अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भारत को ‘रिफाइनिंग सुपरपावर’ बताया। उन्होंने कहा कि भारत के पास भारी कच्चे तेल को रिफाइन करके पेट्रोल, डीजल और दूसरे ईंधन बनाने की क्षमता है। न्यूज एजेंसी ANI से बात करते हुए मार्को रुबियो ने कहा, मेरा मानना है कि जैसे-जैसे वेनेजुएला का ज्यादा तेल बाजार में आएगा, भारत उसे रिफाइन कर सकता है। इससे दुनिया में तेल आपूर्ति बढ़ाने में मदद मिलेगी। भारतीय कंपनियां वेनेजुएला में भी बढ़ा सकती हैं तेल उत्पादन रुबियो ने वेनेजुएला में भारतीय कंपनियों की मौजूदा तेल परियोजनाओं का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि भारतीय कंपनियां वहां पहले से मौजूद तेल संपत्तियों से उत्पादन बढ़ा सकती हैं। रुबियो के मुताबिक, इस मुद्दे पर भारत के साथ पहले भी बातचीत हो चुकी है। उन्होंने कहा कि भारत इस दिशा में काम करने के लिए तैयार और इच्छुक नजर आ रहा है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस योजना को आगे बढ़ाने में अमेरिकी प्रतिबंधों और अन्य पाबंदियों से जुड़े मुद्दे सामने आ सकते हैं। इन पर अमेरिका और भारत को मिलकर काम करना होगा। रुबियो बोले- दोनों देश 21वीं सदी की दिशा तय कर सकते हैं मुंबई में ‘फ्रीडम 250’ कार्यक्रम में अमेरिकी विदेश मंत्री ने भारत और अमेरिका के बीच उन अहम मुद्दों पर असाधारण तालमेल है, जो दोनों देशों के राष्ट्रीय हितों को तय करते हैं। उन्होंने कहा कि दुनिया की दो बड़ी शक्तियां मिलकर 21वीं सदी की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। रुबियो ने कहा, दुनिया के कोई भी दो देश हर मुद्दे पर पूरी तरह सहमत नहीं हो सकते। कुछ मामलों में मतभेद होंगे। लेकिन उन अहम मुद्दों पर, जो भारत और अमेरिका के राष्ट्रीय हितों को तय करते हैं, दोनों देशों के बीच असाधारण तालमेल है। जयशंकर बोले- भारत-अमेरिका के रिश्ते लगातार मजबूत हुए विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि भारत और अमेरिका के संबंध पिछले कई दशकों में काफी आगे बढ़े हैं। दोनों देशों के बीच सहयोग अब बुनियादी ढांचे, शिक्षा, खाद्य और कृषि, तकनीक, ऊर्जा, रक्षा और नागरिक उड्डयन जैसे कई क्षेत्रों तक फैल चुका है। जयशंकर ने कहा, हमारे संबंधों ने वास्तव में लंबा सफर तय किया है। इतिहास में दर्ज है कि कई अमेरिकी भारत के स्वतंत्रता संघर्ष के समर्थक थे। आजादी के बाद भी हमारी साझेदारी ने भारत के विकास में वास्तविक योगदान दिया है। जयशंकर ने अमेरिकी तकनीकी क्षेत्र में भारतीय प्रतिभाओं के योगदान को भी अहम बताया। उन्होंने माना कि वैश्विक चुनौतियों से निपटने के तरीकों को लेकर दोनों देशों के बीच अलग-अलग राय रही है। इसके बावजूद पिछले कुछ दशकों में साझेदारी लगातार बढ़ी है और इसमें सहयोग के नए क्षेत्र जुड़ते गए हैं। मार्को रुबियो और मुकेश अंबानी की कल मुलाकात अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो बुधवार को जामनगर में दुनिया के सबसे बड़े रिफाइनरी कॉम्प्लेक्स का दौरा करेंगे। इस दौरान वे रिलायंस के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर मुकेश अंबानी से भी मिलेंगे। रूबियो रिलायंस के साथ वेनेजुएला का कच्चा तेल रिफाइन करने पर बातचीत करेंगे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक रिलायंस इंडस्ट्रीज अमेरिका के टेक्सास में एक ऑइल रिफाइनरी में बड़ा निवेश करने की तैयारी में है, जो 50 साल में अमेरिका में बनने वाली पहली रिफाइनरी होगी।इसी वजह से यह मुलाकात काफी अहम मानी जा रही है। रूबियो का जामनगर दौरा 3 वजहों से अहम… 1. अमेरिका में डीजल 155 रुपए के पार अमेरिका में डीजल की कीमतें 6 डॉलर प्रति गैलन के पार हैं, यानी करीब 155 रुपए प्रति लीटर। इसके चलते ट्रक ड्राइवर, किसान और माल ढुलाई कारोबारी परेशान हैं। ट्रम्प सरकार चाहती है कि 3 नवंबर को होने वाले मिड टर्म इलेक्शन से पहले अमेरिका में पर्याप्त डीजल सप्लाई हो सके। इसलिए अमेरिका रूस से डीजल खरीद रहा है। रिलायंस भी सस्ती कीमतों में कच्चा तेल रिफाइन करके अमेरिका को पेट्रोल-डीजल बेच सकता है, जिससे अमेरिका फ्यूल क्राइसिस से बच सके। 2. वेनेजुएला से और तेल खरीदे रिलायंस जनवरी में वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को गिरफ्तार करने के बाद से अमेरिकी सरकार ही विदेशों में वेनेजुएला का तेल बेच रही है। रिलायंस वेनेजुएला के सबसे बड़े तेल खरीदारों में से एक है। ग्लोबल ट्रेड इंटेलिजेंस फर्म Kpler के मुताबिक, सितंबर में भारत ने वेनेजुएला से रोजाना 2.57 लाख बैरल तेल मंगाया। इसका 76% हिस्सा रिलायंस ने खरीदा। अमेरिका चाहता है कि रिलायंस वेनेजुएला से और ज्यादा तेल खरीदे। क्योंकि अमेरिका कई बार कह चुका है कि भारत वेनेजुएला से तेल खरीदे। हालांकि सरकारी तेल कंपनियों ने ऐसा नहीं किया। 3. अमेरिका में रिलायंस का 300 अरब डॉलर का निवेश रिलायंस अमेरिका के टेक्सास राज्य में एक नई रिफाइनरी खोल रही है, जो 50 साल में अमेरिका में बनने वाली पहली रिफाइनरी होगी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने मार्च 2026 में इसे 300 अरब डॉलर का सौदा बताया था। अमेरिका चाहता है कि ये निवेश जल्द से जल्द हो। दुनिया की सबसे बड़ी रिफाइनरी है जामनगर रिलायंस के मुताबिक, जामनगर रिफाइनरी एक ही जगह पर बनी दुनिया की सबसे बड़ी और आधुनिक रिफाइनरी है। यहां हर दिन 14 लाख बैरल कच्चे तेल को प्रोसेस करने की क्षमता है।
Bengaluru-Mumbai Vande Bharat: बेंगलुरु और मुंबई के बीच ट्रेन से सफर करने वाले यात्रियों को दक्षिण रेलवे इस कर्नाटक राज्योत्सव के मौके पर बड़ी सौगात दे सकता है। अभी इन दोनों मेट्रो शहरों के बीच 1,118 km की दूरी तय करने में सबसे तेज उद्यान एक्सप्रेस को लगभग 24 घंटे लगते थे। लेकिन, इस कर्नाटक राज्योत्सव में यह बदल सकता है, क्योंकि साउथ वेस्टर्न रेलवे 1 नवंबर को बेंगलुरु-मुंबई वंदे भारत स्लीपर एक्सप्रेस की पहली स्पेशल ट्रेन चलाने का प्रस्ताव दे रहा है।
इस प्रस्तावित सेवा से दोनों शहरों के बीच सफर का समय 24 घंटे से घटकर लगभग 16 घंटे होने की उम्मीद है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि कर्नाटक के बढ़ते यात्री ट्रैफिक के लिए रेल कनेक्टिविटी को और बढ़ाना जरूरी है, जिसमें बेंगलुरु को मुंबई, हैदराबाद और चेन्नई से जोड़ने वाली तेज ट्रेनें हों। कर्नाटक के लिए, 1 नवंबर का प्रस्ताव एक अच्छी शुरुआत हो सकता है। अगर यह योजना आगे बढ़ती है, तो यह भारत के दो सबसे बड़े आर्थिक केंद्रों को जोड़ने वाले रेल नेटवर्क में एक बड़ा मील का पत्थर होगा।
16 घंटे में पूरा होगा 1,118 km का सफर
इस प्रस्तावित सेवा से 1,118 km का सफर लगभग 16 घंटे में पूरा होने की उम्मीद है, जिससे सफर का समय लगभग आठ घंटे कम हो जाएगा। हालाकि, नियमित व्यावसायिक सेवा शुरू होने की तारीख अभी घोषित नहीं की गई है। उम्मीद है कि केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव पहली स्पेशल ट्रेन को हरी झंडी दिखाएंगे। यह ट्रेन दक्षिण भारत में पहली वंदे भारत स्लीपर सर्विस होगी। रेलवे सूत्रों के अनुसार, प्रस्तावित ट्रेन अक्टूबर में लॉन्च नहीं की जा सकी क्योंकि कर्नाटक विधान परिषद चुनावों के लिए आचार संहिता लागू थी।
16 कोच की होगी ट्रेन
बेंगलुरु-मुंबई वंदे भारत स्लीपर एक्सप्रेस में 16 कोच होंगे, 11 AC थ्री-टियर, चार AC टू-टियर और एक AC फर्स्ट-क्लास कोच, जिनकी कुल क्षमता 823 बर्थ होगी। सफर का किराया क्लास के आधार पर ₹2,600 और ₹4,250 के बीच होने की उम्मीद है, हालांकि फाइनल किराया अभी घोषित नहीं किया गया है। प्रस्तावित रूट में ट्रेन मुंबई पहुंचने से पहले अनंतपुर, गुंटकल, रायचूर, कलबुर्गी, सोलापुर और कल्याण से गुजरेगी।
‘हमें सिर्फ एक नहीं, बल्कि और ट्रेनों की जरूरत है’
एक शहरी यातायात विशेषज्ञ ने नाम न बताने की शर्त पर News18 से बात की। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित सेवा का स्वागत है, लेकिन कर्नाटक को रेल नेटवर्क के और भी बड़े विस्तार की जरूरत है। एक्सपर्ट ने बड़ी संख्या में यात्रियों के बेंगलुरु आने-जाने की ओर इशारा किया। खासकर, छुट्टियों के दौरान देश भर के लोगों के लिए एक डेस्टिनेशन के रूप में शहर की खास स्थिति देखने को मिलती है। एक्सपर्ट ने तर्क दिया कि कर्नाटक को दशकों से रेलवे ने कम आंका है और उसे अलग-अलग रूटों पर कई सेवाओं की जरूरत है।
त्योहारों के मौसम में यात्रा की मांग तेजी से बढ़ती है और यात्रियों को अक्सर सस्ते टिकट खोजने में मुश्किल होती है। बेंगलुरु और मुंबई के बीच एक तेज ट्रेन राहत दे सकती है, लेकिन शहर को दूसरी बड़ी जगहों से जोड़ने के लिए और ज्यादा सर्विस की जरूरत है।
अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो मंगलवार को तीन दिवसीय भारत दौरे पर मुंबई पहुंचे हैं। इस दौरे के दौरान भारत और अमेरिका के बीच व्यापार और रणनीतिक संबंधों को मजबूत करने पर चर्चा होने की उम्मीद है। अमेरिका के विदेश मंत्री रुबियो ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ होने वाली बैठक से पहले दोनों देशों के बीच सहयोग और आगे की योजनाओं को लेकर अपनी बात रखी। उनके इस दौरे को भारत-अमेरिका संबंधों के लिहाज से अहम माना जा रहा है। मुंबई में पत्रकारों से बातचीत के दौरान मार्को रुबियो ने कई अहम अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी बात रखी।
उन्होंने यूक्रेन युद्ध, अमेरिका के हथियार नियंत्रण से जुड़े मामलों और रूस से तेल खरीदने को लेकर जारी चर्चाओं जैसे विषयों पर चर्चा की। इन मुद्दों को लेकर भारत और अमेरिका के बीच होने वाली बातचीत पर भी सबकी नजरें टिकी हुई हैं।
पॉजिटिव नतीजे देखने को मिलेगा
लंबे समय से चर्चा में चल रहे भारत-अमेरिका द्विपक्षीय समझौते की स्थिति पर बात करते हुए मार्को रुबियो ने साफ किया कि अमेरिकी विदेश विभाग सीधे तौर पर व्यापार समझौते पर बातचीत नहीं करता है। उन्होंने कहा, “ट्रेड एग्रीमेंट पर बातचीत की जिम्मेदारी विदेश विभाग की नहीं है, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में हमारी अहम भूमिका है। मैं और मेरे काउंटरपार्ट, नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर इस समझौते को लेकर काफी गंभीर हैं। हम इसे पूरा करने के बेहद करीब हैं। मेरा मानना है कि समझौते को अंतिम रूप देने के लिए अब केवल कुछ मुद्दों पर काम करना बाकी है, इसलिए इसके जल्द पूरा होने की उम्मीद है।”
उन्होंने आगे कहा कि, “हम चाहते हैं कि जल्द ही इस बारे में अच्छी खबर सामने आए और इसके बाद समझौते पर हस्ताक्षर किए जाएं। हमें पूरा भरोसा है कि आने वाले समय में इस दिशा में पॉजिटिव नतीजे देखने को मिलेंगे।”
रिलायंस के साथ होगी बैठक
इसके अलावा, उन्होंने बताया कि अमेरिकी डेलीगेशन वेनेजुएला में तेल उत्पादन को लेकर रिलायंस के साथ बैठक करेगा। उन्होंने कहा कि भारत ने अपनी पेट्रोलियम खरीद के स्रोतों में विविधता लाने की दिशा में काफी प्रगति की है, जिसे उन्होंने एक समझदारी भरा कदम बताया।
ग्लोबल एनर्जी जरूरतों को पूरा करने में भारत की भूमिका पर बात करते हुए मार्को रुबियो ने कहा कि, “भारत तेल रिफाइनिंग के मामले में काफी मजबूत है। उन्होंने बताया कि भारत के पास भारी कच्चे तेल को साफ करने और उससे उपयोगी ईंधन बनाने की क्षमता है और वह पहले भी ऐसा कर चुका है।” रुबियो के मुताबिक, “वेनेजुएला से तेल की आपूर्ति बढ़ने पर भारत इसका इस्तेमाल कर सकता है। उन्होंने ये भी कहा कि भारत के पास वेनेजुएला में पहले से ही तेल उत्पादन से जुड़े अधिकार हैं, जिनकी मदद से वह वहां अपना तेल उत्पादन बढ़ा सकता है।”
मार्को रुबियो ने तेल को लेकर क्या कहा
उन्होंने आगे कहा, “ये सभी सकारात्मक बातें हैं। मैं यह नहीं कह रहा कि दुनिया भर में चल रही घटनाओं के कारण तेल की आपूर्ति में जो कमी आ सकती है, उसे केवल वेनेजुएला ही पूरा कर सकता है। लेकिन मेरा मानना है कि लंबे समय में वेनेजुएला इसमें अहम योगदान दे सकता है और कम समय में भी कुछ राहत पहुंचा सकता है। यह उन मुद्दों में से एक है, जिन पर हम चर्चा करेंगे। भारत के साथ इस विषय पर पहले भी बातचीत हो चुकी है और वह इसके लिए तैयार नजर आ रहा है। भारत इस दिशा में आगे बढ़ने को इच्छुक है, हालांकि पाबंदियों से जुड़ी कुछ बाधाएं सामने आ सकती हैं, जिनका हमें समाधान निकालना होगा।”
दोनों देशों के संबंधों को और मजबूत बनाना
अपने भारत दौरे के महत्व पर बात करते हुए मार्को रुबियो ने कहा कि, “भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर इस साल चार बार अमेरिका का दौरा कर चुके हैं।” उन्होंने भारत को दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश और सबसे बड़ा लोकतंत्र बताते हुए कहा कि, अमेरिका के लिए भारत एक अहम व्यापारिक और कारोबारी साझेदार है। रुबियो ने दोनों देशों के बीच रक्षा क्षेत्र में सहयोग और क्वाड में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका का भी जिक्र किया। उन्होंने भारत को अमेरिका का मजबूत रणनीतिक साझेदार बताया और कहा कि दोनों देशों के बीच संबंधों को और मजबूत बनाने के लिए अमेरिकी अधिकारियों को भारत के अधिक दौरे करने चाहिए।
यूक्रेन को लेकर क्या कहा
इसके अलावा, मार्को रुबियो ने यूक्रेन युद्ध और अमेरिका के हथियार नियंत्रण से जुड़े अहम अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी अपनी बात रखी। उन खबरों पर प्रतिक्रिया देते हुए, जिनमें कहा गया था कि डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने अमेरिकी रक्षा प्रणाली इस्तेमाल करने वाले सहयोगी देशों को यूक्रेन के लिए पैट्रियट मिसाइलें भेजने की मंजूरी रोक दी थी, रुबियो ने कहा कि यूक्रेन को जानबूझकर किसी भी तरह की मदद से वंचित नहीं किया जा रहा था। उन्होंने यह भी बताया कि ट्रंप उन आरोपों से नाराज थे, जिनमें कहा जा रहा था कि उनके फैसलों से यूक्रेन की स्थिति कमजोर हो रही है।
इसके अलावा, मार्को रुबियो ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि अगर चीन, रूस और अमेरिका के बीच हथियारों पर नियंत्रण को लेकर सहमति बनती है, तो यह पूरी दुनिया के लिए एक सकारात्मक कदम होगा। उन्होंने संकेत दिया कि इन तीनों देशों के बीच इस मुद्दे पर बातचीत आगे बढ़ने से वैश्विक सुरक्षा को मजबूत करने में मदद मिल सकती है।
अमेरिका में चुनाव के दौरान वोटरों को प्रभावित करने के लिए भारत से सोशल मीडिया पर वीडियो फैलाए गए। इन वीडियो में आम लोग सड़कों पर खड़े होकर एक उम्मीदवार की तारीफ करते और महंगाई जैसे मुद्दों पर अपनी राय देते नजर आए। वीडियो ऐसे बनाए गए थे, जैसे लोग अपनी मर्जी से उम्मीदवार का समर्थन कर रहे हों। लेकिन इन्हें सोशल मीडिया पर पोस्ट करने के लिए पैसे दिए जा रहे थे। मुंबई में बैठा आयुष जैन हर पोस्ट के बदले करीब 15 डॉलर (1400 रुपए) कमा रहा था। गलत जानकारी फैलाने वाले सोशल मीडिया पोस्ट पर नजर रखने वाले दो रिसर्च ग्रुप्स के मुताबिक, इन वीडियो को पोस्ट करने वाले ज्यादातर अकाउंट भारत से चलाए जा रहे थे। डेमोक्रेट उम्मीदवार के समर्थन में 36 वीडियो पोस्ट किए गए यह मामला अगस्त में मिशिगन राज्य में सीनेट चुनाव के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार को चुनने से पहले का है। सोशल मीडिया पर कम से कम 36 वीडियो पोस्ट किए गए जिन्हें लाखों बार देखा गया। एक्स, फेसबुक, इंस्टाग्राम और थ्रेड्स पर डाले गए इन वीडियो में ज्यादातर सांसद हेली स्टीवंस की तारीफ की गई थी। इनमें लोग महंगाई और रोजी-रोटी जैसे मुद्दों पर बात करते हुए स्टीवंस का समर्थन करते नजर आए। हालांकि, वीडियो बनाने वालों की पहचान सामने नहीं आई है और यह भी साफ नहीं है कि इनके पीछे पैसा किसने लगाया था। रिपोर्ट के मुताबिक, यह अभियान स्टीवंस को उनके प्रतिद्वंद्वी डॉ. अब्दुल एल-सैयद के खिलाफ जीत दिलाने की कोशिश कर रहे किसी राजनीतिक समूह से जुड़ा हो सकता है। लेकिन इन वीडियो को फैलाने में स्टीवंस के चुनाव अभियान या उनके समर्थक समूहों का हाथ होने का कोई सबूत सामने नहीं आया है। 4 अगस्त को चुनाव में एल-सैयद ने जीत हासिल की। हर 1000 व्यू पर मिलते थे 1 से 5 डॉलर पेंसिल्वेनिया की कंपनी ने आयुष को काम पर रखा था अमेरिका के पेंसिल्वेनिया राज्य की ‘लुमिना क्लिपर्स’ नाम की एक कंपनी ने आयुष जैन को हायर किया था। यह कंपनी सोशल मीडिया पर बॉट अकाउंट के जरिए पोस्ट की पहुंच बढ़ाने का काम करती है। बॉट ऐसे अकाउंट होते हैं, जिनका इस्तेमाल बड़ी संख्या में पोस्ट और इन्फोर्मेशन फैलाने के लिए किया जा सकता है। इस कंपनी का फोन नंबर UAE का है और इसे पुर्तगाल में रहने वाले आयरलैंड के नागरिक राइस मैके चलाते हैं। मैके ने माना कि उनकी कंपनी ने मिशिगन के इन वीडियो को फैलाने में भूमिका निभाई थी। इसके लिए आयुष जैन और उनके जैसे दर्जनों अन्य लोगों को काम पर रखा गया था। हालांकि, उन्होंने यह बताने से इनकार कर दिया कि उन्हें यह काम किसने दिया था और इसके लिए कितना पैसा खर्च हुआ। 28 अकाउंट ने पैसे लेकर फैलाए वीडियो इस अभियान का सबसे पहले पता ‘एंटीबॉट4नवालनी’ नाम के समूह ने लगाया। समूह ने एक्स पर ऐसे 28 अकाउंट की पहचान की, जो पैसे लेकर वीडियो पोस्ट कर रहे थे। इन पोस्ट को 70 लाख से ज्यादा बार देखा गया। इसके बाद क्लेमसन यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने फेसबुक, इंस्टाग्राम और थ्रेड्स पर भी ऐसे अकाउंट खोजे। इनमें से कुछ अकाउंट पहले चीन से जुड़े बॉट नेटवर्क के जरिए चलाए गए अभियानों में भी सामने आ चुके थे। रिसर्चर्स के मुताबिक, ये अकाउंट आम तौर पर कार्टून और मनोरंजन से जुड़े वीडियो पोस्ट करते थे लेकिन चुनाव के दौरान अचानक राजनीतिक वीडियो फैलाने लगे। डेमोक्रेटिक पार्टी के सीनेट उम्मीदवार के चुनाव के बाद भी इन अकाउंट से राजनीतिक पोस्ट जारी रहीं। इनमें कैलिफोर्निया में गवर्नर पद के रिपब्लिकन उम्मीदवार स्टीव हिल्टन के समर्थन वाली पोस्ट भी शामिल थीं। ————————– यह खबर भी पढ़ें… ट्रम्प मिडटर्म चुनाव हार सकते हैं:10 में से 9 सर्वे में पीछे, महंगाई-ईरान जंग से लोकप्रियता घटी, अपने ही उम्मीदवार दूरी बना रहे अमेरिका में 3 नवंबर को होने वाले मिडटर्म चुनाव राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की पार्टी के लिए मुश्किल खड़ी कर सकते हैं। पूरी खबर पढ़ें…

ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस पार्टी ने फैसला कर लिया है कि वह सरकार को चैन नहीं लेने देगी। इसके लिए उसने तय किया है कि वह सरकार के हर फैसले को संदिग्ध बना देगी और हर कदम पर उससे सवाल करेगी। इसका पता नहीं कितना राजनीतिक लाभ मिलेगा लेकिन यह जरूर है कि भाजपा और सरकार के तंत्र को जवाब देने में बड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर और पहले से चल रहे विवादों को छोड़ दें तो हाल के दो मामले ऐसे हैं, जिनमें ऊपरी तौर पर कोई गड़बड़ी नहीं दिख रही है लेकिन कांग्रेस ने इसे मुद्दा बना दिया और ऐसा विवाद खड़ा किया कि सरकार बैकफुट पर आ गई है।
पहला मामला अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो के भारत दौरे से जुड़ा है। विदेश मंत्री एस जयशंकर और रूबियो की मुलाकात मुंबई में तय हुई है। इस पर राहुल गांधी ने कहा कि अमेरिका के विदेश मंत्री ने अपने कर्मचारी को मुंबई तलब किया। इस बात को कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने भी आगे बढ़ाया। अब सोचें, भारत के दौरे पर आ रहे अमेरिका के विदेश मंत्री से अगर भारत के विदेश मंत्री देश के किसी और शहर में मिलेंगे तो यह कहा जाएगा कि उनको वहां तलब किया गया? भारत के विदेश मंत्री को अमेरिकी विदेश मंत्री का कर्मचारी बता कर राहुल कौन सा नैरेटिव सेट कर रहे हैं? लेकिन उन्होंने जानते बूझते ऐसा कर दिया क्योंकि उनको पता है कि सरकार इस पर भी बैकफुट पर आएगी। कई बार ऐसा होता है कि नेता राजधानी से इतर दूसरे शहरों में मिलते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन गए तो राष्ट्रपति शी जिनपिंग से उनकी मुलाकात वुहान में हुई। तो क्या कहा जा सकता है कि मोदी ने जिनपिंग को वुहान तलब किया?
बहरहाल, दूसरा मामला जनगणना के नियमों में बदलाव का है। भारत के महापंजीयक ने अगले साल होने वाली जनगणना में सरकारी कर्मचारियों और शिक्षकों के अलावा निजी स्कूलों के शिक्षकों व कर्मचारियों और वॉलंटियर्स को भी शामिल करने का फैसला किया है। महापंजीयक कार्यालय की ओर से इसका आदेश निकला तो कांग्रेस ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के लोगों के लिए रोजगार योजना है। जबकि यह एक अच्छी पहल है कि वॉलंटियर्स को प्रशिक्षण देकर इस तरह के कामों में लगाया जाए। इससे स्कूलों में शिक्षकों की कमी से होने वाली समस्याएं कम होंगी, स्कूलों में पढ़ाई का काम कम प्रभावित होगा और सरकारी कार्यालयों के कामकाज में आने वाली बाधा भी दूर होगी। इसी तरह की योजना के तहत अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली में अपनी सरकार रहते हुए अपने कार्याकर्ताओं को सिविल डिफेंस वॉलंयिटर्स के रूप में भर्ती किए थे। अपने लोगों को बस मार्शल में रखा था और चौराहों पर तख्ती लेकर खड़े होने के लिए भी अपने लोगों को चुना था। अगर यह रोजगार की भी योजना है तो इससे कुछ लोगों को काम मिलेगा।

इलॉन मस्क ने कुछ रोज पहले पूछा था कि क्या मुकेश अंबानी भारत के असली बॉस हैं? अब ऐसा लगता है कि अंदरूनी तौर पर डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन में सचमुच ऐसी राय बनी गई है!
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की ताजा भारत यात्रा के सिलसिले में यह उचित सवाल उठा है कि क्या अमेरिका अब भारत के साथ अपने संबंध में कूटनीतिक मर्यादा का पालन करने की जरूरत भी नहीं समझ रहा है। अरबपति अमेरिकी कारोबारी इलॉन मस्क ने कुछ रोज पहले पूछा था कि क्या मुकेश अंबानी भारत के असली बॉस हैं? अब ऐसा लगता है कि अंदरूनी तौर पर ऐसी ही राय डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन में बनी है। इसलिए रुबियो भारतीय कारोबारियों- खासकर रिलायंस ग्रुप के साथ व्यापारिक वार्ता के लिए सीधे मुंबई और जामनगर पहुंच रहे हैं।
इस यात्रा का कार्यक्रम बनने के बाद भारत स्थित अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने “उम्मीद” जताई कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर रुबियो से मिलने जाएंगे। बाद में खबर आई कि जयशंकर सचमुच मुंबई जा रहे हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण घटनाक्रम है। यह दिखाता है कि ट्रंप प्रशासन भारत जैसे ‘रणनीतिक सहयोगियों’ को जूनियर पार्टनर के रूप में देखता है और इस पर नरेंद्र मोदी सरकार को कोई एतराज नहीं है! रुबियो की यात्रा का मकसद अमेरिका में रिलायंस ग्रुप के रिफाइनरी लगाने की योजना को आगे बढ़ाना है। ट्रंप प्रशासन दुनिया भर से पूंजी और उत्पादक विशेषज्ञता को जुटाने के प्रयास में लगा है, ताकि अमेरिका में औद्योगिक ढांचा फिर से खड़ा हो सके।
इस क्रम में भारतीय पूंजीपतियों पर उसकी खास निगाह है, जो सहज ही इस योजना में भागीदार बनने को उतावले दिखे हैं। अंबानी, रुइया, अडानी जैसे भारतीय समूह अमेरिका में बड़े निवेश का इरादा दिखा चुके हैं। भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए यह नई चुनौती है, जिसे खुद अभी अपने विकास के लिए बड़े पूंजी निवेश एवं कारोबारी महारत की जरूरत है। हैरतअंगेज है कि पूंजी निवेश की पलट गई इस दिशा पर ना तो भारत में कोई बहस है, और ना ही देश के दीर्घकालिक भविष्य के लिहाज से इसे गंभीरता से लिया जा रहा है। जबकि इस दौर में अमेरिका सहित तमाम देश पूंजी प्रवाह को निर्देशित कर रहे हैं। बहरहाल, सबसे दुखद यह संदेश है कि अमेरिका भारत सरकार की संप्रभु प्रतिष्ठा का भी अब ख्याल नहीं रख रहा है।

भारत जैसी विश्व व्यवस्था चाहता है, वैसी खुद क्यों नहीं बनाता?…. किसी बड़े नेता तक पहुँच होने से यह पता नहीं चलता कि मुलाकात के बाद कौन-सी शर्तें कायम रहीं। असली परीक्षा तब होती है जब दोनों देशों के हित टकराते हैं। व्यक्तिगत कूटनीति तभी सार्थक होती है जब संस्थाएँ उस पहुँच को स्थायी राष्ट्रीय लाभ में बदल सकें। ऐसा नहीं होने पर गले मिलने की तस्वीर एक ऐसा विज्ञापन बन जाती है जिसके दावों को वास्तविक बातचीत और समझौतों ने अभी साबित नहीं किया है।
पश्चिमी देशों के बुद्धिजीवियों और रणनीतिक विशेषज्ञों की बैठकों में भारत की वैश्विक हैसियत पर अक्सर ऐसे चर्चा होती है, मानो दुनिया की सबसे बड़ी मेज पर उसके लिए कुर्सी रखी जानी बाकी हो। पश्चिम को भारत का महत्व स्वीकार करना चाहिए। उसकी रणनीतिक स्वायत्तता का सम्मान करना चाहिए। ऐसी शर्तें नहीं थोपनी चाहिए जिनसे एक अनिवार्य साझेदार नाराज हो जाए। मान लिया गया है कि दुनिया की बड़ी शक्तियों में भारत का शामिल होना तय है। बस यह फैसला होना बाकी है कि उसे कहाँ बैठाया जाएगा।
इस सोच में दम है। भारत का विशाल बाजार, उसकी भौगोलिक स्थिति, तकनीकी प्रतिभा और सैन्य शक्ति उसे अंतरराष्ट्रीय सौदेबाजी में पर्याप्त ताकत देते हैं। क्वाड के जरिए सहयोग, सेमीकंडक्टर क्षेत्र में निवेश और रक्षा उत्पादन में साझेदारी ऐसे साझा हित हैं जिन्हें कोई गंभीर सरकार नजरअंदाज नहीं कर सकती। पश्चिम के दोहरे मानदंडों पर भारत की आपत्तियाँ भी बेबुनियाद नहीं हैं। जो देश अपनी सुविधा के अनुसार कभी संप्रभुता का सम्मान करते हैं और कभी उसकी अनदेखी, उन्हें दूसरों को सिद्धांतों पर कायम रहने का उपदेश देने का कितना अधिकार है?
लेकिन किसी देश का अनिवार्य होना उसे दबाव से सुरक्षित नहीं बना देता। उसकी उपयोगिता सौदेबाजी में ताकत जरूर देती है, मगर यह गारंटी नहीं कि उस पर दबाव नहीं डाला जाएगा। कोई देश आपकी जरूरतों के कारण आपको गले भी लगा सकता है और आपकी कमजोरियों का फायदा उठाकर दबाव भी बना सकता है। निमंत्रण और शिकंजा, दोनों साथ आ सकते हैं।
यहीं भारत के बढ़ते वैश्विक महत्व की चमकदार कहानी भ्रामक हो जाती है। किसी ताकतवर देश के लिए उपयोगी होना और उस उपयोगिता की शर्तें स्वयं तय करने की ताकत रखना, दो अलग बातें हैं।
इस फर्क को समझने के लिए भारतीय रणनीतिकारों को विदेशों की ओर देखने की जरूरत नहीं है। अपने ही देश की कॉरपोरेट अर्थव्यवस्था में इसका उदाहरण मौजूद है।
मुंबई हवाई अड्डे का नियंत्रण जीवीके समूह से अदाणी समूह के हाथों में जाने की घटना को देखें। जीवीके के पास एक महत्वपूर्ण रणनीतिक संपत्ति थी। हवाई अड्डे के संचालन का अनुभव था। बड़े निवेशकों से संबंध थे। इसके बावजूद कर्ज, वित्तीय कठिनाइयों और जाँच एजेंसियों की कार्रवाइयों का सिलसिला उसके हवाई अड्डा कारोबार के आसपास बना। अंततः अदाणी समूह ने उसका नियंत्रण हासिल कर लिया।
बाद में जीवीके के उपाध्यक्ष ने इस बात से इनकार किया कि किसी दबाव के कारण हवाई अड्डा बेचना पड़ा। उनका यह खंडन भी घटनाक्रम का हिस्सा है। लेकिन उन परिस्थितियों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता जिनके कारण यह सौदा राजनीतिक विवाद का विषय बना। यहाँ मुद्दा सौदे को लेकर किसी एक विवादित दावे को सही या गलत ठहराना नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि किसी संपत्ति का मालिक होना कितना मायने रखता है, यदि उसे बनाए रखने के लिए जरूरी पूँजी, पहुँच या अनुमति किसी दूसरे के नियंत्रण में हो?
कंपनी की बैलेंस शीट पर अरबों की संपत्ति दिखाई दे सकती है, जबकि उसके पीछे छिपी निर्भरता नजर नहीं आती। कोई स्थापित कारोबारी तब तक सुरक्षित दिखाई देता है जब तक उसकी सुरक्षा की शर्तें नहीं बदलतीं।
संप्रभु देशों के सामने भी यही समस्या होती है। फर्क इतना है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इसके परिणाम कहीं अधिक खतरनाक हो सकते हैं। अमेरिका अपने बाजार, तकनीक, वित्तीय व्यवस्था और सुरक्षा संबंधों तक पहुँच के जरिए दूसरे देशों पर दबाव बना सकता है। जरूरी नहीं कि उसका नियंत्रण हर क्षेत्र में हो। दबाव प्रभावी बनाने के लिए इतना पर्याप्त है कि वह ऐसी किसी चीज तक पहुँच रोक सके जिसका विकल्प सामने वाला देश आसानी से नहीं खोज सकता।
भारत के पास भी सौदेबाजी के लिए पर्याप्त संसाधन हैं। मगर असली सवाल यह है कि भारत अपनी किसी महत्वपूर्ण जरूरत की आपूर्ति रुकने पर कितने समय तक टिक सकता है? और दूसरी तरफ, अमेरिका या कोई दूसरा साझेदार भारत से मिलने वाले लाभ के बिना कितने समय तक रह सकता है?
रणनीतिक स्वायत्तता की असली परीक्षा इसी असमान सहनशक्ति में होती है।
इसका अर्थ यह नहीं कि अंतरराष्ट्रीय संबंध किसी गणितीय समीकरण के अनुसार चलते हैं। सरकारें गलत आकलन करती हैं। गठबंधन बदलते हैं। घरेलू विरोध के कारण नेताओं की समझौता करने की क्षमता सीमित होती है। आर्थिक और सैन्य शक्ति के साथ विश्वसनीयता, जनमत और संस्थाओं के प्रति भरोसा भी परिणामों को प्रभावित करते हैं।
बड़ी शक्तियाँ अक्सर दूसरों से सहयोग के बदले उनके व्यवहार में बदलाव की माँग करती हैं। शर्तें लगाती हैं, जबकि अपने ऊपर वैसी ही निगरानी या जवाबदेही स्वीकार नहीं करतीं। उनका पाखंड उन शर्तों को समाप्त नहीं करता। उलटे, निर्भर देश के लिए उनकी कीमत और बढ़ा देता है। इसलिए भारत के सामने दो परस्पर जुड़े काम हैं। पहला, ऐसी क्षमता विकसित करना जिससे वह बाहरी दबाव का सामना कर सके। दूसरा, ऐसी विश्वसनीयता अर्जित करना जिससे दूसरे देश भी उसके साथ खड़े होने को तैयार हों।
इन दोनों का सीधा संबंध भारत की घरेलू शासन व्यवस्था से है। स्वतंत्र नियामक संस्थाएँ हों तो निवेश के लिए राजनीतिक पहुँच पर निर्भरता कम होती है। विश्वसनीय न्यायपालिका हो तो सत्ता के कृपापात्र समूहों से बाहर रहकर कारोबार खड़ा करने का जोखिम घटता है। खुली प्रतिस्पर्धा हो तो देश की उत्पादन क्षमता का आधार व्यापक बनता है। विश्वविद्यालयों में असहमति और स्वतंत्र विचार की गुंजाइश हो तो वह बौद्धिक स्वतंत्रता विकसित होती है जिसके बिना तकनीकी आत्मनिर्भरता संभव नहीं।
यही संस्थाएँ किसी शक्तिशाली साझेदार के शर्तें लगाने पर देश को अधिक विकल्प देती हैं। इनके कमजोर होने पर राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा कुछ कंपनियों, कुछ फैसलों और कुछ व्यक्तियों पर निर्भर होती चली जाती है। मगर नई दिल्ली में भारत की ताकत का सार्वजनिक प्रदर्शन अक्सर व्यक्तिगत कूटनीति के इर्दगिर्द घूमता दिखाई देता है।
प्रधानमंत्री का विदेशी नेताओं से गले मिलना इसकी सबसे पहचानी जाने वाली तस्वीर है। सामने खड़े नेता से आत्मीयता दिखाई जाती है और उस दृश्य को भारत की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा के प्रमाण के रूप में प्रसारित किया जाता है। गले मिलना आत्मीयता का संकेत हो सकता है। लेकिन उससे वह सब साबित नहीं होता जो तस्वीर देखकर नागरिकों को समझाया जाता है।
किसी बड़े नेता तक पहुँच होने से यह पता नहीं चलता कि मुलाकात के बाद कौन-सी शर्तें कायम रहीं। असली परीक्षा तब होती है जब दोनों देशों के हित टकराते हैं। भारत किस बात से इनकार कर सकता है? क्या हासिल कर सकता है? और मतभेद होने पर संबंध कितना दबाव सह सकता है?
व्यक्तिगत कूटनीति तभी सार्थक होती है जब संस्थाएँ उस पहुँच को स्थायी राष्ट्रीय लाभ में बदल सकें। ऐसा नहीं होने पर गले मिलने की तस्वीर एक ऐसा विज्ञापन बन जाती है जिसके दावों को वास्तविक बातचीत और समझौतों ने अभी साबित नहीं किया है।
भारत की विदेश नीति के प्रचार और वास्तविक आचरण के बीच यह अंतर केवल व्यक्तिगत कूटनीति तक सीमित नहीं है। एक अधिक न्यायपूर्ण विश्व व्यवस्था की भारत की माँग में भी यही सवाल उठता है।
नई दिल्ली का विरोध सही है जब शक्तिशाली देश नियमों को अपनी सुविधा के अनुसार मोड़ते हैं, असहमति जताने वालों को दंडित करते हैं या विशेषाधिकार अपने लिए सुरक्षित रखते हैं। लेकिन जब ऐसे ही सवाल भारत के भीतर उठते हैं तो उसकी दलील का नैतिक वजन कम होने लगता है। मतदाता सूचियों को लेकर विवाद, विपक्षी नेताओं के विरुद्ध जाँच एजेंसियों के चुनिंदा इस्तेमाल के आरोप, निवारक हिरासत और विरोध प्रदर्शनों पर प्रतिबंध जैसे सवाल लोकतांत्रिक विश्वसनीयता से जुड़े हैं। इंटरनेट बंद करने की कार्रवाइयों का लोगों की आजीविका और आवश्यक सेवाओं तक पहुँच पर पड़ने वाला नुकसान भी दस्तावेजों में दर्ज है।
इन सवालों का उत्तर संप्रभुता का हवाला देकर नहीं दिया जा सकता। संप्रभुता तो यह तय करती है कि इनके जवाब देने की जिम्मेदारी किसकी है। ऐसा नहीं कि दूसरे देशों की आलोचना करने से पहले भारत को हर मामले में आदर्श बनना होगा। भारतीय नागरिकों के अधिकारों की परीक्षा लेने का अधिकार वाशिंगटन को नहीं है। लेकिन जो सरकार दुनिया से कहती है कि साझा शक्ति और न्यायपूर्ण व्यवस्था के उसके दृष्टिकोण पर भरोसा किया जाए, उसे यह भी स्वीकार करना होगा कि अपने देश में उसे सौंपी गई सत्ता का इस्तेमाल कैसे होता है, इसकी पड़ताल होगी।
यही कसौटी व्यापार नीति पर भी लागू होती है।
भारत के पास कमजोर आजीविकाओं की रक्षा करने और अपनी औद्योगिक क्षमता विकसित करने के उचित कारण हैं। इन उद्देश्यों के पक्ष में ठोस तर्क दिए जा सकते हैं। लेकिन इनके नाम पर हर व्यापारिक बाधा को जायज नहीं ठहराया जा सकता, जबकि दूसरे देशों की ऐसी ही पाबंदियों को मुक्त और निष्पक्ष व्यापार के विरुद्ध बताया जाए।
एक न्यायसंगत व्यापार नीति को स्पष्ट करना चाहिए कि संरक्षण किसे दिया जा रहा है, उससे कौन-सी नई क्षमता विकसित होगी और कब संरक्षण पाने वाले उद्योगों को खुली प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। वरना रणनीतिक स्वायत्तता एक भव्य नाम बनकर रह जाएगी, जिसके पीछे राजनीतिक पहुँच रखने वाले कारोबारियों को प्रतिस्पर्धा से बचाने की व्यवस्था चलती रहेगी।
दुनिया में प्रभावशाली भूमिका निभाने का भारत का दावा मजबूत है। लेकिन उसकी वास्तविक उपलब्धि इस पर निर्भर करेगी कि देश की विशाल आबादी और संस्थाएँ मिलकर कितनी व्यापक उत्पादन क्षमता, प्रतिभा और स्वतंत्र शक्ति विकसित करती हैं।
जिस देश में कारोबारी स्थापित कंपनियों को चुनौती दे सकते हों, नागरिक अधिकारियों से सवाल कर सकते हों और संस्थाएँ सत्ता की नाराजगी सह सकती हों, उसके पास कहीं अधिक ताकत होती है। उसकी तुलना में वह देश कमजोर स्थिति में होगा जहाँ अवसर और सफलता का रास्ता सत्ता तक विशेष पहुँच से होकर गुजरता हो।
ऐसी घरेलू शक्ति विकसित हो जाने से अमेरिका का दबाव, चीन की चुनौती या पश्चिम के दोहरे मानदंड समाप्त नहीं हो जाएँगे। लेकिन भारत के पास उनका सामना करने के अधिक विकल्प होंगे। साथ ही एक अलग विश्व व्यवस्था की उसकी माँग उन देशों को भी अधिक विश्वसनीय लगेगी जो स्वयं अपनी स्वतंत्रता और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ाना चाहते हैं।
भारत यह तय नहीं कर सकता कि उससे अधिक शक्तिशाली देश उसकी निर्भरताओं की परीक्षा लेंगे या नहीं। लेकिन वह यह जरूर तय कर सकता है कि उसकी अपनी घरेलू व्यवस्था उन निर्भरताओं को बढ़ाएगी या कम करेगी।
कैमरे हटते ही गले मिलना समाप्त हो जाता है। उसके बाद जो बचता है, वही असली ताकत है। भारत अपने बूते क्या बना सकता है, कितना दबाव सह सकता है और जिन नियमों पर दुनिया को चलने की सलाह देता है, उन पर स्वयं कितना भरोसा पैदा कर सकता है।
Powerica Share Price: नुवामा इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज (Nuvama Institutional Equities) पावरिका लिमिटेड (Powerica Ltd) के शेयरों को लेकर बुलिश नजर आ रहा है। ब्रोकरेज फ्रर्म ने स्टॉक पर Buy रेटिंग दी है और इसके लिए 700 रुपये का टारगेट प्राइस दिया। जो मौजूदा लेवल से 20 फीसदी की तेजी दिखा रहा है । बता दें कि Powerica के शेयर अपने आईपीओ प्राइस ₹395 से लगभग 48% की तेजी आई है। सोमवार को ये 564.45 रुपये पर बंद हुआ। 2 अप्रैल 2026 को BSE और NSE पर लिस्ट होने के बाद, पिछले 6 महीनों में इस स्टॉक में 34.51% की बढ़त दर्ज की गई है।
ब्रोकरेज फर्म का कहना है कि नुवामा का यह सकारात्मक नजरिया तीन मुख्य ग्रोथ ड्राइव पर टिका है। कंपनी के डीजल जनरेटर (DG) बिजनेस में सुधार, विंड इंडिपेंडेंट पावर प्रोड्यूसर (IPP) पोर्टफोलियो का विस्तार, और रेट्रोफिट एमिशन कंट्रोल डिवाइसेस (RECDs) के क्षेत्र में लंबे समय के अवसर।
स्टॉक पर क्या है ब्रोकरेज की राय
पावरिका का पावर-सॉल्यूशन पोर्टफोलियो काफी विविध है, जिसमें DG सेट, विंड पावर जनरेशन और RECDs शामिल हैं। नुवामा को उम्मीद है कि FY26 से FY29 के दौरान इन व्यवसायों से अच्छी कमाई होगी। इसके पीछे डेटा सेंटरों की बढ़ती मांग, अधिक कुशल विंड टर्बाइन और एमिशन-कंट्रोल तकनीक को बड़े पैमाने पर अपनाना जैसे कारण हैं।
ब्रोकरेज का अनुमान है कि FY26 से FY29 के बीच, DG बिजनेस के टैक्स के बाद मुनाफे (PAT) में लगभग 21% की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) देखने को मिलेगी। वहीं, विंड IPP के EBITDA (ब्याज, टैक्स, डेप्रिसिएशन और अमोर्टाइजेशन से पहले की कमाई) में 44% और RECD के PAT में 27% की CAGR रहने की उम्मीद है।
पावरिका का DG बिजनेस लगातार कैश जनरेट करने का एक मजबूत आधार है। भारत में कमिंस (Cummins) के लिए केवल तीन जनरेटर ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स (GOEMs) में से एक होने के नाते, कंपनी को एक खास फायदा मिलता है।
भारत में डेटा सेंटर इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार हो रहा है, खासकर दक्षिण और पश्चिमी भारत में, जिसका फायदा पावरिका को मिल सकता है। नुवामा ने बताया कि पावरिका के पास डेटा सेंटर से जुड़े लगभग ₹1,100 करोड़ के ऑर्डर हैं। इसकी तुलना में, FY26 में डेटा सेंटर से बिक्री लगभग ₹340 करोड़ रही थी, जो भविष्य में कंपनी की ग्रोथ की अच्छी संभावनाओं को दर्शाती है। ब्रोकरेज को उम्मीद है कि मार्जिन में सुधार आएगा, क्योंकि कंपनी कमिंस (Cummins) द्वारा बढ़ाई गई कीमतों का बोझ ग्राहकों पर डाल देगी। औद्योगिक पूंजीगत व्यय (industrial capital expenditure) में तेजी आने से इसे और बढ़ावा मिल सकता है।
हालांकि, यह सुधार इस बात पर निर्भर करता है कि पॉवरिका (Powerica) बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर कितनी अच्छी तरह डाल पाती है। नुवामा (Nuvama) ने चेतावनी दी है कि अगर कंपनी बढ़ती कमोडिटी लागत के बीच कीमतों में हुई बढ़ोतरी को खुद सहने या ग्राहकों पर डालने में विफल रहती है, तो इससे DG मार्जिन पर दबाव पड़ सकता है।
पॉवरिका का विंड पावर (पवन ऊर्जा) कारोबार, नुवामा की निवेश थीसिस का एक और मुख्य आधार है। कंपनी की विंड कैपेसिटी, मिले हुए ‘लेटर ऑफ अवार्ड’ (LOAs) के सहारे, वित्त वर्ष 2029 तक लगभग 330 MW से बढ़कर 631 MW होने की उम्मीद है।
कंपनी का पोर्टफोलियो भी नए और अधिक कुशल टर्बाइनों की ओर बढ़ रहा है। वित्त वर्ष 2029 तक इनका हिस्सा 65% से बढ़कर लगभग 82% होने का अनुमान है। ये नई संपत्तियां 30% से अधिक का प्लांट लोड फैक्टर (PLF) और लगभग 80% का EBITDA मार्जिन दे सकती हैं, जिससे पूरे पोर्टफोलियो की आर्थिक स्थिति में सुधार होगा।
नुवामा को उम्मीद है कि वित्त वर्ष 2029 तक ब्लेंडेड PLF लगभग 29.4% और विंड बिजनेस का EBITDA मार्जिन लगभग 77% तक पहुंच जाएगा। इसी के आधार पर, वित्त वर्ष 2026 से वित्त वर्ष 2029 के बीच विंड IPP कारोबार के लिए 44% EBITDA CAGR (चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर) का अनुमान लगाया गया है।
पॉवरिका का RECD कारोबार अभी काफी छोटा है, लेकिन जैसे-जैसे उत्सर्जन नियंत्रण (emission-control) की जरूरतें बढ़ेंगी, यह विकास का एक महत्वपूर्ण जरिया बन सकता है। नुवामा के अनुसार, इसका संभावित बाजार लगभग 60,000 करोड़ रुपये का है, जिसमें केवल पांच से छह प्रमाणित प्रतिस्पर्धी ही मौजूद हैं।
ब्रोकरेज ने बताया कि इस कारोबार में इक्विटी पर लगभग 47% रिटर्न मिलने की संभावना है। साथ ही, विभिन्न राज्यों में RECD से जुड़े नियमों का लागू होना और कंपनी की नए ऑर्डर हासिल करने की क्षमता, इसके लिए महत्वपूर्ण कारक होंगे।
नुवामा का मानना है कि पॉवरिका की रिपोर्ट की गई कमाई, उसकी नकदी पैदा करने की वास्तविक क्षमता को पूरी तरह से नहीं दर्शाती है। FY26 में ऑपरेटिंग कैश फ्लो PAT का लगभग 170% रहा, जबकि इसके विंड एसेट्स इक्विटी पर लगभग 15–17% का कैश रिटर्न देते हैं।
ब्रोकरेज को उम्मीद है कि कंसोलिडेटेड रिटर्न ऑन इक्विटी FY27 के लगभग 12% से बढ़कर FY30 तक 14.4% हो जाएगा, क्योंकि नई विंड परियोजनाओं के लिए लगभग 70:30 के डेट-टू-इक्विटी अनुपात के साथ फंडिंग की जाएगी। नुवामा (Nuvama) के अनुसार वैल्यूएशन आकर्षक हैं। इसमें विंड बिजनेस के लिए FY29 में अनुमानित एंटरप्राइज वैल्यू-टू-EBITDA लगभग 6.8 गुना है, और DG सेट के लिए प्राइस-टू-अर्निंग मल्टीपल लगभग 21 गुना है।
(डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सार्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।
Silver Price Today: देश में चांदी की कीमतों में दबाव जारी है। 20 अक्टूबर को विजयादशमी पर अलग-अलग शहरों में चांदी का भाव में नरमी आई है। दिल्ली के सर्राफा बाजार में चांदी 2.15 लाख रुपये प्रति किलो पर है। जबकि गुडरिटर्न्स के मुताबिक चांदी की कीमत 2,30,000 रुपये प्रति किलो पर है।
दशहरे के कारण घरेलू वायदा बाजार मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) और इंडियन बुलियन ज्वैलर्स एसोसिएशन (IBJA) में आज कारोबार बंद है। लेकिन इससे पहले तक मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर चांदी का वायदा घटकर 209825 रुपये प्रति किलो हो गया। जबकि पिछले कारोबारी सत्र में चांदी 2,09,828 रुपये प्रति किलो पर बंद हुई थी। बुलियंस के मुताबिक चांदी की कीमत 2,10,260 रुपये किलो हो गई। जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में 57.30 डॉलर प्रति औंस हो गई।
कहां है निवेशकों की नजर
निवेशक अगले हफ्ते आने वाले अमेरिकी फेडरल रिजर्व के नीतिगत फैसले का इंतजार कर रहे हैं। फेडरल रिजर्व की मॉनेटरी पॉलिसी मीटिंग 27-28 अक्टूबर को है। सितंबर में अमेरिकी केंद्रीय बैंक ने अपनी बेंचमार्क ओवरनाइट ब्याज दरों में 25 बेसिस पॉइंट्स की बढ़ोतरी की थी, जिसके बाद ये 3.75%-4.00% की रेंज में आ गईं।
भारत में कीमतें अंतरराष्ट्रीय बुलियन (सोना-चांदी) के रुझानों, USD/INR मुद्रा की चाल, और त्योहारों के दौरान होने वाली भारी खरीदारी की उम्मीदों से तय होती हैं। आइए गुडरिटर्न के आंकड़ों के मुताबिक 20 अक्टूबर को भारत के प्रमुख शहरों में चांदी की ताजा कीमतों पर एक नजर डालते हैं
| शहर | 1 किलो चांदी का भाव |
| दिल्ली | ₹ 2,30,000 |
| मुंबई | ₹ 2,30,000 |
| कोलकाता | ₹2,30,000 |
| चेन्नई | ₹2,40,000 |
| लखनऊ | ₹2,30,000 |
| पटना | ₹2,30,000 |
| जयपुर | ₹2,30,000 |
| अहमदाबाद | ₹2,30,000 |
| पुणे | ₹2,30,000 |
| बेंगलुरु | ₹ 2,30,000 |
| हैदराबाद | ₹2,30,000 |
| भोपाल | ₹2,30,000 |
| चंडीगढ़ | ₹2,30,000 |
| नोएडा | ₹2,30,000 |
| गुरुग्राम | ₹2,30,000 |
बाजार जानकार का कहना है कि पिछले हफ्ते $55.40 के निचले स्तर पर सपोर्ट मिलने के बाद, चांदी (सिल्वर) एक अहम मोड़ पर है। अब आगे की चाल से यह तय होने की संभावना है कि क्या मंदी का रुझान (bearish trend) जारी रहेगा या फिर इसमें कोई रिकवरी (countertrend recovery) देखने को मिलेगी।
चांदी खरीदते समय इन बातों का रखें ध्यान
चांदी खरीदने से पहले उसकी शुद्धता, वजन और पक्का बिल जरूर जांचें। 999 शुद्धता वाली चांदी में 99.9 प्रतिशत चांदी होती है, जबकि 925 स्टर्लिंग सिल्वर में 92.5 प्रतिशत चांदी होती है। गहनों की कीमत में मेकिंग चार्ज और लागू GST भी जुड़ सकता है।
Gold Price Today: सोने में गिरावट पर लगा ब्रेक, दशहरा पर 24 और 22 कैरेट दोनों का भाव चढ़ा
(डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सार्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

मुंबई। फिल्म अभिनेता टाइगर श्रॉफ पर जानलेवा हमला करने वाले तीन आरोपी पकड़े गए हैं। तीनों को राजस्थान के कोटा से पकड़ा गया। तीनों हमलावरों में से एक बिहार का और दो हरियाणा के रहने वाले हैं। इस बीच टाइगर श्रॉफ पर हमले को लेकर मुंबई पुलिस ने सोमवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इसमें पुलिस ने बताया कि, जिस तरह से गोलियां चलाईं गईं उससे लगता है कि आरोपी हत्या की योजना से ही आए थे।
पुलिस ने बताया है कि लॉरेंस बिश्नोई गैंग के अनिल पंडित ने हमला करने का कॉन्ट्रैक्ट दिया था। यह भी बताया गया है कि अनिल ने वीडियो जारी कर इसकी जिम्मेदारी ली। गौरतलब है कि हमले में टाइगर श्रॉफ को गोली नहीं लगी, लेकिन उनके बाएं हाथ में बारूद और कांच के टुकड़ों से चोट आई है। फायरिंग में उनका ड्राइवर भी घायल हुआ है।
बहरहाल, रविवार की शाम को टाइगर पर हमला करने वालों को करीब 15 घंटे में राजस्थान के कोटा रेलवे स्टेशन से पकड़ा गया। आरोपी जयपुर, दिल्ली के रास्ते नेपाल भागने की तैयारी में थे। मुंबई पुलिस से सूचना मिलने के बाद कोटा पुलिस ने सुबह साढ़े 10 बजे तीनों को रेलवे स्टेशन से पकड़ा। कोटा की एसपी तेजस्विनी गौतम के मुताबिक, तीनों पुणे से जयपुर जाने वाली ट्रेन से जयपुर जा रहे थे। बताया जा रहा है कि तीनों बिना टिकट ट्रेन में सवार हुए थे। तीनों को जनरल कोच में हिरासत में लिया गया। इनके पास से कोई हथियार बरामद नहीं हुआ है।
राजस्थान पुलिस के मुताबिक, पकड़े गए तीनों संदिग्धों में दो हरियाणा और एक बिहार का रहने वाला है। इनमें हरियाणा के सोनीपत का रेहान और बिहार के बेगूसराय का ऋतिक कुमार उर्फ रोशन शामिल हैं। पहले तीसरे आरोपी के नाबालिग होने की बात सामने आई थी। लेकिन बाद में पुलिस ने इससे इनकार किया। मुंबई पुलिस के जानकार सूत्रों के मुताबिक, आरोपी करीब 10 दिनों से टाइगर श्रॉफ पर नजर रख रहे थे।

