हिंदी एवं इतिहास लेखन में उल्लेखनीय योगदान के लिए अमित राव पवार को मिला ‘मातृभाषा मुंशी प्रेमचंद सम्मान’

हिंदी एवं इतिहास लेखन में उल्लेखनीय योगदान के लिए अमित राव पवार को मिला 'मातृभाषा मुंशी प्रेमचंद सम्मान'

Amit Rao Pawar

इंदौर। 14 सितंबर से प्रारंभ हुए हिंदी सप्ताह के अवसर पर इंदौर प्रेस क्लब सभागार में आयोजित साहित्यिक समारोह में देवास के युवा लेखक एवं इतिहासविद अमित राव पवार को हिंदी साहित्य एवं इतिहास लेखन के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए ‘मातृभाषा मुंशी प्रेमचंद सम्मान’ से अलंकृत किया गया।

 

18 सितंबर 2026 (शुक्रवार) को आयोजित इस समारोह में ‘शुभ संकल्प समूह, इंदौर’ एवं ‘मध्य भारत हिंदी साहित्य समिति’ के संयुक्त तत्वावधान में श्री पवार को स्मृति-चिह्न एवं प्रशस्ति-पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया।

 

समारोह के दौरान वक्ताओं ने हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार, संरक्षण एवं संवर्धन के साथ-साथ युवा पीढ़ी को हिंदी साहित्य से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। कार्यक्रम में अमित राव पवार के साहित्यिक व ऐतिहासिक लेखन की सराहना करते हुए उन्हें हिंदी के प्रति समर्पित युवा रचनाकार बताया गया।

 

इस कार्यक्रम के सफल संयोजन में डॉ. सुनीता श्रीवास्तव एवं उपेंद्र श्रीवास्तव का विशेष योगदान रहा। अमित राव पवार को यह सम्मान प्राप्त होने पर साहित्यिक व सामाजिक क्षेत्र के पदाधिकारियों, साहित्यप्रेमियों तथा शुभचिंतकों ने उन्हें बधाई एवं शुभकामनाएं दीं।

इंदौर में साहित्य की विविध विधाओं का संगम: जनवादी लेखक संघ का 150वाँ रचना पाठ संपन्न

इंदौर में साहित्य की विविध विधाओं का संगम: जनवादी लेखक संघ का 150वाँ रचना पाठ संपन्न

Janvadi Lekhak Sangh pradeep kant

इंदौर। 22 अगस्त 2026 को इंदौर के 'अभिनव कला समाज' में जनवादी लेखक संघ के 150वें मासिक रचना पाठ का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं पर केंद्रित था, जिसमें ललित निबंध, यात्रा वृत्तांत और व्यंग्य विधा की रचनाएँ प्रस्तुत की गईं।

 

रचना पाठ का विवरण

ललित निबंध (संध्या गंगराड़े): संध्या गंगराड़े ने अपने ललित निबंध 'तबे एकला चालो रे' का पाठ किया। यह निबंध कबीर, मीरा, ग़ालिब और रवींद्रनाथ टैगोर जैसी महान विभूतियों के माध्यम से भीड़ से अलग हटकर अपनी राह बनाने वाले व्यक्तित्वों की बात करता है। निबंध में यह विचार व्यक्त किया गया कि अपनी अलग राह बनाने वाले ही समाज को कुछ नया दे सकते हैं, जबकि भीड़ तो भेड़चाल में बदलकर मंदिर-मस्जिद के विवादों में उलझी रहती है। इसी अकेलेपन के संघर्ष को दर्शाने के लिए कबीर के “जो घर फूँके आपना चले हमारे साथ”, मीरा के “मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई”, ग़ालिब के “रहिए अब ऐसी जगह चलकर जहाँ कोई ना हो” और टैगोर के “जोदी तोर डाक शुने केउ ना आशे तोबे एकला चालो रे” का उल्लेख किया गया।

 

यात्रा वृत्तांत (विभा दुबे): विभा दुबे ने अपने यात्रा वृत्तांत 'मेरी अमेरिका यात्रा' का वाचन किया। उन्होंने बताया कि यह यात्रा दो दृष्टियों से महत्वपूर्ण थी—पहला, अपने देश से दूर बसे परिजनों (बेटी और भाई) से मिलना और दूसरा, वहाँ की संस्कृति को समझना। इसमें न्यूज़र्सी, न्यूयॉर्क, कैलिफोर्निया और नियाग्रा फॉल्स की यात्रा का वर्णन था, जिसके अंतर्गत अमेरिका के वातावरण, वनस्पति, स्थानीय संस्कृति और मकानों की बनावट का सुंदर ज़िक्र किया गया।

 

व्यंग्य पाठ (सुरेश उपाध्याय): अंत में सुरेश उपाध्याय ने अपने तीन व्यंग्यों—'फाइल है फाइल का क्या', 'बैसाखी नंदन के बल्ले-बल्ले' और 'चोर-चोर का शोर' का पाठ किया। ये तीनों व्यंग्य वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक स्थितियों पर चुटकी लेते हुए गहराई से सोचने पर विवश करते हैं।

 

रचनाओं पर समीक्षा एवं चर्चा

रचना पाठ के उपरांत उपस्थित साहित्यकारों ने पढ़े गए आलेखों पर बेबाक और ईमानदार चर्चा की:

प्रदीप कांत: उन्होंने कहा कि ललित निबंध अपनी अलग राह बनाने वालों से शुरू होकर भीड़ की उस भेड़चाल तक जाता है, जो कभी भी सांप्रदायिकता का रूप ले सकती है। वहीं, यात्रा वृत्तांत को अपने वास्तविक स्वरूप में लिखा जाना अभी बाकी है।

 

प्रदीप मिश्र: उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजनों में रचनात्मकता साझा की जाती है, इसलिए उन पर ईमानदारी से चर्चा ज़रूरी है। उन्होंने निबंध में अकेलेपन के संघर्ष की सराहना करते हुए लालित्य की थोड़ी कमी को रेखांकित किया। यात्रा वृत्तांत के संदर्भ में उन्होंने कहा कि बतकही के साथ-साथ इसमें शब्दचित्र बनने चाहिए थे, जिनकी अभी कमी दिखी। साथ ही उन्होंने सुरेश उपाध्याय के व्यंग्यों की पैनी धार की सराहना की।

 

अन्य वक्ता (देवेंद्र रिणवा, शिरीन भावसार, विश्वनाथ कदम, विभा दुबे और संध्या गंगराड़े): देवेंद्र रिणवा, शिरीन भावसार और विश्वनाथ कदम ने व्यंग्य तथा ललित निबंध की सराहना की, परंतु यह भी माना कि यात्रा वृत्तांत का अपने पूर्ण स्वरूप में आना अभी शेष है। विभा दुबे और संध्या गंगराड़े ने व्यंग्यों के छोटे आकार के बावजूद उनके भीतर छिपी बड़ी सामाजिक मार को रेखांकित किया।

 

मंच संचालन एवं आभार

कार्यक्रम का सफल संचालन सचिव, जनवादी लेखक संघ प्रदीप कांत ने किया तथा अंत में आभार प्रदर्शन देवेंद्र रिणवा द्वारा किया गया।

Tulsidas Jayanti: रामभक्ति शाखा के मशहूर संत कवि तुलसीदास ने जन-जन को समझाया राम नाम परमार्थ, उनके ये 5 दोहे जिंदगी संवार देंगे

तुलसीदास जयंती 2026 आज, 19 अगस्त को पूरे देश में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जा रही है। यह दिन महान संत और कवि गोस्वामी तुलसीदास की 529वीं जयंती के रूप में मनाया जा रहा है। तुलसीदास जी भगवान श्रीराम के बड़े भक्त थे। उन्होंने अपनी रचनाओं से श्रीराम के जीवन, उनके आदर्शों और भक्ति का संदेश लोगों तक पहुंचाया। उनकी आसान भाषा में लिखी रचनाएं आज भी लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय हैं। गोस्वामी तुलसीदास जयंती पर लोग मंदिरों में रामचरितमानस पाठ, हनुमान चालीसा, भजन-कीर्तन और सत्संग किए जाते हैं। इस दिन लोग तुलसीदास जी की शिक्षाओं से प्रेरणा लेते हैं और भगवान श्रीराम की भक्ति के साथ दया, अच्छे कर्म और परोपकार का महत्व समझते हैं। उनकी प्रसिद्ध रचना रामचरितमानस आज भी घर-घर में पढ़ी और सुनी जाती है।

तुलसीदास जी का जीवन

गोस्वामी तुलसीदास के पिता का नाम आत्माराम और माता का नाम हुलसी देवी बताया जाता है। जन्म के बाद उनके माता-पिता ने उन्हें छोड़ दिया था। इसके बाद एक दासी ने उनका पालन-पोषण किया, लेकिन जब तुलसीदास जी करीब पांच साल के थे, तब उस दासी का निधन हो गया और वे अनाथ हो गए। इसके बाद नरहरिदास ने उन्हें अपनाया और अपने साथ अयोध्या ले गए। नरहरिदास ने उन्हें राम मंत्र की शिक्षा दी और भगवान श्रीराम की भक्ति का मार्ग दिखाया। आगे चलकर तुलसीदास जी ने अवधी भाषा में रामचरितमानस की रचना की, जिससे रामायण की कथा आम लोगों तक आसानी से पहुंची।तुलसीदास जयंती का महत्व

तुलसीदास जयंती पंचांग के अनुसार, सप्तमी तिथि 18 अगस्त को शाम 5:50 बजे शुरू होगी और 19 अगस्त को शाम 7:19 बजे समाप्त होगी। तुलसीदास जयंती हिंदू धर्म में खास महत्व रखती है। इस दिन महान संत और कवि गोस्वामी तुलसीदास जी को याद किया जाता है। इस साल उनकी 529वीं जयंती मनाई जा रही है। तुलसीदास जी भगवान श्रीराम के बड़े भक्त थे। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध रचना रामचरितमानस के जरिए श्रीराम की कथा और उनके आदर्शों को आसान भाषा में लोगों तक पहुंचाया। उनकी रचनाओं में भक्ति के साथ अच्छे व्यवहार, सत्य, दया, न्याय और सही रास्ते पर चलने की सीख भी मिलती है।

इस दिन भक्त भगवान श्रीराम और हनुमान जी की पूजा करते हैं। कई जगहों पर रामचरितमानस और रामायण का पाठ किया जाता है। भक्त हनुमान चालीसा और सुंदरकांड का पाठ करने के साथ भजन-कीर्तन और सत्संग में भी शामिल होते हैं। पूजा के बाद प्रसाद बांटा जाता है। तुलसीदास जयंती पर जरूरतमंदों और ब्राह्मणों को भोजन, कपड़े और धन का दान करने की परंपरा भी है। कई स्थानों पर भंडारे का आयोजन किया जाता है। इस दिन तुलसीदास जी की शिक्षाओं को याद करते हुए लोगों को दया, सेवा और अच्छे कर्म करने की प्रेरणा दी जाती है।तुलसीदास जी के प्रसिद्ध दोहे-

1. तुलसी सब छल छांड़िकै, कीजै राम-सनेह।

अंतर पति सों है कहा, जिन देखी सब देह॥अर्थ: तुलसीदास जी कहते हैं कि इंसान को अपने जीवन से छल, कपट और झूठ जैसी चीजों को दूर करके भगवान श्रीराम से सच्चा प्रेम करना चाहिए। जिस तरह कोई व्यक्ति अपने मन की बात किसी से छिपा नहीं सकता, उसी तरह भगवान भी हमारे मन के विचारों और भावनाओं को जानते हैं। वे हमारे हर अच्छे-बुरे कर्म से परिचित हैं। इसलिए भगवान की भक्ति दिखावे के लिए नहीं, बल्कि साफ मन और सच्ची श्रद्धा के साथ करनी चाहिए।2. आवत हिय हरषै नहीं, नैनन नहीं सनेह।

तुलसी तहां न जाइए, कंचन बरसे मेह॥

अर्थ: तुलसीदास जी समझाते हैं कि जिस घर या स्थान पर पहुंचने पर लोगों के मन में हमारे लिए खुशी न हो और उनकी आंखों में प्रेम और अपनापन दिखाई न दे, वहां बार-बार नहीं जाना चाहिए। भले ही उस जगह से कितना भी धन, सम्मान या फायदा मिलने की उम्मीद हो, लेकिन जहां अपनापन और सम्मान न मिले, वहां रहना उचित नहीं है। रिश्तों में केवल लाभ नहीं, बल्कि प्रेम और स्नेह भी जरूरी होता है।

3. तुलसी काया खेत है, मनसा भयौ किसान।

पाप-पुन्य दोउ बीज हैं, बुवै सो लुनै निदान॥

अर्थ: तुलसीदास जी ने इंसान के जीवन को एक खेत और उसके मन को किसान के समान बताया है। जिस तरह किसान खेत में जैसा बीज बोता है, उसे आगे चलकर वैसा ही फल मिलता है, उसी तरह इंसान के कर्म भी उसके जीवन का फल तय करते हैं। अच्छे काम और पुण्य करेंगे तो अच्छे परिणाम मिलेंगे, जबकि गलत काम और पाप करने पर उसका बुरा परिणाम भी भुगतना पड़ेगा। इसलिए व्यक्ति को अपने विचारों और कर्मों पर हमेशा ध्यान देना चाहिए।

4. लोग मगन सब जोग हीं, जोग जायं बिनु छेम।

त्यों तुलसी के भावगत, राम प्रेम बिनु नेम॥

अर्थ: तुलसीदास जी कहते हैं कि लोग अपने जीवन में अलग-अलग चीजों को पाने और अपनी इच्छाओं को पूरा करने में लगे रहते हैं। लेकिन केवल किसी चीज को हासिल करना ही पर्याप्त नहीं होता, उसे संभालकर रखना भी जरूरी है। इसी तरह धार्मिक नियमों और पूजा-पाठ का पालन करना तभी सार्थक है, जब मन में भगवान श्रीराम के प्रति सच्चा प्रेम और भक्ति हो। केवल बाहरी नियमों को निभाने के बजाय मन से ईश्वर को याद करना ज्यादा महत्वपूर्ण है।

5. राम नाम अवलंब बिनु, परमारथ की आस।

बरषत वारिद-बूंद गहि, चाहत चढ़न अकास॥

अर्थ: तुलसीदास जी कहते हैं कि भगवान श्रीराम के नाम और भक्ति का सहारा लिए बिना जीवन के सबसे बड़े उद्देश्य को पाने की उम्मीद करना मुश्किल है। वे इसकी तुलना बारिश की बूंदों को पकड़कर आसमान पर चढ़ने की कोशिश से करते हैं, जो संभव नहीं है। इसका भाव यह है कि इंसान को अपने जीवन में भगवान की भक्ति, अच्छे कर्म और सही आचरण का सहारा लेना चाहिए। केवल इच्छा करने से जीवन का उद्देश्य पूरा नहीं होता, उसके लिए सही मार्ग पर चलना और ईश्वर के प्रति विश्वास रखना भी जरूरी है।