Independence Day 2026: 15 अगस्त को प्रधानमंत्री लाल किले पर क्यों फहराते हैं तिरंगा? इस साल देश मनाएगा 80वां स्वतंत्रता दिवस

Independence Day 2026: हर साल 15 अगस्त को, भारत के प्रधानमंत्री लाल किले पर तिरंगा फहराते हैं। यह पल अंग्रेजों से लंबे संघर्ष के बाद मिली आजादी को याद दिलाता है और देश को अपना स्वतंत्रता दिवस मनाने के लिए एक करता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि 15 अगस्त को प्रधानमंत्री ही क्यों झंडा फहराते हैं, जबकि राष्ट्रपति गणतंत्र दिवस पर इसे फहराते हैं? दोनों समारोह एक जैसे लग सकते हैं, लेकिन ये आजाद भारत के इतिहास में दो अलग-अलग मील के पत्थर हैं।

स्वतंत्रता दिवस, 15 अगस्त को, प्रधानमंत्री लाल किले पर राष्ट्रीय ध्वज फहराते हैं। गणतंत्र दिवस, 26 जनवरी को, राष्ट्रपति कर्तव्य पथ पर तिरंगा फहराते हैं। अंतर इस बात में है कि दोनों दिन क्या दर्शाते हैं: 1947 में भारत की स्वतंत्रता और 1950 में संविधान को अपनाना।

स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री झंडा क्यों फहराते हैं?

15 अगस्त वह दिन है जब भारत 1947 में ब्रिटिश शासन से स्वतंत्र हुआ था। लाल किले पर झंडा फहराने का समारोह ब्रिटिश शासन के खिलाफ लंबे संघर्ष के बाद भारत की स्वतंत्रता को दर्शाता है। आजाद भारत में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने दिल्ली में लाल किले के लाहौरी गेट के ऊपर राष्ट्रीय झंडा फहराया था। तब से, प्रधानमंत्री पारंपरिक रूप से स्वतंत्रता दिवस पर झंडा फहराते हैं और देश को संबोधित करते हैं। प्रधानमंत्री झंडे के खंभे के नीचे से झंडा फहराते हैं, जिसके बाद राष्ट्रगान होता है। यह समारोह स्वतंत्रता दिवस की मुख्य परंपराओं में से एक है और पूरे देश में इसे देखा जाता है।

गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रपति फहराते हैं तिरंगा

गणतंत्र दिवस आजाद भारत के इतिहास में एक अलग महत्वपूर्ण पल का प्रतीक है। 26 जनवरी, 1950 को, भारत का संविधान लागू हुआ, जिसने भारत सरकार अधिनियम, 1935 की जगह ली, और भारत एक गणतंत्र बन गया। यह दिन संविधान को अपनाने की याद में मनाया जाता है और हर साल भारत के राष्ट्रीय कार्यक्रमों में से एक के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर पर, राष्ट्रपति कर्तव्य पथ पर राष्ट्रीय झंडा फहराते हैं। झंडा पहले से ही झंडे के खंभे के ऊपर बंधा होता है और समारोह के दौरान इसे फहराया जाता है। इस आयोजन के बाद रिपब्लिक डे परेड होती है, जिसमें भारत की संस्कृतिक विविधता, सैन्य ताकत और नेशनल अचीवमेंट्स को दिखाया जाता है।

दोनों आयोजनों में मूल अंतर

15 अगस्त और 26 जनवरी दोनों ही राष्ट्रीय दिवस हैं, जिनका भारत के इतिहास में अहम स्थान है। हर साल 15 अगस्त को मनाया जाने वाला स्वतंत्रता दिवस 1947 में ब्रिटिश राज से भारत की आजादी का प्रतीक है। वहीं, 26 जनवरी को मनाया जाने वाला गणतंत्र दिवस देश में एक संविधान लागू होने की घटना का प्रतीक है।

15 अगस्त को प्रधानमंत्री का झंडा फहराने का समारोह देश की आजादी और उसके लिए हुए संघर्ष से जुड़ा है। 26 जनवरी को राष्ट्रपति का झंडा फहराने का समारोह भारत की संवैधानिक और गणतंत्र पहचान से जुड़ा है।

Independence Day 2026: स्वतंत्रता दिवस पर सबसे पहले किसने लाल किले पर फहराया था तिरंगा? जानें इतिहास में दर्ज इस घटना के बारे में

Independence Day 2026: स्वतंत्रता दिवस पर सबसे पहले किसने लाल किले पर फहराया था तिरंगा? जानें इतिहास में दर्ज इस घटना के बारे में

Independence Day 2026: हमारा देश 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजी हुकूमत से आजाद हुआ था। लंबे संघर्ष के बाद मिली आजादी से सभी उत्साहित थे। यह उत्साह आजादी के 79 साल पूरे होने के बाद आज भी कायम है। इस साल 15 अगस्त 2026 को भारत अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाएगा। इस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराकर आजादी के जश्न की शुरुआत करेंगे। नई दिल्ली स्थित लाल किले पर झंडा फहराना एक ऐसी परंपरा है, जो 1947 के पहले से चली आ रही है। आइए आज जानें कि लाल किले पर पहली पर किसने 15 अगस्त को तिरंगा फहराया था।

इतिहास के पन्नों से

आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 16 अगस्त, 1947 को पहली बार लाल किले पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया था। तब से लाल किले पर तिरंगा फहराना भारतीय स्वतंत्रता और हमारे गौरव का प्रतीक बन गया है। भारत को 15 अगस्त, 1947 को आधी रात को आजादी मिली थी, लेकिन लाल किले पर झंडा 16 अगस्त, 1947 को सुबह 8:30 बजे फहराया गया था। 15 अगस्त, 1947 को आधिकारिक स्वतंत्रता दिवस पर, मुख्य झंडा फहराने की रस्म आधी रात को कॉन्स्टिट्यूएंट असेंबली (बाद में संसद भवन) में हुई थी। इसके बाद शाम को इंडिया गेट के पास एक और रस्म हुई। लाहौरी गेट की प्राचीर से नेहरू के भाषण ने भारत के सालाना स्वतंत्रता दिवस समारोह के लिए एक मिसाल कायम की, जहां प्रधानमंत्री हर 15 अगस्त को राष्ट्रीय झंडा फहराते हैं और देश को संबोधित करते हैं।

सबसे ज्यादा बार पंडित नेहरू ने फहराया तिरंगा

पंडित नेहरू ने 1947 से 17 बार लाल किले पर झंडा फहराया है, जो हमारी स्वतंत्रता के 79 सालों में किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा सबसे ज्यादा बार फहराया गया है। इस मामले में उनकी बेटी इंदिरा गांधी दूसरे नंबर पर हैं, जिन्होंने 16 बार तिरंगा फहराया है। इसके बाद, श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने छह बार लाल किले पर झंडा फहराया है, उनके बाद राजीव गांधी और पीवी नरसिम्हा राव – पांच-पांच बार, लाल बहादुर शास्त्री ने 1964 और ’65 में, मोरारजी देसाई ने 1977 और ’78 में, चरण सिंह ने 1979 में, श्री वीपी सिंह – 1990 में, श्री एचडी देवेगौड़ा – 1996 में और श्री इंद्र कुमार गुजराल – 1997 में।

चंद्रशेखर ने कभी नहीं फहराया लाला किले पर झंडा

दिलचस्प बात यह है कि गुलजारी लाल नंदा ने, अंतरिम प्रधानमंत्री के तौर पर अपने दो छोटे कार्यकाल में, चंद्रशेखर के अलावा कभी झंडा नहीं फहराया। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह 15 अगस्त, 2007 को 10 बार लाल किले पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया। इसके बाद वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से अब तक 12 बार तिरंगा फहरा चुके हैं। इस साल देश के स्वाधीनता दिवस की 80वीं वर्षगांठ पर वह 13वीं बार ध्वजारोहण करेंगे।

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15 अगस्त पर लाल किले में दिखेगा नया इतिहास! जश्न में पहली बार दो ऐतिहासिक पल

15 अगस्त से पहले दिल्ली में स्वतंत्रता दिवस समारोह की तैयारियां तेज हो गई हैं। लाल किले के पास दंगल पार्क में भारतीय सेना के जवानों ने पारंपरिक 21 तोपों की सलामी रिहर्सल की जा रही है। इस बार समारोह में ‘युवा शक्ति’, ‘विकसित भारत 2047’ और ‘वंदे मातरम’ के 150 साल पूरे होने को खास जगह दी जाएगी।

युवा शक्ति और Gen-Z

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इस बार लाल किले पर होने वाला स्वतंत्रता दिवस समारोह देश की युवा शक्ति और Gen-Z पर फोकस रहेगा। इसमें युवाओं की अचीवमेंट, उनकी नई सोच और देश के डेवलपमेंट में उनके योगदान को सामने रखा जाएगा। साथ ही 2047 तक भारत को विकसित देश बनाने के लक्ष्य में युवाओं की भूमिका को भी खास तरीके से दिखाया जाएगा। सेरेमनी में युवा अचीवर्स को स्पेशल गेस्ट के तौर पर बुलाया गया है।

स्वतंत्रता दिवस समारोह

इस साल ‘वंदे मातरम’ के 150 साल पूरे हो रहे हैं, इसलिए स्वतंत्रता दिवस समारोह में इसे खास जगह दी जाएगी। पहली बार लाल किले की प्राचीर से ‘वंदे मातरम’ गाया जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाल किले से तिरंगा फहराएंगे और देश को संबोधित करेंगे।

टेक्नोलॉजी और साइंस

स्वतंत्रता दिवस समारोह में भारत की तकनीकी और वैज्ञानिक अचीवमेंट को भी दिखाया जाएगा। न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी, स्पेस और मॉडर्न टेक्निक सेक्टर में देश ने जो प्रगति की है, उसकी झलक विजुअल्स के जरिए दिखाई जाएगी। इन्विटेशन कार्ड में ‘सेवा तीर्थ’ को प्रायोरिटी दी गई है, जो पब्लिक सर्विस और विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को दिखाती है।

इंटर्नशिप और डेवलपमेंट स्कीम

इस बार समारोह में देश के युवा प्रतिभाओं को खास सम्मान दिया जाएगा। इंटरनेशनल फिजिक्स, केमिस्ट्री, बायोलॉजी और मैथमैटिक्स ओलंपियाड 2026 में मेडल जीतने वाले 19 स्टूडेंट्स को सम्मानित किया जाएगा। इसके अलावा युवा इनोवेटर्स, स्टार्टअप फाउंडर्स, प्रधानमंत्री इंटर्नशिप स्कीम के इंटर्न, स्किल डेवलपमेंट स्कीम का लाभ लेने वाले और MY भारत के वॉलंटियर्स जैसे युवा अचीवर्स भी समारोह में शामिल होंगे।

जल संरक्षण

इस साल स्वतंत्रता दिवस समारोह में बैठने की जगहों के नाम भारत की प्रमुख झीलों के नाम पर रखे जाएंगे। इसका मकसद लोगों का ध्यान जल संरक्षण और पानी बचाने की जरूरत की ओर अट्रैक्ट करना है।

इस बार का स्वतंत्रता दिवस समारोह देश की परंपरा, युवाओं की ताकत और भारत की तरक्की की झलक एक साथ दिखाएगा। ‘वंदे मातरम’ के 150 साल पूरे होने से यह मौका और खास बन गया है। युवा प्रतिभाओं के सम्मान और देश की वैज्ञानिक उपलब्धियों के साथ समारोह में विकसित भारत 2047 का संदेश भी मिलेगा।

भारत का होकर भी ये अनोखा शहर, जो 16 अगस्त को मनाता है स्वतंत्रता दिवस!

भारत में हर साल 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है। लेकिन एक ऐसा शहर भी है, जहां आज़ादी का जश्न 16 अगस्त को मनाने की परंपरा है। इसके पीछे चार वीर स्वतंत्रता सेनानियों का बलिदान जुड़ा है, जिन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान देश के लिए अपनी जान न्योछावर कर दी थी।

 

अनोखी परंपरा

जहां पूरा देश 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाता है, वहीं बिहार के बक्सर जिले का डुमरांव 16 अगस्त को भी उतने ही उत्साह के साथ यह दिन मनाता है। यहां लोग झंडा फहराते हैं, शहीदों को श्रद्धांजलि देते हैं और उनके बलिदान को याद करते हैं। यह परंपरा कई दशकों से लगातार निभाई जा रही है और आज भी पूरे सम्मान के साथ जारी है। उन वीर स्वतंत्रता सेनानियों को याद करते हैं जिनके साहस और बलिदान ने आजादी की लड़ाई को नई ताकत दी।

 

ब्रिटिश शासन के कब्जा

साल 1942 में महात्मा गांधी ने ‘करो या मरो’ का नारा दिया था, जिसके बाद पूरे देश में भारत छोड़ो आंदोलन तेज हो गया। इसी आंदोलन के दौरान डुमरांव के हजारों लोग तिरंगा लेकर पुलिस थाने की ओर बढ़े। उनका उद्देश्य ब्रिटिश शासन के कब्जे वाली इमारत पर तिरंगा फहराकर आजादी की लड़ाई में अपना योगदान देना था। इस आंदोलन में महिलाओं, युवाओं और बच्चों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

 

वीरों का बलिदान

जब प्रदर्शनकारी पीछे हटने को तैयार नहीं हुए, तो अंग्रेज पुलिस ने उन पर गोलियां चला दीं। इस गोलीबारी में कपिल मुनि, गोपाल कहार, रामदास सोनार और रामदास लोहार शहीद हो गए। कई अन्य लोग भी घायल हुए, लेकिन लोगों का हौसला नहीं टूटा। अपने साथियों के बलिदान के बावजूद आंदोलन जारी रहा और आखिरकार प्रदर्शनकारियों ने तिरंगा फहराकर अपने संकल्प को पूरा किया।

 

शहीद स्मारक

देश आजाद होने के बाद जिस पुलिस थाने में यह घटना हुई थी, उसे चारों शहीदों की याद में स्मारक में बदल दिया गया। यह स्मारक आज भी लोगों को आजादी की लड़ाई और उन वीरों के बलिदान की याद दिलाता है। हर साल 16 अगस्त को यहां बड़ी संख्या में लोग पहुंचकर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और उनके योगदान को नमन करते हैं। यह परंपरा हमें याद दिलाती है कि भारत की आजादी लाखों लोगों के संघर्ष और बलिदान का परिणाम है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।

 

सरकारी सम्मान

डुमरांव की इस ऐतिहासिक परंपरा को समय के साथ सरकारी मान्यता भी मिली। बिहार सरकार ने वर्ष 2015 में 16 अगस्त को होने वाले इस आयोजन को आधिकारिक पहचान दी। इसके बाद इस दिन होने वाले कार्यक्रमों को और अधिक महत्व मिला। वर्ष 2017 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शहीद स्मारक पर चारों वीरों की प्रतिमाओं का अनावरण किया, जिससे आने वाली पीढ़ियां भी उनके बलिदान को याद रख सकें।

Independence Day 2026: भारत का अनोखा शहर! जहां 15 अगस्त की सुबह नहीं, 14 अगस्त की रात ही फहराया जाता है तिरंगा

स्वतंत्रता दिवस भारत के लिए गर्व और भावनाओं से जुड़ा खास दिन है। हर साल 15 अगस्त को देशभर में तिरंगा फहराकर आजादी का जश्न मनाया जाता है। लेकिन बिहार के पूर्णिया शहर में इस मौके को मनाने का अंदाज बाकी जगहों से बिल्कुल अलग है। यहां लोग 15 अगस्त की सुबह का इंतजार नहीं करते, बल्कि 14 अगस्त की आधी रात को ही तिरंगा फहराते हैं। यह परंपरा आजादी मिलने के उस ऐतिहासिक पल से जुड़ी है, जब भारत ने रात 12 बजे के बाद स्वतंत्रता की घोषणा सुनी थी।

पूर्णिया का यह अनोखा जश्न दशकों पुरानी कहानी और स्वतंत्रता सेनानियों की भावनाओं को आज भी जीवित रखता है। यही वजह है कि हर साल रात के समय झंडा चौक पर बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं और उस गौरवशाली पल को याद करते हैं।

आधी रात को मिली थी आजादी की खबर

यह परंपरा कोई नई शुरुआत नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें आजादी की उस ऐतिहासिक रात से जुड़ी हैं। 14 अगस्त 1947 की रात पूरा देश उस पल का इंतजार कर रहा था, जब भारत ब्रिटिश शासन से मुक्त होने वाला था। ऑल इंडिया रेडियो पर स्वतंत्रता की घोषणा का प्रसारण हुआ और रात 12 बजकर 1 मिनट पर देश ने आजादी की खबर सुनी।

पूर्णिया के स्वतंत्रता सेनानी ने रचा था इतिहास

जब पूरा देश उस ऐतिहासिक पल का गवाह बन रहा था, तब पूर्णिया के स्वतंत्रता सेनानी रामेश्वर प्रसाद सिंह ने सुबह होने का इंतजार नहीं किया। उन्होंने अपने दो साथियों रामरतन शाह और शमशुल हक के साथ रात में ही शहर के बीचों-बीच पहुंचकर तिरंगा फहराया। आज जिस जगह को ‘झंडा चौक’ के नाम से जाना जाता है, वहीं पहली बार उस रात आजादी का झंडा लहराया गया था।

तिरंगा फहरते ही गूंज उठा था पूरा इलाका

बताया जाता है कि जैसे ही झंडा ऊपर उठा, वहां मौजूद लोगों में खुशी की लहर दौड़ गई। उस पल आजादी सिर्फ रेडियो पर सुनाई देने वाली खबर नहीं रही, बल्कि लोगों के सामने एक ऐसा एहसास बन गई जिसे वे अपनी आंखों से देख और महसूस कर सकते थे।

आज भी कायम है 14 अगस्त की आधी रात वाली परंपरा

दशकों बाद भी पूर्णिया के लोग इस ऐतिहासिक परंपरा को निभा रहे हैं। हर साल 14 अगस्त की रात झंडा चौक पर लोग इकट्ठा होते हैं और उसी समय तिरंगा फहराते हैं, जब देश को पहली बार आजादी मिली थी। जब पूरा भारत 15 अगस्त की सुबह स्वतंत्रता दिवस मनाता है, वहीं पूर्णिया कुछ घंटे पहले ही उस गौरवशाली पल को याद कर लेता है।

झंडा चौक बना आजादी की यादों का प्रतीक

आज झंडा चौक सिर्फ एक स्थान नहीं, बल्कि इतिहास की उस रात का प्रतीक बन चुका है। ये जगह याद दिलाती है कि आजादी का जश्न केवल एक तारीख नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों के संघर्ष और भावनाओं से जुड़ा एक ऐतिहासिक एहसास है।

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