Rakesh Jhunjhunwala: सिर्फ ₹3 के शेयर ने राकेश झुनझुनवाला को बना दिया अरबपति! जानें ‘बिग बुल’ के उस सबसे बड़े मास्टर स्ट्रोक के बारे

Rakesh Jhunjhunwala Inspirational Journey: जब 1985 में 25 साल का एक नौजवान हाथ में महज 5 हजार रुपये लेकर शेयर बाजार के दंगल में उतरा, तो दलालों ने उसे सिर्फ एक ‘मुंगेरीलाल’ समझा था। पिता की सख्त हिदायत थी कि, ‘एक भी रुपया उधार मत लेना!’ लेकिन उस लड़के की आंखों में दलाल स्ट्रीट को फतह करने का जुनून था। फिर शुरू हुआ सही दांव, सटीक टाइमिंग और लोहे जैसे धैर्य का वो खेल, जिसने उस मामूली लड़के को भारत का ‘बिग बुल’ बना दिया।

₹5,000 से ₹40,000 करोड़ का विशाल साम्राज्य खड़ा करने वाले राकेश झुनझुनवाला की यह कहानी सिर्फ शेयर बाजार का गणित नहीं, बल्कि भारत के इतिहास का सबसे रोमांचक और प्रेरणादायक सफर है। आइए जानते हैं उस एक ‘मास्टर स्ट्रोक’ के बारे में जिसने रातों-रात उनकी किस्मत बदल दी।

शुरुआती जीवन और शेयर बाजार में पहला कदम

राकेश झुनझुनवाला का जन्म 5 जुलाई 1960 को हुआ था। उनके पिता इनकम टैक्स ऑफिसर थे, जो अक्सर अपने दोस्तों के साथ शेयर बाजार की बातें किया करते थे। वहीं से युवा राकेश के मन में बाजार को लेकर उत्सुकता जागी।

पिता की सलाह पर उन्होंने पहले अपनी पढ़ाई पूरी की और वर्ष 1985 में चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) बने। जब उन्होंने शेयर बाजार में उतरने की इच्छा जताई, तो उनके पिता ने अनुमति तो दी लेकिन दो सख्त शर्तें रखीं। पिता या दोस्तों से पैसा उधार नहीं लेना है, और किसी भी नुकसान की जिम्मेदारी खुद उठानी होगी। राकेश झुनझुनवाला ने 1985 में अपनी बचत के ₹5000 के साथ बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) में कदम रखा। उस समय सेंसेक्स महज 150 अंकों के आसपास था।

टाटा टी ने दिया पहला बड़ा ब्रेकआउट

राकेश झुनझुनवाला को अपनी पहली बड़ी सफलता 1986 में मिली, जब उन्होंने टाटा टी के शेयरों पर बड़ा दांव लगाया। उन्होंने ₹43 के भाव पर टाटा टी के 5000 शेयर खरीदे। महज 3 महीने के भीतर ही उस शेयर की कीमत ₹43 से बढ़कर ₹143 हो गई।

इस एक सौदे से उन्हें करीब ₹5 लाख का बड़ा मुनाफा हुआ। 1986 से 1989 के बीच उन्होंने कई सही दांव लगाकर लगभग ₹20-25 लाख का मुनाफा कमाया, जिसने उन्हें बाजार में बड़ी पूंजी के साथ खेलने का मौका दिया।

वो एक शेयर जिसने बना दिया अरबपति

अगर किसी एक शेयर ने उनकी जिंदगी बदली, तो वो था टाटा ग्रुप का टाइटन कंपनी।उन्होंने वर्ष 2002-03 के दौरान टाइटन के लगभग 6 करोड़ शेयर औसतन ₹3 प्रति शेयर के बेहद सस्ते भाव पर खरीदे। बाजार में तमाम उतार-चढ़ाव आए, लेकिन उन्होंने टाइटन में अपनी हिस्सेदारी को सालों-साल बनाए रखा। आगे चलकर टाइटन का शेयर हजारों रुपये के स्तर पर पहुंच गया। अकेले टाइटन के शेयर से ही उनकी नेटवर्थ में ₹10,000 करोड़ से ज्यादा का इजाफा हुआ।

इसके अलावा सिल्सा लैब (Sesa Goa), लुपिन, क्रिसिल और स्टार हेल्थ जैसे शेयरों में उनके शुरुआती निवेश ने उन्हें भारतीय बाजार का सबसे सफल रिटेल निवेशक बना दिया। अपने जीवन के आखिरी दौर में उन्होंने भारत की नई एयरलाइन अकासा एयर में भी बड़ा निवेश किया।

राकेश झुनझुनवाला की सफलता के 4 सबसे बड़े मंत्र

1. लंबी अवधि का धैर्य: वे ट्रेडिंग से ज्यादा लंबी अवधि के वैल्यू इन्वेस्टिंग पर भरोसा करते थे। उनका मानना था कि अगर कंपनी का फंडामेंटल मजबूत है, तो समय के साथ शेयर बढ़ेगा ही।

2. भारत की ग्रोथ पर पक्का भरोसा: वे हमेशा कहते थे कि भारत की अर्थव्यवस्था पर दांव लगाओ। वे भारतीय बाजार को लेकर हमेशा बेहद बुलिश रहते थे।

3. गलतियों से सीखना: झुनझुनवाला का मानना था कि बाजार में गलतियां होना स्वाभाविक है, लेकिन अपनी गलती को जल्दी स्वीकार करना और घाटे को काटना ही असली समझदारी है।

4. जब सब डरें, तब निवेश करें: 1992 के हर्षद मेहता घोटाले या 2008 की वैश्विक मंदी उन्होंने हर बड़े संकट और मंदी को एक बेहतरीन खरीदारी के मौके के रूप में देखा।

निवेशकों के लिए हमेशा प्रेरणास्रोत रहेंगे ‘बिग बुल’

14 अगस्त 2022 को 62 वर्ष की उम्र में भले ही भारत के ‘बिग बुल’ ने दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन उनकी छोड़ी हुई विरासत आज भी दलाल स्ट्रीट की हर धड़कन में जिंदा है। ₹5000 की मामूली पूंजी से शुरू होकर देश की सबसे बड़ी एविएशन कंपनी और बहुचर्चित इन्वेस्टमेंट फर्म्स में विशाल हिस्सेदारी बनाने का उनका यह सफर सिर्फ एक निवेशक की कामयाबी नहीं, बल्कि हर आम इंसान के बड़े सपने देखने और उन्हें सच करने की सबसे बड़ी मिसाल है। राकेश झुनझुनवाला भले आज हमारे बीच न हों, लेकिन उनका एक-एक सबक आज भी करोड़ों निवेशकों को बाजार के तूफानों से टकराने और अपनी किस्मत खुद लिखने का हौसला देता है।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

15 अगस्त पर लाल किले में दिखेगा नया इतिहास! जश्न में पहली बार दो ऐतिहासिक पल

15 अगस्त से पहले दिल्ली में स्वतंत्रता दिवस समारोह की तैयारियां तेज हो गई हैं। लाल किले के पास दंगल पार्क में भारतीय सेना के जवानों ने पारंपरिक 21 तोपों की सलामी रिहर्सल की जा रही है। इस बार समारोह में ‘युवा शक्ति’, ‘विकसित भारत 2047’ और ‘वंदे मातरम’ के 150 साल पूरे होने को खास जगह दी जाएगी।

युवा शक्ति और Gen-Z

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इस बार लाल किले पर होने वाला स्वतंत्रता दिवस समारोह देश की युवा शक्ति और Gen-Z पर फोकस रहेगा। इसमें युवाओं की अचीवमेंट, उनकी नई सोच और देश के डेवलपमेंट में उनके योगदान को सामने रखा जाएगा। साथ ही 2047 तक भारत को विकसित देश बनाने के लक्ष्य में युवाओं की भूमिका को भी खास तरीके से दिखाया जाएगा। सेरेमनी में युवा अचीवर्स को स्पेशल गेस्ट के तौर पर बुलाया गया है।

स्वतंत्रता दिवस समारोह

इस साल ‘वंदे मातरम’ के 150 साल पूरे हो रहे हैं, इसलिए स्वतंत्रता दिवस समारोह में इसे खास जगह दी जाएगी। पहली बार लाल किले की प्राचीर से ‘वंदे मातरम’ गाया जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाल किले से तिरंगा फहराएंगे और देश को संबोधित करेंगे।

टेक्नोलॉजी और साइंस

स्वतंत्रता दिवस समारोह में भारत की तकनीकी और वैज्ञानिक अचीवमेंट को भी दिखाया जाएगा। न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी, स्पेस और मॉडर्न टेक्निक सेक्टर में देश ने जो प्रगति की है, उसकी झलक विजुअल्स के जरिए दिखाई जाएगी। इन्विटेशन कार्ड में ‘सेवा तीर्थ’ को प्रायोरिटी दी गई है, जो पब्लिक सर्विस और विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को दिखाती है।

इंटर्नशिप और डेवलपमेंट स्कीम

इस बार समारोह में देश के युवा प्रतिभाओं को खास सम्मान दिया जाएगा। इंटरनेशनल फिजिक्स, केमिस्ट्री, बायोलॉजी और मैथमैटिक्स ओलंपियाड 2026 में मेडल जीतने वाले 19 स्टूडेंट्स को सम्मानित किया जाएगा। इसके अलावा युवा इनोवेटर्स, स्टार्टअप फाउंडर्स, प्रधानमंत्री इंटर्नशिप स्कीम के इंटर्न, स्किल डेवलपमेंट स्कीम का लाभ लेने वाले और MY भारत के वॉलंटियर्स जैसे युवा अचीवर्स भी समारोह में शामिल होंगे।

जल संरक्षण

इस साल स्वतंत्रता दिवस समारोह में बैठने की जगहों के नाम भारत की प्रमुख झीलों के नाम पर रखे जाएंगे। इसका मकसद लोगों का ध्यान जल संरक्षण और पानी बचाने की जरूरत की ओर अट्रैक्ट करना है।

इस बार का स्वतंत्रता दिवस समारोह देश की परंपरा, युवाओं की ताकत और भारत की तरक्की की झलक एक साथ दिखाएगा। ‘वंदे मातरम’ के 150 साल पूरे होने से यह मौका और खास बन गया है। युवा प्रतिभाओं के सम्मान और देश की वैज्ञानिक उपलब्धियों के साथ समारोह में विकसित भारत 2047 का संदेश भी मिलेगा।

Friendship Day Special: प्यार दोस्ती है…., दोस्तों के साथ देखें ये 10 पुरानी यादें ताजा करने वाली फिल्में

Friendship Day Special: फ्रेंडशिप डे के मौके पर, जब हमारे करीबी दोस्त हमसे सैकड़ों मील दूर हों, तो हमें दोस्ती पर बनी कुछ खूबसूरत, गहरी और जिंदगी बदलने वाली फिल्में देखनी चाहिए। जैसे-जैसे आप बड़े होते हैं, दोस्ती बनाए रखने में समय और मेहनत लगती है, लेकिन आपको यह भी एहसास होता है कि अपनी जिंदगी के खास लोगों के संपर्क में रहना कितना जरूरी है। हाल की रिसर्च से पता चलता है कि करीबी दोस्त होने से तनाव कम होता है, आप सतर्क रहते हैं और ज्यादा समय तक जी रहे होते हैं।

शोले

शोले 1975 की एक शानदार बॉलीवुड फ़िल्म है। इस फ़िल्म की कामयाबी के पीछे कई वजहें थीं, जिनमें सबसे अहम थी इसकी बेहतरीन कास्ट, शैतान वीरू के रोल में धर्मेंद्र, हाजिर-जवाब जय के रोल में अमिताभ बच्चन, बदला लेने वाले ठाकुर बलदेव सिंह के रोल में संजीव कुमार, बातूनी बसंती के रोल में हेमा मालिनी, शांत विधवा राधा के रोल में जया भादुरी और कुख्यात गब्बर सिंह के रोल में अमजद खान।

मुन्ना भाई MBBS

‘मुन्ना भाई MBBS’ एक गैंगस्टर की कॉमेडी फ़िल्म है जो डॉक्टर बनना चाहता है। इस फ़िल्म में कॉमेडी और गंभीर, दोनों तरह के हिस्से हैं। यह एक मज़ेदार फ़िल्म है जिसमें मुन्ना भाई और सर्किट जैसे जाने-माने और पसंद किए जाने वाले किरदार हैं। ‘मुन्ना भाई MBBS’ असल में अपनी तरह की एक अलग फिल्म है। इसकी एक्टिंग और ह्यूमर इसे देखने लायक बनाते हैं, क्योंकि ज़्यादातर ड्रामैटिक सीन थोड़े ज़्यादा बढ़ा-चढ़ाकर दिखाए गए हैं। जहाँ फ़िल्म के मज़ेदार हिस्सों के डायलॉग स्मार्ट और एंटरटेनिंग हैं, वहीं दुखद दृश्यों में डायलॉग बहुत खराब हैं।

सोनू के टिटू की स्वीटी

लव रंजन की फिल्मों को लैंगिक भेदभाव वाले कथानकों के लिए जाना जाता है, और सोनू के टिटू की स्वीटी भी इसका अपवाद नहीं है, बस फर्क इतना है कि इसमें दोस्ती बनाम रोमांस को मुख्य विषय बनाया गया है। सोनू के टिटू की स्वीटी दो पक्के दोस्तों, टिटू (सनी सिंह) और सोनू (कार्तिक आर्यन) की कहानी है, जो लगातार टिटू को गलत महिलाओं के चक्कर में पड़ने से बचाते रहते हैं। स्वीटी (नुसरत भरूचा) टिटू की जिंदगी में आती है और उसका प्यार टिटू की दुनिया को हिला देता है। हालांकि, सोनू को स्वीटी के साथ कुछ गड़बड़ होने का शक होता है और वह टिटू को दोबारा गलत हाथों में पड़ने से बचाने के लिए हर संभव कोशिश करता है।

वीरे दी वेडिंग

सिर्फ़ महिलाओं पर आधारित फ़िल्में बनाने के पारंपरिक तरीके से हटकर, ‘वीरे दी वेडिंग’ ने इंडस्ट्री में हलचल मचा दी। ‘वीरे दी वेडिंग’ पारंपरिक महिला-केंद्रित सिनेमा से हटकर एक ‘असंस्कारी’ फ़िल्म है। इस फ़िल्म में अभिनेत्रियों के बीच गहरे और अटूट रिश्ते को दिखाया गया है। ‘वीरे दी वेडिंग’ भले ही हल्की-फुल्की फ़िल्म है, लेकिन इसकी कहानी के अलग-अलग पहलू इतनी खूबसूरती से बुने गए हैं कि वे बनावटी लगते हैं।

ये जवानी है दीवानी

यह हमारी नीरस जिंदगी में रंग भर देती है। सिनेमैटोग्राफी से लेकर संगीत, लेखन और कलाकारों तक, यह फिल्म दोस्ती का एक प्यारा उत्सव है। यह बॉलीवुड की अब तक की सबसे बेहतरीन दोस्ती पर आधारित फिल्मों में से एक है। यह वीडियो प्यार, विश्वास, क्षमा और मस्ती जैसे दोस्ती के आदर्शों को दर्शाता है।

दिल चाहता है

‘दिल चाहता है’ ताज़ी हवा में गहरी सांस लेने जैसा अनुभव देती है। यह दिखाती है कि किसी बिज़नेस में युवाओं को शामिल करना हमेशा एक अच्छी बात होती है। ‘दिल चाहता है’ बेहतरीन फ़िल्मों में से एक है। यह उन फ़िल्मों में से है जिन्हें पसंद न कर पाना मुश्किल है, खासकर इसलिए क्योंकि यह दिखाती है कि भारतीय सिनेमा के माध्यम का इस्तेमाल कैसे किया जाना चाहिए। फ़िल्म में बस कहीं भी गाना डाल देने के बजाय, निर्देशकों ने हर गाने को ऐसा बनाया है जो ज़रूरी लगे, देखने में दिलचस्प हो और कभी भी उबाऊ न लगे।

फुकरे

यह फ़िल्म आपको आपके कॉलेज के दिनों की याद दिला देगी। यह कहानी है चार ऐसे दोस्तों की जो जल्दी अमीर बनना चाहते हैं और अपने कॉलेज के दिनों का मज़ा लेना चाहते हैं। कॉलेज की लड़कियाँ और प्रॉम नाइट से लेकर इन लड़कों की हरकतों से सब कुछ गड़बड़ हो जाने तक, इस फ़िल्म में सब कुछ है।

छिछोरे

‘छिछोरे’ भावनाओं का एक उतार-चढ़ाव भरा सफ़र है, जो कॉलेज के दिनों की दोस्ती, प्यार, रैगिंग, बहस, मुक़ाबलों और अनगिनत यादों को सम्मान देता है। यह एक दिलचस्प कहानी के ज़रिए ज़रूरी संदेश देने वाली एक प्रासंगिक फ़िल्म है। ‘दंगल’ फ़िल्म के लिए मशहूर नितेश तिवारी द्वारा निर्देशित ‘छिछोरे’ एक ऐसी फ़िल्म है जिसमें बहुत कुछ है और यह बहुत मज़ेदार भी है; यह लंबे समय तक आपके ज़हन में बसी रहती है।

3 इडियट्स

राजकुमार हिरानी ने हमेशा किसी खास विषय पर बात की है और/या समाज की कमज़ोर मान्यताओं और नैतिकताओं पर खुलकर कटाक्ष किया है। यह वीडियो उस आम सोच पर आधारित है कि अगर आप साइंस के स्टूडेंट के तौर पर सफल होना चाहते हैं, तो आपको मेडिकल साइंस या इंजीनियरिंग में ही पढ़ाई करनी चाहिए। रैंचो, राजू और फरहान का सफ़र दर्दनाक और मज़ेदार दोनों है, और हमारा मन इससे कभी नहीं भरता। उनकी दोस्ती का सादगी भरा अंदाज़ हमारे दिलों को छू लेता है और हमें अपने कॉलेज के दोस्तों और उस एक अनोखे दोस्त की याद दिलाता है, जो हमेशा लीक से हटकर सोचने की हिम्मत रखता था।

जिंदगी ना मिलेगी दोबारा

कल्की से शादी से पहले अभय देओल की बैचलर पार्टी के हिस्से के रूप में, तीन दोस्तों (ऋतिक, अभय देओल और फरहान अख्तर) का एक समूह स्पेन की रोड ट्रिप पर निकलता है। ऋतिक और फरहान दोनों ही निजी समस्याओं से जूझ रहे हैं। एक शानदार लेखक की बदौलत इस साधारण सी कहानी को बेहतरीन ढंग से फिल्माया गया है। कलाकारों का अभिनय लाजवाब है। फिल्म में दीप्ति नवल और नसीरुद्दीन शाह भी हैं।

शादी और प्यार फिल्म के प्रमुख विषयों में से हैं। इसके बावजूद, बेहतरीन कॉमेडी आपको हर पल मनोरंजन देती है। हमें लगता है कि यह शानदार लेखन का प्रमाण है। दोस्ती के इस दिन, ला टोमाटीना उत्सव, स्पेन के समुद्र तट और कैटरीना कैफ, सभी देखने लायक हैं।

कुछ कुछ होता है

शाहरुख खान, काजोल और रानी मुखर्जी की ये फिल्म आज भी लोगों की पसंदीदा बनी हुई है। फिल्में फ्रेंडशिप डे सेलिब्रेशन काफी खूबसूरती से दिखाया गया है। वहीं फिल्म का डायलॉग प्यार दोस्ती है…आज भी लोगों की जुबान पर रहता है।

Father’s Day 2026: बॉलीवुड के वे यादगार ऑन-स्क्रीन फादर्स, जिन्होंने पिता होने के बदल दिए मायने

Father’s Day 2026: इस फादर्स डे पर, हम उन ऑन-स्क्रीन पिताओं को सेलिब्रेट कर रहे हैं, जिनकी कहानियां, त्याग और बिना शर्त प्यार आज भी अलग-अलग पीढ़ियों के दर्शकों के दिलों को छूते हैं। इस फादर्स डे ऑन स्क्रीन पॉपुलर पिता के किरदार को निभाने वाले एक्टर्स के बारे में जानते हैं।

Kuch Kuch Hota Hai

इस पसंदीदा फ़ैमिली ड्रामा में, शाहरुख़ खान ने राहुल का किरदार निभाया है। राहुल एक देखभाल करने वाले सिंगल फ़ादर हैं और अपनी बेटी अंजलि के साथ उनका रिश्ता बहुत प्यारा है। उनका रिश्ता दोस्ती, भरोसे और बिना शर्त प्यार पर टिका है, जिसने राहुल को बॉलीवुड के सबसे यादगार ऑन-स्क्रीन पिताओं में से एक बना दिया है।

Kabhi Khushi Kabhie Gham

अमिताभ बच्चन का किरदार ‘यशवर्धन रायचंद’ परिवार की परंपराओं और अपने बेटे के प्रति प्यार के बीच उलझा हुआ एक सख्त पिता का है। भले ही उनका सख्त बर्ताव अक्सर दूरियां पैदा करता है, लेकिन यह किरदार असल में उन भावनात्मक संघर्षों और गहरे लगाव को दिखाता है जो कई पिता अपने मन के भीतर छिपाकर रखते हैं।

Gunjan Saxena: The Kargil Girl

पंकज त्रिपाठी ने अनूप सक्सेना का किरदार शानदार ढंग से निभाया है—एक ऐसे पिता जो अपनी बेटी के सपनों पर हमेशा भरोसा रखते हैं। उनका शांत सहयोग, हौसला बढ़ाना और प्रगतिशील सोच उन्हें बिना शर्त माता-पिता के प्यार का एक बेहतरीन उदाहरण बनाती है। हाल के समय की फिल्मों में यह किरदार पिता की ऐसी भूमिकाओं में से एक है जिनसे लोग आसानी से जुड़ाव महसूस करते हैं।

Angrezi Medium

इरफान खान ने चंपक बंसल के तौर पर बेहद दिल को छू लेने वाली एक्टिंग की है। वे एक ऐसे पिता हैं जो अपनी बेटी की खुशी के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। उनका इमोशनल सफ़र हंसी-मज़ाक, त्याग और अटूट साथ से भरा है, जो माता-पिता के निस्वार्थ प्यार को दिखाता है।

Dangal

बॉलीवुड में पिता के किरदार को दिखाने के मामले में, महावीर सिंह फोगट के तौर पर आमिर खान का अभिनय सबसे प्रेरणादायक उदाहरणों में से एक है। पुरुषों के दबदबे वाले खेल में अपनी बेटियों को बाधाएं तोड़ने में मदद करने के लिए दृढ़ संकल्पित, वे अनुशासन के साथ-साथ उनकी काबिलियत पर अटूट विश्वास भी रखते हैं। उनका सफर उन त्यागों और दृढ़ संकल्प को दर्शाता है जो माता-पिता के प्यार की पहचान हैं।

Khelo India में दूधवाले ने जीता स्वर्ण पदक, उठ गया था पिता का साया

खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स 2026 में पुरुषों के 79 किग्रा फ्रीस्टाइल भार वर्ग में स्वर्ण पदक जीतने वाले जम्मू-कश्मीर के हमाम हुसैन ने बड़े भाई के साथ घर-घर जाकर दूध पहुंचाने के साथ कुश्ती का अभ्यास करते हुए अपने सपने को जिंदा रखा।

जम्मू के जोरावर गांव के रहने वाले 28 वर्षीय हमाम के लिए जिंदगी और खेल हमेशा साथ-साथ चले हैं। पांच साल पहले पिता के निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारी उनके और उनके बड़े भाई के कंधों पर आ गई। दोनों ने मिलकर दूध बेचकर घर चलाया और इसी के साथ हमाम ने अपने कुश्ती के सपने को जिंदा रखा।

आखिरकार खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स 2026 में यह संघर्ष रंग लाया, जहां हमाम ने पुरुषों के 79 किग्रा फ्रीस्टाइल वर्ग में हिमाचल प्रदेश के मोहित कुमार को हराकर स्वर्ण पदक जीता। यह उनके 14 साल के कुश्ती करियर का पहला राष्ट्रीय स्तर का स्वर्ण पदक है।

पदक जीतने के बाद हमाम ने SAI Media से कहा, “मेरे बड़े भाई भी पहलवान थे और राज्य स्तर पर खेल चुके हैं। पिता के निधन के बाद सारी जिम्मेदारी हम पर आ गई। मेरे भाई को कुश्ती छोड़नी पड़ी और उन्होंने दूध बेचना शुरू कर दिया। मैं भी उनके साथ दूध देने जाता था क्योंकि परिवार चलाना जरूरी था।

लेकिन मेरे भाई ने मुझे हमेशा कुश्ती जारी रखने के लिए प्रेरित किया और मुझे दंगलों में लेकर जाते थे। हमाम ने बताया कि उनके पिता की छोड़ी हुई भैंसें ही परिवार की आजीविका का साधन बनीं। मेरे भाई ने दूध बेचकर घर चलाया और मैं उनकी मदद करता था। लेकिन जब मैंने मिट्टी के अखाड़े में कदम रखा, तो इस खेल से मुझे लगाव हो गया।”

सीमित संसाधनों के बावजूद हमाम ने कभी उम्मीद नहीं छोड़ी। वे अपने गांव से करीब 20 किलोमीटर दूर मिट्टी के अखाड़े में अभ्यास करते हैं और मैट पर ट्रेनिंग के लिए लगभग 40 किलोमीटर दूर जम्मू तक का सफर तय करते हैं। वह भी अपने काम की जिम्मेदारियों के साथ।

उन्होंने कहा, “साई सेंटर जम्मू में है और हम निचले इलाके में रहते हैं, इसलिए वहां नियमित रूप से जाना मुश्किल होता है। हम आमतौर पर प्रतियोगिताओं के दौरान ही वहां जाते हैं, वरना गांव के अखाड़ों में ही अभ्यास करते हैं। मेरे पास कोई व्यक्तिगत कोच नहीं है। अखाड़े में सीनियर पहलवान हमें मार्गदर्शन देते हैं। जब हम मैट पर अभ्यास करते हैं, तब वहां कोच होते हैं। गांवों में हमें शहरों जैसी सुविधाएं नहीं मिलतीं। अगर बेहतर सुविधाएं मिलें, तो हमारे क्षेत्र के पहलवान राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और अधिक पदक जीत सकते हैं।”

हमाम के लिए यह स्वर्ण पदक सिर्फ एक जीत नहीं, बल्कि वर्षों के संघर्ष और समर्पण का प्रतीक है।
उन्होंने अंत में कहा, “यहां आकर बहुत अच्छा लगा। यहां की सुविधाएं बहुत अच्छी थीं। हम एक पिछड़े इलाके से आते हैं, जहां कुश्ती के लिए ज्यादा समर्थन नहीं है, इसलिए हमें दूर-दूर तक जाना पड़ता है। यह पहली बार है जब हमारे लिए इस तरह की प्रतियोगिता आयोजित की गई है। अगर ऐसे और आयोजन होते रहें, तो हम और पदक जीत सकते हैं।”