चारधाम यात्रा: अटूट आस्था, VIP संस्कृति और व्यवस्थाओं की अग्निपरीक्षा

चारधाम यात्रा: अटूट आस्था, VIP संस्कृति और व्यवस्थाओं की अग्निपरीक्षा

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यात्राएँ केवल पर्यटन नहीं, बल्कि स्वयं को जानने, जन-आस्था को अनुभव करने और प्रकृति के निकट पहुँचने का अवसर होती हैं। धार्मिक यात्रा मनुष्य को सांसारिक भागदौड़ से दूर कर आत्मचिंतन और ईश्वर के सान्निध्य में जाने का मार्ग दिखाती है। इसी भावना के साथ 26 सितंबर को मध्य प्रदेश के देवास से उत्तराखंड की चारधाम यात्रा प्रारंभ हुई। 15 दिनों के इस सफर ने मुझे आध्यात्मिक संतोष तो दिया, लेकिन धार्मिक स्थलों की व्यवस्थाओं और श्रद्धालुओं की कठिनाइयों ने कई गंभीर प्रश्न भी खड़े किए।

 

माँ गंगा की आरती से हिमालय की दिव्यता तक

हरिद्वार में माँ गंगा की भव्य आरती, मंत्रोच्चार और दीपों से जगमगाती जलधारा ने मन को भावविभोर कर दिया। ऋषिकेश के आध्यात्मिक वातावरण से होते हुए यात्रा माँ यमुनोत्री पहुँची। लगभग छह से सात किलोमीटर के दुर्गम पहाड़ी मार्ग पर पैदल चढ़ाई, थकान और हल्की बारिश के बीच माँ यमुना के दर्शन हुए। इसके बाद उत्तरकाशी में श्री काशी विश्वनाथ महादेव और गंगोत्री में माँ गंगा के दर्शन किए। हिमालय की विशालता ने अनुभव कराया कि प्रकृति के सामने मनुष्य का अहंकार कितना छोटा है।

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केदारनाथ: आस्था अटूट, लेकिन व्यवस्था पर सवाल

यात्रा का सबसे कठिन पड़ाव बाबा केदारनाथ धाम रहा। लगभग 20 से 22 किलोमीटर के दुर्गम मार्ग पर चढ़ाई, घोड़े-खच्चरों की आवाजाही और यात्रियों की भीड़ के बीच आगे बढ़ना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था। लगभग 12 घंटे की मशक्कत के बाद रात करीब दो बजे धाम पहुँचना संभव हुआ, जबकि दर्शन का सौभाग्य अगले दिन शाम लगभग छह बजे मिला। बाबा केदारनाथ के सम्मुख पहुँचते ही मन श्रद्धा से भर गया और सारी थकान मानो क्षणभर में मिट गई।

 

लेकिन घंटों की प्रतीक्षा ने सवाल भी खड़ा किया कि क्या श्रद्धालुओं को सुगम दर्शन उपलब्ध कराना सरकार और प्रशासन की प्राथमिकता नहीं होनी चाहिए?

 

देश के कोने-कोने से लोग धन, समय और शारीरिक सामर्थ्य खर्च करके अपने आराध्य तक पहुँचते हैं। इनमें बुजुर्ग, महिलाएँ और अस्वस्थ लोग भी होते हैं। कठिन यात्रा के बाद घंटों कतार में खड़े रहना और अंततः कुछ सेकंड के दर्शन पाना उनकी पीड़ा को बढ़ाता है। इस समस्या के बीच VIP संस्कृति भी चिंता का विषय है। विशेष व्यक्तियों को प्राथमिकता देने से यदि आम श्रद्धालुओं को अतिरिक्त प्रतीक्षा करनी पड़े, तो यह व्यवस्था उनकी आस्था और सम्मान दोनों को ठेस पहुँचाती है।

 

ईश्वर के दरबार में हर भक्त बराबर है; किसी की विशेष सुविधा आम श्रद्धालु की परेशानी का कारण नहीं बननी चाहिए। हिमालय की कठिन भौगोलिक परिस्थितियाँ सरकार और प्रशासन के सामने चुनौती अवश्य हैं, लेकिन बेहतर योजना और जवाबदेही की आवश्यकता को नकारा नहीं जा सकता। श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ना उपलब्धि हो सकती है, पर उनकी परेशानियाँ बढ़ना व्यवस्था की सफलता नहीं है।

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त्रियुगीनारायण से बद्रीनाथ तक

केदारनाथ के बाद त्रियुगीनारायण मंदिर में दर्शन का अवसर मिला। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी स्थल पर भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। मंदिर की अखंड धूनी तथा भगवान विष्णु की उपस्थिति इस स्थान की आध्यात्मिक महत्ता बढ़ाती है। इसके बाद बद्रीनाथ धाम में भगवान बद्रीविशाल के दर्शन के साथ यात्रा पूर्ण हुई। इन पवित्र स्थलों ने श्रद्धा, समर्पण और भारतीय संस्कृति की गहराई का अनुभव कराया।

 

आस्था या सोशल मीडिया का प्रदर्शन?

यात्रा के दौरान धार्मिक स्थलों पर तस्वीरें लेने और रील बनाने की बढ़ती प्रवृत्ति भी दिखाई दी। अनुभव साझा करना गलत नहीं है, लेकिन जब कैमरा श्रद्धा पर हावी हो जाए, तो तीर्थयात्रा का वास्तविक उद्देश्य पीछे छूटने लगता है। प्रश्न यह है कि हम ईश्वर के दर्शन करने जाते हैं या दुनिया को यह दिखाने कि हम दर्शन करने गए थे? भक्ति का वास्तविक आनंद लाइक और कमेंट में नहीं, बल्कि उस क्षण में है जब मन बिना किसी दिखावे के अपने आराध्य के सामने झुकता है।

 

सरकार और प्रशासन के लिए स्पष्ट संदेश

चारधाम यात्रा में उमड़ती भीड़ सरकार और प्रशासन के लिए अवसर से अधिक जिम्मेदारी है। दर्शन व्यवस्था, यातायात, पार्किंग, पेयजल, स्वच्छता, चिकित्सा और आपातकालीन सहायता को मजबूत करना अनिवार्य है। बुजुर्गों और दिव्यांगों के लिए विशेष सुविधाएँ सुनिश्चित की जानी चाहिए तथा VIP व्यवस्था के कारण आम श्रद्धालुओं का आवागमन और दर्शन बाधित नहीं होने चाहिए।

 

श्रद्धालुओं की सुरक्षा और सम्मान कोई सरकारी एहसान नहीं, बल्कि प्रशासन की बुनियादी जिम्मेदारी है। सरकार को घोषणाओं से आगे बढ़कर धरातल पर सुधार दिखाना होगा। समय रहते व्यवस्थाएँ नहीं सुधारी गईं, तो बढ़ती भीड़ भविष्य में गंभीर कठिनाइयाँ पैदा कर सकती है। विकास के साथ हिमालय के नाजुक पर्यावरण की रक्षा भी उतनी ही आवश्यक है।

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आस्था का सम्मान, व्यवस्था की जवाबदेही

10 अक्टूबर को लौटते समय मन में चारधाम के दर्शन का संतोष था, लेकिन व्यवस्थाओं में सुधार की आवश्यकता भी स्पष्ट थी। सरकार को जवाबदेही निभानी होगी, प्रशासन को संवेदनशील बनना होगा और यात्रियों को अनुशासन तथा पर्यावरण संरक्षण का पालन करना होगा।

 

आस्था अटूट है, लेकिन श्रद्धालुओं की सहनशीलता को व्यवस्था की कमजोरियों का विकल्प नहीं बनाया जा सकता। ईश्वर के दरबार में समानता तभी सार्थक होगी, जब प्रत्येक भक्त को समान सम्मान और यथासंभव सुविधाजनक दर्शन मिलें। क्योंकि चारधाम की यात्रा पैरों से जितनी पूरी होती है, उससे कहीं अधिक हृदय और आत्मा से पूरी होती है।

 

हर हर महादेव! जय बद्रीविशाल! जय माँ गंगे! जय माँ यमुना!

शारदीय नवरात्रि व्रत 2026: रोज-रोज साबूदाने की खिचड़ी खाने के 6 नुकसान

शारदीय नवरात्रि व्रत 2026: रोज-रोज साबूदाने की खिचड़ी खाने के 6 नुकसान

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शारदीय नवरात्रि के व्रत में साबूदाने की खिचड़ी सबसे लोकप्रिय और पसंदीदा फलाहार मानी जाती है। स्वाद और पेट भरने के लिहाज से यह बेहद बढ़िया विकल्प है, लेकिन नवरात्रि के दौरान इसका रोजाना और अत्यधिक सेवन स्वास्थ्य के लिए गंभीर नुकसान पहुँचा सकता है।

 

1. वजन बढ़ना और मोटापा

हाई कार्बोहाइड्रेट और कैलोरी: साबूदाने में कार्बोहाइड्रेट और कैलोरी की मात्रा बहुत अधिक होती है, जबकि इसमें प्रोटीन और फाइबर बेहद कम होता है।

अतिरिक्त वसा का जमाव: खिचड़ी बनाते समय इसमें मूंगफली, घी या तेल और आलू का इस्तेमाल होने से शरीर में फैट तेजी से जमा होता है, जिससे मोटापा बढ़ता है।

अन्य बीमारियों का खतरा: अत्यधिक वजन बढ़ने और मोटापे के कारण हृदय संबंधी समस्याएं, रक्तचाप, पथरी और अन्य गंभीर स्वास्थ्य बीमारियों का जोखिम बढ़ जाता है।

 

2. ब्लड शुगर लेवल में तेजी से बढ़ोतरी

उच्च ग्लाइसेमिक इंडेक्स: साबूदाने का ग्लाइसेमिक इंडेक्स काफी अधिक होता है, जिससे इसे खाते ही शरीर में ग्लूकोज का स्तर तेजी से बढ़ता है।

डायबिटीज मरीजों के लिए हानिकारक: अत्यधिक कार्बोहाइड्रेट का सेवन ब्लड शुगर स्पाइक कर सकता है। मधुमेह से पीड़ित या प्री-डायबिटिक लोगों को इसे अपने दैनिक डाइट रूटीन में शामिल न करने या डॉक्टर की सलाह के बाद ही बेहद सीमित मात्रा में खाने की सलाह दी जाती है।

 

3. पाचन संबंधी समस्याएं और कब्ज

फाइबर की कमी: साबूदाने में फाइबर न के बराबर होता है और यह स्वभाव से काफी स्टार्चयुक्त तथा चिपचिपा होता है।

पेट की परेशानियां: लगातार साबूदाना खाने से पाचन क्रिया धीमी पड़ सकती है, जिससे पेट में गैस, भारीपन, पेट फूलना और कब्ज जैसी समस्याएं होने लगती हैं।

 

4. हृदय, मस्तिष्क और श्वसन तंत्र पर प्रभाव

अंगों पर असर: साबूदाने का अत्यधिक सेवन मस्तिष्क और हृदय के स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है।

सांस लेने में दिक्कत: अधिक मात्रा में इसके सेवन से सांस लेने में कठिनाई महसूस हो सकती है।

 

5. गुर्दे की पथरी (किडनी स्टोन) में हानिकारक

पथरी की समस्या बढ़ना: यदि किसी को किडनी स्टोन (गुर्दे की पथरी) की समस्या है, तो साबूदाने की खिचड़ी का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि यह इस समस्या को और अधिक बढ़ा सकता है।

 

6. अन्य शारीरिक समस्याएं

अन्य लक्षण: बहुत अधिक मात्रा में साबूदाने की खिचड़ी खाने से उल्टी, सिर दर्द, सीने में दर्द, रक्त विकार और थायराइड जैसी कई अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का सामना भी करना पड़ सकता है।

 

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सबके लिए समय है… फिर अपने सपनों के लिए क्यों नहीं?

सबके लिए समय है... फिर अपने सपनों के लिए क्यों नहीं?

There is time for everything, then why not for your dreams

रात को सोने से पहले आप बीते दिन के बारे में सोचते हैं। कितने काम किए, कितनी जिम्मेदारियां निभाईं, कितने लोगों की जरूरत पूरी की, लेकिन जिस काम को करने की इच्छा सुबह मन में उठी थी, वह आज भी छूट गया। आप खुद को समझाते हैं- कल जरूर समय निकालूंगा।

 

कभी-कभी ऐसे ही कई महीने बीत जाते हैं। जीवन चलता रहता है, पर भीतर कोई इच्छा चुपचाप प्रतीक्षा करती रहती है। उसे याद करते ही एक कसक उठती है- क्या मेरा जीवन केवल जरूरी काम निपटाते हुए बीत जाएगा?

 

इस प्रश्न में आपके भीतर बचे हुए सपने की आवाज है। उसे सुनिए। हो सकता है वह आपको किसी अधूरे काम की याद दिला रही हो, किसी दबे हुए हुनर की ओर बुला रही हो या जीवन को थोड़ा अधिक अर्थपूर्ण बनाने का आग्रह कर रही हो।

 

हम अक्सर अपनी इच्छाओं को इसलिए पीछे रख देते हैं क्योंकि जिम्मेदारियां सामने खड़ी होती हैं। परिवार, आजीविका और संबंधों का महत्त्व अपनी जगह है लेकिन उन्हें निभाते हुए अपनी क्षमताओं के लिए थोड़ी जगह बचाना भी जरूरी है। आपके भीतर जो अच्छा है, उसे विकसित होने का अवसर मिलना चाहिए।

 

अपने आप से पूछिए, कौनसा काम करने के बाद मुझे केवल थकान नहीं, मन में संतोष भी मिलता है? किस काम को बेहतर करने की इच्छा बार-बार लौटती है? लोग किस बात के लिए मेरी सहायता लेते हैं? इन प्रश्नों के उत्तर आपकी छिपी प्रतिभा का परिचय दे सकते हैं।

 

हो सकता है आप कठिन बात आसानी से समझा लेते हों। लोगों की परेशानी धैर्य से सुनते हों। किसी अव्यवस्थित काम को संवार देते हों। लिखने, सिखाने, बनाने या समस्याएं सुलझाने में आपकी सहज रुचि हो। जिसे आप सामान्य समझकर अनदेखा करते आए हैं, वही आपकी विशेष क्षमता हो सकती है।

कब मनाया जाएगा विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस? जानें कब हुई इसकी शुरुआत और क्‍या है उद्देश्‍य?

कब मनाया जाएगा विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस? जानें कब हुई इसकी शुरुआत और क्‍या है उद्देश्‍य?

Why is World Mental Health Day observed, When did it begin and what is its objective

World Mental Health Day 2026: मनुष्य की शारीरिक सेहत की भांति ही उसका मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) भी संपूर्ण जीवन का एक महत्वपूर्ण आधार है। इसी विचार को ध्येय बनाकर प्रति वर्ष 10 अक्टूबर को अंतरराष्‍ट्रीय स्तर पर विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है। इस विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के नेतृत्व में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के प्रति वैश्विक जागरूकता बढ़ाने और मानसिक देखभाल को बढ़ावा देने का प्रयास किया जाता है। कब हुई विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस की शुरुआत और क्‍या है इस दिवस को मनाने का उद्देश्‍य? आइए जानते हैं विस्‍तार से…

 

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस का इतिहास

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाने की शुरुआत वर्ष 1992 में हुई थी। दरअसल उस समय के संयुक्त राष्ट्र के तत्कालीन महासचिव यूजीन ब्रॉडी ने दुनियाभर में इस दिवस को मनाए जाने की सलाह दी थी और स्वास्थ्य संघ की पहल पर ही पहली बार इस दिवस को मनाया गया था। तब से ही यह दिवस अब दुनियाभर में मनाया जाने लगा। 

 

इस अंतरराष्‍ट्रीय अभियान का नेतृत्व विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और ‘वर्ल्ड फेडरेशन फॉर मेंटल हेल्थ’ (WFMH) द्वारा संयुक्त रूप से किया जाता है। यह केवल एक औपचारिक दिन नहीं, बल्कि 100 से अधिक देशों में चलाया जाने वाला एक व्यापक जनजागरूकता अभियान है।

 

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाने का उद्देश्‍य

वर्तमान समय में भागदौड़ वाली जिंदगी में तनावरहित जीना बहुत ही मुश्किल हो गया है। हर साल विश्वभर में 10 अक्टूबर को विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस या मानसिक दिवस मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य मेंटल हेल्थ या मानसिक स्वास्थ्य को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ाना है। 

 

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाने का उद्देश्‍य जनसामान्य को यह समझाना कि मन की बीमारियां और तनाव भी शरीर की अन्य बीमारियों की तरह स्वाभाविक हैं। साथ ही इस दिवस के जरिए समाज के हर वर्ग तक मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं और परामर्श की पहुंच सुनिश्चित करना है।

 

पीड़ित व्यक्तियों को सही समय पर अपनों का संबल और चिकित्सीय सहायता प्राप्त करने के लिए प्रेरित करना। मानसिक रोग से पीड़ित लोगों को प्रायः समाज की उपेक्षा या पूर्वाग्रहों का सामना करना पड़ता है। यह दिवस इस झिझक और रुढ़िवादिता को तोड़कर खुलकर बात करने का मंच प्रदान करता है।

 

समय पर लक्षणों की पहचान कर डिप्रेशन, एंग्जायटी (चिंता) और अत्यधिक तनाव जैसी समस्याओं को गंभीर रूप लेने से रोका जा सकता है। विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि यदि हम स्वयं या हमारे आसपास कोई व्यक्ति मानसिक दबाव से गुजर रहा है, तो सहायता मांगना कमजोरी नहीं बल्कि बुद्धिमत्ता और साहस का लक्षण है।

 

मानसिक बीमारियों से बचाव के लिए क्या करें?

व्यस्तता भरे दिनचर्या से खुद के लिए समय निकालें।

पोषक तत्व वाले भोजन को जीवन का हिस्सा बनाएं।

प्रोफेशनल डॉक्टर का सहारा लें।

नकारात्मक लोगों से दूरी रखें।

तनाव को नियंत्रित करें।

मेडिटेशन को अपनाएं।

योग का सहारा लें।

हमेशा खुश रहें।

अकेले न रहें।

Maharaja Agrasen Jayanti: कौन थे महाराजा अग्रसेन? 5000 साल पहले दी थी ऐसी न्यायनीति, जानकर रह जाएंगे हैरान

Maharaja Agrasen Jayanti: कौन थे महाराजा अग्रसेन? 5000 साल पहले दी थी ऐसी न्यायनीति, जानकर रह जाएंगे हैरान

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Maharaja Agrasen Jayanti 2026: भारत के महान लोकनायक एवं महाराजा अग्रसेन की जयंती 11 अक्टूबर, रविवार 2026 को मनाई जाएगी। हिन्दू पंचांग के अनुसार, उनका जन्म आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को हुआ था। महाराजा अग्रसेन समानता पर आधारित आर्थिक नीति को अपनाने वाले संसार के प्रथम सम्राट थे। महाराजा अग्रसेन को समाजवाद का अग्रदूत भी कहा जाता है। महाराजा अग्रसेन की न्यायनीति प्राचीन भारत के इतिहास में सबसे अनोखी, मानवीय और प्रेरणादायक मानी जाती है। आइए जानते हैं महाराजा अग्रसेन की न्यायनीति और उनके जीवन के बारे में विस्‍तार से…

 

कौन थे महाराजा अग्रसेन?

महाराजा अग्रसेन का जन्म सूर्यवंशी क्षत्रिय राजा वल्लभ सेन के यहां हुआ था जो प्रतापनगर के राजा थे। मान्यता के अनुसार इनका जन्म मर्यादा पुरुषोतम भगवान श्रीराम की 34वीं पीढ़ी में द्वापर के अंतिमकाल और कलियुग के प्रारंभ में आज से 5000 वर्ष पूर्व हुआ था।

 

यह भी कहा जाता है कि उनका जन्म विक्रम संवत प्रारंभ होने के करीब 3130 साल पहले हुआ था। कहते हैं कि महाभारत के युद्ध के समय महाराज अग्रसेन 15 वर्ष के थे। महाराज अग्रसेन ने 108 वर्षों तक राज किया। उनके 18 पुत्र हुए जिनसे 18 गोत्र चले। गोत्रों के नाम गुरुओं के गोत्रों पर रखे गए।

 

‘1 रुपया और 1 ईंट’ का स्वर्णिम सिद्धांत

महाराजा अग्रसेन की न्यायनीति का सबसे बड़ा स्तंभ उनकी सामाजिक सहायता प्रणाली थी। जब भी कोई नया परिवार उनके राज्य (अग्रोहा) में आकर बसता था तो राज्य का प्रत्येक नागरिक उसे 1 रुपया और 1 ईंट भेंट करता था।

इसका उद्देश्‍य यह था कि 1 ईंट से वह व्यक्ति अपने रहने के लिए घर बना लेता था और रुपयों से अपना व्यापार शुरू कर पाता था। इस व्यवस्था से कोई भी व्यक्ति असहाय या गरीब रहकर अपराध (जैसे चोरी या लूट) की ओर प्रवृत्त नहीं होता था। उन्होंने समाज से असमानता मिटाकर अपराध की संभावना को ही समाप्त कर दिया था।

 

अहिंसात्मक एवं सुधारात्मक दंडनीति

महाराजा अग्रसेन शारीरिक हिंसा, मृत्युदंड या कठोर कारावास के घोर विरोधी थे। यदि कोई नागरिक पहली बार कोई अपराध या गलती करता था, तो उसे तुरंत कठोर दंड देने के बजाय सुधरने का अवसर दिया जाता था। दंड ऐसा होता था जिससे अपराधी में पश्चाताप की भावना जागे, न कि प्रतिशोध की।

महाराजा अग्रसेन का न्याय केवल अपराध की सजा देने तक सीमित नहीं था, बल्कि अपराध की जड़ (गरीबी और लाचारी) को समाप्त करने और समाज में समानता स्थापित करने पर केंद्रित था।

 

आर्थिक समानता और स्वाभिमान

महाराजा अग्रसेन ने अपने राज्य में ऐसी व्यवस्था बनाई थी जहां कोई भी व्यक्ति याचक (भिखारी) न बने। उनका मानना था कि किसी को बिना काम किए दान देना उसके स्वाभिमान को चोट पहुंचाता है। इसलिए उन्होंने ऐसी नीति बनाई जिससे हर व्यक्ति को व्यापार या कृषि का साधन मिले और वह स्वाभिमान से अपनी जीविका चला सके।

 

प्रजातांत्रिक एवं लोकतांत्रिक न्याय

महाराजा अग्रसेन ने राजतंत्र में भी लोकतांत्रिक सिद्धांतों को लागू किया। उन्होंने राज्य को 18 प्रशासनिक इकाइयों में विभाजित किया था और 18 यज्ञों के माध्यम से 18 गोत्रों की स्थापना की। निर्णय अकेले राजा द्वारा नहीं, बल्कि गणराज्य के प्रतिनिधियों और गुरुओं की सलाह व सहमति से निष्पक्ष रूप से लिए जाते थे।

 

राजा और प्रजा के बीच विश्वास

उनकी न्यायनीति इतनी पारदर्शी और लोककल्याणकारी थी कि प्रजा को कभी अदालती चक्करों या शोषण का सामना नहीं करना पड़ता था। राज्य में विश्वास और बंधुत्व का वातावरण था, जिससे अपराध दर न के बराबर थी।

महाराजा अग्रसेन की न्यायनीति केवल कानून लागू करने तक सीमित नहीं थी, बल्कि वह कल्याणकारी राज्य और व्यवहारिक समाजवाद का पहला ऐतिहासिक उदाहरण थी, जहां न्याय का अर्थ समाज के हर व्यक्ति को बराबरी का अवसर और सम्मान देना था।

 

पशु हिंसा पर प्रतिबंध

उन्होंने अपने राज्य में यज्ञों में दी जाने वाली बलि और पशु हिंसा पर पूर्णतः प्रतिबंध लगा दिया था। उनका मानना था कि जीव हत्या अन्याय है।

 

महाराज अग्रसेन के मुख्‍य 3 आदर्श

महाराज अग्रसेन ने एक ओर हिन्दू धर्मग्रंथों में वैश्य वर्ण के लिए निर्देशित कर्मक्षेत्र को स्वीकार किया और दूसरी ओर देशकाल के परिप्रेक्ष्य में नए आदर्श स्थापित किए। उनके जीवन के मूल रूप से 3 आदर्श हैं- लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था, आर्थिक समरूपता एवं सामाजिक समानता।

क्यों मनाया जाता है भारतीय वायुसेना दिवस? जानें दुनिया की चौथी सबसे बड़ी ताकत का इतिहास

क्यों मनाया जाता है भारतीय वायुसेना दिवस? जानें दुनिया की चौथी सबसे बड़ी ताकत का इतिहास

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Indian Air Force Day 2026: हर साल 8 अक्टूबर को भारतीय वायुसेना दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह वह पावन अवसर है जब पूरा देश अपनी वायुसेना के शौर्य, अदम्य साहस और समर्पण को नमन करता है। ‘नभः स्पृशं दीप्तम्’ (गर्व के साथ आकाश को छूना) के अमर ध्येय वाक्य को जीने वाली भारतीय वायुसेना केवल हमारी सीमाओं की रक्षा ही नहीं करती, बल्कि देशवासियों के विश्वास का वो मज़बूत आधार है जो हर संकट में ढाल बनकर खड़ा रहता है। 8 अक्टूबर 1932 को भारतीय वायुसेना की स्थापना हुई थी। आइए जानते हैं भारतीय वायुसेना दिवस पर उसके इतिहास और महत्‍व के बारे में विस्‍तार से… 

 

भारतीय वायुसेना का इतिहास

8 अक्टूबर 1932 को ब्रिटिश शासनकाल के दौरान ‘रॉयल इंडियन एयर फोर्स’ (RIAF) के रूप में इसकी नींव रखी गई। 1 अप्रैल 1933 को महज 4 वेस्टलैंड वापिटी विमानों और 6 निडर भारतीय अधिकारियों के साथ वायुसेना के पहले स्क्वाड्रन ने सांसें लीं। द्वितीय विश्व युद्ध में अदम्य साहस दिखाने के लिए इसे ‘रॉयल’ उपाधि मिली थी।

इसे 1950 में पूर्ण गणतंत्र घोषित होने से पहले ‘रॉयल इंडियन एयरफोर्स’ के नाम से जाना जाता था। इसने 1945 के द्वितीय विश्वयुद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 1950 में आजादी यानी पूर्ण गणतंत्र घोषित होने के बाद इसमें से ‘रॉयल’ शब्द हटाकर उसे सिर्फ इंडियन एयर फोर्स (Indian Air Force) कर दिया गया। दुनियाभर में सिर्फ अमेरिका, चीन और रूस के पास भारत से बड़ी वायुसेना मौजूद है।

 

शौर्य और अभियानों की गाथा

भारतीय वायुसेना दुनिया की चौथी सबसे बड़ी और ताकतवर वायुसेना है, जिसने इतिहास के हर मोड़ पर अपनी श्रेष्ठता साबित की है। साल 1947, 1965, 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्धों से लेकर 1962 के भारत-चीन युद्ध और 1999 के कारगिल युद्ध की बर्फीली चोटियों तक वायुसेना ने दुश्मनों के हौसले पस्त किए हैं।

सियाचिन की शून्य से नीचे की बर्फ में ‘ऑपरेशन मेघदूत’, मालदीव में लोकतंत्र बचाने का ‘ऑपरेशन कैक्टस’ और 2019 में सीमा पार जाकर की गई ‘बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक’ वायुसेना की अचूक क्षमता का प्रमाण हैं। 

 

आपदा में सबसे पहली उम्मीद

वायुसेना केवल विनाशकारी युद्धों के लिए ही नहीं, बल्कि संकटग्रस्त जिंदगियों को बचाने के लिए भी जानी जाती है। प्राकृतिक आपदाओं (चाहे उत्तराखंड की विनाशकारी बाढ़ हो, गुजरात का भूकंप या केरल की सुनामी) हर जगह वायुसेना के चॉपर संकटमोचन बनकर पहुंचे हैं। महामारी या विदेशों में गृहयुद्ध के दौरान फंसे भारतीयों और मित्र देशों के नागरिकों को सुरक्षित निकालने में वायुसेना के सी-17 ग्लोबमास्टर जैसे विशाल विमानों ने हमेशा मिसाल कायम की है।

 

जब वायुसेना नीले गगन में रचती है इतिहास

वायुसेना दिवस का जश्न सिर्फ एक औपचारिक परेड नहीं, बल्कि भारत की सैन्य ताकत और एयरोबेटिक कलाबाजी का अद्भुत संगम है। कार्यक्रम की शुरुआत वायुसेना प्रमुख द्वारा राष्ट्रीय ध्वज फहराने, भव्य परेड के निरीक्षण और अदम्य साहस दिखाने वाले वीर वायु सैनिकों को वीरता पदकों से अलंकृत करने के साथ होती है।

 

देश के अलग-अलग हिस्सों में आयोजित होने वाले भव्य एयर शो में जब राफेल, सुखोई Su-30MKI, स्वदेशी तेजस, जगुआर और मिराज जैसे घातक लड़ाकू विमान एक साथ उड़ान भरते हैं, तो धरती से आसमान तक गर्व की लहर दौड़ जाती है। एयरोबेटिक टीम ‘सूर्य किरण’ के लाल-सफेद विमान और ‘सारंग’ हेलीकॉप्टर दल जब हवा में जटिल और हैरतअंगेज फॉर्मेशन्स बनाते हैं, तो दर्शक दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर हो जाते हैं।

 

भारतीय वायुसेना की भविष्य की ओर उड़ान

आज भारतीय वायुसेना केवल अपनी पुरानी विरासत पर निर्भर नहीं है, बल्कि भविष्य की चुनौतियों के लिए तेज़ी से खुद को बदल रही है। ‘मेक इन इंडिया’ के तहत ‘तेजस’ (LCA), प्रचंड अटैक हेलीकॉप्टर और आधुनिक ड्रोन प्रणालियों को शामिल कर आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ाए गए हैं। अब वायुसेना केवल हवाई सीमा तक सीमित नहीं है, बल्कि स्पेस (अंतरिक्ष) और साइबर सुरक्षा के नए आयामों में भी अपनी पकड़ मज़बूत कर रही है।

 

भारतीय वायुसेना का महत्व

वर्तमान युग में युद्ध की स्थिति में सबसे अधिक महत्व वायुसेना का होता है, इसलिए सेना के इस अंग का सबसे मजबूत होना अति आवश्यक है। भारतीय वायुसेना दुनिया की चौथी सबसे बड़ी वायुसेना है। दुनियाभर में सिर्फ अमेरिका, चीन और रूस के बाद भारत में बड़ी वायुसेना मौजूद है। भारतीय वायुसेना कई ऐसे लड़ाकू विमान हैं जो इसे दुनिया की चौथी सबसे बड़ी वायुसेना होने का दर्जा दिलाती है। भारतीय वायुसेना बल, वीरता और पराक्रम का प्रतीक है।

 

वायुसेना दिवस पर भारतीय वायु सैनिकों की बहादुरी, शौर्य और पराक्रम के लिए उन्हें सलाम करती है। यह दिवस हर भारतीय के दिल में देशभक्ति का जज़्बा जगाता है और उन वीर सपूतों को नमन करने का अवसर देता है जो दिन-रात हमारी नींद की हिफाज़त के लिए आसमान में पहरा देते हैं। 

भगवान के ठेकेदार और चमत्कार का कारोबार, सोशल मीडिया पर धर्म के नाम पर फैलता अंधविश्वास

भगवान के ठेकेदार और चमत्कार का कारोबार, सोशल मीडिया पर धर्म के नाम पर फैलता अंधविश्वास

Godmen miracle business

भगवान और भक्त के बीच की दूरी जितनी कम है, बाबा और भक्त के बीच का बाजार उतना ही बड़ा होता जा रहा है। कभी भगवान तक पहुंचने के लिए मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा या चर्च जाना पड़ता था। अब मोबाइल की स्क्रीन ही नया दरबार है। बाबा लाइव हैं, चमत्कार लाइव है, आशीर्वाद लाइव है और भक्त भी लाइव है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले आस्था निजी हुआ करती थी, अब वह कंटेंट है—और कंटेंट जितना सनसनीखेज हो, उसकी कमाई उतनी ज्यादा। 

 

मनुष्य ने सदियों से भगवान को समझने की कोशिश की है। इसी कोशिश के बीच कुछ लोगों ने खुद को भगवान और भक्त के बीच की अनिवार्य कड़ी घोषित कर दिया। कोई संत बना, कोई बाबा, कोई गॉडमैन और कोई चमत्कारी पुरुष। कोई सीधे हनुमानजी को टेलीफोन लगाता है तो कोई उलटे-सीधे प्रयोग से परेशानी दूर करने का दावा करता है। दावा एक ही—हमारे पास वह शक्ति है जो आपके पास नहीं है।

 

बीमारी है? बाबा ठीक कर देंगे। नौकरी नहीं मिल रही? बाबा रास्ता बताएंगे। शादी नहीं हो रही? बाबा उपाय बताएंगे। कारोबार नहीं चल रहा? बाबा ग्रह बदल देंगे। भविष्य जानना है? बाबा सब जानते हैं। और सबसे दिलचस्प बात यह है कि बाबा का दावा जितना बड़ा होता जाता है, भक्त का सवाल उतना छोटा।

अंधविश्वास की असली ताकत डर है

अंधविश्वास हमेशा मूर्ख लोगों में नहीं पनपता। वह अक्सर परेशान लोगों में पनपता है। जिसके घर में कोई बीमार हो, जिसके पास नौकरी न हो, जिसके कारोबार में लगातार नुकसान हो रहा हो, जिसकी संतान परेशान हो या जिसे भविष्य अंधकारमय दिखाई दे रहा हो—उसे तर्क से ज्यादा तत्काल उम्मीद चाहिए।

 

यहीं चमत्कार का बाजार शुरू होता है।

 

विज्ञान कहता है—इलाज में समय लगेगा। व्यवस्था कहती है—प्रक्रिया पूरी करनी होगी। अर्थव्यवस्था कहती है—मेहनत करनी होगी। 
 

बाबा कहता है—बस विश्वास रखो। और संकट में फंसा इंसान इस छोटे से वाक्य में बड़ी राहत खोज लेता है।

 

यही कारण है कि अंधविश्वास को केवल हंसी में उड़ाना भी पर्याप्त नहीं है। उसके पीछे इंसान की असुरक्षा, डर और उम्मीद छिपी होती है। इस कमजोरी को समझने वाले लोग ही उसे सबसे आसानी से बाजार में बदलते हैं।

सोशल मीडिया ने बाबा को आश्रम से निकालकर हमारी जेब में पहुंचा दिया

 

पहले किसी बाबा के चमत्कार की खबर सुनने के लिए किसी भक्त को आश्रम जाना पड़ता था। अब एक रील काफी है। एक वीडियो में बाबा किसी बीमार व्यक्ति के सिर पर हाथ रखते हैं। अगले फ्रेम में वह व्यक्ति ठीक दिखाई देता है।

 

वीडियो वायरल।

 

नीचे हजारों कमेंट— “जय बाबा की।” “साक्षात भगवान।” “जिसे विश्वास नहीं, वह खुद भुगतेगा।”

 

बस, चमत्कार प्रमाणित हो गया।

 

लेकिन किसी ने यह नहीं पूछा कि बीमारी क्या थी? डॉक्टर ने क्या कहा था? इलाज क्या चल रहा था? व्यक्ति वास्तव में ठीक हुआ या नहीं? वीडियो के पहले और बाद की पूरी कहानी क्या थी?

 

क्यों पूछेंगे? हमें चमत्कार पसंद है, प्रक्रिया नहीं।

 

सोशल मीडिया की सबसे बड़ी समस्या यही है कि वहां वायरल होना कई बार सत्य का प्रमाण समझ लिया जाता है।

एक बाबा की सौ भविष्यवाणियों में दो सही निकल जाएं तो उन्हीं दो के वीडियो लाखों बार चलेंगे। बाकी अट्ठानवे गलत भविष्यवाणियां किसी को याद नहीं रहेंगी। यह चमत्कार नहीं, हमारी स्मृति और हमारी मानसिकता का खेल है।

धर्म को बचाने के लिए अंधविश्वास से लड़ना जरूरी है

धर्म और अंधविश्वास एक चीज नहीं हैं। धर्म आपको विनम्र बना सकता है। अंधविश्वास आपको किसी व्यक्ति का अंधभक्त बना सकता है। 

 

धर्म आपको भीतर देखने की प्रेरणा दे सकता है। अंधविश्वास आपको हर समस्या का समाधान बाहर किसी बाबा में खोजने को मजबूर कर सकता है।

 

धर्म प्रश्नों से डरता नहीं। अंधविश्वास सवाल से डरता है। यही फर्क हमें समझना होगा।

 

किसी संत का सम्मान करना अच्छी बात है। किसी आध्यात्मिक व्यक्ति से सीखना भी अच्छी बात है। लेकिन किसी इंसान को सर्वशक्तिमान मान लेना और अपने जीवन के निर्णय उसकी इच्छा पर छोड़ देना खतरनाक है।

 

भगवान में विश्वास व्यक्तिगत आस्था है, लेकिन इंसान को भगवान बना देना सामाजिक जोखिम।

असली चमत्कार क्या है?

शायद हमें चमत्कार की परिभाषा बदलने की जरूरत है। किसी बीमार व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाना चमत्कार है। किसी गरीब बच्चे की पढ़ाई का खर्च उठाना चमत्कार है। किसी बेरोजगार को काम दिलाना चमत्कार है। किसी निराश इंसान को आत्मविश्वास लौटाना चमत्कार है।

 

लेकिन इसके लिए कैमरा नहीं चाहिए। रील नहीं चाहिए। लाखों व्यूज नहीं चाहिए। और शायद इसीलिए ये चमत्कार वायरल नहीं होते। हमें उन लोगों से सावधान रहना चाहिए जो हर समस्या का समाधान अपने पास होने का दावा करते हैं। क्योंकि जो व्यक्ति आपको हर सवाल का जवाब देने का दावा करता है, संभव है कि वह सबसे पहले आपके सवाल पूछने की क्षमता छीनना चाहता हो।

भगवान को एजेंट की जरूरत नहीं

सबसे बड़ा सवाल यही है—अगर भगवान सर्वशक्तिमान हैं, तो उन्हें हमारे और अपने बीच किसी एजेंट की जरूरत क्यों होगी?
 

प्रार्थना के लिए दलाल क्यों? आस्था के लिए फीस क्यों? चमत्कार के लिए पैकेज क्यों? और भगवान तक पहुंचने के लिए किसी इंसान के प्रमाणपत्र की जरूरत क्यों? शायद भगवान से हमारा रिश्ता जितना निजी होगा, बाबा का कारोबार उतना ही छोटा होगा।
 

इसलिए धर्म छोड़ने की जरूरत नहीं है। बाबा के पीछे भागना भी जरूरी नहीं है। जरूरत सिर्फ इतनी है कि आस्था के साथ विवेक भी बचा रहे। क्योंकि आस्था आंखें बंद करके चलना नहीं है।

 

आस्था वह है जिसमें आंखें खुली हों और फिर भी विश्वास कायम रहे।

 

और याद रखिए— जिस समाज में सवाल पूछने वाले कम और चमत्कार बताने वाले ज्यादा हो जाएं, वहां भगवान से ज्यादा खतरा भगवान के ठेकेदारों से होता है। आज सोशल मीडिया पर हमें चमत्कारों की नहीं, सवालों की वायरलिटी चाहिए।

क्योंकि जिस दिन हर बाबा के चमत्कार से पहले एक भक्त पूछेगा—“प्रमाण क्या है?” उस दिन शायद अंधविश्वास की सबसे बड़ी दुकान अपने आप बंद हो जाएगी।
-धर्मराज

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस: यदि दयालुता हमारा स्वभाव है, तो हिंसा कहाँ से आती है?

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस: यदि दयालुता हमारा स्वभाव है, तो हिंसा कहाँ से आती है?

shri shri ravishankar

– – गुरुदेव श्री श्री रविशंकर

हर व्यक्ति का स्वाभाविक स्वरूप दयालु, प्रेमपूर्ण, करुणामय और आनंदमय होता है। कोई भी बच्चा बिना किसी कारण के नहीं रोता। वह तभी रोता है जब उसे भूख लगी हो, नींद आ रही हो या वह भयभीत हो। इसी प्रकार, यदि कोई व्यक्ति हिंसक है तो उसके पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है। यदि किसी में करुणा का अभाव है तो उसके पीछे भी कोई कारण छिपा होता है। और यदि हम वास्तव में उसकी जड़ तक जाएँ, तो हमें वहाँ अकेलापन, भय, अस्वीकृति की भावना और अपनेपन का अभाव ही देखने को मिलेगा।

 

जब कोई व्यक्ति शारीरिक रूप से बीमार होता है तो हम उसे अस्पताल भेजते हैं; वहीं जब उसके व्यवहार में विकृति आ जाती है तो हम उसे जेल भेज देते हैं। लेकिन जेल भेजने के बाद भी हम उसे ऐसे साधन और तकनीकें उपलब्ध नहीं कराते, जिनसे वह अपने व्यवहार में सुधार ला सके और अपनी भावनाओं को समझकर उन्हें बदल सके।

 

आज दुनिया में होने वाली आधी से अधिक हिंसा के पीछे मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियाँ हैं। मानसिक स्वास्थ्य आज पूरे विश्व के सामने खड़ी सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। चाहे देश विकासशील हो या विकसित, क्षेत्र युद्धग्रस्त हो या शांतिपूर्ण समाज—यह संकट हम सभी को प्रभावित करता है। यह अत्यंत चिंताजनक विषय है कि विश्व में हर 42 सेकंड में एक व्यक्ति अपना जीवन समाप्त कर रहा है। असंख्य युवा या तो आक्रामक और हिंसक होते जा रहे हैं या फिर अवसाद (डिप्रेशन) का शिकार हो रहे हैं। भारत अपनी समृद्ध आध्यात्मिक परंपरा के माध्यम से इस वैश्विक मानसिक स्वास्थ्य संकट से निपटने में दुनिया का मार्गदर्शन कर रहा है।

 

सामान्यतः न तो घर पर और न ही विद्यालय में हमें अपनी भावनाओं को संभालना सिखाया जाता है। कभी-कभी अकेलापन महसूस होना स्वाभाविक है; पर्याप्त धन, परिवार और मित्र होने पर भी व्यक्ति भीतर से उदास या अकेला अनुभव कर सकता है। आज मानसिक स्वास्थ्य के एक बड़े संकट के रूप में उभर रहा यह अकेलापन इसलिए है, क्योंकि हमने स्वयं के साथ समय बिताना और अपने भीतर शांत रहना सीखा ही नहीं है। यदि हम यह कला सीख लें, तो हमारे भीतर का आनंद हमारे आसपास के प्रत्येक व्यक्ति तक स्वतः पहुँचने लगेगा।

 

यहाँ हमारी ‘श्वास’ (साँस) एक स्वस्थ मन की कुंजी बनती है। एक स्वस्थ मन के लक्षण क्या हैं? आपके चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान जिसे कोई आपसे छीन न सके, और अपने भीतर एक ऐसा आत्मविश्वास कि आप किसी भी चुनौती का निर्भीकता से सामना कर सकें। स्वस्थ मन वह है जो रचनात्मक आलोचना को स्वीकार कर सके और स्वयं भी स्वस्थ व सकारात्मक आलोचना करने का साहस रखे। यह निर्भय होने के साथ-साथ विनम्र बने रहने की अद्भुत क्षमता है।

 

प्रत्येक भावना शरीर के किसी न किसी विशेष हिस्से में विशिष्ट संवेदनाएँ उत्पन्न करती है, और इसका सीधा संबंध हमारी श्वास से होता है। जब हम उदास होते हैं तब हमारी श्वास की गति व ढंग अलग होता है, और जब हम प्रसन्न होते हैं तब वह भिन्न होता है।

 


जब आप क्रोधित, निराश या ईर्ष्यालु होते हैं, तो प्रायः यह समझ नहीं आता कि उन नकारात्मक भावनाओं का क्या करें, और हम उन्हें अपने भीतर ही दबाकर रखते हैं। लेकिन आपकी श्वास मानो आपसे कह रही होती है— “मैं दिन-रात तुम्हारे भीतर प्रवाहित होती रहती हूँ। यदि तुम मुझ पर थोड़ा-सा ध्यान दे दो, तो मैं तुम्हें प्रसन्न रखूँगी, तुम्हारी आत्मा को ऊर्जावान व प्रफुल्लित रखूँगी और तुम्हारी जीवन-ऊर्जा को जीवंत बनाए रखूँगी।”

 

आज दुनिया भर में करोड़ों लोगों ने सरल श्वास तकनीकों और ध्यान (Meditation) को अपनाया है, जिससे उनके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आया है। उदाहरण के लिए, ‘सुदर्शन क्रिया’ ने अनेक लोगों को निराशा और चिंता से उबरने में सहायता की है। ये तकनीकें हमें अपने मन का स्वामी बनना सिखाती हैं, न कि अपने ही मन का शिकार बने रहना।

वरिष्ठ अधिकारी चक्रपाणि दत्त मिश्र की पुस्तक ‘कमेंट्री ऑन इंडियन स्टाम्प एक्ट, 1899’ का गौरवमयी विमोचन

वरिष्ठ अधिकारी चक्रपाणि दत्त मिश्र की पुस्तक 'कमेंट्री ऑन इंडियन स्टाम्प एक्ट, 1899' का गौरवमयी विमोचन

Grand launch of book Commentary on Indian Stamp Act 1899 by senior officer Chakrapani Dutt Mishra

इंदौर में आयोजित एक भव्य गौरवमयी समारोह में वरिष्ठ अधिकारी चक्रपाणि दत्त मिश्र (जिला पंजीयक एवं स्टाम्प कलेक्टर) द्वारा लिखित पुस्तक- ‘कमेंट्री ऑन इंडियन स्टाम्प एक्ट, 1899 (एज एप्लीकेबल टू द स्टेट ऑफ एम.पी.)’ का भव्य विमोचन संपन्न हुआ। खेत्रपाल लॉ हाउस, इंदौर द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक स्टाम्प विधि व प्रशासनिक क्षेत्र के लिए अत्यंत उपयोगी मानी जा रही है।

समारोह का शुभारंभ दीप प्रज्वलन से हुआ, जिसके बाद बेबी अलायना ने गणेश वंदना और आकांक्षा जाचक शेट्टी ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। मंचासीन अतिथियों, सभागार में बड़ी संख्या में उपस्थित प्रशासनिक/राजस्व अधिकारियों,वरिष्ठ अधिवक्ताओं,सर्विस प्रोवाइडर्स का शब्द पुष्प से स्वागत इंदौर परिक्षेत्र के डी.आई.जी. रजिस्ट्रेशन उमाशंकर बाजपेयी ने किया। उन्होंने कहा कि लेखक द्वारा पद पर रहते हुए अपने अनुभवों के आधार पर की गई यह कमेंट्री सर्वहितकारी और उपयोगी साबित होगी। इसके पश्चात अतिथियों द्वारा मंच पर बनी आदमकद पुस्तक का पर्दा हटाकर औपचारिक अनावरण किया गया।

 

लेखक चक्रपाणि दत्त मिश्र ने बताया कि मध्यप्रदेश में ‘संपदा परियोजना’ के जरिए कागज रहित कार्य करते हुए त्वरित पीडीएफ दिया जाता है। उन्होंने कहा कि विधिक विवेक, स्वांतःसुखाय तथा समाज-सुखाय हेतु 1200 पृष्ठों की इस पुस्तक की रचना की गई है, जिसमें 101 केस स्टडीज, व्यावहारिक समस्याएं व उनके समाधान शामिल हैं। अधिनियम पर न्याय निर्णयों की कठिन शब्दावली के बीच सेतु बनने के लिए इस पुस्तक को लिखा गया है ताकि लोक प्राधिकारी,अधिवक्ता,न्यायाधीश, विधि के विद्यार्थी और आम नागरिक इसे सरलता से समझ सकें।

 

गेस्ट ऑफ़ ऑनर, इंदौर के संभागायुक्त (IAS) भास्कर लक्षकार ने कहा कि पद पर रहते हुए किताब लिखना बड़ी बात है। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक प्रशासनिक स्तर के साथ-साथ एवं आम जनता के स्तर पर आने वाली स्टाम्प ड्यूटी संबंधी कठिनाइयों के निवारण में यह पुस्तक सहायक साबित होगी तथा एक सच्चे एवं प्रभावी संदर्भ ग्रन्थ की तरह स्टाम्प शुल्क की प्रभार्यता संबंधी दुविधाओं को दूर कर सही मार्गदर्शन करेगी।

 

पुस्तक पर चर्चा में जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश हिदायत उल्ला खान ने इसे विधि के क्षेत्र में ‘मील का पत्थर’ करार दिया। वहीं पूर्व अतिरिक्त महाधिवक्ता मनोज द्विवेदी ने कहा कि लिटिगेशन को कम करने तथा स्टाम्प ड्यूटी व रजिस्ट्रेशन की समस्याओं को सुलझाने में यह अनुभव-आधारित पुस्तक अत्यंत कारगर होगी। भोपाल से पधारे विशिष्ट अतिथि स्वप्नेश शर्मा (सीनियर डिस्ट्रिक्ट रजिस्ट्रार, भोपाल एवं संपदा के परियोजना अधिकारी ) ने बताया कि इंदौर जिला अकेले 25% राजस्व देता है और लेखक के 30 वर्षों के अनुभवों से राज्य की अर्थव्यवस्था व टैक्स कलेक्शन को समृद्धि मिलेगी।

 

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे भारत के सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश माननीय न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार माहेश्वरी ने 1200 पेजेज की इस पुस्तक को प्रशासनिक व कानूनी संदर्भों के लिए अत्यंत उपयोगी ग्रंथ बताया और एक संक्षिप्त ‘लघु रिफरेंस बुक’ लिखने का सुझाव भी दिया।

 

कार्यक्रम का मंच संचालन प्रसिद्ध कवयित्री व शिक्षिका प्रीति दुबे एवं डॉ. अमरेश नायडू (वरिष्ठ जिला पंजीयक एवं स्टाम्प कलेक्टर) द्वारा किया गया। अतिथियों का स्वागत कनिष्क मिश्र, डॉ. अंजना चक्रपाणि मिश्र, सिद्धार्थ मिश्र, इंदू मिश्र, डॉ.पीयूष मिश्र, निष्ठा मिश्र, आकांक्षा जाचक शेट्टी और नीतेश शेट्टी ने किया। अंत में डॉ. अंजना चक्रपाणि मिश्र ने आभार व्यक्त किया, जिसके बाद राष्ट्रगान के साथ समारोह का समापन हुआ।कार्यक्रम में बड़ी संख्या में प्रदेश के कई क्षेत्रों से पधारे प्रशासनिक अधिकारी, पंजीयन अधिकारी, अधिवक्ता गण, ईष्ट मित्र, शुभचिंतक आदि उपस्थित थे!

फेमिनिस्‍ट औरतों को एक तख़्ती पर मर्दों के लिए यह भी लिखना चाहिए

फेमिनिस्‍ट औरतों को एक तख़्ती पर मर्दों के लिए यह भी लिखना चाहिए

Feminist

आख़िरकार औरतों ने मर्दों पर कविताएं लिखीं, भले वे बहुत बेहूदा और ख़राब ही क्यों न थीं!

औरतों ने वो काम कर दिखाया जो मर्द ख़ुद अपने लिए नहीं कर सका। अब किसी औरत से मैं चाहता हूं कि वो मर्द के पसीने पर पसीने से भीगी हुई कोई कविता लिखेगी।

मैं चाहता हूं कि एक तख्ती पर यह भी लिखा जाना चाहिए कि कैसे मर्दों ने घर बनाए। खेत उगाये। फ़सल उगाई। बाग़ लगाए और बागों में फूल उगाए। भले तोड़कर नहीं ला सके, पर कैसे औरतों को उनके लिए चांद- तारे तोड़ लाने के ख़्वाब दिखाए?

लिखो कि मर्दों ने तुमसे वो भी कहा जो वो नहीं कर सकते थे!

एक तख्ती पर लिखो कि कैसे मर्दों ने औरतों को सुंदर कहा, लिखो कि जब औरतों को यकीन नहीं हुआ कि वे सुंदर हैं तो उसने उनके लिए शीशे भी बना डाले।

औरतों को चाहिए कि एक तख्ती पर वो लिखे कि कैसे मर्द दफ़्तर के किसी कोने में ता-उम्र एक वक्त सिर्फ़ ठंडी रोटियां खाता रहा?

औरतों! यह भी लिखो कि वो कितना उदास दिखता है जब अकेले- अकेले खाना खाता है?

लिखो कि कैसे मर्द फोन करते- करते यह सोचकर रुक जाता है कि अभी वो सो रही होगी।

एक तख्ती पर यह भी लिखो कि जब वो बारिश में भीगकर घर लौटता है तो कैसे उसकी देह का एक हिस्सा सड़क के कीचड़ में बहकर चला जाता है? कैसे गर्म सड़कों पर धूप हमेशा के लिए उसका रंग चुरा लेती है?

यह भी लिखो कि कैसे वो सर्दियों में अपनी हड्डियां बेचकर घर लौटता रहा?

लिखो कि मर्द अक्सर अपने घर के लिए ही जल्दी घर लौटता है। एक तख्ती पर यह भी तो लिखो कि कई बार औरतों की वजह से ही वो घर नहीं लौटाता!

लिखो कि ज़्यादातर मर्दों ने सबसे पहले बेटियां ही क्यों पैदा करना चाही?

औरतों! साहस करो, एक तख्ती पर यह भी लिखो कि तुम्हारा भाई और बाप भी एक मर्द है।

लिखो कि आख़िर क्यों ज़्यादातर दोस्तियां मर्द ही निभाते रहे?

यह भी तो लिखो कि वो तभी रोता है जब उसके आसपास कोई नहीं होता और तभी हंसता है जब सभी उसके साथ होते हैं।

कुछ पड़ताल यह भी करो कि मर्द किसी के मरने पर भी दहाड़ मारकर क्यों नहीं रोता?

लिखो कि जो प्रेम में रो पड़ता है, वो श्मशानों में पत्थर क्यों हो जाता है?

पता करो, मर्द क्यों चाहता है कि मरे हुए मर्दों की आत्माएं हमेशा के लिए मुक्त हो जाए?

एक तख्ती पर लिखो कि तमाम मृत्युओं का बोझ वो कहां रखता होगा?

एक तख्ती पर लिखो कि क्यों वो ईश्वर के खिलाफ़ हर सुबह फिर से पैदा होकर उठ खड़ा हो जाता है?

एकआध तख्तियों पर यह भी लिखना चाहिए कि क्यों सबसे ज़्यादा उसकी पीठ और तलवों में छाले पड़ते हैं?
एक तख्ती पर मर्द की उदासी का भी ज़िक्र करो तो जानें!

लिखो कि ज़िंदगी के तमाम रंज ओ ग़म के बावजूद मर्द ने देवता क्यों नहीं बनना चाहा?

यह भी लिखो कि मर्द की देह आखिर थकती क्यों नहीं?

एक तख्ती पर लिखो कि एक बार जाने के बाद उसकी आत्मा वापस लौटना क्यों नहीं चाहती?