनल सपोर्ट बना हुआ है। ऊपर की तरफ, 24,800 और 25,000 पर रेजिस्टेंस है। गिरावट पर खरीदारी की रणनीति अपनाना उचित रहेगा।

डे ट्रेडर्स के लिए 24350/78700 के स्तर पर अहम सपोर्ट

कोटक नियो में हेड इक्विटी रिसर्च, श्रीकांत चौहान का कहना है कि बेंचमार्क इंडेक्स में शानदार तेजी देखने को मिली। निफ्टी 576 अंक ऊपर बंद हुआ,जबकि सेंसेक्स में 2009 अंकों की बढ़त रही। सेक्टर्स की बात करें तो, कैपिटल मार्केट और फाइनेंशियल सर्विसेज इंडेक्स ने सबसे अच्छा प्रदर्शन किया। इनमें 4 प्रतिशत से अधिक की तेजी आई। वहीं, डिफेंस इंडेक्स में सबसे ज्यादा गिरावट रही जो 1.70 प्रतिशत नीचे आ गया।

तकनीकी रूप से एक मजबूत गैप-अप ओपनिंग के बाद बाजार में पूरे दिन पॉजिटिव मोमेंटम बना रहा। इसने एक मजबूत बुलिश कैंडल बनाई और इंट्राडे चार्ट्स पर यह ‘हायर-हाई’ और ‘हायर-लो’ का पैटर्न बना रहा है। यह मौजूदा स्तरों से आगे और तेजी आने का संकेत है। डे ट्रेडर्स के लिए, 24350/78700 का स्तर एक अहम सपोर्ट का काम करेगा। जब तक बाजार इस स्तर के ऊपर ट्रेड कर रहा है,तब तक बुलिश सेंटीमेंट बने रहने की संभावना है।

ऊपर की तरफ यह तेजी 24700–24800/79800-80000 तक जारी रह सकती है। दूसरी ओर, 24350/78700 के नीचे जाने पर करेक्शन 24250–24200/78500-78200 तक जारी रह सकता है।

 

Investment Mantar : इस रैली में कमजोर शेयरों से निकलें, उन स्टॉक्स पर फोकस करें जो सिर्फ तेल की वजह से गिरे थे

डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सर्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

ट्रंप के खिलाफ रिपब्लिकन पार्टी में बगावत : उपराष्ट्रपति जेडी वेंस भी नाराज, रक्षामंत्री हेगसेथ पर महाभियोग का खतरा

ट्रंप के खिलाफ रिपब्लिकन पार्टी में बगावत : उपराष्ट्रपति जेडी वेंस भी नाराज, रक्षामंत्री हेगसेथ पर महाभियोग का खतरा

Pete Hegseth Impeachmen: अमेरिकी मध्यावधि चुनावों (US Midterm Elections 2026) में करारी हार के बाद रिपब्लिकन पार्टी और व्हाइट हाउस के भीतर अभूतपूर्व राजनीतिक भूचाल आ गया है। हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट दोनों में बहुमत खोने के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ पार्टी के अंदर ही बगावती सुर तेज हो गए हैं। हालात इतने खराब हैं कि ट्रंप की ही पार्टी के एक सांसद ने रक्षा मंत्री हेगसेथ के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की घोषणा कर दी है। 

रिपब्लिकन पार्टी में कलह की 5 बड़ी वजहें

मध्यावधि चुनाव के नतीजों में डेमोक्रेटिक पार्टी ने बहुमत हासिल कर ट्रंप प्रशासन पर शिकंजा कस दिया है। इस हार के बाद पार्टी नेताओं और रणनीतिकारों ने ट्रंप की घरेलू व विदेश नीतियों पर सीधा हमला बोला है। ALSO READ: ईरान युद्ध की वजह से हारे मध्यावधि चुनाव? अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का बड़ा कबूलनामा

  • ईरान युद्ध (Iran War) और महंगाई : उपराष्ट्रपति जेडी वेंस (JD Vance) ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि 2024 में ट्रंप को वोट देने वाले कई मतदाता ईरान जंग की वजह से दूर हो गए। ईंधन की बढ़ती कीमतों और युद्ध के लंबा खिंचने से आम जनता में भारी नाराजगी दिखी। ALSO READ: क्या लेमडक बने डोनाल्ड ट्रंप? ईरान युद्ध और वैश्विक नीतियों पर पड़ेगा यह बड़ा असर, आ सकता है महाभियोग
  • रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ (Pete Hegseth) निशाने पर : रिपब्लिकन नेताओं ने आरोप लगाया कि रक्षा मंत्री हेगसेथ ने ट्रंप को बिना किसी ‘एग्जिट प्लान’ के ईरान युद्ध में उलझा दिया। रिपब्लिकन सांसद थॉमस मैसी ने हेगसेथ के खिलाफ महाभियोग (Impeachment) प्रस्ताव लाने का ऐलान तक कर दिया है। ALSO READ: ट्रंप की हार से भारत और भारतीयों को क्या-क्या होगा फायदा?
  • विदेश नीति पर सवाल : टेक्सास रिपब्लिकन पार्टी के पूर्व कार्यकारी निदेशक चैड विलबैंक्स (Chad Wilbanks) सहित कई नेताओं ने ट्रंप की आक्रामक व्यापार नीति (Tariffs) और रूसी राष्ट्रपति पुतिन के प्रति झुकाव को पार्टी की हार के लिए जिम्मेदार ठहराया।
  • रणनीतिक चूक और सीमित वोटर फोकस : रणनीतिकार मैट मैकोविएक (Matt Mackowiak) और सांसद चिप रॉय ने माना कि पार्टी का पूरा ध्यान एक सीमित वोटर बेस पर रहा। विवादित उम्मीदवारों को टिकट देने और चुनावी अभियान में फंड प्रबंधन की गड़बड़ी ने नतीजों को बिगाड़ा।
  • अश्वेत और एशियाई मतदाताओं का मोहभंग : सरकार की नीतियों से नाराज होकर अश्वेत, एशियाई और युवा मतदाताओं ने बड़ी संख्या में डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों के पक्ष में मतदान किया।

शेयर बाजारों में जबरदस्त लिवाली, सेंसेक्स 2,000 अंक से ज्यादा उछला

अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के परिणामों से उत्साहित निवेशकों की लिवाली से गुरुवार को बीएसई का सेंसेक्स 2,008.61 अंक (2.60 प्रतिशत) उछल गया और 79 हजार अंक के पार 79,310.01 अंक पर बंद हुआ। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी-50 सूचकांक भी 576 अंक यानी 2.40 फीसदी की बढ़त में 24,536.60 अंक पर पहुंच गया।

अमेरिका में मध्यावधि चुनावों में विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी को मिली जीत से निवेशकों में पश्चिम एशिया में स्थिति सामान्य होने की उम्मीद बंधी है। इससे कच्चा तेल बुधवार को करीब 10 फीसदी टूट गया और आज लगभग सभी प्रमुख शेयर बाजारों में लिवाली देखी गई।

घरेलू स्तर पर वृहत बाजार में भी सभी सूचकांक हरे निशान में रहे। निफ्टी मिडकैप-50 सूचकांक 1.87 प्रतिशत और स्मॉलकैप-100 सूचकांक 0.56 फीसदी चढ़ा।

Also Read : स्टार्क ने टेस्ट गेंदबाजों की रैंकिंग में फिर हासिल किया शीर्ष स्थान

सेक्टर आधारित सूचकांकों में निफ्टी ऑटो 4.14 प्रतिशत ऊपर बंद हुआ। वित्तीय सेवा समूह का सूचकांक 3.99 प्रतिशत, रियल्टी का 3.52, सीमेंट का 3.36, बैंकिंग का 3.33, आईटी का 2.42, टिकाऊ उपभोक्ता उत्पाद का 2.32 और फार्मा का एक प्रतिशत मजबूत हुआ। रसायन को छोड़कर अन्य सभी सेक्टरों में तेजी रही।

सेंसेक्स की कंपनियों में बजाज फाइनेंस का शेयर पौने आठ प्रतिशत उछल गया। इंडिगो में पौने छह फीसदी, आईसीआईसीआई बैंक तथा मारुति सुजुकी दोनों में सवा पांच फीसदी, और महिंद्रा एंड महिंद्रा में पांच फीसदी की तेजी रही। बजाज फिनसर्व और एशियन पेंट्स के शेयर लगभग साढ़े चार फीसदी मजबूत हुए।

एक्सिस बैंक, इटरनल, अल्ट्राटेक सीमेंट, इंफोसिस और एचडीएफसी बैंक के शेयर तीन से चार प्रतिशत ऊपर बंद हुए। भारतीय स्टेट बैंक, सन फार्मा, एलएंडटी, टीसीएस और टेक महिंद्रा के शेयर दो से तीन प्रतिशत तक की बढ़त में रहे। एनटीपीसी का शेयर डेढ़ प्रतिशत से अधिक टूट गया। बीईएल, अडानी पोर्ट्स, आईटीसी और पावरग्रिड में भी गिरावट रही।

Pic Credit : UNI

भारत के लिए ट्रम्प से ज्यादा खतरनाक है डेमोक्रेट्स!

भारत के लिए ट्रम्प से ज्यादा खतरनाक है डेमोक्रेट्स!

MLC Election Result 2029

                                     

अमेरिकी राजनीति में डोनाल्ड ट्रम्प को मिले चुनावी झटकों और डेमोक्रेटिक पार्टी की बढ़ती ताकत के बीच भारत के लिए यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि वाशिंगटन का रुख उसके प्रति नरम पड़ जाएगा। भारत की नीतियों की आलोचना करने में डेमोक्रेटिक सांसद भी पीछे नहीं रहे है। कश्मीर, धार्मिक स्वतंत्रता, अल्पसंख्यकों के अधिकार और लोकतांत्रिक संस्थाओं से जुड़े मुद्दों पर पार्टी के कई प्रभावशाली नेता लगातार भारत सरकार पर सवाल उठाते रहे है। ऐसे में अमेरिकी सत्ता के बदलते समीकरणों से भारत के प्रति इस आलोचनात्मक रवैये में बदलाव की उम्मीद करना उचित नहीं होगा।

 

शीतयुद्ध के दौर में भारत की गुटनिरपेक्ष विदेश नीति, पाकिस्तान के साथ अमेरिका के रणनीतिक संबंध और भारत के परमाणु कार्यक्रम को लेकर दोनों देशों के बीच कई बार मतभेद उभरे। मई 1998 में भारत के पोखरण परमाणु परीक्षणों के बाद तत्कालीन डेमोक्रेट राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के प्रशासन ने भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए। अमेरिकी प्रशासन का तर्क था कि इन परीक्षणों से दक्षिण एशिया में परमाणु हथियारों की होड़ तेज हो सकती है।  2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद अमेरिकी कांग्रेस में भारत की नीतियों पर आलोचना  खूब हुई थी और इसमें आगे डेमोक्रेटिक सांसद ही थे।

भारतीय मूल की डेमोक्रेट सांसद प्रमिला जयपाल ने दिसंबर 2019 में अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में रेजोल्यूशन 745 प्रस्तुत किया था। इसमें जम्मू-कश्मीर में संचार प्रतिबंध समाप्त करने, हिरासत में लिए गए लोगों के मामलों की समीक्षा करने और धार्मिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने की मांग की गई थी। इस प्रस्ताव का समर्थन बर्नी सैंडर्स और एलिजाबेथ वॉरेन जैसे नेताओं ने भी किया। जानी मानी डेमोकेटिक नेता कमला हैरिस ने कश्मीर के लोगों के नागरिक अधिकारों और लोकतांत्रिक स्वतंत्रता का प्रश्न उठाया था। इस प्रकार कश्मीर अमेरिकी डेमोक्रेटिक राजनीति में भारत से जुड़े प्रमुख मुद्दों में शामिल  रहा है।

 

2020 के राष्ट्रपति चुनाव में जो बाइडेन ने अपने चुनावी कार्यक्रम में सीएए, एनआरसी और जम्मू-कश्मीर में प्रतिबंधों को लेकर चिंता जताई थी। एक और चर्चित डेमोक्रेट सांसद इल्हान उमर ने अमेरिकी मध्यावधि चुनाव में लगातार पांचवीं बार जीत दर्ज की है। वे भारत के प्रति अपने आलोचनात्मक रुख के कारण लगातार चर्चा में रही है। इल्हान उमर कश्मीर, धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर भारत सरकार की नीतियों पर सवाल उठाती रही है। 2022 में पाकिस्तान यात्रा के दौरान उन्होंने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर का दौरा किया था और वहां मानवाधिकारों तथा कश्मीर की स्थिति पर बयान दिए थे।

भारत ने इस यात्रा पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन बताया था। 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान भी इल्हान उमर ने भारत को लेकर अपनी आलोचना जारी रखी। उन्होंने अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में एक प्रस्ताव पेश किया था, जिसमें भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों की स्थिति पर चिंता जताई गई थी और धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन से जुड़ी अमेरिकी निगरानी सूची में भारत को शामिल करने की मांग की गई थी।  पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की यात्रा और भारत के खिलाफ अमेरिकी संसद में प्रस्ताव पेश करने जैसी घटनाओं के कारण भारत में उन्हें भारत विरोधी दृष्टिकोण रखने वाली सांसद के रूप में देखा जाता है। 

 

एक और डेमोक्रेट सीनेटर टैमी बाल्डविन ने 2023 को सीनेट में रेजोल्यूशन 424 प्रस्तुत किया था। इसमें भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के विरुद्ध कथित उत्पीड़न तथा हिंसा समाप्त करने का आग्रह किया गया था। अमेरिकी डेमोक्रेटिक पार्टी लोकतंत्र, धार्मिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों के प्रश्नों पर भारत सरकार की आलोचना करती रही है। यही विरोधाभास बाइडेन प्रशासन के समय भी दिखाई दिया था।  उस समय प्रधानमंत्री मोदी को राजकीय यात्रा का निमंत्रण दिया गया था और रक्षा तथा तकनीकी सहयोग को नई ऊंचाई मिली, दूसरी ओर अमेरिकी कांग्रेस में भारत की आंतरिक नीतियों पर आलोचनात्मक प्रस्ताव प्रस्तुत होते रहे थे।

 

यहां अमेरिकी विदेश नीति की प्राथमिकताओं पर भी सवाल उठते है। पाकिस्तान में सैन्य शासन, लोकतांत्रिक संस्थाओं की कमजोरी और अल्पसंख्यकों की स्थिति के बावजूद अमेरिका ने अपने रणनीतिक हितों के लिए लंबे समय तक पाकिस्तान के साथ सहयोग किया है। इसके विपरीत भारत के आंतरिक मामलों पर अमेरिकी सांसदों की मुखरता दिखाई देती है। यह अंतर अमेरिकी विदेश नीति में रणनीतिक हितों और लोकतांत्रिक मूल्यों के बीच मौजूद तनाव को उजागर करता है। 4 नवंबर 2026 के मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी की सफलता ने अमेरिकी राजनीति में शक्ति संतुलन को प्रभावित किया है। इससे ट्रम्प प्रशासन को कांग्रेस में अधिक राजनीतिक चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। डेमोक्रेट सांसद संसदीय समितियों, सुनवाई और प्रस्तावों के माध्यम से प्रशासन की नीतियों पर दबाव बढ़ा सकते है। भारत से जुड़े मुद्दे भी इस राजनीतिक खींचतान का हिस्सा बन सकते है।

 

अमेरिकी राजनीति में रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स की प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं, लेकिन भारत को लेकर रिपब्लिकन से कहीं ज्यादा कड़ा व्यवहार डेमोक्रेट्स का रहा है। जाहिर है अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में ट्रम्प के कमजोर पड़ने और  डेमोक्रेट्स के मजबूत होने का फायदा भारत को मिलने वाला है, ऐसा तो नहीं लगता और न ही डेमोक्रेट्स का इतिहास इसकी अनुमति देता है।

सिवाय मेरे उन्हें और कोई दूसरा… अमेरिका के पहले मुस्लिम सेनेटर बने अब्दुल अल सैयद की भारतवंशी पत्नी सारा का वीडियो वायरल!

Sarah Jukaku: 2026 के अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में पहले मुस्लिम सीनेटर के रूप में अब्दुल अल-सैयद की जीत ने कर्नाटक के एक छोटे से गांव को चर्चा में ला दिया है। इसकी वजह उनकी पत्नी डॉ. सारा जकाकू हैं, जिनका परिवार मूल रूप से भटकल का रहने वाला है, जो मंगलुरु से लगभग 140 किमी दूर है।

‘यूएसए टुडे’ के अनुसार पेशे से मनोचिकित्सक डॉ. जकाकू की मुलाकात अब्दुल अल-सैयद से तब हुई थी, जब वे दोनों मिशिगन विश्वविद्यालय में पढ़ाई कर रहे थे। छात्रों के प्रकाशन ‘द मिशिगन डेली’ के एक लेख के मुताबिक जब अब्दुल अल-सैयद अपने पहले साल (फ्रेशमैन) में थे, तब उनकी सगाई हो गई थी और 2006 में उन्होंने शादी कर ली। इस साल वे अल-सैयद के मध्यावधि चुनाव अभियान में भी सक्रिय रूप से शामिल थीं।

US मध्यावधि चुनाव 2026

एक चुनावी रैली के दौरान उन्होंने अपने और अपने पति के रिश्ते के बारे में बात की थी। डॉ. जुकाकू ने कहा कि “मेरे अलावा उन्हें कोई नहीं बताता कि क्या करना है।” उनके पिता जुकाकू तैयब, जो एक नेफ्रोलॉजिस्ट (गुर्दा रोग विशेषज्ञ) हैं, भटकल में पले-बढ़े और MBBS पूरा करने के बाद अमेरिका चले गए थे। उनके दादा जुकाकू शम्सुद्दीन एक जाने-माने वकील और शिक्षाविद थे। उन्होंने जामखंडी रियासत (जो आज कर्नाटक के बागलकोट जिले में है) के मुख्यमंत्री बी.डी. जत्ती की सरकार में वित्त उप-मंत्री के रूप में काम किया था।

डॉ. सारा का जन्म और पालन-पोषण मिशिगन में हुआ है। उन्होंने 2015 में कोलंबिया यूनिवर्सिटी के वैगेलोस कॉलेज ऑफ फिजिशियंस एंड सर्जन्स से अपनी मेडिकल डिग्री हासिल की, जिसके बाद उन्होंने मनोरोग विज्ञान (साइकियाट्री) के क्षेत्र में अपना करियर बनाया।

बागलकोट के निवासियों ने अब्दुल अल-सैयद को बधाई दी है। उनकी जीत अमेरिका में आई उस ‘ब्लूनामी’ (डेमोक्रेटिक लहर) के दौरान हुई, जिसने कई ‘रूबी रेड’ (रिपब्लिकन) राज्यों को अपने प्रभाव में ले लिया। वहां के एक निवासी ने ‘अमेरिकन बाजार’ को बताया “हम उन्हें बहुत-बहुत शुभकामनाएं देते हैं। यह हम सभी के लिए गर्व की बात है कि जुकाकू परिवार का कोई सदस्य अमेरिका में इतने महत्वपूर्ण पद के लिए चुनाव लड़ रहा है।”

इस कपल की शादी को दो दशक से ज्यादा समय हो चुका है। इस दौरान अब्दुल अल-सैयद ने दक्षिण भारतीय संस्कृति के साथ अपने जुड़ाव के बारे में मजाकिया अंदाज में बात की है। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा- “देखिए… मेरी शादी एक दक्षिण भारतीय परिवार में 20 साल पहले हुई थी… अब मैं पूरी तरह से इसमें घुल-मिल गया हूं। सच कहूं तो शायद मैं अरब होने से ज्यादा भारतीय हूं।” पत्रकारों के साथ एक अन्य बातचीत में अल-सैयद ने कहा कि वह “देसी महिलाओं से घिरे हुए हैं… मेरी दो देसी बेटियां एमाली और सेरीन हैं। एक देसी पत्नी हैं।”

Currency Check : कच्चे तेल में नरमी से मिला सपोर्ट, रुपया 29 पैसे मजबूत होकर 94.35 रुपए प्रति डॉलर पर खुला

Currency Check : 5 नवंबर को लगातार पांचवें दिन भी भारतीय रुपये की बढ़त का सिलसिला जारी है। तेल की कीमतों में गिरावट आई है। इससे रुपए के सपोर्ट मिल रहा है। मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी की हार राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ईरान युद्ध से बाहर निकलने के लिए मजबूर कर सकती है। इसके चलते ही तेल की कीमतों में नरमी आई है।

बुधवार के 94.64 रुपए प्रति डॉलर के बंद भाव की तुलना में रुपया आज 29 पैसे की बढ़त के साथ 94.35 रुपए प्रति डॉलर पर खुला। आज अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ज्यादातर एशियाई मुद्राओं में तेजी देखने को मिली है। फिलीपीन पेसो सबसे ज्यादा मजबूत हुआ है। इसमें 0.36 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई है। इसके बाद थाई बाहत का नंबर है जो 0.42 प्रतिशत मजबूत हुआ है। जापानी येन और मलेशियाई रिंगित में 0.29-0.29 प्रतिशत की तेजी आई है, जबकि दक्षिण कोरियाई वॉन और सिंगापुर डॉलर में 0.18 प्रतिशत और 0.08 प्रतिशत की बढ़त देखी गई है।

दूसरी ओर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ताइवान डॉलर में 0.21 प्रतिशत की कमजोरी आई है। जबकि चीनी रेनमिनबी और इंडोनेशियाई रुपिया में 0.07 प्रतिशत और 0.04 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।

गुरुवार को डॉलर में थोड़ी गिरावट आई। अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेट्स की भारी जीत ने अनिश्चितता के एक बड़े कारण को दूर कर दिया है,जिससे ग्लोबल शेयर बाजार में तेजी आई है। कई बड़ी मुद्राओं के मुकाबले डॉलर की मजबूती को मापने वाला डॉलर इंडेक्स पिछले सत्र में 0.36% की गिरावट के बाद आज भी 0.06% गिरकर 101.41 पर आ गया है। यूरो 0.12% बढ़कर 1.1241 डॉलर पर पहुंच गया है।

 

 

बाजार की लगाम अब पूरी तरह से तेजड़ियों के हाथ, निफ्टी में जल्द ही 24200–24400 का लेवल मुमकिन

ट्रंप प्रशासन की सख्त कार्रवाई; ईरान की मदद करने वाली 9 भारतीय कंपनियों पर लगाए प्रतिबंध

ट्रंप प्रशासन की सख्त कार्रवाई; ईरान की मदद करने वाली 9 भारतीय कंपनियों पर लगाए प्रतिबंध

US Sanctions on Indian companies

अमेरिका ने ईरान के खिलाफ अपनी आर्थिक घेराबंदी को और तेज कर दिया है। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने भारत और तुर्की की कई कंपनियों और व्यक्तियों पर नए प्रतिबंध लगा दिए हैं। इन पर आरोप है कि इन्होंने ईरान को अंतरराष्ट्रीय तेल प्रतिबंधों से बचने में मदद की और उसके ‘शैडो फ्लीट’ को सहारा दिया। यह बड़ा कदम ऐसे समय उठाया गया है जब हाल ही में अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेट्स को बड़ी जीत मिली है और चुनावों के दौरान मतदाताओं ने ईरान युद्ध तथा देश में बढ़ती महंगाई को लेकर खुलकर अपनी नाराजगी जताई थी। ALSO READ: ईरान युद्ध की वजह से हारे मध्यावधि चुनाव? अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का बड़ा कबूलनामा

 

भारतीय नागरिकों और फर्मों पर शिकंजा

अमेरिकी वित्त विभाग के अनुसार, प्रतिबंधित किए गए लोगों में भारत में रहने वाले सुनील कुमार शर्मा और उनकी पत्नी जसप्रीत प्रीति शाहिद शामिल हैं। इसके अलावा, दो अन्य भारतीय नागरिक भी इस दायरे में आए हैं जो इस दंपति के व्यवसायों को संभालते थे।

 

जांच में सामने आया है कि इन लोगों से जुड़ी नौ अलग-अलग इकाइयों ने समुद्री धोखाधड़ी के एक बड़े जाल के जरिए ईरान के तेल परिवहन में मदद की। इन नेटवर्क्स के जरिए ईरानी पेट्रोलियम ढोने वाले प्रतिबंधित जहाजों को फर्जी झंडे और झूठे प्रमाण-पत्र (फर्जी मैरीटाइम सर्टिफिकेट्स) मुहैया कराए जाते थे, ताकि वे अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और पर्यावरण नियमों से बच निकल सकें।

 

तुर्की पर भी गाज गिरी

सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि अमेरिका ने तुर्की पर भी कड़ा रुख अपनाया है। ट्रेजरी विभाग ने तुर्की की कंपनी ‘फ्यूगो ग्राउंड सर्विसेज इंक’ पर प्रतिबंध लगा दिया है, जो ईरान के प्रतिबंधित विमानन (Aviation) क्षेत्र को लगातार समर्थन दे रही थी। ALSO READ: क्या लेमडक बने डोनाल्ड ट्रंप? ईरान युद्ध और वैश्विक नीतियों पर पड़ेगा यह बड़ा असर, आ सकता है महाभियोग

 

‘या तो आप हमारे साथ हैं या खिलाफ’

अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने बेहद कड़े शब्दों में चेतावनी दी है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए लिखा, “ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट के तहत आप या तो हमारे साथ हैं या हमारे खिलाफ। हमें पता है कि आप कहां हैं और जो लोग ईरानी शासन का समर्थन करना जारी रखेंगे, हम उन पर प्रतिबंध लगाएंगे—चाहे वे जमीन, समुद्र या हवा के जरिए ऐसा करें।”

विशेषज्ञों का मानना है कि मध्यावधि चुनावों में चुनावी झटके के बाद भी ट्रंप प्रशासन ईरान के मामले में पीछे हटने के मूड में नहीं है और तेहरान के खिलाफ अपनी आर्थिक जंग को और अधिक आक्रामक बना रहा है।

Stock Market Today : बाजार पर आज इन खबरों का दिखेगा असर, कोई ट्रेड लेने से पहले इन पर डाल लें एक नजर

Market news : गिफ्ट निफ्टी से मिल रहे संकेतों को देखते हुए लगता है कि 5 नवंबर को भारतीय बेंचमार्क इंडेक्सों में एक मजबूत शुरुआत देखने को मिल सकती है। शुरुआती कारोबार में गिफ्ट निफ्टी 316 अंक ऊपर चढ़कर 24,315 के आसपास ट्रेड कर रहा था। यहां हम आपके लिए तमाम समाचार प्लेटफॉर्मों पर चल रही आज की ऐसी अहम खबरों की एक सूची जारी कर रहें हैं जो भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजारों को प्रभावित कर सकते हैं।

मार्केट ओवरव्यू

4 नवंबर को भारतीय इक्विटी बेंचमार्क ने लगातार पांचवें सत्र में भी अपनी बढ़त बनाए रखी। बाजार को कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट, विदेशी फंडों निवेश और घरेलू कंपनियों के मजबूत नतीजों से सपोर्ट मिला। हालांकि, कमजोर ग्लोबल संकेतों और अमेरिकी मध्यावधि चुनाव के नतीजों को लेकर बनी अनिश्चितता के कारण निवेशक सतर्क रहे। कारोबार के अंत में सेंसेक्स 383.55 अंक यानी 0.50 प्रतिशत की बढ़त के साथ 77,301.40 पर और निफ्टी 149.75 अंक यानी 0.63 प्रतिशत की बढ़त के साथ 23,960.60 पर बंद हुआ।

बाजार में बुल्स का जोश हाई

बाजार को कच्चे तेल और FIIs का डबल पावर मिल रहा है। गिफ्ट निफ्टी में 350 प्वाइंट से ज्यादा का उछाल है। FIIs की भी दमदार वापसी देखने को मिली है। इनकी तरफ से कैश और वायदा मिलाकर करीब 10 हजार करोड़ रुपये की खरीदारी हुई है। पिछले 7 दिनों में कैश में 25000 करोड़ की नेट खरीदारी देखने को मिली है।

अमेरिकी बाजारों में जोरदार तेजी

अमेरिका के मिड टर्म चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी की भारी जीत से अमेरिकी बाजार झूम उठे हैं। डाओ जोंस में 18 महीने की सबसे बड़ी तेजी देखने को मिली है। इसमें 1500 अंकों का जोरदार उछाल आया है। S&P और नैस्डैक भी डेढ़ परसेंट दौड़े हैं। लेकिन डेटा सेंटर से जुड़े शेयरों में भारी बिकवाली आई है। इसके असर से एशिया में कॉस्पी भी 5 परसेंट नीचे दिख रहा है।

ट्रंप के हार के बाद क्रूड में भारी गिरावट

कच्चे तेल में बड़ी गिरावट आई है। यह 9 फीसदी टूटकर 95 डॉलर के नीचे आ गया है। यह 2 महीने के निचले स्तरों पर पहुंच गया है। ट्रंप की हार के बाद ईरान युद्ध खत्म होने की उम्मीद बढ़ने से ये गिरावट बढ़ी है। इधर डॉलर इंडेक्स कमजोर होने से सोने-चांदी में तूफानी तेजी है। सोना 3.5% तो चांदी 5% उछली है।

BSE का मुनाफा 7.5% घटा

दूसरी तिमाही में BSE के नतीजे फीके रहे हैं। तिमाही आधार पर इसका मुनाफा 7.5 फीसदी घटा है। रेवेन्यू में भी 8.5 फीसदी का दबाव दिखा है। लेकिन मार्जिन में 220 bps का सुधार दिखा है।

अपोलो हॉस्पिटल के नतीजे अनुमान से अच्छे

अपोलो हॉस्पिटल्स ने अनुमान से अच्छे नतीजे पेश किए है। इसके मुनाफे 34 परसेंट और रेवेन्यू में 23 परसेंट का उछाल आया है। मार्जिन में भी बढ़त हुई है। अरविंदो फार्मा के रिजल्ट उम्मीद से बेहतर रहे हैं। इसकी प्रॉफिट ग्रोथ 33 परसेंट रही। आय और मार्जिन में भी बढ़ोतरी हुई है।

डाबर के Q2 मुनाफे और रेवेन्यू में 11.7% की बढ़ोतरी

दूसरी तिमाही में डाबर के नतीजे अनुमान के करीब रहे हैं। इसके आय और मुनाफे में 11.7% का उछाल आया है। हालांकि मार्जिन उम्मीद से थोड़ा कम रही है। इसमें 60 bps का दबाव दिखा है। वहीं, वॉल्यूम ग्रोथ 5.5 फीसदी रही है। कंपनी के भारतीय FMCG कारोबार में 10.7% की ग्रोथ रही है।

तीन गुना हुआ नायिका का मुनाफा, लेंसकार्ट के प्रॉफिट और मार्जिन में उछाल

दूसरी तिमाही में नायिका का मुनाफा तीन गुना हो गया है। रेवेन्यू में भी 28% की बढ़त दिखी है। मार्जिन में भी उछाल दिखा है। दूसरी ओर लेंसकार्ट का प्रॉफिट डबल हो गया है। एबिटा में 50% का उछाल आया है। मार्जिन में भी बढ़त दिखी है।

भारती, टाइटन, M&M और ONGC के नतीजे आज

आज निफ्टी की चार कंपनियों भारती एयरटेल, टाइटन, M&M और ONGC के Q2 नतीजे आएंगे। टाइटन का मुनाफा 30% बढ़ सकता है। मार्जिन में भी सुधार संभव है। वहीं ब्रिटानिया, भारत फोर्ज और ग्लेनमार्क समेत वायदा की 13 कंपनियां भी अपने रिजल्ट पेश करेंगी।

एशियाई मुद्राओं में बढ़त

अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ज्यादातर एशियाई मुद्राओं में तेजी देखने को मिल रही है। फिलीपीन पेसो सबसे ज्यादा मजबूत हुआ है,जिसमें 0.36 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई। इसके बाद थाई बाहत का नंबर है जो 0.42 प्रतिशत मजबूत हुआ है। जापानी येन और मलेशियाई रिंगित में 0.29-0.29 प्रतिशत की तेजी आई है, जबकि दक्षिण कोरियाई वॉन और सिंगापुर डॉलर में क्रमशः 0.18 प्रतिशत और 0.08 प्रतिशत की बढ़त दिख रही है।

दूसरी ओर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ताइवान डॉलर में 0.21 प्रतिशत की कमजोरी आई है। जबकि चीनी रेनमिनबी और इंडोनेशियाई रुपिया में क्रमशः 0.07 प्रतिशत और 0.04 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।

विदेशी निवेशकों का रुख

विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने लगातार चौथे सत्र में भी अपनी खरीदारी जारी रखी और 4 नवंबर को 7,284 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे। इसके विपरीत,घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) ने लगातार चौथे सत्र में भी बिकवाली जारी रखी और 3,712 करोड़ रुपये के शेयर बेचे।

US बॉन्ड यील्ड

बुधवार को ट्रेजरी यील्ड में गिरावट आई। अमेरिका में डेमोक्रेट्स ने कांग्रेस के दोनों सदनों पर नियंत्रण हासिल कर लिया है। बेंचमार्क US 10-ईयर ट्रेजरी यील्ड 2 बेसिस पॉइंट गिरकर 4.86% पर और 2-ईयर बॉन्ड की यील्ड लगभग 2 बेसिस पॉइंट गिरकर 4.56% पर आ गई है।

डॉलर इंडेक्स

गुरुवार को डॉलर में थोड़ी गिरावट आई है। अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेट्स की भारी जीत ने अनिश्चितता के एक बड़े कारण को दूर कर दिया है। इससे ग्लोबल इक्विटीज में तेजी आई है। फिलहाल डॉलर इंडेक्स 101.37 पर ट्रेड कर रहा है।

 

 

Market Outlook : बाजार में दिखी जोरदार तेजी, जानिए 5 नवंबर को कैसी रह सकती है सेंसेक्स-निफ्टी का चाल

US Midterm Election Impact: अमेरिका में डेमोक्रेट्स की जीत से भारत को फायदा मिलेगा या बढ़ सकती हैं मुश्किलें?

अमेरिका के मध्यावधि चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी ने प्रतिनिधि सभा और सीनेट दोनों सदनों में बहुमत हासिल कर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को बड़ा राजनीतिक झटका दिया है। ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के बीच आए इन नतीजों से अमेरिकी राजनीति में शक्ति संतुलन बदल गया है। अब संसद के दोनों सदनों में डेमोक्रेट्स की मजबूत मौजूदगी होगी जबकि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बने रहेंगे। इस चुनावी नतीजे का असर सिर्फ अमेरिका की घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा। भारत के लिए भी इसके कई मायने हैं। पिछले कुछ महीनों में भारत और अमेरिका के रिश्तों में व्यापार शुल्क, रूस से तेल खरीद, एच-1बी वीजा, पाकिस्तान के साथ अमेरिकी संबंधों और भारत-पाकिस्तान संघर्षविराम को लेकर ट्रंप के बयानों के कारण तनाव देखने को मिला है।

ऐसे में सवाल है कि क्या कांग्रेस के दोनों सदनों में डेमोक्रेट्स के बहुमत से भारत को ट्रंप प्रशासन के साथ बातचीत में कुछ राहत मिलेगी? क्या भारतीय सामान पर अमेरिकी शुल्क घट सकते हैं? क्या भारतीय आईटी पेशेवरों को एच-1बी वीजा के मामले में राहत मिल सकती है? और क्या रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत पर अमेरिकी दबाव बढ़ेगा?

हमारी सहयोगी वेबसाइट फर्स्टपोस्ट ने अपने एक्सप्लेनर में विशेषज्ञों के आकलन के मुताबिक बताया है कि डेमोक्रेट्स की जीत से भारत को बातचीत के लिए कुछ अतिरिक्त मौके मिल सकते हैं लेकिन इससे ट्रंप प्रशासन की नीतियां तुरंत बदल जाएंगी, ऐसा मानना सही नहीं होगा। इसकी वजह यह है कि व्यापार शुल्क और वीजा से जुड़े कई अहम फैसलों में राष्ट्रपति के पास अब भी व्यापक कार्यकारी अधिकार हैं। आपको बता दें कि नई अमेरिकी कांग्रेस जनवरी 2027 में कामकाज संभालेगी।

भारत के लिए क्यों अहम हैं अमेरिकी मध्यावधि चुनाव?

अमेरिका भारत के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में शामिल है। भारतीय आईटी सेवाओं के लिए भी अमेरिकी बाजार बेहद महत्वपूर्ण है। इसके अलावा चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग और रक्षा तकनीक के मामले में दोनों देशों की साझेदारी अहम भूमिका निभाती है। यही वजह है कि अमेरिकी कांग्रेस में सत्ता का संतुलन बदलने का असर भारत के व्यापार, निवेश, ऊर्जा सुरक्षा, आव्रजन और रक्षा सहयोग पर पड़ सकता है। भारत-अमेरिका संबंधों में इस साल कई मुद्दों पर खींचतान रही है। ट्रंप प्रशासन ने भारतीय प्रोडक्ट्स पर टैरिफ लगाए। व्यापार समझौते पर बातचीत अटकी रही। अमेरिका ने भारत पर रूस से तेल खरीद कम करने का दबाव बनाया। ट्रंप ने बार-बार दावा किया कि उन्होंने 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्षविराम कराने में मध्यस्थता की थी। इसके अलावा पाकिस्तान के साथ अमेरिका के बढ़ते संपर्क और एच-1बी वीजा से जुड़ी नई फीस ने भी भारत की चिंताएं बढ़ाई हैं। भारत की चुनौती यह है कि वह अमेरिका के साथ अपने रणनीतिक और आर्थिक रिश्तों को मजबूत बनाए रखे लेकिन रूस जैसे देशों के साथ अपने स्वतंत्र विदेश नीति संबंधों को भी प्रभावित न होने दे।

भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर क्या पड़ेगा असर?

भारत के लिए सबसे तात्कालिक चिंता व्यापार शुल्क और लंबित व्यापार समझौता है। दोनों देशों ने फरवरी 2026 में एक व्यापार समझौते की रूपरेखा का ऐलान किया था। इसके तहत भारतीय प्रोडक्ट्स पर अमेरिकी शुल्क 50 फीसदी से घटाकर 18 फीसदी किए जाने की बात थी। इसके बदले भारत को अमेरिकी औद्योगिक वस्तुओं और कुछ खाद्य एवं कृषि उत्पादों पर शुल्क कम करने थे। लेकिन इसके बाद अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने स्थिति बदल दी। 20 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने 6-3 के बहुमत से फैसला सुनाया कि ट्रंप ने व्यापक शुल्क लगाने के लिए जिस आपातकालीन शक्तियों से जुड़े कानून का इस्तेमाल किया था वह उन्हें ऐसा करने का अधिकार नहीं देता।

फर्स्टपोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, 18 फीसदी शुल्क की दर वास्तव में लागू ही नहीं हो पाई। इसके बाद अस्थायी रूप से 10 फीसदी अतिरिक्त शुल्क लगाया गया और 24 जुलाई से ज्यादातर भारतीय उत्पादों पर सेक्शन 301 के तहत 10 फीसदी शुल्क लागू हुआ। इस बीच भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हुए हैं। केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने 29 अक्टूबर को कहा था कि अंतरिम समझौता अंतिम चरण में है और इससे भारतीय किसानों के हितों की पूरी सुरक्षा होगी। हालांकि समझौते पर हस्ताक्षर की तारीख अभी घोषित नहीं की गई है। भारत में किसान संगठनों को आशंका है कि समझौते के जरिए आनुवंशिक रूप से संशोधित यानी जीएम फसलों के लिए भारतीय बाजार का रास्ता खुल सकता है।

क्या डेमोक्रेट्स भारत के लिए कम शुल्क की राह खोलेंगे?

कांग्रेस में डेमोक्रेट्स का बहुमत आने से भारत को तत्काल व्यापारिक राहत मिलने की संभावना कम है। इसकी वजह यह है कि अमेरिकी डेमोक्रेटिक पार्टी भी पूरी तरह मुक्त व्यापार की समर्थक नहीं है। इसलिए उनकी जीत को भारतीय उत्पादों पर शुल्क घटने का संकेत नहीं माना जा सकता। हालांकि डेमोक्रेट्स भारत को चीन के मुकाबले एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार मानते हैं। ऐसे में वे मौजूदा व्यापार समझौते की कुछ शर्तों में बदलाव की मांग कर सकते हैं। डेमोक्रेटिक बहुमत वाली प्रतिनिधि सभा अमेरिकी शुल्क के असर पर सुनवाई करा सकती है। खास तौर पर यह जांचने की कोशिश हो सकती है कि आयात पर लगाए गए शुल्क से अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए वस्तुएं कितनी महंगी हुई हैं। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी कांग्रेस में ऐसा कोई कानून पारित होने की संभावना कम है जिससे भारत पर लगने वाले शुल्क में बड़ा बदलाव हो। इसलिए भारत के लिए व्यापार समझौते पर बातचीत जारी रखना जरूरी होगा। डेमोक्रेट्स की जीत से बातचीत का माहौल बदल सकता है, लेकिन समझौते की शर्तें अपने आप नहीं बदलेंगी।

रूस से तेल खरीदने पर भारत की मुश्किलें बढ़ेंगी?

भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा एक और बड़ा मुद्दा है। अमेरिका और इजरायल के ईरान के साथ युद्ध के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति पर करीब आठ महीने से दबाव बना हुआ है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास पैदा हुई बाधाओं ने भी तेल बाजार में अनिश्चितता बढ़ाई है। बुधवार को ब्रेंट क्रूड की कीमत 0.8 फीसदी बढ़कर 104.42 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई। बाजार की नजर इस बात पर थी कि ईरान को लेकर अमेरिकी प्रशासन अगला कदम क्या उठाता है। ट्रंप ने फाइनेंशियल टाइम्स से कहा था कि अमेरिका की ईरान पर तत्काल हमला करने की कोई योजना नहीं है। वहीं एक ईरानी अधिकारी ने रॉयटर्स को बताया कि दोनों पक्ष किसी समझौते से अभी काफी दूर हैं। कच्चे तेल की ऊंची कीमतों का असर भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश पर पड़ सकता है। भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चा तेल आयात करना पड़ता है। तेल महंगा होने से आयात बिल बढ़ सकता है और इसका असर घरेलू अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।

रूस से तेल खरीद पर अमेरिकी दबाव क्यों अहम है?

भारत के लिए रूस से कच्चा तेल खरीदना भी लगातार अमेरिकी दबाव का विषय रहा है। 18 सितंबर को हस्ताक्षरित एक अमेरिकी कानून के तहत रूस से तेल और गैस खरीदने वाले बड़े देशों पर 100 फीसदी तक शुल्क लगाने का प्रावधान है। हालांकि ट्रंप ने 16 अक्टूबर को इन शुल्कों से छूट दे दी थी। इस छूट की कोई तय समाप्ति तारीख नहीं है लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति इसे वापस ले सकते हैं। फरवरी में जारी अमेरिकी आदेश के तहत वाणिज्य विभाग को यह निगरानी करने का निर्देश दिया गया है कि भारत दोबारा रूस से तेल खरीदना शुरू करता है या नहीं। डेमोक्रेट्स के सत्ता में आने से रूस के प्रति अमेरिकी नीति में नरमी आने की संभावना नहीं दिखती। मार्च में जब अमेरिकी वित्त विभाग ने होर्मुज क्षेत्र में आपूर्ति बाधित होने के दौरान भारत को रूसी तेल खरीदने के लिए अस्थायी छूट दी थी, तब कांग्रेस के डेमोक्रेटिक सदस्यों ने इसका विरोध किया था। इसलिए भारत के लिए स्थिति आसान होने के बजाय कुछ मामलों में चुनौतीपूर्ण भी हो सकती है।

एच-1बी वीजा पर भारतीय आईटी पेशेवरों को मिलेगी राहत?

अमेरिकी मध्यावधि चुनाव का एक बड़ा असर भारतीय आईटी पेशेवरों और अमेरिका में काम करने की इच्छा रखने वाले युवाओं पर पड़ सकता है। भारतीय नागरिक एच-1बी वीजा पाने वालों में सबसे बड़ा समूह हैं। इसलिए इस वीजा से जुड़े अमेरिकी नियमों में बदलाव का असर भारतीय पेशेवरों पर सबसे ज्यादा पड़ सकता है। सितंबर 2025 में ट्रंप प्रशासन ने कुछ नए एच-1बी आवेदनों पर 1 लाख डॉलर की फीस लगाने का एलान किया था। इससे भारतीय आईटी कंपनियों और अमेरिका में काम करने के इच्छुक भारतीय पेशेवरों की चिंता बढ़ी। हालांकि इस फीस की वसूली को लेकर कानूनी लड़ाई जारी है। फर्स्टपोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक अदालतों ने 24 जुलाई 2026 से इस फीस की वसूली पर रोक लगा रखी है। 18 सितंबर को जारी एक राष्ट्रपति आदेश के जरिए इस व्यवस्था को 21 सितंबर 2027 तक बढ़ाया गया था। मैसाचुसेट्स की एक अदालत में 20 राज्यों की ओर से दायर मामले में न्यायाधीश ने कहा कि यह फीस असल में एक तरह का कर है जिसे लगाने का अधिकार सिर्फ अमेरिकी कांग्रेस के पास है।

क्या डेमोक्रेट्स एच-1बी फीस खत्म कर सकते हैं?

कांग्रेस में डेमोक्रेट्स का बहुमत होने से एच-1बी नीति की जांच-पड़ताल बढ़ सकती है। वे इस बात पर सवाल उठा सकते हैं कि नई फीस का अमेरिकी कंपनियों और विदेशी पेशेवरों पर क्या असर पड़ रहा है। लेकिन इससे यह उम्मीद करना सही नहीं होगा कि एच-1बी वीजा की फीस तुरंत खत्म हो जाएगी या वीजा नियमों में बड़ी राहत मिल जाएगी। नई कांग्रेस जनवरी 2027 में कामकाज शुरू करेगी। ट्रंप के पास राष्ट्रपति के रूप में वीटो का अधिकार बना रहेगा। अगर कांग्रेस ऐसा कोई विधेयक पारित करती है जो इस फीस को सीमित करता है या इसे कानून के रूप में बदलने की कोशिश करता है तो ट्रंप उसे वीटो कर सकते हैं।

भारतीय शेयर बाजार पर क्या होगा असर?

अमेरिकी मध्यावधि चुनाव के नतीजों के बीच भारतीय शेयर बाजार में भी उतार-चढ़ाव देखने को मिला। चुनाव परिणाम आने से पहले भारतीय बाजार मजबूत स्थिति में थे। मंगलवार तक चार कारोबारी सत्रों में निफ्टी 50 और सेंसेक्स करीब 5 फीसदी चढ़कर दो महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गए थे। इसके पीछे कंपनियों के बेहतर नतीजे, कच्चे तेल की कीमतों में नरमी और विदेशी निवेशकों की ओर से खरीदारी में शुरुआती सुधार जैसे कारण थे। मंगलवार को विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार में करीब 6837 करोड़ रुपये यानी 721.66 मिलियन डॉलर की शुद्ध खरीदारी की। लेकिन बुधवार को तस्वीर कुछ बदली। निफ्टी 23946.35 के उच्च स्तर तक पहुंचा, जबकि सेंसेक्स ने 77396.04 का स्तर छुआ। हालांकि बाद में बाजार की बढ़त कम हो गई। इस दौरान आईटी शेयरों में सबसे ज्यादा दबाव देखने को मिला। आईटी कंपनियों के शेयरों में 2.2 फीसदी की गिरावट आई। बाजार विशेषज्ञों ने इसकी वजह अमेरिकी आव्रजन नीति और आउटसोर्सिंग से जुड़ी अनिश्चितताओं को बताया। अमेरिकी बाजार में सेवाओं की मांग कमजोर रहने की आशंका भी आईटी शेयरों पर दबाव का एक कारण रही।

क्या मध्यावधि चुनाव के बाद भारतीय बाजार में तेजी आती है?

इतिहास के कुछ आंकड़े भारतीय शेयर बाजार के लिए उम्मीद की वजह हो सकते हैं। एक्सपर्ट्स के मुताबिक 1982 के बाद से अमेरिका के 11 मध्यावधि चुनावों में से छह मौकों पर उसके बाद के महीनों में भारतीय शेयर सूचकांकों ने औसतन 12 फीसदी की बढ़त दर्ज की। हालांकि इसे इस बार भी बाजार में तेजी की गारंटी नहीं माना जा सकता। कच्चे तेल की कीमतें, विदेशी निवेशकों का रुख, कंपनियों के नतीजे और अमेरिका की आर्थिक नीतियां बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। ब्रोकरेज के आकलन में निफ्टी के लिए 23200 का स्तर एक महत्वपूर्ण सपोर्ट माना गया है।

रक्षा सहयोग, क्वाड और चीन के मोर्चे पर क्या बदलेगा?

भारत और अमेरिका के बीच रक्षा और रणनीतिक सहयोग को दोनों देशों की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों का समर्थन मिलता रहा है। दोनों देश रक्षा अभ्यास, सैन्य तकनीक, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग और चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने जैसे मुद्दों पर साथ काम करते रहे हैं। इसलिए अमेरिकी कांग्रेस में डेमोक्रेट्स के बहुमत से भारत-अमेरिका रक्षा संबंधों की दिशा में बड़े बदलाव की संभावना कम है। हालांकि अमेरिकी कांग्रेस की निगरानी और बजट संबंधी फैसले कुछ रक्षा परियोजनाओं की रफ्तार को प्रभावित कर सकते हैं।

इसके लिए भारत-अमेरिका क्रिटिकल एंड इमर्जिंग टेक्नोलॉजी यानी आईसीईटी ढांचे के तहत सहयोग को आगे बढ़ाना महत्वपूर्ण हो सकता है। इसके अलावा क्वाड के तहत महत्वपूर्ण खनिजों और समुद्र के नीचे बिछाई जाने वाली इंटरनेट केबल जैसी परियोजनाओं में सहयोग बढ़ाने के अवसर भी हैं। डेमोक्रेट्स की मजबूत मौजूदगी अमेरिकी विदेश नीति में कुछ मामलों में संतुलनकारी भूमिका निभा सकती है। इससे भारत को रक्षा, व्यापार और कूटनीति से जुड़े अपने हितों को आगे बढ़ाने के लिए अतिरिक्त अवसर मिल सकते हैं।

भारत के लिए डेमोक्रेट्स की जीत के क्या मायने हैं?

ऐसे में देखें तो अमेरिकी मध्यावधि चुनाव के नतीजे भारत के लिए न तो पूरी तरह राहत की खबर हैं और न ही किसी बड़े संकट का संकेत। इसका सबसे बड़ा असर यह होगा कि ट्रंप प्रशासन की नीतियों पर अमेरिकी कांग्रेस की निगरानी बढ़ेगी। व्यापार के मोर्चे पर भारत को तत्काल शुल्क में कमी की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। एच-1बी वीजा के मामले में भी डेमोक्रेट्स की जीत से तुरंत राहत मिलने की संभावना नहीं है। रूस से तेल खरीद पर अमेरिकी दबाव जारी रह सकता है और इस मुद्दे पर कांग्रेस में बहस तेज हो सकती है। भारत की चुनौती अब यह होगी कि वह ट्रंप प्रशासन के साथ अपने संबंधों को संभालते हुए अमेरिकी कांग्रेस के साथ भी संवाद मजबूत करे। आखिरकार, भारत की समस्या अमेरिका के साथ साझेदारी नहीं बल्कि ट्रंप प्रशासन के कुछ खास नीतिगत फैसले रहे हैं।