इलाज आपकी थाली में, ध्यान नहीं दिया तो साइलेंट किलर साबित हो सकता है एनीमिया

इलाज आपकी थाली में, ध्यान नहीं दिया तो साइलेंट किलर साबित हो सकता है एनीमिया

Treatment of anemia

Treatment of anemia: “जिस देश की आधी से अधिक महिलाएं और दो-तिहाई बच्चे खून की कमी से जूझ रहे हों, वहां यह केवल स्वास्थ्य का नहीं बल्कि विकास का भी मुद्दा बन जाता है।” भारतीय परिप्रेक्ष्य में एनीमिया आज भी एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के अनुसार 15 से 49 वर्ष आयु वर्ग की लगभग 57 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं।

 

पांच वर्ष से कम उम्र के करीब 67 प्रतिशत बच्चों में भी खून की कमी पाई गई है। यह स्थिति बताती है कि आर्थिक प्रगति और स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के बावजूद पोषण संबंधी चुनौतियां अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। हालांकि चिंता से अधिक जरूरत जागरूकता की है, क्योंकि एनीमिया उन समस्याओं में से है जिनकी रोकथाम और उपचार दोनों संभव हैं।

क्या कहते हैं चिकित्सक?

गोरखपुर के वरिष्ठ फिजिशियन डॉ. आलोक कुमार गुप्ता कहते हैं कि एनीमिया से बचाव की शुरुआत घर की रसोई और भोजन की थाली से होती है। हरी पत्तेदार सब्जियां, दालें, चना, गुड़, बाजरा, तिल, मौसमी फल और अन्य पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थ नियमित रूप से भोजन में शामिल किए जाने चाहिए।

 

उनके अनुसार आयरन युक्त भोजन के साथ विटामिन-सी का सेवन शरीर में आयरन के अवशोषण को बढ़ाता है। इसलिए नींबू, आंवला, संतरा या अन्य खट्टे फलों का सेवन लाभकारी होता है। वहीं भोजन के तुरंत बाद चाय या कॉफी और भोजन के दौरान कोई भी कोल्ड ड्रिंक पीने से बचना चाहिए, क्योंकि ये आयरन के अवशोषण में बाधा बन सकते हैं। 

साल में सपरिवार एक बार जरूर लें कृमि नाशक दवा

डॉक्टर आलोक के मुताबिक आयरन की कमी के साथ ही आंतों मे पेट के कीड़ों (कृमि) का संक्रमण भी धीरे धीरे रक्त रिसाव का कारक होता है। इसलिए कम से कम वर्ष मे एक बार पूरे परिवार को कोई कृमि नाशक लेना चाहिए। मासिक के दौरान अधिक रक्तस्राव भी एनीमिया का कारक होता है।

खून की कमी का असर सिर्फ शरीर पर नहीं

एनीमिया केवल एक चिकित्सकीय समस्या नहीं है। इसका सीधा असर बच्चों की पढ़ाई, महिलाओं के स्वास्थ्य, श्रमिकों की कार्यक्षमता और देश की उत्पादकता पर पड़ता है। यही कारण है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन इसे दुनिया की प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों में शामिल करता है।

 

दरअसल एनीमिया एक ऐसी समस्या है जो चुपचाप करोड़ों लोगों की सेहत, कार्यक्षमता और भविष्य को प्रभावित करती है। शरीर में हीमोग्लोबिन कम होने पर पर्याप्त ऑक्सीजन अंगों तक नहीं पहुंच पाती। परिणामस्वरूप व्यक्ति को कमजोरी, थकान, चक्कर आना, सांस फूलना और काम करने में परेशानी जैसी समस्याएं होने लगती हैं।

 

इसका सबसे गंभीर असर बच्चों, किशोरियों और गर्भवती महिलाओं पर पड़ता है। बच्चों में शारीरिक और मानसिक विकास प्रभावित हो सकता है। सीखने और याद रखने की क्षमता पर असर पड़ सकता है। वहीं गर्भवती महिलाओं में समय से पहले प्रसव, कम वजन वाले शिशु के जन्म और मातृ मृत्यु का जोखिम बढ़ जाता है।

उत्तर प्रदेश के लिए और महत्वपूर्ण है यह लड़ाई

उत्तर प्रदेश देश का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है। इसी कारण यहां बच्चों, किशोरियों और प्रजनन आयु वर्ग की महिलाओं की संख्या भी सबसे अधिक है। ऐसे में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य से जुड़े कार्यक्रमों की सफलता काफी हद तक एनीमिया पर नियंत्रण पर निर्भर करती है। हाल के वर्षों में राज्य में सकारात्मक प्रगति देखने को मिली है। गर्भवती महिलाओं में एनीमिया की दर में कमी दर्ज की गई है और गंभीर एनीमिया के मामलों में भी गिरावट आई है। इसमें स्वास्थ्य विभाग, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

 

राज्य सरकार पोषण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए लगातार अभियान चला रही है। पोषण वाटिका और औषधीय वाटिका जैसी पहल इसी दिशा में उठाए गए कदम हैं। इनका उद्देश्य लोगों को पौष्टिक आहार के प्रति जागरूक करना और स्थानीय स्तर पर पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थों की उपलब्धता बढ़ाना है।

सहजन : पोषण का पावर हाउस

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लंबे समय से सहजन (मोरिंगा) के प्रचार-प्रसार पर जोर देते रहे हैं। पोषण विशेषज्ञ भी सहजन को अत्यंत पौष्टिक पौधा मानते हैं। इसकी पत्तियों और फलियों में अनेक प्रकार के विटामिन, खनिज और एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं। तुलनात्मक रूप से देखें तो सहजन में—

  • संतरे की तुलना में अधिक विटामिन-सी
  • गाजर की तुलना में अधिक विटामिन-ए
  • दूध की तुलना में अधिक कैल्शियम
  • केले की तुलना में अधिक पोटैशियम
  • दही की तुलना में अधिक प्रोटीन पाया जाता है।

इसी कारण विद्यालयी पोषण कार्यक्रमों और सामुदायिक पोषण योजनाओं में इसके उपयोग पर जोर दिया जा रहा है। केंद्र सरकार भी राज्यों को स्थानीय स्तर पर उपलब्ध पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थों को पोषण कार्यक्रमों में शामिल करने के लिए प्रोत्साहित कर चुकी है।

सरकार की पहल और समाज की भूमिका

केंद्र सरकार ने वर्ष 2018 में “एनीमिया मुक्त भारत” अभियान शुरू किया था। इसके तहत आयरन एवं फोलिक एसिड की गोलियों का वितरण, कृमिनाशक दवाओं का सेवन, नियमित जांच और पोषण संबंधी जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में भी स्कूलों, आंगनबाड़ी केंद्रों और स्वास्थ्य संस्थानों के माध्यम से आयरन की गोलियां वितरित की जा रही हैं। गर्भवती महिलाओं की नियमित जांच और हाई-रिस्क मामलों की पहचान पर विशेष जोर दिया जा रहा है।

 

फिर भी केवल सरकारी योजनाओं के भरोसे इस समस्या का समाधान संभव नहीं है। परिवार और समाज को भी अपनी भूमिका निभानी होगी। संतुलित भोजन, नियमित स्वास्थ्य जांच और पोषण के प्रति जागरूकता ही एनीमिया के खिलाफ सबसे प्रभावी हथियार हैं।

 

दरअसल एनीमिया केवल स्वास्थ्य का विषय नहीं बल्कि मानव संसाधन विकास का भी विषय है। स्वस्थ बच्चे बेहतर विद्यार्थी बनते हैं। स्वस्थ किशोरियां भविष्य में स्वस्थ माताएं बनती हैं। स्वस्थ महिलाएं और पुरुष अधिक उत्पादक होते हैं। इसलिए खून की कमी दूर करना केवल बीमारी से लड़ना नहीं, बल्कि देश की क्षमता को मजबूत करना भी है।

 

अच्छी बात यह है कि एनीमिया ऐसी समस्या नहीं है जिसका समाधान असंभव हो। जागरूकता, संतुलित पोषण, नियमित जांच और सरकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन से इस चुनौती पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है। विकसित भारत की यात्रा में यह याद रखना होगा कि मजबूत राष्ट्र की नींव स्वस्थ नागरिक ही होते हैं। और स्वस्थ नागरिकों के लिए पर्याप्त खून, पर्याप्त पोषण और पर्याप्त जागरूकता सबसे जरूरी है।

एनीमिया के प्रमुख लक्षण

जल्दी थकान, चक्कर आना, चेहरा पीला पड़ना, सांस फूलना, लगातार कमजोरी महसूस होना, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई आदि इसके प्रमुख लक्षण हैं। यदि इनमें से कई लक्षण लगातार दिखाई दें तो चिकित्सकीय जांच अवश्य कराएं।

World Blood Donor Day 2026: विश्व रक्तदान दिवस, कब और क्यों मनाया जाता है?

World Blood Donor Day 2026: विश्व रक्तदान दिवस, कब और क्यों मनाया जाता है?

vishwa raktdata divas kyon manaya jata hai: हर साल पूरी दुनिया में 14 जून को विश्व रक्तदान दिवस मनाया जाता है। इस दिन को रक्त समूहों की खोज करने वाले महान वैज्ञानिक Karl Landsteiner की जयंती के अवसर पर मनाया जाता है। उनके शोध ने आधुनिक रक्ताधान यानी ब्लड ट्रांसफ्यूजन प्रणाली की नींव रखी थी। इसे मनाए जाने के पीछे का मुख्य उद्देश्य क्या हैं, आइये यहां विस्तार से समझते है।ALSO READ: health care tips: खून गाढ़ा होने के प्रमुख लक्षण, रोग, कारण और उपचार

 

1. कब मनाया जाता है और 14 जून ही क्यों चुना गया?

विश्व रक्तदान दिवस, यह खास दिन हर साल 14 जून को मनाया जाता है। इसी दिन मशहूर ऑस्ट्रियाई जीवविज्ञानी और चिकित्सक कार्ल लैंडस्टीनर (Karl Landsteiner) का जन्मदिन होता है। उन्होने सन 1900 में रक्त के मुख्य समूहों की पहचान की थीं। 

 

2. कार्ल लैंडस्टीनर कौन थे?

कार्ल लैंडस्टीनर ने ही मानव रक्त में ABO ब्लड ग्रुप सिस्टम (A, B, AB और O ब्लड ग्रुप) की खोज की थी। इस क्रांतिकारी खोज के लिए उन्हें साल 1930 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उनकी इस खोज की वजह से ही आज इंसानों में सुरक्षित तरीके से ब्लड ट्रांसफ्यूजन अर्थात् एक व्यक्ति का खून दूसरे को चढ़ाना, संभव हो पाया है। उनके इसी योगदान को सम्मान देने के लिए डब्ल्यूएचओ (WHO) ने 14 जून के दिन को चुना।

 

3. क्यों मनाया जाता है? (मुख्य उद्देश्य/कारण)

विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization, WHO) ने साल 2004 में इस दिन को मनाने की शुरुआत की थी। इसके पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारण हैं:

 

रक्तदाताओं का आभार जताना: जो लोग बिना किसी पैसे या स्वार्थ के, स्वैच्छिक रूप से (voluntarily) अपना खून दान करते हैं, उन्हें धन्यवाद कहना और उनके इस जीवनदायी योगदान की सराहना करना।

 

जागरूकता फैलाना: दुनिया भर में लोगों को यह समझाना कि सुरक्षित रक्त और रक्त उत्पादों- जैसे प्लाज्मा, प्लेटलेट्स की आवश्यकता हर समय बनी रहती है, चाहे वह सर्जरी हो, प्रसव/ चाइल्ड बर्थ हो के दौरान होने वाला रक्तस्राव हो या कोई बड़ा हादसा।

 

नियमित रक्तदान के लिए प्रेरित करना: समाज में, खासकर युवाओं में, नियमित रूप से रक्तदान करने की आदत को बढ़ावा देना ताकि अस्पतालों में खून की कमी से किसी की जान न जाए।

 

एक जरूरी बात: बहुत से लोग सोचते हैं कि रक्तदान करने से शरीर में कमजोरी आती है, जबकि सच यह है कि एक स्वस्थ व्यक्ति द्वारा दान किया गया खून शरीर में महज 24 से 48 घंटों के भीतर फिर से बन जाता है। आपका किया हुआ एक (1) यूनिट रक्तदान, तीन (3) अलग-अलग लोगों की जान बचा सकता है।

 

अस्वीकरण (Disclaimer) : चिकित्सा, स्वास्थ्य संबंधी नुस्खे, योग, धर्म, ज्योतिष, इतिहास, पुराण आदि विषयों पर वेबदुनिया में प्रकाशित/प्रसारित वीडियो, आलेख एवं समाचार सिर्फ आपकी जानकारी के लिए हैं, जो विभिन्न सोर्स से लिए जाते हैं। इनसे संबंधित सत्यता की पुष्टि वेबदुनिया नहीं करता है। सेहत या ज्योतिष संबंधी किसी भी प्रयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। इस कंटेंट को जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है जिसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।ALSO READ: स्‍वच्‍छता के सिरमौर इंदौर ने नेत्रदान में भी किया गजब का रिकॉर्ड कायम

Blood Donation Quotes: रक्तदान के लिए प्रेरित करेंगे ये शानदार 25 स्लोगन, संदेश और प्रेरक पंक्तियां

Blood Donation Quotes: रक्तदान के लिए प्रेरित करेंगे ये शानदार 25 स्लोगन, संदेश और प्रेरक पंक्तियां

A single unit of your blood can save many lives; an image conveying the message of saving lives through blood donation

Blood Donation Slogans: दुनिया भर में हर दिन हजारों मरीजों को दुर्घटनाओं, सर्जरी, कैंसर उपचार, प्रसव और गंभीर बीमारियों के दौरान रक्त की आवश्यकता होती है। कई बार रक्त की कमी के कारण मरीजों की जान खतरे में पड़ जाती है। ऐसे में लोगों को नियमित रूप से रक्तदान के लिए प्रेरित करने और सुरक्षित रक्त की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए हमें मात्र 1 दिन इसे मनाने की आवश्‍यकता नहीं है। स्वैच्छिक रक्तदान न केवल मानवता की सबसे बड़ी सेवा है, बल्कि समाज के प्रति हमारी जिम्मेदारी का भी प्रतीक है।ALSO READ: health care tips: खून गाढ़ा होने के प्रमुख लक्षण, रोग, कारण और उपचार

 

यहां पढ़ें रक्तदान पर बेहतरीन स्लोगन्स, भावुक संदेश और प्रेरक पंक्तियां, जो आपको रक्तदान करने के लिये प्रेरित करेंगी…

 

रक्तदान पर स्लोगन

1. रक्तदान करें, जीवन बचाएं।

2. रक्त की हर बूंद किसी के लिए अमृत समान।

3. आपका रक्त, किसी की नई उम्मीद।

4. रक्तदान है महान, इससे बचते हैं कई प्राण।

5. आज रक्तदान, कल जीवनदान।

6. एक कदम मानवता की ओर, करें रक्तदान।

7. रक्तदान सबसे बड़ा उपहार है।

8. रक्तदान करें, मुस्कान बांटें।

9. स्वस्थ रहें, रक्तदान करें।

10. रक्तदान है सच्ची समाज सेवा।

 

प्रेरक संदेश

1. आपका थोड़ा सा समय और रक्त किसी जरूरतमंद को नया जीवन दे सकता है।

 

2. रक्तदान केवल दान नहीं, बल्कि मानवता के प्रति आपकी जिम्मेदारी है।

 

3. जब आप रक्तदान करते हैं, तब आप किसी अनजान व्यक्ति के जीवन में आशा की किरण बनते हैं।

 

4. रक्तदान करने से न केवल किसी की जान बचती है, बल्कि समाज में सेवा और संवेदना का संदेश भी फैलता है।

 

5. आपका एक यूनिट रक्त तीन लोगों तक की जान बचाने में मदद कर सकता है।

 

प्रेरक पंक्तियां

1. खून की हर बूंद में छिपी है किसी की जिंदगी की कहानी।

2. जो रक्तदान करता है, वह जीवनदान देता है।

3. इंसानियत की सबसे खूबसूरत पहचान है रक्तदान।

4. किसी के चेहरे की मुस्कान बनना है, तो रक्तदान करना है।

5. जीवन का सबसे अनमोल उपहार है- रक्तदान।

6. रक्तदान का संकल्प लें, मानवता का सम्मान करें।

7. आपका रक्त किसी परिवार की खुशियां लौटा सकता है।

8. रक्तदान से बड़ा कोई दान नहीं, क्योंकि यह सीधे जीवन से जुड़ा है।

9. हर स्वस्थ व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह नियमित रक्तदान करे।

10. रक्तदान करें और किसी के जीवन का हीरो बनें।

 

संदेश

'आइए दुनिया के सभी लोग यह संकल्प लें कि हम नियमित रक्तदान करेंगे और जरूरतमंद लोगों के जीवन की रक्षा में अपना योगदान देंगे। रक्तदान महादान है, क्योंकि इससे किसी को जीवन का दूसरा अवसर मिलता है।'

 

उपरोक्त पंक्तियों का उपयोग पोस्टर, बैनर, सोशल मीडिया कैप्शन, व्हाट्सऐप स्टेटस और जागरूकता अभियानों में किया जा सकता है।

 

अस्वीकरण (Disclaimer) : चिकित्सा, स्वास्थ्य संबंधी नुस्खे, योग, धर्म, ज्योतिष, इतिहास, पुराण आदि विषयों पर वेबदुनिया में प्रकाशित/प्रसारित वीडियो, आलेख एवं समाचार सिर्फ आपकी जानकारी के लिए हैं, जो विभिन्न सोर्स से लिए जाते हैं। इनसे संबंधित सत्यता की पुष्टि वेबदुनिया नहीं करता है। सेहत या ज्योतिष संबंधी किसी भी प्रयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। इस कंटेंट को जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है जिसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।ALSO READ: World Blood Donor Day 2026: विश्व रक्तदान दिवस, कब और क्यों मनाया जाता है?

बर्लिन में बना जर्मनी का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर

बर्लिन में बना जर्मनी का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर

Berlin New Hindu Tempel

Berlin – New Hindu Tempel: बर्लिन और पूरे जर्मनी में हिंदू समुदाय के लिए रविवार 7 जून का दिन, एक बहुत ही विशेष दिन था। उस दिन, जर्मनी की राजधानी बर्लिन, एक नए अपूर्व आकर्षण की धनी बन गई।

 

20 वर्षों से भी ज़्यादा समय की योजना और निर्माणकार्य पूरा होने के बाद, 7 जून 2026 के दिन, बर्लिन के “नोएकौएल्न” (नवकोलोन) नाम के उपनगर में, गणेश जी को समर्पित एक नए भव्य हिंदू मंदिर का— उनकी मूर्ति की विधिवत प्राण-प्रतिष्ठा और मंदिर की इमारत के अभिषेक के साथ— भव्य उद्घाटन हुआ।

 

अभिषेक समारोह के दौरान, तीन पुजारियों में से एक ने, एक ऊँचे क्रेन की सहायता से मंदिर के शिखर पर बर्लिन की स्प्रे नदी और भारत की गंगा नदी के मिश्रित पानी का जलार्पण किया। बर्लिन, जर्मनी की राजधानी होने के साथ-साथ जर्मनी का एक राज्य भी है। इसीलिए, मंदिर के उद्घाटन समारोह में बर्लिन राज्य के दो मंत्री और जर्मनी में भारत के राजदूत अजीत गुप्ते भी उपस्थित थे।

निर्माण पूरी तरह दान के पैसे से

17 मीटर से भी अधिक ऊँचाई वाला यह मंदिर अब जर्मनी में सबसे बड़ा हिंदू मंदिर है। उसका का निर्माण पूरी तरह दान के पैसे और लोगों द्वारा स्वैच्छिक सेवा के बल पर किया गया है। उसे बनाने वाली पंजीकृत संस्था “श्री-गणेश-हिंदू-मंदिर .V.” के प्रमुख विल्वानाथन कृष्णमूर्ति ने मीडिया को बताया कि यह “श्री गणेश हिंदू मंदिर” शनिवार से ही लोगों के लिए खुल गया: मंदिर में सभी का गर्मजोशी से स्वागत है। इस मंदिर के निर्माण की योजना 20 साल से भी पहले बनी थी और निर्माणकार्य 2010 में शुरू हुआ था। निर्माण का ख़र्च, जो लगभग 11 लाख यूरो के बराबर है (1 यूरो=111रूपये), केवल दान के ज़रिए जुटाया गया।

निर्माण कार्य में विलंब

2005 की शुरुआती योजनाओं के अनुसार, निर्माण कार्य 2007 के अंत में शुरू होना और मंदिर 2010 तक बन कर पूरा होना था। 4 नवंबर 2007 के दिन मंदिर की नींव रखने का पहला समारोह हुआ, लेकिन उसके बाद निर्माण कार्य वास्तव में शुरू नहीं हो पाया। 2010 में निर्माण की सरकारी स्वीकृति जब मिल गई, तो उसी साल सितंबर में मंदिर की नींव रखने का दूसरा समारोह हुआ। 

 

इसके बाद, सितंबर 2011 तक काम पूरा करने का लक्ष्य रखा गया, लेकिन चंदा कम मिलने के कारण ऐसा हो नहीं सका। एक वर्ष बाद, 2012 में ही “राजा गोपुरम” कहलाने वाले प्रवेश द्वार के लिए नींव और खंभे आदि खड़े किए जा सके। 2013 में निर्माण अनुमति की समय-सीमा ख़त्म होने के बाद, नई अनुमति के लिए एक नया आवेदन करना पड़ा। हालांकि, 2024 में काम पूरा होने की तारीख तय की गई थी, लेकिन उस समय तक काम पूरा नहीं हो पाया था, इसलिए अगली समय-सीमा अक्टूबर 2025 तय की गई।

यूरोप में अपनी तरह का सबसे बड़ा मंदिर

बर्लिन में बना यह भव्य मंदिर पूरे, यूरोप में अपनी तरह के सबसे बड़े मंदिरों में से एक है। मंदिर की 17 मीटर ऊँची सुनहरी छत, दक्षिण भारतीय कारीगरों द्वारा बनाई गई शानदार नक्काशी-भरी कलाकृति है। मंदिर की दीवारों वाले नीले रंग के बाहरी हिस्से पर सजावटी पैटर्न और देवी-देवताओं की आकृतियाँ बनी हुई हैं। पूजा-स्थल का अंदरूनी हिस्सा भी बहुत शानदार ढंग से डिज़ाइन किया गया है। प्रवेश द्वार को हाथ से पेंट की गई 250 आकृतियों से सजाया गया है। पूजा स्थल के अंदरूनी हिस्से को भी शानदार ढंग से डिज़ाइन किया गया है। इसमें गणेश जी को समर्पित मुख्य वेदी के साथ-साथ कई अन्य वेदियाँ भी हैं—जो शिव, विष्णु और दुर्गा जैसे देवी-देवताओं को समर्पित हैं—और जिनकी रक्षा रक्षकों की भव्य आकृतियाँ करती हैं। बर्लिन में यह दूसरा और पूरे यूरोप में गणेश जी को समर्पित संभवतः एकमात्र मंदिर है।

2080 तक के लिए मिली है ज़मीन

गणेश जी ऊर्जा और बुद्धिमत्ता के प्रतीक माने जाते हैं। मंदिर की प्रायोजक संस्था के प्रमुख विल्वानाथन कृष्णमूर्ति के अनुसार, श्री गणेश मंदिर लगभग 850 वर्ग मीटर के क्षेत्र में फैला है, जबकि वर्ष 2080 तक मंदिर के लिए मिली पूरी ज़मीन लगभग 5,000 वर्ग मीटर के बराबर है। इससे पहले बर्लिन में जो एकमात्र हिंदू मंदिर था और अब भी है, वह 2013 में बना था और “श्री मयूरपति मुरुगन मंदिर” कहलाता है। वह मुख्य रूप से श्रीलंका में 1983 से 2009 तक चले “तमिल टाइगर्स” वाले गृहयुद्ध के समय, वहां से यूरोप और जर्मनी में आए तमिल शरणार्थियों का बनाया मंदिर है।

Berlin New Hindu Tempel

श्रीलंकाई तमिलों ने ही जर्मनी के नॉर्थ राइन वेस्टफेलिया राज्य के “हाम” (Hamm) शहर में, जर्मनी में पहला हिंदू मंदिर बनाया था। दक्षिणी भारत के कांचीपुरम में स्थित कामाक्षी देवी के मंदिर की वास्तुकला से प्रेरित “श्री कामाक्षी अम्पाल” नाम के इस मंदिर का उद्घाटन 7, जुलाई 2002 के दिन हुआ था। अर्किटेक्ट (वस्तुकार) थे, जर्मनी के हाइंस-राइनर आइशहोर्स्ट। हाम के तमिल-हिंदू मंदिर को पूरे यूरोप में सबसे बड़ा द्रविड़ मंदिर माना जाता है।

बर्लिन में हिदुओं की अनुमानित संख्या 45,000

किसी को भी ठीक-ठीक नहीं पता कि लगभग 40 लाख की जनसंख्या वाले बर्लिन में कितने हिंदू रहते हैं। श्री गणेश मंदिर की निर्माता संस्थ केप्रमुख विल्वानाथन कृष्णमूर्ति का अनुमान है कि बर्लिन में हिदुओं की संख्या 45,000 तक हो सकती है। हाल ही में इस संख्या में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई है, जिसका मुख्य कारण भारत से आए छात्र और आईटी (IT) पेशेवर माने जाते हैं। 8 करोड़ 41 लाख की जनसंख्या वाले पूरे जर्मनी में भी अनुमानतः क़रीब केवल 2 लाख ही भारतीय रहते हैं, जिनमें से अनुमानतः1 लाख हिंदू हैं।

 

मंदिर के उद्घाटन समारोह के समय बताया गया कि उस के दरवाज़े रोज़ शाम 4:00 बजे से 6:00 बजे तक सबके लिए खुले रहेंगे। सुबह और शाम की आरती में शामिल होने के लिए किसी पंजीकरण या प्रवेश फ़ीस की ज़रूरत नहीं होगी। यह मंदिर हर हिंदू परंपरा—वैष्णव, शैव, शाक्त, स्मार्त—और यहाँ आने वाले हर व्यक्ति का स्वागत करेगा: बर्लिन के परिवारों, छात्रों, अलग-अलग धर्मों के लोगों, आस-पास के कार्यालयों के कर्मचारियों तथा “ओपन डे” पर आने वाले स्कूली बच्चों की टोलियों का भी स्वागत है।

संस्कारी अनुष्ठान संस्कृत, तमिल या हिंदी में

मंदिर के पुजारी नामकरण संस्कार, स्कूल जाने की शुरुआत, शादी और गृह-प्रवेश की पूजा जैसे अवसरों के लिए उलब्ध रहेंगे। वे संस्कारी अनुष्ठान संस्कृत, तमिल या हिंदी में करवाते हैं— साथ में जर्मन या अंग्रेज़ी अनुवाद भी होता है। संस्कृत भाषा सीखने की हर हफ़्ते क्लास लगेगी। संस्कृत की पहले से कोई जानकारी होना ज़रूरी नहीं है। बच्चे और बड़े, सब साथ-साथ सीख सकते हैं। हार्मोनियम और तबले के साथ गाना- बजाना सीखने की भी सुविधा होगी। त्योहारों के दिन “अन्नदान” होगा— सभी मौजूद लोगों के लिए गर्म भोजन होगा— चाहे वे भक्त हों या अचानक आए आगंतुक।

 

बर्लिन का बहुचर्चित और उतना ही प्रतीक्षित मंदिर तो अंततः बन गया; उसके निर्मातओं को अब एक ऐसा “अंतर-सांस्कृतिक मिलन-केंद्र” बनाने का विचार ललचा रहा है, जिसका उद्देश्य बर्लिन की अलग-अलग संस्कृतियों और धर्मों के लोगों के बीच पारस्परिक संवाद को बढ़ावा देना होगा। यह एक ऐसा विचार है, जो अन्यथा अन्य धर्मों वाले लोगों और उनके धर्माधिकारियों के मन में नहीं आता। अन्य धर्मी यही मानते हैं कि केवल उनका धर्म ही सर्वश्रेष्ठ है। अतः जो उनके सहधर्मी नहीं हैं, वे उनके धर्म को अपनाएं।

Fathers Day 2026: पिता का साया क्यों होता है सबसे बड़ा सहारा? जानिए फादर्स डे पर

Fathers Day 2026: पिता का साया क्यों होता है सबसे बड़ा सहारा? जानिए फादर्स डे पर

Fathers are a protective shield for their children; the image depicts a scene celebrating Happy Fathers Day

Father and Family Relationship: इस बार रविवार, 21 जून 2026 को पितृ दिवस मनाया जा रहा है। फादर्स डे एक ऐसा मौका है जब हम उस इंसान को शुक्रिया कहते हैं जो खामोशी से हमारे पूरे जीवन की नींव रखता है। अक्सर मां के प्यार और ममता पर बहुत कुछ लिखा जाता है, जो कि बिल्कुल सही भी है, लेकिन पिता का प्यार थोड़ा अलग होता है। वह अमूमन अपनी भावनाएं जताते नहीं हैं, लेकिन उनका साया जीवन का सबसे बड़ा सहारा होता है।

 

आखिर पिता का साया सबसे बड़ा सहारा क्यों माना जाता है? आइए इसे कुछ गहरे पहलुओं से समझते हैं:

 

1. सुरक्षा का मजबूत कवच

बचपन में जब पिता का हाथ थामकर हम मेले या भीड़-भाड़ वाली जगह पर चलते थे, तो एक अजीब सा सुकून रहता था कि 'अब कुछ गलत नहीं हो सकता।' पिता का होना घर में एक ऐसी सुरक्षा की भावना देता है जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। दुनिया की कोई भी मुसीबत हो, पिता एक ढाल बनकर खड़े हो जाते हैं ताकि आंच बच्चों तक न पहुंचे।

 

2. बिन कहे सब कुछ सहने की ताकत

एक पिता की सबसे बड़ी खासियत होती है उनका मौन समर्पण। अपनी खुशियों, नए कपड़ों या जरूरतों को टाल देना ताकि बच्चों की स्कूल फीस और ख्वाहिशें पूरी हो सकें। ऑफिस या काम के तनाव को घर के दरवाजे के बाहर ही छोड़ देना और अंदर आते ही मुस्कुराना। कभी यह अहसास न होने देना कि वह आर्थिक या मानसिक रूप से किसी दबाव में हैं।

 

3. उड़ने के लिए पंख और गिरने पर हौसला

मां जहां हमें संवारती है और संभलकर चलना सिखाती है, वहीं पिता हमें दुनिया की कड़वी सच्चाइयों का सामना करना सिखाते हैं। जब आप लाइफ में पहली बार असफल होते हैं, तो पिता वो इंसान होते हैं जो आपकी पीठ थपथपाकर कहते हैं- 'कोई बात नहीं, उठो और दोबारा कोशिश करो, मैं तुम्हारे साथ खड़ा हूं।' वह आपको रिस्क लेना सिखाते हैं, क्योंकि उन्हें पता होता है कि गिरकर ही बच्चा मजबूत बनेगा।

 

4. जीवन के सबसे पहले 'रोल मॉडल'

हर बच्चे के लिए उसके पिता दुनिया के सबसे मजबूत और बुद्धिमान इंसान होते हैं। हम अनजाने में ही सही, उनके चलने, बात करने, और मुश्किल हालातों से निपटने के तरीके को कॉपी करने लगते हैं। एक पिता का अनुशासित और ईमानदार जीवन ही बच्चों के भविष्य के नैतिक मूल्यों (Values) की नींव रखता है।

 

5. इस फादर्स डे पर क्या करें?

पिता कभी आपसे महंगे तोहफों की उम्मीद नहीं करते। उन्हें सिर्फ आपका थोड़ा सा वक्त और सम्मान चाहिए होता है।

 

उनसे बात करें: आज के दिन उनके पास बैठें, उनके पुराने दिनों के किस्से सुनें।

 

शुक्रिया कहें: जो बातें आप रोज नहीं कह पाते, आज कह दें—'पापा, आप जो मेरे लिए करते हैं, उसके लिए थैंक यू।'

 

उनके चेहरे पर मुस्कान लाएं: उनकी पसंद की कोई छोटी सी चीज या उनके साथ उनकी पसंदीदा चाय/कॉफी शेयर करें।

 

आपके जीवन में आपके पापा का साया हमेशा एक मजबूत बरगद के पेड़ की तरह बना रहे।

 

फादर्स डे की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं! 

 

अस्वीकरण (Disclaimer) : चिकित्सा, स्वास्थ्य संबंधी नुस्खे, योग, धर्म, ज्योतिष, इतिहास, पुराण आदि विषयों पर वेबदुनिया में प्रकाशित/प्रसारित वीडियो, आलेख एवं समाचार सिर्फ आपकी जानकारी के लिए हैं, जो विभिन्न सोर्स से लिए जाते हैं। इनसे संबंधित सत्यता की पुष्टि वेबदुनिया नहीं करता है। सेहत या ज्योतिष संबंधी किसी भी प्रयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। इस कंटेंट को जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है जिसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।

तेजी से बदल रहा है बंगाल

तेजी से बदल रहा है बंगाल

 West Bengal Chief Minister Suvendu Adhikari

पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी सरकार द्वारा सत्ता संभालने के अल्पकाल में ही स्पष्ट बदलाव दिख रहा है। ऐसा लगता है कि केवल ममता सरकार की विचारधारा और दिशा के बिल्कुल उलट शुभेंदु सरकार ने यू टर्न ही नहीं किया बल्कि सारे कील कांटों को उखाड़ते, ध्वस्त करते तीव्र गति से शासन की गाड़ी वहां पहुंच रही है जहां से  बंगाल शांत और स्थिर हो सामान्य राज्य के रूप में गतिविधियों का निर्धारण करे। 

 

शुभेंदु सरकार ने कुछ फैसले किए तथा कुछ प्रभाव में ही परिवर्तन आ गया। इनमें केवल केंद्रीय योजनाओं को लागू करना ही नहीं है। आप चाहे भाजपा के जितने आलोचक हों क्या किसी ने कल्पना की थी कि सरकार आने के हफ्ते भर के अंदर ही राज्य से टीएमसी द्वारा लगाए अवैध टोल बूथ हट जाएंगे, बैरिकेड समाप्त हो जाएंगे, हफ्ते वसूली का धंधा खत्म हो जाएगा…? यह हो गया। 

 

ममता ने स्वयं महिलाओं की सुरक्षा के प्रति चिंता प्रकट करते हुए रात में न निकलने का आग्रह किया था। सरकार बदलते ही बंगाल अपने स्वभाव, संस्कृति और चहल-पहल में वापस दिख रहा है। महिलाएं देर रात आती-जाती दिखाई दे सकती है। सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है।

कोलकाता समेत कई जिलों में रात की पुलिस पेट्रोलिंग काफी बढ़ा दी गई है। आम प्रतिक्रिया देख लीजिए सोशल मीडिया से लेकर मुख्य मीडिया में लोग लिख रहे हैं कि अब सरकार बदली है ऐसा महसूस हो रहा है। बकरीद के दिन वर्षों बाद सड़कों की बजाय मैदानों और मस्जिदों में नमाज पढ़े गए। 

 

किसी सरकार की दिशा का संकेत होता है और अगर वैचारिक और प्रशासनिक दिशा स्पष्ट हो, उनके प्रति प्रतिबद्धता और व्यवहार में प्रखरता हो तो उसका इकबाल  कायम होता है। चुनाव परिणाम के तुरंत बाद ऐसा लग रहा था मानो बंगाल को संभालना कठिन होगा। कुछ ही दिनों में ऐसा लगने लगा मानो यह वो बंगाल है ही नहीं जिसे हम 4 मई के चुनाव परिणाम के पूर्व या उसके दो चार दिनों बाद तक देख रहे थे। 

 

कोलकाता से आसनसोल तक अवैध निर्माण के विरुद्ध बुलडोजर कार्रवाई का आक्रामक हिंसक विरोध पूर्व सरकार की तस्वीर पेश कर रहा था। पत्थरबाजी भी हुई। उसके बाद क्या हुआ यह महत्वपूर्ण है। फुटेज से पत्थरबाजों और दंगाइयों के चेहरे पहचान कर कार्रवाई हो रही है तथा पुलिस ने लाउडस्पीकर में ऐलान कर दिया कि जिन लोगों ने हिंसा और तोड़फोड़ की है उनकी संपत्ति से इसकी वसूली की जाएगी।

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार ने हिंसक प्रदर्शनकारियों और दंगाइयों के विरुद्ध यही नियम अपनाया और उसके परिणाम काफी हद तक आए। बंगाल में इसकी कल्पना ही नहीं थी जो सामने है। 

 

भाजपा ने चुनाव अभियान में कानून और व्यवस्था कायम करने, महिला सुरक्षा, अवैध घुसपैठ रोकने, घुसपैठियों को बाहर निकालने, सीमा सुरक्षा एवं अंतरिक्ष सुरक्षा दोनों सुनिश्चित करने, तुष्टिकरण की समाप्ति एवं हिंदुओं के साथ हुए अन्याय का परिमार्जन, भ्रष्टाचार का अंत, प्रदेश को विकास एवं सांस्कृतिक गरिमा की पटरी पर वापस लाने आदि वायदे किए थे। 

 

मुख्यमंत्री का पदभार संभालते ही शुभेन्दु ने बांग्लादेश की सीमा पर घेराबंदी के लिए सीमा सुरक्षा बल को भूमि सौंपने का आदेश दिया जिसे 45 दिनों में पूरा हो जाना है। 450 किलोमीटर ऐसे क्षेत्र हैं जहां घेरा लगाना बाकी है उसकी जमीन मिली नहीं। मिनट में यह काम हो गया। इस दिशा में सबसे महत्वपूर्ण और बड़ा फैसला नेशनल हाईवे 10 और नेशनल हाईवे 110 के सात हिस्से केंद्र सरकार को सौंपना है। इनमें से पांच चिकन नेक या सिलीगुड़ी गलियारा से गुजरते हैं। 

 

चिकन नेक का 120 किलोमीटर इलाका पूर्वोत्तर के आठ राज्यों को भारत के साथ जमीन से जोड़ता है। यह बांग्लादेश, नेपाल, भूटान तीन देशों से लगता है और चीन भी यहां से निकट है। चिकन नेक कट जाए तो पूर्वोत्तर से भारत का सीधा जमीनी संपर्क खत्म हो जाएगा।

दिल्ली दंगों के आरोपी सरजिल इमाम को उच्चतम न्यायालय ने आज तक जमानत इसीलिए नहीं दी कि उसने मुसलमानों के द्वारा चिकन नेट काट कर भारत को खंडित करने की बात की थी। संयोग से उस पूरे क्षेत्र में भारत के अंदर बंगाल और बिहार दोनों और मुसलमानों की आबादी राष्ट्रीय औसत से अधिक है तथा दूसरी और बांग्लादेश है। 

 

मुस्लिम आबादी को भड़का कर चिकन नेक काट कर शेष पूर्वोत्तर को भारत से अलग करने का विचार बांग्लादेश के पूर्व शासक मोहम्मद यूनुस से लेकर वहां जेन जी आंदोलन तथा जमात ए इस्लामी के नेताओं के सामने आए । ममता सरकार ने केंद्र के आग्रह को स्वीकार नहीं किया और इस कारण वहां रक्षा और नागरिक दोनों प्रकार के आधारभूत संरचनाओं की कमी रही। 

 

अवैध घुसपैठ के साथ अनेक भारत विरोधी गतिविधियां, अवैध पशुओं एवं सामग्रियों की तस्करी आदि को पूरी तरह रोक पाना कठिन था।  नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया तथा नेशनल हाईवे इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड मिलकर इसका विकास करेगा। यानी आंतरिक और सीमा सुरक्षा और दूसरे रूप में कहें तो घुसपैठियों को रोकने के लिए सरकार ने पूर्ण प्रतिबद्धता दिखाई है। 

 

कट मनी और भ्रष्टाचार तथा महिलाओं के विरुद्ध अपराध की व्यापक छानबीन और कार्रवाई के लिए दो उच्च स्तरीय अधिकार प्राप्त आयोगों का गठन किया जा चुका है। सरकार ने आरजी कर मेडिकल कॉलेज के पूर्व सुपरिटेंडेंट संदीप घोष के खिलाफ वित्तीय धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग मामलों में ईडी को मुकदमा चलाने की मंजूरी दे दी है।

ऐसे ही आदेश अन्य मामलों में दिए जा रहे हैं जिन्हें पूर्व सरकार ने रोक कर रखा था। आप जानते हैं कि संदेशखाली से लेकर आईजी कर और यहां तक कि मुर्शिदाबाद के दंगों में महिलाओं के साथ व्यवहार बंगाल में प्रमुख मुद्दा रहा है। कट मानी और भ्रष्टाचार का अनुभव ऐसा था मानो यह सरकारी प्रक्रिया का ही अंग हो। आप देख लीजिए वही पुलिस प्रशासन और माहौल कितना बदला है। 

 

अवैध कब्जों से मुक्ति बंगाल की ऐसी चुनौती है जिससे निपटना यानी इतिहास की धारा बदल देना होगा। एक पार्टी के लोगों का ही पूरे प्रदेश में कब्जा है। तृणमूल ने सत्ता में आते ही कांग्रेस और दूसरी पार्टियों के दफ्तरों व अन्य स्थान कब्जाये, इसके साथ नेताओं ने प्रशासन की मिली भगत से सरकारी व निजी जमीन, मकान सब पर भयानक रूप से कब्जे किए।

माफिया तंत्र भूमि का उत्पन्न हुआ जिसने न जाने कितने लोगों को स्थान छोड़ने को विवश कर दिया। इसी तरह धर्म स्थलों पर कब्जे हुए या उन्हें जबरन बंद रखने को भी विवश किया गया।  लगातार उन अवैध कब्जों के विरुद्ध कार्रवाई हो रही है। कांग्रेस और वामपंथी दलों तक के दफ्तर मुक्त कर भाजपा के लोगों ने कई जगह सौंप दिया। कुछ डर से ही छोड़ कर भाग गए। कई धर्मस्थल तो जनता ने हीं मुक्त करा लिए।

 

वास्तव में शुभेंदु सरकार ने भाजपा की विचारधारा को सत्ता नीति में अपनाते हुए स्पष्ट संदेश दिया है। सड़कों पर नमाज पढ़ने का अंत करने के लिए लगातार कार्रवाई हो रही है। वंदे मातरम गायन अनिवार्य कर दिया गया। राज्य के इमामों, मुअज्जिनों और पुजारियों को दिया जाने वाला सरकारी भत्ता (मानदेय) 1 जून से समाप्त करने का आदेश जारी किया गया है। 

 

सरकार का एक बड़ा‌ फैसला अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण को 17% से घटाकर 7% करना तथा इसे केवल 66 हिंदू जातियों तक ही सीमित रखना है। पिछड़ी जाति की सूची में से मुसलमान की जातियों को पूरी तरह हटा दिया। ममता बनर्जी ने 2024 में 71 जातियों को पिछड़ी जाति में शामिल किया था जिनमें 65 मुस्लिम समुदाय के थे। ममता बनर्जी ने मुसलमानों को ज्यादा से ज्यादा पिछड़ी जाति का आरक्षण देने के लिए ही श्रेणी ए बनाकर 10% आरक्षण घोषित किया था। इसके पहले  पिछड़े वर्ग के लिए 7% आरक्षण था। 

 

साफ था कि केवल वोट बैंक की दृष्टि से मुसलमानों को पिछड़ी जाति में शामिल कर अतिरिक्त आरक्षण का अनुपात लाया गया। इस तरह शुभेंदु सरकार ने कम समय में ही त्वरित गति से अपने कदमों द्वारा यह स्थापित कर दिया कि राज्य किसी मजहब या पंथ विशेष या पार्टी नेताओं या समर्थकों लिए नहीं बल्कि सबके हित में काम करेगा। 

खजाने का धन किसी पंथ के तुष्टिकरण के लिए नहीं बल्कि उपयुक्त पात्रों के कल्याण पर खर्च होगा, शासन कानून और विधान के अनुसार चलेगा,  प्राथमिकता आंतरिक एवं बाह्य सुरक्षा तथा विकास होगा एवं पहले जो निहित स्वार्थी तत्व इसके रास्ते में आए, सत्ता का दुरुपयोग किया उन सबके विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई होगी।


(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। 'वेबदुनिया' इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेती है।)

घर संभालने वाली महिलाओं को 30 हजार; पर ‘हाउस हसबैंड्स’ का क्या?

घर संभालने वाली महिलाओं को 30 हजार; पर ‘हाउस हसबैंड्स’ का क्या?

Homemakers

11 जून 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने मोटर वाहन दुर्घटना दावा मामलों में एक क्रांतिकारी फैसला सुनाया है। कोर्ट ने गृहिणियों (Homemakers) को “नेशन बिल्डर्स” (राष्ट्र निर्माता) का दर्जा देते हुए उनके घरेलू योगदान (Loss of Domestic Care) के लिए न्यूनतम 30,000 मासिक की नोशनल इनकम (Notional Income) तय कर दी है। यह सिर्फ एक मुआवजा नहीं, बल्कि एक बड़ा सामाजिक बदलाव है:
 
10% की बढ़ोतरी: यह तय राशि हर तीन साल में 10% बढ़ेगी।

अतिरिक्त लाभ: अगर कोई महिला कामकाजी (Working Woman) भी है, तो यह राशि उसकी सैलरी के अतिरिक्त जोड़ी जाएगी।

फैसले की इनसाइड स्टोरी: क्यों बदलना पड़ा पुराना नियम?
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की बेंच ने 2001 के एक पुराने मामले पर सुनवाई करते हुए यह ऐतिहासिक सिद्धांत स्थापित किया।

कोर्ट की तीखी टिप्पणी: “यह बेहद विडंबनापूर्ण है कि गृहिणी को कमाने वाले सदस्यों पर निर्भर माना जाता है, जबकि हकीकत यह है कि पूरा घर उन्हीं के दम पर चलता है। सच तो यह है कि बाहर कमाने वाले सदस्य खुद गृहिणी पर निर्भर होते हैं।”

पहले अदालतों में गृहिणियों के काम को 'अकुशल श्रम' (Unskilled Labour) मानकर महज 3,000 जैसी मामूली रकम पर मुआवजा आंका जाता था। कोर्ट ने साफ किया कि महिलाएं देश की GDP में 15-17% का अनपेड योगदान देती हैं और पुरुषों से कहीं ज्यादा वक्त घर के कामों में बिताती हैं।

क्या है 'Loss of Domestic Care' का नया फॉर्मूला?
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह 30,000 एक 'बेसिक मिनिमम' (Stand-in) है। अब मुआवजे की गणना में 'घरेलू देखभाल का नुकसान' एक अलग हेड होगा, जिसके तहत निम्नलिखित को शामिल किया जाएगा:

घर का सुचारू संचालन और प्रबंधन।
बच्चों की मातृत्व देखभाल (Maternal Care)।
जीवनसाथी (Spouse) को मानसिक और व्यावहारिक समर्थन।

सकारात्मक पहलू: यह फैसला सदियों से अदृश्य रहे महिलाओं के घरेलू श्रम को आर्थिक मूल्य और सम्मान देता है। ग्रामीण और मध्यम वर्ग के परिवारों को दुर्घटना के वक्त इससे बहुत बड़ी आर्थिक सुरक्षा मिलेगी।

ओपिनियन: 'माई लॉर्ड'… पुरुष गृहस्थों (House Husbands) का ख्याल कौन रखेगा?

फैसले की सबसे दिलचस्प बात यह रही कि कोर्ट ने माना कि 'Homemaker' शब्द सुनते ही अक्सर महिला की छवि दिमाग में आती है, लेकिन पुरुष भी इस भूमिका में हो सकते हैं—चाहे मर्जी से या मजबूरी से। कोर्ट ने पुरुष होममेकर्स के प्रयासों की सराहना तो की, लेकिन पूरा फैसला पारंपरिक ढांचे (यानी महिला होममेकर) पर ही केंद्रित रहा। 

यहाँ एक बड़ा सवाल उठता है: क्या कानून और मुआवजे का यह सिद्धांत 'जेंडर-न्यूट्रल' नहीं होना चाहिए?

बदलते भारत की हकीकत: आधुनिक भारत में 'रोल रिवर्सल' तेजी से बढ़ रहा है। आज कई पुरुष अपनी पत्नी के करियर को उड़ान देने के लिए खुद पूर्णकालिक (Full-time) घर संभालते हैं—बच्चों की परवरिश, खाना बनाना, सफाई और बजट संभालना। हालांकि सोशल मीडिया पर इस फैसले के बाद सवाल उठाए जा रहे हैं कि शीर्ष अदालत का यह फैसला उन पुरुषों पर भी लागू होना चाहिए, जो होममेकर की भूमिका में कामकाजी पत्नी की अनुपस्थिति में पूरा घर संभालते हैं।  

भेदभाव क्यों?: अगर एक पुरुष गृहस्थ की दुर्घटना में मौत होती है, तो उसे सिर्फ 'आश्रित' (Dependent) मानकर कम मुआवजा देना न्यायसंगत नहीं है। जो योगदान एक महिला का है, वही योगदान उस पुरुष का भी है।

रूढ़िवादिता तोड़ना जरूरी: सुप्रीम कोर्ट ने 2021 और 2024 के फैसलों में भी पत्नी के घरेलू काम को पति के ऑफिस वर्क के बराबर माना था। अब समय आ गया है कि इस समानता को दोनों दिशाओं (महिला और पुरुष) में समान रूप से लागू किया जाए।

चुनौतियां और आगे की राह
चुनौती: इस फैसले को जमीनी स्तर पर लागू करने में एकरूपता (Consistency) लाना सबसे बड़ा काम होगा। इसके लिए मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल्स (MACT) को विशेष ट्रेनिंग और गाइडलाइंस देनी होंगी।

सुझाव: भविष्य में अदालतों को 'हाउस हसबैंड्स' के अधिकारों को भी स्पष्ट रूप से परिभाषित करना होगा। इसके अलावा, होममेकर्स (चाहे महिला हो या पुरुष) के लिए सिर्फ मौत के बाद मुआवजे तक बात सीमित न रहे, बल्कि उनके लिए सामाजिक सुरक्षा और पेंशन जैसी योजनाएं भी सोची जानी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट का यह कदम बेहद प्रगतिशील और सराहनीय है। यह राष्ट्र निर्माण में घरेलू श्रम की गरिमा को पहचान देता है। लेकिन सच्ची समानता तभी आएगी, जब 'घर संभालने वाले' के जेंडर को दरकिनार कर, उसके काम को समान आर्थिक और सामाजिक मूल्य दिया जाएगा। उम्मीद है कि 'माई लॉर्ड' अगली बार हाउस हसबैंड्स की इस अदृश्य मेहनत पर भी न्याय की मुहर लगाएंगे। कानून का यह सफर तभी पूर्ण होगा! 

नॉर्वे का राजपरिवार चिंताग्रस्त क्यों है?

नॉर्वे का राजपरिवार चिंताग्रस्त क्यों है?

norway royal family

Norway Royal Family: यूरोप का सबसे उत्तरी देश नॉर्वे एक राजशाही लोकतंत्र है। पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव के बहुत निकट होने के कारण वहाँ सर्दियों का मौसम बहुत लंबा और बहुत ही बर्फीला होता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी  यूरोप की अपनी पिछली विदेश यात्रा के समय 18-19 मई को जब नॉर्वे में थे, तब वहां की राजधानी ओस्लो का तापमान दिन में 13 से 18 डिग्री सेंटिग्रेड और रात में 3 से 8 डिग्री सेंटिग्रेड था।

 

प्रधानमंत्री मोदी इस यात्रा के समय ओस्लो में नॉर्वे के राजा हाराल्ड और रानी सोन्या तथा युवराज हाक्कोन और उनकी पत्नी युवराज्ञी मेत्ते मारित से भी मिले थे। मेत्ते मारित की तबीयत उस समय भी ठीक नहीं थी और उसके बाद में तो और भी चिंताजनक बन गई।

युवराज्ञी मेत्ते मारित की बीमारी

नॉर्वे के राजमहल ने इस बीच शुक्रवार, 5 जून को आधिकारिक तौर पर बताया कि युवराज्ञी मेत्ते मारित को उनके फेफड़े के प्रतिरोपण (lung transplant) के लिए एक प्रतीक्षा सूची (वेटिंग लिस्ट) में रखा गया है। इसका कारण “युवराज्ञी के फेफड़ों की बीमारी का चिंताजनक रूप से बढ़ जाना है।” ठीक एक दिन पहले उनका ओस्लो के रिक्सहोस्पिटालेट (Rikshospitalet) अस्पताल में कई घंटों तक इलाज हुआ था।

 

मेत्ते मारित को फेफड़ों की “पल्मोनरी फाइब्रोसिस” (pulmonary fibrosis) नाम की बीमारी होने की बात 2018 से ही ज्ञात है। दिसंबर 2025 में, राजमहल ने घोषणा की थी कि उनके फेफड़ो के लिए संभावित प्रतिरोपण की तैयारियां शुरू हो गई हैं। तब से, 52 वर्षीय मेत्ते मारित सार्वजनिक कार्यक्रमों में आदि में अक्सर ऑक्सीजन-प्रदायी उपकरण के साथ दिखाई देती रही हैं। “पल्मोनरी फाइब्रोसिस” फेफड़ों की एक जानलेवा गंभीर बीमारी है, जिसमें फेफड़ों के ऊतकों (tissue) को नुकसान पहुंचता है और उनमें कठोर निशान (scar tissue) बन जाते हैं। इससे फेफड़ों का लचीलापन खत्म हो जाता है और शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती।

norway royal family

“यह ख़तरनाक बीमारी है”

जिस दिन राजमहल ने अपना बयान जारी किया, उसी दिन मेत्ते मारित के डॉक्टरों ने प्रेस से बात की। ओस्लो के रिक्सहोस्पिटालेट अस्पताल के मुख्य फिजिशियन और “पल्मोनोलॉजिस्ट” तथा प्रतिरोपण (ट्रांसप्लांट) विभाग के प्रमुख “कार्डियोथोरेसिक” सर्जन ने मेत्ते मारित की बीमारी की वर्तमान स्थिति और उनके उपचार के लिए आवश्यक आगे के कदमों के बारे में जानकारी दी।

 

इन डॉक्टरों ने बताया कि पिछले छह महीनों में मेत्ते मारित के फेपड़ों की हालत काफी ख़राब हो गई है। पिछले एक साल में उनके फेफड़ों में बहुत ज़्यादा “स्कार टिश्यू” (कठोर निशान वाले ऊतक) बन गए हैं। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि “फेफड़ों की कार्यक्षमता की जांच से पता चला है कि केवल पिछले तीन महीनों में उनकी कार्यक्षमता काफी घट गई हुई है–“यह खतरनाक है।” फेफड़ों के विशेषज्ञ ने बताया कि प्रतिरोपण सूची में किसी का नाम शामिल करने के लिए स्पष्ट चिकित्सा निर्देशों का पालन किया जाता है–“मरीज़ के फेफड़ों की बीमारी इतनी गंभीर होनी चाहिए कि हमें यह मानना पड़े कि उसके पास जीने के लिए अब केवल एक साल बचा है।” साथ ही, बीमार व्यक्ति की स्थिति इतनी स्थिर भी होनी चाहिए कि वह उपचार प्रक्रिया और उसके बाद की ठीक होने की अवधि को भी झेल सके।

मेत्ते मारित के लिए जटिल प्रक्रिया

फाइब्रोसिस का सही इलाज सिर्फ़ फेफड़ों का प्रतिरोण (ट्रांसप्लांट) ही है। दवाएं बीमारी के बढ़ने की गति को धीमा तो कर सकती हैं, लेकिन इस प्रक्रिया को पलट नहीं सकतीं। यह प्रक्रिया अपने आप में बहुत मुश्किल और चुनौतीपूर्ण हती है। डॉक्टरों ने इस प्रक्रिया के बारे में बताया कि रोगी को सामान्य निश्चेतक (एनेस्थीसिया) के द्वारा बेहोश करने के बाद छाती की हड्डी (ब्रेस्टबोन) को खोला जाता है, दिल को हार्ट-लंग मशीन से जोड़ा जाता है और बीमार फेफड़े को काट कर निकाल दिया जाता है— जो “पूरी प्रक्रिया का सबसे मुश्किल हिस्सा” है। इस ऑपरेशन में तीन से पांच घंटे तक का समय लगता है।

 

डॉक्टरों ने बताया कि इस तरह की प्रक्रिया के बाद आगे जो कुछ होगा, उसमें जोखिम भी शामिल है—”यदि हम मान लें कि इन मरीज़ों को प्रतीक्षा सूची में रखा गया है और बारी आने पर उनका सफल प्रतिरोपण ऑपरेशन होता है, तब भी आठ में से एक मरीज़ पहला साल बीतने तक जीवित नहीं रह पाता।” एक दशक बाद, प्रतिरोपण ऑपरेशन करवाने वाले लगभग आधे मरीज़ ही जीवित रहते हैं। इसके अलावा, मरीज़ों को जीवन भर “प्रतिरक्षादमनकारी” (इम्यूनोसप्रेसिव) दवाएं लेनी पड़ती हैं, जो ऑपरेशन के बाद शरीर की अत्यधिक सक्रिय हो गई प्रतिरक्षा-प्रणाली को शांत करती हैं। जो लोग इस सब से उबर पाते हैं, उनमें से कई अच्छी ज़िंदगी भी जी पाते हैं।

उपयुक्त फेफड़े के दानी की तलाश

रिक्सहोस्पिटालेट (Rikshospitalet) के डॉक्टरों ने भरोसा जताया कि प्रतिरोपण के लिए जल्द ही उपयुक्त फेफड़ा मिल जाएगा। पिछले छह महीनों में प्रतीक्षा सूची “बहुत छोटी” रही है। नॉर्वे में हर साल लगभग 100 से 120 मृत अंग दाता (deceased organ donors) हुआ करते हैं, किंतु उनके फेफड़ों में से केवल एक-चौथाई ही प्रतिरोपण के लिए उपयुक्त होते हैं।

 

डॉक्टरों ने इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि प्रतिरोपण के लिए दानी से मिले फेफड़े का आकार, मरीज़ के फेफड़े के आकार से मेल खाना चाहिए। इसी प्रकार, दानी के रक्त का ग्रुप मरीज़ के रक्त-ग्रुप से मेल बैठना चाहिए, और उसके ऊतक-प्रकार (टिश्यू टाइप) के खिलाफ कोई एंटीबॉडी नहीं होनी चाहिए। डॉक्टरों ने कहा कि मेत्ते मारित देश के युवराज (यानी भावी राजा) की पत्नी अवश्य हैं, पर तब भी उन्हें कोई विशेष प्राथमिकता नहीं दी जाएगी— “हम हमेशा उस व्यक्ति को प्राथमिकता देते हैं जो सबसे अधिक गंभीर रूप से बीमार है, जिसके पास इंतज़ार करने का समय नहीं है।”

युवराज और परिवार पर असर

युवराज्ञी मेत्ते मारित के फेफड़ों के लिए होने वाले प्रतिरोपण की तैयारी का असर नॉर्वे के पूरे शाही परिवार पर दिखने लगा है। राजमहल ने घोषणा की है कि मेत्ते मारित अब आधिकारिक कार्यक्रमों में शामिल नहीं हो पाएंगी। युवराज हाक्कोन और मेत्ते मारित के विवाह की 25वीं वर्षगांठ (रजत जयंती) का जश्न— जो इसी वर्ष, यानी अगस्त 2026 में होना था — टाल दिया गया है। साथ ही, मेत्ते मारित सितंबर में होने वाली शाही यात्रा में भी शामिल नहीं होंगी। इसी प्रकार, युवराज हाक्कोन भी अपनी पत्नी के साथ अधिक समय बिताने के लिए अपने कार्यक्रमों को बदलने वाले हैं। शाही परिवार के दोनों बच्चे भी अपनी रोज़मर्रा की जिंदगी को नए सिरे से व्यवस्थित कर रहे हैं।

 

राजमहल ने घोषणा की है कि राजकुमारी इन्ग्रिद अलेक्सांद्रा 2026 के ऑटम (शरत्कालीन) शिक्षा सेमेस्टर में ऑस्ट्रेलिया के सिडनी शहर में अपनी पढ़ाई नहीं करेंगी; इसके बदले नॉर्वे के ओस्लो विश्वविद्यालय में ही अपनी पढ़ाई जारी रखेंगी। राजकुमार स्वेरे माग्नुस अपनी योजना के अनुसार, यूरोप में ही अपनी आगे की पढ़ाई शुरू करेंगे और ज़रूरत पड़ने पर नॉर्वे लौट आएंगे। नॉर्वे का रजघराना, इन सारी जानकारियों को छिपाने के बदले सार्वजनिक करने के द्वारा, 56 लाख की जनसंख्या वाली अपनी जनता को यही जताना चाहता है कि हम भी आदमी ही हैं, देवता नहीं। आम जनता के समान ही हमें भी सुख-दुख और बीमारियों जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

भरपूर लाभ के लिए रोज करें मंडूकासन; जानिए इसे करने का सही तरीका

भरपूर लाभ के लिए रोज करें मंडूकासन; जानिए इसे करने का सही तरीका

Mandukasana Method

'मंडूक' का सीधा सा मतलब है मेंढक। जब आप इस योग की अंतिम मुद्रा में होते हैं, तो आपके शरीर का आकार एक बैठे हुए मेंढक जैसा दिखाई देता है, बस इसीलिए इसे मंडूकासन (Frog Pose) कहा जाता है। वैसे तो इसे करने के कई तरीके हैं, लेकिन सबसे पॉपुलर और असरदार तरीका नीचे दिया गया है।

 

स्टेप-बाय-स्टेप गाइड (The Right Method)

स्टार्टिंग पोजीशन: सबसे पहले दंडासन (पैरों को सीधा फैलाकर) में बैठें और फिर घुटनों को मोड़कर वज्रासन की मुद्रा में आ जाएं।

मुद्रा बनाएं: अब अपने दोनों हाथों की मुट्ठियां बंद करें। ध्यान रहे, मुट्ठी बंद करते समय अंगूठा उंगलियों के अंदर दबा होना चाहिए।

पोजीशन लॉक करें: इन बंद मुट्ठियों को अपनी नाभि (Navel) के दोनों तरफ सेट करें।

फाइनल मूव: एक गहरी सांस छोड़ते हुए (Exhale) धीरे-धीरे आगे की ओर झुकें और अपनी ठोड़ी (Chin) को जमीन से टिकाने की कोशिश करें। कुछ सेकंड इसी पोजीशन में होल्ड करें, फिर सांस लेते हुए वापस नॉर्मल वज्रासन में आ जाएं।

 

काउंटर पोज (विपरीत आसन) क्यों है जरूरी?

योग का नियम कहता है कि आगे झुकने वाले आसन के बाद पीछे झुकने वाला आसन जरूर करना चाहिए ताकि बॉडी का बैलेंस बना रहे। मंडूकासन के बाद आप अपने योग एक्सपर्ट की सलाह से ऊष्ट्रासन (Camel Pose) या विपरीत नौकासन कर सकते हैं।

 

कितनी बार करें? (Frequency)

आम लोगों के लिए: इस आसन को रोजाना 2 बार दोहराना काफी है।

डायबिटीज मरीजों के लिए: शुगर कंट्रोल करने के लिए इसका अभ्यास 3 से 4 बार तक किया जा सकता है।

 

अलर्ट: कब और किसे बचना है? (Precautions)

नो-गो जोन: अगर पेट का कोई सीरियस ऑपरेशन या गंभीर बीमारी हो, तो इसे बिल्कुल न करें।

विशेष सलाह: स्लिप डिस्क, ऑस्टियोपॉरोसिस या भयंकर कमर दर्द के मरीज इसे बिना योग थेरेपिस्ट की देखरेख के ट्राई न करें।

प्रो-टिप: झुकते समय ध्यान रखें कि आपकी मुट्ठियां नाभि के आस-पास एकदम सही जगह पर फिक्स हों।

 

अल्टीमेट बेनिफिट्स (यह शरीर पर कैसे काम करता है?)

डायबिटीज में रामबाण: यह आसन आपके पैनक्रियाज (अग्न्याशय) को एक्टिव कर देता है, जिससे इंसुलिन का बैलेंस सुधरता है। शुगर के मरीजों के लिए यह बेहद फायदेमंद है।

डाइजेशन का पावरहाउस: पेट की आम समस्याएं जैसे गैस, कब्ज, एसिडिटी, अपच और भूख न लगने की शिकायत को यह चुटकियों में दूर करता है।

इंटरनल ऑर्गन्स का डीटॉक्स: इस आसन के दबाव से आमाशय, लिवर, किडनी, छोटी-बड़ी आंत, गॉलब्लैडर और रीप्रोडक्टिव ऑर्गन्स की डीप मसाज हो जाती है, जिससे उनकी वर्किंग कैपेसिटी बढ़ जाती है।

हार्ट और बेली फैट: यह आपके दिल (Heart) की सेहत को दुरुस्त रखता है और पेट की चर्बी को टोन करने में भी मदद करता है।

 

हिंदी साहित्य में पहेली के रूप में लिखी जाने वाली एक लयात्मक कविता: कह मुकरियां

हिंदी साहित्य में पहेली के रूप में लिखी जाने वाली एक लयात्मक कविता: कह मुकरियां

Illustration based on Hindi poetry

 

मुझको देता शीतल छाया।

देख उसे मन बहुत लुभाया।

वर्षा देने में वह दक्ष।

क्या सखि साजन? ना सखि ‘वृक्ष’।।

 

उसकी छटा श्याम सुखकारी।

सावन में उसकी बलिहारी।

धरा को जो कर देता मादल।

क्या सखि साजन? ना सखि बादल।।

 

मुझको हरदम राह दिखाता।

तम के भीतर दीप जलाता।

वह मेरे जीवन का रक्षक।

क्या सखि साजन? ना सखि शिक्षक।।

 

उसकी सूरत अति मनभावन।

वह लगता तुलसी सा पावन।

वह मेरी गोदी में लेटा।

क्या सखि साजन? ना सखि बेटा।।

 

मंद-मंद मुस्काता रहता।

शीतल रश्मि बहाता रहता।

उसके आगे फीके इंद्र।

क्या सखि साजन? ना सखि चन्द्र।

 

वह मेरा साथी है सच्चा।

मन उसका जैसे हो बच्चा।

भोली सूरत उच्च चरित्र 

क्या सखि साजन? ना सखि मित्र।

 

उसकी महिमा बड़ी निराली।

भर दे जीवन में हरियाली।

महक उठे जिससे मेरा तन।

क्या सखि साजन? ना सखि उपवन।।

 

मेरे मन का वही सहारा।

दुख में बन जाता रखवारा।

दुखों को करता है वह राई 

क्या सखि साजन? ना सखि भाई।।

 

उसकी धुन में सपने बुनती।

मन की गोपी उसको सुनती

तान सुने कान्हा का अंशी।

क्या सखि साजन? ना सखि वंशी।।

 

मुझको सबसे अधिक दुलारा।

उसने जीवन खूब सँवारा।

रोम-रोम उपजे उत्कर्ष

क्या सखि साजन? ना सखि ‘हर्ष’।।