रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच समुद्र में रूसी जहाजों को लेकर तनाव बढ़ गया है। रूस के नागरिक और कारोबारी जहाजों पर हमलों को लेकर राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने चेतावनी दी है। उन्होंने इसे आतंकवाद करार दिया और कहा कि इससे रूस और यूक्रेन के बीच शांति वार्ता की संभावना और मुश्किल हो रही है। पुतिन ने नॉर्वे की ओर से रूसी रिसर्च जहाज प्रोफेसर मोलचानोव को हिरासत में लिए जाने पर भी नाराजगी जताई। नॉर्वे ने यूक्रेन के कहने पर जहाज जब्त किया नॉर्वे ने यूक्रेन की सरकारी कंपनी नाफ्टोगाज की मांग पर इस जहाज को हिरासत में लिया। उस वक्त ‘प्रोफेसर मोलचानोव’ स्वालबार्ड के बारेंट्सबर्ग इलाके में खड़ा था। यह रूस का सरकारी रिसर्च जहाज है। इस पर वैज्ञानिकों और रिसर्च से जुड़े कर्मचारियों के अलावा उनके परिवार और पर्यटक भी सफर करते हैं। यह स्वालबार्ड की रूसी बस्तियों के लिए जरूरी सामान भी पहुंचाता है। नॉर्वे ने यह जहाज किसी समुद्री प्रतिबंध के उल्लंघन के आरोप में नहीं, बल्कि एक पुराने मुआवजे के मामले में जब्त किया। 2014 में रूस ने क्रीमिया पर कब्जा करने के बाद वहां नाफ्टोगाज की संपत्तियों पर नियंत्रण कर लिया था। इसके बाद नाफ्टोगाज ने रूस से मुआवजा मांगा। 2023 में हेग की एक अंतरराष्ट्रीय अदालत ने रूस को नाफ्टोगाज को करीब 4.22 अरब डॉलर देने का आदेश दिया। रूस ने अब तक यह रकम नहीं दी है। पुतिन बोले- यूक्रेन ने 100 रूसी जहाजों पर हमले किए पुतिन ने कहा कि उनकी नाराजगी सिर्फ नॉर्वे द्वारा जहाज जब्त किए जाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यूक्रेन अब समुद्र में रूसी नागरिक जहाजों को सीधे निशाना बना रहा है। उन्होंने दावा किया कि पिछले 40 दिनों के भीतर लगभग 100 रूसी व्यापारिक जहाजों पर हमले किए गए, जिनमें कई रूसी व विदेशी नाविकों की जान गई है। पुतिन ने चेतावनी दी कि रूस दुनिया के किसी भी कोने में इसका करारा जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार है। अमेरिका से बातचीत का रास्ता अभी बंद नहीं हुआ यूक्रेन के साथ शांति वार्ता को लेकर भले ही मुश्किलें बढ़ रही हों, लेकिन पुतिन ने अमेरिका के साथ बातचीत का रास्ता खुला होने के संकेत दिए हैं। उन्होंने कहा कि रूस और अमेरिका के बीच संपर्क लगातार बना हुआ है और मॉस्को, वॉशिंगटन के साथ रिश्ते फिर सामान्य करना चाहता है। पुतिन ने यह भी साफ किया कि इसके लिए सिर्फ रूस की इच्छा काफी नहीं है। अमेरिका को भी इसके लिए तैयार होना होगा। पुतिन ने ट्रम्प के रुख को लेकर कहा कि उनकी समझ के मुताबिक अमेरिकी राष्ट्रपति सकारात्मक बातचीत के पक्ष में हैं। उन्होंने बताया कि दोनों देशों की खुफिया एजेंसियों के बीच संपर्क जारी है। ट्रम्प के दूत भी रूस के संपर्क में हैं। इसी बीच पिछले हफ्ते CIA प्रमुख जॉन रैटक्लिफ ने मॉस्को में रूस के खुफिया अधिकारियों से मुलाकात की थी। इस मुलाकात में क्या बात हुई, यह दोनों देशों ने सार्वजनिक नहीं किया है। पुतिन ने नई सैन्य लामबंदी की खबरों को खारिज किया राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने रूस में नई अनिवार्य सैन्य भर्ती या लामबंदी की खबरों को खारिज किया है। उन्होंने कहा कि फिलहाल रूस को नए सैनिकों की लामबंदी की जरूरत नहीं है। व्लादिवोस्तोक में ईस्टर्न इकोनॉमिक फोरम में पुतिन ने कहा, “आज ऐसी कोई स्थिति नहीं है, जिसके लिए लामबंदी की जरूरत हो।” उन्होंने इन खबरों को दुष्प्रचार अभियान बताया। पुतिन के मुताबिक, इस महीने होने वाले रूस के निचले सदन स्टेट ड्यूमा के चुनाव से पहले यह अभियान चलाया जा रहा है, ताकि चुनाव के नतीजों को प्रभावित किया जा सके। उन्होंने कहा कि लोग अपनी इच्छा से सेना में शामिल हो रहे हैं और सैन्य सेवा के लिए कॉन्ट्रैक्ट साइन कर रहे हैं। 2022 में 3 लाख लोगों की हुई थी लामबंदी रूस में आखिरी बार सितंबर 2022 में आंशिक लामबंदी हुई थी। क्रेमलिन के मुताबिक, तब करीब 3 लाख रिजर्व सैनिकों को सेना में बुलाया गया था। इस फैसले के बाद रूस में काफी विरोध हुआ था और बड़ी संख्या में सैन्य सेवा की उम्र वाले पुरुष देश छोड़कर चले गए थे। इसके बाद से क्रेमलिन कई बार कह चुका है कि रूस में दोबारा ऐसी लामबंदी की कोई योजना नहीं है।
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने बुधवार को कहा कि उन्हें नहीं लगता कि भारत और ईरान किसी ट्रेड डील पर बातचीत कर रहे हैं। साथ ही, उन्होंने दूसरे देशों को चेतावनी दी कि वे तेहरान को अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने में मदद न करें।
रुबियो ने फॉक्स न्यूज रेडियो के ‘द ब्रायन किल्मीड शो’ में एक इंटरव्यू के दौरान ये बातें कहीं। उनसे शंघाई सहयोग संगठन (SCO) समिट के दौरान बिश्केक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन की मुलाकात के बारे में पूछा गया था।
रूबियो ने कहा, “मुझे नहीं लगता कि भारत और ईरान के बीच कोई ट्रेड डील हुई है। जाहिर है, हर देश अपनी विदेश नीति बनाता है और दुनिया भर के कई देश ईरान की सरकार से बातचीत करते हैं।”
इस बात पर प्रतिक्रिया देते हुए कि पीएम मोदी और पेजेशकियन के बीच ट्रेड डील होने की संभावना दिख रही है, रूबियो ने आगे कहा: “मेरा मतलब है कि हमने भी ईरान की सरकार के कुछ लोगों से मुलाकात की है, क्योंकि कुछ बातचीत हुई है और उनसे संपर्क भी रहा है।”
रूबियो ने US प्रतिबंधों को लेकर चेतावनी दी
रूबियो ने कहा कि US राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वॉशिंगटन का रुख साफ कर दिया है: देशों को ईरान की मदद नहीं करनी चाहिए कि वह US प्रतिबंधों से बच सके।
रूबियो ने कहा, “किसी भी देश को ऐसे तरीके बनाने में उनकी मदद नहीं करनी चाहिए जिनसे वे कमाई कर सकें और उस पैसे का इस्तेमाल आतंकवाद को बढ़ावा देने और परमाणु हथियार बनाने की कोशिश में कर सकें।”
उन्होंने आगे कहा, “और अगर देश ऐसा करने का फैसला करते हैं, तो हमें उन पर भी प्रतिबंध लगाने होंगे।”
रुबियो का यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत ईरान के साथ अपने कूटनीतिक और आर्थिक संबंध बनाए हुए है, और साथ ही पश्चिम एशिया में चल रहे व्यापक युद्ध के बीच अमेरिका के साथ भी बातचीत कर रहा है।
मोदी-पेजेशकियन की मुलाकात में क्या हुआ?
फरवरी में ईरान-अमेरिका के बीच तनाव शुरू होने के बाद, प्रधानमंत्री मोदी ने सोमवार को बिश्केक में पेजेशकियन से अपनी पहली द्विपक्षीय बातचीत की।
बैठक के दौरान, मोदी ने कहा कि भारत ईरान के साथ अपने व्यापार के दायरे को “बढ़ाना और उसमें विविधता लाना” चाहता है। साथ ही, उन्होंने पश्चिम एशिया में स्थायी शांति के प्रयासों के लिए नई दिल्ली के समर्थन को भी दोहराया।
दोनों नेताओं ने इस टकराव और आम नागरिकों, नागरिक बुनियादी ढांचे और नेविगेशन की आजादी की सुरक्षा की जरूरत पर भी चर्चा की।
पेजेशकियान ने पीएम मोदी से आग्रह किया कि वे बातचीत को बढ़ावा देने और लड़ाई खत्म करने में मदद के लिए, संघर्ष में शामिल देशों के साथ भारत के व्यापक संपर्कों का इस्तेमाल करें।
भारत ने ईरान और अन्य संबंधित पक्षों के साथ चाबहार बंदरगाह के भविष्य पर भी बातचीत जारी रखी है। यह दोनों देशों के बीच एक अहम कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट है, जिस पर अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण अनिश्चितता बनी हुई है।
नई दिल्ली का मानना है कि इस क्षेत्र में विवादों को बातचीत और कूटनीति के जरिए सुलझाया जाना चाहिए, साथ ही उसे अपने व्यापार, कनेक्टिविटी और व्यापक रणनीतिक हितों की भी रक्षा करनी चाहिए।
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US-Iran War Update: ईरान में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के दौरान एक दर्दनाक घटना सामने आई है। दक्षिणी ईरान में एक ऐसे रिहायशी मकान को मिसाइल हमले से नुकसान पहुंचा, जहां शादी का समारोह चल रहा था। अमेरिकी सेना के हमले में एक बच्चे समेत कम से कम 5 लोगों की मौत हो गई। जबकि 50 से अधिक लोग घायल बताए जा रहे हैं। वहीं, तेहरान ने जॉर्डन, कुवैत और बहरीन में मौजूद US ठिकानों पर जवाबी हमला किया है।
ईरानी रेड क्रिसेंट के मुताबिक, यह हमला होर्मोजगान प्रांत के सिरिक काउंटी के कुहेस्तक शहर में हुआ। जिस घर को हमले के दौरान नुकसान पहुंचा, वहां शादी का जश्न मनाया जा रहा था। रेड क्रिसेंट ने बताया कि अमेरिकी मिसाइल हमले के बाद मिसाइल के छर्रे रिहायशी मकान तक पहुंचे, जिससे वहां मौजूद लोग इसकी चपेट में आ गए।
रेड क्रिसेंट ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जानकारी देते हुए कहा कि हमले में बड़ी संख्या में लोग घायल हुए हैं। शुरुआती जानकारी में एक छोटे बच्चे समेत चार लोगों की मौत की बात कही गई थी। जबकि बाद की रिपोर्टों में मृतकों की संख्या बढ़कर 5 बताई गई। घायलों की संख्या 50 से ज्यादा है।
मलबे में तब्दील हुआ घर, चीख-पुकार का वीडियो सामने आया
ईरानी सरकारी मीडिया ने हमले के बाद का कथित वीडियो भी जारी किया है। फुटेज में घटनास्थल पर भारी मलबा और मकान को हुआ नुकसान दिखाई देता है। वीडियो में आसपास मौजूद लोगों की चीख-पुकार भी सुनाई देती है। हालांकि, वीडियो और मृतकों तथा घायलों से जुड़े आंकड़ों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है।
ईरान का पलटवार, जॉर्डन, कुवैत और बहरीन में अमेरिका के ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले
इस बीच, ईरान ने अमेरिका के खिलाफ जवाबी कार्रवाई तेज कर दी है। ईरान ने बुधवार तड़के जॉर्डन, कुवैत और बहरीन में अमेरिकी सैन्य हितों से जुड़े ठिकानों को निशाना बनाकर बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन हमले किए। ये हमले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उस चेतावनी के कुछ ही समय बाद हुए, जिसमें उन्होंने ईरान को अमेरिका के खिलाफ किसी भी हमले की स्थिति में और ज्यादा कड़ा जवाब देने की चेतावनी दी थी।
ईरानी हमले ऐसे समय हुए जब अमेरिकी सेना ने दक्षिणी ईरान में हमलों की एक नई लहर शुरू की थी। अमेरिका का कहना है कि इन हमलों में ईरानी सेना इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) से जुड़े बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया गया। वॉशिंगटन के मुताबिक, यह कार्रवाई हाल में होर्मुज जलडमरूमध्य में कमर्शियल जहाजों और अमेरिकी सैनिकों के खिलाफ कथित हमले के प्रयासों के जवाब में की गई।
जॉर्डन में 10 मिसाइलों को मार गिराने का दावा
जॉर्डन में ईरानी IRGC ने एक अमेरिकी मरीन कॉर्प्स बेस पर बड़े पैमाने पर बैलिस्टिक मिसाइल हमला करने का दावा किया। ईरानी मीडिया ने इस सैन्य ठिकाने की पहचान कैंप टिटिन के तौर पर की है, जो अकाबा की खाड़ी के पास स्थित बताया गया है। ईरानी न्यूज एजेंसी ‘तस्नीम’ ने दावा किया कि हमले में अमेरिकी सैनिकों को निशाना बनाया गया। जवाबी हमले में बड़ी संख्या में अमेरिकी सैनिकों के मारे जाने की बात कही। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। दूसरी ओर, जॉर्डन की ओर से 10 ईरानी मिसाइलों को इंटरसेप्ट किए जाने की जानकारी सामने आई है।
हमले से बढ़ता तनाव, खाड़ी क्षेत्र पर मंडरा रहा खतरा
अमेरिका और ईरान के बीच लगातार बढ़ते सैन्य टकराव ने पूरे खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ा दिया है। एक तरफ अमेरिकी सेना ईरान के सैन्य और IRGC से जुड़े ठिकानों पर हमले कर रही है। वहींं ईरान जवाब में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी वाले देशों और ठिकानों को निशाना बना रहा है। होर्मुज स्ट्रेट को लेकर भी स्थिति बेहद संवेदनशील बनी हुई है। यह क्षेत्र वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यहां सैन्य तनाव बढ़ने का असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार और तेल आपूर्ति पर भी पड़ सकता है।
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ख़ुफ़िया एजेंसियां अपने राष्ट्र के दूरगामी हितों के लिए दोस्तों का भी बलिदान कर सकती है। ट्रम्प और पुतिन के दोस्ताना रिश्तों के बारे में दुनिया जानती है। ट्रम्प ईरान युद्द को जीतकर चुनाव जितना चाहते है वहीं पुतिन भी यूक्रेन को लेकर कुछ ऐसे ही मंसूबे पाले हुए है। यदि ईरान में तख्तापलट हो जाये तो ट्रम्प जीत जायेंगे और यदि यूक्रेन से जेलेंसकी की बिदाई हो जाये तो पुतिन जीत जायेंगे। लगता है ट्रम्प और पुतिन मिलकर एक दूसरे की मदद करने का मंसूबा बना चूके है। हाल ही में अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के निदेशक जॉन रैटक्लिफ का मॉस्को पहुंचना और रूसी खुफिया अधिकारियों से बातचीत करना इस बात का संकेत है कि दोनों महाशक्तियों के बीच कुछ खास पक रहा है।
दरअसल अंतरराष्ट्रीय राजनीति में दोस्ती और दुश्मनी स्थायी नहीं होती, स्थायी होते हैं राष्ट्रीय हित। यही वजह है कि जो देश सार्वजनिक मंचों पर एक-दूसरे के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी दिखाई देते है, उनकी खुफिया एजेंसियां पर्दे के पीछे संवाद के रास्ते खुले रखती है। रैटक्लिफ ने मॉस्को में रूसी खुफिया अधिकारियों के साथ बातचीत की, इसकी रूस की विदेशी खुफिया सेवा एसवीआर के प्रमुख सर्गेई नारीश्किन ने पुष्टि की है। वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में सीआईए प्रमुख की मॉस्को यात्रा का महत्व बहुत अधिक है। दोनों देशो की खुफियां एजेंसियों के बीच संवाद का इतिहास भी पुराना है।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ वैचारिक रूप से एक-दूसरे से बिल्कुल अलग थे, लेकिन नाजी जर्मनी के खिलाफ दोनों एक ही मोर्चे पर खड़े थे। उस दौर में अमेरिकी ओएसएस और सोवियत खुफिया तंत्र के बीच संपर्क स्थापित हुआ। अमेरिकी खुफिया इतिहास से पता चलता है कि ओएसएस प्रमुख विलियम जे.डोनोवन ने 1943 में सोवियत अधिकारियों के साथ खुफिया सहयोग और सूचनाओं के आदान-प्रदान की संभावनाओं पर बातचीत की थी। कुछ ही वर्षों बाद यही दोनों देश शीत युद्ध में एक-दूसरे के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी बन गए। इतिहास का यह अध्याय बताता है कि खुफिया सहयोग विचारधारा या मित्रता पर नहीं, बल्कि तत्कालीन रणनीतिक जरूरतों पर आधारित होता है।
अमेरिका और रूस के बीच बाद के वर्षों में भी सीमित खुफिया सहयोग के उदाहरण मिलते है। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में दोनों देशों ने कई बार एक-दूसरे को महत्वपूर्ण सूचनाएं दी है। दिसंबर 2017 में अमेरिका ने रूस को सेंट पीटर्सबर्ग में संभावित आतंकी हमले की जानकारी दी थी। रूसी सुरक्षा एजेंसियों ने इस सूचना के आधार पर कार्रवाई की और हमले की साजिश को विफल किया। इसके बाद राष्ट्रपति पुतिन ने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को फोन कर अमेरिकी सहायता के लिए धन्यवाद दिया था। यह घटना बताती है कि गंभीर साझा खतरे के सामने कट्टर प्रतिद्वंद्वी भी खुफिया जानकारी साझा कर सकते हैं।
रैटक्लिफ की वर्तमान मॉस्को यात्रा को इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है। यूक्रेन युद्ध ने अमेरिका और रूस को आमने-सामने खड़ा कर रखा है, लेकिन युद्ध को समाप्त करने की कोशिशों ने दोनों के बीच संवाद की आवश्यकता भी पैदा की है। राष्ट्रपति ट्रंप के लिए यूक्रेन युद्ध का अंत उनकी विदेश नीति की एक बड़ी उपलब्धि हो सकता है, जबकि पुतिन ऐसी समाप्ति चाहते हैं जिसमें रूस की रणनीतिक और क्षेत्रीय स्थिति कमजोर न हो। दोनों के हित पूरी तरह समान नहीं हैं, लेकिन युद्ध समाप्त करने की आवश्यकता दोनों पक्षों को बातचीत की मेज तक ला सकती है। ऐसे संवेदनशील दौर में खुफिया चैनल औपचारिक कूटनीति से अधिक उपयोगी साबित होते हैं, क्योंकि उनके माध्यम से बिना सार्वजनिक दबाव के संभावित विकल्पों पर बातचीत की जा सकती है।
इस पूरे घटनाक्रम में ईरान भी एक महत्वपूर्ण कड़ी है। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव, रूस और ईरान के रणनीतिक संबंध तथा पश्चिम एशिया में तेजी से बदलते समीकरणों ने मॉस्को और वॉशिंगटन दोनों की चिंताएं बढ़ाई है। यदि अमेरिका ईरान में निर्णायक रणनीतिक सफलता चाहता है, तो उसे रूस की भूमिका और उसके प्रभाव को भी ध्यान में रखना होगा। इसी तरह रूस के लिए भी यूक्रेन के अलावा पश्चिम एशिया में बदलते शक्ति-संतुलन को समझना आवश्यक है। इस मुलाकात में ईरान में तख्तापलट या यूक्रेन में राष्ट्रपति जेलेंस्की की सत्ता से विदाई पर बातचीत की संभावना से इसलिए इंकार नहीं किया जा सकता है क्योंकि इस पर ट्रम्प और पुतिन का राजनीतिक भविष्य टिका हुआ है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति की वास्तविकता है कि बड़ी शक्तियां दूसरे देशों की राजनीतिक परिस्थितियों को अपने हितों के अनुरूप प्रभावित करने के विकल्पों पर विचार करती रहती है। सत्ता परिवर्तन, नेतृत्व परिवर्तन या राजनीतिक दबाव जैसी परिस्थितियां कई बार बड़े भू-राजनीतिक समीकरणों का हिस्सा बनती है। इसलिए रैटक्लिफ की यात्रा को सामान्य तो नहीं लिया जा सकता।
इस घटनाक्रम का सबसे बड़ा संदेश यही है कि ट्रंप और पुतिन के बीच सार्वजनिक राजनीति से अलग एक रणनीतिक संवाद की संभावना बनी हुई है। दोनों नेता अपने-अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं और खुफिया एजेंसियां इसी रणनीतिक सोच का सबसे संवेदनशील हिस्सा होती है। वे मित्रता की रक्षा से अधिक अपने राष्ट्र के हितों की रक्षा करती है। आवश्यकता पड़ने पर प्रतिद्वंद्वी से बातचीत करना और अवसर मिलने पर सहयोगी से दूरी बनाना उनके लिए असामान्य नहीं है। इतिहास बताता है कि खुफिया एजेंसियों के बीच होने वाली बातचीत का वास्तविक महत्व अक्सर उसके तत्काल सार्वजनिक परिणामों से नहीं, बल्कि आने वाले महीनों में दिखाई देने वाले घटनाक्रमों से समझ में आता है। अमेरिका और रूस भले ही आज भी प्रतिद्वंद्वी हों, लेकिन राष्ट्रीय हित उन्हें एक-दूसरे से बात करने के लिए मजबूर कर रहे हैं। खुफिया एजेंसियों की यह खामोश कूटनीति आने वाले समय में यूक्रेन और ईरान ही नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक शक्ति-व्यवस्था को प्रभावित कर सकती है।
ईरान रूस का रणनीतिक साझेदार है, जबकि यूक्रेन अमेरिका और यूरोप की सुरक्षा-व्यवस्था का अहम मोर्चा। ऐसे में यदि दोनों देशों में सत्ता परिवर्तन होता है और नई सत्ताएं मॉस्को और वॉशिंगटन के अनुकूल बैठती है, तो यह पुतिन और ट्रंप दोनों के लिए असाधारण राजनीतिक जीत होगी। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में महाशक्तियां अपने हितों के लिए दूसरे देशों की राजनीतिक अस्थिरता और सत्ता परिवर्तन को प्रभावित करने से पीछे नहीं रही है। सत्ता परिवर्तन कई बार विचारधारा से नहीं, भू-राजनीतिक जरूरतों से संचालित होते हैं। ट्रंप और पुतिन भी शक्ति की इसी कठोर राजनीति के माहिर खिलाड़ी माने जाते है।
अमेरिका, यूरोप में हाल के वर्षों में ‘टीन टेकओवर’ और ‘ब्लैकआउट चैलेंज’ जैसे खतरनाक ट्रेंड के बाद अब ब्रिटेन में ‘रॉन्ग-वे ड्राइविंग’ ट्रेंड में है। सोशल मीडिया पर व्यूज और लाइक्स हासिल करने की अंधी दौड़ ने युवाओं को नए और जानलेवा खेल में उलझा दिया है। ब्रिटेन में इन दिनों हाईवे पर गलत दिशा में तेज रफ्तार गाड़ी चलाने का का ट्रेंड तेजी से फैल रहा है। युवा भीड़भाड़ वाली सड़कों या हाईवे पर पर गलत दिशा में कार दौड़ाते हुए वीडियो शूट कर उन्हें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर पोस्ट करते हैं। इस खतरनाक ‘गेमिफाइड’ स्टंट के कारण हाल ही में कई हादसे हुए हैं। जैसे- 22 अगस्त को उत्तरी इंग्लैंड के मिडल्सब्रो में हाईवे पर गलत दिशा से आ रही कार ने पुलिस वाहन को जोरदार टक्कर मार दी। इस हादसे में कार सवार 5 युवाओं और दो पुलिस अधिकारियों की मौत हुई। जांच में कार चला रहे युवा के टिकटॉक अकाउंट पर मिले एक पुराने वीडियो में 160 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से कार चलाने और पुलिस से भागने के दृश्य मिले। इस ट्रेंड से चिंतित ब्रिटेन के पीएम एंडी बर्नहैम कहते हैं कि खतरनाक ड्राइविंग की रील्स वास्तव में निंदनीय काम है। अमेरिका में ‘स्ट्रीट टेकओवर’ और ‘नो-हेजिटेशन ड्राइविंग’ नाम से गलत दिशा में स्पीडिंग और पुलिस को उकसाने के वीडियो बनाए जाते हैं। कैलिफोर्निया और टेक्सास जैसे राज्यों में इसे रोकने के लिए विशेष टास्क फोर्स का गठन करना पड़ा है। रील्स की सनक, खतरे का अहसास खत्म सवाल है कि युवा ऐसे जानलेवा स्टंट क्यों कर रहे हैं? वॉशिंगटन में साइबर साइकोलॉजी की प्रो. मैरी एकन बताती हैं, ‘जब युवा इन जानलेवा कारनामों को रिकॉर्ड और ब्रॉडकास्ट करते हैं, तो उन्हें असली खतरे से काल्पनिक दूरी महसूस होने लगती है। उन्हें लगता है कि वे कोई वीडियो गेम खेल रहे हैं या लाइव परफॉर्मेंस दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर मिलने वाले लाइक्स और व्यूज उन्हें जोखिम उठाने का सामाजिक इनाम महसूस कराते हैं।’ ब्रिटेन में इस वर्ष हाईवे पर गलत दिशा में गाड़ी चलाने के 62 केस हो चुके हैं, जो पिछले साल से 32% अधिक हैं। इस ट्रेंड से जुड़े हादसों में एक ही हफ्ते में 12 लोगों की मौत हुई है। ध्यान दें – ये अब ‘लाइक्स’ देखने के लिए दुनिया में नहीं हैं जैकब माटुसियाक, मकाई सैडिंगटन, थियो रे, माइकल रॉबर्ट कैहिल और कोल रॉबर्ट वर्थी की पासैट कार दुर्घटना में मृत्यु हो गई (बाएं से दाएं)। 17 से 23 साल के ये युवक अब सोशल मीडिया के अपने अकाउंट्स पर लाइक्स और व्यूज कभी नहीं देख सकेंगे।
अमेरिका के मोंटाना के बिलिंग्स शहर में रविवार शाम एक परिवार के 8 लोगों की हत्या कर दी गई। घटना उस समय हुई जब परिवार के लोग एक साथ डिनर कर रहे थे। आरोपी ने सबको गोली मारने के बाद घर में आग लगा दी। फिर खुद को भी शूट कर लिया। आरोपी के अलावा मरने वाले लोग एक ही परिवार की चार पीढ़ियों से थे। इनमें 4 बच्चे भी शामिल हैं। पुलिस के मुताबिक, उन्हें रविवार शाम करीब 6 बजे घर से गोली चलने की सूचना मिली थी। पुलिस मौके पर पहुंची तो घर के पीछे से गोलियों की आवाज आ रही थी। घर के बाहर एक व्यक्ति घायल मिला। उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां उसकी मौत हो गई। वही इस घटना का संदिग्ध माना जा रहा है। पुलिस को बच्चे के बेहोश होने की सूचना मिली थी घटना के दौरान 911 पर पुलिस को घर में गोली चलने और एक बच्चे के बेहोश होने की सूचना मिली थी। इसके बाद मौके पर दमकल की गाड़ियां भेजी गईं। कुछ देर बाद एक और फायर इंजन भेजने को कहा गया। डिस्पैचर ने पूछा कि क्या बच्चे को गोली लगी है। पुलिस ने बताया कि इसकी पुष्टि नहीं हुई थी। सिर्फ इतना पता था कि बच्चा बेहोश है और यह भी साफ नहीं था कि वह सांस ले रहा है या नहीं। पुलिस पहुंची तो फायरिंग की आवाज आ रही थी इमरजेंसी टीमें रविवार शाम करीब 6:10 बजे मौके पर पहुंचीं। पुलिस ने घर के बाहर एक व्यक्ति को देखा। इसी दौरान घर के अंदर से गोलियों की आवाज भी आ रही थी। आग तेजी से फैल रही थी, इसलिए दमकलकर्मी तुरंत घर के अंदर नहीं जा सके। फायर चीफ मैट हॉपेल ने बताया कि आग तेजी से फैली और घर का बड़ा हिस्सा जल गया। आग बुझाने के लिए डाला गया पानी और जला हुआ मलबा जांच में परेशानी पैदा कर रहा है। इससे पुलिस को मौके से सबूत जुटाने में समय लग रहा है। पड़ोसी ने सुनी पटाखों जैसी आवाज घर से तीन मकान दूर रहने वाले डेविड हिलर ने बताया कि रविवार शाम 6 बजे के बाद उन्हें पटाखों जैसी आवाज सुनाई दी। बाद में एक पड़ोसी ने फोन कर इलाके में गोलीबारी की जानकारी दी। हिलर ने बाहर निकलकर देखा तो पुलिसकर्मी हथियारों के साथ गाड़ियों की आड़ में खड़े थे और घर से काला धुआं उठ रहा था। हत्या की वजह अभी सामने नहीं आई पुलिस के मुताबिक, संदिग्ध व्यक्ति मृतकों को जानता था, लेकिन हत्या के पीछे की वजह अभी सामने नहीं आई है। आग कैसे लगी, इसकी भी जांच की जा रही है। अधिकारियों ने कहा है कि जांच पूरी होने तक मामले से जुड़ी कुछ जानकारियां सार्वजनिक नहीं की जाएंगी। अमेरिका में मास शूटिंग की हाल की घटनाएं… 22 अगस्त: ओरेगन के फॉरेस्ट ग्रोव में एक घर में 5 लोगों की हत्या हुई। मृतकों में आरोपी की पार्टनर, उसकी मां और दादी समेत पांच लोग शामिल थे। संदिग्ध बाद में वॉशिंगटन में मृत मिला। 14 अगस्त: मिशिगन के मिसॉकी काउंटी में हुई गोलीबारी में 6 लोगों की मौत हो गई। मृतकों में संदिग्ध शूटर भी शामिल है। घटना में एक 13 साल की बच्ची भी घायल हुई, जिसे चार गोलियां लगी थीं। 15 अगस्त: वर्जीनिया स्टेट यूनिवर्सिटी के कैंपस के पास हुई गोलीबारी में 5 लोग घायल हुए। पुलिस ने 19 वर्षीय संदिग्ध को गिरफ्तार किया। ————————- यह खबर भी पढ़ें… अमेरिका में भारतीय इंजीनियर ने पत्नी की हत्या की: भारत में रह रही गर्लफ्रेंड को शव की फोटो भेजी; जमानत के लिए ₹47 करोड़ देने होंगे अमेरिका में एक भारतीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर को पत्नी की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। पुलिस का आरोप है कि उसने पत्नी का गला घोंटकर हत्या की। पूरी खबर पढ़ें…
अमेरिका और रूस के बीच तनाव के बीच अमेरिकी वायुसेना का एक बड़ा मिलिट्री प्लेन मंगलवार को मॉस्को में उतरा। C-17A ग्लोबमास्टर III की इस लैंडिंग ने इसलिए ध्यान खींचा, क्योंकि रूस की राजधानी में किसी अमेरिकी सैन्य प्लेन का पहुंचना बेहद असामान्य है। अब सवाल उठ रहा है कि आखिर इस प्लेन को रूस क्यों भेजा गया? फ्लाइट-ट्रैकिंग मॉनिटर के मुताबिक, प्लेन ने मॉस्को के समय के अनुसार सुबह करीब 8:50 बजे लातविया की राजधानी रीगा से उड़ान भरी और लगभग 74 मिनट बाद मॉस्को पहुंचा। इस उड़ान की एक और खास बात यह रही कि प्लेन रूस के हवाई क्षेत्र से होकर मॉस्को पहुंचा। किसी अमेरिकी सैन्य प्लेन को इस रास्ते से उड़ान भरने के लिए रूसी अधिकारियों की मंजूरी जरूरी होती है। प्लेन के मिशन पर अब भी सस्पेंस रिकॉर्ड के मुताबिक, यही प्लेन 23 अगस्त को वॉशिंगटन डीसी के पास जॉइंट बेस एंड्रयूज से रीगा पहुंचा था। यह वही अमेरिकी सैन्य अड्डा है जहां राष्ट्रपति के विमानों का बेड़ा रहता है, जिसमें एयर फोर्स वन भी शामिल है। अमेरिका और रूस दोनों ने अब तक यह नहीं बताया कि प्लेन को मॉस्को क्यों भेजा गया था। प्लेन में कौन था और क्या सामान था, इसकी जानकारी भी सामने नहीं आई है। मॉस्को में अमेरिकी सैन्य प्लेन की असामान्य लैंडिंग के बाद प्लेन पर नजर रखने वाले लोगों और सोशल मीडिया यूजर्स के बीच कई कयास लगाए जाने लगे। कुछ लोगों ने इसे कैदियों की अदला-बदली, यूक्रेन युद्ध को लेकर किसी गुप्त बातचीत या अमेरिकी दूतावास से जुड़े काम से जोड़कर देखा। हालांकि, इनमें से किसी भी दावे की पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर अमेरिकी C-17 को मॉस्को भेजने के पीछे वजह क्या थी? C-17 ग्लोबमास्टर- टैंक से सैनिकों तक ले जाने में सक्षम C-17A ग्लोबमास्टर III अमेरिकी वायुसेना का बहुत बड़ा सामान ढोने वाला सैन्य प्लेन है। इसका इस्तेमाल सैनिकों, सैन्य गाड़ियों और भारी सामान को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए किया जाता है। इस प्लेन को बोइंग ने बनाया है। इसकी लंबाई करीब 174 फीट और दोनों पंखों की चौड़ाई करीब 170 फीट है। यह प्लेन करीब 1,70,900 पाउंड यानी लगभग 77 टन वजन ले जा सकता है। इसमें एक साथ 102 पूरी तरह तैयार पैराट्रूपर्स या करीब 69 टन वजन वाला M1 अब्राम्स टैंक ले जाया जा सकता है। इसकी उड़ने की सामान्य रफ्तार करीब 518 मील प्रति घंटा है। ज्यादा से ज्यादा वजन के साथ यह बिना दोबारा ईंधन लिए करीब 2,760 मील तक उड़ सकता है। हवा में ही ईंधन भरने की सुविधा मिलने पर यह इससे कहीं ज्यादा दूरी तय कर सकता है। इतना बड़ा प्लेन होने के बावजूद C-17 करीब 3,500 फीट लंबी रनवे से भी उड़ान भर सकता है और उतर सकता है। इसकी एक खासियत यह भी है कि यह अपनी ताकत से पीछे की ओर भी चल सकता है। अमेरिकी वायुसेना इसका इस्तेमाल कहां करती है? C-17 का काम सिर्फ सैनिकों और हथियारों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना नहीं है। अमेरिकी वायुसेना इसका इस्तेमाल सैनिकों और सामान को पहुंचाने, हवा से सामान गिराने, घायल लोगों को बाहर निकालने और जरूरत के समय मदद पहुंचाने के लिए भी करती है। यह कोई लड़ाकू प्लेन या बम गिराने वाला प्लेन नहीं है। इसका मुख्य काम भारी सामान और सैन्य उपकरणों को जल्दी एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाना है। प्लेन में क्या था, अभी पता नहीं मॉस्को जाने वाला यह प्लेन RCH4555 नाम से उड़ रहा था। सार्वजनिक फ्लाइट जानकारी से यह पता चलता है कि प्लेन कहां से चला और किस रास्ते से मॉस्को पहुंचा। लेकिन प्लेन में कौन था और उसके अंदर क्या सामान था, इसकी जानकारी सामने नहीं आई है। यही वजह है कि रूस और अमेरिका के बीच तनाव के इस दौर में इस उड़ान ने इतना ध्यान खींचा है। फिलहाल कैदियों की अदला-बदली, रूस-अमेरिका के बीच किसी खास बातचीत या अमेरिकी दूतावास से जुड़े काम जैसी बातें सिर्फ अंदाजे हैं। इनमें से किसी की भी पुष्टि नहीं हुई है। जब तक अमेरिका या रूस की तरफ से कोई जानकारी नहीं आती, तब तक यह साफ नहीं होगा कि अमेरिकी C-17 प्लेन को अचानक मॉस्को भेजने की असली वजह क्या थी।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प सरकार ने सोमवार को H-1B वीजा के लिए नया प्रस्ताव जारी किया है। इस प्रस्ताव के मुताबिक H-1B वीजा पर विदेशी कर्मचारियों को हर वीजा के लिए 1,03,265 डॉलर (करीब 98 लाख रुपए) की एक्सट्रा फीस देनी होगी। H-1B एक गैर-अप्रवासी वीजा है, जिसके जरिए अमेरिकी कंपनियां कुछ समय के लिए विदेशों से हाई स्किल वाले पेशेवरों को नौकरी पर रख सकती हैं। इस फीस से H-1B वीजा लेना पहले के मुकाबले बहुत महंगा हो जाएगा। पहले H-1B वीजा लेने में आमतौर पर करीब 2,000 से 5,000 डॉलर (करीब 1.9 लाख से 4.7 लाख रुपए ) तक फीस लगती थी। यह रकम अलग-अलग मामलों में अलग हो सकती थी। रॉयटर्स के मुताबिक, यह नया नियम साल के आखिर तक लागू किया जा सकता है।अगर यह लागू हो जाता है तो इसका सीधा असर भारतीयों पर पड़ेगा, क्योंकि इसका सबसे ज्यादा इस्तेमाल भारतीय IT और टेक प्रोफेशनल्स करते हैं। कोर्ट ने जून में फीस को गैरकानूनी बताया था पिछले साल ट्रम्प ने एक अस्थायी आदेश के जरिए यह फीस लागू की थी। लेकिन जून में अमेरिकी फेडरल कोर्ट ने इसे गैरकानूनी बताते हुए अमेरिकी सरकार को फीस वसूलने से रोक दिया था। अब बोस्टन की एक अपीलीय अदालत इस फैसले की समीक्षा कर रही है। वहीं, वॉशिंगटन डीसी की एक दूसरी अदालत इस मामले में एक बड़े कारोबारी संगठन की याचिका पर फैसला देख रही है। नए प्रस्ताव में अमेरिकी होमलैंड सिक्योरिटी विभाग (DHS) को फीस को स्थायी बनाने के लिए नियम बनाने का निर्देश दिया गया है। यानी सरकार अब इसे हमेशा के लिए कानून बनाने की कोशिश कर रही है। खबर लगातार अपडेट हो रही है…
Iran-US War Update: ईरान और अमेरिका के बीच तनाव अब उस मोड़ पर पहुंच गया है, जिसका असर सिर्फ दोनों देशों तक सीमित नहीं रह सकता। ईरान ने साफ चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका ने उसके खिलाफ कथित ‘आर्थिक युद्ध’ जारी रखा, तो वह होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) समेत फारस की खाड़ी से तेल का निर्यात पूरी तरह रोक सकता है। ईरान की इस धमकी ने दुनिया के सबसे अहम तेल आपूर्ति मार्गों में से एक को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
सवाल यह है कि अगर Hormuz से तेल की आवाजाही वास्तव में रुकती है तो इसका असर भारत समेत पूरी दुनिया के पेट्रोल, डीजल, LPG और दूसरे ईंधनों की कीमतों पर कितना पड़ेगा?
‘एक बूंद तेल भी निर्यात नहीं होगा’
ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव मोहन रेजाई ने अमेरिका को कड़ी चेतावनी दी है। न्यूज एजेंसी ANI के अनुसार, रेजाई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कहा कि अगर आर्थिक युद्ध जारी रहता है तो होर्मुज के रास्ते या फारस की खाड़ी के किसी अन्य हिस्से से एक बूंद तेल भी निर्यात नहीं होगा।
रेजाई ने केवल अमेरिका को ही चेतावनी नहीं दी, बल्कि उन देशों को भी निशाने पर लिया जो ईरान के खिलाफ अमेरिकी आर्थिक अभियान में शामिल होते हैं या उसका समर्थन करते हैं। उनके मुताबिक, ईरान ऐसे किसी भी देश की भागीदारी या समर्थन को युद्ध की कार्रवाई के रूप में देखेगा।
अमेरिका करने जा रहा है बड़ा आर्थिक हमला
ईरान की यह चेतावनी ऐसे समय आई है जब अमेरिका उसके खिलाफ नए और कड़े आर्थिक प्रतिबंधों की तैयारी कर रहा है। न्यूज एजेंसी Reuters के मुताबिक, अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट सोमवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाले हैं। इसमें ईरान और उसके साथ व्यापार करने वाले देशों को निशाना बनाने वाली नई आर्थिक कार्रवाई का ऐलान किया जा सकता है।
Financial Times में लिखे एक लेख में बेसेंट ने आने वाले कदमों को किसी विरोधी के खिलाफ अब तक की गई सबसे बड़ी वित्तीय कार्रवाई बताया है। अमेरिका ने अभी इन संभावित प्रतिबंधों की पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की है। लेकिन संकेत दिया है कि ईरान के साथ आर्थिक और वित्तीय संबंध बनाए रखने वाले देशों पर भी दबाव डाला जा सकता है।
चीन को भी अमेरिका की चेतावनी
अमेरिका ने ईरान के साथ कारोबार करने वाले देशों को लेकर दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया है। Reuters के अनुसार, बेसेंट ने चीन से भी अमेरिका के साथ सहयोग करने का आग्रह किया है। यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चीन की ऊर्जा जरूरतों में खाड़ी क्षेत्र की बड़ी भूमिका है। रिपोर्ट के मुताबिक, चीन अपने तेल आयात का करीब आधा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से प्राप्त करता है।
चीन ने हालांकि अमेरिकी प्रतिबंधों की नीति पर आपत्ति जताई है। वॉशिंगटन स्थित चीनी दूतावास के प्रवक्ता ने कहा कि प्रतिबंध और दबाव समस्या के समाधान में मदद नहीं करते और कूटनीति का रास्ता अपनाने की जरूरत है। ईरान के नेताओं ने अमेरिकी दबाव के खिलाफ बयानबाजी तेज कर दी है।
ईरानी सेना यानी इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के प्रवक्ता सरदार मोहेबी ने अमेरिकी आर्थिक दबाव को लेकर कहा कि यह सैन्य मोर्चे पर अमेरिका की कथित हार की स्वीकारोक्ति है। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने भी अमेरिकी प्रतिबंधों की आलोचना की। उन्होंने कहा कि ईरान के लिए युद्ध और प्रतिबंध कोई नई चीज नहीं हैं। ईरान करीब दो दशकों से प्रतिबंधों का सामना कर रहा है।
होर्मुज पर क्यों टिकी है पूरी दुनिया की नजर?
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल रूट्स में से एक है। फारस की खाड़ी से निकलने वाले तेल और गैस के लिए यह प्रमुख समुद्री रास्ता है। इसलिए यहां किसी भी बड़े सैन्य या राजनीतिक संकट का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है।
Reuters के मुताबिक, ईरान पहले से ही अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण आर्थिक दबाव में है। इसके अलावा हालिया हमलों के कारण उसके बुनियादी ढांचे को नुकसान, व्यापार में बाधा, उत्पादन में कमी और पुनर्निर्माण की लागत का दबाव भी बढ़ा है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ईरान के पास अब भी पर्याप्त मिसाइल और ड्रोन क्षमता मौजूद है, जिससे वह खाड़ी के पड़ोसी देशों को निशाना बना सकता है। होर्मुज से गुजरने वाले तेल टैंकरों के लिए खतरा पैदा कर सकता है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह संकट?
ईरान-अमेरिका तनाव का असर भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल और LPG का आयात करता है। ऐसे में अगर होर्मुज के जरिए तेल की आपूर्ति लंबे समय तक प्रभावित होती है तो अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं।
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इसका असर आगे चलकर पेट्रोल-डीजल, LPG, CNG और परिवहन लागत पर पड़ सकता है। खासकर LPG के मामले में भारत के लिए आयात और अंतरराष्ट्रीय कीमतें महत्वपूर्ण हैं। यही वजह है कि होर्मुज में बढ़ता तनाव भारत के लिए केवल विदेश नीति या सुरक्षा का मुद्दा नहीं है, बल्कि आम आदमी की रसोई और वाहन के खर्च से भी जुड़ा हुआ मामला है।
कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने शनिवार को कहा कि कनाडा 8 सितंबर से अमेरिकी सामान पर जवाबी टैरिफ लगाएगा। यह फैसला अमेरिका की ओर से कनाडा के करीब 20 अरब डॉलर के उत्पादों पर 50% टैरिफ लगाए जाने के बाद लिया गया है। दोनों देशों के बीच आखिरी दौर की बातचीत भी शुक्रवार को बिना किसी समझौते के खत्म हो गई। कनाडा का जवाबी टैरिफ स्टील, डेयरी उत्पाद, घरेलू उपकरण, कृषि उपकरण, पल्प एंड पेपर और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे अमेरिकी सामान पर लगेगा। किन-किन उत्पादों पर कितना टैरिफ लगेगा, इसकी पूरी जानकारी आने वाले दिनों में जारी की जाएगी। दोनों देशों के बीच 3 दिन चली बातचीत बेनतीजा रही अमेरिका और कनाडा के बीच 3 दिन तक चली ट्रेड डील की बातचीत नाकाम रही। इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने शनिवार आधी रात से कनाडा के 20 अरब डॉलर (करीब 1.9 लाख करोड़ रुपए) के सामान पर 50% टैरिफ लागू कर दिया। यह टैरिफ कनाडा के अमेरिका भेजे जाने वाले कुल सामान का करीब 5% है। अमेरिका और कनाडा के अधिकारियों ने वॉशिंगटन डीसी में तीन दिन की बातचीत की थी, लेकिन व्यापार समझौता फाइनल नहीं हो सका। कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने कहा कि अमेरिका जितना टैरिफ लगाएगा, कनाडा भी उतना ही जवाब देगा। अमेरिका बोला- अच्छा ऑफर दिया था, उन्होंने मौका गंवाया दोनो देशों के बीच ट्रेड डील नहीं हो पाने के बाद अमेरिकी ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव (USTR) ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर कहा कि कनाडा ने अमेरिका के साथ पार्टनशिप का बहुत अच्छा मौका गंवा दिया है। USTR के मुताबिक, उन्होंने कनाडा को किसी भी बड़े एक्सपोर्टर के मुकाबले सबसे अच्छा ऑफर दिया था। लेकिन कनाडा की नई मांगों और पहले किए गए वादों से पीछे हटने की वजह से यह डील नहीं हो पाई। USTR ने आगे कहा कि अगर यह डील होती तो इससे एयरोस्पेस में सप्लाई चेन कोऑर्डिनेशन, गलत ट्रेड प्रैक्टिस से निपटने के लिए जरूरी कदम, खनिजों पर सहयोग, और US-मेक्सिको-कनाडा एग्रीमेंट (USMCA) बातचीत की घोषणा जैसे नतीजे सामने आते। अमेरिका ने कनाडा पर इतना ज्यादा टैरिफ क्यों लगाया? अमेरिका का कहना है कि कनाडा की कुछ व्यापार नीतियां अमेरिकी कंपनियों के लिए नुकसानदेह हैं। दोनों देशों के बीच कई मुद्दों पर लंबे समय से विवाद चल रहा है। इनमें ऑटोमोबाइल, डेयरी प्रोडक्ट्स, शराब और लकड़ी का कारोबार प्रमुख हैं। अमेरिका ने पहले नए टैरिफ 20 अगस्त से लगाने का ऐलान किया था। हालांकि, डेडलाइन से ठीक पहले दोनों देशों ने बातचीत शुरू करने का फैसला किया। इसके बाद ट्रम्प ने टैरिफ लागू करने की समयसीमा 3 दिन बढ़ा दी, ताकि समझौते की कोशिश की जा सके। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, कई मुद्दों पर सहमति बन गई थी, लेकिन कुछ अहम मामलों में दोनों देश एक-दूसरे की शर्तों पर सहमत नहीं हो सके। 1. अमेरिकी कारों के साथ भेदभाव का आरोप अमेरिका लंबे समय से शिकायत करता रहा है कि कनाडा की ट्रेड पॉलिसी अमेरिकी कार कंपनियों को कनाडा के बाजार में बराबर मौका नहीं देती। अमेरिका चाहता है कि उसकी कारों और दूसरे सामान के लिए कनाडा का बाजार ज्यादा खुले। कनाडा ने बदले में अमेरिका से स्टील, एल्युमिनियम, कारों और लकड़ी पर लगाए गए टैरिफ में राहत मांगी थी। लेकिन अमेरिका इन टैरिफ को हटाने पर तैयार नहीं हुआ। 2. कनाडा का अपने डेयरी मार्केट को प्रोटेक्शन कनाडा अपने डेयरी बाजार को विदेशी कंपनियों और सस्ते डेयरी प्रोडक्ट्स से बचाने के लिए लंबे समय से कई नियम लागू करता रहा है। अमेरिका चाहता है कि उसके दूध, पनीर और दूसरे डेयरी प्रोडक्ट्स को कनाडा के बाजार में ज्यादा आसानी से बेचने का मौका मिले। लेकिन कनाडा अपने डेयरी सेक्टर को लेकर ज्यादा रियायत देने के लिए तैयार नहीं हुआ। इस मुद्दे पर भी दोनों देशों के बीच मतभेद बने रहे। 3. अमेरिकी शराब की बिक्री पर प्रतिबंध कनाडा के कुछ हिस्सों में अमेरिकी शराब की बिक्री को लेकर भी पाबंदियां लगाई गई हैं। अमेरिका इसे अपने सामान के साथ भेदभाव के तौर पर देखता है। अमेरिका चाहता है कि उसकी शराब को कनाडा के बाजार में ज्यादा आसानी से बेचने की इजाजत मिले। इसके अलावा दोनों देशों के बीच कनाडा की सॉफ्टवुड लंबर यानी लकड़ी को लेकर भी लंबे समय से विवाद है। अमेरिका कनाडा से आने वाली लकड़ी पर कई तरह के व्यापारिक प्रतिबंध और शुल्क लगाता रहा है। ————— यह खबर भी पढ़ें… भारत पर 100% टैरिफ वाला बिल अमेरिकी सीनेट में पास:रूसी तेल खरीदने वाले 5 देशों पर कार्रवाई; 86 सांसदों ने पक्ष में वोट किया, 11 विरोध में अमेरिकी सीनेट ने 86-11 के बहुमत से भारत समेत 5 देशों पर 100% तक का टैरिफ लगाने वाला बिल पास कर दिया है। इसका मकसद रूस की तेल से होने वाली कमाई को कम करना है, ताकि उसकी युद्ध लड़ने की क्षमता कमजोर हो सके। पूरी खबर पढ़ें…


