नीदरलैंड्स ने अमेरिका और कनाडा में रखा 86 टन सोना निकालकर लंदन भेज दिया है। डच सेंट्रल बैंक (DNB) ने बताया कि यह ट्रांसफर मार्च से अगस्त के बीच कई महीनों में किया गया। अब यह सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड में रखा गया है। DNB के मुताबिक, संकट की स्थिति में लंदन में रखा सोना ज्यादा आसानी से खरीदा-बेचा जा सकता है। इस ट्रांसफर से पहले DNB के कुल सोने का 31.3% न्यूयॉर्क और 19.7% ओटावा में रखा था। अब दोनों जगहों पर यह हिस्सेदारी घटकर 18.5% रह गई है। वहीं, लंदन में रखे सोने की हिस्सेदारी 18.1% से बढ़कर 32.1% हो गई है। नीदरलैंड्स में 30.8% सोना अभी भी रखा हुआ है। 27 टन सोना न्यूयॉर्क-ओटावा से नीदरलैंड्स लाया गया DNB के मुताबिक, 27 टन सोने की छड़ें न्यूयॉर्क और ओटावा से नीदरलैंड्स के जाइस्ट पहुंचाई गईं। इसके बाद इसी मात्रा और गुणवत्ता का सोना लंदन भेज दिया गया। सोने की छड़ों को पिघलाने की जरूरत नहीं पड़ी। हालांकि, अटलांटिक महासागर के पार इतनी बड़ी मात्रा में सोना किस तरह पहुंचाया गया, इसकी जानकारी बैंक ने नहीं दी। DNB ने बताया कि ट्रांसफर का बाकी हिस्सा अलग तरीके से किया गया। न्यूयॉर्क में सोना बेचा गया और उतनी ही मात्रा का सोना लंदन में दोबारा खरीदा गया। बैंक के मुताबिक, सोने की खरीद-बिक्री और फिजिकल ट्रांसफर को साथ करने से इतनी बड़ी और जटिल प्रक्रिया से जुड़े जोखिम को बांटने में मदद मिली। संकट में लंदन का सोना जल्दी इस्तेमाल हो सकेगा DNB के मुताबिक, बैंक ऑफ इंग्लैंड में रखा सोना दुनिया में सबसे आसानी से ट्रेड होने वाले सोने में माना जाता है। इसलिए किसी संकट के समय इसे अमेरिका या कनाडा में रखे सोने की तुलना में ज्यादा आसानी से बेचा या खरीदा जा सकता है। DNB ने इस फैसले के पीछे “बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव” का हवाला दिया है। हालांकि, बैंक ने यह साफ नहीं किया कि वह किन घटनाओं को लेकर ऐसा कह रहा है। अमेरिका-कनाडा के बीच जारी है ट्रेड विवाद यह फैसला ऐसे समय आया है, जब अमेरिका और कनाडा के बीच ट्रेड विवाद चल रहा है। दोनों देशों के बीच बातचीत फेल होने के बाद एक-दूसरे के सामान पर नए टैरिफ लगाए गए हैं। कनाडा के स्टील, एल्युमिनियम, लकड़ी और ऑटोमोबाइल जैसे प्रमुख सेक्टर अमेरिकी टैरिफ से प्रभावित हुए हैं। अगस्त में अमेरिका ने करीब 28 अरब कनाडाई डॉलर यानी 20 अरब डॉलर के कनाडाई सामान पर अतिरिक्त 50% टैरिफ लगाने का ऐलान किया था। नीदरलैंड्स के पास कुल 612.4 टन सोना DNB के मुताबिक, 2025 के अंत में नीदरलैंड्स के पास कुल 612.4 टन सोना था। इसकी कीमत करीब 72.2 अरब यूरो थी। बैंक ने बताया कि सोने को अलग-अलग जगहों पर रखने की व्यवस्था का मकसद जोखिम को बांटना और संकट के समय सोने तक आसानी से पहुंच बनाए रखना है। लंदन का गोल्ड मार्केट सबसे बड़ा फ्रांस की नेशनल गोल्ड काउंटर के प्रेसिडेंट लॉरेंट श्वार्ट्ज ने कहा कि सेंट्रल बैंक करीब एक दशक से अपने गोल्ड रिजर्व को अलग-अलग जगहों पर शिफ्ट कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिका के मौजूदा राजनीतिक माहौल की वजह से भी कुछ सेंट्रल बैंक सोना रखने के लिए दूसरी जगहों को चुन सकते हैं। श्वार्ट्ज के मुताबिक, लंदन का गोल्ड मार्केट दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे ज्यादा लिक्विड मार्केट है। यानी यहां सोने को आसानी से खरीदा-बेचा जा सकता है। इसलिए संकट के समय लंदन में रखा सोना जल्दी इस्तेमाल किया जा सकता है। सेंट्रल बैंक यहां अपने सोने को दूसरे बैंकिंग संस्थानों को आसानी से उधार भी दे सकते हैं। ——————– ये खबर भी पढ़ें… रूस-यूक्रेन ने ब्लैक सी में 300 जहाजों पर हमले किए:दुनिया में गेहूं-मक्का महंगा होने का खतरा; रूस का अनाज निर्यात 71% घटा रूस-यूक्रेन युद्ध में ब्लैक सी अब जंग का बड़ा मोर्चा बन गया है। पिछले करीब डेढ़ महीने में दोनों देशों ने 300 से ज्यादा जहाजों को निशाना बनाया है। इनमें अनाज ले जाने वाले जहाज, तेल टैंकर और दूसरे मालवाहक पोत शामिल हैं। लगातार हमलों से ब्लैक सी का समुद्री व्यापार प्रभावित हुआ है। पूरी खबर यहां पढ़ें…
Pharma Mutual Funds: पिछले एक साल में फार्मा सेक्टर ने निवेशकों को अच्छा रिटर्न दिया है। Nifty Pharma Index करीब 25% चढ़ा है। वहीं, फार्मा और हेल्थकेयर सेक्टोरल म्यूचुअल फंड्स ने 11% से 30% तक रिटर्न दिया है।
Value Research के आंकड़ों के मुताबिक, 19 एक्टिव फार्मा सेक्टोरल फंड्स में से सिर्फ 10 फंड्स ने एक साल में 20% से ज्यादा रिटर्न दिया। इन फंड्स का औसत रिटर्न 20.7% रहा। BSE Healthcare TRI ने इस दौरान 18.68% रिटर्न दिया।
1 साल में सबसे ज्यादा रिटर्न देने वाले 10 फार्मा फंड
| फंड | 1 साल का रिटर्न |
| Kotak Healthcare Direct | 29.80% |
| HDFC Pharma and Healthcare Direct | 28.85% |
| PGIM India Healthcare Direct | 28.04% |
| Quant Healthcare Direct | 27.02% |
| Bajaj Finserv Healthcare Direct | 26.30% |
WhiteOak Capital Pharma and Healthcare Direct | 25.87% |
ICICI Pru Nifty Pharma Index Direct | 23.89% |
| SBI Healthcare Opportunities Direct | 23.59% |
| Mirae Asset Healthcare Direct | 22.91% |
| Tata Nifty MidSmall Healthcare Index Direct | 20.93% |
डेटा: Value Research, 28 अगस्त 2026 तक
फार्मा सेक्टर क्यों चढ़ा?
फार्मा कंपनियों के शेयरों में तेजी के पीछे कई वजहें रहीं। अमेरिका में भारतीय जेनेरिक दवा कंपनियों के लिए माहौल बेहतर हुआ है। कुछ फार्मा इंपोर्ट पर 100% अमेरिकी टैरिफ से जेनेरिक दवाओं और उनसे जुड़े इंग्रीडिएंट्स को बाहर रखा गया।
घरेलू मांग भी मजबूत बनी हुई है। भारत का फार्मा एक्सपोर्ट FY27 की पहली तिमाही में 6.8% बढ़कर 8.1 अरब डॉलर पहुंच गया। सरकार भी Biopharma SHAKTI जैसी योजनाओं के जरिए सेक्टर में निवेश बढ़ा रही है।
Warren Buffett: वॉरेन बफे ने 1977 में बताए थे निवेश के 5 नियम, आज भी हर निवेशक के लिए हैं काम के
आगे निवेश करना सही है?
Anand Rathi Wealth के मुताबिक, फार्मा सेक्टर की वैल्यूएशन हाल की तेजी के बाद बढ़ गई है। फार्मा इंडेक्स करीब 43 गुना P/E पर कारोबार कर रहा है, जबकि इसका ऐतिहासिक औसत 37-38 गुना रहा है।
उनका मानना है कि अब आगे की तेजी कमाई की वास्तविक ग्रोथ पर निर्भर करेगी। सेक्टोरल फंड में निवेश से कॉन्सेंट्रेशन रिस्क भी बढ़ता है। ऐसे में सिर्फ हाल की तेजी देखकर फार्मा फंड में पैसा लगाने से पहले जोखिम और वैल्यूएशन पर जरूर विचार करना चाहिए।
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारीक रहमान को पत्र लिखकर बोइंग विमान खरीदने के फैसले के लिए धन्यवाद दिया है। बांग्लादेश PM तारिक रहमान के नाम से 31 अगस्त को लिखी इस चिट्ठी में ट्रम्प ने लिखा, प्रिय प्रधानमंत्री, मुझे बोइंग विमान खरीदने से संबंधित आपकी चिट्ठी मिली। मैं इस फैसले की बहुत तारीफ करता हूं। बोइंग आपको निराश नहीं करेगा और मैं भी इसे नहीं भूलूंगा। मैं आपसे मिलने का इंतजार कर रहा हूं। अमेरिका से 25 बोइंग प्लेन खरीदने की तैयारी में बांग्लादेश बांग्लादेश के पास अभी 14 बोइंग प्लेन हैं। बांग्लादेश ने अप्रैल 2026 में 14 नए बोइंग विमान का ऑर्डर भी दिया था। अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने 30 अगस्त को बताया था कि ट्रम्प और रहमान के बीच बोइंग विमानों को लेकर बड़ी डील हुई है। इसके तहत बांग्लादेश 25 बोइंग विमान खरीदने की तैयारी में है। अमेरिकी टैरिफ से राहत पाने के लिए डील हुई बांग्लादेश की बोइंग खरीद सिर्फ अपनी एयरलाइन का बेड़ा बढ़ाने की योजना नहीं है। इसका एक बड़ा मकसद अमेरिका के साथ व्यापार घाटा कम करना और अमेरिकी टैरिफ में राहत पाना भी है। इसी वजह से बोइंग विमान खरीदने का मुद्दा दोनों देशों के व्यापारिक रिश्तों से भी जुड़ गया है। जब अमेरिका ने बांग्लादेश के सामान पर 37% टैरिफ लगाने की बात कही, तो बांग्लादेश ने अमेरिका से ज्यादा सामान खरीदने की कोशिश शुरू की। इसी दौरान बोइंग से 25 विमान खरीदने की बात सामने आई। बाद में बांग्लादेश ने बोइंग के 14 विमानों का सौदा पक्का किया। इसकी कीमत करीब 3.7 अरब डॉलर है। इसमें 8 बोइंग 787-10, 2 बोइंग 787-9 और 4 बोइंग 737-8 MAX विमान शामिल हैं। पहला विमान नवंबर 2031 में मिलने की उम्मीद है। इस सौदे में अमेरिका का एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट बैंक भी मदद करेगा। बैंक लोन की व्यवस्था करेगा और बांग्लादेश सरकार इस लोन की गारंटी देगी। ट्रम्प के दौर में हुईं बड़ी बोइंग डील ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल में बांग्लादेश के अलावा कम से कम 6 देशों ने अमेरिका से बोइंग के विमान खरीदने का ऐलान किया है। 1. सऊदी अरब: मई 2025 में ट्रम्प की सऊदी अरब यात्रा के दौरान सऊदी कंपनी एविलीज ने बोइंग के 20 विमान खरीदने का पक्का ऑर्डर दिया। कंपनी ने 10 और विमान खरीदने का विकल्प भी रखा। 2. कतर: मई 2025 में ट्रम्प की कतर यात्रा के दौरान कतर एयरवेज और बोइंग के बीच 210 विमानों तक का समझौता हुआ। व्हाइट हाउस ने इसे दोनों देशों के बीच बड़े आर्थिक समझौतों का हिस्सा बताया। 3. इंडोनेशिया: जुलाई 2025 में अमेरिका से 50 बोइंग विमान खरीदने का वादा किया। इसके बदले अमेरिका ने इंडोनेशियाई सामान पर टैरिफ में कटौती की। 4. जापान: जुलाई 2025 में अमेरिका-जापान व्यापार समझौते के तहत जापान ने 100 प्लेन खरीदने की बात कही। इनमें बोइंग विमान शामिल हैं। 5. चीन: मई 2026 में ट्रम्प ने कहा कि चीन 200 बोइंग विमान खरीदने की तैयारी कर रहा है। बाद में बोइंग ने भी इसकी पुष्टि की। 6. साउथ कोरिया: अगस्त 2025 में साउथ कोरिया ने 103 बोइंग विमान खरीदने का ऐलान किया। इसके बाद ट्रम्प ने उन पर लगा 25% टैरिफ घटाकर 10% कर दिया। ——————– यह खबर भी पढ़ें… ट्रम्प बोले- होर्मुज पर जल्द अमेरिका का फुल कंट्रोल होगा अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दावा किया है कि अमेरिका जल्द ही होर्मुज स्ट्रेट पर पूरी तरह कंट्रोल कर लेगा। उन्होंने कहा कि अमेरिकी हमलों में ईरान की नेवी, एयरफोर्स और मिलिट्री लीडरशिप को बहुत नुकसान हुआ है। पूरी खबर पढ़ें…
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारीक रहमान को पत्र लिखकर बोइंग विमान खरीदने के फैसले के लिए धन्यवाद दिया है। बांग्लादेश PM तारिक रहमान के नाम से 31 अगस्त को लिखी इस चिट्ठी में ट्रम्प ने लिखा, प्रिय प्रधानमंत्री, मुझे बोइंग विमान खरीदने से संबंधित आपकी चिट्ठी मिली। मैं इस फैसले की बहुत तारीफ करता हूं। बोइंग आपको निराश नहीं करेगा और मैं भी इसे नहीं भूलूंगा। मैं आपसे मिलने का इंतजार कर रहा हूं। अमेरिका से 25 बोइंग प्लेन खरीदने की तैयारी में बांग्लादेश बांग्लादेश के पास अभी 14 बोइंग प्लेन हैं। बांग्लादेश ने अप्रैल 2026 में 14 नए बोइंग विमान का ऑर्डर भी दिया था। अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने 30 अगस्त को बताया था कि ट्रम्प और रहमान के बीच बोइंग विमानों को लेकर बड़ी डील हुई है। इसके तहत बांग्लादेश 25 बोइंग विमान खरीदने की तैयारी में है। अमेरिकी टैरिफ से राहत पाने के लिए डील हुई बांग्लादेश की बोइंग खरीद सिर्फ अपनी एयरलाइन का बेड़ा बढ़ाने की योजना नहीं है। इसका एक बड़ा मकसद अमेरिका के साथ व्यापार घाटा कम करना और अमेरिकी टैरिफ में राहत पाना भी है। इसी वजह से बोइंग विमान खरीदने का मुद्दा दोनों देशों के व्यापारिक रिश्तों से भी जुड़ गया है। जब अमेरिका ने बांग्लादेश के सामान पर 37% टैरिफ लगाने की बात कही, तो बांग्लादेश ने अमेरिका से ज्यादा सामान खरीदने की कोशिश शुरू की। इसी दौरान बोइंग से 25 विमान खरीदने की बात सामने आई। बाद में बांग्लादेश ने बोइंग के 14 विमानों का सौदा पक्का किया। इसकी कीमत करीब 3.7 अरब डॉलर है। इसमें 8 बोइंग 787-10, 2 बोइंग 787-9 और 4 बोइंग 737-8 MAX विमान शामिल हैं। पहला विमान नवंबर 2031 में मिलने की उम्मीद है। इस सौदे में अमेरिका का एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट बैंक भी मदद करेगा। बैंक लोन की व्यवस्था करेगा और बांग्लादेश सरकार इस लोन की गारंटी देगी। ट्रम्प के दौर में हुईं बड़ी बोइंग डील ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल में बांग्लादेश के अलावा कम से कम 6 देशों ने अमेरिका से बोइंग के विमान खरीदने का ऐलान किया है। 1. सऊदी अरब: मई 2025 में ट्रम्प की सऊदी अरब यात्रा के दौरान सऊदी कंपनी एविलीज ने बोइंग के 20 विमान खरीदने का पक्का ऑर्डर दिया। कंपनी ने 10 और विमान खरीदने का विकल्प भी रखा। 2. कतर: मई 2025 में ट्रम्प की कतर यात्रा के दौरान कतर एयरवेज और बोइंग के बीच 210 विमानों तक का समझौता हुआ। व्हाइट हाउस ने इसे दोनों देशों के बीच बड़े आर्थिक समझौतों का हिस्सा बताया। 3. इंडोनेशिया: जुलाई 2025 में अमेरिका से 50 बोइंग विमान खरीदने का वादा किया। इसके बदले अमेरिका ने इंडोनेशियाई सामान पर टैरिफ में कटौती की। 4. जापान: जुलाई 2025 में अमेरिका-जापान व्यापार समझौते के तहत जापान ने 100 प्लेन खरीदने की बात कही। इनमें बोइंग विमान शामिल हैं। 5. चीन: मई 2026 में ट्रम्प ने कहा कि चीन 200 बोइंग विमान खरीदने की तैयारी कर रहा है। बाद में बोइंग ने भी इसकी पुष्टि की। 6. साउथ कोरिया: अगस्त 2025 में साउथ कोरिया ने 103 बोइंग विमान खरीदने का ऐलान किया। इसके बाद ट्रम्प ने उन पर लगा 25% टैरिफ घटाकर 10% कर दिया। ट्रम्प बोइंग विमान खरीदने पर क्यों जोर देते हैं अमेरिका में बड़े यात्री विमान बनाने वाली मुख्य कंपनी बोइंग ही है। वहां दूसरी विमान कंपनियां भी हैं, लेकिन वे ज्यादातर सैन्य या छोटे विमानों के कारोबार में हैं। बड़े यात्री विमानों के मामले में बोइंग ही अमेरिका की बड़ी कंपनी है और उसका सबसे बड़ा मुकाबला यूरोप की एयरबस से है। ट्रम्प की व्यापार नीति का सबसे बड़ा मकसद ही यही है कि दूसरे देश अमेरिका से ज्यादा से ज्यादा सामान खरीदें। इससे अमेरिका का व्यापार घाटा कम हो सकता है और अमेरिकी कंपनियों को बड़े ऑर्डर मिल सकते हैं। यहां बोइंग बहुत काम आती है, क्योंकि एक यात्री विमान की कीमत ही करोड़ों डॉलर होती है। अगर कोई देश 50, 100 या 200 विमान खरीदने का सौदा करता है तो अमेरिका से होने वाली खरीद का आंकड़ा एक झटके में अरबों डॉलर बढ़ जाता है। इसका फायदा सिर्फ बोइंग को नहीं मिलता। इनके निर्माण से वहां की फैक्ट्रियों, इंजीनियरों और दूसरे कामगारों को रोजगार मिलता है। उदाहरण के लिए, व्हाइट हाउस ने दक्षिण कोरिया की 103 बोइंग विमानों की डील को करीब 36.2 अरब डॉलर का बताया और कहा कि इससे अमेरिका में करीब 1.35 लाख नौकरियों को मदद मिलेगी। ——————– यह खबर भी पढ़ें… ट्रम्प बोले- होर्मुज पर जल्द अमेरिका का फुल कंट्रोल होगा अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दावा किया है कि अमेरिका जल्द ही होर्मुज स्ट्रेट पर पूरी तरह कंट्रोल कर लेगा। उन्होंने कहा कि अमेरिकी हमलों में ईरान की नेवी, एयरफोर्स और मिलिट्री लीडरशिप को बहुत नुकसान हुआ है। पूरी खबर पढ़ें…
अमेरिका और कनाडा के बीच ट्रेड वॉर फिर तेज हो गया है। कनाडा ने अमेरिकी सामान पर नए जवाबी टैरिफ लगाने का ऐलान किया है। साथ ही कनाडा सरकार ने प्रभावित कर्मचारियों और कारोबारियों के लिए C$5.4 अरब का राहत पैकेज भी घोषित किया है।
कनाडा की सरकार अमेरिकी सामान पर 15% से 50% तक के जवाबी टैरिफ लगाने की तैयारी कर रही है। ये टैरिफ 8 सितंबर से लागू होंगे। सरकार का कहना है कि इससे अमेरिकी टैरिफ से प्रभावित कंपनियों और कर्मचारियों को राहत देने में मदद मिलेगी।
अमेरिका ने कनाडा के सामान पर 50% तक टैरिफ लगाया
अमेरिका ने शनिवार से कनाडा के कई सामान पर 50% तक के नए टैरिफ लागू कर दिए हैं। इससे करीब 20 अरब डॉलर के कनाडाई एक्सपोर्ट पर असर पड़ने का अनुमान है। यह अमेरिका को कनाडा के कुल एक्सपोर्ट का करीब 5.5% है।
अमेरिका के इस कदम के बाद कनाडा ने जवाबी कार्रवाई का फैसला किया है। Oxford Economics के मुताबिक, नए अमेरिकी टैरिफ से कनाडा के अमेरिका को होने वाले एक्सपोर्ट पर प्रभावी टैरिफ रेट 5.1% से बढ़कर 6.9% हो सकता है।
किन सेक्टर पर ज्यादा असर?
इस ट्रेड विवाद का असर कई इंडस्ट्री पर पड़ सकता है। प्लास्टिक, इलेक्ट्रिकल मशीनरी, लकड़ी और पेपर प्रोडक्ट्स पर इसका बड़ा असर होने की उम्मीद है। Quebec, New Brunswick और Ontario के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर भी दबाव बढ़ सकता है। कंपनियों के लिए लागत और सप्लाई चेन को लेकर अनिश्चितता बढ़ रही है।
ऑटो सेक्टर भी निशाने पर
ट्रेड विवाद अब ऑटो सेक्टर तक भी पहुंच गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि अगले साल कनाडा से आने वाली कारों पर टैरिफ बढ़ाकर 50% किया जा सकता है। फिलहाल गैर-अमेरिकी कंटेंट पर 25% टैरिफ है। इस प्रस्ताव के बाद कनाडाई ऑटो इंडस्ट्री पर दबाव और बढ़ सकता है।
अमेरिका पर कनाडा की बड़ी निर्भरता
कनाडा के लिए यह ट्रेड वॉर इसलिए ज्यादा अहम है क्योंकि उसकी अर्थव्यवस्था अमेरिका के साथ कारोबार पर काफी निर्भर है। कनाडा के कुल एक्सपोर्ट में अमेरिका की हिस्सेदारी करीब 70% है। वहीं कनाडा इस साल अमेरिका का दूसरा सबसे बड़ा गुड्स ट्रेडिंग पार्टनर है।
विवाद अब सिर्फ टैरिफ तक सीमित नहीं
दोनों देशों के बीच तनाव अब ट्रेड से आगे राजनीतिक मुद्दों तक पहुंच गया है। कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने आरोप लगाया कि अमेरिकी वार्ताकारों ने कनाडा के दूसरे देशों के साथ ट्रेड समझौतों और फ्रेंच भाषा व Quebec की संस्कृति से जुड़े मुद्दों पर भी दबाव बनाया।
ट्रंप ने इन आरोपों को खारिज किया है। उन्होंने कहा कि वह कनाडाई लोगों के फ्रेंच बोलने के मामले में कभी दखल नहीं देंगे।
USMCA पर भी नजर
अब दोनों देशों के बीच USMCA यानी US-Mexico-Canada Agreement का भविष्य भी अहम हो गया है। ट्रंप पहले ही संकेत दे चुके हैं कि वह मौजूदा समझौते को उसी रूप में आगे बढ़ाने के पक्ष में नहीं हैं।
US-Canada Trade War: अमेरिका और कनाडा के बीच ट्रेड वॉर यानी व्यापार विवाद और बढ़ गया है। दोनों देशों के बीच आखिरी समय में हुई बातचीत से कोई समझौता नहीं हो सका। इसके बाद अमेरिका ने कनाडा से आने वाले करीब 20 अरब डॉलर (लगभग 1.7 लाख करोड़ रुपये) के सामान पर 50% टैरिफ लगा दिया है। वहीं, जवाब में कनाडा ने भी 8 सितंबर से अमेरिका के खिलाफ इसी तरह के कदम उठाने की घोषणा की है।
बता दें कि अमेरिका के नए टैरिफ का असर कनाडा से अमेरिका को होने वाले सालाना निर्यात के लगभग 5% हिस्से पर पड़ेगा और इसमें हॉकी के सामान, डेयरी उत्पाद, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य सामान सहित कई तरह के उत्पाद शामिल हैं।
कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने कहा कि ओटावा ने बातचीत के दौरान कई रियायतें दीं, लेकिन वॉशिंगटन की उन मांगों को ठुकरा दिया जिन्हें उन्होंने जरूरत से ज्यादा बताया।
उन्होंने X पर लिखा, “एक साल से ज्यादा समय से, कनाडा ने अमेरिका के साथ एक नई और व्यापक व्यापार डील पर बातचीत करने के लिए पूरी ईमानदारी और मेहनत से काम किया है। हमने व्यावहारिक, धैर्यवान और लगातार प्रयास करने वाला रवैया अपनाया है। हमारा मकसद हमेशा कनाडाई लोगों के लिए सबसे अच्छी डील हासिल करना रहा है, न कि किसी भी कीमत पर या किसी भी समय-सीमा में डील करना। कल देर शाम मैंने अपने वार्ताकारों को ओटावा लौटने का निर्देश दिया। हम अमेरिका के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं कर सकते और न ही हम उनकी मांगी गई चीजें देंगे।”
कनाडा डॉलर-के-बदले-डॉलर के हिसाब से टैरिफ लगाकर जवाब देगा
कार्नी ने कहा कि अमेरिका के टैरिफ लागू होने के बाद कनाडा भी जवाबी टैरिफ लगाएगा। इन उपायों में स्टील, डेयरी, घरेलू उपकरण, कृषि उपकरण, पल्प और पेपर, और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे सेक्टर शामिल हो सकते हैं।
कार्नी ने कहा, “आने वाले दिनों में हम इन नए टैरिफ उपायों की जानकारी जारी करेंगे, जो लेबर डे के बाद आने वाले मंगलवार से लागू होंगे।”
कनाडा ने बातचीत के दौरान यह प्रस्ताव भी दिया था कि अगर वॉशिंगटन अपने टैरिफ में काफी कमी करता है, तो वह अमेरिकी स्टील, एल्युमीनियम और ऑटोमोबाइल पर लगे अपने बाकी जवाबी टैरिफ हटा लेगा। ओटावा ने यह भी संकेत दिया था कि प्रांत अमेरिकी शराब उत्पादों को अपने बाजार में वापस आने की इजाजत दे सकते हैं।
हालांकि, कार्नी ने कहा कि अमेरिका के अंतिम प्रस्ताव कनाडा की स्वीकार करने की क्षमता से कहीं अधिक थे।
अमेरिका का दावा- कनाडा ने बेहतर डील ठुकराई
अमेरिकी ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव जेमिसन ग्रीर ने वॉशिंगटन के रुख का बचाव करते हुए कहा कि ट्रंप प्रशासन ने कनाडा के लिए अहम उत्पादों – जैसे स्टील, ऑटोमोबाइल और लकड़ी – पर रियायतें देने की पेशकश की थी।
ग्रीर ने कहा, “हम ऐसे कदम उठा रहे हैं जो कनाडा की जवाबी कार्रवाई का जवाब देंगे।”
उन्होंने तर्क दिया कि कनाडा को बेहतर शर्तें ऑफर की गई थीं, लेकिन उसने उन्हें स्वीकार नहीं किया।
आखिरी समय की मांगों की वजह से बातचीत टूट गई
कार्नी के मुताबिक, अमेरिका की आखिरी मांगों में ऐसी शर्तें शामिल थीं जिनसे कनाडा में बनी गाड़ियों पर टैरिफ में मिलने वाली छूट कम हो जाती, दूसरे देशों के साथ ट्रेड एग्रीमेंट करने की कनाडा की क्षमता सीमित हो जाती और भाषा, संस्कृति व संप्रभुता से जुड़ी सुरक्षा पर असर पड़ता।
कार्नी ने इन मांगों को “अस्वीकार्य” बताया और कहा कि कनाडा अब अमेरिका के साथ पहले जैसे रिश्तों की स्थिति में वापस नहीं जाएगा।
बातचीत टूटने की यह घटना ऐसे समय में हुई है, जब कुछ दिन पहले ही दोनों देशों के अधिकारियों ने उम्मीद जताई थी कि वे किसी समझौते पर पहुंचने के करीब हैं।
USMCA के भविष्य पर सवाल
बढ़ते विवाद ने यूनाइटेड स्टेट्स-मेक्सिको-कनाडा एग्रीमेंट (USMCA) के भविष्य पर भी चिंताएं बढ़ा दी हैं। यह नॉर्थ अमेरिकन ट्रेड पैक्ट इन तीनों देशों के बीच होने वाले व्यापार के एक बड़े हिस्से को नियंत्रित करता है।
अमेरिका पहले ही मैक्सिको के साथ इस समझौते में बदलाव को लेकर बातचीत शुरू कर चुका है, लेकिन कनाडा के साथ अभी तक औपचारिक बातचीत शुरू नहीं हुई है।
अमेरिका और कनाडा के बीच बढ़ता यह विवाद लंबे समय से सहयोगी रहे इन दोनों देशों के रिश्तों में एक बड़ा बदलाव दिखाता है। पिछले साल अमेरिका और कनाडा के बीच लगभग 880 अरब डॉलर का सामान और सेवाएं एक्सचेंज की गईं, जिससे वे व्यापार के लिए एक-दूसरे पर बहुत ज्यादा निर्भर हो गए हैं।
पुराने सहयोगी देशों के रिश्तों में बढ़ा तनाव
टैरिफ को लेकर यह ताजा विवाद वॉशिंगटन और ओटावा के बीच महीनों से बढ़ते तनाव के बाद शुरू हुआ है। ट्रंप ने अमेरिका में मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए बार-बार टैरिफ लगाने पर जोर दिया है और कनाडा के अमेरिका का 51वां राज्य बनने के बारे में विवादित बातें भी कही हैं।
कार्नी ने दोनों देशों के रिश्तों में आ रहे बदलाव को स्वीकार करते हुए कहा कि कनाडा ने यह समझ लिया है कि “अमेरिका बदल गया है” और दोनों देश “अपने पुराने रिश्तों की स्थिति में वापस नहीं लौटेंगे।”
बता दें कि कनाडा अपने सामान का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा अमेरिका को निर्यात करता है, इसलिए यह विवाद कनाडाई कारोबारियों और कर्मचारियों के लिए बहुत अहम है।
ओंटारियो के प्रीमियर डग फोर्ड ने कार्नी के जवाब का समर्थन किया है। उन्होंने “टैरिफ के बदले टैरिफ और डॉलर के बदले डॉलर” के आधार पर जवाबी कार्रवाई करने की बात कही और कहा कि “सभी विकल्पों पर विचार किया जाना चाहिए।”
ट्रंप ने नए टैरिफ के लिए 1930 के ट्रेड लॉ का इस्तेमाल किया
ये नए टैरिफ US टैरिफ एक्ट, 1930 की धारा 338 पर आधारित हैं। इस नियम के तहत US राष्ट्रपति उन देशों से होने वाले इंपोर्ट पर 50% तक टैरिफ लगा सकते हैं, जिन्होंने अमेरिकी कारोबारों के साथ भेदभाव किया हो।
यह नियम ‘महामंदी’ (Great Depression) के दौर का है और पहले कभी भी इस तरह से टैरिफ लगाने के लिए इसका इस्तेमाल नहीं किया गया है।
इन नए कदमों से वह ट्रेड विवाद और गहरा हो गया है, जिसने दुनिया के सबसे करीबी आर्थिक और राजनीतिक रिश्तों में से एक पर पहले ही तनाव पैदा कर दिया है। फिलहाल आगे कोई बातचीत तय नहीं है, इसलिए दोनों देश अब टैरिफ विवाद के अगले दौर की तैयारी कर रहे हैं।
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