Treatment of anemia: “जिस देश की आधी से अधिक महिलाएं और दो-तिहाई बच्चे खून की कमी से जूझ रहे हों, वहां यह केवल स्वास्थ्य का नहीं बल्कि विकास का भी मुद्दा बन जाता है।” भारतीय परिप्रेक्ष्य में एनीमिया आज भी एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के अनुसार 15 से 49 वर्ष आयु वर्ग की लगभग 57 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं।
पांच वर्ष से कम उम्र के करीब 67 प्रतिशत बच्चों में भी खून की कमी पाई गई है। यह स्थिति बताती है कि आर्थिक प्रगति और स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के बावजूद पोषण संबंधी चुनौतियां अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। हालांकि चिंता से अधिक जरूरत जागरूकता की है, क्योंकि एनीमिया उन समस्याओं में से है जिनकी रोकथाम और उपचार दोनों संभव हैं।
क्या कहते हैं चिकित्सक?
गोरखपुर के वरिष्ठ फिजिशियन डॉ. आलोक कुमार गुप्ता कहते हैं कि एनीमिया से बचाव की शुरुआत घर की रसोई और भोजन की थाली से होती है। हरी पत्तेदार सब्जियां, दालें, चना, गुड़, बाजरा, तिल, मौसमी फल और अन्य पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थ नियमित रूप से भोजन में शामिल किए जाने चाहिए।
उनके अनुसार आयरन युक्त भोजन के साथ विटामिन-सी का सेवन शरीर में आयरन के अवशोषण को बढ़ाता है। इसलिए नींबू, आंवला, संतरा या अन्य खट्टे फलों का सेवन लाभकारी होता है। वहीं भोजन के तुरंत बाद चाय या कॉफी और भोजन के दौरान कोई भी कोल्ड ड्रिंक पीने से बचना चाहिए, क्योंकि ये आयरन के अवशोषण में बाधा बन सकते हैं।
साल में सपरिवार एक बार जरूर लें कृमि नाशक दवा
डॉक्टर आलोक के मुताबिक आयरन की कमी के साथ ही आंतों मे पेट के कीड़ों (कृमि) का संक्रमण भी धीरे धीरे रक्त रिसाव का कारक होता है। इसलिए कम से कम वर्ष मे एक बार पूरे परिवार को कोई कृमि नाशक लेना चाहिए। मासिक के दौरान अधिक रक्तस्राव भी एनीमिया का कारक होता है।
खून की कमी का असर सिर्फ शरीर पर नहीं
एनीमिया केवल एक चिकित्सकीय समस्या नहीं है। इसका सीधा असर बच्चों की पढ़ाई, महिलाओं के स्वास्थ्य, श्रमिकों की कार्यक्षमता और देश की उत्पादकता पर पड़ता है। यही कारण है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन इसे दुनिया की प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों में शामिल करता है।
दरअसल एनीमिया एक ऐसी समस्या है जो चुपचाप करोड़ों लोगों की सेहत, कार्यक्षमता और भविष्य को प्रभावित करती है। शरीर में हीमोग्लोबिन कम होने पर पर्याप्त ऑक्सीजन अंगों तक नहीं पहुंच पाती। परिणामस्वरूप व्यक्ति को कमजोरी, थकान, चक्कर आना, सांस फूलना और काम करने में परेशानी जैसी समस्याएं होने लगती हैं।
इसका सबसे गंभीर असर बच्चों, किशोरियों और गर्भवती महिलाओं पर पड़ता है। बच्चों में शारीरिक और मानसिक विकास प्रभावित हो सकता है। सीखने और याद रखने की क्षमता पर असर पड़ सकता है। वहीं गर्भवती महिलाओं में समय से पहले प्रसव, कम वजन वाले शिशु के जन्म और मातृ मृत्यु का जोखिम बढ़ जाता है।
उत्तर प्रदेश के लिए और महत्वपूर्ण है यह लड़ाई
उत्तर प्रदेश देश का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है। इसी कारण यहां बच्चों, किशोरियों और प्रजनन आयु वर्ग की महिलाओं की संख्या भी सबसे अधिक है। ऐसे में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य से जुड़े कार्यक्रमों की सफलता काफी हद तक एनीमिया पर नियंत्रण पर निर्भर करती है। हाल के वर्षों में राज्य में सकारात्मक प्रगति देखने को मिली है। गर्भवती महिलाओं में एनीमिया की दर में कमी दर्ज की गई है और गंभीर एनीमिया के मामलों में भी गिरावट आई है। इसमें स्वास्थ्य विभाग, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
राज्य सरकार पोषण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए लगातार अभियान चला रही है। पोषण वाटिका और औषधीय वाटिका जैसी पहल इसी दिशा में उठाए गए कदम हैं। इनका उद्देश्य लोगों को पौष्टिक आहार के प्रति जागरूक करना और स्थानीय स्तर पर पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थों की उपलब्धता बढ़ाना है।
सहजन : पोषण का पावर हाउस
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लंबे समय से सहजन (मोरिंगा) के प्रचार-प्रसार पर जोर देते रहे हैं। पोषण विशेषज्ञ भी सहजन को अत्यंत पौष्टिक पौधा मानते हैं। इसकी पत्तियों और फलियों में अनेक प्रकार के विटामिन, खनिज और एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं। तुलनात्मक रूप से देखें तो सहजन में—
- संतरे की तुलना में अधिक विटामिन-सी
- गाजर की तुलना में अधिक विटामिन-ए
- दूध की तुलना में अधिक कैल्शियम
- केले की तुलना में अधिक पोटैशियम
- दही की तुलना में अधिक प्रोटीन पाया जाता है।
इसी कारण विद्यालयी पोषण कार्यक्रमों और सामुदायिक पोषण योजनाओं में इसके उपयोग पर जोर दिया जा रहा है। केंद्र सरकार भी राज्यों को स्थानीय स्तर पर उपलब्ध पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थों को पोषण कार्यक्रमों में शामिल करने के लिए प्रोत्साहित कर चुकी है।
सरकार की पहल और समाज की भूमिका
केंद्र सरकार ने वर्ष 2018 में “एनीमिया मुक्त भारत” अभियान शुरू किया था। इसके तहत आयरन एवं फोलिक एसिड की गोलियों का वितरण, कृमिनाशक दवाओं का सेवन, नियमित जांच और पोषण संबंधी जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में भी स्कूलों, आंगनबाड़ी केंद्रों और स्वास्थ्य संस्थानों के माध्यम से आयरन की गोलियां वितरित की जा रही हैं। गर्भवती महिलाओं की नियमित जांच और हाई-रिस्क मामलों की पहचान पर विशेष जोर दिया जा रहा है।
फिर भी केवल सरकारी योजनाओं के भरोसे इस समस्या का समाधान संभव नहीं है। परिवार और समाज को भी अपनी भूमिका निभानी होगी। संतुलित भोजन, नियमित स्वास्थ्य जांच और पोषण के प्रति जागरूकता ही एनीमिया के खिलाफ सबसे प्रभावी हथियार हैं।
दरअसल एनीमिया केवल स्वास्थ्य का विषय नहीं बल्कि मानव संसाधन विकास का भी विषय है। स्वस्थ बच्चे बेहतर विद्यार्थी बनते हैं। स्वस्थ किशोरियां भविष्य में स्वस्थ माताएं बनती हैं। स्वस्थ महिलाएं और पुरुष अधिक उत्पादक होते हैं। इसलिए खून की कमी दूर करना केवल बीमारी से लड़ना नहीं, बल्कि देश की क्षमता को मजबूत करना भी है।
अच्छी बात यह है कि एनीमिया ऐसी समस्या नहीं है जिसका समाधान असंभव हो। जागरूकता, संतुलित पोषण, नियमित जांच और सरकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन से इस चुनौती पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है। विकसित भारत की यात्रा में यह याद रखना होगा कि मजबूत राष्ट्र की नींव स्वस्थ नागरिक ही होते हैं। और स्वस्थ नागरिकों के लिए पर्याप्त खून, पर्याप्त पोषण और पर्याप्त जागरूकता सबसे जरूरी है।
एनीमिया के प्रमुख लक्षण
जल्दी थकान, चक्कर आना, चेहरा पीला पड़ना, सांस फूलना, लगातार कमजोरी महसूस होना, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई आदि इसके प्रमुख लक्षण हैं। यदि इनमें से कई लक्षण लगातार दिखाई दें तो चिकित्सकीय जांच अवश्य कराएं।










