कैबिनेट ने सामाजिक सहायता योजना के लिए 53428 करोड़ रुपये किए मंजूर , विकलांग पेंशन में भी हुई बढ़ोतरी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार को ‘राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम’ (NSAP) को 2026-27 से 2030-31 तक, यानी पांच साल के लिए जारी रखने की मंजूरी दे दी है। इसके लिए कुल 53,428 करोड़ रुपये का बजट रखा गया है। ग्रामीण विकास विभाग की ओर से पेश किए गए प्रस्ताव में कार्यक्रम और उसके जुड़ी योजनाओं का नाम बदलना,विकलांग पेंशन के नियमों में बदलाव करना और वृद्धावस्था पेंशन,विधवा पेंशन तथा पारिवारिक लाभ योजनाओं को उनके मौजूदा स्वरूप में जारी रखना शामिल है।

इसकी जानकारी देते हुए केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा, “दुनिया के सबसे व्यापक सोशल सिक्योरिटी नेट में से एक का विस्तार किया गया है और इसे 2031 तक बढ़ा दिया गया है। इस विस्तारित सोशल सिक्योरिटी नेट के लिए कुल 53,428 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।”

उन्होंने आगे कहा, “विकलांग लोगों के लिए, विकलांगता पेंशन पाने की पिछली पात्रता सीमा 80 प्रतिशत विकलांगता थी। अब इस सीमा को घटाकर आधा यानी 40 प्रतिशत कर दिया गया है, जिसका मतलब है कि 40 प्रतिशत विकलांगता वाले लोग भी विकलांग पेंशन पाने के पात्र होंगे।”

विकलांगता पेंशन में बदलाव

सबसे अहम बदलाव विकलांगता पेंशन के नियमों में हुए हैं। इसके तहत 0 से 79 साल की उम्र के लाभार्थियों को हर महीने 375 रुपये और 80 साल या उससे ज़्यादा उम्र के लोगों को 625 रुपये की मदद मिलेगी।

विकलांगता के लिए पात्रता की सीमा (बेंचमार्क) को मौजूदा 80 प्रतिशत से घटाकर 40 प्रतिशत कर दिया जाएगा। न्यूनतम उम्र की शर्त भी हटा दी जाएगी, जिससे विकलांग लोग जन्म से ही इसके लिए पात्र हो सकेंगे।

वृद्धावस्था पेंशन,विधवा पेंशन और फेमिली बेनिफिट योजनाएं बिना किसी बदलाव के जारी रहेंगी।

कैबिनेट ने कहा कि सभी 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लगभग 3.20 करोड़ लाभार्थियों को इसमें शामिल किया जाएगा। विकलांगता पेंशन योजना के तहत संशोधित पात्रता शर्तों, लाभार्थियों की संख्या और सहायता की दर के बारे में विस्तार से बताने वाली गाइडलाइंस तीन महीने के भीतर जारी और लागू की जाएंगी।

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इन योजनाओं के बदलेंगे नाम

नाम बदलने की कवायद के तहत,NSAP अब प्रधानमंत्री सामाजिक सहायता योजना बन जाएगी। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना का नाम बदलकर प्रधानमंत्री वृद्धावस्था पेंशन योजना कर दिया जाएगा, जबकि इंदिरा गांधी राष्ट्रीय विधवा पेंशन योजना प्रधानमंत्री विधवा पेंशन योजना बन जाएगी। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय विकलांग पेंशन योजना का नाम बदलकर प्रधानमंत्री दिव्यांगजन पेंशन योजना कर दिया जाएगा और राष्ट्रीय परिवार लाभ योजना का नाम प्रधानमंत्री परिवार लाभ योजना हो जाएगा।

बता दें कि NSAP को 15 अगस्त 1995 को गरीब परिवारों को मदद देने के लिए शुरू किया गया था। यह संविधान के अनुच्छेद 41 (जो राज्य की नीति के निर्देशक सिद्धांतों में से एक है) के तहत केंद्र की ज़िम्मेदारी को पूरा करने के लिए किया गया था। इस प्रोग्राम के लिए पूरा पैसा केंद्र सरकार देती है, ताकि पूरे देश में एक जैसी मदद मिल सके।

विकलांग पेंशन में किए गए बदलाव ‘विकलांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016’ के तहत किए गए हैं। यह कानून ‘बेंचमार्क विकलांगता’ को 40 प्रतिशत की सीमा के आधार पर परिभाषित करता है और यह प्रावधान करता है कि विकलांगता से जुड़ी सहायता राशि, अन्य श्रेणियों के लाभार्थियों के लिए समान योजनाओं के तहत मिलने वाली सहायता से कम से कम 25 प्रतिशत अधिक होनी चाहिए।

 

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शेख हसीना बोलीं- BRICS समिट छोड़ने से बांग्लादेश को नुकसान:रिश्ते सुधारने का मौका गंवाया; भारत ने न्यौता दिया था लेकिन PM रहमान नहीं आए

बांग्लादेश की पूर्व पीएम शेख हसीना ने कहा कि प्रधानमंत्री तारिक रहमान के BRICS समिट में शामिल न होने से बांग्लादेश को नुकसान हुआ। हसीना ने PTI को दिए इंटरव्यू में बुधवार को कहा कि रहमान के फैसले के चलते बांग्लादेश ने भारत के साथ रिश्ते सुधारने का मौका भी गंवा दिया। 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में BRICS समिट हुई थी। भारत ने रहमान को समिट में आने का न्योता दिया था, लेकिन वे नहीं पहुंचे थे। हसीना ने कहा कि अगर उनके भारत में रहने की वजह से तारिक रहमान भारत नहीं आए, तो यह दुख की बात है। दो देशों के रिश्ते किसी एक व्यक्ति या राजनीतिक मतभेदों के आधार पर तय नहीं होने चाहिए। हसीना बोलीं- बातचीत के रास्ते खोलना सरकार की जिम्मेदारी हसीना ने कहा कि BRICS सिर्फ नेताओं की बैठक नहीं है। इसमें दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं शामिल होती हैं। समिट में शामिल होकर बांग्लादेश दूसरे देशों से सीख सकता था। लेकिन सरकार ने यह मौका गंवा दिया। उन्होंने कहा कि एक जिम्मेदार सरकार को देश के लिए दूसरे देशों से बातचीत और आगे बढ़ने के नए रास्ते खोलने चाहिए, न कि उन्हें बंद करना चाहिए। रहमान के पिता के भारत दौरे का जिक्र किया हसीना ने 1979 में बांग्लादेश के तत्कालीन राष्ट्रपति और तारिक रहमान के पिता जियाउर रहमान के भारत दौरे का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि उस समय वह दिल्ली में रह रही थीं। हसीना के मुताबिक, 1980 में जब जियाउर रहमान लंदन गए, तब भी वह वहीं थीं। इसके बावजूद उनकी मौजूदगी ने जियाउर रहमान के दौरे में कोई रुकावट नहीं डाली। हसीना ने कहा कि 15 अगस्त 1975 को उनके पिता और बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान समेत परिवार के कई सदस्यों की हत्या कर दी गई थी। इसके बाद 3 नवंबर को ढाका की सेंट्रल जेल में चार बड़े नेताओं की भी हत्या हुई। हसीना ने जियाउर रहमान पर गलत तरीके से सत्ता में आने का आरोप लगाया। हसीना बोलीं- बांग्लादेश गंभीर संकट से गुजर रहा हसीना ने दावा किया कि बांग्लादेश इस समय बड़े संकट से गुजर रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि देश में लोकतंत्र कमजोर हुआ है और विरोधी दलों को अपनी बात रखने के मौके नहीं मिल रहे हैं। बांग्लादेश लौटकर लोकतंत्र बहाल करना चाहती हैं हसीना हसीना ने बांग्लादेश लौटने की कोई तारीख नहीं बताई। लेकिन उन्होंने कहा कि वह देश लौटकर लोकतंत्र बहाल करने की लड़ाई में शामिल होना चाहती हैं। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश के लोगों को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव में अपनी पसंद की सरकार चुनने का मौका मिलना चाहिए। हसीना के मुताबिक, उनकी वापसी इस दिशा में एक अहम कदम होगी। मौत की सजा के बावजूद बांग्लादेश लौटने से डर नहीं इंटरव्यू के दौरान हसीना ने माना कि बांग्लादेश लौटना उनके लिए जोखिम भरा हो सकता है। वहां की अदालत ने उन्हें मौत की सजा सुनाई है। इसके बावजूद उन्होंने कहा कि वह डरकर पीछे नहीं हटेंगी। उन्होंने 1975 में अपने पिता शेख मुजीबुर रहमान, मां, भाइयों और परिवार के कई सदस्यों की हत्या का जिक्र किया। हसीना ने कहा कि 1981 में सैन्य शासन और धमकियों के बावजूद वह बांग्लादेश लौटी थीं। उन्होंने 21 अगस्त 2004 को हुए ग्रेनेड हमले और खुद पर हुए दूसरे हमलों का भी जिक्र किया। हसीना ने कहा कि उन्हें जेल और राजनीतिक उत्पीड़न भी झेलना पड़ा है। उन्होंने कहा कि आज उनकी सबसे बड़ी चिंता अपनी सुरक्षा नहीं, बल्कि बांग्लादेश में न्याय व्यवस्था की स्थिति है। उन्होंने मौत की सजा को राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताया। उनका कहना है कि किसी व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का मौका दिए बिना सजा सुनाना न्याय नहीं है। 78 साल की शेख हसीना अगस्त 2024 में सरकार के खिलाफ बड़े आंदोलन के बाद सत्ता से हट गई थीं। इसके बाद वह बांग्लादेश छोड़कर भारत आ गईं। तब से वह यहीं रह रही हैं। ————————- ये खबर भी पढ़ें… पूर्व बांग्लादेशी एडवाइजर यूनुस को लोगों ने आतंकवादी कहा: न्यूयॉर्क एयरपोर्ट पर घेरा बांग्लादेश के पूर्व चीफ एडवाइजर मोहम्मद यूनुस को अमेरिका के न्यूयॉर्क एयरपोर्ट पर विरोध का सामना करना पड़ा। एयरपोर्ट पर मौजूद कुछ लोगों ने उन्हें घेर लिया और ‘आतंकवादी’ कहा। पूरी खबर यहां पढ़ें…

Bullet Train Project Update: मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट में बड़ी कामयाबी, 12 मंजिला बिल्डिंग जितना ऊंचा साबरमती नदी पुल तैयार, अब आगे क्या?

Mumbai-Ahmedabad Bullet Train Project Update: मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट के तहत एक बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है। नेशनल हाई स्पीड रेल कॉरपोरेशन लिमिटेड (NHSRCL) ने अहमदाबाद में साबरमती नदी पर बने 12 मंजिला बिल्डिंग जितना ऊंचा पुल का निर्माण पूरा कर लिया है। NHSRCL ने बताया कि मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना के तहत साबरमती नदी पर 480 मीटर लंबा और 36 मीटर ऊंचा पुल बनकर तैयार हो गया है। एनएचएसआरसीएल ने एक बयान में कहा कि करीब 118 फुट ऊंचा यह पुल 12 मंजिला इमारत के बराबर है। यह मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन कॉरिडोर के प्रमुख ढांचों में से एक है।

14.8 मीटर की ऊंचाई पर है पुल

आधिकारिक विज्ञप्ति में कहा गया है कि यह पुल पश्चिम रेलवे की अहमदाबाद-दिल्ली मुख्य रेल लाइन के पास स्थित है, जो जमीन के स्तर से करीब 14.8 मीटर की ऊंचाई पर है। यह पुल साबरमती और अहमदाबाद बुलेट ट्रेन स्टेशनों के बीच स्थित है। यह साबरमती स्टेशन से करीब एक किलोमीटर और अहमदाबाद स्टेशन से चार किलोमीटर दूर है। बयान के अनुसार, साबरमती नदी पुल के खंभों को ज्यादा ऊंचाई वाला बनाया गया है ताकि मौजूदा बुनियादी ढांचे से जरूरी वर्टिकल क्लीयरेंस बनाए रखी जा सके। NHSRCL के मुताबिक, साबरमती नदी पर बने इस पुल की लंबाई 480 मीटर है। इसकी करीब 36 मीटर ऊंचाई इसे परियोजना के प्रमुख इंजीनियरिंग स्ट्रक्चर में शामिल करती है।

पुल की बड़ी बातें

नेशनल हाई स्पीड रेल कॉरपोरेशन लिमिटेड ने बताया कि पुल को आठ गोलाकार पिलर का सहारा दिया गया है। इनमें से चार पिलर नदी की तलहटी में, दो पिलर नदी के दोनों किनारों पर और दो पिलर नदी के किनारों से बाहर स्थित हैं। पिलर को रणनीतिक तरीके से इस तरह लगाया गया है कि नदी में जल प्रवाह में कम से कम रुकावट हो। NHSRCLने कहा कि पुल का निर्माण ‘बैलेंस्ड कैंटिलीवर मेथड’ से किया गया है। यह नदियों और गहरे जलमार्गों पर लंबी दूरी वाले पुलों के निर्माण के लिए इस्तेमाल की जाने वाली विशेष तकनीक है। इस तकनीक से पुल के ऊपरी ढांचे के नीचे पारंपरिक मचान लगाए बिना उसका निर्माण किया जा सकता है।

बयान में आगे कहा गया है कि मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल (एमएएचएसआर) का मार्ग कई मौजूदा बुनियादी ढांचा सुविधाओं से होकर गुजरता है, जिनमें फ्लाईओवर, पुल, रेलवे लाइन और मेट्रो कॉरिडोर शामिल हैं। विज्ञप्ति के अनुसार, इस कॉरिडोर में नदी पर कुल 25 पुल हैं, जिनमें 21 गुजरात और चार महाराष्ट्र में हैं। गुजरात में प्रस्तावित 21 नदी पुलों में से अब तक 18 का निर्माण पूरा हो चुका है।

मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट

मुंबई-अहमदाबाद हाई स्पीड रेल कॉरिडोर देश की पहली हाई-स्पीड रेल प्रोजेक्ट है। इसके तहत गुजरात और महाराष्ट्र को हाई-स्पीड रेल नेटवर्क से जोड़ा जा रहा है। इस प्रोजेक्ट के तहत साबरमती और अहमदाबाद समेत कई स्टेशनों और बड़े इंजीनियरिंग स्ट्रक्चर का निर्माण किया जा रहा है।

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इस बीच, साबरमती नदी पर 480 मीटर लंबे पुल का निर्माण पूरा होना परियोजना के निर्माण कार्य में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है। भारत में पहली बुलेट ट्रेन 15 अगस्त 2027 के आसपास शुरू करने का लक्ष्य रखा गया है। यह ट्रेन मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर पर चलेगी। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया था कि शुरुआत में सूरत-बिलिमोरा सेक्शन पर सेवा शुरू होगी।

6 ग्राम का कंगन, 22 एकड़ की सोसाइटी और 2000 लोगों की भीड़… ऐसे वापस मिला खोया सोना

हैदराबाद की एक गेटेड कम्युनिटी में गुम हुआ सोने का ब्रेसलेट मिलने की कहानी इन दिनों चर्चा में है। करीब 22 एकड़ में फैले इस रिहायशी परिसर में रहने वाली कंटेंट क्रिएटर स्वाति बांदला को तब परेशानी हुई, जब उनका 6-7 ग्राम का ब्रेसलेट अचानक गायब हो गया। उन्हें याद ही नहीं था कि आखिर ज्वेलरी कब और कहां गिरी। काफी तलाश के बाद भी जब कोई सुराग नहीं मिला, तो उन्होंने सोसाइटी की सिक्योरिटी टीम से मदद मांगी। इसके बाद CCTV फुटेज ने पूरी कहानी का रुख बदल दिया। सिक्योरिटी कर्मचारियों ने उनके आने-जाने के रास्तों और कॉमन एरिया की फुटेज खंगाली और एक खास जगह को चिन्हित किया।

खास बात यह थी कि वहां स्वतंत्रता दिवस के मौके पर 2,000 से ज्यादा लोग मौजूद थे। इसके बावजूद स्वाति और उनके पति ने रात में वहां पहुंचकर तलाश जारी रखी और आखिरकार घास में चमकता ब्रेसलेट मिल गया।

6-7 ग्राम का ब्रेसलेट हुआ अचानक गायब

हैदराबाद की कंटेंट क्रिएटर स्वाति बांदला ने इंस्टाग्राम वीडियो में अपना अनुभव शेयर किया। उन्होंने बताया कि ब्रेसलेट करीब 6-7 ग्राम का था और उन्हें बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि वह कब और कहां गिरा। 16 अगस्त को जब उन्हें ब्रेसलेट हाथ में नहीं मिला, तो सबसे पहले उन्होंने सोसाइटी की सिक्योरिटी टीम से संपर्क किया। उन्होंने यह भी पता किया कि कहीं किसी निवासी ने ब्रेसलेट को सिक्योरिटी या लॉस्ट एंड फाउंड में तो जमा नहीं कराया है।

एक वीडियो बना पूरी तलाश का सुराग

जब शुरुआती कोशिशों से कुछ पता नहीं चला तो स्वाति ने अपने फोन में मौजूद पुराने फोटो और वीडियो खंगालने शुरू किए। इसी दौरान उन्हें 15 अगस्त की सुबह का एक वीडियो मिला, जिसमें ब्रेसलेट उनकी कलाई पर साफ दिखाई दे रहा था। यह छोटा-सा सुराग सिक्योरिटी टीम के लिए बेहद काम का साबित हुआ। वीडियो को आधार बनाकर टीम ने स्वाति की उस दिन की गतिविधियों को CCTV में ट्रैक करना शुरू किया।

CCTV ने जो दिखाया, वहीं से शुरू हुई असली खोज

सिक्योरिटी कर्मचारियों ने सोसाइटी के अलग-अलग हिस्सों की फुटेज देखी। एंट्री और एग्जिट पॉइंट, लिफ्ट, लॉबी और कॉमन एरिया तक के कैमरों को खंगाला गया। काफी फुटेज देखने के बाद टीम को एक ऐसी जगह नजर आई, जहां संभावना थी कि स्वाति के वहां से गुजरने से कुछ सेकंड पहले ब्रेसलेट जमीन पर गिरा होगा। लेकिन समस्या यह थी कि उसी जगह 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस का कार्यक्रम आयोजित किया गया था।

2000 से ज्यादा लोगों के बीच कैसे मिलता ब्रेसलेट?

जिस जगह ब्रेसलेट गिरने की आशंका थी, वहां दिनभर 2,000 से ज्यादा लोग आ-जा चुके थे। ऐसे में कुछ ग्राम का सोने का ब्रेसलेट घास में तलाशना किसी चुनौती से कम नहीं था। फिर भी स्वाति और उनके पति ने हार नहीं मानी। रात में दोनों उसी जगह पहुंचे, जिसे CCTV फुटेज के आधार पर चिन्हित किया गया था।

अंधेरे में चमकी उम्मीद की एक किरण

रात में रोशनी के बीच घास में तलाश करते हुए अचानक उन्हें कुछ चमकता हुआ दिखाई दिया। पास जाकर देखा तो वह वही गुम हुआ सोने का ब्रेसलेट था। जिस ज्वेलरी को वापस मिलने की उम्मीद लगभग खत्म हो चुकी थी, वह आखिरकार मिल गई। इस पूरे घटनाक्रम में CCTV और सिक्योरिटी टीम की तेजी ने अहम भूमिका निभाई।

स्वाति ने सिक्योरिटी टीम को दिया पूरा श्रेय

इस अनुभव के बाद स्वाति ने कहा कि गेटेड कम्युनिटी की अहमियत सिर्फ सुविधाओं और इमारतों तक सीमित नहीं है। उनके मुताबिक, मजबूत सिक्योरिटी सिस्टम, CCTV कैमरे और मदद के लिए मौजूद स्टाफ मुश्किल समय में बेहद काम आते हैं। उन्होंने माना कि अगर सिक्योरिटी टीम ने तुरंत कार्रवाई नहीं की होती और CCTV फुटेज को इतनी बारीकी से ट्रैक नहीं किया होता, तो शायद उनका ब्रेसलेट हमेशा के लिए खो जाता।

(डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट सोशल मीडिया पर यूज़र द्वारा शेयर किए गए कंटेंट पर आधारित है। मनीकंट्रोल इन दावों की न तो स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है और न ही इनका समर्थन करता है।)

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राष्ट्रधर्म, शिक्षा और लोक कल्याण को आजीवन समर्पित रहे महंत दिग्विजयनाथ

राष्ट्रधर्म, शिक्षा और लोक कल्याण को आजीवन समर्पित रहे महंत दिग्विजयनाथ

राष्ट्रीयता, कृतज्ञता, सांस्कृतिक स्वाभिमान और गुरु-परंपरा के प्रति अटूट निष्ठा की संवाहक गोरक्षपीठ में प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी पितरों (पूर्वजों) की स्मृति में अध्यात्म और राष्ट्रचेतना के स्वर गूंज रहे हैं। अवसर है युगपुरुष ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज और राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज की पुण्यतिथि के उपलक्ष्य में आयोजित साप्ताहिक श्रद्धांजलि समारोह का।

 

गोरक्षपीठ में 23 सितंबर से श्रीमद्भागवत महापुराण कथा एवं 24 सितंबर से समसामयिक विषयों पर सम्मेलन जारी है। इसी क्रम में आश्विन कृष्ण तृतीया (मंगलवार, 29 सितंबर) को ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ की 57वीं पुण्यतिथि पर गोरक्षपीठाधीश्वर एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में विशाल श्रद्धांजलि सभा गोरखनाथ मंदिर के महंत दिग्विजयनाथ स्मृति सभागार में आयोजित होगी, जिसमें देशभर के अनेकानेक संतजन उपस्थित रहेंगे।

 

आजीवन और स्मृतिशेष होकर भी अपने विचारों, संकल्पों और कार्यों से भावी पीढ़ी का मार्गदर्शन करने वाले, 1935 से 1969 तक नाथपंथ की विश्वविख्यात गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर रहे महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज को इतिहास ‘युगपुरुष’ के रूप में स्मरण करता है। ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज न केवल गोरखनाथ मंदिर के वर्तमान स्वरूप के शिल्पी रहे, बल्कि उनका पूरा जीवन राष्ट्र, धर्म, अध्यात्म, संस्कृति, शिक्षा व समाजसेवा के जरिये लोक कल्याण को समर्पित रहा। तरुणाई से ही वह देश की आजादी की लड़ाई में जोरदार भागीदारी निभाते रहे तो देश के स्वतंत्र होने के बाद सामाजिक एकता और उत्थान के लिए। इसके लिए शैक्षिक जागरण पर उनका सर्वाधिक जोर रहा।

मेवाड़ में जन्मे थे महंत दिग्विजयनाथ 

महंत दिग्विजयनाथ का जन्म वर्ष 1894 में वैशाख पूर्णिमा के दिन चित्तौड़, मेवाड़ ठिकाना ककरहवां (राजस्थान) में हुआ था। उनके बचपन का नाम नान्हू सिंह था। पांच वर्ष की उम्र में 1899 में इनका आगमन गोरखपुर की गोरक्षपीठ में हुआ। अपनी जन्मभूमि मेवाड़ की माटी का प्रभाव था कि बचपन से ही उनमें दृढ़ इच्छाशक्ति और स्वाभिमान से समझौता न करने की प्रवृत्ति कूट-कूटकर भरी हुई थी। उनकी शिक्षा गोरखपुर में ही हुई और उन्हें खेलों से भी गहरा लगाव था। 15 अगस्त 1933 को गोरखनाथ मंदिर में उनकी योग दीक्षा हुई और 15 अगस्त 1935 को वह गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर बने। वह अपने जीवन के तरुणकाल से ही आजादी की लड़ाई में हिस्सा लेते रहे। देश को स्वतंत्र देखने का उनका जुनून था कि उन्होंने 1920 में महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए असहयोग आंदोलन के समर्थन में स्कूल छोड़ दिया। ब्रिटिश हुकूमत की तरफ से उन पर लगातार आरोप लगते थे कि वह क्रांतिकारियों को संरक्षण और सहयोग देते हैं। 1922 के चौरीचौरा के घटनाक्रम में भी उनका नाम आया लेकिन उनकी बुद्धिमत्ता के सामने ब्रिटिश हुकूमत को झुकना पड़ा और उन्हें रिहा कर दिया गया।

श्रीराम मंदिर आंदोलन में नींव के पत्थर हैं ब्रह्मलीन महंतश्री

अयोध्या में भगवान श्रीराम के मंदिर के निर्माण को लेकर हुए आंदोलनों में गोरक्षपीठ की महती भूमिका को सभी जानते हैं। ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज इस आंदोलन में नींव के पत्थर हैं। 1934 से 1949 तक उन्होंने लगातार अभियान चलाकर आंदोलन को न केवल नई ऊंचाई दी, बल्कि 1949 में वह श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन के नेतृत्वकर्ता भी रहे। 22-23 दिसंबर 1949 को अयोध्या में भगवान रामलला की मूर्ति प्रकट होने के नौ दिन पहले महंत दिग्विजयनाथ जी के नेतृत्व में अखंड रामायण पाठ का आयोजन शुरू हो गया था।

 

रामलला के प्रकट होने के समय महंत जी स्वयं वहां उपस्थित थे। पांच सौ वर्षों के इंतजार के बाद अयोध्या में प्रभु श्रीराम अपनी जन्मभूमि स्थित मंदिर में विराजमान हो चुके हैं। प्रभु रामलला के मंदिर निर्माण के लिए चले आंदोलन को उनके बाद उनके शिष्य महंत अवेद्यनाथ जी ने निर्णायक बनाया। एक सुखद संयोग यह भी है कि न्यायालय के निर्णय के बाद मंदिर निर्माण की जब शुभ घड़ी आई तब राज्य की सत्ता का नेतृत्व भी गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ कर रहे हैं। ऐसे में जब भी अयोध्या के श्रीराम मंदिर का जिक्र होगा तो वर्तमान गोरक्षपीठाधीश्वर के दादागुरु ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी स्वत: सबको स्मरण होंगे। 

शिक्षा की जलाई ज्योति से प्रकाशित हो रहा पूर्वांचल

महंत दिग्विजयनाथ जी ने गोरखपुर और आसपास के क्षेत्रों के लिए शिक्षा की जो ज्योति जलाई, उससे आज पूरा पूर्वांचल प्रकाशित हो रहा है। शिक्षा क्रांति के लिए उन्होंने 1932 में महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद की स्थापना की। एक किराए के मकान में परिषद के अंतर्गत महाराणा प्रताप क्षत्रिय स्कूल शुरू हुआ। 1935 में इसे जूनियर हाईस्कूल की मान्यता मिली और 1936 में हाईस्कूल की भी पढाई शुरू हुई। नाम ‘महाराणा प्रताप हाई स्कूल’ हो गया। इसी बीच महंत दिग्विजयनाथ जी के प्रयास से गोरखपुर के सिविल लाइंस में पांच एकड भूमि महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद को प्राप्त हो गयी और महाराणा प्रताप हाईस्कूल का केंद्र सिविल लाइंस हो गया तथा देश के आजाद होते समय यह विद्यालय महाराणा प्रताप इंटरमीडिएट कालेज के रुप में प्रतिष्ठित हुआ। 1949-50 में इसी परिसर में महाराणा प्रताप डिग्री कालेज की स्थापना महंतश्री के नेतृत्व में हुई।

 

शिक्षा को लेकर उनकी सोच दूरदर्शी और निजी हित से परे थी। यही वजह थी कि उन्होंने 1958 में अपनी दो संस्थाओं महाराणा प्रताप डिग्री कालेज व महाराणा प्रताप महिला महाविद्यालय को गोरखपुर विश्वविद्यालय की स्थापना हेतु दान में दिया। बाद में परिषद की तरफ से उनकी स्मृति में महंत दिग्विजयनाथ स्नातकोत्तर महाविद्यालय की स्थापना की गई। महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद द्वारा वर्तमान में चार दर्जन से अधिक शिक्षण संस्थाएं गोरखपुर क्षेत्र में संचालित हो रही हैं। इनमें प्राथमिक शिक्षा से लेकर विश्वविद्यालय, चिकित्सा शिक्षा एवं प्रौद्योगिकी शिक्षा तक के प्रकल्प सम्मिलित हैं।

राजनीति को भी लोक कल्याण का ध्येय माना

महंत दिग्विजयनाथ जी ने राजनीति में भी गोरक्षपीठ की लोक कल्याण की परंपरा को ही ध्येय बनाया। 1937 में हिंदू महासभा में शामिल होकर उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की विधिवत शुरुआत की। महंत जी ने 1944 में हिंदू महासभा के प्रांतीय अधिवेशन का ऐतिहासिक आयोजन गोरखपुर में कराया। महासभा के राजनीतिज्ञ होने के कारण 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के मिथ्यारोप में उन्हें बंदी बना लिया गया, लेकिन सरकार को उन्हें 1949 में दस माह बाद ससम्मान बरी करना पड़ा। राष्ट्रहित में उन्होंने 1956 में पृथक पंजाबी राज्य के लिए मास्टर तारा सिंह के आमरण अनशन को सूझबूझ से समाप्त कराया।

 

वह 1961 में अखिल भारतीय हिंदू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष (हिंदू राष्ट्रपति के रूप में) निर्वाचित हुए। धर्म व सामाजिक एकता के क्षेत्र में भी उनका योगदान अतुलनीय है। 1939 में अखिल भारतीय अवधूत भेष बारहपंथ योगी महासभा की स्थापना कर पूरे देश के संत समाज को लोक कल्याण व राष्ट्रहित में एकजुट करने के लिए भी उन्हें याद किया जाता है। 1960 में हरिद्वार में अखिल भारतीय षडदर्शन सभा सम्मेलन की अध्यक्षता, 1961 में दिल्ली में अखिल भारतीय हिंदू सम्मेलन का आयोजन व 1965 में दिल्ली में अखिल विश्व हिंदू सम्मेलन का आयोजन भी उनकी उल्लेखनीय उपलब्धियों में शामिल है। 1967 में गोरखपुर लोकसभा क्षेत्र से सांसद निर्वाचित हुए महंतजी 1969 में ब्रह्मलीन हुए, लेकिन उनके व्यक्तित्व व कृतित्व की अमरता अहर्निश बनी हुई है। इन महातपस्वी के आदर्श, शिक्षा संस्थान और राष्ट्रीय दृष्टि आज भी समाज को गति और दिशा प्रदान कर रहे हैं।

 

IIT job offers withdrawn: आईआईटी से दो प्लेसमेंट सीजन के लिए बाहर हो सकती हैं ओरेकल समेत 22 कंपनियां, जानें क्यों लेना पड़ रहा ऐसा फैसला

IIT job offers withdrawn: देश के प्रमुख आईआईटी संस्थानों ने छात्रों के हितों को देखते हुए सर्व सम्मति से एक फैसला किया है। इस फैसले के अनुसार, इंडियन इंस्टीट्यूट्स ऑफ टेक्नोलॉजी (IIT) ने 2 प्लेसमेंट सीजन के लिए 22 कंपनियां को बाहर कर दिया है। आईआईटी संस्थानों में कैंपस प्लेसमेंट के दौरान छात्रों को नौकरी का ऑफर देने वाली इन कंपनियों में ओरेकल जैसी दिग्गज कंपनी भी शामिल है।

ऑल आईआईटी प्लेसमेंट कमेटी (AIPC) इस बारे में 30 सितंबर तक कंपनियों को लिखित रूप से सूचित करेगी। द इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक ये कंपनियां 2026 में ग्रेजुएट होने वाले स्टूडेंट्स को दिए गए जॉब ऑफर को पूरा करने में फेल रहीं। एआईपीसी के कन्वीनर और आईआईटी गुवाहाटी के एसोसिएट प्रोफेसर जॉन जोस ने बताया कि कमेटी ने कंपनियों को ब्लैकलिस्ट करने के बजाय इस एक्शन को “नॉन-कोऑपरेशन” कहा है।

एआईपीसी ने क्यों लिया यह फैसला ?

आईआईटी ने अगले दो प्लेसमेंट सीजन के लिए कैंपस रिक्रूटमेंट के लिए 22 कंपनियों के साथ सहयोग बंद करने का फैसला किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, ये कंपनियां 2026 में ग्रेजुएट होने वाले स्टूडेंट्स को दिए गए जॉब ऑफर को पूरा करने में फेल रहीं। यह फैसला 23 आईआईटी के 150 से ज्यादा ऑफर पर लागू होता है। एआईपीसी के कन्वीनर जोस जोस ने कहा कि कुछ कंपनियों ने 10 से 15 ऑफर वापस ले लिए थे। फाइनल लिस्ट और जिन ऑफर पर असर पड़ा है, उनकी संख्या अभी भी तैयार की जा रही है क्योंकि अलग-अलग आईआईटी कमेटी को मामलों के स्टेटस के बारे में अपडेट कर रहे हैं।

प्लेसमेंट सीजन से बाहर होने वाली कंपनियों में ओरेकल भी शामिल

आईआईटी के 2 प्लेसमेंट सीजन से बाहर होने वाली कंपनियों की सूची में ओरेकल का नाम भी शामिल है। रिपोर्ट के मुताबिक, यूएस सॉफ्टवेयर कंपनी ने आईआईअी छात्रों को दिए गए करीब 40 ऑफर नहीं माने। कई स्टार्टअप भी इस लिस्ट में हैं।

IITs ने नियोक्ताओं को पहले दी थी चेतावनी

आईआईटी का सितंबर का यह फैसला ऑफर वापस लेने वाली कंपनियों के साथ महीनों की बातचीत के बाद आया है। जून में, एआईपीसी ने Oracle, Interview Kickstart और SuperAGI समेत 10 से ज्यादा कंपनियों से कहा कि वे या तो उनके ऑफर मानें या प्रभावित स्टूडेंट्स को तीन महीने की सैलरी दें। इस मामले से उस समय करीब 100 छात्र प्रभावित हुए थे।

आईआईटी ने कंपनियों को दिया था 15 अगस्त तक का समय

एआईपीसी ने कंपनियों को जवाब देने के लिए 15 अगस्त तक का समय दिया था। मामलों को सुलझाने में नाकाम रहने वाली कंपनियों को 2027 और 2028 की क्लास के प्लेसमेंट ड्राइव से बाहर करने की चेतावनी दी थी। इसके बाद AIPC ने कंपनियों के लिए ऑफर पाने वाले छात्रों को ऑनबोर्ड करने की डेडलाइन 15 सितंबर तय की।

मुजफ्फरनगर से ई-रिक्शा लेकर स्पीति वैली पहुंचा लड़का, 12,500 फीट पर पहुंचते ही वायरल हुआ वीडियो

मुजफ्फरनगर के रहने वाले सुमित कुमार प्रजापति इन दिनों अपने अनोखे सफर की वजह से सोशल मीडिया पर चर्चा में हैं। जहां लोग स्पीति वैली जाने के लिए कार, बाइक या एसयूवी का सहारा लेते हैं, वहीं सुमित अपनी ई-रिक्शा लेकर पहाड़ों की ओर निकल पड़े। उनका यह सफर सिर्फ घूमने-फिरने तक सीमित नहीं है, बल्कि हर मोड़ पर एक नई चुनौती और नया अनुभव सामने आ रहा है। सुमित ने इस यात्रा की शुरुआत 15 अगस्त को की थी। सफर शुरू करते समय उन्होंने इंस्टाग्राम पर बताया था कि वह रोजाना वीडियो के जरिए लोगों को अपनी यात्रा की जानकारी देंगे।

रास्ते में उन्हें किन परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है, लोग उनकी ई-रिक्शा को देखकर कैसी प्रतिक्रिया दे रहे हैं और यात्रा किस तरह आगे बढ़ रही है इन सभी चीजों को वह कैमरे में कैद करते रहे। अब तक उन्होंने कुल 27 वीडियो के जरिए अपनी यात्रा की कहानी साझा की है।

मनाली तक पहुंचने का तरीका भी था खास

सुमित के इंस्टाग्राम पेज के मुताबिक, वह अपने दोस्तों के साथ गाड़ी से मनाली पहुंचे। उनकी ई-रिक्शा को ट्रक में लादकर मनाली तक पहुंचाया गया। इसके बाद यात्रा का सबसे दिलचस्प हिस्सा शुरू हुआ। 19 अगस्त को सुमित मनाली से ई-रिक्शा पर सवार होकर अकेले स्पीति वैली की ओर निकल पड़े। पहाड़ों के मुश्किल रास्तों पर तीन पहियों वाली इलेक्ट्रिक सवारी को आगे बढ़ते देखकर लोग भी हैरान रह गए। उनके एक वीडियो पर यूट्यूब इंडिया ने भी प्रतिक्रिया दी और मजेदार अंदाज में लिखा, “मॉडर्न प्रॉब्लम्स को देसी सॉल्यूशन चाहिए।”

‘बैटरी कहां चार्ज होगी?’ लोगों ने पूछा सवाल

जैसे ही सुमित के वीडियो सोशल मीडिया पर आने लगे, लोगों के मन में सबसे पहला सवाल ई-रिक्शा की बैटरी को लेकर उठा। यूजर्स पूछने लगे कि पहाड़ों के बीच आखिर ई-रिक्शा को चार्ज कहां किया जाएगा। सुमित ने बताया कि वह जिस जगह रुकते हैं, वहीं अपनी ई-रिक्शा को चार्ज करते हैं। इतना ही नहीं, किसी आपात स्थिति में काम आने के लिए उन्होंने जेनरेटर भी अपने साथ रखा है।

फैंस की एक बात मानकर बदल दिया सफर का अंदाज

सुमित की पहली वीडियो देखने के बाद एक सोशल मीडिया यूजर ने उनसे कहा कि अगर ई-रिक्शा इतनी दूर जा रही है तो इसमें सवारियां क्यों नहीं बैठाते। सुमित ने इस सुझाव को मान लिया। इसके बाद उन्होंने ई-रिक्शा में सवारियां बैठाकर स्पीति की ओर सफर जारी रखा। इससे उनकी यात्रा का अनुभव और भी अलग हो गया। अब वह सिर्फ अपनी मंजिल की ओर बढ़ने वाले यात्री नहीं थे, बल्कि रास्ते में मिलने वाले लोगों के साथ भी इस अनोखे सफर को साझा कर रहे थे।

12,500 फीट की ऊंचाई पर ई-रिक्शा ने सबको रोका

जैसे-जैसे सुमित ऊंचाई की ओर बढ़े, उनकी ई-रिक्शा लोगों के लिए कौतूहल का विषय बन गई। करीब 12,500 फीट की ऊंचाई वाले पथरीले रास्तों पर तीन पहियों वाली इस सवारी को चलते देखकर कई लोग रुक गए। कुछ लोगों ने सुमित के वीडियो बनाए, कुछ ने उनकी हिम्मत की तारीफ की और कई लोग तालियां बजाते नजर आए। वहीं, कुछ लोगों के लिए यह समझना ही मुश्किल था कि आखिर ई-रिक्शा इतनी खड़ी चढ़ाई और खराब रास्तों को पार कैसे कर रही है।

कुंजुम पहुंचकर बनाया रिकॉर्ड

26 अगस्त को सुमित अपनी ई-रिक्शा लेकर कुंजुम पहुंचे। उन्होंने इसे अपनी यात्रा की बड़ी उपलब्धि बताया और दावा किया कि ई-रिक्शा से वहां तक पहुंचने वाला यह पहला ऐसा सफर है। इस उपलब्धि ने उनकी यात्रा को और खास बना दिया। सोशल मीडिया पर पहले जहां लोग उनकी ई-रिक्शा को लेकर सवाल पूछ रहे थे, वहीं अब उनके सफर की चर्चा उपलब्धि के तौर पर होने लगी।

‘कार नहीं थी, लेकिन सपना तो था’

1 सितंबर को शेयर किए गए वीडियो में सुमित ने अपने सफर के पीछे की कहानी बताई। उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति का सपना होता है कि वह कभी शहर से दूर पहाड़ों के किसी गांव में जाकर सुकून के कुछ पल बिताए। उनका भी ऐसा ही सपना था, लेकिन उनके पास कार नहीं थी। इसके बावजूद उन्होंने रुकने के बजाय अपनी ई-रिक्शा को ही सफर का साथी बना लिया। सुमित का कहना है कि जहां लोग मुश्किल पहाड़ी रास्तों पर 4×4 गाड़ियों का इस्तेमाल करते हैं, वहीं वह बैटरी से चलने वाले तीन पहियों के वाहन के साथ आगे बढ़ रहे हैं। उनकी कहानी अब सोशल मीडिया पर सिर्फ एक अनोखी यात्रा नहीं, बल्कि इस बात की मिसाल बन गई है कि सपने देखने के साथ उन्हें पूरा करने का हौसला भी जरूरी है।

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UP Smart Schools: एक ओर यूपी के 14,429 सरकारी स्कूलों में स्मार्ट क्लास बनाने का ऐलान, दूसरी ओर नोएडा के स्कूल की CJP ऑडिट पर बवाल

UP smart schools: उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने बेसिक शिक्षा परिषद के तहत 14,429 सरकारी प्राइमरी स्कूलों को ‘स्मार्ट स्कूलों’ के तौर पर विकसित करने के लिए 300 करोड़ रुपये की योजना को मंजूरी दी है। यह फैसला लखनऊ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में लिया गया। इस योजना के तहत, राज्य के सरकारी स्कूलों में डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए चुने गए स्कूलों में चरणबद्ध तरीके से स्मार्ट क्लास शुरू की जाएंगी। इन स्कूलों के छात्रों को स्मार्ट क्लास, ICT लैब, डिजिटल किताबें और डिजिटल लाइब्रेरी की सुविधा मिलेगी। टेक्नोलॉजी-आधारित लर्निंग सिस्टम के तहत शिक्षक टैबलेट का भी इस्तेमाल करेंगे।

300 करोड़ रुपये मंज़ूर

योगी सरकार ने इस पहल के लिए 300 करोड़ रुपये मंजूर किए हैं। स्मार्ट क्लास लगाने के लिए ‘श्री ट्रॉन इंडिया लिमिटेड’ को लागू करने वाली एजेंसी के तौर पर चुना है। इंस्टॉलेशन का काम कॉम्पिटिटिव टेंडरिंग (प्रतिस्पर्धी निविदा प्रक्रिया) के जरिए किया जाएगा। प्रस्तावित दर 2,07,910 रुपये प्रति स्कूल तय की गई है, जिसमें सैनिटेशन चार्ज और GST शामिल हैं। अगर टेंडर प्रक्रिया में दर कम आती है, तो सरकार 300 करोड़ रुपये की सीमा के भीतर बची हुई रकम का इस्तेमाल और स्कूलों को कवर करने के लिए कर सकती है।

1,129 स्कूलों में डिजिटल लाइब्रेरी की सुविधा

राज्य में पहले से ही 32,000 से ज़्यादा स्कूलों में स्मार्ट क्लास चल रही हैं। 15,000 से ज्यादा स्कूलों में ICT लैब की सुविधा भी है। जबकि 1,129 स्कूलों में डिजिटल लाइब्रेरी की सुविधा दी गई है। सरकार ने उत्तर प्रदेश में 2.61 लाख से अधिक शिक्षकों को टैबलेट भी उपलब्ध कराए हैं। उत्तर प्रदेश के प्राइमरी स्कूलों में स्मार्ट क्लास 2021 में शुरू हुई थीं। जबकि इनका औपचारिक संचालन 2022-23 शैक्षणिक सत्र से शुरू हुआ।

नई स्मार्ट स्कूल योजना सरकारी स्कूलों में डिजिटल शिक्षा की पहुंच को और बढ़ाएगी। सरकार छात्रों की संख्या और एनरोलमेंट के आधार पर चरणबद्ध तरीके से स्मार्ट क्लास और ICT लैब सुविधाओं का विस्तार करेगी। इस पहल का मकसद सरकारी स्कूलों के बच्चों को आधुनिक, गुणवत्तापूर्ण और टेक्नोलॉजी आधारित शिक्षा उपलब्ध कराना है।

CJP ने नोएडा में ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान शुरू

इस बीच, कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने मंगलवार को नोएडा में ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान शुरू कर दिया। इसके तहत संगठन ने युवाओं से अपने आसपास के स्कूलों का निरीक्षण करने और शिक्षण सुविधाओं की जमीनी हकीकत का आकलन करने की अपील की। CJP के सह-संयोजक सौरव दास ने कहा कि 15 अगस्त से जारी इस अभियान का उद्देश्य युवाओं को अपने क्षेत्र में स्कूलों की स्थिति और वहां दी जा रही शिक्षा की गुणवत्ता की जांच करने के लिए प्रोत्साहित करना है।

दास ने पत्रकारों से कहा, “आज हम ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान के तहत एक स्कूल का ऑडिट करने के लिए नोएडा आए हैं। हम देखना चाहते हैं कि यहां बच्चे किन परिस्थितियों में पढ़ रहे हैं। चूंकि, नोएडा उत्तर प्रदेश के बेहतर जिलों में से एक है, इसलिए उम्मीद की जाती है कि यहां के स्कूलों की स्थिति अच्छी होगी।” उन्होंने कहा कि जमीनी हकीकत सामने लाने के लिए उत्तर प्रदेश के युवाओं को भी आगे आकर अपने आसपास के स्कूलों में दी जा रही शिक्षा की गुणवत्ता की जांच करनी चाहिए।

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इससे पहले, दास ने X पर एक पोस्ट में कहा था कि वह अप्रैल 2026 में नोएडा में हुए श्रमिकों के विरोध-प्रदर्शन के सिलसिले में उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से कथित तौर पर प्रताड़ित किए गए और अनुचित तरीके से जेल में डाले गए लोगों के परिजन और मित्रों से मुलाकात करेंगे। दास ने कहा था कि संविधान उचित वेतन की मांग करने और अमानवीय रूप से लंबी पाली के खिलाफ प्रदर्शन करने के अधिकार की रक्षा करता है।

केसरिया छोड़ फिर नीली जर्सी पर लौटी भारतीय पुरुष महिला हॉकी टीम

विश्वकप में भारतीय महिला और पुरुष हॉकी टीम केसरिया रंग की जर्सी पहनकर मैदान पर उतरी थी। इस निर्णय से कई राजनैतिक बहस खुल गई थी और कई पुर्व हॉकी खिलाड़ियों ने इसका विरोध किया था। शायद यही कारण है कि हॉकी इंडिया ने निर्णय लिया है कि जापान के आइची-नागोया में होने वाले आगामी एशियाई खेलों में भारतीय पुरुष और महिला हॉकी टीमें परंपरागत नीली जर्सी में ही मैच खेलेंगी।

हॉकी इंडिया के अध्यक्ष दिलीप टिर्की ने कहा कि भारतीय ओलंपिक संघ (आईओए) ने टीम किट के रंगों को लेकर विकल्प दिए थे जिसके बाद हॉकी इंडिया ने भारतीय टीम की जर्सी के लिए नीले रंग को पहली पसंद बनाया।

इन पूर्व खिलाड़ियों ने उठाया सवाल

नीदरलैंड और बेल्जियम में 15 अगस्त से शुरू हो रहे विश्व कप से पहले भारतीय टीमों की जर्सी का रंग नीले से केसरिया कर दिया गया जिसे लेकर वीरेन रासकिन्हा, परगट सिंह, वी भास्करन, धनराज पिल्लै जैसे पूर्व खिलाड़ियों ने सवाल उठाया था। वहीं मामले ने राजनीतिक रंग भी ले लिया और विपक्षी दलों ने इस पर सरकार को आड़े हाथों लिया था।

टिर्की सहित हॉकी इंडिया के पदाधिकारियों का कल तक कहना था कि खेल के मैदान पर इस्तेमाल होने वाली नीली पिच से रंग की समानता से बचने के लिए यह पूरी तरह से तकनीकी निर्णय था।

पूर्व कप्तान रासकिन्हा ने हालांकि जर्सी का रंग बदलने के फैसले पर सवाल किया था।उन्होंने एक्स पर लिखा था ,‘‘ हॉकी इंडिया ने खेल के लिये बहुत कुछ किया है लेकिन यह निराशाजनक है। भारतीय टीम की विरासत और पहचान नीला रंग रही है। मैने कई साल तक गर्व से नीली जर्सी पहनी है। प्रशंसक हमारी टीम को नीले रंग में देखना चाहते हैं।यह भगवा का क्या तुक है।’’

उन्होंने एक्स पर लिखा था ,‘‘ हॉकी इंडिया ने खेल के लिये बहुत कुछ किया है लेकिन यह निराशाजनक है। भारतीय टीम की विरासत और पहचान नीला रंग रही है। मैने कई साल तक गर्व से नीली जर्सी पहनी है। प्रशंसक हमारी टीम को नीले रंग में देखना चाहते हैं।यह भगवा का क्या तुक है।’’

ब्रिटेन के किले पर पाकिस्तान का झंडा फहराने पर विवाद:दक्षिणपंथी रिफॉर्म पार्टी ने विरोध किया, कहा- ऐतिहासिक इमारत पर विदेशी झंडा क्यों

ब्रिटेन के वेल्स में कार्डिफ कैसल (किले) पर पाकिस्तान का झंडा फहराने को लेकर विवाद हो गया है। दक्षिणपंथी रिफॉर्म पार्टी ने इसका विरोध किया है। रिफॉर्म के सीनियर नेता रॉबर्ट जेनरिक ने सोशल मीडिया पर कार्डिफ कैसल पर पाकिस्तानी झंडा फहराए जाने का वीडियो शेयर किया। उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक इमारतों पर विदेशी झंडे फहराया जाना बंद होना चाहिए।उन्होंने लिखा, कार्डिफ कैसल पर पाकिस्तान का झंडा फहराया गया है। हम अपनी संस्कृति पर कब्जे की इस कोशिश को क्यों होने दे रहे हैं? अब यह हर जगह दिखाई देता है। कार्डिफ काउंसिल ने बताया कि पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस के मौके पर 14 अगस्त को कैसल पर पाकिस्तान का झंडा फहराया गया था। इससे पहले 9 अगस्त को भी एक कार्यक्रम में झंडा फहराया गया था और वह रातभर लगा रहा। कंजरवेटिव नेता बोलीं- यह सम्मान है, कब्जा नहीं वेल्श कंजरवेटिव सांसद नताशा असगर ने रिफॉर्म के रुख की आलोचना की। उन्होंने कहा कि पाकिस्तानी, भारतीय और पोलिश समुदायों के झंडा फहराने के कार्यक्रमों में वह खुद शामिल हो चुकी हैं। उन्होंने कहा कि इन कार्यक्रमों में अलग-अलग राजनीतिक दलों के लोग शामिल होते हैं। यह किसी समुदाय का कब्जा नहीं, बल्कि एक-दूसरे के प्रति सम्मान दिखाने का तरीका है। असगर ने कहा, “मैं रिफॉर्म की ओर से नस्लीय विवाद भड़काने की कोशिशों से तंग आ चुकी हूं।” उन्होंने रिफॉर्म नेताओं को ऐसे कार्यक्रमों में शामिल होने की सलाह दी, ताकि वे देख सकें कि अलग-अलग समुदायों के बीच मेल-जोल कैसे होता है। काउंसिल ने कहा- भारत का झंडा भी फहराया था कार्डिफ काउंसिल के लेबर नेता क्रिस वीवर ने कहा कि पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस पर झंडा फहराने का मकसद कार्डिफ में रहने वाले पाकिस्तानी समुदाय के योगदान को सम्मान देना था। उन्होंने बताया कि 15 अगस्त को भारत के स्वतंत्रता दिवस के मौके पर भारतीय झंडा भी फहराया गया था। वीवर ने कहा कि काउंसिल लंबे समय से महत्वपूर्ण राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मौकों पर अलग-अलग देशों के झंडे फहराती रही है। कार्डिफ कैसल पर वेल्स और ब्रिटेन के झंडे भी लगे रहते हैं। उन्होंने कहा, “यह पूरा विवाद गलत जानकारी की वजह से खड़ा हुआ है और अब इसे बंद होना चाहिए।” विवाद में 2024 की पुरानी तस्वीर भी रिफॉर्म वेल्स के नेता डैन थॉमस ने रविवार को सोशल मीडिया पर एक तस्वीर शेयर करते हुए लिखा, “अब लेबर कार्डिफ कैसल पर पाकिस्तान का झंडा फहरा रही है।” लेकिन यह तस्वीर नई नहीं थी। इसे 14 अगस्त 2024 को एक BBC पत्रकार ने पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस के मौके पर पोस्ट किया था। सोमवार को कार्डिफ कैसल पर पाकिस्तान का झंडा नहीं दिखा। BBC Wales ने रिफॉर्म से पूछा कि थॉमस ने दो साल पुरानी तस्वीर का इस्तेमाल क्यों किया और पोस्ट में ऐसे क्यों लिखा जैसे झंडा अभी फहराया गया हो। रिफॉर्म वेल्स ने इस सवाल का जवाब नहीं दिया। स्थानीय नेता बोले- वेल्स की पहचान को खतरा नहीं वेल्स की एक स्थानीय पार्टी की वेस्टमिंस्टर नेता लिज सेविल रॉबर्ट्स ने भी रिफॉर्म पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि किसी दूसरे देश का झंडा फहराने से वेल्स की पहचान को कोई खतरा नहीं है। उनके मुताबिक, रॉबर्ट जेनरिक अपनी पार्टी की समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए ऐसे मुद्दे उठा रहे हैं। रिफॉर्म वेल्स इससे पहले कार्डिफ बे में वेल्स की संसद Senedd के बाहर यूक्रेन का झंडा फहराने का भी विरोध कर चुकी है। पाकिस्तानी समुदाय के योगदान को सम्मान देने की बात कार्डिफ काउंसिल ने कहा कि कार्डिफ कैसल शहर की प्रमुख ऐतिहासिक और सार्वजनिक इमारतों में से एक है। ऐसे मौकों पर यहां झंडा फहराने से शहर अलग-अलग स्थानीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अवसरों को सम्मान देता है। काउंसिल के मुताबिक, पाकिस्तान का झंडा फहराना कार्डिफ के बहुसांस्कृतिक समाज और यहां रहने वाले पाकिस्तानी समुदाय के योगदान को पहचानने का हिस्सा था। खबर अपडेट हो रही है…