जन नेता कामरेड होमी एफ दाजी – शताब्दी पर जयजगत!

जन नेता कामरेड होमी एफ दाजी - शताब्दी पर जयजगत!

होमी एफ. दाजी, साम्यवादी विचारधारा के साथ ज़ीने वाले साम्यवादी राजनेता होने के साथ ही वंचित तबके से लेकर पढ़े-लिखे बुद्धिजीवियों के मन मस्तिष्क को गहराई से प्रभावित करने वाले राजनेता थे। होमी दाजी का जन्म 5 सितम्बर 1926 को बम्बई में एक पारसी परिवार में हुआ था। 14 मई 2009 को कामरेड होमी दाजी ने अपनी जीवन यात्रा इन्दौर में 82 वर्ष की आयु में पूरी की। जीवन संघर्ष क्या होता है यह होमी दाजी ने अपने जीवन के प्रारंभ में ही अच्छे से समझ लिया था।

 

बम्बई से अपने पिताजी के साथ होमी दाजी इन्दौर आए और इन्दौर में आपने अपना और अपने परिवार के निजी जीवन को गढ़ने की खुद शुरुआत की और जीवन संघर्ष में सतत आगे बढ़ते रहने का अनथक सिलसिला प्रारंभ किया। होमी दाजी के समूचे जीवन की कहानी वंचित समूह के लोगों में ज़ीने के साथ हक एवं गरिमापूर्वक जीते रहने की आशा और विश्वास पैदा करने की अनोखी कहानी है। आजादी आने के शुरुआती काल में सभी लोगों के मन में बहुत बढ़िया उत्साह का वातावरण बना हुआ था। आजादी की खुशी और आगे बढ़कर देश समाज के कार्य में सहजता से भागीदारी की प्रवृत्ति भी बहुतायत से मौजूद थी।

 

आजादी आंदोलन के कारण जनचेतना समाज के सभी तबकों और हिस्सों में मौजूद थीं। गुलामी के कालखंड की उदासीनता छट चुकी थी। इस कालखंड में नौजवान होमी दाजी जो खुद घनघोर आर्थिक संकटों से घिरे हुए थे, ने अपनी परवाह किए बगैर लोगों के अरमानों को जगाने और उनके सपनों में रंग भरने के लिए संघर्ष की राजनीति की राह चुनी। छात्र जीवन में अपने अध्ययन हेतु स्कूल की फीस भरने लायक आर्थिक स्थिति नहीं होने पर भी होमी दाजी ने बिना घबराए और बिना पीछे हटे, छात्र जीवन संघर्ष की वैचारिक प्रतिबद्धता एवं तेजस्विता के साथ इतिहास विषय में आगरा यूनिवर्सिटी से एमए करने के साथ साथ ही एलएलबी की डिग्री मेरिट लिस्ट में स्थान पाकर हासिल की थी। यह युवा होमी दाजी के व्यक्तित्व का उजला पृष्ठ है कि परिस्थितियां कैसी भी हो हिम्मत कभी न हारो।

 

कामरेड होमी दाजी जैसा शब्दों और आवाज का जादूगर किसी भी कालखंड में यदा-कदा ही संघर्षमयी सार्वजनिक, राजनीतिक जीवन के सतत, सक्रिय, संघर्ष में से उभरकर आता हैं। कामरेड होमी दाजी को सुनने के लिए लोग लालायित बने रहते थे। दाजी का कालखंड एक तरह से लगातार आमसभाओं की वैचारिक सक्रियता का कालखंड था। होमी दाजी को अपने श्रोताओं के मानस की गहरी समझ थी। यदि गरीब वंचित और निरक्षर लोगों के बीच होमी दाजी बोलते थे तो इस तरह बोलते थे कि उनके द्वारा बोली हुई बातें श्रोताओं के दिल दिमाग में उतर जाएं। इसी तरह दिग्गज पढ़े-लिखे विद्वानों की सभा में भी शामिल श्रोता समूह, मंत्रमुग्ध हो दाजी को सुनता रहता था।

 

आम सभा हो या कपड़ा मिलों में मजदूरों की छुट्टी होने पर होने वाली गेट मीटिंग, होमी दाजी के भाषण न केवल मजदूरों को राजनीतिक चिंतन का विषय देते थे वरन गेट मीटिंग सुनने वाले मजदूर, अपनी-अपनी बस्तियों में जाकर लोगों को बताते थे कि आज होमी दाजी ने अपने भाषण में यह बात कही और इस तरह मज़दूरों को गेट मीटिंग के माध्यम से अपनी बस्तियों में जाकर राजनीतिक चेतना को फ़ैलाने की लोक कोचिंग वे आम सभाओं के माध्यम से करते रहते थे।

 

होमी दाजी की वकालत का कार्यालय एक तरह से वकालत के साथ ही राजनीतिक सामाजिक गतिविधियों के महत्वपूर्ण संचालन केन्द्र की तरह जाना जाता था। होमी दाजी की वकालत केवल कोर्ट परिसर तक ही सीमित नहीं थी, जनता के बीच भी दाजी की वकालत सार्वजनिक मुद्दों पर चलती रहती थी। पर होमी दाजी की वकालत का लोहा विधि जगत मानने लगा था।

 

कामरेड होमी दाजी ने सन 1962 में चीन के भारत पर हमले की पृष्ठभूमि में इन्दौर से लोकसभा का चुनाव निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में लड़ा और वे तीसरी लोकसभा के सदस्य बने, 1962 के इस लोकसभा निर्वाचन की एक और उल्लेखनीय बात यह थी कि समाजवादी पार्टी ने सुप्रसिद्ध मामा बालेश्वर दयाल को इन्दौर लोकसभा से प्रत्याशी बनाया था। इस आम चुनाव में जीत होमी दाजी को मिली। इन्दौर लोकसभा क्षेत्र से मामा बालेश्वर दयाल के समाजवादी पार्टी से चुनाव लड़ने से जो राजनीतिक चेतना निकली उसकी परिणति यह हुई कि 1967 के विधानसभा चुनाव में इन्दौर से साथी कल्याण जैन और साथी आरिफ बेग दोनों समाजवादी विधायक निर्वाचित हुए। इस तरह कामरेड होमी दाजी और मामा बालेश्वर दयाल के निर्वाचन लड़ने से इन्दौर की चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण मोड़ आया और समाजवादी और साम्यवादी विचारधारा की इन्दौर की राजनीति और समाजिक जीवन में पकड़ मजबूत हुई।

 

लोकसभा में कामरेड होमी दाजी ने अपनी भाषण कला के साथ संसदीय प्रक्रिया की गहरी संवैधानिक समझ होने की छाप संसदीय प्रक्रिया में निरंतर सक्रिय भागीदारी कर लोकमानस पर छोड़ने के साथ ही राष्ट्रीय राजनीति में भी महत्वपूर्ण भूमिका की शुरुआत की। इस कालखंड में पंडित जवाहरलाल नेहरू देश के प्रधानमंत्री थे। समाजवादी नेता डॉ. राममनोहर लोहिया सहित देश के दिग्गज राजनेता लोकसभा में मौजूद थे। लोकसभा में सक्रिय भूमिका से कामरेड होमी दाजी ने देश के दिग्गज राजनेताओं सहित जनमानस का ध्यान आकर्षित किया और देश की संसदीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

 

कामरेड होमी दाजी दो बार मध्य प्रदेश की विधानसभा के सदस्य के रूप में इन्दौर के श्रमिक क्षेत्र से निर्वाचित हुए। कामरेड होमी दाजी बाद में 1967 के लोकसभा चुनाव में प्रकाशचन्द्र सेठी से चुनाव हार गए। 1971 में पुनः इन्दौर के श्रमिक क्षेत्र से विधायक निर्वाचित हुए। इन्दौर, मध्यप्रदेश और भारत के श्रमिक आंदोलन में कामरेड होमी दाजी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। एटक में राष्ट्रीय स्तर पर भी कामरेड होमी दाजी की महत्वपूर्ण भूमिका इतिहास में दर्ज है।

 

कामरेड होमी दाजी की जीवनसाथी कामरेड पैरिन दाजी ने घर, परिवार से लेकर कम्युनिस्ट पार्टी, श्रम आन्दोलन और सार्वजनिक एवं निजी जीवन में बराबरी से सहभागिता कर एक आदर्श प्रस्तुत किया जो सार्वजनिक जीवन में मिलने वाला बिरला उदाहरण है। कामरेड होमी दाजी एवं पैरिन दाजी का एक बेटा रूसी दाजी जो एक अभिभाषक होने के साथ-साथ आजीवन सामाजिक राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय रहा। इसी तरह एक बेटी कामरेड डाक्टर रोशनी दाजी जो रूस से डाक्टर बनकर आई और इन्दौर की वंचित बस्तियों में वंचित वर्ग के लोगों के लिए चिकित्सकीय परामर्श और इलाज एक डिस्पेंसरी के माध्यम से करते हुए राजनीतिक सामाजिक गतिविधियों में आजीवन शामिल रही।

 

कामरेड दाजी के दोनों बच्चों का युवा अवस्था में ही देहावसान हो जाना दाजी दम्पति के जीवन काल की गहरी दुखदाई घटना होने पर भी दाजी दम्पति ने निराशा को अपने निजी जिंदगी में फटकने नहीं दिया और आशा, विश्वास और संघर्ष को अपने जीवन क्रम का एक हिस्सा माना। अपनी लंबी निजी जिंदगी और संघर्षपूर्ण सार्वजनिक जीवन को जिस हिम्मत से शांतिपूर्वक तरीके से स्वीकार कर जीवन में निराशा को न तो दोनों ने आने दिया और न ही संघर्ष से पलायन कर अपने जीवन संघर्ष में आईं चुनौतियों से धबराए। यही दाजी दम्पति का निजी और सार्वजनिक जीवन जीने वाले सभी सामाजिक एवं राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए खुला और सीधा संदेश है कि “हिम्मत कभी न हारो”।

 

होमी दाजी ने 50-55 साल से भी ज्यादा का समय सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भूमिका के साथ बिताया। इस कालखंड में हजारों नौजवानों, मजदूरों, किसानों और राजनीतिक सामाजिक कार्यकर्ताओं को जनता के लिए और जनता की तरह जीते हुए निर्भय राजनीति करते रहने का रास्ता दिखाया। मैं सन 1960 से इन्दौर के सार्वजनिक राजनीतिक सामाजिक जीवन में सतत सक्रिय हूं और 1960 में 9 वर्ष की आयु में पहली बार कामरेड होमी दाजी से एक आम सभा में मिला था। तब से लेकर कामरेड होमी दाजी के अंतिम संस्कार तक की घटनाएं मेरी स्मृति में आज भी जीवन्त रूप में दर्ज हैं। मुझे कामरेड होमी दाजी को देखने, सुनने, समझने और साथ काम करने का लंबा अवसर मिला।

 

कामरेड होमी दाजी से जीवन के कई नए आयाम सीखने का अद्भुत अवसर भी मिला। इन्दौर के साम्यवादी विचारधारा के कई कार्यकर्ताओं और राजनीतिक सामाजिक नेतृत्व से भी सम्पर्क का अवसर कामरेड होमी दाजी के साथ कई आन्दोलनों एवं मुद्दों पर साथ काम करने से मिला। इन्दौर में साम्यवादी आन्दोलन के काफी नेताओं को देखने-सुनने और मिलने का अवसर भी मिला। दत्तात्रय सरमंडल, कामरेड अनंत लागू से लेकर इन्दौर के साम्यवादी आन्दोलन की आज की पीढ़ी एवं पुरानी पीढ़ी के लगभग सभी साथियों एवं लोगों से पिछले 60-65 सालों से मिलने और जानने का एक लंबा सिलसिला जारी है, जो मेरे सार्वजनिक जीवन के अनुभवों का अनमोल खजाना है। इन्दौर में नगर निगम की चुनावी राजनीति में नागरिक समिति के रूप में विपक्षी राजनैतिक दलों का मोर्चा बनाने में भी कामरेड होमी दाजी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

 

यह वर्ष कामरेड होमी दाजी का शताब्दी वर्ष है। 100 वर्ष में सारी दुनिया में जमीन आसमान का अंतर आता गया है। पर सारी दुनिया में मनुष्यता के बुनियादी सवाल और अधिक गहराई से वैसे ही उठ रहे हैं जैसे 100 साल पहले या उससे पहले भी उठ रहे थे। 100 साल यानी पांच पीढ़ियों का कालखंड। आज का कालखंड एक दम भिन्न हो गया है पर भारत ही नहीं सारी दुनिया की समस्याएं और उन्हें समझने और धीरज के साथ बेहतर रास्ता निकालने की समझ जरूरी है। वैसे ही आज के कालखंड के नौजवान, मजदूर, किसान और जीवन संघर्ष में रास्ता खोज रहे राजनैतिक, सामाजिक गतिविधियों में लगे हुए आन्दोलनकारी लोगों को नया बेहतर रास्ता निकालने का आमंत्रण दे रहे हैं जैसा कि कामरेड होमी दाजी की युवावस्था में आजाद भारत के शुरुआती दिनों में युवा होमी दाजी की पीढ़ी को मिला था। 

 

किसी भी व्यक्ति की शताब्दी के वर्ष में बहुत सारे लोग, संदर्भ और पूरा जनजीवन बदल जाता है, पर फिर भी जीवन का बुनियादी संघर्ष नहीं बदलता, बुनियादी सवाल नई चुनौतियों के साथ आ जाते हैं। कामरेड होमी दाजी की जन्म शताब्दी पर कामरेड पैरिन दाजी, कामरेड रूसी दाजी, कामरेड डाक्टर रोशनी दाजी सहित जीवन संघर्ष के सभी साथियों सहित सभी दिवंगत साथियों का भी सादर स्मरण। सबको जयजगत।

दुनिया का नक्शा बदलने की तैयारी, UN में आज वोटिंग:यूरोप-रूस-कनाडा का साइज छोटा होगा, अफ्रीका-दक्षिण अमेरिका को फायदा

बचपन से किताबों, टीवी और इंटरनेट पर हम दुनिया का जो नक्शा देखते आए हैं, उसमें कई देशों और महाद्वीपों का आकार असल से काफी अलग दिखता है। अब इसे बदलने की कोशिश हो रही है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा में शुक्रवार को इस प्रस्ताव पर वोटिंग होगी। इसमें ऐसा विश्व नक्शा अपनाने की बात है, जिसमें देशों और महाद्वीपों का आकार जमीन पर उनके असली आकार के करीब दिखे।

अगर यह प्रस्ताव पास होता है, तो दुनिया का नक्शा काफी बदल जाएगा। अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका बड़े दिखेंगे, जबकि ग्रीनलैंड, यूरोप और कनाडा मौजूदा नक्शे के मुकाबले छोटे नजर आएंगे।

इस बदलाव की मुहिम कुछ अफ्रीकी देशों ने शुरू की है। उनका कहना है कि मौजूदा नक्शे में अफ्रीका को उसके असली आकार से काफी छोटा दिखाया जाता रहा है। मौजूदा नक्शे में आखिर दिक्कत क्या है? दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले नक्शों में से एक मर्केटर नक्शा है। इसे यूरोपियन मैप मेकर जेरार्डस मर्केटर ने 1569 में बनाया था। इस नक्शे की एक बड़ी खासियत है कि यह समुद्र में रास्ता तय करने और जहाजों के नेविगेशन के लिए काफी उपयोगी है। लेकिन पूरी गोल धरती को सपाट नक्शे पर दिखाने की वजह से इसमें देशों और महाद्वीपों का आकार असल से अलग नजर आने लगता है। जैसे-जैसे कोई इलाका भूमध्य रेखा से दूर जाता है, वह नक्शे पर जरूरत से ज्यादा बड़ा दिखाई देने लगता है। यही वजह है कि उत्तरी और दक्षिणी हिस्सों के कई इलाके असल से काफी बड़े नजर आते हैं। ग्रीनलैंड इसका सबसे मशहूर उदाहरण है। मर्केटर नक्शे में ग्रीनलैंड दक्षिण अमेरिका के लगभग बराबर दिखाई देता है। लेकिन असल में दोनों के आकार में बहुत बड़ा अंतर है। ग्रीनलैंड का क्षेत्रफल करीब 22 लाख वर्ग किलोमीटर है। यह लगभग डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो के बराबर है। वहीं अफ्रीका का क्षेत्रफल करीब 3 करोड़ वर्ग किलोमीटर है। यानी अफ्रीका ग्रीनलैंड से करीब 14 गुना बड़ा है। फिर भी मर्केटर नक्शे को देखकर दोनों का आकार लगभग एक जैसा लग सकता है। यही वह फर्क है जिसे अब कम करने की कोशिश हो रही है। अफ्रीकी देशों को आखिर दिक्कत क्या है अफ्रीकी देशों का कहना है कि बात सिर्फ नक्शे पर किसी देश या महाद्वीप के छोटा-बड़ा दिखने की नहीं है। दुनिया का नक्शा यह भी तय करता है कि हम अलग-अलग हिस्सों को किस नजर से देखते हैं। UN के सामने रखे गए प्रस्ताव में कहा गया है कि मर्केटर नक्शे में अफ्रीका का वास्तविक आकार काफी छोटा नजर आता है। लंबे समय तक ऐसी तस्वीर देखने से लोगों के मन में अफ्रीका के आकार और वैश्विक महत्व को लेकर गलत धारणा बन सकती है। प्रस्ताव में लैटिन अमेरिका और दक्षिण एशिया का भी जिक्र है। इसमें कहा गया है कि नक्शे में इन क्षेत्रों का छोटा नजर आना उनकी विकास जरूरतों, बुनियादी ढांचे और आर्थिक क्षमता को भी कम करके आंकने की धारणा बना सकता है। अब दिखेगी दुनिया की ज्यादा सही तस्वीर UN के सामने रखे गए प्रस्ताव का नाम ‘करेक्ट द मैप’ है। इसे अफ्रीकी संघ के सदस्य देशों और बहामास ने मिलकर आगे बढ़ाया है। इसमें मर्केटर नक्शे की जगह ऐसे नक्शे इस्तेमाल करने की बात कही गई है, जिनमें दुनिया के अलग-अलग हिस्से उनके वास्तविक क्षेत्रफल के ज्यादा करीब दिखाई दें। इनमें ‘इक्वल अर्थ’ नक्शा खास है। इसे 2018 में पेश किया गया था। इसका मकसद दुनिया के देशों और महाद्वीपों का आकार इस तरह दिखाना है कि वह जमीन पर उनके असली क्षेत्रफल के ज्यादा करीब नजर आए। इस नक्शे में बदलाव पहली नजर में ही दिखाई देता है… यानी जमीन पर कुछ नहीं बदलता, सिर्फ उसे नक्शे पर दिखाने का तरीका बदल जाता है। न्यूजीलैंड भी पुराने नक्शे से परेशान अफ्रीका अकेला ऐसा इलाका नहीं है जिसे पुराने नक्शे से शिकायत रही है। न्यूजीलैंड भी लंबे समय से दुनिया के नक्शे पर अपनी जगह को लेकर मजाक करता रहा है। 2018 में न्यूजीलैंड के एक पर्यटन विज्ञापन में तत्कालीन प्रधानमंत्री जैसिंडा आर्डर्न भी नजर आई थीं। इसमें मजाकिया अंदाज में दिखाया गया था कि दुनिया के कई नक्शों में न्यूजीलैंड जैसे गायब ही हो जाता है। दरअसल, मर्केटर नक्शे में न्यूजीलैंड नीचे दाईं ओर एकदम किनारे पर दिखाई देता है। कई बार नक्शे में वह पूरी तरह छूट भी जाता है। इक्वल अर्थ नक्शे के कुछ रूपों में ओशिनिया को केंद्र के करीब लाया जाता है। इससे ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों की स्थिति भी ज्यादा प्रमुख नजर आती है। फ्रांस भी नए नक्शे के समर्थन में इस मुहिम को फ्रांस का भी समर्थन मिला है। फ्रांस के विदेश मंत्री जीन-नोएल बारो ने शुक्रवार को कहा कि उनका देश ऐसे नक्शों का इस्तेमाल करेगा, जिनमें देशों और महाद्वीपों का आकार जमीन पर उनके असली क्षेत्रफल के ज्यादा करीब दिखे। उन्होंने कहा कि मौजूदा नक्शे में अमेरिका, रूस और चीन जैसे देश अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और दक्षिण-पूर्व एशिया के मुकाबले ज्यादा बड़े और प्रमुख नजर आते हैं। बारो ने कहा कि नक्शे पर बार-बार दिखने वाला यह फर्क धीरे-धीरे लोगों की सोच पर भी असर डालता है। इसलिए अब दुनिया को नक्शे पर ज्यादा सही तरीके से दिखाने का समय आ गया है। अफ्रीका ने पहले खुद बदला नक्शा अफ्रीका सिर्फ यह शिकायत नहीं कर रहा कि उसे दुनिया के नक्शे पर छोटा दिखाया जाता है। उसने इसे बदलने की शुरुआत खुद कर दी है। अफ्रीकी संघ ने मार्च में इक्वल अर्थ नक्शे को अपनाने का फैसला किया। इसके बाद अप्रैल में टोगो ने अफ्रीकी संघ की ओर से संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों से भी ऐसे नक्शों को अपनाने की अपील की। यानी अब कोशिश सिर्फ अफ्रीका के नक्शे बदलने तक सीमित नहीं है। अफ्रीकी देश चाहते हैं कि दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाले नक्शों में भी महाद्वीपों का आकार ज्यादा सही दिखाई दे। जुलाई में संयुक्त राष्ट्र महासभा में इस मुद्दे पर शुरुआती बातचीत हुई और अब मामला वोटिंग तक पहुंच गया है। अफ्रीकी संघ की आयुक्त अम्मा ट्वुम-अमोआ ने मार्च में कहा था कि अफ्रीका को लंबे समय से नक्शों पर उसके असली आकार से छोटा दिखाया जाता रहा है। उनके मुताबिक, अब समय आ गया है कि दुनिया अफ्रीका को सिर्फ नक्शे पर नहीं, बल्कि उसके इतिहास, संस्कृति, अर्थव्यवस्था और वैश्विक भूमिका के हिसाब से भी देखे। गूगल मैप का भी नक्शा बदलेगा अब सवाल सिर्फ स्कूलों में टंगे नक्शों या किताबों में छपे मैप का नहीं है। दुनिया का नक्शा बदलने की यह बहस हमारे मोबाइल की स्क्रीन तक पहुंच सकती है। आज हम दुनिया को कागज से ज्यादा गूगल मैप्स जैसे डिजिटल मैप पर देखते हैं। इन प्लेटफॉर्म पर भी धरती को स्क्रीन पर दिखाने के लिए नक्शे के अलग-अलग प्रोजेक्शन का इस्तेमाल होता है। यही वजह है कि UN का प्रस्ताव टेक कंपनियों को भी इस बहस में शामिल करना चाहता है। प्रस्ताव में कंपनियों से कहा गया है कि वे ज्यादा सटीक प्रोजेक्शन अपनाने और इसके लिए UN के सदस्य देशों व क्षेत्रीय संगठनों के साथ मिलकर काम करने पर विचार करें। यानी अगर आने वाले समय में ज्यादा सटीक प्रोजेक्शन को व्यापक रूप से अपनाया जाता है, तो जिस दुनिया को हम फोन पर देखते हैं, उसका नक्शा भी बदल सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि UN का प्रस्ताव पास होते ही अगले दिन गूगल मैप्स खोलने पर पूरी दुनिया बदली हुई नजर आएगी। इसके बाद अलग-अलग टेक कंपनियों, देशों और संस्थानों को अपने स्तर पर फैसला लेना होगा। तो क्या सच में दुनिया का नक्शा बदल जाएगा? अगर संयुक्त राष्ट्र महासभा का प्रस्ताव पास हो जाता है, तो इसका मतलब यह नहीं होगा कि पूरी दुनिया में एक ही नया नक्शा इस्तेमाल करना अनिवार्य हो जाएगा। लेकिन इससे नक्शे बनाने और पढ़ाने में ऐसे तरीकों को बढ़ावा मिल सकता है, जिनमें देशों और महाद्वीपों का वास्तविक क्षेत्रफल ज्यादा सही दिखाई दे। दुनिया तो वही रहेगी। अफ्रीका, ग्रीनलैंड, यूरोप, दक्षिण अमेरिका और भारत अपनी जगह पर ही रहेंगे। फर्क सिर्फ इतना होगा कि नक्शे पर वे जैसे दिखते हैं, वह जमीन पर उनके असली आकार के ज्यादा करीब होगा।

एस्टोनिया के रक्षामंत्री ने इस्तीफा दिया:यूक्रेन को समय पर तोप के गोले नहीं दे पाए; कॉन्ट्रैक्ट में भारतीय कंपनी शामिल, अनुभव नहीं होने का आरोप

एस्टोनिया के रक्षा मंत्री हानो पेवकुर ने इस्तीफा दे दिया है। उनके इस्तीफे की वजह यूक्रेन के लिए की गई करीब 768 करोड़ रुपए की एक डील है। सौदे के तहत भारतीय कंपनी से जुड़ी इटली की एक फर्म को गोला-बारूद सप्लाई का कॉन्ट्रैक्ट दिया गया था। आरोप है कि कंपनी के पास तोप के गोले बनाने या बेचने का अनुभव नहीं था। इसके बावजूद उसे बड़ा कॉन्ट्रैक्ट दिया गया और भारी रकम एडवांस में दी गई। कंपनी के साथ किए गए थे 4 समझौते 2024 में एस्टोनिया के सेंटर फॉर डिफेंस इन्वेस्टमेंट ने तोप के गोलों की खरीद के लिए डेटासेल एसआरएल के साथ चार समझौते किए। यह कंपनी इटली में रजिस्टर्ड है। मार्च 2024 में इसे भारतीय कंपनी नेको डिफेंस म्यूनिशंस ने खरीदा था। पहला कॉन्ट्रैक्ट अगस्त 2024 में हुआ था। इसके तहत करीब 1.5 करोड़ यूरो एडवांस दिए गए। इसके बाद दूसरे और फिर दो अन्य कॉन्ट्रैक्ट किए गए। चारों सौदों में एडवांस भुगतान करीब 7 करोड़ यूरो तक पहुंच गया। नवंबर 2024 तक यूक्रेन पहुंचने थे गोले गोला-बारूद का पहला बैच नवंबर 2024 में यूक्रेन पहुंचना था, लेकिन डेटासेल ने देरी की। बाद में जो सामान पहुंचा, उसे लेकर भी सवाल उठाए गए। अधिकारियों के मुताबिक, कुछ खेप अधूरी थी और उसमें गोले चलाने के लिए जरूरी हिस्से मौजूद नहीं थे। इनमें फ्यूज, प्रोपेलेंट चार्ज और प्राइमर जैसे हिस्से शामिल बताए गए हैं। इसलिए एस्टोनिया ने कुछ सामान को स्वीकार नहीं किया। कंपनी ने आरोपों को खारिज किया डेटासेल ने एस्टोनिया के आरोपों को स्वीकार नहीं किया है। कंपनी का कहना है कि उसने बड़ी मात्रा में सामान तैयार किया और उसकी सप्लाई के लिए बिल भी दिए। कंपनी ने यह भी कहा कि डिलीवरी में देरी के पीछे अलग-अलग देशों से मंजूरी और जरूरी दस्तावेज मिलने में हुई देरी जैसी वजहें थीं। एस्टोनिया के 768 करोड़ रुपए अटके एस्टोनिया ने इस सौदे में करीब 768 करोड़ रुपए दिए थे। अब वह इस रकम को वापस पाने की कोशिश कर रहा है। अनुबंध को लेकर मामला मध्यस्थता तक पहुंच गया है। अगर पैसा वापस नहीं मिला तो एस्टोनिया पर इस रकम का वित्तीय बोझ पड़ सकता है। यूरोपीय आयोग भी एस्टोनिया के साथ इस मामले पर बातचीत कर रहा है। EU के फंड से आया था पैसा इस सौदे में इस्तेमाल हुआ पैसा यूरोपीय संघ की यूरोपियन पीस फैसिलिटी (EPF) से आया था। यह फंड यूक्रेन को सैन्य सहायता देने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। अब सवाल यह है कि अगर एस्टोनिया कंपनी से पैसा वापस नहीं ले पाया तो इस फंड का क्या होगा। यूरोपीय आयोग इस मामले में एस्टोनियाई अधिकारियों के संपर्क में है। मंत्री बोले- हर सौदे की जिम्मेदारी मेरी रक्षा मंत्री हानो पेवकुर ने कहा कि मंत्री खुद हर हथियार खरीद के कॉन्ट्रैक्ट पर बातचीत नहीं करता। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने संबंधित कॉन्ट्रैक्ट व्यक्तिगत रूप से नहीं पढ़े थे। लेकिन उनके मुताबिक, मंत्रालय के काम की राजनीतिक जिम्मेदारी रक्षा मंत्री की होती है। इसी वजह से उन्होंने इस्तीफा देने का फैसला किया। जांच में खरीद प्रक्रिया पर भी सवाल एस्टोनिया के राष्ट्रीय लेखा कार्यालय ने इस सौदे को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। जांच का एक बड़ा मुद्दा यह है कि इतने बड़े रक्षा सौदे में ऐसी कंपनी को कैसे चुना गया, जिसके पास तोप के गोले की सप्लाई का पहले का अनुभव नहीं था। यानी विवाद सिर्फ इस बात पर नहीं है कि गोले समय पर पहुंचे या नहीं। सवाल यह भी है कि कंपनी का चयन कैसे हुआ और इतनी बड़ी रकम एडवांस में क्यों दी गई। ————————- यह खबर भी पढ़ें… जयशंकर बोले- तेल खरीद पर रोक से जंग नहीं थमेगी: बातचीत से ही खत्म होगी, भारत यूक्रेन युद्ध खत्म कराने के लिए मध्यस्थता को तैयार केंद्रीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि रूस-यूक्रेन जंग का समाधान इस बात से नहीं निकलेगा कि कोई देश रूसी तेल खरीदता है या नहीं। पूरी खबर पढ़ें…

एस्टोनिया के रक्षामंत्री ने इस्तीफा दिया:यूक्रेन को समय पर तोप के गोले नहीं दे पाए; कॉन्ट्रैक्ट में भारतीय कंपनी शामिल, अनुभव नहीं होने का आरोप

एस्टोनिया के रक्षा मंत्री हानो पेवकुर ने इस्तीफा दे दिया है। उनके इस्तीफे की वजह यूक्रेन के लिए की गई करीब 768 करोड़ रुपए की एक डील है। सौदे के तहत भारतीय कंपनी से जुड़ी इटली की एक फर्म को गोला-बारूद सप्लाई का कॉन्ट्रैक्ट दिया गया था। आरोप है कि कंपनी के पास तोप के गोले बनाने या बेचने का अनुभव नहीं था। इसके बावजूद उसे बड़ा कॉन्ट्रैक्ट दिया गया और भारी रकम एडवांस में दी गई। कंपनी के साथ किए गए थे 4 समझौते 2024 में एस्टोनिया के सेंटर फॉर डिफेंस इन्वेस्टमेंट ने तोप के गोलों की खरीद के लिए डेटासेल एसआरएल के साथ चार समझौते किए। यह कंपनी इटली में रजिस्टर्ड है। नवंबर 2024 तक यूक्रेन पहुंचने थे गोले गोला-बारूद का पहला बैच नवंबर 2024 में यूक्रेन पहुंचना था, लेकिन डेटासेल ने देरी की। बाद में जो सामान पहुंचा, उसे लेकर भी सवाल उठाए गए। अधिकारियों के मुताबिक, कुछ खेप अधूरी थी और उसमें गोले चलाने के लिए जरूरी हिस्से मौजूद नहीं थे। इनमें फ्यूज, प्रोपेलेंट चार्ज और प्राइमर जैसे हिस्से शामिल हैं। इसलिए एस्टोनिया ने कुछ सामान को स्वीकार नहीं किया। कंपनी ने आरोपों को खारिज किया डेटासेल ने एस्टोनिया के आरोपों को खारिज कर दिया है। कंपनी का कहना है कि उसने बड़ी मात्रा में सामान तैयार किया और उसकी सप्लाई के लिए बिल भी दिए। कंपनी ने यह भी कहा कि डिलीवरी में देरी के पीछे अलग-अलग देशों से मंजूरी और जरूरी दस्तावेज मिलने में हुई देरी जैसी वजहें थीं। एस्टोनिया के 768 करोड़ रुपए अटके एस्टोनिया ने इस सौदे में करीब 768 करोड़ रुपए दिए थे। अब वह इस रकम को वापस पाने की कोशिश कर रहा है। अगर पैसा वापस नहीं मिला तो एस्टोनिया पर इस रकम का वित्तीय बोझ पड़ सकता है। यूरोपीय आयोग भी एस्टोनिया के साथ इस मामले पर बातचीत कर रहा है। EU के फंड से आया था पैसा इस सौदे में इस्तेमाल हुआ पैसा यूरोपीय संघ की यूरोपियन पीस फैसिलिटी (EPF) से आया था। यह फंड यूक्रेन को सैन्य सहायता देने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। अब सवाल यह है कि अगर एस्टोनिया कंपनी से पैसा वापस नहीं ले पाया तो इस फंड का क्या होगा। यूरोपीय आयोग इस मामले में एस्टोनियाई अधिकारियों के संपर्क में है। जांच में खरीद प्रक्रिया पर भी सवाल एस्टोनिया के राष्ट्रीय लेखा कार्यालय ने इस सौदे को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। जांच का एक बड़ा मुद्दा यह है कि इतने बड़े रक्षा सौदे में ऐसी कंपनी को कैसे चुना गया, जिसके पास तोप के गोले की सप्लाई का पहले का अनुभव नहीं था। यानी विवाद सिर्फ इस बात पर नहीं है कि गोले समय पर पहुंचे या नहीं। सवाल यह भी है कि कंपनी का चयन कैसे हुआ और इतनी बड़ी रकम एडवांस में क्यों दी गई। ————————- यह खबर भी पढ़ें… जयशंकर बोले- तेल खरीद पर रोक से जंग नहीं थमेगी: बातचीत से ही खत्म होगी, भारत यूक्रेन युद्ध खत्म कराने के लिए मध्यस्थता को तैयार केंद्रीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि रूस-यूक्रेन जंग का समाधान इस बात से नहीं निकलेगा कि कोई देश रूसी तेल खरीदता है या नहीं। पूरी खबर पढ़ें…

पुतिन बोले- रूसी जहाजों को जब्त करना आतंकवाद है:इससे यूक्रेन जंग कभी खत्म नहीं होगी; नॉर्वे के जहाज जब्त करने पर नाराजगी जताई

रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच समुद्र में रूसी जहाजों को लेकर तनाव बढ़ गया है। रूस के नागरिक और कारोबारी जहाजों पर हमलों को लेकर राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने चेतावनी दी है। उन्होंने इसे आतंकवाद करार दिया और कहा कि इससे रूस और यूक्रेन के बीच शांति वार्ता की संभावना और मुश्किल हो रही है। पुतिन ने नॉर्वे की ओर से रूसी रिसर्च जहाज प्रोफेसर मोलचानोव को हिरासत में लिए जाने पर भी नाराजगी जताई। नॉर्वे ने यूक्रेन के कहने पर जहाज जब्त किया नॉर्वे ने यूक्रेन की सरकारी कंपनी नाफ्टोगाज की मांग पर इस जहाज को हिरासत में लिया। उस वक्त ‘प्रोफेसर मोलचानोव’ स्वालबार्ड के बारेंट्सबर्ग इलाके में खड़ा था। यह रूस का सरकारी रिसर्च जहाज है। इस पर वैज्ञानिकों और रिसर्च से जुड़े कर्मचारियों के अलावा उनके परिवार और पर्यटक भी सफर करते हैं। यह स्वालबार्ड की रूसी बस्तियों के लिए जरूरी सामान भी पहुंचाता है। नॉर्वे ने यह जहाज किसी समुद्री प्रतिबंध के उल्लंघन के आरोप में नहीं, बल्कि एक पुराने मुआवजे के मामले में जब्त किया। 2014 में रूस ने क्रीमिया पर कब्जा करने के बाद वहां नाफ्टोगाज की संपत्तियों पर नियंत्रण कर लिया था। इसके बाद नाफ्टोगाज ने रूस से मुआवजा मांगा। 2023 में हेग की एक अंतरराष्ट्रीय अदालत ने रूस को नाफ्टोगाज को करीब 4.22 अरब डॉलर देने का आदेश दिया। रूस ने अब तक यह रकम नहीं दी है। पुतिन बोले- यूक्रेन ने 100 रूसी जहाजों पर हमले किए पुतिन ने कहा कि उनकी नाराजगी सिर्फ नॉर्वे द्वारा जहाज जब्त किए जाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यूक्रेन अब समुद्र में रूसी नागरिक जहाजों को सीधे निशाना बना रहा है। उन्होंने दावा किया कि पिछले 40 दिनों के भीतर लगभग 100 रूसी व्यापारिक जहाजों पर हमले किए गए, जिनमें कई रूसी व विदेशी नाविकों की जान गई है। पुतिन ने चेतावनी दी कि रूस दुनिया के किसी भी कोने में इसका करारा जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार है। अमेरिका से बातचीत का रास्ता अभी बंद नहीं हुआ यूक्रेन के साथ शांति वार्ता को लेकर भले ही मुश्किलें बढ़ रही हों, लेकिन पुतिन ने अमेरिका के साथ बातचीत का रास्ता खुला होने के संकेत दिए हैं। उन्होंने कहा कि रूस और अमेरिका के बीच संपर्क लगातार बना हुआ है और मॉस्को, वॉशिंगटन के साथ रिश्ते फिर सामान्य करना चाहता है। पुतिन ने यह भी साफ किया कि इसके लिए सिर्फ रूस की इच्छा काफी नहीं है। अमेरिका को भी इसके लिए तैयार होना होगा। पुतिन ने ट्रम्प के रुख को लेकर कहा कि उनकी समझ के मुताबिक अमेरिकी राष्ट्रपति सकारात्मक बातचीत के पक्ष में हैं। उन्होंने बताया कि दोनों देशों की खुफिया एजेंसियों के बीच संपर्क जारी है। ट्रम्प के दूत भी रूस के संपर्क में हैं। इसी बीच पिछले हफ्ते CIA प्रमुख जॉन रैटक्लिफ ने मॉस्को में रूस के खुफिया अधिकारियों से मुलाकात की थी। इस मुलाकात में क्या बात हुई, यह दोनों देशों ने सार्वजनिक नहीं किया है। पुतिन ने नई सैन्य लामबंदी की खबरों को खारिज किया राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने रूस में नई अनिवार्य सैन्य भर्ती या लामबंदी की खबरों को खारिज किया है। उन्होंने कहा कि फिलहाल रूस को नए सैनिकों की लामबंदी की जरूरत नहीं है। व्लादिवोस्तोक में ईस्टर्न इकोनॉमिक फोरम में पुतिन ने कहा, “आज ऐसी कोई स्थिति नहीं है, जिसके लिए लामबंदी की जरूरत हो।” उन्होंने इन खबरों को दुष्प्रचार अभियान बताया। पुतिन के मुताबिक, इस महीने होने वाले रूस के निचले सदन स्टेट ड्यूमा के चुनाव से पहले यह अभियान चलाया जा रहा है, ताकि चुनाव के नतीजों को प्रभावित किया जा सके। उन्होंने कहा कि लोग अपनी इच्छा से सेना में शामिल हो रहे हैं और सैन्य सेवा के लिए कॉन्ट्रैक्ट साइन कर रहे हैं। 2022 में 3 लाख लोगों की हुई थी लामबंदी रूस में आखिरी बार सितंबर 2022 में आंशिक लामबंदी हुई थी। क्रेमलिन के मुताबिक, तब करीब 3 लाख रिजर्व सैनिकों को सेना में बुलाया गया था। इस फैसले के बाद रूस में काफी विरोध हुआ था और बड़ी संख्या में सैन्य सेवा की उम्र वाले पुरुष देश छोड़कर चले गए थे। इसके बाद से क्रेमलिन कई बार कह चुका है कि रूस में दोबारा ऐसी लामबंदी की कोई योजना नहीं है।

जयशंकर बोले-भारत यूक्रेन जंग खत्म कराने में मदद को तैयार:कहा- जरूरत पड़ी तो मध्यस्थता करेंगे; ब्लैक सी में नाविकों की सुरक्षा का मुद्दा उठाया

केंद्रीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि भारत रूस-यूक्रेन युद्ध खत्म कराने में मदद के लिए तैयार है। उन्होंने जरूरत पड़ने पर मध्यस्थता करने की भी पेशकश की है। जयशंकर ने यह बात गुरुवार को कीव दौरे के दौरान पत्रकारों से बातचीत में कही। वे यूक्रेन के विदेश मंत्री एंड्री सिबिहा के साथ मौजूद थे। जयशंकर ने ब्लैक सी में भारतीयों समेत सभी नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जरूरत पर भी जोर दिया है। साथ ही उन्होंने कहा कि युद्ध का समाधान बातचीत और कूटनीति के जरिए निकाला जाना चाहिए। ब्लैक सी दुनिया के प्रमुख समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। रूस और यूक्रेन से गेहूं, मक्का और सूरजमुखी तेल का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से दुनिया के दूसरे देशों तक पहुंचता है। जयशंकर के यूक्रेन दौरे की तस्वीरें… यूक्रेन बोला- रूसी हमलों के बीच जयशंकर का दौरा अहम यूक्रेन के विदेश मंत्री एंड्री सिबिहा ने जयशंकर के कीव दौरे को अहम बताया। उन्होंने कहा कि रूसी हमलों के बीच भारतीय विदेश मंत्री की यह यात्रा खास मायने रखती है। सिबिहा ने कहा कि रूस लगातार यूक्रेनी शहरों, बंदरगाहों और नागरिक जहाजों को निशाना बना रहा है। दोनों नेताओं ने ब्लैक सी में जहाजों की आवाजाही सामान्य करने और इससे जुड़ी वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर भी चर्चा की। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के उस रुख का भी स्वागत किया, जिसमें भारत लगातार बातचीत और कूटनीति के जरिए युद्ध खत्म करने की बात कहता रहा है। दोनों देश अगली अंतर-सरकारी आयोग की बैठक कराने पर भी सहमत हुए। दोनों नेताओं के बीच इंफ्रास्ट्रक्चर, फार्मा, टेक्नोलॉजी और डिजिटल सेक्टर में भारत-यूक्रेन के बीच सहयोग बढ़ाने पर भी बात हुई। जयशंकर 3 से 5 सितंबर तक यूक्रेन और पोलैंड दौरे पर विदेश मंत्री एस. जयशंकर 3 से 5 सितंबर तक यूक्रेन और पोलैंड की आधिकारिक यात्रा पर हैं। यूक्रेन के बाद वे पोलैंड जाएंगे, जहां उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री रादोस्लाव सिकोरस्की से द्विपक्षीय बातचीत करेंगे। विदेश मंत्रालय के मुताबिक, इस यात्रा का मकसद दोनों देशों के साथ भारत के रिश्तों को और मजबूत करना है। इस दौरान क्षेत्रीय हालात और आपसी हितों से जुड़े दूसरे अहम मुद्दों पर भी चर्चा होगी। खबर लगातार अपडेट हो रही है…

भारत की जगह चीन से महंगी बिजली खरीद रहा बांग्लादेश:दोगुनी कीमत चुका रहा, फैसले के लेकर देश में विरोध

बांग्लादेश भारत से मिलने वाली सस्ती बिजली के बावजूद चीन से महंगी बिजली खरीद रहा है। ढाका के पास अमीनबाजार में लग रहे वेस्ट-टू-एनर्जी प्रोजेक्ट से 42 MW बिजली 25 टका यानी करीब 19.25 रुपए प्रति यूनिट की दर से खरीदी जाएगी। इसके लिए 25 साल का करार हुआ है। भारत से बांग्लादेश को करीब 11 टका यानी 8.50 रुपए प्रति यूनिट की दर से बिजली मिल रही है। चीन से मिलने वाली बिजली की कीमत भारत से दोगुने से भी ज्यादा है। 2 सितंबर को बीजिंग में हुए इस समझौते का बांग्लादेश में विरोध हो रहा है। बांग्लादेश ने भारत के 1 पैसे के चार्ज पर आपत्ति जताई थी भारत के केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग (CERC) ने सीमा-पार बिजली लेनदेन और ग्रिड से जुड़े खर्च के लिए 1 पैसे प्रति यूनिट शुल्क प्रस्तावित किया था। बांग्लादेश पावर डेवलपमेंट बोर्ड (BPDB) ने इसका विरोध किया। इसके बाद भारत ने शुल्क को घटाकर आधा पैसा प्रति यूनिट करने की बात कही। चीन के प्रोजेक्ट से कचरे की समस्या भी होगी कम अमीनबाजार का प्रोजेक्ट सिर्फ बिजली बनाने के लिए नहीं है। इसमें ढाका के कचरे का इस्तेमाल बिजली उत्पादन के लिए किया जाएगा। करीब 2.3 करोड़ आबादी वाले ढाका में रोजाना 8 हजार मीट्रिक टन कचरा निकलता है। वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट से कचरे की समस्या कम करने के साथ बिजली भी पैदा होगी। बांग्लादेश इस समय बिजली की कमी और पावर कट की समस्या से जूझ रहा है। देश के सामने विदेशी मुद्रा का संकट भी है। बांग्लादेश के पावर सेक्टर में चीन का दखल बढ़ रहा चीन बांग्लादेश के पावर इंफ्रास्ट्रक्चर में अपनी भूमिका बढ़ा रहा है। वह तीस्ता नदी पर हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट समेत बिजली से जुड़े बड़े प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। अमीनबाजार का वेस्ट-टू-एनर्जी प्रोजेक्ट भी इसी बढ़ती भागीदारी का हिस्सा है। चीन की योजना बांग्लादेश के रास्ते म्यांमार तक भी ऊर्जा पहुंच बढ़ाने की है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2030 तक ढाका के वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट से म्यांमार को बिजली सप्लाई करने की तैयारी है। इस तरह अमीनबाजार प्रोजेक्ट का इस्तेमाल बांग्लादेश की बिजली जरूरत के साथ क्षेत्रीय ऊर्जा कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए भी किया जाएगा। ———————– ये खबर भी पढ़ें… रूस-यूक्रेन ने ब्लैक सी में 300 जहाजों पर हमले किए:दुनिया में गेहूं-मक्का महंगा होने का खतरा; रूस का अनाज निर्यात 71% घटा रूस-यूक्रेन युद्ध में ब्लैक सी अब जंग का बड़ा मोर्चा बन गया है। पिछले करीब डेढ़ महीने में दोनों देशों ने 300 से ज्यादा जहाजों को निशाना बनाया है। पूरी खबर पढ़ें…

नीदरलैंड्स ने अमेरिका-कनाडा से 86 टन सोना हटाकर लंदन भेजा:बैंक ऑफ इंग्लैड में रखा, कहा- संकट आने पर यहां आसानी से बेच सकेंगे

नीदरलैंड्स ने अमेरिका और कनाडा में रखा 86 टन सोना निकालकर लंदन भेज दिया है। डच सेंट्रल बैंक (DNB) ने बताया कि यह ट्रांसफर मार्च से अगस्त के बीच कई महीनों में किया गया। अब यह सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड में रखा गया है। DNB के मुताबिक, संकट की स्थिति में लंदन में रखा सोना ज्यादा आसानी से खरीदा-बेचा जा सकता है। इस ट्रांसफर से पहले DNB के कुल सोने का 31.3% न्यूयॉर्क और 19.7% ओटावा में रखा था। अब दोनों जगहों पर यह हिस्सेदारी घटकर 18.5% रह गई है। वहीं, लंदन में रखे सोने की हिस्सेदारी 18.1% से बढ़कर 32.1% हो गई है। नीदरलैंड्स में 30.8% सोना अभी भी रखा हुआ है। 27 टन सोना न्यूयॉर्क-ओटावा से नीदरलैंड्स लाया गया DNB के मुताबिक, 27 टन सोने की छड़ें न्यूयॉर्क और ओटावा से नीदरलैंड्स के जाइस्ट पहुंचाई गईं। इसके बाद इसी मात्रा और गुणवत्ता का सोना लंदन भेज दिया गया। सोने की छड़ों को पिघलाने की जरूरत नहीं पड़ी। हालांकि, अटलांटिक महासागर के पार इतनी बड़ी मात्रा में सोना किस तरह पहुंचाया गया, इसकी जानकारी बैंक ने नहीं दी। DNB ने बताया कि ट्रांसफर का बाकी हिस्सा अलग तरीके से किया गया। न्यूयॉर्क में सोना बेचा गया और उतनी ही मात्रा का सोना लंदन में दोबारा खरीदा गया। बैंक के मुताबिक, सोने की खरीद-बिक्री और फिजिकल ट्रांसफर को साथ करने से इतनी बड़ी और जटिल प्रक्रिया से जुड़े जोखिम को बांटने में मदद मिली। संकट में लंदन का सोना जल्दी इस्तेमाल हो सकेगा DNB के मुताबिक, बैंक ऑफ इंग्लैंड में रखा सोना दुनिया में सबसे आसानी से ट्रेड होने वाले सोने में माना जाता है। इसलिए किसी संकट के समय इसे अमेरिका या कनाडा में रखे सोने की तुलना में ज्यादा आसानी से बेचा या खरीदा जा सकता है। DNB ने इस फैसले के पीछे “बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव” का हवाला दिया है। हालांकि, बैंक ने यह साफ नहीं किया कि वह किन घटनाओं को लेकर ऐसा कह रहा है। अमेरिका-कनाडा के बीच जारी है ट्रेड विवाद यह फैसला ऐसे समय आया है, जब अमेरिका और कनाडा के बीच ट्रेड विवाद चल रहा है। दोनों देशों के बीच बातचीत फेल होने के बाद एक-दूसरे के सामान पर नए टैरिफ लगाए गए हैं। कनाडा के स्टील, एल्युमिनियम, लकड़ी और ऑटोमोबाइल जैसे प्रमुख सेक्टर अमेरिकी टैरिफ से प्रभावित हुए हैं। अगस्त में अमेरिका ने करीब 28 अरब कनाडाई डॉलर यानी 20 अरब डॉलर के कनाडाई सामान पर अतिरिक्त 50% टैरिफ लगाने का ऐलान किया था। नीदरलैंड्स के पास कुल 612.4 टन सोना DNB के मुताबिक, 2025 के अंत में नीदरलैंड्स के पास कुल 612.4 टन सोना था। इसकी कीमत करीब 72.2 अरब यूरो थी। बैंक ने बताया कि सोने को अलग-अलग जगहों पर रखने की व्यवस्था का मकसद जोखिम को बांटना और संकट के समय सोने तक आसानी से पहुंच बनाए रखना है। लंदन का गोल्ड मार्केट सबसे बड़ा फ्रांस की नेशनल गोल्ड काउंटर के प्रेसिडेंट लॉरेंट श्वार्ट्ज ने कहा कि सेंट्रल बैंक करीब एक दशक से अपने गोल्ड रिजर्व को अलग-अलग जगहों पर शिफ्ट कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिका के मौजूदा राजनीतिक माहौल की वजह से भी कुछ सेंट्रल बैंक सोना रखने के लिए दूसरी जगहों को चुन सकते हैं। श्वार्ट्ज के मुताबिक, लंदन का गोल्ड मार्केट दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे ज्यादा लिक्विड मार्केट है। यानी यहां सोने को आसानी से खरीदा-बेचा जा सकता है। इसलिए संकट के समय लंदन में रखा सोना जल्दी इस्तेमाल किया जा सकता है। सेंट्रल बैंक यहां अपने सोने को दूसरे बैंकिंग संस्थानों को आसानी से उधार भी दे सकते हैं। ——————– ये खबर भी पढ़ें… रूस-यूक्रेन ने ब्लैक सी में 300 जहाजों पर हमले किए:दुनिया में गेहूं-मक्का महंगा होने का खतरा; रूस का अनाज निर्यात 71% घटा रूस-यूक्रेन युद्ध में ब्लैक सी अब जंग का बड़ा मोर्चा बन गया है। पिछले करीब डेढ़ महीने में दोनों देशों ने 300 से ज्यादा जहाजों को निशाना बनाया है। इनमें अनाज ले जाने वाले जहाज, तेल टैंकर और दूसरे मालवाहक पोत शामिल हैं। लगातार हमलों से ब्लैक सी का समुद्री व्यापार प्रभावित हुआ है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

रूस-यूक्रेन ने ब्लैक सी में 300 जहाजों पर हमले किए:दुनिया में गेहूं-मक्का महंगा होने का खतरा; रूस का अनाज निर्यात 71% घटा

रूस-यूक्रेन युद्ध में ब्लैक सी अब जंग का बड़ा मोर्चा बन गया है। पिछले करीब डेढ़ महीने में दोनों देशों ने 300 से ज्यादा जहाजों को निशाना बनाया है। इनमें अनाज ले जाने वाले जहाज, तेल टैंकर और दूसरे मालवाहक पोत शामिल हैं।लगातार हमलों से ब्लैक सी का समुद्री व्यापार प्रभावित हुआ है। जहाज मालिक इस रूट पर जाने से बच रहे हैं और माल ढुलाई की लागत बढ़ रही है। इसका असर दुनिया की खाद्य सप्लाई पर पड़ने का खतरा है। गेहूं और मक्का की कीमतों में तेजी आ सकती है। रूस और यूक्रेन मिलकर दुनिया के करीब 30% गेहूं निर्यात का हिस्सा रखते हैं। दोनों देशों का ज्यादातर अनाज ब्लैक सी के रास्ते दूसरे देशों तक पहुंचता है। रूस का अनाज निर्यात 71% घटा अगस्त में रूस का कुल अनाज निर्यात पिछले साल के 59 लाख टन से घटकर 17 लाख टन रह गया। यानी करीब 71% की गिरावट आई। रूस का गेहूं निर्यात भी 50 लाख टन से घटकर 13 लाख टन रह गया। रूसी गेहूं खरीदने वाले देशों की संख्या 43 से घटकर 16 रह गई है। वहीं, रूस से अनाज भेजने वाले बंदरगाहों की संख्या 47 से घटकर 10 रह गई। देश के सबसे बड़े बंदरगाह नोवोरोसिस्क से शिपमेंट 24.9 लाख टन से घटकर 10.4 लाख टन रह गया। पिछले साल के मुकाबले गेहूं 30% महंगा हुआ बंदरगाहों और जहाजों पर हमले बढ़ने से अनाज का समुद्री कारोबार प्रभावित हुआ है। दोनों देशों के गोदामों में अनाज मौजूद है, लेकिन उसे खरीदार देशों तक पहुंचाने में मुश्किल आ रही है। इसका असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी दिख रहा है। गेहूं की कीमतें पिछले एक साल में करीब 30% बढ़ चुकी हैं। यूक्रेन ने सड़क-रेल से निर्यात बढ़ाया, लेकिन सप्लाई कम ब्लैक सी का समुद्री रास्ता प्रभावित होने के बाद यूक्रेन सड़क और रेल नेटवर्क के जरिए अनाज दूसरे देशों तक भेज रहा है। हालांकि इन रास्तों की क्षमता ब्लैक सी के बंदरगाहों की तुलना में काफी कम है। डेन्यूब नदी के रास्ते भी सीमित मात्रा में अनाज भेजा जा रहा है। लेकिन जलस्तर और परिवहन क्षमता की वजह से यह विकल्प समुद्री रास्ते की पूरी भरपाई नहीं कर पा रहा है। मक्का की ग्लोबल सप्लाई पर भी असर का खतरा ब्लैक सी में बढ़ते तनाव का असर सिर्फ गेहूं पर नहीं, मक्का की सप्लाई पर भी पड़ सकता है। 2025-26 में यूक्रेन ने 2.3 करोड़ टन मक्का निर्यात किया था। यह दुनिया के कुल मक्का निर्यात का करीब 12% था। अगर मौजूदा हालात लंबे समय तक जारी रहे तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में मक्का की सप्लाई भी प्रभावित हो सकती है। ब्लैक सी क्यों है इतना अहम? ब्लैक सी दुनिया के प्रमुख समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। रूस और यूक्रेन से गेहूं, मक्का और सूरजमुखी तेल का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से दुनिया के दूसरे देशों तक पहुंचता है। दोनों देश मिलकर वैश्विक गेहूं निर्यात का करीब 30% हिस्सा रखते हैं। इसलिए ब्लैक सी में सैन्य तनाव का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय खाद्य बाजार पर पड़ सकता है। 2022 में भी बढ़ी थीं खाद्य कीमतें 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद ब्लैक सी से अनाज निर्यात बाधित हुआ था। उस समय दुनिया भर में खाद्य कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई थी। बाद में संयुक्त राष्ट्र और तुर्किये की मध्यस्थता से ब्लैक सी ग्रेन डील लागू हुई। इससे लाखों टन अनाज अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच सका। अब ब्लैक सी में फिर जहाजों और बंदरगाहों पर हमले बढ़ने से वैश्विक खाद्य आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ गई है। अगर समुद्री रास्ता लंबे समय तक प्रभावित रहा तो गेहूं, मक्का और खाद्य तेल की कीमतों में नई तेजी आ सकती है। इसका असर उन देशों पर ज्यादा पड़ सकता है जो रूस और यूक्रेन से होने वाले अनाज निर्यात पर निर्भर हैं। ——————– ये खबर भी पढ़ें… रूबियो बोले- भारत-ईरान के बीच ट्रेड डील पर बातचीत नहीं:तेहरान की मदद करने वालों पर बैन लगाएंगे; मोदी-पजशकियान मुलाकात पर सवाल पूछा था अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने कहा कि मुझे नहीं लगता कि भारत और ईरान के बीच कोई ट्रेड डील हुई है। उनसे पीएम मोदी और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पजशकियान की मुलाकात को लेकर सवाल किया गया था। पूरी खबर पढ़ें…

रिपोर्ट-रूस की मदद से ईरान ने खतरनाक सुपरसोनिक मिसाइल बनाया:3 साल लगे; अमेरिकी जहाजों पर हमले में इस्तेमाल होगा

रूस गुपचुप तरीके से ईरान को सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल विकसित करने की तकनीक दे रहा था। फाइनेंशियल टाइम्स (FT) की रिपोर्ट के मुताबिक, इस सीक्रेट प्रोजेक्ट की शुरुआत 2023 में हुई थी। अमेरिका-इजराइल के ईरान के खिलाफ युद्ध के दौरान भी इस पर काम जारी रहा। इस कार्यक्रम का कोडनेम C430L है। इसमें कुछ रूसी मिसाइल एक्सपर्ट ईरान के साथ काम कर रहे थे। कार्यक्रम का मकसद ईरान को ऐसी मिसाइल तकनीक विकसित करने में मदद करना है, जिसका इस्तेमाल अमेरिकी वॉरशिप के खिलाफ किया जा सकता है। FT के मुताबिक, लीक हुए दस्तावेजों से पता चलता है कि C430L कार्यक्रम को लेकर रूस और ईरान के बीच बातचीत 2026 की गर्मियों तक जारी थी। हालांकि, अभी यह साफ नहीं है कि इस कार्यक्रम के तहत ईरान ने पूरी तरह तैयार सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल विकसित कर ली है या उसे सैन्य इस्तेमाल के लिए कब तक तैनात किया जा सकता है। ईरान के पास सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल क्षमता नहीं सुपरसोनिक का मतलब है ऐसी रफ्तार जो आवाज की गति (मैक 1) से ज्यादा हो। यह करीब 1,200 किमी/घंटा से ज्यादा की रफ्तार से उड़ती है। ईरान के पास तेज रफ्तार बैलिस्टिक और हाइपरसोनिक मिसाइलें हैं। ईरान अपनी फत्तह मिसाइल की रफ्तार करीब मैक 13 से 15 बताता है, यानी लगभग 16,000 से 18,500 किमी/घंटा। इन बैलिस्टिक मिसाइलों का उड़ने का तरीका अलग होता है। वह ऊपर जाती है और फिर तेज रफ्तार से नीचे अपने टारगेट की तरफ आती है। ऊंचाई पर आने वाली बैलिस्टिक मिसाइल रडार को ज्यादा आसानी से दिखाई दे सकती है। डिफेंस सिस्टम को उसे ट्रैक करने और उस पर हमला करने के लिए ज्यादा समय मिलता है। कम ऊंचाई पर आने वाली क्रूज मिसाइल जमीन या समुद्र की सतह के करीब उड़ती है। धरती की गोलाई और पहाड़ों जैसी चीजों की वजह से रडार उसे तब पकड़ सकता है, जब वह काफी करीब आ चुकी हो। यही वजह है कि ईरान सुपरसोनिक रफ्तार वाली क्रूज मिसाइल बना रहा है। C430L प्रोग्राम का मकसद- रैमजेट इंजन बनाना FT की जांच के मुताबिक, कार्यक्रम का मुख्य फोकस रैमजेट इंजन पर था। यह ऐसा इंजन है, जो तेज रफ्तार से उड़ रही मिसाइल को आगे बढ़ाने के लिए हवा और ईंधन का इस्तेमाल करता है। मिसाइल जब तेजी से आगे बढ़ती है तो सामने से आने वाली हवा इंजन के अंदर जाती है। वहां इस हवा में ईंधन मिलाकर जलाया जाता है। इससे पैदा होने वाली ताकत मिसाइल को आगे बढ़ाने और उसकी तेज रफ्तार बनाए रखने में मदद करती है। रैमजेट इंजन का तेज रफ्तार वाली मिसाइलों में इस्तेमाल होता है। हालांकि, इसे काम करने के लिए मिसाइल को पहले से पर्याप्त गति चाहिए। इसलिए शुरुआत में मिसाइल को गति देने के लिए अलग इंजन या लॉन्च सिस्टम की जरूरत हो सकती है। ईरान ने रैमजेट इंजन का टेस्ट भी किया रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान रैमजेट इंजन विकसित कर चुका है और उसका उड़ान परीक्षण भी कर चुका है। पूर्व CIA विश्लेषक जिम लैमसन के मुताबिक, इस तरह की तकनीक ईरान को भविष्य में ऐसा हथियार सिस्टम विकसित करने में मदद कर सकती है, जो अमेरिकी नौसेना के जहाजों के लिए खतरा बने। ड्रोन से मिसाइल तकनीक तक पहुंचा रूस-ईरान का सहयोग ईरान पहले ही रूस को शाहेद ड्रोन दे चुका है। इन ड्रोन का इस्तेमाल यूक्रेन युद्ध में बड़े पैमाने पर हुआ है। ईरान ने रूस में इन ड्रोनों का उत्पादन शुरू करने में भी मदद की थी। वहीं रूस ने भी ईरान को सैन्य उपकरण और हथियार मुहैया कराए हैं। यह पहली बार हो रहा है जब रूस सिर्फ हथियार देने के बजाय ईरान की अपनी मिसाइल बनाने की क्षमता बढ़ाने में मदद कर रहा है। यही वजह है कि C430L प्रोग्राम को रूस और ईरान के सैन्य सहयोग में एक अहम कदम मान जा रहा है। रूस की सरकारी हथियार कंपनी भी शामिल एफटी के मुताबिक, सी430एल कार्यक्रम को रूस की सरकारी हथियार निर्यात कंपनी रोसबोरोनेक्सपोर्ट ने तैयार किया था। इस प्रोजेक्ट में उसने रूस की मिसाइल कंपनी एनपीओ मशिनोस्त्रोयेनिया के साथ काम किया। अमेरिका ने 2014 में NPO मशिनोस्त्रोयेनिया पर प्रतिबंध लगाए थे। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, यह कंपनी जहाज, पनडुब्बी और जमीन से दागी जाने वाली क्रूज मिसाइलों पर काम करती है। यह कंपनी रूस के परमाणु हथियार कार्यक्रम से जुड़े काम में भी शामिल रही है। FT को मिले लीक दस्तावेजों और यात्रा रिकॉर्ड से पता चलता है कि C430L समझौते पर हस्ताक्षर होने से पहले रूस के हथियार निर्यात अधिकारियों और NPO मशिनोस्त्रोयेनिया के कई वरिष्ठ इंजीनियरों ने ईरान के कई दौरे किए थे।