बंगाल में अब पुस्तक संस्कृति पर हमला

भारतीय जनता पार्टी को जब ममता बनर्जी बाहरी बता रही थीं और बांग्ला संस्कृति के लिए खतरा बता कर प्रचार कर रही थीं तब भाजपा ने दावा किया था कि वह बांग्ला संस्कृति पर आंच नहीं आने देगी। लेकिन सरकार बनने के बाद ऐसा लग रहा है कि बंगाली लोगों के खान पान के बाद अब उनकी पढ़ने लिखने की संस्कृति पर हमले हो रहे हैं। लेफ्ट और तृणमूल कांग्रेस के समय जो राजनीतिक संस्कृति बनी थी वह नहीं बदली है। अब भी पहले के जैसे ही नेताओं पर हमले हो रहे हैं। विपक्षी पार्टी के कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया जा रहा है और वसूली का पुराना सिस्टम चल रहा है। बस चेहरे बदल गए हैं।

हैरानी की बात है कि भाजपा की सरकार बनने के बाद भी राजनीतिक संस्कृति जस की तस है और संस्कृति खतरे में आ गई। इस बार दुर्गापूजा को लेकर खबर है कि सीपीएम के कई बुक स्टॉल्स पर हमला हुआ। दूसरी जगह के लोगों को शायद पता नहीं हो लेकिन पश्चिम बंगाल यह संस्कृति रही है कि दुर्गापूजा के दौरान पंडालों के बाहर और जगह जगह पर किताबों की दुकानें लगाई जाती हैं। राजनीतिक दल भी किताबों के स्टॉल लगाते हैं। लोग किताबें खरीदते हैं। यह उनकी संस्कृति का हिस्सा है। लेकिन जाधवपुर यूनिवर्सिटी के बाहर से लेकर दूसरे कई हिस्सों में सीपीएम के बुक स्टॉल्स पर हमले हुए हैं। भाजपा के नेता इस तरह की घटनाओं से पल्ला झाड़ रहे हैं लेकिन यह सरकार के ऊपर बड़ा सवाल है। कुछ दिन पहले लोगों ने देखा ही कि कैसे दुर्गापूजा के दौरान मांस, मछली नहीं खाने की अपील कराई गई। जब इस पर विवाद हुआ तो भाजपा के नेता मंदिरों में बैठ कर मछली खाने लगे।

रांची में 65 करोड़ की लागत से बन रही हाई-टेक लाइब्रेरी, एक साथ 500 लोगों के पढ़ने की होगी सुविधा

रांची में झारखंड सरकार और सीसीएल की मदद से 65 करोड़ की लागत से सेमराबादी में लाइब्रेरी बन रही है। यह लाइब्रेरी आधुनिक सुविधाओं से लैस होगी, जिसमें टेक्नोलॉजी का काफी इस्तेमाल होगा। सीनियर सिटीजंस से लेकर बच्चों तक के लिए अलग रीडिंग रूम होंगे। लाइब्रेरी में 6 लिफ्ट, हर फ्लोर पर रीडिंग रूम, ई लाइब्रेरी जैसे कई आधुनिक सुविधाएं होंगी। लाइब्रेरी में एक साथ 500 से अधिक लोग पढ़ सकेंगे।

एक फ्लोर महान हस्तियों के लिए

रांची के सांसद संजय सेठ ने बताया कि हमने लाइब्रेरी के निर्माण कार्य का जायजा लिया है। काम काफी तेजी से चल रहा है। इस लाइब्रेरी की खास बात यह है कि इसका एक पूरा फ्लोर महान हस्तियों और परमवीर चक्र जैसे बड़े सम्मान पाने वालों के लिए रखा गया है। इस फ्लोर पर इन हस्तियों को जानने और समझने का मौका इस लाइब्रेरी में मिलेगा।

कैफेटेरिया और 6 लिफ्ट की सुविधा

ग्राउंड फ्लोर पर कैफेटेरिया होगी ताकि बच्चों को पढ़ाई के बीच रिफ्रेशमेंट की सुविधा मिल सके। कैफेटेरिया में हेल्दी फूड के विकल्प होंगे। लोगों खासकर बुजुर्ग लोगों को ध्यान में रखकर लाइब्रेरी में 6 लिफ्ट लगाई जा रही हैं। इससे एक फ्लोर से दूसरे फ्लोर पर आने-जाने में काफी आसानी होगी। लाइब्रेरी में वाई-फाई की भी सुविधा होगी।

सीनियर सिटीजन, बच्चों के लिए खास एरिया

सेठ ने बताया कि एक फ्लोर पूरी तरह से सिटीजंस और बच्चों को समर्पित होगा। सीनियर सिटीजंस की जरूरत को ध्यान में रखते हुए स्पिरिचुअलिटी से जुड़ी किताबों की व्यवस्था की जा रही हैं। ये किताबें हिन्दी, अंग्रेजी सहित कई भाषाओं में होंगी। बच्चों के लिए कॉमिक्स से लेकर फिक्सन स्टोरी, पजल्स बुक जैसे कई वेरिएंट की किताबें उपलब्ध होंगी।

मोराबादी बनेगा एजुकेशन हब

मोराबादी में कई सारे कॉलेज और यूनिवर्सिटी हैं। इन संस्थानों के स्टूडेंट्स को भी लाइब्रेरी से फायदा होगा। इस क्षेत्र की पहचान पहे से ही एक बड़े एजुकेशन हब के रूप में बन रही है। आर्थिक रूप से कमजोर स्टूडेंट्स का लाइब्रेरी में खास ध्यान रखा जाएगा। उन्हें मुफ्त में लाइब्रेरी एक्सेस की फैसिलिटी दी जाएगी। सामान्य कैटेगरी के स्टूडेंट्स से फीस ली जाएगी। अभी फीस तय नहीं की गई है।

(रांची से शिखा श्रेया की रिपोर्ट)

‘वेरिटी’: सच से ज़्यादा ख़तरनाक अफ़साना

कुछ कहानियां हमें डराती नहीं हैं। वे हमारे भीतर एक शक छोड़ जाती हैं। ऐसा शक, जो सिनेमा हॉल से बाहर निकलने के बाद भी हमारे साथ चलता है। क्या जो हमने देखा, वही सच था? क्या जिस आदमी पर हमें भरोसा हुआ, वह भरोसे के लायक था? क्या जिस औरत को हम पीड़ित समझ रहे थे, वह वास्तव में पीड़ित थी?

सिने-सोहबत

सबसे बड़ा सवाल कि अगर किसी लेखक ने अपनी ज़िंदगी के सबसे अंधेरे हिस्से को कहानी की शक्ल में लिख दिया हो, तो हम कैसे तय करेंगे कि उसमें कितना सच है और कितना कल्पना?

माइकल शोवाल्टर की हालिया हॉलीवुड फ़िल्म ‘वेरिटी’, कोलीन हूवर के लोकप्रिय मनोवैज्ञानिक रोमांचक उपन्यास पर आधारित है। फ़िल्म में ऐन हैथवे, डकोटा जॉनसन और जोश हार्टनेट मुख्य भूमिकाओं में हैं। और सच कहूं तो ‘वेरिटी’ को सिर्फ़ एक रोमांचक फ़िल्म कहना उसके साथ थोड़ी नाइंसाफी होगी। यह कहानी दरअसल है लेखन की, इच्छा की, विवाह की, अपराध की, महत्वाकांक्षा की और सबसे बढ़ कर सच को अपनी सुविधा के हिसाब से गढ़ लेने की इंसानी फ़ितरत की।

डकोटा जॉनसन की लोवेन ऐशली एक संघर्षरत लेखिका है। किताबें लिखती है, लेकिन सफलता उससे अभी दूर है। तभी उसे एक ऐसा प्रस्ताव मिलता है, जिसे वह शायद ठुकरा नहीं सकती। प्रसिद्ध लेखिका वेरिटी क्रॉफ़र्ड एक भयानक दुर्घटना के बाद लगभग निष्क्रिय अवस्था में है। वह बोल नहीं सकती, लिख नहीं सकती और अपने बेहद लोकप्रिय उपन्यासों की शृंखला पूरी नहीं कर सकती।

लोवेन को उसके घर बुलाया जाता है ताकि वह वेरिटी के अधूरे काम को पूरा कर सके और यहीं से खेल शुरू होता है। क्योंकि किसी लेखक के घर में रखी चीज़ें महज़  चीज़ें नहीं होतीं। कागज, नोटबुक, अधूरे पन्ने, किताबें, तस्वीरें सब कुछ किसी न किसी कहानी की तरफ इशारा करते हैं। लोवेन को एक पांडुलिपि मिलती है। और यह पांडुलिपि वेरिटी की ज़िंदगी के ऐसे हिस्सों को सामने लाती है, जिन्हें पढ़ने के बाद उसके लिए वेरिटी को उसी नज़र से देख पाना संभव नहीं रह जाता।

अब सवाल यह नहीं है कि वेरिटी ने क्या किया। सवाल यह है कि क्या वेरिटी ने सच में वह सब किया? कहानी लिखने वाले के पास सबसे ख़तरनाक ताकत क्या होती है? किसी किरदार को मार देने की? नहीं। उसे परिभाषित करने की। लेखक तय करता है कि उसका नायक कौन है, खलनायक कौन है, कौन निर्दोष है और कौन दोषी।

लेकिन ‘वेरिटी’ इस विचार को एक कदम आगे ले जाती है। अगर कोई लेखक अपनी ज़िंदगी को ही एक कहानी की तरह लिखने लगे तो? अगर वह अपने अपराध को साहित्य बना दे? अगर वह अपनी सच्चाई को कल्पना बताकर बच निकलने की कोशिश करे? और अगर कल्पना को सच बताकर किसी और को दोषी बना दे? यही वह जगह है जहां ‘वेरिटी’ दिलचस्प हो जाती है। क्योंकि फ़िल्म हमें लगातार याद दिलाती है कि हर कहानी का लेखक सिर्फ़ वही नहीं होता, जो कलम पकड़कर बैठा है। कभी-कभी पाठक भी कहानी लिखता है।

लोवेन वेरिटी की पांडुलिपि पढ़ती है और अपने मन में वेरिटी की एक तस्वीर बनाती है। लेकिन वह तस्वीर सच है या वेरिटी की बनाई हुई है, यह तय करना दर्शक का काम है।

ऐन हैथवे के लिए वेरिटी एक असाधारण भूमिका है। इसलिए नहीं कि वह बहुत कुछ करती हैं, बल्कि इसलिए कि लंबे समय तक उन्हें कुछ भी करने की ज़रूरत नहीं पड़ती। वेरिटी शारीरिक रूप से लगभग निष्क्रिय है। लेकिन स्क्रीन पर उसकी मौजूदगी लगातार सक्रिय रहती है। वह बोल नहीं रही। लेकिन दर्शक को लगता है कि वह सब कुछ सुन रही है। वह चल नहीं रही लेकिन लगता है कि वह पूरे घर को नियंत्रित कर रही है। वह अपनी सफ़ाई नहीं दे सकती। और शायद यही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। क्योंकि जब कोई व्यक्ति जवाब नहीं देता, तो हम उसके लिए अपने जवाब गढ़ने लगते हैं।

ऐन हैथवे इसी अस्पष्टता का खूबसूरती से इस्तेमाल करती हैं। उनके चेहरे पर मासूमियत और ख़तरे के बीच की दूरी इतनी कम है कि दर्शक लगातार अपना फ़ैसला बदलता रहता है। और यही एक अच्छी मनोवैज्ञानिक रोमांचक फ़िल्म की खूबी है। वह आपको बताती नहीं कि किससे डरना है। वह आपको डरने के लिए मजबूर करती है।

डकोटा जॉनसन की लोवेन इस फ़िल्म में सिर्फ़ मुख्य किरदार नहीं है। वह दर्शक की आंखें भी है। वह पहली बार उस घर में प्रवेश करती है, तो हमें भी उतना ही कम पता है जितना उसे। धीरे-धीरे उसे कुछ चीज़ें दिखाई देती हैं। फिर कुछ और। फिर कुछ ऐसा, जिसे देखने के बाद वह पहले देखी हुई चीज़ों पर भी शक करने लगती है। और दर्शक भी। यहीं डकोटा जॉनसन बहुत अच्छी लगती हैं।

लोवेन कोई परफेक्ट नायिका नहीं है। वह जिज्ञासु है, असुरक्षित है, भावनात्मक रूप से कमज़ोर पड़ती है और परिस्थितियों के साथ उसका नैतिक कम्पास भी कई बार हिलता है। यही उसकी खूबसूरती है। क्योंकि वह किसी सुपरहीरो की तरह इस घर में नहीं आती। वह एक लेखक की तरह आती है, कहानी खोजने। और धीरे-धीरे कहानी उसे खोजने लगती है।

जोश हार्टनेट का जेरेमी पहली नज़र में एक संवेदनशील और दुखी पति दिखाई देता है। लेकिन ‘वेरिटी’ जैसी फ़िल्म में अगर कोई व्यक्ति बहुत अच्छा दिखाई दे, तो दर्शक स्वाभाविक रूप से पूछता है कि लोवेन और जेरेमी के बीच आकर्षण कहानी को एक और परत देता है। यह सिर्फ़ प्रेम कहानी नहीं है। यह विश्वास की कहानी है। किसे देखकर आपको लगता है कि वह आपकी तरफ है? और अगर वह व्यक्ति आपको वही कहानी सुनाए, जो आप सुनना चाहते हैं, तो क्या आप उसकी बात पर विश्वास कर लेंगे? लोवेन, जेरेमी और वेरिटी के बीच यही दिलचस्प त्रिकोण बनता है। यहां तीन लोग हैं। तीन दृष्टिकोण हैं। और शायद तीन अलग-अलग सच भी।

‘वेरिटी’ की सबसे बड़ी उपलब्धि उसकी कहानी से ज्यादा उसका माहौल है। वेरिटी का घर सिर्फ़ घर नहीं है। वह फ़िल्म का एक किरदार बन जाता है। बाहर खूबसूरती है। अंदर बेचैनी। बाहर परिवार है। अंदर रहस्य। बाहर खामोशी है। और उस खामोशी के भीतर बहुत सारी आवाज़ें।

फ़िल्म की सिनेमैटोग्राफ़ी भी इसी विरोधाभास को पकड़ती है। सब कुछ चमकदार है, खूबसूरत है, सलीके से रखा हुआ है लेकिन उसी सुंदरता के नीचे कुछ ऐसा है जो लगातार असहज करता है। यह डर भूतों का डर नहीं है।

यह उस डर की फ़िल्म है जब आपको लगने लगे कि आप जिसे जानते हैं, शायद वह वह व्यक्ति है ही नहीं। और मेरे लिए यही ‘वेरिटी’ का सबसे दिलचस्प हिस्सा है। लेकिन फ़िल्म की कमज़ोरी भी यहीं से शुरू होती है। पहला हिस्सा जिस आत्मविश्वास से रहस्य बनाता है, फ़िल्म का आखिरी हिस्सा उतने ही आत्मविश्वास से उस रहस्य को संभाल नहीं पाता।

कहानी में इतने मोड़ आते हैं कि एक समय के बाद रहस्य और उलझन के बीच की सीमा थोड़ी धुंधली हो जाती है। कुछ घटनाएं चौंकाती हैं। कुछ पर आप मुस्कुराते हैं। और कुछ पर आप सोचते हैं क्या सचमुच?

यानी फिल्म कभी-कभी अपनी ही बनाई हुई दुनिया पर ज़रुरत से ज्यादा भरोसा करने लगती है। यही वजह है कि ‘वेरिटी’ एक बेहतरीन मनोवैज्ञानिक रोमांचक फ़िल्म बनने से थोड़ा पीछे रह जाती है। लेकिन यह उसकी विफलता नहीं है। क्योंकि लोकप्रिय सिनेमा का अपना एक आनंद होता है। हर फ़िल्म को शोध-पत्र होने की ज़रूरत नहीं। कभी-कभी हमें ऐसी कहानी भी चाहिए जो हमें पकड़कर बैठाए, हमें शक करवाए, हमें चौंकाए और बीच-बीच में हमें यह सोचने पर मजबूर करे कि भाई, आख़िर सच क्या है?

‘वेरिटी’ को कोलीन हूवर की लोकप्रियता से अलग करके देखना भी मुश्किल है। आज के समय में साहित्य और सिनेमा का रिश्ता बदल चुका है। अब किताब की लोकप्रियता सिर्फ़ किताबों की बिक्री तक सीमित नहीं रहती। वह एक तैयार दर्शक-वर्ग भी बनाती है। कोलीन हूवर इसी बदलाव की बड़ी प्रतिनिधि हैं। उनकी कहानियों में प्रेम है, लेकिन उसके साथ अपराध, जुनून, हिंसा, असुरक्षा और भावनात्मक उथल-पुथल भी है।

‘वेरिटी’ इस दुनिया का एक ज्यादा अंधेरा रूप है। और शायद इसलिए यह उन दर्शकों को भी आकर्षित कर सकती है जिन्हें पारंपरिक रोमांस से ज्यादा मनोवैज्ञानिक रोमांच पसंद है। शायद ‘वेरिटी’ का सबसे दिलचस्प सवाल यही है।

हम सच जानना क्यों चाहते हैं? क्या इसलिए कि सच ज़रूरी है? या इसलिए कि हमें किसी एक कहानी पर विश्वास करना ज़रूरी लगता है? हर रहस्य का जवाब मिल जाए, यह ज़रूरी नहीं। कभी-कभी सवाल का बचा रह जाना ही कहानी को हमारे साथ घर तक लेकर आता है।

‘वेरिटी’ पूरी तरह सफल फ़िल्म नहीं है। लेकिन यह एक ऐसी फ़िल्म ज़रूर है, जिसके बारे में आप फ़िल्म खत्म होने के बाद किसी के साथ बात करना चाहेंगे।

और मेरे लिए सिनेमा की असली परीक्षा यही है। क्या फ़िल्म खत्म होने के बाद बातचीत शुरू होती है? क्योंकि अंततः यह फ़िल्म हत्या, विवाह या रहस्य से ज्यादा कहानी की ताकत के बारे में है।

एक लेखक कहानी लिखता है। पाठक उस पर विश्वास करता है। फिर एक दिन पाठक को शक होता है कि कहानी शायद सच नहीं थी। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। क्योंकि उसने उस कहानी पर विश्वास कर लिया होता है। और शायद ‘वेरिटी’ की सबसे खतरनाक बात यही है कि सच हमेशा सबसे ताकतवर कहानी नहीं होता।
कई बार वह कहानी ज़्यादा ताकतवर होती है, जिस पर हम सच की तरह विश्वास कर लें। यही ‘वेरिटी’ का असली खेल है।

और सिनेमा हॉल से निकलते हुए मेरे मन में बस एक सवाल था कि अगर आपकी ज़िंदगी पर कोई कहानी लिख दे, तो क्या आप पहचान पाएंगे कि उसमें आपका सच कितना है?

अगर आपको रिश्तों के भीतर छिपे रहस्य, मनोवैज्ञानिक रोमांच, खूबसूरत लोकेशन और लगातार बदलते शक पसंद हैं तो ज़रूर देख लीजिएगा।(पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार और यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़’ के होस्ट हैं।)

कनाडाई लेखक पर AI से किताब लिखने का आरोप:फ्रांस के सबसे बड़े पुरस्कार की रेस से बाहर, लेखक बोले- 2019 में ये सब नहीं था

कनाडाई लेखक थेलीसन ओरेलियन की किताब को फ्रांस के सबसे बड़े साहित्यिक पुरस्कार ‘प्रिक्स गोनकोर्ट’ की दौड़ से बाहर कर दिया गया है। ओरेलियन पर उनकी किताब ‘इट वॉज ईदर दैट ऑर डाई’ लिखने में AI की मदद लेने का आरोप लगा है। लेखक ने इससे इनकार किया है। उन्होंने कहा कि किताब पर 2017 में काम शुरू हुआ था और 2019 में पहला ड्राफ्ट तैयार कर लिया गया था। तब आम लोगों के लिए AI उपलब्ध नहीं थे। हालांकि गोनकोर्ट अकादमी इससे सहमत नहीं हुई। अकादमी ने कहा कि रिसर्चर्स और पत्रकारों की जांच में किताब का बड़ा हिस्सा AI की मदद से लिखने का संकेत मिला है। अकादमी ने कहा कि वे AI कंटेंट से तैयार साहित्य को किसी भी रूप में बढ़ावा नहीं देना चाहते। सोशल मीडिया पोस्ट से शुरू हुआ विवाद ओरेलियन की किताब को लेकर विवाद एक छोटे से गुमनाम सोशल मीडिया अकाउंट से शुरू हुआ। बाद में फ्रांस के अखबार ले फिगारो के लेखक सैमुअल फिटूसी ने माना कि वह इस अकाउंट को चलाते थे। फिटूसी ने कहा कि कुछ यूजर्स ने उनसे ओरेलियन की किताब की जांच करने को कहा था। इसके बाद उन्होंने किताब को पैंग्राम नाम के AI से लिखावट पहचानने वाले टूल से जांचा। उनका कहना था कि इसका मकसद ओरेलियन को निशाना बनाना नहीं था। वह लोगों का ध्यान इस ओर खींचना चाहते थे कि AI अब किताबें लिखने में भी इस्तेमाल हो रहा है। तीन AI टूल्स की मदद से किताब की जांच ओरेलियन की किताब की जांच तीन AI पहचानने वाले टूल और कई एक्सपर्ट्स ने की। इन जांचों में किताब में AI के इस्तेमाल की संभावना बताई गई। हालांकि, एक्सपर्ट्स ने यह भी कहा कि ऐसे टूल्स के नतीजों को 100% सही नहीं माना जा सकता। पैंग्राम- किताब के 95% हिस्से में AI के इस्तेमाल की संभावना है। GPT जीरो- किताब के 87% हिस्से में AI के इस्तेमाल की संभावना है। विंस्टन- अलग-अलग हिस्सों में 12% से 66% इंसानी लेखन की संभावना बताई। फ्रांस के AI रिसर्चर थियरी पोइबो ने कहा कि किताब में AI इस्तेमाल होने की संभावना है, लेकिन अभी यह पूरी तरह पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता। फ्रांस में किताब की बहुत चर्चा हो रही ओरेलियन की किताब फ्रांस में पहले से ही चर्चा में थी। इसमें एक हाईस्कूल शिक्षक की कहानी है, जो हैती में गैंग से बचकर निकलता है। इसके बाद वह डेरियन गैप (घने जंगलों, पहाड़ियों और दलदलों का एक खतरनाक रास्ता) पार कर अमेरिका और फिर कनाडा पहुंचता है। कुछ ही हफ्तों में किताब की 54 हजार से ज्यादा कॉपी बिक चुकी हैं। इसे अच्छी समीक्षाएं मिली थीं और कई साहित्यिक पुरस्कारों के लिए इसका नाम आया था। ओरेलियन इस महीने अपनी किताब के प्रचार के लिए फ्रांस पहुंचे थे। उनकी किताब को वहां अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही थी। उन्हें टीवी कार्यक्रमों में बुलाया जा रहा था और किताब गोनकोर्ट के अलावा भी कई बड़े साहित्यिक पुरस्कारों की दौड़ में शामिल थी। भूकंप के बाद हैती छोड़ा, कनाडा गए ओरेलियन 38 साल के हैं। उनका जन्म हैती के गोनाइव्स शहर में हुआ था। उनके पिता अकाउंटेंट और मां दर्जी थीं। 2010 के भूकंप के बाद उन्होंने हैती छोड़ दिया था। इस भूकंप में 2 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी और उनका घर भी तबाह हो गया था। इसके बाद वे डोमिनिकन रिपब्लिक पहुंचे। वहां से उन्होंने कनाडा जाने के लिए वीजा की अर्जी दी, लेकिन पहली अर्जी खारिज हो गई। इसके बाद एक क्यूबेक की कांसुलर अधिकारी ने उनकी हालत देखकर उन्हें 30 दिन में यह साबित करने का मौका दिया कि कनाडा में उनके परिवार के लोग उनका खर्च उठा सकते हैं। उनके अंकल ने जरूरी दस्तावेज भेजे और इसके बाद उनका कनाडा जाने का रास्ता खुला। —————————–
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ओपनएआई ने दावा किया है कि उसकी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तकनीक ने गणित की दुनिया के सबसे मुश्किल सवालों में से एक को सॉल्व कर दिया है। AI को इसे सुलझाने में सिर्फ 88 घंटे लगे। पूरी खबर यहां पढ़ें…

पड़ोसी के WiFi कनेक्शन से की जेईई की तैयारी, मुंबई के स्लम में पले अभिषेक अब आईआईटी दिल्ली से कर रहे बीटेक

आईआईटी में पढ़ाई का सपना टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में करियर बनाने के इच्छुक ढेरों युवाओं का होता है। इसके लिए छात्र जेईई एडवांस्ड की तैयारी करते हैं, जिसे देश की सबसे मुश्किल प्रतियोगी परीक्षाओं में से एक माना जाता है। आमतौर पर छात्र और अभिभावक सोचते हैं कि JEE एडवांस्ड की तैयारी का मतलब सबसे अच्छी कोचिंग, शांत स्टडी रूम या बिना रुकावट इंटरनेट एक्सेस होना है। लेकिन मुंबई के अभिषेक शर्मा के लिए ये सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं। इसके बावजूद उन्होंने जेईई एडवांस्ड में ऑल इंडिया रैंक 2,456 हासिल की, जिसमें OBC-NCL रैंक 415 थी। वह अब आईआईटी दिल्ली से बीटेक कर रहे हैं।

मोबाइल डेटा खत्म होने के बाद पड़ोसी के वाईफाई से की पढ़ाई

अभिषेक की कामयाबी की चर्चा होना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि उन्होंने साबित किया है कि देश की सबसे प्रतियोगी प्रवेश परीक्षा में सफल होने के लिए पैसा हो या न हो, सही सोच जरूरी है। उनका परिवार मुंबई के एक स्लम एरिया लोकमान्य तिलक नगर में किराए के घर में रहता था, जहां वे हर महीने ₹3,000 किराया देते थे। उनके पिता एक स्टील फैब्रिकेशन कंपनी में मजदूर के तौर पर काम करते थे और परिवार के पास पैसे कम थे। जेईई एडवांस्ड की तैयारी कर रहे कई छात्रों के लिए, किताबें, कोचिंग, स्टेबल इंटरनेट और पढ़ाई के लिए एक खास जगह तक पहुंच उनकी तैयारी का एक जरूरी है। शर्मा के पास उस स्तर की सुविधाएं नहीं थीं। इसके बजाय, उन्होंने अपने आस-पास जो भी सुविधाएं मौजूद थीं, उन पर भरोसा किया और मुश्किलों के बावजूद पढ़ाई जारी रखी।

कम सहूलियों के बावजूद शर्मा ने कैसे की तैयारी ?

अभिषेक के लिए जेईई एडवांस्ड की तैयारी के रास्ते की सबसे बड़ी मुश्किल थी इंटरनेट एक्सेस। फोन का मोबाइल डेटा जब खत्म हो जाता था, तो वह छत पर जाते थे और अपने पड़ोसी के Wi-Fi से कनेक्ट करते थे ताकि वह अपनी पढ़ाई जारी रख सकें। उनके घर का माहौल भी परिवार के वित्तीय हालात से अलग नहीं था। उनका परिवार महंगी कोचिंग सुविधा और तैयारी के दूसरे महंगे स्रोत उपलब्ध नहीं करा सकता था। इसके बावजूद अभिषेक ने इन मुश्किलों को अपने इरादे कमजोर करने नहीं दिया। उन्होंने एग्जाम की तैयारी जारी रखी और आखिरकार ऐसी रैंक हासिल की जिससे भारत के सबसे बड़े इंजीनियरिंग इंस्टीट्यूशन में से एक में एडमिशन मिल गया।

JEE एडवांस्ड रैंक 2456 से IIT दिल्ली तक

जब JEE एडवांस्ड के रिजल्ट घोषित हुए, तो अभिषेक का नाम ऑल इंडिया रैंक 2,456 और OBC-NCL रैंक 415 के साथ आया। यह रिजल्ट उनके करियर का वह पहला कदम था जहां से IIT दिल्ली की यात्रा शुरू होनी थी। शर्मा अब आईआईटी दिल्ली से बीटेक कर रहे हैं। उनका सफर दिखाता है कि एक ही परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्रों के हालात कितने अलग हो सकते हैं। अभिषेक की सक्सेस स्टोरी दिखाती है कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के दौरान पैसों की तंगी किस तरह की मुश्किलें पैदा कर सकती है।

राम मंदिर चढ़ावा चोरी केस: CCTV में कैद हुईं चोरी की 105 घटनाएं, चांदी की ईंटों और कीमती सामानों पर SIT ने SC को क्या बताया?

Viral Post: ‘कभी खाने को थे मोहताज…’ एक फैसले ने बदल दी जिंदगी, अब शख्स बना रहा अपने ‘सपनों का महल’

सोशल मीडिया पर एक युवक के प्रेरणादायक सफर को लेकर किया गया पोस्ट सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इस पोस्ट में व्यक्ति ने बताया कि 900 रुपये का स्कूल टूर भी न कर पाने वाला एक छात्र आज केंद्र सरकार में नौकरी कर रहा है। व्यक्ति के पुराने क्लासमेट अंकित पांडे ने सोशल मीडिया पर उनकी कहानी शेयर की है। उन्होंने बताया कि कभी उसके परिवार के लिए स्कूल का खर्च उठाना भी काफी मुश्किल था। लेकिन उन्होंने इस मुश्किल हालात के बावजूद पढ़ाई नहीं छोड़ी और एसएससी सीजीएल परीक्षा पास करके अपनी जिंदगी बदल दी। सोशल मीडिया पर ये पोस्ट तेजी से वायरल हो रहा है।

नहीं थे स्कूल टूर के लिए पैसे

एक्स पर एक पोस्ट में यूजर अंकित पांडे ने लिखा, “एक समय मेरे स्कूल के क्लासमेट के पास स्कूल टूर के लिए 900 रुपये भी नहीं थे।” उन्होंने आगे बताया, “हम सभी अपने लंच बॉक्स में अलग-अलग तरह का खाना लाते थे, लेकिन वह ज्यादातर अचार और रोटी लाता था। उसके पास पुरानी किताबें थीं, नया बैग भी नहीं था और वह हमेशा क्लास में सबसे शांत रहने वाला लड़का था।” पांडे के मुताबिक, उसके माता-पिता अपने बेटे की पढ़ाई जारी रखने के लिए मजदूरी करते थे।

पिता करते थे मजदूरी

पांडे ने लिखा, “उसके माता-पिता सिर्फ 4,000 रुपये की मासिक स्कूल फीस भरने के लिए मजदूरी करते थे। लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने मुश्किल हालात का सामना किया, अपनी पढ़ाई जारी रखी और वो काम किया, जिसे कभी उनके लिए नामुमकिन माना जाता था। आखिरकार, उन्होंने एसएससी सीजीएल परीक्षा पास कर ली। आज वह केंद्र सरकार में नौकरी कर रहे हैं और अपना घर बना रहे हैं।” सोशल मीडिया पर ये पोस्ट तेजी से वायरल हो रहा है।

पांडे ने कहा, “मैंने उसका सफर करीब से देखा है। स्कूल के लंच बॉक्स में अचार-रोटी लाने से लेकर आज अपना घर बनाने तक। जिंदगी ने उसे शुरुआत में बहुत कम दिया, लेकिन उसने आगे बढ़ने के लिए मेहनत करना कभी नहीं छोड़ा। कभी-कभी मेहनत सच में इंसान की पूरी जिंदगी बदल सकती है।”

लोगों ने किया कमेंट

एक यूजर ने कमेंट किया, “बहुत खूबसूरत कहानी है, अंकित। यह दिखाती है कि जब आपकी इच्छाशक्ति बाकी हर चीज से मजबूत होती है, तो आप किसी भी मुश्किल को पार कर सकते हैं और जिंदगी में कुछ भी हासिल कर सकते हैं।” एक अन्य यूजर ने लिखा, “मेहनत सब कुछ बदल सकती है।” वहीं, तीसरे यूजर ने कहा, “ये सफलता की ऐसी कहानी है, जो दिल को छू जाती है। अचार-रोटी से लेकर अपना घर बनाने तक का सफर वाकई खास है।”

(डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट सोशल मीडिया पर यूज़र द्वारा शेयर किए गए कंटेंट पर आधारित है। मनीकंट्रोल इन दावों की न तो स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है और न ही इनका समर्थन करता है।)

घर से भटक कर 1200km दूर चला गया बुजुर्ग, युवक ने AI पर लगाई ऐसी तरकीब और ढूंढ निकाला सही पता

किताबें बचाने के लिए चुनवा दी थी दीवार! युद्ध के 15 साल बाद सीरिया में घर लौटे शख्स ने हथौड़ा चलाया तो सेफ निकली पिता की दुर्लभ लाइब्रेरी

कुवैत में 15 साल बिताने के बाद सीरिया का एक व्यक्ति दमिश्क में अपने घर लौटने की तैयारी कर रहा है। उसने 2011 में एक दीवार के पीछे अपनी एक निजी लाइब्रेरी को छुपा दिया था, क्योंकि उसे डर था कि पूर्व राष्ट्रपति बशर अल-असद के शासन में अंदर रखी किताबें उसे खतरे में डाल सकती हैं।

ऑनलाइन वायरल हो रहे वीडियो फुटेज में अबू बिलाल नाम का यह व्यक्ति हथौड़े से दीवार तोड़ते हुए और किताबों व पत्रिकाओं से भरी अलमारियां निकालते हुए दिख रहा है, जो लगभग 15 साल से छिपी हुई थीं। खबरों के मुताबिक, इस कलेक्शन में सैकड़ों किताबें, कुरान से जुड़े सर्टिफिकेट और अन्य निजी सामान शामिल हैं। असद सरकार के तहत संघर्ष और कड़े सुरक्षा उपायों के बीच सीरिया छोड़कर कुवैत जाने से पहले उसने 2011 के आखिर में यह दीवार बनाई थी।

खबरों के अनुसार दीवार हटाने के बाद उसे अपना ज्यादातर सामान सही-सलामत मिला। छिपी हुई जगह में बहुत कम धूल गई थी। यह भावुक कर देने वाली खोज ऐसे समय में हुई है, जब दिसंबर 2024 में असद सरकार के गिरने के बाद सीरिया के पब्लिशिंग और साहित्य जगत में बड़े बदलाव आए हैं।

जो किताबें पहले की सरकार के समय प्रतिबंधित थीं, वे अब दमिश्क की किताबों की दुकानों और साहित्यिक कार्यक्रमों में खुलेआम मिल रही हैं। असद के सत्ता से हटने के बाद हुए पहले ‘दमिश्क इंटरनेशनल बुक फेयर 2026’ में पहले प्रतिबंधित रहा इस्लामी साहित्य, पूर्व सरकार के आलोचकों की रचनाएं और कुर्दिश प्रकाशन शामिल किए गए थे। खबरों के मुताबिक इसमें 35 देशों के 500 से ज्यादा पब्लिशिंग हाउस ने हिस्सा लिया था।

पब्लिशर्स ने सेंसरशिप में बड़ी ढील की बात भी कही है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक 2026 के मेले में सैयद कुतुब और इब्न तैमिया जैसे लेखकों की किताबें और कुर्द साहित्य खुलेआम दिखाए गए। हालांकि रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कुछ पाबंदियां अभी भी हैं, जैसे कि ऐसी सामग्री पर रोक जो नागरिक शांति के लिए खतरा मानी जाती है या जो पूर्व असद शासन का महिमामंडन करती है।

इसलिए छिपी हुई लाइब्रेरी का फिर से मिलना सीरिया के सांस्कृतिक माहौल में आए बड़े बदलाव की एक खास व्यक्तिगत मिसाल बन गया है, जो किताबें कभी दीवारों के पीछे रखी गई थीं, उन्हें अब सबके सामने लाया जा सकता है। अबू बिलाल के लिए यह पल उनकी जिंदगी के उस हिस्से में वापसी जैसा था, जिसे उन्होंने 2011 में दमिश्क में पीछे छोड़ दिया था, जिसे एक दशक से भी ज्यादा समय तक एक दीवार के पीछे एक-एक करके किताबों को सहेजकर रखा गया थाwol

UP Smart Schools: एक ओर यूपी के 14,429 सरकारी स्कूलों में स्मार्ट क्लास बनाने का ऐलान, दूसरी ओर नोएडा के स्कूल की CJP ऑडिट पर बवाल

UP smart schools: उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने बेसिक शिक्षा परिषद के तहत 14,429 सरकारी प्राइमरी स्कूलों को ‘स्मार्ट स्कूलों’ के तौर पर विकसित करने के लिए 300 करोड़ रुपये की योजना को मंजूरी दी है। यह फैसला लखनऊ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में लिया गया। इस योजना के तहत, राज्य के सरकारी स्कूलों में डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए चुने गए स्कूलों में चरणबद्ध तरीके से स्मार्ट क्लास शुरू की जाएंगी। इन स्कूलों के छात्रों को स्मार्ट क्लास, ICT लैब, डिजिटल किताबें और डिजिटल लाइब्रेरी की सुविधा मिलेगी। टेक्नोलॉजी-आधारित लर्निंग सिस्टम के तहत शिक्षक टैबलेट का भी इस्तेमाल करेंगे।

300 करोड़ रुपये मंज़ूर

योगी सरकार ने इस पहल के लिए 300 करोड़ रुपये मंजूर किए हैं। स्मार्ट क्लास लगाने के लिए ‘श्री ट्रॉन इंडिया लिमिटेड’ को लागू करने वाली एजेंसी के तौर पर चुना है। इंस्टॉलेशन का काम कॉम्पिटिटिव टेंडरिंग (प्रतिस्पर्धी निविदा प्रक्रिया) के जरिए किया जाएगा। प्रस्तावित दर 2,07,910 रुपये प्रति स्कूल तय की गई है, जिसमें सैनिटेशन चार्ज और GST शामिल हैं। अगर टेंडर प्रक्रिया में दर कम आती है, तो सरकार 300 करोड़ रुपये की सीमा के भीतर बची हुई रकम का इस्तेमाल और स्कूलों को कवर करने के लिए कर सकती है।

1,129 स्कूलों में डिजिटल लाइब्रेरी की सुविधा

राज्य में पहले से ही 32,000 से ज़्यादा स्कूलों में स्मार्ट क्लास चल रही हैं। 15,000 से ज्यादा स्कूलों में ICT लैब की सुविधा भी है। जबकि 1,129 स्कूलों में डिजिटल लाइब्रेरी की सुविधा दी गई है। सरकार ने उत्तर प्रदेश में 2.61 लाख से अधिक शिक्षकों को टैबलेट भी उपलब्ध कराए हैं। उत्तर प्रदेश के प्राइमरी स्कूलों में स्मार्ट क्लास 2021 में शुरू हुई थीं। जबकि इनका औपचारिक संचालन 2022-23 शैक्षणिक सत्र से शुरू हुआ।

नई स्मार्ट स्कूल योजना सरकारी स्कूलों में डिजिटल शिक्षा की पहुंच को और बढ़ाएगी। सरकार छात्रों की संख्या और एनरोलमेंट के आधार पर चरणबद्ध तरीके से स्मार्ट क्लास और ICT लैब सुविधाओं का विस्तार करेगी। इस पहल का मकसद सरकारी स्कूलों के बच्चों को आधुनिक, गुणवत्तापूर्ण और टेक्नोलॉजी आधारित शिक्षा उपलब्ध कराना है।

CJP ने नोएडा में ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान शुरू

इस बीच, कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने मंगलवार को नोएडा में ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान शुरू कर दिया। इसके तहत संगठन ने युवाओं से अपने आसपास के स्कूलों का निरीक्षण करने और शिक्षण सुविधाओं की जमीनी हकीकत का आकलन करने की अपील की। CJP के सह-संयोजक सौरव दास ने कहा कि 15 अगस्त से जारी इस अभियान का उद्देश्य युवाओं को अपने क्षेत्र में स्कूलों की स्थिति और वहां दी जा रही शिक्षा की गुणवत्ता की जांच करने के लिए प्रोत्साहित करना है।

दास ने पत्रकारों से कहा, “आज हम ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान के तहत एक स्कूल का ऑडिट करने के लिए नोएडा आए हैं। हम देखना चाहते हैं कि यहां बच्चे किन परिस्थितियों में पढ़ रहे हैं। चूंकि, नोएडा उत्तर प्रदेश के बेहतर जिलों में से एक है, इसलिए उम्मीद की जाती है कि यहां के स्कूलों की स्थिति अच्छी होगी।” उन्होंने कहा कि जमीनी हकीकत सामने लाने के लिए उत्तर प्रदेश के युवाओं को भी आगे आकर अपने आसपास के स्कूलों में दी जा रही शिक्षा की गुणवत्ता की जांच करनी चाहिए।

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इससे पहले, दास ने X पर एक पोस्ट में कहा था कि वह अप्रैल 2026 में नोएडा में हुए श्रमिकों के विरोध-प्रदर्शन के सिलसिले में उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से कथित तौर पर प्रताड़ित किए गए और अनुचित तरीके से जेल में डाले गए लोगों के परिजन और मित्रों से मुलाकात करेंगे। दास ने कहा था कि संविधान उचित वेतन की मांग करने और अमानवीय रूप से लंबी पाली के खिलाफ प्रदर्शन करने के अधिकार की रक्षा करता है।

चीन में आय में असमानता बढ़ी, माओ की किताबें लोकप्रिय:नौकरी और बढ़ती स्पर्धा से परेशान जेन-जी इसे संघर्षों से निपटने का तरीका मान रहे

आधुनिक चीन के संस्थापक माओत्से तुंग (माओ जेदांग) की मृत्यु के 50 साल बाद उनकी किताबें और भाषण फिर चर्चा में हैं। खासकर जेन-जी और युवा प्रोफेशनल के बीच। वजहें साफ हैं। अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी है। नौकरियों को लेकर अनिश्चितता बढ़ी है। शिक्षा और रोजगार में प्रतिस्पर्धा बढ़ी है। आय असमानता की चिंता बढ़ी है। ऐसे में कुछ युवा माओ की रचनाओं को सिर्फ राजनीतिक दस्तावेज नहीं मान रहे। वे इसे संघर्षों से निपटने का तरीका मान रहे हैं। चीनी मीडिया की रिपोर्टों के मुताबिक, माओ के विचार कई युवाओं के लिए ‘संकट से निपटने की ताकत का स्रोत’ बन रहे हैं। यह वापसी इसलिए भी खास है, क्योंकि जेन-जी माओ को निजी स्मृति की तरह नहीं जानती। वह उन्हें इतिहास के एक बड़े किरदार की तरह देखती है। उनके शब्दों को आज के दबाव के हिसाब से नए अर्थ में पढ़ती है। भविष्य को लेकर अनिश्चितता से जूझ रहे युवाओं का बड़ा वर्ग माओ के पुराने विचारों को आज की मुश्किलों को समझने, उनसे जूझने और समाधान खोजने के तौर पर देख रहा है। मार्क्स ऑफ माओत्से तुंग’ रही। यह किताब सबसे ज्यादा बिकी भी है। वहीं, ई-कॉमर्स साइट ताओबाओ पर माओ के चित्रों और विचारों वाले 20,000 से ज्यादा मग बिक चुके हैं। सोशल मीडिया पर माओ के भाषणों और लेखों को नौकरी, निजी संघर्ष और रिश्तों की समस्याओं से जोड़कर पेश किया जा रहा है। ऑनलाइन रीडिंग ग्रुप और एआई से बने ऑडियो-वीडियो भी युवा पीढ़ी तक पहुंच रहे हैं। युवाओं को माओ में ऐसा क्या मिल रहा एडिलेड यूनिवर्सिटी के चीनी अध्ययन के प्रोफेसर मोबो गाओ के अनुसार, कड़ी प्रतिस्पर्धा, संपत्ति की असमानता और रोजगार की सीमित संभावनाओं के बीच कुछ युवाओं को माओ के वर्ग और संघर्ष से जुड़े विचार अपने अनुभवों को समझने का तरीका दे सकते हैं। जेन-जी के लिए माओ एक ऐतिहासिक नेता से ज्यादा ऐसे व्यक्ति हैं, जिसके लेखन में मुश्किल हालात से लड़ने और असफलता के बाद आगे बढ़ने की बातें खोजी जा सकती हैं। गाओ कहते हैं कि जेन-जी माओ के कार्यों को जीवन की चुनौतियों से निपटने की गाइडबुक के रूप में पढ़ रहे हैं, न कि राजनीतिक दस्तावेज के तौर पर। अमेरिका से तनाव बढ़ा तो माओ के विचार फिर वायरल हुए – माओ ने 1946 में कहा था कि साम्राज्यवाद और परमाणु बम ‘पेपर टाइगर’ हैं- यानी वे ऊपर से खतरनाक लगते हैं, लेकिन असल में कमजोर हैं। हाल के ​वर्षों में जब अमेरिका से व्यापार तनाव बढ़ा तो माओ के साम्राज्यवाद संबंधी ‘पेपर टाइगर’ जैसा विचार चीन के सोशल मीडिया पर प्रमुखता से छाया रहा। -1938 में लिखी माओ की किताब ‘ऑन प्रोट्रैक्टेड वॉर’ के संदर्भ भी ऑनलाइन चर्चा में रहे। इससे माओ की छवि के दो पहलू सामने आते हैं- एक ओर निजी मुश्किलों में संघर्ष का प्रतीक और दूसरा- बाहरी दबाव के सामने चीन की ताकत और राष्ट्रीय स्वतंत्रता का प्रतीक। यह युवाओं को लुभा रहा है।

स्टडी टाइम और होमवर्क बनेगा फन टाइम! इन 7 आसान तरीको से बच्चे खुद करने लगेंगे पढ़ाई

होमवर्क के समय बच्चों को बैठाना कई माता-पिता के लिए रोज चैलेंजिंग हो जाता है। कभी बच्चा पढ़ने का मन नहीं करता, तो कभी छोटी-सी बात पर चिड़चिड़ा हो जाता है। ऐसे में डांटने या प्रेशर बनाने के बजाय पढ़ाई का माहौल थोड़ा आसान और ऑर्गेनाइज बनाना ज्यादा मददगार हो सकता है। कुछ छोटी-छोटी आदतों से होमवर्क करने को स्ट्रेस फ्री बनाया जा सकता है और बच्चे में धीरे-धीरे खुद पढ़ने की अच्छी आदत भी डेवलप हो सकती है।

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1. एक रूटीन बनाएं

बच्चे के होमवर्क के लिए रोज एक तय समय रखें। कोशिश करें कि वह हर दिन लगभग उसी समय और एक ही जगह पर पढ़ाई करे। इससे बच्चे को पहले से पता रहेगा कि कब उसे खेलना या टीवी देखना छोड़कर पढ़ाई शुरू करनी है। शुरुआत में उसे रूटीन की आदत डालने में थोड़ा समय लग सकता है, लेकिन कुछ दिनों बाद वह खुद उस समय पढ़ाई के लिए तैयार होने लगेगा।

 

 

2. पढ़ने की जगह साफ रखें

पढ़ाई के लिए ऐसी जगह चुनें जहां ज्यादा शोर न हो और बच्चा आसानी से ध्यान लगा सके। डेस्क पर सिर्फ जरूरी किताबें, कॉपियां और स्टेशनरी रखें। खिलौने, मोबाइल फोन, टैबलेट या ऐसी दूसरी चीजें दूर रखें जो उसका ध्यान बार-बार भटका सकती हैं। क्लीन और ऑर्गेनाइज जगह होने से बच्चे को पढ़ाई पर फोकस करने में आसानी होती है।

 

 

3. बड़े काम को छोटे हिस्सों में बांटें

अगर बच्चे को एक साथ बहुत सारा होमवर्क या कोई बड़ा प्रोजेक्ट मिल जाए, तो उसे देखकर वह घबरा सकता है। ऐसे में पूरे काम को छोटे-छोटे हिस्सों में बांट दें। उदाहरण के लिए, पहले गणित के सवाल, फिर हिंदी की कॉपी और उसके बाद प्रोजेक्ट का काम। एक-एक करके काम पूरा करने से बच्चा परेशान कम होगा और उसे अपना काम आसान लगेगा।

 

 

4. बीच में शार्ट ब्रेक दें

बच्चे से लगातार लंबे समय तक पढ़ने की उम्मीद न करें। कुछ देर पढ़ने के बाद छोटा ब्रेक देना उसके लिए फायदेमंद हो सकता है। उदाहरण के लिए, करीब 20 मिनट पढ़ाई के बाद 5 मिनट का ब्रेक दिया जा सकता है। इसमें बच्चा थोड़ा चल सकता है, पानी पी सकता है या आंखों को आराम दे सकता है। बस ब्रेक इतना लंबा न हो जाए कि बच्चा फिर से पढ़ाई न करना चाहे।

 

 

5. उसे खुद करने का मौका दें

बच्चे को हर सवाल का जवाब तुरंत बताने के बजाय पहले खुद सोचने और कोशिश करने का मौका दें। वह किसी सवाल पर अटक जाए, तो डायरेक्ट आंसर देने के बजाय हिंट देकर उसकी मदद करें। इससे बच्चे का कॉन्फिडेंस बढ़ेगा और उसे खुद प्रॉब्लम सॉल्व करने की आदत होगी। धीरे-धीरे वह मुश्किल सवालों को समझने की कोशिश करेगा।

 

 

6. खुद भी शांत रहें

होमवर्क करते समय बच्चा परेशान हो जाए, गलती करे या किसी सवाल को बार-बार गलत करे, तो गुस्सा करने से सिचुएशन और बिगड़ सकती है। ऐसे समय पर अपनी आवाज शांत रखें और उसे समझाएं कि गलती होना सामान्य बात है। उसे यह महसूस कराएं कि वह कोशिश कर रहा है, इसलिए घबराने की जरूरत नहीं है। माता-पिता का शांत आवाज बच्चे का स्ट्रेस कम करती है।

 

 

7. बच्चे की मेहनत की करें तारीफ

सिर्फ अच्छे नंबर आने पर ही बच्चे की तारीफ न करें, बल्कि उसकी मेहनत और कोशिश को भी महत्व दें। उसने खुद कोई मुश्किल सवाल हल किया है या बिना याद दिलाए अपना होमवर्क पूरा किया है, तो उसकी तारीफ करें। इससे बच्चे का कॉन्फिडेंस बढ़ता है और वह आगे भी मन लगाकर पढ़ाई करने के लिए मोटिवेट होता है।

बच्चों के लिए पढ़ाई को बोझ बनाने के बजाय उसे उनकी रोज की जिंदगी का नेचुरल पार्ट बनाना जरूरी है। माता-पिता का सपोर्ट और सही माहौल बच्चे के मन से पढ़ाई का डर कम कर सकता है। इस तरह धीरे-धीरे बच्चा जिम्मेदारी समझने लगता है और पढ़ाई को लेकर उसका भरोसा भी बढ़ता है।