शेयर बाजार में आ सकती है 50% तक तेजी, प्रशांत जैन ने कहा-अगले कुछ हफ्तों में निवेश के बड़े मौके

भारतीय शेयर बाजारों में गिरावट का दौर खत्म होने जा रहा है। यह उन इनवेस्टर्स के लिए शेयरों में निवेश का सही वक्त है, जो मध्यम और लंबी अवधि के लिए इनवेस्ट करना चाहते हैं। दिग्गज फंड मैनेजर प्रशांत जैन ने यह कहा है। उन्होंने 3पी इनवेस्टमेंट मैनेजर्स के सितंबर तिमाही के लेटर में कई महत्वपूर्ण बताई है।

दिसंबर मध्य तक FIIs की बिकवाली सुस्त पड़ जाएगी

प्रशांत जैन (Prashant Jain) को इनवेस्टमेंट का कई दशकों का अनुभव है। उन्होंने कहा है कि अगले तीन साल में भारतीय शेयर बाजारों का रिटर्न 40-50 फीसदी रह सकता है। शॉर्ट टर्म में बाजार में हल्की गिरावट के आसार दिख रहे हैं। विदेशी निवेशकों (FIIs) की भारतीय बाजार में बिकवाली के बारे में उन्होंने कहा कि दिसंबर के मध्य तक इसमें कमी आ सकती है।

अगले कुछ हफ्तों में शेयर बाजारों में एंट्री का गोल्डन मौका

उन्होंने कहा कि दिसंबर के मध्य के बाद मार्केट्स में रिकवरी शुरू होगी। इसलिए अगले कुछ हफ्ते या महीने शेयर बाजारों में एंट्री का शानदार मौका हो सकता है। पिछले करीब दो सालों से भारतीय शेयर बाजारों में गिरावट दिखी है। सितंबर 2024 से सितंबर 2026 के बीच Nifty 12.4 फीसदी गिरा है। इस दौरान विदेशी निवेशकों यानी FIIs ने 58 अरब डॉलर से ज्यादा के शेयर बेचे हैं। हालांकि, FY25 और FY26 में इकोनॉमी की ग्रोथ करीब 7.5 फीसदी रही।

इन वजहों से भारतीय बाजार का प्रदर्शन रहा खराब

भारतीय शेयर बाजारों पर कई फैक्टर्स का असर पड़ा है। इनमें जियोपॉलिटिकल टेंशन, अमेरिकी टैरिफ, गोल्ड के आयात में उछाल और क्रूड ऑयल की कीमतों में तेजी शामिल हैं। साथ ही फॉरेन इनवेस्टर्स की दिलचस्पी आर्टफिशियल इंटेलिजेंस और सेमीकंडक्टर कंपनियों से जुड़ी स्टॉक्स में बढ़ी है। इससे विदेशी निवेश उन बाजारों में गया है, जिनमें ऐसी कंपनियां मौजूद हैं।

विदेशी निवेशकों ने AI स्टॉक्स में पैसे लगाने में दिखाई दिलचस्पी

AI और सेमीकंडक्टर सुपरसाइकिल में भारत की मौजूदगी ना के बराबर है। इसलिए विदेशी निवेशकों ने भारत से पैसा निकाल एआई और सेमीकंडक्टर्स वाले बाजारों में लगाए हैं। इस वजह से अमेरिका और कई उभरते बाजारों के मुकाबले भारतीय शेयर बाजारों का प्रदर्शन खराब रहा है। भारतीय शेयर बाजारों में हालिया बिकवाली की वजह अमेरिकी में 10 साल के बॉन्ड्स की बढ़ती यील्ड है। यह 5 फीसदी के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर गया है। इससे अमेरिकी बॉन्ड्स में निवेश का आकर्षण बढ़ा है।

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हर दो साल गिरने के बाद शेयर बाजारों में आती है बड़ी तेजी

3पी इनवेस्टमेंट मैनेजर्स ने अपनी स्टडी में पाया है कि हर दो सालों में 15 फीसदी गिरावट के बाद के अगले तीन सालों में शेयर बाजारों में अच्छी तेजी देखने को मिली है। इस दौरान बाजार ने कम से कम 20 फीसदी रिटर्न दिए हैं। कई शेयरों का रिटर्न तो 50 फीसदी या इससे ज्यादा रहा है। हालांकि, यह इस बात की गारंटी नहीं है कि आगे भी ऐसा होगा। यह सिर्फ एक ट्रेंड है।

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Copper News: कमोडिटी ट्रेडर्स के लिए बिग अलर्ट, कॉपर में मई के बाद की सबसे बड़ी वीकली गिरावट

Copper News: शेयर मार्केट में हाहाकार मचा हुआ ही है, कमोडिटी मार्केट में भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। निफ्टी (Nifty) वीकली लेवल पर लगातार आठ हफ्ते कमजोर हुआ है और इतनी लंबी गिरावट 25 साल बाद दिखी है। अब कमोडिटी मार्केट में बात करें तो कॉपर जो धड़ाधड़ ऊपर भाग रहा था, अब मई के बाद से सबसे बड़ी वीकली गिरावट की तरफ बढ़ रहा है। शुक्रवार को डॉलर में गिरावट के साथ लंदन मेटल एक्सचेंज पर इसके फ्यूचर्स प्रति टन $14,300 प्रति टन से ऊपर चले गए, लेकिन फिर भी वीकली लेवल पर हफ्ते की समाप्ति पर इसमें लगभग 2% की गिरावट रहने के आसार हैं।

क्यों फीका पड़ा Copper?

एनर्जी की लागत में बढ़ोतरी और चीन के लड़खड़ाते इंडस्ट्रियल सेक्टर की वजह से मांग कम होने के डर से कॉपर को झटका लगा। एनर्जी की लागत इसलिए बढ़ रही है क्योंकि पश्चिमी एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे युद्ध ने तेल की सप्लाई को बुरी तरह प्रभावित किया हुआ है, जिससे यह उबल पड़ा और कॉपर को भी इसकी आंच महसूस हुई। इसके अलावा चीन में इंडस्ट्रियल कमजोरी के आंकड़ो ने भी कॉपर पर दबाव बनाया।

अभी कितना टूटेगा भाव?

चीन में इंडस्ट्रियल एक्टिविटीज की कमजोर और कच्चे तेल में उबाल ने कॉपर को नरम किया है लेकिन सप्लाई की कमी के कारण कीमतें ऊपरी लेवल पर बनी हुई है यानी कि इसमें अधिक गिरावट की गुंजाइश नहीं दिख रही है। रिफाइंड मेटल पर अमेरिकी टैरिफ के डर से ट्रेडर्स ने लाखों टन मेटल अमेरिका भेजा है, जिससे दूसरी जगहों पर कमी का खतरा पैदा हो गया है। चिली की एक बड़ी खदान में भी हड़ताल चल रही है।

बैंक ऑफ अमेरिका कॉरपोरेशन के एनालिस्ट्स ने अपने नोट में जिक्र किया है कि जब तक पश्चिमी एशिया में युद्ध जारी रहेगा, बेस मेटल्स में बढ़ोतरी सीमित हो सकती है लेकिन एल्युमीनियम, कॉपर और निकेल की सप्लाई में कमी से कीमतों को सपोर्ट मिलना चाहिए।

अभी अमेरिका में सितंबर महीने का रोजगार डेटा आना है, जिसमें मार्केट का अनुमान है कि हायरिंग में बड़ी सुस्ती देखने को मिल सकती है। यह आंकड़ा आज शुक्रवार को आना है। इसमें सुस्ती का असर ये होगा कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व की अपनी मौद्रिक नीतियों को और सख्त करने की संभावना फीकी होगी, जो कॉपर के लिए पॉजिटिव हो सकता है।

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खत्म हुआ मार्केट में गिरावट का दौर! इस कारण मैक्वेरी को है भरोसा, लगाया इन सेक्टर पर दांव

Market Outlook: मैक्वेरी कैपिटल के एमडी और भारत में इक्विटी हेड संदीप भाटिया का मानना है कि भारतीय शेयर बाजार फिलहाल अपनी रेंज के निचले स्तर पर हैं। इसके अलावा उनका यह भी मानना है कि मार्केट को झटका देने वाली जितनी भी खबरें हैं, और जो भी दबाव है, उसका खराब दौर अब निश्चित रूप से पीछे छूट चुका है। संदीप के मुताबिक कच्चे तेल के भाव और अमेरिकी टैरिफ का रिस्क बना हुआ है तो भारत और अमेरिका में ब्याज दरें अभी भी मार्केट के लिए एक चुनौती बनी हुई हैं। इसके अलावा भारत को अभी तक हार्डवेयर और AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) से जुड़े थीम में बढ़ती वैश्विक दिलचस्पी का पूरा फायदा नहीं मिला है। इन चिंताओं के बावजूद उनका मानना है कि भारतीय कंपनियों के सितंबर 2026 तिमाही के रिजल्ट उम्मीद से बेहतर रह सकते हैं।

बैंकिंग सेक्टर

किस सेक्टर के कंपनियों के कारोबारी नतीजे धमाकेदार रह सकते हैं, इसे लेकर संदीप ने कोई अनुमान तो नहीं बताया लेकिन यह जरूर कहा कि बैंकिंग सेक्टर में आउटलुक सुधर रहा है। बैंकिंग सेक्टर उन सेक्टर्स में शुमार है, जिनमें सबसे अधिक दबाव दिखा है लेकिन अब संदीप को उम्मीद है कि अगले दो साल में बैंकों के मार्जिन में सुधार होगा और उनके शेयरों की वैल्यूएशन फिर से बढ़ सकती है, हालांकि नियर टर्म में कमाई पर कुछ दबाव रह सकता है। उनका कहना है कि साल 2027 और साल 2028 में यानी अगले दो वर्षों में बैंकों की कमाई अच्छी रहेगी।

फाइनेंशियल सेक्टर

संदीप भाटिया को फाइनेंशियल सेविंग्स में बड़ा मौका दिख रहा है। उनका अनुमान है कि देश की वित्तीय बचत $50 हजार करोड़ से अधिक है, जोकि और बढ़ सकता है। संदीप का मानना है कि एमसीएक्स, बीएसई और एनएसई को इस रुझान से फायदा हो सकता है।

कंज्यूमर और ऑटो सेक्टर

संदीप भाटिया को उम्मीद है कि कंज्यूमर-ड्यूरेबल कंजम्प्शन से अच्छे नतीजे देखने को मिल सकते हैं। उन्होंने हुंडई इंडिया, मारुति सुजुकी इंडिया और महिंद्रा एंड महिंद्रा जैसी ऑटो कंपनियों का जिक्र करते हुए कहा कि फेस्टिवल सीजन के दौरान गाड़ियों की बिक्री जबरदस्त रही है।

पावर और एनर्जी सेक्टर

संदीप भाटिया की पावर और एनर्जी स्पेस में दिलचस्पी बनी हुई है। रिन्यूएबल एनर्जी स्पेस में उन्हें क्लीन मैक्स एंवायरो एनर्जी सॉल्यूशंस तो पावर इक्विपमेंट और ट्रांसमिशन कंपनियों में हिताची एनर्जी इंडिया पसंद है। उनका कहना है कि यह मौका सिर्फ एआई से जुड़ी बिजली की मांग की वजह से नहीं बन रहा है, बल्कि देश में मजबूत इंडस्ट्रियल और मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ से भी इसे बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

आईटी सेक्टर

वैल्यूएशन आकर्षक होने के बावजूद संदीप आईटी सेक्टर को लेकर सतर्क हैं और अभी इस सेक्टर में निवेश करने से बच रहे हैं। संदीप का मानना है कि जब तक एआई के असर को लेकर अधिक स्पष्टता नहीं आती, तब तक दबाव बना रहेगा।

इंश्योरेंस सेक्टर

संदीप भाटिया का कहना है कि इंश्योरेंस सेक्टर के लिए नियमों में बदलाव बड़ी चिंता बनी हुई है। फिलहाल वह पॉलिसीबाजार की पीबी फिनटेक को लेकर सतर्क हैं और इस सेक्टर पर कोई फैसला लेने से पहले बीमा नियामक IRDA की ड्राफ्ट सिफारिशों के फाइनल होने का इंतजार करना चाहते हैं।

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आज का एक्सप्लेनर:जिनपिंग का स्वागत करने एयरपोर्ट जाएंगे ट्रम्प, स्टेट डिनर भी देंगे; आखिर चीन को खुश क्यों कर रहा अमेरिका, पूरी कहानी

यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की से तीखी बहस, जापान की पीएम को नीचा दिखाना, भारत के पीएम को टैरिफ की चेतावनी… अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ज्यादातर विदेशी नेताओं के साथ अपमानजनक तरीके से पेश आते रहे। लेकिन चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग के दौरे से पहले ट्रम्प के तेवर बदले-बदले से हैं। जिनपिंग के लिए रेड कार्पेट कैसे बिछा रहे ट्रम्प, चीन को खुश करने के पीछे क्या कोई खास मकसद और इस दौरे का दुनिया पर असर क्या पड़ेगा; जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: अमेरिका की जमीन पर जिनपिंग के स्वागत में क्या-क्या होगा? जवाब: शी जिनपिंग 11 साल बाद अमेरिका पहुंच रहे हैं। भारतीय समय के मुताबिक 23-24 सितंबर की रात 1 बजे के बाद उनका विमान वॉशिंगटन डीसी के जॉइंट बेस एंड्रयूज पर लैंड करेगा। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक… सवाल-2: आखिर जिनपिंग को इतनी तवज्जो क्यों दे रहे ट्रम्प, बदले में क्या चाहिए? जवाब: अमेरिका में दशकों पुरानी परंपरा रही है कि विदेशी नेता राष्ट्रपति से मिलने व्हाइट हाउस आते हैं, व्हाइट हाउस उनके स्वागत के लिए एयरपोर्ट नहीं जाता। ट्रम्प का प्रोटोकॉल तोड़ना सिर्फ शिष्टाचार नहीं, चीन की अहमियत का कूटनीतिक संकेत माना जा रहा है। इसकी वजह मोटे-तौर पर 4 मांगों में छिपी है… 1. चीन रेयर अर्थ मिनरल्स की सप्लाई बनाए रखे 2. चाकू, बेलन, नोटबुक का कारोबार टैरिफ-फ्री हो 3. बड़ी डील की घोषणा, जिससे मिड-टर्म चुनावों में माहौल बने 4. चीन के साथ ‘AI हॉटलाइन’ बने, ताकि ये बेलगाम न हो अमेरिकी थिंकटैंक सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज में चीनी कारोबार के एक्सपर्ट स्कॉट कैनेडी के मुताबिक, ‘ट्रम्प प्रशासन को उम्मीद थी कि टैरिफ के एकतरफा भारी दबाव से चीन झुक जाएगा। ऐसा नहीं हुआ। चीन का निर्यात इस साल 28% बढ़ा है। इसलिए मोलभाव में शी की स्थिति ट्रम्प से मजबूत दिख रही है।’ सवाल-3: जिनपिंग अमेरिका से क्या हासिल करने की कोशिश करेंगे? जवाब: अमेरिकी टैरिफ के बावजूद लगातार दूसरे साल चीन का ट्रेड सरप्लस 1 ट्रिलियन डॉलर पार कर सकता है। यानी चीन ने जितना सामान दूसरे देशों से खरीदा उससे कहीं ज्यादा उन्हें बेचा है। साफ है कि चीन व्यापार के लिए सिर्फ अमेरिका पर निर्भर नहीं है। ऐसे में अमेरिकी दौरे से जिनपिंग 3 चीजें साधना चाहते हैं… 1. अमेरिका ताइवान की आजादी का विरोध करे 2. रेयर अर्थ मिनरल्स के एवज में ज्यादा टैरिफ छूट मिले 3. जिनपिंग का भव्य स्वागत, जिससे चीन में छवि मजबूत हो सवाल-4: क्या इस दौरे से भारत और दुनिया पर कोई बड़ा असर पड़ेगा? जवाब: एशियाई और यूरोपीय देशों को डर है कि अगर अमेरिका और चीन साथ आ गए तो ये वर्ल्ड ऑर्डर, यानी दुनिया के नियम खुद तय करेंगे। AI के क्षेत्र में अमेरिका और चीन ही सबसे तेजी से काम कर रहे हैं। दोनों नेताओं की मीटिंग के बाद पूरी दुनिया में AI को नियंत्रित करने का सिस्टम तैयार हो सकता है। ईरान जंग शुरू होने के बाद से तेल की सप्लाई प्रभावित हुई है। अगर चीन की मध्यस्थता से अमेरिका ईरान जंग से बाहर निकल पाए और होर्मुज स्ट्रेट के कंट्रोल पर सहमति बन जाए, तो ग्लोबल ऑइल सप्लाई फिर पटरी पर आ सकती है। अमेरिका और चीन में ट्रेड वॉर की वजह से विदेशी कंपनियों के फैक्ट्री लगाने के लिए भारत विकल्प बनकर उभरा था। अमेरिका-चीन की सुलह से भारत के हाथ से यह मौका निकल सकता है। ब्रिगेडियर अनिल रमन (रि.) के मुताबिक, ‘एशिया-पैसेफिक क्षेत्र में चीन को मैनेज करने के लिए अमेरिका भारत से अच्छे रिश्ते बनाकर रखता था। अगर अब अमेरिका-चीन आपस में ही अपने रिश्ते संभालने लगेंगे, तो अमेरिका को भारत की जरूरत कम होगी। लेकिन अगर चीन-अमेरिका में सहमति नहीं बन पाती है, तो अमेरिका के लिए भारत की जरूरत बढ़ जाएगी।’ अमेरिका ने रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने वाला बिल पास हो गया है। अगर रेयर अर्थ मिनरल्स के बदले अमेरिका चीन को रूसी तेल खरीदने की ढील देता है, तो भारत पर अमेरिका को ऐसा कोई ऑफर देने का दबाव बढ़ेगा, जिससे उसे भी रियायत मिले। ———- ये खबर भी पढ़िए… खामेनेई को घर में मारा, अब ईरानी राष्ट्रपति को वीजा:अमेरिका के दुश्मनों को भी न्यूयॉर्क आकर खिलाफ बोलने की छूट क्यों; 5 किस्से ईरान के राष्ट्रपति मसूद पजशकियान न्यूयॉर्क पहुंच गए हैं। वे हर साल होने वाले यूनाइटेड नेशंस जनरल असेंबली (UNGA) में आज भाषण देंगे। उनके साथ विदेश मंत्री अब्बास अराघची भी होंगे। इन नेताओं को अपना दुश्मन मानने वाले अमेरिका ने ही इन्हें वीजा दिया है। पूरी खबर पढ़िए..

Petrol Diesel Price Hike: क्या ₹10-₹15 महंगा होगा पेट्रोल? 7 पॉइंट्स में समझिए ट्रंप के नए 100% टैरिफ प्लान का पूरा गणित

US Sanctions India Petrol Price: अमेरिकी संसद ने रूस पर कड़े प्रतिबंधों वाले बिल को पास कर दिया है। यह राष्ट्रपति ट्रंप को रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार देता है। अब सबसे बड़ा सवाल आम आदमी के मन में यह है कि क्या इस फैसले के बाद भारत में पेट्रोल और डीजल के दाम आसमान छूने लगेंगे?

अगर भारत रूसी सस्ता क्रूड ऑयल खरीदना बंद करता है या अमेरिका बैन लगाता है, तो पेट्रोल की कीमतें अचानक किसी एक झटके में नहीं बढ़ेंगी। इसका असर इस बात पर निर्भर करेगा कि भारत विकल्प के तौर पर कहां से तेल खरीदता है, ग्लोबल क्रूड के दाम क्या रहते हैं और सरकार-तेल कंपनियां टैक्स में कितनी राहत देती हैं। इन 7 पॉइंट्स में समझिए आपकी जेब पर कितना बोझ पड़ेगा।

1. भारत आखिर कितना रूसी तेल खरीदता है?

साल 2022 के बाद से रूस भारत के लिए सस्ते कच्चे तेल का सबसे बड़ा स्रोत बन गया। वित्तीय वर्ष 2026 में भारत ने $40.8 अरब डॉलर का रूसी तेल आयात किया, जो कुल कच्चे तेल आयात का 30.3% था। जुलाई 2026 तक भारत के कुल तेल आयात में अकेले रूस की हिस्सेदारी 51% पहुंच गई थी। भारत अपनी जरूरत का 88% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। अगर रूसी सप्लाई रुकती है, तो भारत को बहुत बड़े पैमाने पर नया सप्लायर ढूंढना होगा।

2. क्या रूसी तेल बंद होते ही तुरंत महंगा हो जाएगा पेट्रोल?

जरूरी नहीं कि तुरंत ऐसा हो, और न ही यह गणित सीधा काम करता है।अगर भारतीय रिफाइनरियां (IOC, BPCL, HPCL) रूस से तेल खरीदना बंद करती हैं, तो वे मिडिल ईस्ट, अफ्रीका और अमेरिका से क्रूड खरीद सकती हैं। पहले रूस $10 प्रति बैरल से ज्यादा का डिस्काउंट दे रहा था। हालांकि, मिड-2026 में रूस के ‘उराल्स’ क्रूड पर डिस्काउंट घटकर सिर्फ $1 से $2 प्रति बैरल रह गया है। यानी डिस्काउंट पहले से ही काफी कम हो चुका है, इसलिए रूसी तेल बंद होने का झटका उतना भयानक नहीं होगा जितना साल-दो साल पहले होता।

3. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें है सबसे बड़ा खतरा

असली चुनौती भारत के रिफाइनरों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए होगी। अगर अमेरिकी बैन के कारण रूसी क्रूड इंटरनेशनल मार्केट से बाहर हो जाता है, तो ग्लोबल मार्केट में तेल की किल्लत हो जाएगी। मिडिल ईस्ट में भू-राजनीतिक तनावों और सप्लाई में आ रही रुकावटों के कारण ब्रेंट क्रूड का भाव $105 प्रति बैरल के आसपास पहुंच चुका है। जब दुनिया में तेल की सप्लाई घटेगी, तो कच्चे तेल के दाम सभी के लिए बढ़ जाएंगे।

4. भारत दूसरा तेल ढूंढ तो लेगा, लेकिन ‘कीमत’ चुकानी होगी

भारत के पास सऊदी अरब, यूएई, इराक और अफ्रीकी देशों से तेल खरीदने का पुराना अनुभव है। लेकिन सप्लायर बदलना सिर्फ एक नया टैंकर भेजने जितना आसान नहीं होता। हर रिफाइनरी का स्ट्रक्चर खास तरह के कच्चे तेल के लिए डिजाइन होता है।साथ ही अचानक जब भारत और अन्य देश नए विकल्पों की ओर भागेंगे, तो बाजार में प्रीमियम और माल भाड़ा काफी बढ़ जाएगा, जिससे क्रूड एक्विजिशन कॉस्ट महंगी हो जाएगी जिसका सीधा असर अंततः ग्राहकों पर ही पड़ेगा।

5. भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें कैसे तय होती हैं?

पेट्रोल पंप पर मिलने वाले पेट्रोल की कीमत सिर्फ कच्चे तेल के दाम पर निर्भर नहीं करती, बल्कि इसमें कई लेयर शामिल होती हैं।

पेट्रोल पंप की अंतिम कीमत = कच्चे तेल की लागत + रिफाइनिंग खर्च + भाड़ा + डीलर कमीशन + केंद्र की एक्साइज ड्यूटी + राज्यों का वैट (VAT)

पेट्रोल-डीजल जीएसटी से बाहर हैं। जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल बेकाबू होता है, केंद्र सरकार एक्साइज ड्यूटी घटाकर और तेल कंपनियां अपने मार्जिन को एडजस्ट करके आम जनता को सीधी महंगाई से बचाती हैं। जैसा मार्च 2026 में क्रूड $122 पहुंचने पर ₹10/लीटर एक्साइज घटाकर किया गया था।

6. तो आखिर कितने रुपये बढ़ सकते हैं पेट्रोल के दाम?

इसका कोई एक तय आंकड़ा जैसे ₹10 या ₹20 नहीं दिया जा सकता। यह इन 3 संभावित स्थितियों पर निर्भर करेगा:

सिचुएशन 1 (सामान्य हालात): भारत रूस के बजाय दूसरे देशों से तेल खरीदता है और ग्लोबल सप्लाई सामान्य रहती है। इसका असर ये होगा कि तेल कंपनियों की लागत थोड़ी बढ़ेगी, लेकिन पेट्रोल-डीजल के दाम पर इसका असर ना के बराबर या बहुत मामूली होगा।

सिचुएशन 2 (रूस की सप्लाई पूरी ठप): अंतरराष्ट्रीय बाजार में रूसी तेल रुकने से ब्रेंट क्रूड तेजी से महंगा होता है। इससे रिफाइनरियों के मार्जिन पर दबाव बढ़ेगा और घरेलू बाजार में पेट्रोल-डीजल ₹2 से ₹5 तक महंगे हो सकते हैं।

सिचुएशन 3 (रूस बैन + मिडिल ईस्ट संकट): अगर रूस के तेल पर रोक के साथ-साथ खाड़ी देशों में युद्ध/तनाव से सप्लाई ठप हो जाए। यह सबसे चिंताजनक स्थिति होगी। सरकार के लिए पुरानी दरों पर पेट्रोल बेचना मुश्किल हो जाएगा और कीमतों में बड़ा इजाफा देखना पड़ सकता है।

7. अमेरिकी टैरिफ का सीधा असर पेट्रोल पर नहीं, एक्सपोर्ट पर होगा

यह बिल पास होने के बाद राष्ट्रपति ट्रंप को शक्ति देता है, यह अपने आप भारत पर 100% ड्यूटी लागू नहीं करता। वैसे अगर अमेरिका 100% टैरिफ लगाता है, तो इसका असर भारत के पेट्रोल पंप पर नहीं, बल्कि अमेरिका जाने वाले भारतीय एक्सपोर्ट्स (कपड़ा, आईटी, जेम्स, दवाइयां) पर पड़ेगा। इससे भारतीय रुपया कमजोर होगा और घूम-फिरकर भारत के आयात बिल पर दबाव बनाएगा।

भारत के सामने दोहरी चुनौती

भारत के सामने इस समय दो बड़े जोखिम ऑयल शॉक और ट्रेड शॉक खड़े हैं। सस्ता रूसी तेल छोड़ें, महंगा विकल्प चुनें और पेट्रोल-डीजल महंगा होने का खतरा झेलें। या फिर रूस से तेल खरीदना जारी रखें, अमेरिका के 100% टैरिफ का सामना करें और अपने एक्सपोर्ट सेक्टर को नुकसान पहुंचाएं।

फिलहाल, ग्राहकों को तुरंत पैनिक होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि सरकार और तेल विपणन कंपनियां (OMCs) वैश्विक उथल-पुथल के बीच कीमतों को स्थिर रखने का पूरा प्रयास करेंगी।

JLR Layoffs: टाटा मोटर्स की जगुआर लैंड रोवर में जाएंगी 4000 नौकरियां

टाटा मोटर्स की जगुआर लैंड रोवर ऑटोमोटिव पीएलसी (JLR) अगले दो सालों में 4,000 नौकरियां कम करने जा रही है। कंपनी बढ़ती लागत, गिरती बिक्री और अमेरिकी टैरिफ के असर जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है। JLR ब्रिटेन की सबसे बड़ी कार कंपनी है। ‘द टाइम्स’ की रिपोर्ट के अनुसार, शुक्रवार देर रात कर्मचारियों को चेतावनी दी गई कि सोमवार को रिडंडेंसी प्रोग्राम (छंटनी) की घोषणा हो सकती है।

ब्लूमबर्ग के मुताबिक, एक बयान में कंपनी ने कहा है कि वह एक स्वैच्छिक छंटनी कार्यक्रम (वॉलंटरी रिडंडेंसी प्रोग्राम) शुरू कर रही है। कंपनी दो सालों में लगभग 2.3 अरब डॉलर की बचत करना चाहती है। बयान के अनुसार, JLR वैश्विक बाजार की स्थितियों को देखते हुए अपने ब्रेक-ईवन पॉइंट को घटाकर 300,000 गाड़ियां करना चाहती है। साथ ही अपने कारोबार को आसान बनाना चाहती है।

JLR दिए हुए है 33000 लोगों को रोजगार

JLR ब्रिटेन में लगभग 33,000 लोगों को रोजगार दिए हुए है। कंपनी की मालिक भारत की टाटा मोटर्स पैसेंजर व्हीकल्स लिमिटेड है। हाल की तिमाही में JLR का रेवेन्यू लगभग 10 प्रतिशत गिर गया। प्रॉफिट बिफोर टैक्स 69 प्रतिशत घटकर 10.9 करोड़ पाउंड रह गया। कंपनी की पहली इलेक्ट्रिक रेंज रोवर इस महीने की शुरुआत में बिक्री के लिए आई। यह बाजार की सबसे महंगी इलेक्ट्रिक SUV में से एक है।

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Volkswagen में और 50000 लोगों की छंटनी को मंजूरी

जर्मनी की फॉक्सवैगन में जल्द ही और 50000 नौकरियां जा सकती हैं। कंपनी के सुपरवाइजरी बोर्ड ने एक बदलाव योजना ‘फ्यूचर प्लान 2030’ को मंजूरी दी है। इसमें 50,000 और नौकरियां खत्म करना, 2035 तक अपने व्हीकल मॉडल लाइनअप को आधा करना और 2027-2031 के दौरान कैपिटल खर्च को 16 प्रतिशत तक कम करना जैसी 12 पहलें शामिल हैं। 50,000 नौकरियां कम करने पर सहमति पहले ही बन चुकी थी और प्रक्रिया चल रही है। अब दुनियाभर में लगभग और 50,000 नौकरियां कम करने के प्लान को मंजूरी मिल गई है।

इसके अलावा फॉक्सवैगन ग्रुप की भारतीय यूनिट अपने 3 साल के रीस्ट्रक्चरिंग प्लान को तेज कर रही है। इसके कारण कंपनी की लगभग 12 प्रतिशत वर्कफोर्स कम हो जाएगी। स्कोडा ऑटो फॉक्सवैगन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड ने 2025 में बदलाव की प्रक्रिया शुरू की थी। अब 2027 तक तेजी से छंटनी करने की तैयारी है।

नीदरलैंड्स ने अमेरिका-कनाडा से 86 टन सोना हटाकर लंदन भेजा:बैंक ऑफ इंग्लैड में रखा, कहा- संकट आने पर यहां आसानी से बेच सकेंगे

नीदरलैंड्स ने अमेरिका और कनाडा में रखा 86 टन सोना निकालकर लंदन भेज दिया है। डच सेंट्रल बैंक (DNB) ने बताया कि यह ट्रांसफर मार्च से अगस्त के बीच कई महीनों में किया गया। अब यह सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड में रखा गया है। DNB के मुताबिक, संकट की स्थिति में लंदन में रखा सोना ज्यादा आसानी से खरीदा-बेचा जा सकता है। इस ट्रांसफर से पहले DNB के कुल सोने का 31.3% न्यूयॉर्क और 19.7% ओटावा में रखा था। अब दोनों जगहों पर यह हिस्सेदारी घटकर 18.5% रह गई है। वहीं, लंदन में रखे सोने की हिस्सेदारी 18.1% से बढ़कर 32.1% हो गई है। नीदरलैंड्स में 30.8% सोना अभी भी रखा हुआ है। 27 टन सोना न्यूयॉर्क-ओटावा से नीदरलैंड्स लाया गया DNB के मुताबिक, 27 टन सोने की छड़ें न्यूयॉर्क और ओटावा से नीदरलैंड्स के जाइस्ट पहुंचाई गईं। इसके बाद इसी मात्रा और गुणवत्ता का सोना लंदन भेज दिया गया। सोने की छड़ों को पिघलाने की जरूरत नहीं पड़ी। हालांकि, अटलांटिक महासागर के पार इतनी बड़ी मात्रा में सोना किस तरह पहुंचाया गया, इसकी जानकारी बैंक ने नहीं दी। DNB ने बताया कि ट्रांसफर का बाकी हिस्सा अलग तरीके से किया गया। न्यूयॉर्क में सोना बेचा गया और उतनी ही मात्रा का सोना लंदन में दोबारा खरीदा गया। बैंक के मुताबिक, सोने की खरीद-बिक्री और फिजिकल ट्रांसफर को साथ करने से इतनी बड़ी और जटिल प्रक्रिया से जुड़े जोखिम को बांटने में मदद मिली। संकट में लंदन का सोना जल्दी इस्तेमाल हो सकेगा DNB के मुताबिक, बैंक ऑफ इंग्लैंड में रखा सोना दुनिया में सबसे आसानी से ट्रेड होने वाले सोने में माना जाता है। इसलिए किसी संकट के समय इसे अमेरिका या कनाडा में रखे सोने की तुलना में ज्यादा आसानी से बेचा या खरीदा जा सकता है। DNB ने इस फैसले के पीछे “बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव” का हवाला दिया है। हालांकि, बैंक ने यह साफ नहीं किया कि वह किन घटनाओं को लेकर ऐसा कह रहा है। अमेरिका-कनाडा के बीच जारी है ट्रेड विवाद यह फैसला ऐसे समय आया है, जब अमेरिका और कनाडा के बीच ट्रेड विवाद चल रहा है। दोनों देशों के बीच बातचीत फेल होने के बाद एक-दूसरे के सामान पर नए टैरिफ लगाए गए हैं। कनाडा के स्टील, एल्युमिनियम, लकड़ी और ऑटोमोबाइल जैसे प्रमुख सेक्टर अमेरिकी टैरिफ से प्रभावित हुए हैं। अगस्त में अमेरिका ने करीब 28 अरब कनाडाई डॉलर यानी 20 अरब डॉलर के कनाडाई सामान पर अतिरिक्त 50% टैरिफ लगाने का ऐलान किया था। नीदरलैंड्स के पास कुल 612.4 टन सोना DNB के मुताबिक, 2025 के अंत में नीदरलैंड्स के पास कुल 612.4 टन सोना था। इसकी कीमत करीब 72.2 अरब यूरो थी। बैंक ने बताया कि सोने को अलग-अलग जगहों पर रखने की व्यवस्था का मकसद जोखिम को बांटना और संकट के समय सोने तक आसानी से पहुंच बनाए रखना है। लंदन का गोल्ड मार्केट सबसे बड़ा फ्रांस की नेशनल गोल्ड काउंटर के प्रेसिडेंट लॉरेंट श्वार्ट्ज ने कहा कि सेंट्रल बैंक करीब एक दशक से अपने गोल्ड रिजर्व को अलग-अलग जगहों पर शिफ्ट कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिका के मौजूदा राजनीतिक माहौल की वजह से भी कुछ सेंट्रल बैंक सोना रखने के लिए दूसरी जगहों को चुन सकते हैं। श्वार्ट्ज के मुताबिक, लंदन का गोल्ड मार्केट दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे ज्यादा लिक्विड मार्केट है। यानी यहां सोने को आसानी से खरीदा-बेचा जा सकता है। इसलिए संकट के समय लंदन में रखा सोना जल्दी इस्तेमाल किया जा सकता है। सेंट्रल बैंक यहां अपने सोने को दूसरे बैंकिंग संस्थानों को आसानी से उधार भी दे सकते हैं। ——————– ये खबर भी पढ़ें… रूस-यूक्रेन ने ब्लैक सी में 300 जहाजों पर हमले किए:दुनिया में गेहूं-मक्का महंगा होने का खतरा; रूस का अनाज निर्यात 71% घटा रूस-यूक्रेन युद्ध में ब्लैक सी अब जंग का बड़ा मोर्चा बन गया है। पिछले करीब डेढ़ महीने में दोनों देशों ने 300 से ज्यादा जहाजों को निशाना बनाया है। इनमें अनाज ले जाने वाले जहाज, तेल टैंकर और दूसरे मालवाहक पोत शामिल हैं। लगातार हमलों से ब्लैक सी का समुद्री व्यापार प्रभावित हुआ है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

Pharma Mutual Funds: 1 साल में 30% तक रिटर्न, 10 फंड ने दिया 20% से ज्यादा फायदा; क्या अभी भी है निवेश का मौका?

Pharma Mutual Funds: पिछले एक साल में फार्मा सेक्टर ने निवेशकों को अच्छा रिटर्न दिया है। Nifty Pharma Index करीब 25% चढ़ा है। वहीं, फार्मा और हेल्थकेयर सेक्टोरल म्यूचुअल फंड्स ने 11% से 30% तक रिटर्न दिया है।

Value Research के आंकड़ों के मुताबिक, 19 एक्टिव फार्मा सेक्टोरल फंड्स में से सिर्फ 10 फंड्स ने एक साल में 20% से ज्यादा रिटर्न दिया। इन फंड्स का औसत रिटर्न 20.7% रहा। BSE Healthcare TRI ने इस दौरान 18.68% रिटर्न दिया।

1 साल में सबसे ज्यादा रिटर्न देने वाले 10 फार्मा फंड

फंड1 साल का रिटर्न
Kotak Healthcare Direct29.80%
HDFC Pharma and Healthcare Direct28.85%
PGIM India Healthcare Direct28.04%
Quant Healthcare Direct27.02%
Bajaj Finserv Healthcare Direct26.30%
WhiteOak Capital Pharma and Healthcare Direct

25.87%
ICICI Pru Nifty Pharma Index Direct

23.89%
SBI Healthcare Opportunities Direct23.59%
Mirae Asset Healthcare Direct22.91%
Tata Nifty MidSmall Healthcare Index Direct20.93%

डेटा: Value Research, 28 अगस्त 2026 तक

फार्मा सेक्टर क्यों चढ़ा?

फार्मा कंपनियों के शेयरों में तेजी के पीछे कई वजहें रहीं। अमेरिका में भारतीय जेनेरिक दवा कंपनियों के लिए माहौल बेहतर हुआ है। कुछ फार्मा इंपोर्ट पर 100% अमेरिकी टैरिफ से जेनेरिक दवाओं और उनसे जुड़े इंग्रीडिएंट्स को बाहर रखा गया।

घरेलू मांग भी मजबूत बनी हुई है। भारत का फार्मा एक्सपोर्ट FY27 की पहली तिमाही में 6.8% बढ़कर 8.1 अरब डॉलर पहुंच गया। सरकार भी Biopharma SHAKTI जैसी योजनाओं के जरिए सेक्टर में निवेश बढ़ा रही है।

Warren Buffett: वॉरेन बफे ने 1977 में बताए थे निवेश के 5 नियम, आज भी हर निवेशक के लिए हैं काम के

आगे निवेश करना सही है?

Anand Rathi Wealth के मुताबिक, फार्मा सेक्टर की वैल्यूएशन हाल की तेजी के बाद बढ़ गई है। फार्मा इंडेक्स करीब 43 गुना P/E पर कारोबार कर रहा है, जबकि इसका ऐतिहासिक औसत 37-38 गुना रहा है।

उनका मानना है कि अब आगे की तेजी कमाई की वास्तविक ग्रोथ पर निर्भर करेगी। सेक्टोरल फंड में निवेश से कॉन्सेंट्रेशन रिस्क भी बढ़ता है। ऐसे में सिर्फ हाल की तेजी देखकर फार्मा फंड में पैसा लगाने से पहले जोखिम और वैल्यूएशन पर जरूर विचार करना चाहिए।

Disclaimer: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए सलाह या विचार एक्सपर्ट/ब्रोकरेज फर्म के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदायी नहीं है। यूजर्स को मनीकंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले हमेशा सर्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

ट्रम्प ने बोइंग डील के लिए बांग्लादेश को शुक्रिया कहा:PM से बोले- ये फाइटर जेट आपको निराश नहीं करेगा, मैं भी याद रखूंगा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारीक रहमान को पत्र लिखकर बोइंग विमान खरीदने के फैसले के लिए धन्यवाद दिया है। बांग्लादेश PM तारिक रहमान के नाम से 31 अगस्त को लिखी इस चिट्ठी में ट्रम्प ने लिखा, प्रिय प्रधानमंत्री, मुझे बोइंग विमान खरीदने से संबंधित आपकी चिट्ठी मिली। मैं इस फैसले की बहुत तारीफ करता हूं। बोइंग आपको निराश नहीं करेगा और मैं भी इसे नहीं भूलूंगा। मैं आपसे मिलने का इंतजार कर रहा हूं। अमेरिका से 25 बोइंग प्लेन खरीदने की तैयारी में बांग्लादेश बांग्लादेश के पास अभी 14 बोइंग प्लेन हैं। बांग्लादेश ने अप्रैल 2026 में 14 नए बोइंग विमान का ऑर्डर भी दिया था। अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने 30 अगस्त को बताया था कि ट्रम्प और रहमान के बीच बोइंग विमानों को लेकर बड़ी डील हुई है। इसके तहत बांग्लादेश 25 बोइंग विमान खरीदने की तैयारी में है। अमेरिकी टैरिफ से राहत पाने के लिए डील हुई बांग्लादेश की बोइंग खरीद सिर्फ अपनी एयरलाइन का बेड़ा बढ़ाने की योजना नहीं है। इसका एक बड़ा मकसद अमेरिका के साथ व्यापार घाटा कम करना और अमेरिकी टैरिफ में राहत पाना भी है। इसी वजह से बोइंग विमान खरीदने का मुद्दा दोनों देशों के व्यापारिक रिश्तों से भी जुड़ गया है। जब अमेरिका ने बांग्लादेश के सामान पर 37% टैरिफ लगाने की बात कही, तो बांग्लादेश ने अमेरिका से ज्यादा सामान खरीदने की कोशिश शुरू की। इसी दौरान बोइंग से 25 विमान खरीदने की बात सामने आई। बाद में बांग्लादेश ने बोइंग के 14 विमानों का सौदा पक्का किया। इसकी कीमत करीब 3.7 अरब डॉलर है। इसमें 8 बोइंग 787-10, 2 बोइंग 787-9 और 4 बोइंग 737-8 MAX विमान शामिल हैं। पहला विमान नवंबर 2031 में मिलने की उम्मीद है। इस सौदे में अमेरिका का एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट बैंक भी मदद करेगा। बैंक लोन की व्यवस्था करेगा और बांग्लादेश सरकार इस लोन की गारंटी देगी। ट्रम्प के दौर में हुईं बड़ी बोइंग डील ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल में बांग्लादेश के अलावा कम से कम 6 देशों ने अमेरिका से बोइंग के विमान खरीदने का ऐलान किया है। 1. सऊदी अरब: मई 2025 में ट्रम्प की सऊदी अरब यात्रा के दौरान सऊदी कंपनी एविलीज ने बोइंग के 20 विमान खरीदने का पक्का ऑर्डर दिया। कंपनी ने 10 और विमान खरीदने का विकल्प भी रखा। 2. कतर: मई 2025 में ट्रम्प की कतर यात्रा के दौरान कतर एयरवेज और बोइंग के बीच 210 विमानों तक का समझौता हुआ। व्हाइट हाउस ने इसे दोनों देशों के बीच बड़े आर्थिक समझौतों का हिस्सा बताया। 3. इंडोनेशिया: जुलाई 2025 में अमेरिका से 50 बोइंग विमान खरीदने का वादा किया। इसके बदले अमेरिका ने इंडोनेशियाई सामान पर टैरिफ में कटौती की। 4. जापान: जुलाई 2025 में अमेरिका-जापान व्यापार समझौते के तहत जापान ने 100 प्लेन खरीदने की बात कही। इनमें बोइंग विमान शामिल हैं। 5. चीन: मई 2026 में ट्रम्प ने कहा कि चीन 200 बोइंग विमान खरीदने की तैयारी कर रहा है। बाद में बोइंग ने भी इसकी पुष्टि की। 6. साउथ कोरिया: अगस्त 2025 में साउथ कोरिया ने 103 बोइंग विमान खरीदने का ऐलान किया। इसके बाद ट्रम्प ने उन पर लगा 25% टैरिफ घटाकर 10% कर दिया। ——————– यह खबर भी पढ़ें… ट्रम्प बोले- होर्मुज पर जल्द अमेरिका का फुल कंट्रोल होगा अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दावा किया है कि अमेरिका जल्द ही होर्मुज स्ट्रेट पर पूरी तरह कंट्रोल कर लेगा। उन्होंने कहा कि अमेरिकी हमलों में ईरान की नेवी, एयरफोर्स और मिलिट्री लीडरशिप को बहुत नुकसान हुआ है। पूरी खबर पढ़ें…

ट्रम्प ने बोइंग डील के लिए बांग्लादेश को शुक्रिया कहा:PM से बोले- ये फाइटर जेट आपको निराश नहीं करेगा, मैं भी याद रखूंगा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारीक रहमान को पत्र लिखकर बोइंग विमान खरीदने के फैसले के लिए धन्यवाद दिया है। बांग्लादेश PM तारिक रहमान के नाम से 31 अगस्त को लिखी इस चिट्ठी में ट्रम्प ने लिखा, प्रिय प्रधानमंत्री, मुझे बोइंग विमान खरीदने से संबंधित आपकी चिट्ठी मिली। मैं इस फैसले की बहुत तारीफ करता हूं। बोइंग आपको निराश नहीं करेगा और मैं भी इसे नहीं भूलूंगा। मैं आपसे मिलने का इंतजार कर रहा हूं। अमेरिका से 25 बोइंग प्लेन खरीदने की तैयारी में बांग्लादेश बांग्लादेश के पास अभी 14 बोइंग प्लेन हैं। बांग्लादेश ने अप्रैल 2026 में 14 नए बोइंग विमान का ऑर्डर भी दिया था। अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने 30 अगस्त को बताया था कि ट्रम्प और रहमान के बीच बोइंग विमानों को लेकर बड़ी डील हुई है। इसके तहत बांग्लादेश 25 बोइंग विमान खरीदने की तैयारी में है। अमेरिकी टैरिफ से राहत पाने के लिए डील हुई बांग्लादेश की बोइंग खरीद सिर्फ अपनी एयरलाइन का बेड़ा बढ़ाने की योजना नहीं है। इसका एक बड़ा मकसद अमेरिका के साथ व्यापार घाटा कम करना और अमेरिकी टैरिफ में राहत पाना भी है। इसी वजह से बोइंग विमान खरीदने का मुद्दा दोनों देशों के व्यापारिक रिश्तों से भी जुड़ गया है। जब अमेरिका ने बांग्लादेश के सामान पर 37% टैरिफ लगाने की बात कही, तो बांग्लादेश ने अमेरिका से ज्यादा सामान खरीदने की कोशिश शुरू की। इसी दौरान बोइंग से 25 विमान खरीदने की बात सामने आई। बाद में बांग्लादेश ने बोइंग के 14 विमानों का सौदा पक्का किया। इसकी कीमत करीब 3.7 अरब डॉलर है। इसमें 8 बोइंग 787-10, 2 बोइंग 787-9 और 4 बोइंग 737-8 MAX विमान शामिल हैं। पहला विमान नवंबर 2031 में मिलने की उम्मीद है। इस सौदे में अमेरिका का एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट बैंक भी मदद करेगा। बैंक लोन की व्यवस्था करेगा और बांग्लादेश सरकार इस लोन की गारंटी देगी। ट्रम्प के दौर में हुईं बड़ी बोइंग डील ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल में बांग्लादेश के अलावा कम से कम 6 देशों ने अमेरिका से बोइंग के विमान खरीदने का ऐलान किया है। 1. सऊदी अरब: मई 2025 में ट्रम्प की सऊदी अरब यात्रा के दौरान सऊदी कंपनी एविलीज ने बोइंग के 20 विमान खरीदने का पक्का ऑर्डर दिया। कंपनी ने 10 और विमान खरीदने का विकल्प भी रखा। 2. कतर: मई 2025 में ट्रम्प की कतर यात्रा के दौरान कतर एयरवेज और बोइंग के बीच 210 विमानों तक का समझौता हुआ। व्हाइट हाउस ने इसे दोनों देशों के बीच बड़े आर्थिक समझौतों का हिस्सा बताया। 3. इंडोनेशिया: जुलाई 2025 में अमेरिका से 50 बोइंग विमान खरीदने का वादा किया। इसके बदले अमेरिका ने इंडोनेशियाई सामान पर टैरिफ में कटौती की। 4. जापान: जुलाई 2025 में अमेरिका-जापान व्यापार समझौते के तहत जापान ने 100 प्लेन खरीदने की बात कही। इनमें बोइंग विमान शामिल हैं। 5. चीन: मई 2026 में ट्रम्प ने कहा कि चीन 200 बोइंग विमान खरीदने की तैयारी कर रहा है। बाद में बोइंग ने भी इसकी पुष्टि की। 6. साउथ कोरिया: अगस्त 2025 में साउथ कोरिया ने 103 बोइंग विमान खरीदने का ऐलान किया। इसके बाद ट्रम्प ने उन पर लगा 25% टैरिफ घटाकर 10% कर दिया। ट्रम्प बोइंग विमान खरीदने पर क्यों जोर देते हैं अमेरिका में बड़े यात्री विमान बनाने वाली मुख्य कंपनी बोइंग ही है। वहां दूसरी विमान कंपनियां भी हैं, लेकिन वे ज्यादातर सैन्य या छोटे विमानों के कारोबार में हैं। बड़े यात्री विमानों के मामले में बोइंग ही अमेरिका की बड़ी कंपनी है और उसका सबसे बड़ा मुकाबला यूरोप की एयरबस से है। ट्रम्प की व्यापार नीति का सबसे बड़ा मकसद ही यही है कि दूसरे देश अमेरिका से ज्यादा से ज्यादा सामान खरीदें। इससे अमेरिका का व्यापार घाटा कम हो सकता है और अमेरिकी कंपनियों को बड़े ऑर्डर मिल सकते हैं। यहां बोइंग बहुत काम आती है, क्योंकि एक यात्री विमान की कीमत ही करोड़ों डॉलर होती है। अगर कोई देश 50, 100 या 200 विमान खरीदने का सौदा करता है तो अमेरिका से होने वाली खरीद का आंकड़ा एक झटके में अरबों डॉलर बढ़ जाता है। इसका फायदा सिर्फ बोइंग को नहीं मिलता। इनके निर्माण से वहां की फैक्ट्रियों, इंजीनियरों और दूसरे कामगारों को रोजगार मिलता है। उदाहरण के लिए, व्हाइट हाउस ने दक्षिण कोरिया की 103 बोइंग विमानों की डील को करीब 36.2 अरब डॉलर का बताया और कहा कि इससे अमेरिका में करीब 1.35 लाख नौकरियों को मदद मिलेगी। ——————– यह खबर भी पढ़ें… ट्रम्प बोले- होर्मुज पर जल्द अमेरिका का फुल कंट्रोल होगा अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दावा किया है कि अमेरिका जल्द ही होर्मुज स्ट्रेट पर पूरी तरह कंट्रोल कर लेगा। उन्होंने कहा कि अमेरिकी हमलों में ईरान की नेवी, एयरफोर्स और मिलिट्री लीडरशिप को बहुत नुकसान हुआ है। पूरी खबर पढ़ें…