UN के 80 साल के इतिहास में पहली बार कोई महिला महासचिव बन सकती है। फिलहाल इस रेस में कुल 8 दावेदार हैं। इनमें 5 महिलाएं हैं। शुक्रवार को हुई दूसरे दौर की अनौपचारिक वोटिंग में गुयाना की कैरोलिन रोड्रिग्स बिर्केट सबसे आगे हैं। वहीं दूसरे पायदान पर कोस्टा रिका की रेबेका ग्रिन्सपैन हैं। संयुक्त राष्ट्र के मौजूदा महासचिव एंतोनियो गुटेरेस का दूसरा पांच साल का कार्यकाल 31 दिसंबर 2026 को खत्म होगा। इसलिए अगला महासचिव चुनने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। UN महासचिव का चुनाव कैसे होता है? महासचिव बनने के लिए UNSC के स्थायी सदस्यों का साथ जरूरी विकसित देशों से महासचिव क्यों नहीं बनता ? 1. हर इलाके को मौका देने की कोशिश संयुक्त राष्ट्र में यह कोशिश रहती है कि महासचिव का पद दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के देशों को मिलता रहे। यानी हर बार एक ही इलाके के व्यक्ति को यह पद न मिले। इससे बाकी देशों को भी लगता है कि संयुक्त राष्ट्र सबका है। 1997 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने भी कहा था कि महासचिव चुनते समय अलग-अलग क्षेत्रों को मौका देने और महिला-पुरुष बराबरी का ध्यान रखा जाना चाहिए। हालांकि, यह कोई पक्का नियम नहीं है। 2. महासचिव किसी एक बड़े देश का आदमी न लगे महासचिव को पूरी दुनिया का चेहरा माना जाता है। इसलिए अगर अमेरिका या चीन जैसी बड़ी ताकत के किसी बड़े नेता को यह पद मिल जाए, तो दूसरे देशों को डर हो सकता है कि संयुक्त राष्ट्र पर उस देश का असर बढ़ जाएगा। इसी वजह से ऐसे व्यक्ति को तरजीह मिलती है, जिसे किसी एक बड़ी ताकत के करीब न माना जाए। 3. एशिया-अफ्रीका के देशों की संख्या ज्यादा संयुक्त राष्ट्र में कुल 193 देश हैं। इनमें एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के बहुत से देश हैं। इन देशों की भी इच्छा रहती है कि संयुक्त राष्ट्र का मुखिया सिर्फ यूरोप या अमेरिका की सोच वाला न हो, बल्कि दुनिया के बाकी हिस्सों की आवाज भी समझता हो। लेकिन ऐसा नहीं है कि विकसित देशों के लोगों को कभी मौका ही नहीं मिला। 1991 में कनाडा, नीदरलैंड और नॉर्वे के उम्मीदवार भी महासचिव पद की दौड़ में थे। 2016 में पुर्तगाल के एंतोनियो गुटेरेस महासचिव बने। उस समय पूर्वी यूरोप से महासचिव बनाने की मांग भी काफी जोर पकड़ रही थी। 2006 में शशि थरूर भी भारत से दावेदार रहे भारत के सांसद शशि थरूर भी UN महासचिव पद के दावेदार रह चुके हैं। 2006 में मनमोहन सिंह सरकार ने उन्हें UN महासचिव पद के लिए उम्मीदवार बनाया था। थरूर 1978 से UN में काम कर रहे थे। भारत ने उनके लंबे UN अनुभव और अंतरराष्ट्रीय मामलों की समझ को उनकी ताकत बताया। साथ ही, भारत ने कहा कि अब अगला महासचिव एशिया से होना चाहिए। भारत ने दुनियाभर में थरूर के लिए समर्थन जुटाया। मनमोहन सिंह ने कई देशों के नेताओं को पत्र लिखे, जबकि थरूर ने खुद भी अलग-अलग देशों के नेताओं से मुलाकात की। हालांकि, वे महासचिव नहीं बन सके। अनौपचारिक वोटिंग में थरूर दूसरे नंबर पर रहे, जबकि दक्षिण कोरिया के बान की-मून लगातार सबसे आगे रहे। —————— यह खबर भी पढ़ें… संयुक्त राष्ट्र में इजराइली राजदूत ने UN अफसर को फटकारा:यौन हिंसा से जुड़ी रिपोर्ट में इजराइल का नाम आने से नाराज थे संयुक्त राष्ट्र (UN) में शुक्रवार को एक बैठक के दौरान इजराइल के राजदूत डैनी डैनन और UN महासचिव की विशेष प्रतिनिधि प्रमिला पैटन के बीच तीखी बहस हो गई। पूरी खबर पढ़ें…
UN के 80 साल के इतिहास में पहली बार कोई महिला महासचिव बन सकती है। फिलहाल इस रेस में कुल 8 दावेदार हैं। इनमें 5 महिलाएं हैं। शुक्रवार को हुई दूसरे दौर की अनौपचारिक वोटिंग में गुयाना की कैरोलिन रोड्रिग्स बिर्केट सबसे आगे रहीं। वहीं कोस्टा रिका की रेबेका ग्रिन्सपैन दूसरे नंबर पर रहीं। संयुक्त राष्ट्र के मौजूदा महासचिव एंतोनियो गुटेरेस का दूसरा पांच साल का कार्यकाल 31 दिसंबर 2026 को खत्म होगा। इसलिए अगले महासचिव को चुनने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। UN महासचिव का चुनाव कैसे होता है? महासचिव बनने के लिए UNSC के स्थायी सदस्यों का साथ जरूरी वोटिंग की प्रक्रिया अनौपचारिक वोटिंग में UNSC के 15 सदस्य हर उम्मीदवार के लिए अपनी राय देते हैं। इसमें तीन विकल्प होते हैं: 1. समर्थन
2. विरोध
3. कोई राय नहीं इसका मतलब यह है कि हर देश को उम्मीदवार के पक्ष या विपक्ष में ही वोट देना जरूरी नहीं है। वह ‘कोई राय नहीं’ भी चुन सकता है। जैसे 30 जुलाई की पहली अनौपचारिक वोटिंग में रेबेका ग्रिन्सपैन को सबसे ज्यादा समर्थन मिला था। उन्हें 10 देशों का समर्थन, 1 का विरोध और 4 देशों ने कोई राय नहीं दी थी। 21 अगस्त की अनौपचारिक वोटिंग में कैरोलिन रोड्रिग्स बिर्केट सबसे आगे रहीं। उन्हें 8 देशों का समर्थन, 3 का विरोध और 4 देशों ने कोई राय नहीं दी। हालांकि इन वोटिंग के ये आंकड़े अंतिम चुनाव के नतीजे नहीं होते। इनका मकसद सिर्फ यह पता लगाना होता है कि कौन उम्मीदवार सबसे मजबूत स्थिति में है और किसके नाम पर UNSC में सहमति बन सकती है। विकसित देशों से महासचिव क्यों नहीं बनता ? 1. हर इलाके को मौका देने की कोशिश संयुक्त राष्ट्र में यह कोशिश रहती है कि महासचिव का पद दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के देशों को मिलता रहे। यानी हर बार एक ही इलाके के व्यक्ति को यह पद न मिले। इससे बाकी देशों को भी लगता है कि संयुक्त राष्ट्र सबका है। 1997 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने भी कहा था कि महासचिव चुनते समय अलग-अलग क्षेत्रों को मौका देने और महिला-पुरुष बराबरी का ध्यान रखा जाना चाहिए। हालांकि, यह कोई पक्का नियम नहीं है। 2. महासचिव किसी एक बड़े देश का आदमी न लगे महासचिव को पूरी दुनिया का चेहरा माना जाता है। इसलिए अगर अमेरिका या चीन जैसी बड़ी ताकत के किसी बड़े नेता को यह पद मिल जाए, तो दूसरे देशों को डर हो सकता है कि संयुक्त राष्ट्र पर उस देश का असर बढ़ जाएगा। इसी वजह से ऐसे व्यक्ति को प्रायोरिटी मिलती है, जिसे किसी एक बड़ी ताकत के करीब न माना जाए। 3. एशिया-अफ्रीका के देशों की संख्या ज्यादा संयुक्त राष्ट्र में कुल 193 देश हैं। इनमें एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के बहुत से देश हैं। इन देशों की भी इच्छा रहती है कि संयुक्त राष्ट्र का मुखिया सिर्फ यूरोप या अमेरिका की सोच वाला न हो, बल्कि दुनिया के बाकी हिस्सों की आवाज भी समझता हो। लेकिन ऐसा नहीं है कि विकसित देशों के लोगों को कभी मौका ही नहीं मिला। 1991 में कनाडा, नीदरलैंड और नॉर्वे के उम्मीदवार भी महासचिव पद की दौड़ में थे। 2016 में पुर्तगाल के एंतोनियो गुटेरेस महासचिव बने। उस समय पूर्वी यूरोप से महासचिव बनाने की मांग भी काफी जोर पकड़ रही थी। 2006 में शशि थरूर भी भारत से दावेदार रहे भारत के सांसद शशि थरूर भी संयुक्त राष्ट्र महासचिव पद की दौड़ में शामिल रह चुके हैं। 2006 में मनमोहन सिंह सरकार ने उन्हें भारत की ओर से उम्मीदवार बनाया था। उस समय थरूर का सबसे बड़ा मजबूत पक्ष उनका लंबा संयुक्त राष्ट्र अनुभव था। वे 1978 से संयुक्त राष्ट्र में काम कर रहे थे। भारत ने उनकी अंतरराष्ट्रीय मामलों की समझ और संयुक्त राष्ट्र में लंबे अनुभव को देखते हुए उनकी उम्मीदवारी रखी थी। भारत का यह भी तर्क था कि अब महासचिव का पद एशिया को मिलना चाहिए। थरूर के समर्थन में भारत ने कई देशों से संपर्क किया। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने दूसरे देशों के नेताओं को पत्र लिखे, जबकि थरूर ने भी अलग-अलग देशों के नेताओं से मुलाकात कर समर्थन जुटाया। अमेरिका के विरोध की वजह से हारे थरूर 2006 में हुई अनौपचारिक वोटिंग के हर दौर में थरूर दक्षिण कोरिया के बान की-मून के बाद दूसरे नंबर पर रहे। पहली वोटिंग में बान की-मून को 12 और थरूर को 10 वोट मिले थे। थरूर के मुताबिक, इन 10 वोटों में चीन का वोट भी शामिल था। बाद की वोटिंग में चीन ने उनके खिलाफ वीटो का इस्तेमाल नहीं किया। आखिरी वोटिंग में थरूर को 10 देशों का समर्थन मिला, जबकि 3 देशों ने उनके खिलाफ वोट दिया। इनमें अमेरिका भी शामिल था। अमेरिका UNSC के पांच स्थायी सदस्यों में से एक है और उसके पास वीटो पावर है। आखिरकार बान की-मून महासचिव चुने गए। थरूर ने बाद में लिखा कि उनकी उम्मीदवारी को रोकने में अमेरिका की भूमिका थी। उनके मुताबिक, अमेरिका बान की-मून के समर्थन में था और उसने दूसरे सुरक्षा परिषद सदस्यों के बीच भी उनके पक्ष में समर्थन जुटाया। थरूर के अनुसार, अमेरिका के रुख के पीछे दक्षिण कोरिया के साथ उसके रिश्ते और उस समय कोफी अन्नान के साथ अमेरिकी रिश्तों में आई खटास जैसे कारण भी थे। —————— यह खबर भी पढ़ें… UN में चीफ गुटेरेस की जगह किसे मिलेगी:आज दूसरे दौर की वोटिंग, रेस में 8 दावेदार, कोस्टा रिका की ग्रिन्सपैन सबसे आगे संयुक्त राष्ट्र के मौजूदा महासचिव एंतोनियो गुटेरेस का दूसरा पांच साल का कार्यकाल 31 दिसंबर 2026 को खत्म होगा। उनके बाद अगला महासचिव चुनने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। इस पद के लिए इस समय 8 उम्मीदवार मैदान में हैं। पूरी खबर पढ़ें…

भारत में विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा सोनिया गांधी की जिंदगी पर आधारित उनकी किताब Belonging 10 नवंबर को प्रकाशित होगी, लेकिन इसके पहले ही इसे लेकर राजनीतिक गलियारों में जमकर हलचल है। सोनिया की इस किताब में उनकी राजनीति से लेकर उनकी जिंदगी, उनका संघर्ष और और निजी जीवन का भी जिक्र है। इसमें इटली से भारत तक के उनके सफ़र का ज़िक्र किया गया है। यह किताब प्यार, नुकसान और उन राजनीतिक फैसलों की निजी कहानी बताती है।
इसके साथ ही किताब उनके जीवन के साथ-साथ भारत में करीब छह दशकों के दौरान हुए सामाजिक और राजनीतिक बदलावों को देखने का एक अलग नजरिया भी देती है। अल्फ्रेड ए. नॉफ़ द्वारा रिलीज़ की जाने वाली 544 पन्नों की इस किताब को एक “खुलासा करने वाली” यादों की किताब बताया जा रहा है, जो युद्ध के बाद के इटली से भारत तक के उनके जीवन का सफ़र बताती है और एक बेहद निजी और राजनीतिक कहानी सुनाती है।
पेंगुइन रैंडम हाउस की वेबसाइट पर इसके बारे में कहा गया है कि यह “एक हैरान करने वाली यादों की किताब है जो प्यार, परिवार का एक बेहद दिलचस्प तरीके से जिक्र करती है। इसमें कहा गया है कि किताब में इटली में गांधी के शुरुआती सालों और राजीव गांधी से उनकी शादी से लेकर उनके संघर्षों तक का ज़िक्र होगा।
हिंदी, साड़ी और गांधी परिवार : जानकारी अनुसार, यह किताब इंग्लैंड के कैम्ब्रिज से शुरू होती है, जहां “1965 में उन्नीस साल की छात्रा सोनिया माइनो को पहली नज़र में ही प्यार हो जाता है”- भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के पोते राजीव गांधी से। इसमें बताया गया है कि किताब में उनकी प्रभावशाली सास, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से उनकी मुलाकात का ज़िक्र है और दिखाया गया है कि कैसे राजीव के साथ रहते हुए सोनिया का आत्मविश्वास बढ़ता है और वह हिंदी बोलना, साड़ी पहनना और भारतीय खाने का मज़ा लेना सीखती हैं।
राजीव की हत्या और संजय की प्लैन क्रैश में मौत : बता दें कि इस किताब में उन दुखद घटनाओं का भी ज़िक्र है जो राजीव गांधी के भाई संजय की प्लेन क्रैश में मौत और 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद गांधी परिवार पर गुज़रीं। अपनी माँ की मौत के बाद और सोनिया के डर के बावजूद, राजीव प्रधानमंत्री बने, और सात साल बाद राजीव की भी चुनाव प्रचार के दौरान एक आत्मघाती हमलावर द्वारा हत्या कर दी गई। इसमें यह भी बताया गया है कि सोनिया ने कई सालों तक राजनीति में आने के दबाव का विरोध किया, लेकिन बाद में वह इंडियन नेशनल कांग्रेस की सबसे लंबे समय तक अध्यक्ष रहीं। एक अहम चुनाव के बाद जब पार्टी ने उन्हें प्रधानमंत्री बनाने का फैसला किया, तो उन्होंने इस पद को ठुकराने का ‘हैरान करने वाला फैसला’ लिया और इसके बजाय उस गठबंधन में अपनी पार्टी का नेतृत्व किया जिसने एक दशक तक देश पर शासन किया।
2004 में PM की कुर्सी ठुकराई थी : बता दें कि 2004 में कांग्रेस ने 14 सहयोगी दलों के साथ UPA बनाया। चुनाव के बाद लेफ्ट समेत कई दलों के समर्थन से UPA को 335 सांसदों का समर्थन मिला। सहयोगियों ने सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनाने का समर्थन किया, लेकिन उन्होंने 18 मई 2004 को पद ठुकरा दिया। इसके बाद मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने।
परदे के पीछे बागडोर : NDA ने सोनिया के विदेशी नागरिक का मुद्दा उठाकर उनके पीएम बनने का विरोध किया। इसके कारण सोनिया ने पीएम पद ठुकरा दिया और मनमोहन सिंह को पीएम बनाने का प्रस्ताव रखा। मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बनें। हालांकि, कहा जाता है कि पर्दे के पीछे रहकर सरकार की बागडोर सोनिया के हाथों में ही थी।
किताब के बारे में प्रकाशक का कहना है कि यह किताब आज़ादी के बाद के इतिहास, मौजूदा राजनीतिक संघर्षों और 60 सालों में हुए आर्थिक और सामाजिक बदलावों के ज़रिए “भारत को एक अनोखे नज़रिए से” दिखाती है, साथ ही सोनिया गांधी की निजी खुशियों और मुश्किलों की एक करीबी तस्वीर भी पेश करती है। अल्फ्रेड ए. नॉफ़, नॉफ़ डबलडे पब्लिशिंग ग्रुप का एक इम्प्रिंट है, जो पेंगुइन रैंडम हाउस का एक डिवीज़न है।
भारत 15 अगस्त को अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाने की तैयारी कर रहा है, ऐसे में देश के सबसे मशहूर स्वतंत्रता सेनानियों में से एक, नेताजी सुभाष चंद्र बोस चर्चा में आ गए हैं। दरअसल, मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से बोस की बेटी अनीता बी. फाफ की उस याचिका पर जवाब मांगा है, जिसमें टोक्यो के रेनकोजी मंदिर से उनकी “अस्थियां” वापस लाने के लिए निर्देश देने की मांग की गई है।
हालांकि अगस्त 1945 में नेताजी के गायब होने को लेकर कई तरह की बातें कही जाती रही हैं, लेकिन कुछ रिपोर्टों में यह संकेत दिया गया है कि उनके अवशेष जापान के टोक्यो स्थित रेनकोजी मंदिर में सुरक्षित रखे गए हैं। लेकिन, बोस की अस्थियां जापान में क्यों रखी गई हैं? आइए, हम आपको बताते हैं।
नेताजी की अस्थियां कहां हैं?
आम तौर पर यह माना जाता है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत ताइवान में एक विमान दुर्घटना में हुई थी। 2017 में जारी एक RTI के जवाब में बताया गया था कि शाह नवाज कमेटी, जस्टिस जीडी खोसला कमीशन और जस्टिस मुखर्जी जांच आयोग की रिपोर्टों पर विचार करने के बाद, सरकार इस नतीजे पर पहुंची थी कि नेताजी की मौत 18 अगस्त 1945 को विमान दुर्घटना में हुई थी।
आधिकारिक बयानों के अनुसार, यह माना जाता है कि बोस की मौत 18 अगस्त 1945 को हुई थी। बयानों में यह भी बताया गया है कि दुर्घटना के बाद बोस बुरी तरह जल गए थे और दो दिन बाद उनकी मौत हो गई। ताइवान में उनके पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार किया गया और उनकी अस्थियां जापान लाई गईं, जहां टोक्यो इंडियन इंडिपेंडेंस लीग को उनकी अस्थियों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी सौंपी गई। आधिकारिक दस्तावेजों के मुताबिक, एक श्रद्धांजलि सभा के बाद 14 सितंबर 1945 को उन्हें रेनकोजी मंदिर में रखा गया था।
अवशेषों वाला कलश मंदिर के पुजारी रेवरेंड क्योई मोचिज़ुकी को सौंपा गया था, जिन्होंने उन्हें तब तक सुरक्षित रखने का वादा किया था जब तक कि उन्हें वापस भारत न ले जाया जा सके। दशकों बाद भी, वह वादा नेताजी से जुड़े रहस्य का अहम हिस्सा बना हुआ है।
हर साल नेताजी की पुण्यतिथि पर, रेनकोजी मंदिर में उनके सम्मान में एक श्रद्धांजलि सभा आयोजित की जाती है। इस समारोह में भारतीय दूतावास के अधिकारियों सहित कई प्रमुख जापानी और भारतीय नागरिक शामिल होते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत मंदिर में नेताजी के अवशेषों की देखभाल का खर्च भी उठाता रहा है?
सरकार द्वारा 2016 में जारी की गई नेताजी से जुड़ी सार्वजनिक की गई फाइलों के अनुसार, भारत ने 1967 और 2005 के बीच उनकी देखभाल के लिए मंदिर को 52,66,278 रुपये का भुगतान किया था।
नेताजी के परिवार का क्या कहना है?
पिछले कुछ वर्षों में, नेताजी के परिवार के कई सदस्यों – जिनमें उनके भाई, बेटी और अन्य शामिल हैं – ने भारत सरकार से अनुरोध किया है कि वह नेताजी की अस्थियों को जापान से वापस लाए। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, बोस के छोटे भाई ने 1982 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पत्र लिखकर उनकी अस्थियों को वापस लाने का आदेश देने का अनुरोध किया था।
इसी तरह, मई 1990 में बोस के भतीजों – अशोक नाथ बोस, अमिया नाथ बोस और सुब्रत बोस – ने तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह को पत्र लिखा था। 2007 में, नेताजी की बेटी फाफ ने डॉ. मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर पूछा था कि भारतीय सरकार उनके पिता के अवशेषों को वापस लाने की प्रक्रिया में किस तरह शामिल होने का इरादा रखती है।
बोस के प्रपौत्र और लेखक आशीष रे ने 2018 में पीटीआई को बताया, “नेहरू सरकार से लेकर मोदी सरकार तक, भारत की हर सरकार सच्चाई से वाकिफ रही है, लेकिन उसने अवशेषों को भारत लाने की बात कही है।” गौरतलब है कि बोस के परिवार ने लगातार सरकारों से उनकी अस्थियों को भारत वापस लाने का आग्रह किया है। कई दशकों के दौरान, विभिन्न सरकारों ने भी उनके अवशेषों को वापस लाने के प्रयास किए हैं।
Independence Day 2026: हमारा देश 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजी हुकूमत से आजाद हुआ था। लंबे संघर्ष के बाद मिली आजादी से सभी उत्साहित थे। यह उत्साह आजादी के 79 साल पूरे होने के बाद आज भी कायम है। इस साल 15 अगस्त 2026 को भारत अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाएगा। इस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराकर आजादी के जश्न की शुरुआत करेंगे। नई दिल्ली स्थित लाल किले पर झंडा फहराना एक ऐसी परंपरा है, जो 1947 के पहले से चली आ रही है। आइए आज जानें कि लाल किले पर पहली पर किसने 15 अगस्त को तिरंगा फहराया था।
इतिहास के पन्नों से
आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 16 अगस्त, 1947 को पहली बार लाल किले पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया था। तब से लाल किले पर तिरंगा फहराना भारतीय स्वतंत्रता और हमारे गौरव का प्रतीक बन गया है। भारत को 15 अगस्त, 1947 को आधी रात को आजादी मिली थी, लेकिन लाल किले पर झंडा 16 अगस्त, 1947 को सुबह 8:30 बजे फहराया गया था। 15 अगस्त, 1947 को आधिकारिक स्वतंत्रता दिवस पर, मुख्य झंडा फहराने की रस्म आधी रात को कॉन्स्टिट्यूएंट असेंबली (बाद में संसद भवन) में हुई थी। इसके बाद शाम को इंडिया गेट के पास एक और रस्म हुई। लाहौरी गेट की प्राचीर से नेहरू के भाषण ने भारत के सालाना स्वतंत्रता दिवस समारोह के लिए एक मिसाल कायम की, जहां प्रधानमंत्री हर 15 अगस्त को राष्ट्रीय झंडा फहराते हैं और देश को संबोधित करते हैं।
सबसे ज्यादा बार पंडित नेहरू ने फहराया तिरंगा
पंडित नेहरू ने 1947 से 17 बार लाल किले पर झंडा फहराया है, जो हमारी स्वतंत्रता के 79 सालों में किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा सबसे ज्यादा बार फहराया गया है। इस मामले में उनकी बेटी इंदिरा गांधी दूसरे नंबर पर हैं, जिन्होंने 16 बार तिरंगा फहराया है। इसके बाद, श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने छह बार लाल किले पर झंडा फहराया है, उनके बाद राजीव गांधी और पीवी नरसिम्हा राव – पांच-पांच बार, लाल बहादुर शास्त्री ने 1964 और ’65 में, मोरारजी देसाई ने 1977 और ’78 में, चरण सिंह ने 1979 में, श्री वीपी सिंह – 1990 में, श्री एचडी देवेगौड़ा – 1996 में और श्री इंद्र कुमार गुजराल – 1997 में।
चंद्रशेखर ने कभी नहीं फहराया लाला किले पर झंडा
दिलचस्प बात यह है कि गुलजारी लाल नंदा ने, अंतरिम प्रधानमंत्री के तौर पर अपने दो छोटे कार्यकाल में, चंद्रशेखर के अलावा कभी झंडा नहीं फहराया। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह 15 अगस्त, 2007 को 10 बार लाल किले पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया। इसके बाद वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से अब तक 12 बार तिरंगा फहरा चुके हैं। इस साल देश के स्वाधीनता दिवस की 80वीं वर्षगांठ पर वह 13वीं बार ध्वजारोहण करेंगे।
पुणे में शनिवार को एक समारोह आयोजित किया गया। इस समारोह में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल को लोकमान्य तिलक नेशनल अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। वहीं इस दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि पिछले 12 वर्षों में भारत की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने कहा कि इस दौरान देश की सेनाओं की रक्षा और जवाबी कार्रवाई की क्षमता में बड़ा सुधार हुआ है। बता दें कि, यह पुरस्कार हर साल 1 अगस्त को लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की पुण्यतिथि पर देश और समाज के लिए बेहतरीन काम करने वाले लोगों को दिया जाता है।
अजीत डोभाल को मिला सम्मान
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने आगे कहा कि भारत की विदेश नीति को मजबूत बनाने में भी डोभाल का बड़ा योगदान रहा है। शाह के अनुसार, राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के महत्वपूर्ण फैसलों में अजीत डोभाल की सलाह और भूमिका अहम रही है। भारत अब लोकमान्य तिलक के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के विचारों पर आगे बढ़ रहा है और सरकार इस रास्ते पर मजबूती से काम करती रहेगी। अमित शाह ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में नरेंद्र मोदी सरकार ने देश की सेनाओं की रक्षा और जवाबी कार्रवाई की क्षमता को नई मजबूती दी है। इस बदलाव में अजीत डोभाल का योगदान बेहद महत्वपूर्ण रहा है।”
अमित शाह ने कहा कि साल 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरकार बनने के बाद सबसे पहले अजीत डोभाल को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) नियुक्त करने का फैसला लिया था। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीय सेनाओं को आधुनिक बनाने, उनकी कार्यप्रणाली में सुधार लाने, नई तकनीक अपनाने और उनकी संचालन क्षमता को मजबूत करने के लिए कई बड़े फैसले किए। शाह के अनुसार, इन सभी महत्वपूर्ण कदमों में अजीत डोभाल ने सलाहकार के रूप में अहम भूमिका निभाई। गृह मंत्री ने कहा कि भारत की विदेश नीति को मजबूत बनाने में भी अजीत डोभाल का बड़ा योगदान रहा है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हर महत्वपूर्ण फैसले में डोभाल की सलाह और भूमिका महत्वपूर्ण रही है।
कब शुरू हुआ था यह सम्मान?
तिलक स्मारक ट्रस्ट ने बताया कि लोकमान्य तिलक राष्ट्रीय पुरस्कार की शुरुआत वर्ष 1983 में हुई थी। यह सम्मान सबसे पहले समाजवादी नेता एस. एम. जोशी को दिया गया था। यह पुरस्कार हर वर्ष 1 अगस्त को स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक की पुण्यतिथि पर उन व्यक्तियों को दिया जाता है, जिन्होंने देश की प्रगति और विकास में उल्लेखनीय योगदान दिया हो।
इस हस्तियों को मिल चुका है सम्मान
सबसे पहले यह पुरस्कार समाजवादी नेता एसएम जोशी को प्रदान किया गया था। पिछले वर्षों में यह पुरस्कार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह और इंदिरा गांधी, पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और एनसीपी के वरिष्ठ नेता शरद पवार सहित कई प्रतिष्ठित हस्तियों को मिल चुका है।

Coal Block Allocation Case: कोयला ब्लॉक आवंटन (कोलगेट) मामले में देश के पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत डॉ. मनमोहन सिंह को सुप्रीम कोर्ट से बहुत बड़ी राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने बुधवार को मनमोहन सिंह के खिलाफ चल रहे आपराधिक मामले को पूरी तरह से बंद कर दिया है। इसके साथ ही अदालत ने उन्हें बतौर आरोपी समन भेजने वाले पुराने आदेशों को भी रद्द कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सीबीआई द्वारा दाखिल 'क्लोजर रिपोर्ट' को स्वीकार कर लिया, जिसमें डॉ. मनमोहन सिंह और अन्य को क्लीन चिट दी गई थी।
उच्चतम न्यायालय की तीन न्यायाधीशों की पीठ, जिसमें देश के प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल हैं, ने बुधवार को इस मामले की सुनवाई करते हुए इसे आधिकारिक तौर पर बंद कर दिया। जांच एजेंसी सीबीआई ने इस मामले की विस्तृत जांच के बाद अदालत में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की थी। ALSO READ: 'अगर आप ऐसा सोचते हैं तो मैं आत्महत्या कर लूंगा…' मनमोहन सिंह को लेकर SY कुरैशी की नई किताब में बड़ा खुलासा
मनमोहन के खिलाफ नहीं मिला कोई सबूत
अपनी रिपोर्ट में सीबीआई ने स्पष्ट किया था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री और कोयला मंत्रालय का प्रभार संभाल रहे डॉ. मनमोहन सिंह के खिलाफ आपराधिक षड्यंत्र या पद के दुरुपयोग का कोई सबूत नहीं मिला है। शीर्ष अदालत ने सीबीआई की इस रिपोर्ट को कानून के दायरे में सही मानते हुए स्वीकार कर लिया और उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया।
शीर्ष अदालत ने विशेष सीबीआई अदालत के उस पुराने आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसके तहत पूर्व प्रधानमंत्री को आरोपी के रूप में अदालत में पेश होने का समन जारी किया गया था। पीठ ने कहा कि पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव में किसी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखना उचित नहीं है। इस फैसले के बाद मनमोहन सिंह के खिलाफ चल रहे इस कानूनी विवाद का स्थायी पटाक्षेप हो गया है।
क्या है यह पूरा मामला?
यह मामला संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA-1) सरकार के कार्यकाल के दौरान वर्ष 2005 में ओडिशा के 'तालाबीरा II' (Talabira II) कोयला ब्लॉक के आवंटन से जुड़ा हुआ है। उस समय कोयला मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के पास ही था।
आरोप लगाया गया था कि नियमों की अनदेखी करते हुए तालाबीरा II कोयला ब्लॉक उद्योगपति कुमार मंगलम बिड़ला की कंपनी 'हिंडाल्को' (Hindalco) को आवंटित कर दिया गया। सीबीआई ने शुरुआत में इस मामले में प्राथमिकी (FIR) दर्ज की थी, लेकिन बाद में साक्ष्य न मिलने पर क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की थी।
Coal allocation case: सुप्रीम कोर्ट ने कोयला ब्लॉक आवंटन मामले में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के खिलाफ जारी आपराधिक मामला बुधवार (29 जुलाई) को बंद कर दिया। साथ ही उन्हें आरोपी के रूप में तलब करने वाले आदेश रद्द कर दिए। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची तथा जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की उस क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया, जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री सिंह और अन्य को क्लीन चिट दी गई थी।
शीर्ष अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट के जज के पास सीबीआई की ‘क्लोजर रिपोर्ट’ को खारिज कर संज्ञान लेने का कोई कारण नहीं था। पीठ ने कहा, “अपीलकर्ता के दुर्भाग्यपूर्ण निधन के कारण यह अपील निष्फल मानकर समाप्त की जा सकती थी। लेकिन विशेष जज द्वारा संज्ञान लेने और अपीलकर्ता को तलब करने के पहलू पर विचार करने के लिए हमने सीबीआई द्वारा दाखिल दोनों क्लोजर रिपोर्टों का अध्ययन किया।”
अदालत ने आगे कहा, “जांच एजेंसी की रिपोर्ट स्वीकार करने के संबंध में इस अदालत द्वारा लगातार तय किए गए मानकों को ध्यान में रखते हुए हम संतुष्ट हैं कि विशेष जज के पास सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को अस्वीकार कर संज्ञान लेने का कोई कारण नहीं था। हम अपील स्वीकार करते हैं और विवादित आदेश को रद्द करते हैं। परिणामस्वरूप, हम सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार करते हुए मामले को बंद करते हैं।”
क्या है पूरा मामला?
वर्ष 2005 में ओडिशा के तालाबीरा-II कोयला ब्लॉक आवंटन से संबंधित कथित कोयला घोटाले में एक विशेष अदालत ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, उद्योगपति कुमार मंगलम बिड़ला, पूर्व कोयला सचिव पी. सी. पारेख और तीन अन्य लोगों को आरोपी के रूप में तलब किया था। हालांकि, अदालत ने इस आदेश में हस्तक्षेप करते हुए इस पर रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने 1 अप्रैल 2015 को सिंह के खिलाफ कार्यवाही पर रोक लगा दी थी।
सिंह ने समन को चुनौती देते हुए कहा था कि आवंटन से जुड़े उनके फैसले में कोई आपराधिकता नहीं थी। उनके वकील ने सरकारी कर्मचारी पर मुकदमा चलाने के लिए ज़रूरी मंजूरी न होने का सवाल भी उठाया था। इससे पहले की कार्यवाही के दौरान सीनियर वकील कपिल सिब्बल ने कोयला ब्लॉक आवंटित करने के मनमोहन सिंह के फैसले का बचाव करते हुए कहा था कि यह कार्रवाई प्रशासनिक प्रकृति की थी।
कार्यवाही में मनमोहन सिंह का पक्ष रखते हुए सिब्बल ने बेंच से कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री के खिलाफ की गई प्रतिकूल टिप्पणियों को रिकॉर्ड पर नहीं रहने दिया जाना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि भले ही सिंह की मृत्यु से तकनीकी रूप से अपील समाप्त हो सकती है। फिर भी कोर्ट को उनके खिलाफ की गई टिप्पणियों पर विचार करना चाहिए।


