एल्गोरिथम से अपना पर्सपेक्टिव मत बनाओ: तुम्हारे लिए जो 6 है वह मेरे लिए 9 है…

एल्गोरिथम से अपना पर्सपेक्टिव मत बनाओ: तुम्हारे लिए जो 6 है वह मेरे लिए 9 है...

Gen Z ka perspective

आजकल लोग सोशल मीडिया के आधार पर ही अपनी धारणाएं बनाने लगे हैं। जबकि इस मंच की सच्चाई यह है कि जिसे धर्म का ज़रा भी ज्ञान नहीं है, वह भी ज्ञानी बना बैठा है; और जिसे राजनीति की रत्ती भर समझ नहीं है, वह भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विषयों पर अपने प्रवचन दे रहा है। जो न तो पत्रकार हैं, न संत, ज्योतिष, न एक्सपर्ट और न ही डॉक्टर—वे भी इन सभी भूमिकाओं का दावा कर रहे हैं। आइए, इसी विषय और नजरिये पर आधारित यह आलेख पढ़ते हैं:-

 

सोशल मीडिया का छद्म ज्ञान और नजरिये का भ्रम

डिजिटल क्रांति के इस दौर में ज्ञान की परिभाषा ही बदल गई है। सोशल मीडिया एक ऐसा विशाल मंच बन चुका है जहाँ हर व्यक्ति के पास अपनी राय व्यक्त करने का अधिकार तो है, लेकिन उस राय के पीछे सत्यता और प्रमाणिकता का अभाव तेजी से बढ़ रहा है।

आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया हमारी दिनचर्या ही नहीं, बल्कि हमारी सोच और धारणाओं को संचालित करने वाला सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है। लेकिन इस आभासी दुनिया की सबसे चिंताजनक सच्चाई यह है कि यहाँ बिना किसी योग्यता या प्रामाणिकता के हर विषय पर ज्ञान बांटा जा रहा है।

 

विशेषज्ञता का ढोंग: आज चिकित्सा से लेकर कानून और अध्यात्म से लेकर राजनीति तक—हर विषय पर आधे-अधूरे ज्ञान के साथ 'विशेषज्ञ' मौजूद हैं। एक 15-सेकंड की रील या 280 अक्षरों का पोस्ट किसी गहन विषय का सत्य नहीं हो सकता।

 

भ्रामक धारणाएं: जब लोग बिना जांचे-परखे इस छद्म ज्ञान को सच मान लेते हैं, तो वे एक संकीर्ण और गलत नजरिये का शिकार हो जाते हैं।

 

सत्य और सूचना में अंतर: सूचना का भंडार होना 'ज्ञान' नहीं है और किसी की निजी राय 'सत्य' नहीं हो सकती। सच तक पहुँचने के लिए गहराई, अध्ययन और निष्पक्षता की आवश्यकता होती है, जो सोशल मीडिया के शोर में अक्सर खो जाती है।

 

सत्य एक विशाल और अनंत आकाश की तरह है, जबकि हमारा 'नजरिया' उस आकाश को देखने वाली एक छोटी सी खिड़की है। जीवन में हम जो कुछ भी देखते, सुनते या महसूस करते हैं, उसे अक्सर 'परम सत्य' मान लेते हैं। लेकिन वास्तव में, वह केवल हमारा एक दृष्टिकोण या नजरिया होता है। किसी एक नजरिये से सच को पूरी तरह जान पाना असंभव है, क्योंकि नजरिया व्यक्ति की मान्यताओं, प्रभाव, अनुभवों और परिस्थितियों की सीमा में बंधा होता है।

 

हाथी और छह अंधे व्यक्तियों की कथा

नजरिये और सत्य के अंतर को समझने के लिए भारत की एक प्राचीन लोककथा सबसे बेहतरीन उदाहरण है। छह दृष्टिहीन व्यक्तियों ने जब पहली बार एक हाथी को छुआ, तो सबने अपने-अपने अनुभव के आधार पर हाथी को परिभाषित किया। जिसने कान पकड़ा, उसने हाथी को सूप (सूपा) बताया; जिसने पैर छुआ, उसने खंभा कहा; जिसने पूंछ पकड़ी, उसने रस्सी बताया।

 

उन छहों व्यक्तियों का अपना-अपना नजरिया सही था, क्योंकि उन्होंने जो महसूस किया, वही कहा। लेकिन क्या उनमें से किसी का भी नजरिया पूरे 'हाथी' के सच को बयान कर सका? बिल्कुल नहीं। सच यह था कि हाथी उन सभी अनुभवों का एक सम्मिलित रूप था। ठीक इसी तरह, जब हम अपने किसी एक विचार या नजरिये को सच मान लेते हैं, तो हम बाकी के पूरे सत्य को नकार रहे होते हैं।

 

नजरिये की सीमाएं

हमारा नजरिया हमारे अतीत के अनुभवों, परवरिश, प्रभाव, धर्म, संस्कृति और उस क्षण की हमारी मानसिक स्थिति से तय होता है। दो लोग एक ही घटना को पूरी तरह से अलग-अलग तरीके से देख सकते हैं:

 

संख्या 6 और 9 का भ्रम: फर्श पर लिखा एक अंक एक तरफ खड़े व्यक्ति को 6 दिखेगा, तो दूसरी तरफ खड़े व्यक्ति को 9। दोनों अपनी जगह सही हैं, लेकिन मूल सच यह है कि वह फर्श पर उकेरी गई एक तटस्थ (neutral) आकृति है।

 

समय और स्थिति का प्रभाव: एक ही परिस्थिति एक व्यक्ति के लिए आपदा हो सकती है और दूसरे के लिए अवसर।

 

सत्य का वास्तविक स्वरूप

सत्य निरपेक्ष और अखंड होता है, जबकि नजरिया सापेक्ष और सीमित होता है। जब हम यह मान लेते हैं कि “केवल मेरा ही नजरिया सच है”, तो वहीं से अहंकार, विवाद और पूर्वाग्रह का जन्म होता है। दुनिया के तमाम वैचारिक मतभेद, युद्ध और पारिवारिक कलह का मूल कारण यही है कि लोग अपने 'नजरिये' को ही 'सत्य' मान बैठने की भूल कर बैठते हैं।

 

अंत में आज के संदर्भ में: दूसरों की रील्स और पोस्ट्स से अपना नजरिया बनाने के बजाय, तथ्यों की जांच करना, मूल किताब को पढ़ना और विवेक का प्रयोग करना आज की सबसे बड़ी जरूरत है, क्योंकि वर्तमान में सभी राजनीतिक दल जेन जी का नजरिया बदलने में लगे है। 

आंदोलित युवा और संवाद की आवश्यकता

आंदोलित युवा और संवाद की आवश्यकता

jharkhand student protest

युवा किसी भी राष्ट्र का वर्तमान और भविष्य होते हैं। किसी देश का युवा उसके भविष्य का निर्माता होता है। विश्व का इतिहास बताता है कि हर दौर में युवा वर्ग ने समाज को दिशा देने और व्यवस्था को चुनौती देने में केंद्रीय भूमिका निभाई है। जब कहीं भी सामाजिक बदलाव की कोई हवा चलती है उसमें युवा वर्ग हमेशा ही आगे रहता है। वह सत्ता के एकाधिकार, सामाजिक विषमता और नीतिगत जड़ता के विरुद्ध एक सशक्त प्रतिरोध दर्ज करता है। इतिहास साक्षी है कि जब-जब समाज में असमानता, अन्याय या दिशाहीनता बढ़ती है, तब-तब युवाओं की ऊर्जा ने नए आंदोलनों की नींव रखी है। युवा आंदोलनों ने समाज को एक नई दिशा देने का काम भी किया है।

 

किसी भी देश की तरुणाई जिस ओर चलती है, जमाना उसी तरफ मुड़ जाता है। इस वर्ग में वह शक्ति होती है कि वह हवा का रूख मोड़ सकता है। ऐसे में इस वर्ग के साथ सतत सकारात्मक संवाद बहुत आवश्यक हो जाता है। युवा वर्ग के सवालों, उनकी समस्याओं और विचारों पर मंथन बहुत आवश्यक है। अगर उसके मन में कोई बात है तो उसे सुनना बहुत जरूरी हो जाता है। कहते भी हैं कि किसी भी समूह के भीतर अगर किसी बात को लेकर कोई सवाल या दबाव है तो उसे तुरंत राहत देना जरूरी है। उसके भीतर के तनाव या दबाव को समाप्त करना जरूरी होता है। व्यवस्था और नेतृत्व उससे संवाद कर उसे सामान्य कर सकते हैं।

 

किसी भी समूह के साथ अगर सकारात्मक संवाद किया जाए तो परिस्थितियों को परिवर्तित किया जा सकता है। दुनियाभर में अलग-अलग ट्रेंडस पर नजर रखने वाली कंपनी स्टैटिस्टा के आंकड़े बताते हैं कि बीते दो बरसों में दुनियाभर के लगभग 10 देशों में युवाओं के प्रदर्शन हुए हैं। कुछ सालों पहले सोशल मीडिया के प्रभाव से ही अरब जगत के कई देशों में अनेकों आंदोलन हुए। वहां तख्तापलट भी हुए। युवाओं के इन आंदोलनों के कारण अलग-अलग जगहों पर भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, लेकिन उनमें कुछ बातें, कुछ मांगें अपने मूलस्वभाव में लगभग एक जैसी लगती हैं। और वो हैं, रोजगार के अवसर, बेहतर शिक्षा, भ्रष्टाचारमुक्त शासन व्यवस्था। जब उन्हें लगता है कि उनकी आवाज सुनी ही नहीं जा रही है तो वे सड़कों पर आंदोलित होकर उतर रहे हैं।

 

हाल ही में जेनजी प्रोटेस्ट के बाद आरएसएस प्रमुख ने एक संवाद कार्यक्रम में बातचीत के दौरान कहा कि जेन-जी की जो भी शिकायतें थीं, वो जायज थीं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन भी सहमति बनाने का एक माध्यम है और संवाद से एक सहमति का निर्माण होता है। सीजेपी के नेतृत्व वाला वह आंदोलन दिल्ली में तो खत्म हो गया। दूसरी ओर, रांची का प्रदर्शन भी सरकार के आश्वासन के बाद फिलहाल समाप्त हो गया। दरअसल, छात्र अपनी मांगों पर ठोस निर्णय चाहते हैं। 

 

भारत में दुनिया की बहुत बड़ी युवा आबादी है। देश में युवाओं के आंदोलनों का इतिहास भी अत्यंत समृद्ध रहा है। आजादी के आंदोलन के दौरान भी भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, खुदीराम बोस और नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे युवा नायकों ने जनमानस को भी बड़े पैमाने पर आंदोलित किया। उनके विचार युवा चेतना की प्रमुख प्रेरणा बने। आजाद भारत में भी युवाओं ने समाज में अपने आंदोलनो से सुधार की मांगे रखीं। 70 के दशक में गुजरात का नवनिर्माण वाला छात्र आंदोलन हो या फिर 1974 में हुआ जेपी आंदोलन, सभी में नेतृत्व करने वाला आम छात्र अपने आंदोलन से  सत्ता में सुधार, उसमें परिवर्तन और व्यवस्था को बेहतर बनाने की मांग करता दिखता है।

 

पूर्व राष्ट्रपति डा. कलाम ने कहा था कि युवा ही वह शक्ति है जो दुनिया को बदल सकती है। आज युवा दुनियाभर में व्यवस्थाओं को बदलने की बात पर सड़कों पर उतर रहा है। आज के युवाओं की बेहतर बात यह है कि उनके पास ग्लोबल इन्फरमेशन का नेटवर्क है। वे हर क्षण सूचनाओं से अपडेट होते रहते हैं। मौजूदा वक्त सूचना क्रांति का है। आज का युवा हर तरह के स्मार्ट गैजेट्स और डिजिटल प्लेटफामर्स से जुड़ा हुआ है। पल-पल की जानकारी उसे स्क्रीन पर मिलती रहती है। समाज में भी व्यापक स्तर पर इस तकनीक के चलते बदलाव आए हैं।

 

आमजन अपनी राय इन डिजिटल माध्यमों में खुलकर रखते हैं। ऐसे  में युवा भी सत्ता से सवाल हो या उसके किसी काम की तारीफ करनी हो, वे खुलकर डिजिटल प्लेटफार्म पर अपनी अभिव्यक्ति देते हैं। अगर किसी तरह उनकी आवाज को दबाने का प्रयास हो या युवाओं को लगता है कि उनका दमन हो रहा है तो वे डरने के बजाय सोशल मीडिया पर धूम मचा देते हैं। रील्स, मीम्स, व्यंग्य चित्रों और गीतों के माध्यम से वे जनता और सरकार के बीच अपनी बात रखते हैं। डिजिटल सूचना के माध्यम से त्वरित प्रसार बिना किसी औपचारिक केंद्रीय नेता के भी आंदोलन बहुत तेजी से बड़े आकार में सामने आ रहे हैं। शिक्षा, रोजगार या पर्यावरण जैसे स्थानीय मुद्दे तुरंत वैश्विक संवाद का हिस्सा बन रहे हैं। 

 

अब जहां आधुनिक युवा आंदोलन लचीले और तात्कालिक प्रभाव वाले दिख रहे हैं, वहीं उनके सामने कुछ गंभीर चुनौतियां भी स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती हैं। इस दौर में साफ दिखता है कि कई आंदोलन सोशल मीडिया पर जितनी तेजी से उभार ले रहे हैं,  उतनी ही तेजी से वे बिखर भी जाते हैं। जानकार मानते हैं कि आभासी मीडिया पर विमर्श से उठ खड़े होने वाले आंदोलनों में ठोस नीतिगत बदलाव के लिए जिस तरह की निरंतरता और वैचारिक गहराई की आवश्यक होती है, उसकी अक्सर इनमें कमी पाई जाती है।

यदि युवा आंदोलनों की ऊर्जा को सकारात्मकता के साथ जोड़ा जा सके, उसमें गंभीरता, ठहराव और वैचारिक परिपक्वता, संवैधानिक मूल्यों की समझ के दायरे में रहकर अभिव्यक्ति करने जैसी बातें जुड़ सकें तो युवाओं की आवाज सत्ता को जवाबदेह बना सकती। युवा अपनी सकारात्मकता के साथ राष्ट्र के समावेशी और न्यायपूर्ण भविष्य का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। इसके लिए उनसे सतत प्रभावी संवाद आवश्यक है।

इंदौर में साहित्य की विविध विधाओं का संगम: जनवादी लेखक संघ का 150वाँ रचना पाठ संपन्न

इंदौर में साहित्य की विविध विधाओं का संगम: जनवादी लेखक संघ का 150वाँ रचना पाठ संपन्न

Janvadi Lekhak Sangh pradeep kant

इंदौर। 22 अगस्त 2026 को इंदौर के 'अभिनव कला समाज' में जनवादी लेखक संघ के 150वें मासिक रचना पाठ का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं पर केंद्रित था, जिसमें ललित निबंध, यात्रा वृत्तांत और व्यंग्य विधा की रचनाएँ प्रस्तुत की गईं।

 

रचना पाठ का विवरण

ललित निबंध (संध्या गंगराड़े): संध्या गंगराड़े ने अपने ललित निबंध 'तबे एकला चालो रे' का पाठ किया। यह निबंध कबीर, मीरा, ग़ालिब और रवींद्रनाथ टैगोर जैसी महान विभूतियों के माध्यम से भीड़ से अलग हटकर अपनी राह बनाने वाले व्यक्तित्वों की बात करता है। निबंध में यह विचार व्यक्त किया गया कि अपनी अलग राह बनाने वाले ही समाज को कुछ नया दे सकते हैं, जबकि भीड़ तो भेड़चाल में बदलकर मंदिर-मस्जिद के विवादों में उलझी रहती है। इसी अकेलेपन के संघर्ष को दर्शाने के लिए कबीर के “जो घर फूँके आपना चले हमारे साथ”, मीरा के “मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई”, ग़ालिब के “रहिए अब ऐसी जगह चलकर जहाँ कोई ना हो” और टैगोर के “जोदी तोर डाक शुने केउ ना आशे तोबे एकला चालो रे” का उल्लेख किया गया।

 

यात्रा वृत्तांत (विभा दुबे): विभा दुबे ने अपने यात्रा वृत्तांत 'मेरी अमेरिका यात्रा' का वाचन किया। उन्होंने बताया कि यह यात्रा दो दृष्टियों से महत्वपूर्ण थी—पहला, अपने देश से दूर बसे परिजनों (बेटी और भाई) से मिलना और दूसरा, वहाँ की संस्कृति को समझना। इसमें न्यूज़र्सी, न्यूयॉर्क, कैलिफोर्निया और नियाग्रा फॉल्स की यात्रा का वर्णन था, जिसके अंतर्गत अमेरिका के वातावरण, वनस्पति, स्थानीय संस्कृति और मकानों की बनावट का सुंदर ज़िक्र किया गया।

 

व्यंग्य पाठ (सुरेश उपाध्याय): अंत में सुरेश उपाध्याय ने अपने तीन व्यंग्यों—'फाइल है फाइल का क्या', 'बैसाखी नंदन के बल्ले-बल्ले' और 'चोर-चोर का शोर' का पाठ किया। ये तीनों व्यंग्य वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक स्थितियों पर चुटकी लेते हुए गहराई से सोचने पर विवश करते हैं।

 

रचनाओं पर समीक्षा एवं चर्चा

रचना पाठ के उपरांत उपस्थित साहित्यकारों ने पढ़े गए आलेखों पर बेबाक और ईमानदार चर्चा की:

प्रदीप कांत: उन्होंने कहा कि ललित निबंध अपनी अलग राह बनाने वालों से शुरू होकर भीड़ की उस भेड़चाल तक जाता है, जो कभी भी सांप्रदायिकता का रूप ले सकती है। वहीं, यात्रा वृत्तांत को अपने वास्तविक स्वरूप में लिखा जाना अभी बाकी है।

 

प्रदीप मिश्र: उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजनों में रचनात्मकता साझा की जाती है, इसलिए उन पर ईमानदारी से चर्चा ज़रूरी है। उन्होंने निबंध में अकेलेपन के संघर्ष की सराहना करते हुए लालित्य की थोड़ी कमी को रेखांकित किया। यात्रा वृत्तांत के संदर्भ में उन्होंने कहा कि बतकही के साथ-साथ इसमें शब्दचित्र बनने चाहिए थे, जिनकी अभी कमी दिखी। साथ ही उन्होंने सुरेश उपाध्याय के व्यंग्यों की पैनी धार की सराहना की।

 

अन्य वक्ता (देवेंद्र रिणवा, शिरीन भावसार, विश्वनाथ कदम, विभा दुबे और संध्या गंगराड़े): देवेंद्र रिणवा, शिरीन भावसार और विश्वनाथ कदम ने व्यंग्य तथा ललित निबंध की सराहना की, परंतु यह भी माना कि यात्रा वृत्तांत का अपने पूर्ण स्वरूप में आना अभी शेष है। विभा दुबे और संध्या गंगराड़े ने व्यंग्यों के छोटे आकार के बावजूद उनके भीतर छिपी बड़ी सामाजिक मार को रेखांकित किया।

 

मंच संचालन एवं आभार

कार्यक्रम का सफल संचालन सचिव, जनवादी लेखक संघ प्रदीप कांत ने किया तथा अंत में आभार प्रदर्शन देवेंद्र रिणवा द्वारा किया गया।

इंदौर में आयोजित होगा राज्य स्तरीय- लक्ष्य मंथन योगासन प्रतियोगिता

इंदौर में आयोजित होगा राज्य स्तरीय- लक्ष्य मंथन योगासन प्रतियोगिता

yogasan

इंदौर। योग, स्वास्थ्य संवर्धन एवं सामाजिक चेतना के प्रसार के उद्देश्य से मध्य प्रदेश शासन के 'योग आयोग' के संरक्षण एवं मार्गदर्शन में राज्य स्तरीय “लक्ष्य ‘मंथन’ योगासन प्रतियोगिता” का आयोजन किया जा रहा है।

 

आयोजन की विस्तृत कार्य योजना साझा करते हुए 'लक्ष्य पर्यावरण एवं वाटर सॉल्यूशन वेलफेयर सोसायटी' के अध्यक्ष डॉ. प्रमोद नन्दवाल ने बताया कि संस्था पर्यावरण संरक्षण, जल संवर्धन और सामाजिक जागरूकता के साथ-साथ स्वस्थ व तनावमुक्त जीवनशैली के निर्माण के लिए सतत प्रयासरत है। इसी श्रृंखला में प्रदेश की उभरती युवा प्रतिभाओं को एक सशक्त मंच प्रदान करने तथा योगासन को खेल के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने के संकल्प के साथ इस व्यापक प्रतियोगिता की रूपरेखा तैयार की गई है।

 

आयोजन के तीन चरण

डॉ. नन्दवाल ने बताया कि प्रतियोगिता को तीन चरणों में आयोजित किया जाएगा:

प्रारंभिक (क्वालिफाइंग) चरण: प्रथम एवं द्वितीय क्वालिफाइंग चरण 30 अगस्त तथा 06 सितंबर को सेंट अर्नोल्ड हायर सेकेंडरी स्कूल (स्कीम नं. 74, विजय नगर, इंदौर) में आयोजित होंगे।

फाइनल राउंड: दोनों क्वालिफाइंग चरणों से चयनित श्रेष्ठ प्रतिभागी 12 सितंबर को बास्केटबॉल कॉम्प्लेक्स, इंदौर में आयोजित होने वाले फाइनल राउंड में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करेंगे।

सहभागिता: प्रतियोगिता का स्वरूप समावेशी रखा गया है। इसमें मध्य प्रदेश के विभिन्न विद्यालयों, योग महाविद्यालयों, मान्यता प्राप्त प्रशिक्षण केंद्रों, योग संस्थानों के साथ-साथ स्वतंत्र योग साधक भी सहभागिता कर सकेंगे।

yoga poster

 

आयु वर्ग एवं प्रतियोगिता की श्रेणियां

प्रतियोगिता को आयु और दक्षता के आधार पर दो प्रमुख वर्गों में विभाजित किया गया है:

आयु वर्ग: 8 से 14 वर्ष तथा 14 से 20 वर्ष (बालक एवं बालिका वर्ग पृथक-पृथक)। इसके अतिरिक्त 20 वर्ष से अधिक आयु के साधकों के लिए भी 2 विशेष प्रतियोगिताओं का आयोजन रखा गया है।

व्यक्तिगत योग प्रतियोगिता: इसके अंतर्गत प्रतिभागियों को निर्धारित योग प्रोटोकॉल और पाठ्यक्रम में से चयनित कठिन आसनों का प्रदर्शन करना अनिवार्य होगा।

युगल (पेयर) योगासन प्रतियोगिता: इसमें दो प्रतिभागियों को तय नियमों, संगीत की धुन और सामूहिक तालमेल के साथ अपनी प्रस्तुति देनी होगी। यह प्रारूप प्रतिभागियों में व्यक्तिगत अनुशासन के साथ-साथ टीम भावना को भी प्रोत्साहित करेगा।

 

मूल्यांकन एवं निष्पक्षता

आयोजन की निष्पक्षता और उच्च गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए विशेष ध्यान दिया गया है:

निर्णायक मंडल: निर्णायक मंडल में राष्ट्रीय स्तर की योग निर्णायक परीक्षा उत्तीर्ण एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निर्णयन का अनुभव रखने वाले विशेषज्ञों को शामिल किया गया है।

वैज्ञानिक मानक: मूल्यांकन प्रक्रिया पूरी तरह वैज्ञानिक एवं तकनीकी मानकों पर आधारित होगी, जिसमें आसनों की शुद्धता, शारीरिक संतुलन, लचीलापन, तकनीक, प्रस्तुति शैली एवं निर्धारित योग नियमों की सटीकता को परखा जाएगा।

सुरक्षा एवं नियम: पूरा आयोजन खेल नियमों, सुरक्षा मानकों और प्रशासनिक दिशानिर्देशों का कड़ाई से पालन करते हुए संपन्न कराया जाएगा।

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आयोजन समिति का आह्वान

आयोजन समिति के वरिष्ठ सदस्यों—डॉ. हेमंत शर्मा, श्री अनिल अग्रवाल, सुश्री रौनक सोनी, श्री प्रेम दुआ, श्री मनोज वर्मा एवं श्री चंद्रशेखर तिवारी—ने प्रतियोगिता के सफल आयोजन के लिए अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की है। उन्होंने प्रदेश के विभिन्न विद्यालयों, योग संस्थानों एवं योगप्रेमियों से इसमें अधिक से अधिक संख्या में सहभागिता करने का आह्वान किया है।

 

दिलों को जोड़ने की एक मुहिम: जानिए राजीव गांधी की जयंती और ‘सद्भावना दिवस’ का कनेक्शन

दिलों को जोड़ने की एक मुहिम: जानिए राजीव गांधी की जयंती और 'सद्भावना दिवस' का कनेक्शन

Rajiv Gandhi

Rajiv Gandhi

भांति-भांति के धर्म, अनगिनत भाषाएं और ढेरों बोलियां—भारत की यही सतरंगी विविधता हमारी सबसे बड़ी पहचान है। लेकिन इस विविधता को एक सूत्र में पिरोकर रखना कोई आसान काम नहीं। इसी आपसी भाईचारे, सहिष्णुता और प्रेम के धागे को मजबूत करने के लिए हर साल 20 अगस्त को देश में 'सद्भावना दिवस' मनाया जाता है। यह खास दिन भारत के पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी की जयंती की याद में समर्पित है, जिसका एकमात्र मकसद देश के कोने-कोने में अमन, शांति और सौहार्द का संदेश फैलाना है।

 

सद्भावना दिवस का मर्म और इसकी गहराई

इस दिन का बुनियादी फलसफा यही है कि किसी भी मुल्क की तरक्की सिर्फ बड़ी-बड़ी इमारतों या आर्थिक आंकड़ों से नहीं, बल्कि वहां के लोगों के आपसी प्यार और समझ से तय होती है। अगर दिलों में दूरियां और भेदभाव की दीवारें होंगी, तो हर तरक्की अधूरी रह जाएगी।

 

वर्ष 1991 में राजीव गांधी के निधन के बाद, 1992 में कांग्रेस द्वारा 'राजीव गांधी सद्भावना पुरस्कार' की नींव रखी गई। राजीव गांधी का दृढ़ विश्वास था कि देश की असली ताकत उसकी युवा शक्ति है। उनका मानना था कि अगर युवा पीढ़ी को सही दिशा मिले और वे जात-पात या धर्म के बंधनों से ऊपर उठकर केवल इंसानियत के नाते एक-दूसरे को गले लगाएं, तो देश में एक नई सामाजिक क्रांति आ सकती है।

 

क्यों चुना गया राजीव गांधी की जयंती का दिन?

राजीव गांधी ने अपने दौर में भारत को डिजिटल क्रांति, आधुनिक शिक्षा और सूचना तकनीक के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ाया। लेकिन तकनीक के साथ-साथ उनका सबसे ज्यादा जोर इस बात पर था कि एक बहुसांस्कृतिक देश में शांति और भाईचारा हर हाल में कायम रहना चाहिए। उनका साफ मानना था कि हिंसा, वैमनस्य और नफरत किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकते। उनकी इसी दूरदर्शी और शांतिप्रिय सोच को भावी पीढ़ियों तक पहुंचाने के मकसद से उनकी जयंती को 'सद्भावना दिवस' के रूप में मनाने की परंपरा शुरू हुई।

 

इस दिन क्या-क्या खास होता है?

20 अगस्त को देशभर के सरकारी दफ्तरों, स्कूलों, कॉलेजों और सामाजिक संस्थाओं में एक अलग ही उत्साह देखने को मिलता है:

 

सद्भावना की शपथ: लोग जात-पात और धर्म से ऊपर उठकर समाज में शांति और सौहार्द बनाए रखने का संकल्प लेते हैं।

युवाओं की भागीदारी: स्कूलों-कॉलेजों में निबंध, भाषण और डिबेट कॉम्पिटिशन आयोजित किए जाते हैं ताकि नई पीढ़ी को राष्ट्रीय अखंडता का मतलब समझ आए।

सांस्कृतिक रंग: जगह-जगह ऐसे रंगारंग कार्यक्रम होते हैं जो 'विविधता में एकता' के भारत के मूल मंत्र को बयां करते हैं।

डिजिटल अवेयरनेस: आज के दौर में सोशल मीडिया पर भी भाईचारे और शांति के संदेशों की मुहिम चलाई जाती है।

 

आज के दौर में इसकी अहमियत क्यों बढ़ जाती है?

आज जब छोटी-छोटी बातों पर समाज में बिखराव और दूरियां देखने को मिलती हैं, तब सद्भावना दिवस की प्रासंगिकता और भी ज्यादा गहरी हो जाती है। यह दिन हमें आईना दिखाता है और याद दिलाता है कि भारत का असली वजूद उसकी एकजुटता में है। जब हम हर तरह के भेदभाव को भुलाकर एक भारतीय के रूप में साथ खड़े होते हैं, तभी हमारा देश दुनिया में सीना तानकर आगे बढ़ पाता है।

 

आसमान से बरसेगा सेहत या संकट? जानिए बारिश का पानी पीने का सच!

आसमान से बरसेगा सेहत या संकट? जानिए बारिश का पानी पीने का सच!

Can You Drink Rain Water

Can You Drink Rain Water: बादलों से बरसती बूंदें जितनी राहत देती हैं, उतनी ही मन में एक बड़ी उलझन भी छोड़ जाती हैं—क्या गिलास भरकर बारिश का यह पानी पिया जा सकता है? पहली नज़र में कांच सा साफ़ दिखने वाला यह पानी सीधा पीने के लिए मुफ़ीद नहीं होता।

 

क्यों नहीं पीना चाहिए सीधा बारिश का पानी?

हवा का ज़हर: बूंदें आसमान से ज़मीन तक पहुँचते-पहुँचते हवा में मौजूद धूल, धुएं, टॉक्सिक केमिकल्स और स्मॉग को अपने अंदर समेट लेती हैं।

बैक्टीरिया का घर: जब यह पानी छतों, नालियों या पाइपों से होकर बहता है, तो इसमें छिपे सूक्ष्मजीव और नुकसानदेह बैक्टीरिया आसानी से घुल जाते हैं।

एसिडिक कुदरत: वायुमंडलीय गैसों के संपर्क में आने से कई बार बारिश के पानी में एसिडिक यानी अम्लीयता की मात्रा बढ़ जाती है, जो सेहत पर भारी पड़ सकती है।

 

पीने लायक न सही, पर बेहद काम की हैं ये बूंदें

भले ही आप इसे सीधे गटक न सकें, लेकिन पानी की हर बूंद को कई स्मार्ट तरीकों से काम में लाया जा सकता है:

पौधों की सेहत का राज: यह पानी नेचुरल मिनरल्स का खजाना होता है। बागवानी में इसका इस्तेमाल आपके घर के पौधों को नई रंगत देता है।

चमकदार घर और गाड़ियां: फर्श पोंछने, खिड़कियों और बर्तन चमकाने से लेकर अपनी चमचमाती कार धोने तक, यह पानी पानी की बर्बादी रोकता है।

लॉन्ड्री और फ्लशिंग: कपड़े धोने से लेकर टॉयलेट फ्लश तक के भारी-भरकम इस्तेमाल में बारिश का पानी सबसे बेहतर विकल्प है।

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पानी सहेजने के तरीके और कुछ जरूरी सावधानियां

छत पर टैंक सेट करके या फिर प्लास्टिक के बड़े बैरल और ड्रम लगाकर आप इस बरसाती खजाने को आसानी से जमा कर सकते हैं। बस कुछ छोटी-छोटी बातों का ध्यान ज़रूर रखें:

  • जिस ड्रम या टैंक में पानी स्टोर कर रहे हों, उसे पहले अच्छी तरह साफ-सुथरा कर लें।
  • पानी जमा करते वक्त एक बुनियादी फिल्टर ज़रूर लगाएं ताकि पत्तियां या कचरा अंदर न जाए।
  • अगर किसी मजबूरी में इस पानी को लंबे समय तक इस्तेमाल या किसी काम में लेना पड़े, तो इसे अच्छी तरह उबाल लेना ही समझदारी है।
  • कुदरत की इस अमूल्य देन को सही तरीके से सहेजकर आप न सिर्फ अपने पानी का बिल घटा सकते हैं, बल्कि धरती को बचाकर एक ज़िम्मेदार नागरिक का फर्ज़ भी निभा सकते हैं।

 

Ebola Virus: क्या है इबोला वायरस? जानिए इसके लक्षण, संक्रमण और बचाव के आसान उपाय

Ebola Virus: क्या है इबोला वायरस? जानिए इसके लक्षण, संक्रमण और बचाव के आसान उपाय

Ebola Virus

विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि कांगो में फैली इबोला बीमारी अब तक के इतिहास में दूसरी सबसे बड़ी महामारी है। कुछ साल पहले फैली ये महामारी पश्चिमी अफ्रीका में हजारों लोगों की जान ले चुकी है। वर्तमाान में फ़िलहाल 1094 संक्रमण मामलों की पुष्टि हो चुकी है और 277 लोगों की जान गई है। इबोला एक प्रकार का वायरस है। यह दुनिया भर के सबसे घातक वायरसों में से एक है। इससे सामान्य फ्लू के वायरस की तरह निपटा नहीं जा सकता, इसलिए जानकारी ही बचाव है। 

 

जानिए इबोला के लक्षण

अचानक बुखार आना, कमजोरी, मांसपेशियों में दर्द, गले में खराश और थकान। जितनी जल्दी संभव हो सके डॉक्टरों को सूचित करें। इबोला से संक्रमित मरीज के कपड़ों और इस्तेमाल होने वाले कपड़ों को भी जला देना चाहिए।

 

डॉक्टर्स और देश भर के विशेषज्ञों ने 5 प्रकार की सावधानियां बरतने का आग्रह किया है। 5 सरलतम सावधानियां अपनाकर इबोला नामक खतरनाक वायरस के संक्रमण से बचा जा सकता है-

 

1. हाथों को रखें स्वच्छ

अपने हाथों को हमेशा साबुन और पानी से साफ रखें। हाथों को सुखाने के लिए स्वच्छ तौलिए का इस्तेमाल करें। वायरस को मारने का यह सबसे प्रभावी तरीका है। हाथ धोने के लिए अच्छी कंपनी का हैंडवॉश इस्तेमाल करें।

 

2. हाथ ना मिलाएं

हाथ मिलाने से यथासंभव बचें क्योंकि यह वायरस शरीर के सीधे संपर्क से तेजी से फैलता है।

 

3. स्पर्श से बचें

अगर आपको किसी व्यक्ति पर इबोला से संक्रमित होने का संदेह है तो उन्हें स्पर्श न करें। यह वायरस पेशाब, मल, रक्त, उल्टी, पसीना, आंसू, शुक्राणु और योनि से होने वाले स्राव के संपर्क से फैलता है। अगर आपको लगता है कि किसी व्यक्ति की मौत इबोला वायरस की वजह से हुई है, तो उसके शरीर को छूने से बचें। किसी बीमार व्यक्ति की तुलना में मृत व्यक्ति से वायरस के संक्रमण का खतरा अधिक होता है।

 

4. नॉनवेज से बचें

बंदर, चिंपैंजी, चमगादड़ का मांस नहीं खाएं क्योंकि विशेषज्ञों का मानना है कि मनुष्यों में इसका संक्रमण इन्हीं जानवरों के संपर्क में आने से हुआ। शिकार करने और जानवरों को छूने से बचें। यह सावधानी जरूर रखें कि मांस को ठीक से पकाया गया है।

 

5. डॉक्टर के पास जाने में हिचके नहीं

डॉक्टर से डरें नहीं, वे आपकी मदद करने के लिए हैं। अस्पताल किसी भी मरीज के लिए सबसे सही जगह है। यहां मरीज को पानी की कमी से बचाया जा सकता है और दर्द निवारक दवा भी दी जा सकती हैं।

 

जब उम्मीद थक जाए, तब साहस काम आता है

जब उम्मीद थक जाए, तब साहस काम आता है

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जीवन का सबसे कठिन समय वह नहीं होता, जब हमारे सामने समस्याएँ खड़ी होती हैं। सबसे कठिन समय वह होता है, जब हर प्रयास के बाद भी मन धीरे-धीरे यह मानने लगे कि शायद अब कुछ नहीं बदलेगा। बाहर से सब कुछ सामान्य दिखाई देता है, लेकिन भीतर उम्मीद थकने लगती है। ऐसे क्षणों में इंसान दुनिया से नहीं, स्वयं से हारने लगता है।

 

यदि आपने भी कभी ऐसा समय देखा है, तो यह लेख आपके लिए है। क्योंकि जीवन में ऐसा दौर लगभग हर व्यक्ति के सामने आता है। फर्क केवल इतना होता है कि कोई उसे शब्दों में कह देता है और कोई चुपचाप अपने भीतर सहता रहता है। हम अक्सर सोचते हैं कि इंसान केवल उम्मीद के सहारे जीता है। लेकिन अनुभव ने मुझे एक अलग बात सिखाई है। उम्मीद और साहस एक ही चीज़ नहीं हैं। उम्मीद कहती है— 'शायद सब ठीक हो जाएगा।' साहस कहता है— 'जब तक सब ठीक नहीं होता, तब तक मैं रुकूँगा नहीं।'

 

यही कारण है कि जब उम्मीद थकने लगती है, तब साहस की असली परीक्षा शुरू होती है। कुछ वर्ष पहले मेरी मुलाकात एक छोटे दुकानदार से हुई। उनका चेहरा बुझा-बुझा था। बातचीत के दौरान उन्होंने कहा, 'अब हर सुबह दुकान खोलने का मन नहीं करता। महीनों से मेहनत कर रहा हूँ, लेकिन लगता है जैसे जीवन एक ही जगह ठहर गया है।' मैंने उनसे पूछा, 'फिर भी रोज़ दुकान क्यों खोलते हैं?'

 

उन्होंने कुछ क्षण मेरी ओर देखा और फिर मुस्कुराकर बोले, 'क्योंकि अगर आज शटर नहीं खोलूँगा, तो कल बदलने की संभावना भी अपने हाथों से बंद कर दूँगा। सच कहूँ, अब मैं उम्मीद के भरोसे नहीं, अपने कर्तव्य के भरोसे दुकान खोलता हूँ।' उनकी यह बात सुनकर मैं कुछ देर तक मौन रहा। उस दिन पहली बार महसूस हुआ कि साहस हमेशा ऊँची आवाज़ में नहीं बोलता। कई बार वह हमारे भीतर चुपचाप इतना भर कहता है—'रुकना मत… बस अगला सही कदम उठाते रहो।'

 

उस दिन मुझे एक और बात समझ में आई। जीवन आगे बढ़ाने के लिए हमेशा बड़ी उम्मीदों की ज़रूरत नहीं होती। कई बार एक छोटा-सा कारण ही काफी होता है—परिवार की जिम्मेदारी, किसी अपने की मुस्कान, अपने काम के प्रति ईमानदारी या स्वयं से किया हुआ एक वादा। शायद इसी कारण किसान हर वर्ष फिर से बीज बोता है। उसे मौसम की गारंटी नहीं होती, लेकिन कर्म पर उसका विश्वास बना रहता है। विद्यार्थी कई असफलताओं के बाद भी फिर से किताब खोलता है। उसे परिणाम दिखाई नहीं देता, फिर भी वह सीखना नहीं छोड़ता।

 

एक पिता अपनी चिंताओं को अपने चेहरे तक नहीं आने देता, क्योंकि वह जानता है कि उसके बच्चों का आत्मविश्वास उसके चेहरे से ही जन्म लेता है। एक माँ अपने मन की थकान और अपनी चिंताओं को भीतर ही समेटे रखती है, फिर भी पूरे परिवार को यह एहसास नहीं होने देती कि वह स्वयं कितने संघर्षों से गुजर रही है।

 

ये लोग असाधारण नहीं हैं। ये हमारे आसपास के साधारण लोग हैं। लेकिन इन्हीं साधारण लोगों के भीतर छिपा साहस जीवन को आगे बढ़ाता है। कठिन समय हमें तोड़ने नहीं आता। वह हमें यह दिखाने आता है कि हमारे भीतर कितना धैर्य, कितना विश्वास और कितनी शक्ति अभी भी बची हुई है। जब परिस्थितियाँ अनुकूल होती हैं, तब हर व्यक्ति मजबूत दिखाई देता है। असली पहचान तब होती है, जब सब कुछ विपरीत हो और फिर भी इंसान अपने मूल्यों को न छोड़े।

 

हमारी एक भूल हमें और अधिक कमजोर बना देती है। हम अपने संघर्ष की तुलना किसी और की सफलता से करने लगते हैं। लेकिन हर जीवन की कहानी अलग होती है। किसी की यात्रा तेज होती है, किसी की गहरी। इसलिए तुलना नहीं, निरंतरता महत्वपूर्ण है। जब जीवन कठिन लगे, तब पूरी जिंदगी का निर्णय मत कीजिए। केवल इतना तय कीजिए कि आज का सही कदम क्या है। जीवन हमेशा अगले दस वर्षों के निर्णय से नहीं बदलता। कई बार वह केवल आज लिए गए एक सही निर्णय से बदलना शुरू होता है।

 

यह भी सच है कि हर प्रयास का परिणाम तुरंत नहीं मिलता। कुछ बीज मिट्टी के भीतर लंबे समय तक दिखाई नहीं देते। इसका अर्थ यह नहीं कि उनमें जीवन नहीं है। वे अपनी जड़ें मजबूत कर रहे होते हैं। मनुष्य का जीवन भी कुछ ऐसा ही है। कई बार हमारी सबसे बड़ी तैयारी दुनिया की नज़रों से छिपी होती है। याद रखिए, सफलता केवल मंज़िल तक पहुँचने का नाम नहीं है। कई बार सफलता यह भी होती है कि कठिन समय के बावजूद हमने अपने भीतर की अच्छाई, अपने कर्तव्य और अपने विश्वास को जीवित रखा।

 

यदि आज आपकी उम्मीद थक गई है, तो उसे दोष मत दीजिए। उम्मीद भी मन की एक अवस्था है। उसे लौटने में थोड़ा समय लग सकता है। लेकिन अपने साहस को कभी मत छोड़िए। क्योंकि साहस ही वह शक्ति है, जो थके हुए मन को फिर से उठाती है, बिखरे हुए विश्वास को जोड़ती है और अंधेरे में भी अगला कदम उठाने का हौसला देती है। जीवन धीरे-धीरे उन्हीं लोगों के सामने अपने द्वार खोलता है, जो परिस्थितियों के सामने झुकने के बजाय अपने कर्तव्य पर टिके रहते हैं। इसलिए जब उम्मीद थक जाए, तब उसके लौटने की प्रतीक्षा मत कीजिए। अपने भीतर के साहस का हाथ थाम लीजिए। क्योंकि अंत में जीवन उन लोगों की कहानी लिखता है, जिन्होंने सबसे कठिन दिनों में भी चलना बंद नहीं किया।

 

याद रखिए— उम्मीद हमें भविष्य की झलक दिखाती है, लेकिन उस भविष्य तक पहुँचाने का काम साहस करता है। इसलिए जब उम्मीद थक जाए, तब अपने भीतर की उस शांत आवाज़ को सुनिए, जो आज भी कह रही है— 'एक कदम और… बस एक कदम और।' कई बार यही एक कदम पूरी जिंदगी बदल देता है। अंत में बस इतना ही कहना चाहूँगा— उम्मीद हमें आगे देखने की वजह देती है, लेकिन आगे बढ़ने की ताकत साहस देता है।

असली पनीर और Analog Paneer में क्या है फर्क? खरीदने से पहले ऐसे करें पहचान

असली पनीर और Analog Paneer में क्या है फर्क? खरीदने से पहले ऐसे करें पहचान

asli paneer and Analog Paneer

एनालॉग पनीर एक कृत्रिम या नकली पनीर है, जो पारंपरिक तरीके से शुद्ध दूध को फाड़कर नहीं बनाया जाता। यह केवल पनीर जैसा दिखने, कटने और स्वाद देने वाला एक विकल्प (Substitute) है। इसे बनाने के लिए असली दूध के फैट की जगह स्किम्ड मिल्क पाउडर, पाम ऑयल या अन्य सस्ते वनस्पति तेल (Vegetable Fat), स्टार्च और केमिकल इमल्सीफायर्स का इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि यह पहली नज़र में बिल्कुल असली पनीर जैसा लगता है, लेकिन इसमें पोषक तत्वों की भारी कमी होती है और इसका नियमित सेवन सेहत के लिए हानिकारक हो सकता है।

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यह कैसे बनाया जाता है?

असली पनीर ताजे दूध (गाय या भैंस) में नींबू या सिरका डालकर बनाया जाता है। इसके विपरीत, एनालॉग पनीर बनाने की प्रक्रिया कुछ इस प्रकार है:

सस्ता तेल मिलाना: इसमें असली दूध के फैट (मलाई) की जगह पाम ऑयल (ताड़ का तेल) या अन्य सस्ता वनस्पति तेल इस्तेमाल किया जाता है।

पाउडर और स्टार्च का मिश्रण: इसमें स्किम्ड मिल्क पाउडर (Skimmed Milk Powder), मक्के या आलू का स्टार्च और पानी मिलाकर एक गाढ़ा पेस्ट बनाया जाता है।

केमिकल और स्टेबलाइजर: इसे असली पनीर जैसी बनावट देने के लिए इमल्सिफायर और स्टेबलाइज़र मिलाए जाते हैं ताकि तेल और पानी आपस में जम जाएं।

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यह असली पनीर से अलग कैसे है?

सामग्री और लागत: असली पनीर सिर्फ शुद्ध दूध से बनता है और महंगा होता है। वहीं एनालॉग पनीर वनस्पति तेल और मिल्क पाउडर से बनता है, जिससे इसकी निर्माण लागत बेहद कम (लगभग आधी) आती है।

 

पोषण और सेहत: असली पनीर प्रोटीन और कैल्शियम का प्राकृतिक स्रोत है। इसके विपरीत, एनालॉग पनीर में पाम ऑयल और स्टार्च की अधिकता होने के कारण यह सेहत के लिए फायदेमंद नहीं होता और बैड कोलेस्ट्रॉल बढ़ा सकता है।

 

इस्तेमाल कहां होता है: अत्यधिक सस्ता होने के कारण इसका सबसे ज्यादा इस्तेमाल स्ट्रीट फूड वेंडर्स, सस्ते रेस्टोरेंट, फ्रोजन फूड्स और बड़े पैमाने पर होने वाली शादियों/कैटरिंग में किया जाता है।

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असली और एनालॉग पनीर की पहचान कैसे करें?

हाथ से मसलकर देखें: असली पनीर हाथ से दबाने पर आसानी से चूरा (Crumble) हो जाता है। एनालॉग पनीर रबड़ जैसा खिंचता है या स्पंज की तरह दबता है।

 

आयोडीन टेस्ट (स्टार्च की जांच): पनीर के टुकड़े को पानी में उबालकर ठंडा करें और उस पर आयोडीन सॉल्यूशन की 2-3 बूंदें डालें। अगर पनीर का रंग नीला हो जाए, तो समझ जाएं कि उसमें स्टार्च मिला है यानी वह एनालॉग पनीर है।

 

स्वाद और महक: असली पनीर में दूध की हल्की प्राकृतिक महक और सौम्य मिठास होती है, जबकि एनालॉग पनीर स्वाद में फीका या हल्का तेल जैसा लगता है।

लोकतंत्र की पहली पाठशाला: छात्रसंघ चुनावों की वापसी क्यों जरूरी? जानें युवाओं की बड़ी जिम्मेदारी

Madhya Pradesh Student Union Elections 2026

“विश्वविद्यालय केवल डिग्रियाँ नहीं गढ़ते, वे राष्ट्र का भविष्य गढ़ते हैं।”

 

करीब नौ वर्षों के लंबे अंतराल के बाद मध्य प्रदेश के महाविद्यालयों में छात्रसंघ चुनावों की आहट फिर सुनाई दे रही है। कैंपस एक बार फिर जीवंत हैं- गलियारों में चुनावी नारों की गूंज है, कक्षाओं में प्रत्याशी विद्यार्थियों से संवाद कर रहे हैं, छात्र अपने भविष्य के प्रतिनिधियों पर चर्चा कर रहे हैं और पूरे परिसर का वातावरण लोकतांत्रिक ऊर्जा से भर उठा है। यह दृश्य केवल चुनावी गतिविधियों का नहीं, बल्कि उस लोकतांत्रिक संस्कृति की वापसी का प्रतीक है जिसकी शुरुआत शिक्षण संस्थानों से होती है।

 

मेरे लिए यह दृश्य केवल वर्तमान का अनुभव नहीं, बल्कि स्मृतियों का भी हिस्सा है। छात्र जीवन के वे दिन अनायास ही सामने आ खड़े होते हैं, जब मैं स्वयं छात्र राजनीति में सक्रिय था। वर्ष 2000 से लेकर 2017 तक छात्र राजनीति से जुड़ने एवं मार्गदर्शन करने का एक लंबा अवसर मुझे मिला। विद्यार्थियों की समस्याओं को समझना, नेतृत्व करना, संगठन बनाना, संवाद स्थापित करना और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का हिस्सा बनना मेरे सार्वजनिक जीवन की ऐसी पाठशाला रही जिसने मेरे व्यक्तित्व और सोच दोनों को परिपक्व बनाया। आज यह गहराई से महसूस होता है कि छात्रसंघ चुनाव केवल प्रतिनिधि चुनने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि नेतृत्व, उत्तरदायित्व और लोकतांत्रिक संस्कारों का पहला विद्यालय हैं।

 

लोकतंत्र संसद या विधानसभा की सीढ़ियों से शुरू नहीं होता; उसकी पहली सांस विद्यालयों और महाविद्यालयों के परिसरों में चलती है। यहीं युवा मतदान का महत्व समझते हैं, भिन्न विचारों का सम्मान करना सीखते हैं, असहमति के साथ भी संवाद करने की कला विकसित करते हैं और यह अनुभव करते हैं कि नेतृत्व अधिकार नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व है। इसी कारण छात्र राजनीति को 'लोकतंत्र की पहली पाठशाला' कहा जाता है।

 

वर्ष 2017 के बाद मध्य प्रदेश के अधिकांश महाविद्यालयों में छात्रसंघ चुनाव नहीं हुए। इस दौरान एक पूरी पीढ़ी कॉलेजों में आई, पढ़ाई पूरी की और आगे बढ़ गई, लेकिन उन्हें लोकतंत्र का प्रत्यक्ष अभ्यास करने का अवसर नहीं मिला। आज जो विद्यार्थी स्नातक और स्नातकोत्तर कक्षाओं में अध्ययनरत हैं, उनके लिए यह पहला अवसर होगा जब वे अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करेंगे। यह केवल मतपत्र पर मुहर लगाने या बटन दबाने का अवसर नहीं, बल्कि एक सजग लोकतांत्रिक नागरिक बनने की दिशा में पहला कदम है।

 

शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री प्राप्त करना या रोजगार हासिल करना नहीं होता। इसका वास्तविक लक्ष्य ऐसे नागरिक तैयार करना है जो समाज के प्रति संवेदनशील हों, विवेकपूर्ण निर्णय लेने में सक्षम हों और सार्वजनिक जीवन में जिम्मेदारी निभाने का साहस रखते हों। छात्रसंघ चुनाव इन मूल्यों को व्यावहारिक रूप से सीखने का अवसर देते हैं। यहाँ विद्यार्थी समझते हैं कि लोकतंत्र केवल बहुमत का नाम नहीं, बल्कि संवाद, सहमति और सम्मानजनक असहमति की संस्कृति का नाम है।

 

भारतीय लोकतंत्र का इतिहास इस बात का साक्षी है कि अनेक राष्ट्रीय और प्रादेशिक नेताओं ने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत छात्र राजनीति से ही की। संसद, विधानसभाओं और सामाजिक आंदोलनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले अनेक व्यक्तित्व कभी कॉलेज परिसरों में छात्र प्रतिनिधि रहे। मध्य प्रदेश भी इससे अलग नहीं है। यहाँ के छात्रसंघों ने ऐसे अनेक नेता दिए जिन्होंने आगे चलकर राजनीति, प्रशासन, शिक्षा और समाज सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। इसलिए छात्रसंघ चुनावों को केवल एक वार्षिक औपचारिकता मानना उनके ऐतिहासिक महत्व को कम करके आंकना होगा।

 

समय के साथ छात्र राजनीति का स्वरूप भी बदला है। मेरे छात्र जीवन में चुनाव प्रचार पोस्टर, पर्चियों, दीवार लेखन और नुक्कड़ सभाओं तक सीमित रहता था। आज डिजिटल युग में व्हाट्सएप ग्रुप, इंस्टाग्राम, फेसबुक, यूट्यूब और अन्य सोशल मीडिया मंच चुनावी अभियान के प्रमुख माध्यम बन चुके हैं। यह परिवर्तन समय की मांग भी है और एक नया अवसर भी। इससे संवाद का दायरा व्यापक हुआ है और विद्यार्थी अपने विचार अधिक प्रभावी ढंग से रख पा रहे हैं। हालाँकि, इसके साथ ही यह जिम्मेदारी भी बढ़ी है कि डिजिटल मंच स्वस्थ बहस का माध्यम बनें- दुष्प्रचार, ट्रोलिंग और व्यक्तिगत कटाक्ष का नहीं।

 

आज की राजनीति की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अनेक बार रचनात्मक विमर्श की जगह शोर और तथ्यों की जगह भावनात्मक ध्रुवीकरण हावी हो जाता है। यदि यही प्रवृत्ति छात्र राजनीति में भी प्रवेश कर गई, तो लोकतंत्र की पहली पाठशाला अपना मूल उद्देश्य खो देगी। इसलिए यह आवश्यक है कि चुनाव व्यक्तियों की लोकप्रियता से अधिक मुद्दों की गंभीरता पर आधारित हों। महाविद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आधुनिक पुस्तकालय, शोध सुविधाएं, छात्रावास, खेल, महिला सुरक्षा, दिव्यांग-अनुकूल परिसर, डिजिटल संसाधन, स्टार्टअप और कौशल विकास जैसी मूलभूत आवश्यकताओं को चुनावी विमर्श का केंद्र बनाया जाना चाहिए। विद्यार्थियों को यह समझना होगा कि केवल अच्छे भाषण से अधिक महत्वपूर्ण एक अच्छी और व्यावहारिक कार्ययोजना होती है।

 

यह भी उतना ही आवश्यक है कि छात्र राजनीति अपनी मूल आत्मा को सुरक्षित रखे। राजनीतिक दलों की वैचारिक प्रेरणा लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा हो सकती है, लेकिन छात्रसंघों की प्राथमिकता सदैव 'छात्रहित' ही रहनी चाहिए। यदि चुनाव धनबल, बाहुबल, जातीय ध्रुवीकरण या व्यक्तिगत प्रतिद्वंद्विता का माध्यम बनेंगे, तो उनका शैक्षणिक और लोकतांत्रिक उद्देश्य कमजोर पड़ जाएगा। विश्वविद्यालय प्रशासन, राज्य सरकार, छात्र संगठनों और स्वयं विद्यार्थियों की यह साझा जिम्मेदारी है कि चुनाव मर्यादित, शांतिपूर्ण और विचार-केंद्रित हों।

 

छात्रसंघ के निर्वाचित प्रतिनिधियों के लिए भी यह अवसर केवल विजय प्राप्त करने का नहीं, बल्कि विद्यार्थियों का विश्वास अर्जित करने का है। उनका प्रमुख दायित्व प्रशासन और विद्यार्थियों के बीच प्रभावी संवाद स्थापित करना, समस्याओं के समाधान के लिए रचनात्मक पहल करना और परिसर में सकारात्मक शैक्षणिक वातावरण बनाए रखना है। नेतृत्व का वास्तविक अर्थ लोकप्रियता नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व और सेवा भाव है। यदि यह भावना छात्र जीवन में ही विकसित हो जाए, तो वही युवा भविष्य में समाज और राष्ट्र को बेहतर नेतृत्व प्रदान करेंगे।

 

मध्य प्रदेश में प्रस्तावित छात्रसंघ चुनाव इसलिए केवल एक प्रशासनिक कार्यक्रम नहीं हैं, बल्कि वे लोकतांत्रिक विश्वास की पुनर्स्थापना का सुनहरा अवसर हैं। नौ वर्षों के बाद लौटती यह चुनावी हलचल केवल पोस्टरों, नारों और मतदान तक सीमित नहीं रहनी चाहिए; यह विचारों के पुनर्जागरण, संवाद की पुनर्स्थापना और युवाओं की सकारात्मक भागीदारी का उत्सव बननी चाहिए।

 

आज आवश्यकता इस बात की है कि विद्यार्थी चुनाव को अधिकार नहीं बल्कि दायित्व के रूप में देखें, उम्मीदवार पद को नहीं बल्कि सेवा को अपना संकल्प समझें, और विश्वविद्यालय प्रशासन चुनाव को महज औपचारिकता न मानकर लोकतांत्रिक संस्कृति के उत्सव के रूप में संचालित करे। यदि ऐसा हुआ, तो यह केवल छात्रसंघ चुनावों की वापसी नहीं होगी, बल्कि लोकतंत्र की उस आत्मा का पुनर्जन्म होगा जो शिक्षा संस्थानों से होकर पूरे समाज तक प्रवाहित होती है। इतिहास गवाह है- जब विश्वविद्यालयों में विचार जागते हैं, तब केवल परिसर ही नहीं जागते; समाज जागता है, राजनीति परिपक्व होती है और राष्ट्र का भविष्य एक नई व सही दिशा प्राप्त करता है।