TMC के हाथ से फिसले दो पार्लियामेंट्री पैनल से अध्यक्ष का पद, डोला सेन और काकोली घोष को लगा करारा झटका

राज्यसभा अध्यक्ष सीपी राधाकृष्णन और लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला ने शनिवार को अलग-अलग विभागों से जुड़ी संसद की स्थायी समितियों को फिर से बनाया। इस फैसले से सबसे ज्यादा असर ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस पर पड़ा है। पार्टी को दो अहम संसदीय समितियों के अध्यक्ष के पदों से हाथ धोना पड़ा है। इस फैसले से टीएमसी सांसद डोला सेन और कीर्ति आजाद को बड़ा झटका लगा है।

वाणिज्य मामलों पर संसद की स्थायी समिति का नया अध्यक्ष बीजेपी के सुधांशु त्रिवेदी को बनाया गया है। उन्होंने डोला सेन की जगह ली है। वहीं टीएमसी के बागी गुट की लीडर काकोली घोष दस्तीदार उनकी पुरानी पार्टी के सहयोगी कीर्ति आजाद की जगह केमिकल्स और फर्टिलाइजर पर पैनल की चेयरपर्सन बनाई गई हैं। डीएमके एमपी तिरुचि शिवा और के कनिमोझी को उद्योग मामलों पर पार्लियामेंट्री कमिटी और फूड, कंज्यूमर अफेयर्स और पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन पर पैनल का फिर से अध्यक्ष बनाया गया है। बीजेपी के कुछ जरूरी सहयोगी दलों, JD-U, शिवसेना और TDP – के नेताओं को भी अलग-अलग पार्लियामेंट्री कमेटियों के हेड बनाए रखा गया है।

कांग्रेस के शशि थरूर और चरणजीत सिंह चन्नी समेत कुछ विपक्षी नेताओं को भी क्रमशः एक्सटर्नल अफेयर्स और एग्रीकल्चर कमेटियों के चेयरपर्सन के तौर पर बनाए रखा गया है। कांग्रेस के मुकुल वासनिक को एजुकेशन, महिला, बच्चे और युवा मामलों पर पार्लियामेंट्री पैनल का हेड बनाए रखा गया है, जबकि समाजवादी पार्टी के राम गोपाल वर्मा को हेल्थ और फैमिली वेलफेयर पर पैनल का चेयरपर्सन बनाए रखा गया है। BJP के राधा मोहन सिंह डिफेंस पर पैनल को हेड करेंगे।

JD-U के संजय कुमार झा को ट्रांसपोर्ट, टूरिज्म और कल्चर पर पार्लियामेंट्री पैनल का चेयरपर्सन फिर से अपॉइंट किया गया है, जबकि शिवसेना के श्रीरंग बार्ने को एनर्जी पर पैनल का हेड बनाए रखा गया है। BJP के सुजीत कुमार ने अपनी पार्टी के MP बृज लाल की जगह पर पर्सनेल, पब्लिक ग्रीवांस, लॉ और जस्टिस पर पार्लियामेंट्री पैनल का चेयरपर्सन बनाया है। पूर्व केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर को कोल, माइंस और स्टील पर पैनल का हेड फिर से अपॉइंट किया गया है, जबकि BJP के राजीव प्रताप रूडी को वॉटर रिसोर्स पर पैनल का चेयरपर्सन बनाए रखा गया है।

BJP के भर्तृहरि महताब फाइनेंस पैनल के हेड बने रहेंगे, जबकि उनके पार्टी साथी राधा मोहन दास अग्रवाल को होम अफेयर्स पैनल का हेड बनाए रखा गया है। BJP के निशिकांत दुबे को भी कम्युनिकेशन और इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी पैनल का हेड फिर से बनाया गया है, जबकि महाराष्ट्र से पार्टी MP मेधा विश्राम कुलकर्णी को साइंस और टेक्नोलॉजी, एनवायरनमेंट, फॉरेस्ट और क्लाइमेट चेंज कमेटी का चेयरपर्सन बनाए रखा गया है।

BJP के सुधीर गुप्ता ने रेलवे पैनल के चेयरपर्सन के तौर पर पार्टी साथी सी एम रमेश की जगह ली है, जबकि कांग्रेस के सप्तगिरी शंकर उलाका को रूरल डेवलपमेंट और पंचायती राज पैनल का हेड फिर से बनाया गया है।

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ममता बनर्जी के पैर में लगी चोट नकली थी? फ्रैक्चर केस में शुभेंदु अधिकारी का बड़ा दावा, बंगाल सरकार ने जांच के दिए आदेश

Mamata Banerjee Leg Injury: पश्चिम बंगाल सरकार 2021 के विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के पैर में लगी चोट के कथित झूठे दावों की फिर से जांच शुरू करेगी। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने शनिवार (3 अक्टूबर) को यह बड़ी घोषणा की। इसी के साथ अधिकारी ने नंदीग्राम में 2021 के विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान ममता बनर्जी के पैर में लगी चोट से जुड़े विवाद को फिर से हवा दी है। अधिकारी ने आरोप लगाया है कि बनर्जी ने चोट का नाटक किया था। उन्होंने अपने दावे के समर्थन में बांगुर इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंसेज के मेडिकल रिकॉर्ड का हवाला दिया है।

राज्य सचिवालय ‘नबान्न’ में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए अधिकारी ने आरोप लगाया कि बनर्जी ने चुनाव के दौरान अपनी चोट का नाटक किया था। अधिकारी ने बांगुर इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंस द्वारा जारी बनर्जी की मेडिकल रिपोर्ट दिखाते हुए कहा, “ममता बनर्जी ने 2021 में नंदीग्राम में चुनाव प्रचार के दौरान पैर में चोट लगने का नाटक किया था। हमारे पास मेडिकल रिपोर्ट है, जिसमें कहा गया है कि फ्रैक्चर या हड्डी खिसकने का कोई प्रमाण नहीं है। हम इस मामले की जांच शुरू करेंगे।”

मुख्यमंत्री ने कहा, “उनके झूठे आरोप से नंदीग्राम के लोगों का अपमान हुआ। 9 अक्टूबर के बाद आदर्श आचार संहिता हटने पर मैं इस बारे में और जानकारी सामने रखूंगा। मैं कल किए गए अपने दावों के समर्थन में आज यह बात कह रहा हूं।” नंदीग्राम में छह अक्टूबर को उपचुनाव होना है। जबकि इसके नतीजे 9 अक्टूबर को घोषित किए जाएंगे।

मार्च, 2021 में लगी थी पैर में चोट

सीएम अधिकारी ने इससे पहले नंदीग्राम-2 विकासखंड के बिरुलिया बाजार में एक रैली को संबोधित करते हुए यह दावा किया था। यही वह स्थान है, जहां पांच साल पहले बनर्जी घायल हुई थीं। तत्कालीन मुख्यमंत्री बनर्जी को 10 मार्च, 2021 को चुनाव प्रचार के दौरान नंदीग्राम के बिरुलिया के रेयापाड़ा इलाके में बाएं पैर और कमर में चोट लगी थी। बनर्जी ने शुरुआत में कहा था कि कुछ अज्ञात लोगों ने जानबूझकर उन्हें उनकी कार के दरवाजे की ओर धक्का दिया, जिससे दरवाजा उनके बाएं पैर से जोर से टकराया और भारी भीड़ के बीच पैर चोटिल हो गया।

बाद में अस्पताल से जारी एक वीडियो संदेश में बनर्जी ने बताया था कि समर्थकों का अभिवादन करते समय भारी भीड़ उनकी कार के पास आ गई थी, जिससे उनका पैर दब गया और उन्हें चोट लगी। उन्हें आधिकारिक तौर पर बाएं टखने और पैर की हड्डियों में गंभीर चोट के साथ-साथ दाहिने कंधे, हाथ, गर्दन और कमर में चोट एवं दर्द की जानकारी दी गई थी। इसके बाद उन्हें कोलकाता लाया गया और राज्य संचालित एसएसकेएम अस्पताल में भर्ती कराया गया।

विस्तृत जांच के बाद बनर्जी को 12 मार्च को अस्पताल से छुट्टी दी गई। उस समय उनके बाएं पैर पर प्लास्टर था और उन्होंने बाद में व्हीलचेयर पर बैठकर चुनाव प्रचार जारी रखा। इन चुनावों में तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने 294 में से 216 सीटें जीतकर बड़ी जीत दर्ज की थी। जबकि भारतीय जनता पार्टी (BJP) 77 सीटों पर सिमट गई थी।

रिपोर्ट में क्या है?

अधिकारी द्वारा शेयर किए गए मेडिकल दस्तावेजों से पता चलता है कि 11 मार्च, 2021 के सीटी स्कैन में जांच किए गए क्षेत्रों में कथित तौर पर कोई फ्रैक्चर नहीं दिखा। हालांकि, केवल इन रिपोर्टों से यह साबित नहीं होता है कि बनर्जी की कुल चोटें बनावटी थीं। एसएसकेम (SSKM) अस्पताल की उस समय की रिपोर्टों में उनके बाएं टखने और पैर में चोटों के साथ-साथ कंधे, अग्रबाहु (forearm) और गर्दन में चोटों का भी जिक्र था।

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अधिकारी द्वारा घोषित नई जांच से 2021 की घटना से जुड़ी परिस्थितियों की और जांच होने की उम्मीद है। नंदीग्राम उपचुनाव से ठीक पहले यह विवाद फिर से उठ खड़ा हुआ है, जिससे 2021 के चुनाव का घटनाक्रम एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गया है।

ममता को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिली

नई दिल्ली। तृणमूल कांग्रेस की संस्थापक ममता बनर्जी की पार्टी टूट गई है और टूटे हुए गुट की याचिका पर ममता बनर्जी की पार्टी के बैंक खातों पर रोक लग गई है। इस मामले में ममता सुप्रीम कोर्ट पहुंची थीं लेकिन वहां से उनको कोई राहत नहीं मिली है। सर्वोच्च अदालत ने गुरुवार को तृणमूल कांग्रेस को उन चार बैंक खातों को संचालित करने की इजाजत देने से इनकार कर दिया, जिन्हें पश्चिम बंगाल पुलिस ने साइबर क्राइम की शिकायत के सिलसिले में फ्रीज कर दिया था।

इस मामले में सुनवाई करते हुए जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस पीबी वराले की बेंच ने कहा, ‘चुनाव आयोग ने टीएमसी का चुनाव चिन्ह फ्रीज कर दिया है। खातों में मौजूद फंड का असली हकदार कौन है, इस मामले पर कलकत्ता हाई कोर्ट में सुनवाई चल रही है। इसलिए हम इस मामले की सुनवाई नहीं करेंगे’। गौरतलब है कि चार मई को पश्चिम बंगाल चुनाव के नतीजे आए थे, जिसमें टीएमसी 15 साल बाद राज्य की सत्ता से बाहर हो गई थी।

इसके बाद पार्टी के 58 विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में अलग गुट बना लिया था। यह गुट असली तृणमूल कांग्रेस होने का दावा करता है। बहरहाल, ममता बनर्जी की पार्टी की ओर से पेश हुए सीनियर एडव्होकेट अभिषेक सिंघवी ने कहा कि बैंक खातों को फ्रीज करना पार्टी की राजनीतिक गतिविधियों को रोकने की कोशिश है। इससे पार्टी की गतिविधियां ठप्प हो गई हैं। उन्होंने कहा कि उपचुनावों आदि को देखते हुए पार्टी के खर्चों के लिए हर महीने कम से कम 12.15 करोड़ रुपए की आवश्यकता है। टीएमसी जैसी बड़ी पार्टी की राजनीतिक गतिविधियों के लिए यह न्यूनतम राशि है। इसलिए इन खातों को चलाने की मंजूरी दी जाए।

राज्य सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि दो गुट खुद को असली तृणमूल बता रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को यह तय करने को कहा है कि असली पार्टी कौन सी है। उन्होंने कहा, ‘दूसरा गुट भी कह रहा है कि हमें खाता चलाने की अनुमति दी जाए। इसलिए उन्हें असली तृणमूल पर फैसले का इंतजार करना चाहिए’।

विपक्ष की बैठक आज

नई दिल्ली। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में हुई गड़बड़ियों और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की मनमानियों को लेकर हुए खुलासे के बाद विपक्षी पार्टियों की एक अहम बैठक बुधवार को होगी। विपक्षी गठबंधन यानी ‘इंडिया’ ब्लॉक की पार्टियों के नेताओं की यह बैठक दिल्ली में होगी। हालांकि बैठक से पहले विपक्ष का बिखराव भी साफ दिख गया है। कई पार्टियों के नेता इसमें नहीं शामिल हो रहे हैं।

पिछली बैठक की ही तरह इस बार भी डीएमके और आम आदमी पार्टी इस बैठक में नहीं शामिल होंगे। गौरतलब है कि इस बैठक के समन्वय का काम कांग्रेस पार्टी देख रही है और बताया जा रहा है कि उसने आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल को न्योता नहीं दिया। बहरहाल, समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव भी बैठक में नहीं शामिल होंगे। यह भी कहा जा रहा है कि उनके चाचा रामगोपाल यादव भी बैठक से दूर रहेंगे और पार्टी की ओर से कोई अन्य नेता शामिल होगा। उद्धव ठाकरे भी बैठक के लिए दिल्ली नहीं आ रहे हैं। वे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बैठक में शामिल होंगे।

विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ ब्लॉक की पिछले तीन साल में यह आठवीं बैठक है। जून 2024 में लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद यह तीसरी बैठक है। लोकसभा के चुनाव नतीजों के तुरंत बाद एक बैठक हुई थी। उसके दो साल बाद आठ जून 2026 को बैठक हुई थी। उसमें एसआईआर और चुनाव आयोग को लेकर चर्चा हुई। उसमें तय हुआ था कि दो महीन बाद अगस्त में हैदराबाद में बैठक होगी। लेकिन वह बैठक नहीं हुई। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की खोजी रिपोर्ट के बाद ममता बनर्जी ने विपक्ष की बैठक बुलाने की पहल की।

बहरहाल, बैठक से एक दिन पहले मंगलवार को बताया गया कि अखिलेश यादव 30 सितंबर को लखनऊ में किसानों के सम्मेलन में शामिल होंगे। कहा जा रहा है कि उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से इस बारे में बात भी की है। हालांकि कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने कहा कि अखिलेश राज्यसभा चुनाव के नामांकन से जुड़ी व्यस्तता के कारण नहीं आएंगे।

बैठक में कांग्रेस की ओर से मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी शामिल होंगे। तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी भी इसमें शामिल होंगे। राजद के तेजस्वी यादव, जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और सीपीएम के महासचिव एमए बेबी बैठक में शामिल होंगे। शरद पवार की पार्टी के भी बैठक में शामिल होने की खबर है। गौरतलब है कि पिछले दिनों एमए बेबी ने दिल्ली में अरविंद केजरीवाल से मुलाकात की थी। लेकिन उन्होंने केजरीवाल को बैठक का न्योता नहीं दिया क्योंकि यह काम कांग्रेस को करना है।

चुनाव आयोग के काम भी तो ऐसे हैं!

जब से ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने चुनाव आयोग के अंदर की खींचतान और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की मनमानियों की खबर छापी है तब से एक बड़ी जमात ऐसी है, जिसको संवैधानिक संस्था की साख की चिंता सताने लगी है। लेकिन सवाल है कि क्या किसी अखबार ने या किसी विपक्षी राजनीतिक दल ने चुनाव आयोग या किसी अन्य संवैधानिक संस्था की साख खराब की है? चुनाव आयोग ने अपनी साख तो खुद ही खराब की है। उसके काम ऐसे हैं, जिनसे उसकी मंशा पर सवाल खड़े होते हैं। यह सिर्फ एसआईआर का मामला नहीं है। चाहे आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में कार्रवाई करने का मामला हो या दलबदल के मामले में फैसला देना हो या चुनाव चिन्ह आवंटित करना हो, सबमें चुनाव आयोगी की पक्षधरता भाजपा के साथ दिखाई देती है। इसलिए उसकी साख पर चौतरफा सवाल खड़े हो रहे हैं।

ताजा मामला पश्चिम बंगाल का है, जहां कलकत्ता हाई कोर्ट ने कहा है कि वह ‘फेडअप’ हो गया चुनाव आयोग के रवैए से। सोचें, ऐसा क्या काम कर दिया चुनाव आयोग ने कि हाई कोर्ट के कहना पड़ा कि ‘फेडअप’ हो गए! असल में पश्चिम बंगाल की दो विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हो रहा है। नंदीग्राम और रेजीनगर में। भाजपा को पता है कि रेजीनगर जीतना संभव नहीं है इसलिए सारी ताकत नंदीग्राम पर है, जो मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की पारंपरिक सीट है। इस सीट से नामांकन की प्रक्रिया खत्म होने से पहले चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस का नाम और चुनाव चिन्ह फ्रीज कर दिया और दोनों ध़ड़ों यानी ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी के खेमे को अलग अलग चुनाव चिन्ह आवंटित किया। ममता बनर्जी खेमे को फुटबॉल खेलता हुआ खिलाड़ी और ऋतब्रत बनर्जी को लिफाफा चुनाव चिन्ह आवंटित किया गया। इसी मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग पर टिप्पणी की। असल में लिफाफा चुनाव चिन्ह पहले से इंडियन सेकुलर फ्रंट यानी आईएसएफ को मिला हुआ है। उसी ने चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती दी।

अब सोचें, एक पार्टी प्रदेश में हैं, जिसने पिछली बार कांग्रेस और लेफ्ट से अलायंस करके चुनाव लड़ा था और उस पार्टी के एक विधायक भी हैं, नौशाद सिद्दीकी। उस पार्टी को लिफाफा चुनाव चिन्ह मिला हुआ है। चुनाव आयोग ने वही चिन्ह ममता बनर्जी की पार्टी से दलबदल करके अलग गुट बनाने वाले ऋतब्रत बनर्जी की पार्टी को आवंटित कर दिया। इसका सीधा मकसद यह है कि नंदीग्राम में मतदाता कंफ्यूज हों और थोड़े से ही सही लेकिन मुस्लिम मतदाता लिफाफा देख कर ऋतब्रत बनर्जी को वोट कर दें। इसका सीधा फायदा भाजपा को होगा। सोचें, पहले ममता बनर्जी की उम्मीदवार संचिता प्रधान डे से मुख्यमंत्री ने खुद मुलाकात की और उनको मैदान से हटाया। फिर जब ममता बनर्जी ने कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को समर्थन दिया तो उनको पुलिस ने 20 साल पुराने मामले में गिरफ्तार कर लिया और फिर चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस के एक गुट को लिफाफा चुनाव चिन्ह दे दिया। सोचें, एक उपचुनाव जीतने के लिए क्या क्या किया जा रहा है! बहरहाल, इस मामले की सुनवाई करते हुए कलकत्ता हाई कोर्ट ने नाराजगी जताई और तीखी टिप्पणी की। जस्टिस कृष्णा राव ने कहा कि वे थक गए हैं चुनाव आयोग के इस रवैए से। जैसे ही कोई चुनाव आता है आयोग विवाद खड़ा करने वाला फैसला कर देता है। अदालत ने कहा कि 189 संभावित चुनाव चिन्ह थे, जिसमें से आयोग ने चुन कर लिफाफा चुनाव चिन्ह ऋतब्रत बनर्जी को दे दिया। हाई कोर्ट की इस टिप्पणी आयोग के पक्षपात का एक पुख्ता सबूत है।

चार महीने में सुलझाएं तृणमूल विवाद

नई दिल्ली। राजनीतिक दलों में विभाजन को लेकर संभवतः पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के सामने एक समय सीमा रखी है। सर्वोच्च अदालत ने चुनाव आयोग से कहा है कि तृणमूल कांग्रेस में विभाजन और उनके नाम व चुनाव चिन्ह पर दावेदारी से जुड़े विवाद को चुनाव आयोग चार महीने में सुलझाए। सुप्रीम कोर्ट ने तृणमूल कांग्रेस के दोनों गुटों को एक महीने में अपनी दलीलें पूरी करने और इसके बाद चुनाव आयोग को तीन महीने में फैसला देने का निर्देश दिया है। यानी पूरी प्रक्रिया तार महीने में पूरी करनी होगी।

इससे पहले सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने विवाद को सुलझाने के लिए छह महीने का समय देने की अपील की थी, लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। गौरतलब है कि तृणमूल कांग्रेस की संस्थापक ममता बनर्जी ने यह याचिका दायर की थी, जिस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने समय सीमा तय की। असल में चुनाव आयोग ने एक अंतरिम फैसले में तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिह्न का इस्तेमाल रोक दिया गया था। पश्चिम बंगाल की दो सीटों पर हो रहे उपचुनाव में चुनाव आयोग ने दोनों गुटों को अलग अलग नाम और अलग चुनाव चिन्ह आवंटित किए हैं।

गौरतलब है कि शिव सेना के नाम और चुनाव चिन्ह से जुड़ा विवाद करीब चार साल से लंबित है, जबकि एनसीपी का मामला भी तीन साल से पेंडिंग है। दोनों मामलों में अलग अलग गुटों ने पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर दावा किया है। बहरहाल, सोमवार की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को सुझाव दिया है कि वह तृणमूल कांग्रेस के विवाद को जल्दी सुलझाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई और मशीन लर्निंग का इस्तेमाल करें। कोर्ट ने कहा कि इन आधुनिक तकनीकों की मदद से जटिल कानूनी दस्तावेजों को पढ़ने और समझने का काम बहुत तेजी से हो सकता है।

कांग्रेस ने शुरू की आंदोलन की तैयारी

नई दिल्ली। कांग्रेस पार्टी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की मनमानी को लेकर ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में हुए खुलासे पर बड़ा आंदोलन करने की तैयार कर रही है। पार्टी इसे छोड़ने के मूड में नहीं है। तभी अगले तीन दिन तक लगातार राजनीतिक कार्यक्रम तय किए गए हैं। सोमवार, 28 सितंबर को कांग्रेस कार्यकर्ता जिला मुख्यालयों पर विरोध प्रदर्शन करेंगे। इसके अगले दिन मंगलवार, 29 सितंबर को कांग्रेस कार्य समिति की बैठक होगी और उसके अगले दिन 30 सितंबर को विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ ब्लॉक की बैठक होगी। अगर बीजद के प्रतिनिधि इसमें हिस्सा लेते हैं तो इसे विपक्ष की बैठक कहा जाएगा।

बहरहाल, कांग्रेस पार्टी इस मसले पर अपनी रणनीति बनाने के लिए 29 सितंबर को कार्य समिति यानी सीडब्लुसी की बैठक करेगी। सोनिया व राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा इसमें शामिल होंगे। इसमें विपक्षी गठबंधन की बैठक को लेकर भी बात होगी। अगले दिन ‘इंडिया’ ब्लॉक की बैठक होगी। लगभग सभी विपक्षी पार्टियों के नेता इसमें शामिल होंगे। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव खुद बैठक में नहीं पहुंच पाएंगे लेकिन उनकी पार्टी के नेता इसमें हिस्सा लेंगे।

बताया जा रहा है कि कांग्रेस और सपा के अलावा इस बैठक की पहल करने वाली ममता बनर्जी और लेफ्ट के नेता भी शामिल होंगे। इसमें डीएमके और आम आदमी पार्टी के भी शामिल होने की संभावना है। गौरतलब है कि पिछली बैठक में इन दोनों पार्टियों ने दूरी बनाई थी। बताया जा रहा है कि बीजू जनता दल को भी इसमें शामिल होने का न्योता भेजा गया है और कहा जा रहा है कि नवीन पटनायक का कोई प्रतिनिधि बैठक में शामिल हो सकता है। अगर बीजद का कोई नेता आता है तो इस बैठक को ‘इंडिया’ ब्लॉक की बजाय विपक्ष की बैठक नाम दिया जा सकता है।

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में गड़बड़ी और चुनाव आयोग के आंतरिक मतभेद की खबरों के बाद विपक्षी पार्टियां नए सिरे से एकजुट हो रही हैं। पश्चिम बंगाल में एक दूसरे के धुर विरोधी रहे तृणमूल कांग्रेस और सीपीएम के बीच बातचीत शुरू हो गई है। असल में सीपीएम के महासचिव एमए बेबी ने ‘इंडिया’ ब्लॉक के सभी नेताओं को पत्र लिखा और चुनाव आयोग के हालात पर विचार के लिए बैठक बुलाने की अपील की।

एमए बेबी की चिट्ठी के जवाब में ममता बनर्जी ने सीपीएम महासचिव को फोन कर दिया। कोई 30 साल के बाद ममता की उनसे बात हुई। ममता बनर्जी ने एमए बेबी को कहा कि पूरे विपक्ष को मिलकर ज्ञानेश कुमार के खिलाफ एक साझा रणनीति बनाने की जरूरत है। इसके बाद ही बैठक की तारीख तय की गई।

विपक्ष के जानकार नेताओं का कहना है कि गठबंधन की ओर से 2029 का लोकसभा का चुनाव पुरानी मतदाता सूची से ही कराने की मांग की जाएगी। यानी एसआईआर को रद्द करने की मांग की जा सकती है। इस बैठक में यह सवाल भी पूछा जा सकता है कि एसआईआर के बाद कितने बांग्लादेशी नागरिक पकड़े गए और कितनों को वापस बांग्लादेश भेजा गया? इस बीच कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने चुनौती दी है कि वे सोमवार को दिल्ली आ रहे हैं और सरकार में हिम्मत है तो उनको पकड़ कर दिखाए।

विपक्ष की राजनीतिक दिशा ही ठीक नहीं है

वास्तविकता यह है कि न तो देश में कोई प्रत्यक्ष सत्ता विरोधी लहर है और न विपक्ष भाजपा के साथ जमीनी चुनावी मुकाबले के लिए तैयार है। इस दावे का परीक्षण कई स्तरों पर किया जा सकता है। पहले अगर विपक्ष की तैयारियों की बात करें तो यह दिख रहा है कि कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियां जनता के बीच यह माहौल बनाने की कोशिश कर रही हैं जैसे चुनाव आयोग ही भाजपा को चुनाव जिता रहा हो। यह बात सचाई से कोसों दूर है।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी को लग रहा है कि उनका समय आ गया है। ऐसा लगने में कोई बुराई नहीं है। जो विपक्ष में है उसे लगना चाहिए कि उसका समय आ गया है या आ रहा है। लेकिन सिर्फ लगने से कुछ नहीं होता है। कांग्रेस के बारे में अक्सर यह बात कही जाती है कि वह सत्ता में रहती है या सत्ता के इंतजार में रहती है। अभी राहुल गांधी सत्ता का इंतजार कर रहे हैं। इंतजार जैसे जैसे लंबा होता जा रहा है वैसे वैसे उनकी बेचैनी बढ़ती जा रही है। तभी हर छोटी बड़ी घटना पर वे यह मानने लगते हैं कि अब सरकार कमजोर हो गई है और उनका समय आ गया है, वे चुनाव जीत सकते हैं। तभी चुनाव आयोग को लेकर अंग्रेजी के एक अखबार ने एक खोजी रिपोर्ट प्रकाशित की तो राहुल गांधी को लगा कि यह मौका है। सिर्फ उन्हीं को नहीं, बल्कि दूसरी विपक्षी पार्टियों को भी लगा कि यह एक बड़ा मौका है। पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को भी लगा कि यह बहुत बड़ा अवसर है और इस बहाने अपने को पुनर्जीवित किया जा सकता है।

ममता बनर्जी तो इतनी उत्साहित हो गईं कि दशकों की दुश्मनी भूल कर सीपीएम के महासचिव एमए बेबी को फोन कर दिया। उनसे आग्रह किया कि वे विपक्षी पार्टियों को एकजुट करें। उन्होंने राहुल गांधी से अपील करते हुए कहा कि वे ‘इंडिया’ ब्ल़ॉक की बैठक बुलाएं। इसी तरह का उत्साह राहुल गांधी में भी दिखा। उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की, जिसमें इस अंदाज में बात कर रहे थे, जैसे उनकी सरकार आ गई हो। वे मुख्य चुनाव आयुक्त से कह रहे थे कि वे इस्तीफा कर दें और सरकारी गवाह बन जाएं। इससे ऐसा लगा, जैसे देश में उनकी सरकार हो। लेकिन असल में उनके उत्साह का कोई ठोस आधार नहीं है। चाहे ममता बनर्जी हों या राहुल गांधी दोनों अपने अपने कारणों से मौजूदा हालात का राजनीतिक लाभ लेने का प्रयास कर रहे हैं। ममता बनर्जी को अपने राजनीतिक अस्तित्व की चिंता है तो राहुल गांधी को लग रहा है कि उनका सत्ता का इंतजार समाप्त होने वाला है। तभी आने वाले दिनों में इसी लाइन पर संपूर्ण विपक्ष की राजनीति देखने को मिलेगी।

परंतु वास्तविकता यह है कि न तो देश में कोई प्रत्यक्ष सत्ता विरोधी लहर है और न विपक्ष भाजपा के साथ जमीनी चुनावी मुकाबले के लिए तैयार है। इस दावे का परीक्षण कई स्तरों पर किया जा सकता है। पहले अगर विपक्ष की तैयारियों की बात करें तो यह दिख रहा है कि कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियां जनता के बीच यह माहौल बनाने की कोशिश कर रही हैं जैसे चुनाव आयोग ही भाजपा को चुनाव जिता रहा हो। यह बात सचाई से कोसों दूर है। चाहे चुनाव आयोग हो या कोई दूसरी एजेंसी वह किसी पार्टी को चुनाव नहीं जिता सकती है। चुनाव जनता के वोट से जीता जाता है। जनभावना जिस पार्टी के साथ होती है वह चुनाव जीतती है। बाकी बातों का कोई खास अर्थ नहीं होता है। मिसाल के तौर पर पश्चिम बंगाल का चुनाव देखा जा सकता है। 2021 में पश्चिम बंगाल में भाजपा के लिए बहुत अनुकूल माहौल दिख रहा था। लेकिन जनभावना तृणमूल कांग्रेस के साथ थी तो भाजपा नहीं जीत सकी। इसके उलट 2026 में जनभावना ममता बनर्जी के खिलाफ हुई तो पुलिस और प्रशासन का सारा प्रबंधन होने के बावजूद वे खुद भी हारीं और पार्टी भी हार गई। ऐसी अनके मिसालें दी जा सकती हैं।

ध्यान रहे किसी भी पार्टी के चुनाव जीतने के लिए तीन चीजों की आवश्यकता होती है। पहली, पार्टी का संगठन। दूसरी, एक करिश्माई नेतृत्व और तीसरी चीज है नैरेटिव। जिस पार्टी के पास मजबूत संगठन होगा, करिश्माई नेता होगा और धारणा पर नियंत्रण होगा वही चुनाव जीतेगा। इस समय ये तीनों चीजें भारतीय जनता पार्टी के पास हैं। इसलिए वह लगातार चुनाव जीत रही है। दूसरी ओर अगर कांग्रेस की बात करें तो उसके पास सबसे बड़ी कमजोरी संगठन की है। उसका संगठन बहुत कमजोर है और राज्यों में भी उसके पास अच्छे नेताओं का अकाल है। प्रदेशों के ज्यादातर बड़े नेताओं ने अपनी प्रादेशिक पार्टी बना ली या कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में शामिल हो गए। अगर नेतृत्व की बात करें तो पिछले 22 साल से लगातार मेहनत करके राहुल गांधी अपने को नेता के तौर पर स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन कामयाबी नहीं मिल पा रही है। नेतृत्व के मामले में विपक्ष में आपसी सहमति भी नहीं है। जहां तक धारणा का सवाल है तो विपक्ष के प्रति आम जनमानस में निगेटिव धारणा है। अगर विपक्ष के पास संगठन, नेता और नैरेटिव ये तीन चीजें नहीं हैं तो फिर वह भाजपा जैसी बड़ी पार्टी और नरेंद्र मोदी जैसे करिश्माई नेता को कैसे चुनौती दे पाएगा?

इसके बावजूद अगर राहुल गांधी हमलावर हैं तो उसका कारण यह है कि वे पूरे घटनाक्रम को गलत नजरिए से पढ़ रहे हैं। वे नेता प्रतिपक्ष हैं और इस नाते सरकार के खिलाफ बोलना या राजनीति करना उनका काम है। इस पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती है। लेकिन दुर्भाग्य से वे सरकार और भाजपा का विरोध करते करते देश की संवैधानिक संस्थाओं का विरोध करने लगे हैं। अपने अति उत्साह में राहुल गांधी देश की संस्थाओं की साख को कमजोर करने और उनके ऊपर संदेह बढ़ाने वाले काम कर रहे हैं। अंग्रेजी के एक अखबार ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर एक खुलासा किया तो उससे जुड़े मुद्दों पर सवाल करने की बजाय राहुल गांधी ने पूरी संस्था और उसकी साख पर सवाल खड़े कर दिए। वे इसको एक अलग ही दिशा में ले जाने का प्रयास कर रहे हैं। राहुल ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि उन्होंने मुख्य चुनाव आय़ुक्त ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति का विरोध किया था और आपत्ति दर्ज कराई थी। हकीकत यह है कि उन्होंने बाकी दोनों आयुक्तों एसएस संधू और विवेक जोशी की नियुक्ति पर भी आपत्ति दर्ज कराई थी। जाहिर है वे सेलेक्टिव होकर हमले कर रहे हैं। उनको चुनाव आयोग की साख पर सवाल उठाने से पहले अपने गिरेबान में झांकना चाहिए। कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आय़ुक्त रहे एमएस गिल को मनमोहन सिंह की सरकार में मंत्री बनाया था। नवीन चावला का विवाद भी कांग्रेस के राज का है, जब तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति के शिकायत की थी कि चावला कांग्रेस के आदमी हैं। वास्तविकता यह है कि कांग्रेस की सरकारों ने चुनाव आयोग जैसी संस्था का राजनीतिकरण किया था। यह भी एक तथ्य है कि कांग्रेस के शासन में सीधे सरकार ही चुनाव आयुक्तों को नियुक्त करती थी।

बहरहाल, बड़ा सवाल यह है कि देश में एसआईआर जरूरी है या नहीं? इसका स्पष्ट जवाब है कि एसआईआर जरूरी है। मतदाता सूची में करोड़ों ऐसे लोगों के नाम हैं, जिनकी मृत्यु हो गई है। लाखों ऐसे नाम हैं, जो डुप्लीकेट हैं। ऐसे नामों को हटा कर मतदाता सूची की पवित्रता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी चुनावी आयोग की होती है। उसने अपने संवैधानिक उत्तरदायित्व के तहत यह काम किया है। अगर उसमें कहीं कोई त्रुटि है और नेता विपक्ष उसकी ओर ध्यान दिलाएं तो बात समझ में आती है। लेकिन यह दावा करना कि एसआईआर के कारण भाजपा जीत रही है या चुनाव आयोग के कारण ही प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ एंटी इन्कम्बैंसी नहीं होती है, एक बचकानी बात है। कोई भी एजेंसी या संस्था किसी सरकार के खिलाफ एंटी इन्कम्बैंसी को खत्म नहीं कर सकती है और न चुनाव जिता सकती है। ध्यान रहे एसआईआर की प्रक्रिया पिछले साल जून में शुरू हुई और कांग्रेस के हारने का सिलसिला उससे बहुत पुराना है। इसी साल एसआईआर के बीच पांच राज्यों में चुनाव हुए, जिसमें कांग्रेस केरल में जीती है और एक नई बनी पार्टी तमिलनाडु में जीत गई। इसलिए किसी भी घटना को एक परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता होती है। हर चीज चुनावी राजनीति के लिए नहीं होती है।

असल में राहुल गांधी ढाई साल पहले ही अगले लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुट गए हैं। लेकिन अफसोस की बात है कि इसके लिए वे पार्टी संगठन को मजबूत करते या जमीनी स्तर पर सक्रिय होकर काम करते नहीं दिख रहे हैं। वे प्रेस कॉन्फ्रेंस करके चुनावी माहौल बना रहे हैं। वे चुनावी लाभ के लिए देश की संवैधानिक संस्थाओं को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि नेता प्रतिपक्ष अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में देश के प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार आदि को देश को नष्ट करने वाला बता रहे हैं। वे सम्मानित उद्योगपतियों, राष्ट्रवादी संगठन से जुड़े लोगों और मीडिया की हस्तियों को भी देश विरोधियों की सूची में शामिल कर रहे हैं। इस तरह का एक्सट्रीम नैरेटिव पता नहीं उनको कितना चुनावी लाभ पहुंचाएगा लेकिन देश को निश्चित रूप से इसका नुकसान होगा। देश विरोधी शक्तियों को इन बातों से भारत विरोधी की गतिविधियां तेज करने का अवसर मिलता है। नेता प्रतिपक्ष के नाते उनको एक जिम्मेदार व्यक्ति के तौर पर बरताव करना चाहिए। (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)

दिल्ली में 30 को ‘इंडिया’ ब्लॉक की बैठक

नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के मनमाने तरीके से काम करने की ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में आई रिपोर्ट और मुख्य चुनाव आयुक्त के दो चुनाव आयुक्तों से मतभेद की खबरों के बीच विपक्षी गठबंधन यानी ‘इंडिया’ ब्लॉक की एक मीटिंग तय होने की खबर है। शनिवार को बताया गया कि बुधवार, 30 सितंबर को नई दिल्ली में विपक्षी गठबंधन की बैठक हो सकती है। ममता बनर्जी ने इस बैठक की पहल की है। उन्होंने करीब 30 साल के बाद सीपीएम महासचिव एमए बेबी से बात की। उन्होंने कांग्रेस नेता राहुल गांधी से भी विपक्ष की बैठक करने और साझा आंदोलन करने की गुजारिश की थी।

इस बीच राहुल गांधी और ममता बनर्जी दोनों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के ऊपर हमला बोला है। राहुल गांधी ने शनिवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर कहा कि ज्ञानेश कुमार का इस्तेमाल भाजपा के लिए भर्ती करने में किया गया। फिर मोदी और शाह ने उन्हें अंपायर बनाकर भारत के चुनावों में मैच फिक्सिंग का जिम्मा सौंप दिया।

पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ज्ञानेश कुमार पर निशाना साधते हुए उन्हें ‘वैनिश कुमार’ तक कह दिया है। हालांकि एक तरफ ममता बनर्जी और कांग्रेस पार्टी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ बड़े आंदोलन की तैयारी कर रहे हैं तो दूसरी ओर ममता बनर्जी की पार्टी के सांसद कल्याण बनर्जी ने कहा है कि सिर्फ कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी ही ज्ञानेश कुमार को हटा सकती है। उन्होंने कहा कि अगर सीजेपी कोई ठोस चुनौती दे, तो वे ज्ञानेश कुमार को हटा सकते हैं, कोई दूसरी राजनीतिक पार्टी ऐसा नहीं कर सकती। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, सपा, लेफ्ट आदि की बैठक से पहले यह बयान नुकसानदेह है। गौरतलब है कि सीजेपी ने दो अक्टूबर से आंदोलन का ऐलान किया है।

CEC ज्ञानेश कुमार पर आर-पार के मूड में विपक्ष! 30 सितंबर को दिल्ली में INDIA ब्लॉक की बड़ी बैठक

INDIA Bloc Meeting: देश में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और मतदाता सूचियों के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) प्रक्रिया को लेकर जारी घमासान के बीच विपक्षी खेमे से बड़ी खबर सामने आई है। समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और आंतरिक मतभेदों को लेकर रणनीति तैयार करने के लिए 30 सितंबर को नई दिल्ली में INDIA गठबंधन के घटक दलों की एक अहम बैठक बुलाई गई है।

इस बैठक का मुख्य एजेंडा चुनाव आयोग पर एक संयुक्त रुख अपनाना, चुनाव आयुक्तों के बीच सामने आए मतभेदों पर आयोग को घेरना और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ संसद में नया महाभियोग यानी हटाने का प्रस्ताव लाने पर सर्वसम्मति बनाना है।

बंगाल के कट्टर विरोधी TMC और CPI(M) आए एक मंच पर

SIR और चुनाव आयोग के रुख ने पश्चिम बंगाल में एक-दूसरे की धुर विरोधी पार्टियों तृणमूल कांग्रेस (TMC) और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPI-M) को भी इस मुद्दे पर एक साथ ला खड़ा किया है।

सीपीआई(एम) के महासचिव एम. ए. बेबी ने इंडिया ब्लॉक और अन्य विपक्षी नेताओं को पत्र लिखकर तुरंत बैठक बुलाने का अनुरोध किया था। उन्होंने टीएमसी प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से फोन पर बातचीत की। ममता बनर्जी ने इस बात पर सहमति जताई कि चुनाव आयोग के मौजूदा हालात को देखते हुए सभी विपक्षी दलों को एकजुट होकर कार्रवाई करने की सख्त जरूरत है।

चुनाव आयोग में आतंरिक कलह की खबरों ने बढ़ाई सियासी गर्मी

विपक्ष की इस नई लामबंदी के पीछे ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की वह मीडिया रिपोर्ट मानी जा रही है, जिसमें यह दावा किया गया था कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) से जुड़े कई फैसलों और आदेशों पर चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मुख्य चुनाव आयुक्त के समक्ष बार-बार आपत्तियां दर्ज कराई थीं।

राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर CEC ज्ञानेश कुमार पर तीखा हमला बोला है। विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने और SIR प्रक्रिया को तुरंत रोकने की मांग की है।

चुनाव आयोग की सफाई

उठते विवादों के बीच चुनाव आयोग ने बयान जारी कर स्पष्ट किया कि संस्थागत विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय और आपत्तियां आना एक सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है। आयोग के सभी आदेशों को पूर्ण कानूनी मंजूरी प्राप्त है और वैधानिक प्रक्रियाओं का पूरी तरह पालन किया जा रहा है।

ज्ञानेश कुमार के खिलाफ संसद में ‘तीसरा’ रिमूवल नोटिस लाने की तैयारी

विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कानूनी विशेषज्ञों की राय के बाद संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) में एक नया हटाने का नोटिस पेश करने की दिशा में काम कर रहे हैं।

अगर विपक्षी दल यह नोटिस पेश करते हैं, तो मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विपक्ष की तरफ से किया जाने वाला यह तीसरा प्रयास होगा। इससे पहले भी 23 राजनीतिक दलों और एक निर्दलीय सांसद ने SIR प्रक्रिया और चुनाव संबंधी चिंताओं को लेकर सीधे देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) का रुख किया था।

29 सितंबर को कांग्रेस कार्य समिति की अहम बैठक

INDIA गठबंधन की 30 सितंबर की बैठक से ठीक एक दिन पहले, 29 सितंबर 2026 को कांग्रेस कार्य समिति (CWC) की उच्चस्तरीय बैठक होने जा रही है। इस बैठक में कांग्रेस पार्टी चुनाव आयोग और एसआईआर के विवाद पर अपनी रणनीति तय करेगी, जिसे अगले दिन इंडिया ब्लॉक की संयुक्त बैठक में अन्य घटक दलों के सामने रखा जाएगा।