Kolkata Durga Puja 2026: कोलकाता में सजी ‘राम की अयोध्या’, 20 अक्टूबर को पहुंचेंगे रणबीर कपूर, यश और साई पल्लवी, ये है प्लान

Kolkata Durga Puja: पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के पावन पर्व का उत्साह अपने चरम पर है। रिपोर्ट्स के मुताबिक कोलकाता में इस बार का पूजा पंडाल उत्सव बेहद खास और ऐतिहासिक रंग में नजर आ रहा है। सॉल्ट लेक सांस्कृतिक संसद ने इस बार अपनी पहली थीम-बेस्ड दुर्गा पूजा का आयोजन किया है। इसकी मेन थीम ‘राम की अयोध्या’ रखी गई है। इस भव्य पंडाल में आधुनिक 3डी लाइट एनिमेशन और वीडियो प्रेजेंटेशन के जरिए भगवान श्रीराम के 14 वर्षों के वनवास और लंकापति रावण पर विजय के बाद अयोध्या वापसी के अलौकिक दृश्यों को जीवंत रूप में दर्शाया गया है। इस अनोखी थीम वाले पूजा पंडाल का औपचारिक उद्घाटन पश्चिम बंगाल के राज्यपाल रवींद्र नारायण रवि ने किया है।

3D एनिमेशन और विजुअल इफेक्ट्स से जीवंत हुई ‘राम की अयोध्या’

न्यूज एजेंसी एएनआई के मुताबिक सॉल्ट लेक सांस्कृतिक संसद द्वारा तैयार यह पंडाल सांस्कृतिक परंपराओं और अत्याधुनिक तकनीक का अनूठा संगम पेश कर रहा है। आयोजकों ने पंडाल के भीतर लेजर और 3डी लाइट एनिमेशन के जरिए रामायण के अलग अलग प्रसंगों को बेहद खूबसूरती से उकेरा है। पंडाल में एंट्री करते ही श्रद्धालुओं को त्रेतायुग की अयोध्या में होने का अहसास होता है। विजुअल इफेक्ट्स के जरिए भगवान राम के विजय के बाद अयोध्या लौटने की पौराणिक और सांस्कृतिक महत्ता को दर्शाया गया है।

20 अक्टूबर को जुटेंगे बॉलीवुड और साउथ के दिग्गज सितारे

इस भव्य आयोजन को और अधिक यादगार बनाने के लिए आयोजकों ने 20 अक्टूबर को एक विशेष कार्यक्रम की योजना बनाई है। सॉल्ट लेक सांस्कृतिक संसद के ट्रस्ट बोर्ड के अध्यक्ष ललित बेरीवाला ने जानकारी दी कि 20 अक्टूबर को आने वाली फिल्म ‘रामायण’ की पूरी स्टार कास्ट इस उत्सव में शामिल होने कोलकाता पहुंच रही है। इस खास दिन बॉलीवुड अभिनेता रणबीर कपूर, साउथ सिनेमा के सुपरस्टार यश और अभिनेत्री साई पल्लवी पंडाल में पहुंचकर पूजा-अर्चना करेंगे और उत्सव का हिस्सा बनेंगे। फिल्म ‘रामायण’ की टीम के आगमन की खबर से ही स्थानीय लोगों और प्रशंसकों में जबरदस्त उत्साह देखा जा रहा है।

44 सालों से सांस्कृतिक सेवा, 13 वर्षों से रावण दहन का आयोजन

आयोजकों ने बताया कि सॉल्ट लेक सांस्कृतिक संस्था पिछले करीब 44 सालों से विभिन्न सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़ी हुई है और पिछले 13 वर्षों से इस जगह पर भव्य दशहरा के साथ रावण दहन का आयोजन करती आ रही है। ललित बेरीवाला ने बताया कि पश्चिम बंगाल में सनातन धर्म की परंपराओं को बढ़ावा देने और लोगों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के उद्देश्य से इस बार ‘राम की अयोध्या’ थीम को चुना गया है। इस भव्य आयोजन में राज्य के वरिष्ठ नेता शुभेंदु अधिकारी भी विशेष रूप से शिरकत करेंगे। आयोजकों का दावा है कि बंगाल में पिछले 50 वर्षों के दौरान इस स्तर पर और इस भव्यता के साथ रावण दहन या दशहरे का आयोजन किसी बड़े मंच पर नहीं देखा गया है।

UP News: ‘जो भगवान श्री राम का विरोध करें…’; यूपी चुनाव से पहले अखिलेश यादव को बड़ा झटका, अभय सिंह समेत सपा के 3 विधायक BJP में शामिल

UP News: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले समाजवादी पार्टी (SP) के प्रमुख अखिलेश यादव को बड़ा झटका लगा है। बुधवार (14 अक्टूबर) को SP के तीन बागी विधायक भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल हो गए। समाजवादी पार्टी के ये तीन बागी विधायक राकेश प्रताप सिंह, अभय सिंह और विनोद चतुर्वेदी हैं। राकेश प्रताप सिंह अमेठी की गौरीगंज विधानसभा सीट का प्रतिनिधित्व करते हैं। जबकि अभय सिंह अयोध्या की गोसाईंगंज सीट का प्रतिनिधित्व करते हैं। वहीं, विनोद चतुर्वेदी जालौन की कालपी विधानसभा सीट से विधायक हैं।

इन विधायकों ने 2022 का चुनाव SP के टिकट पर जीता था। लेकिन 2024 के राज्यसभा चुनाव में BJP उम्मीदवार के पक्ष में वोट कर दिया था। यूपी के अमेठी में बुधवार (14 अक्टूबर) को BJP प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की मौजूदगी में तीनों बागी सपा विधायक राकेश प्रताप सिंह, अभय सिंह और विनोद चतुवेर्दी BJP में शामिल हुए।

कौन हैं MLA अभय सिंह?

अभय सिंह भगवान राम की नगरी अयोध्या की गोसाईगंज विधानसभा सीट से विधायक हैं। सिंह भी समाजवादी पार्टी के एक प्रमुख नेता हैं। राज्यसभा चुनाव के दौरान क्रॉस वोटिंग के बाद अभय सिंह पर कार्रवाई हुई थी। बीजेपी के पक्ष में क्रॉस वोटिंग के बाद समाजवादी पार्टी ने अभय सिंह को पार्टी से निष्कासित कर दिया था। पार्टी नेतृत्व के साथ मतभेदों और राजनीतिक बयानों के कारण उनका नाम पहले भी सुर्खियों में रहा है। औपचारिक सदस्यता से पहले भी अभय सिंह कई मौकों पर भगवा पार्टी के मंच पर दिखाई दिए थे। 2027 विधानसभा चुनाव से ठीक पहले सियासत का प्रमुख केंद्र बन चुकी अयोध्या का सियासी तापमान अब और बढ़ने की उम्मीद है।

बुधवार को गोसाईंगंज के विधायक अभय सिंह आधिकारिक तौर पर भगवा पार्टी का दामन थाम लिया। इसके बाद अब वह BJP के लिए निर्भय होकर मैदान में उतर सकेंगे। अभय सिंह ने SP के टिकट पर 2012 और 2022 में गोसाईंगंज विधानसभा सीट जीती। 2017 के विधानसभा चुनाव में वे भारतीय जनता पार्टी (BJP) के उम्मीदवार इंद्र प्रताप उर्फ खब्बू तिवारी से हार गए थे। जबकि 2022 में सिंह ने BJP उम्मीदवार आरती तिवारी को 13,079 वोटों से हराया।

‘जो श्री राम का विरोध करेगा, हम लोग उसके विरोधी हो जाएंगे’

समाजवादी पार्टी के विधायक अभय सिंह ने BJP में शामिल होने पर न्यूज एजेंसी ANI से कहा, “जो मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम का विरोध करें, जो राष्ट्र का विरोध करेंगे, हम लोग उसके विरोधी हो जाएंगे। मर्यादा पुरुषोत्तम राम के बारे में जन-जन तक हिंदी और अवधि में पहुंचाने वाले, तुलसीदास ने राम चरित मानस को लिखा। उस रामचरित मानस को जलाया जाए, फाड़ा जाए। उसके बाद इस घटना पर कोई टिप्पणी न की जाए। उसके बाद दर्शन से रोका जाए। ये सब चीजें ऐसी हैं जो उचित नहीं हैं।”

कौन हैं राकेश प्रताप सिंह?

राकेश प्रताप सिंह अमेठी के गौरीगंज से विधायक हैं। सिंह हाईस्कूल तक की पढ़ाई की हुई है। वह साल 2012, 2017 और 2022 में तीन बार विधायक चुने गए हैं। 2022 में राकेश प्रताप सिंह सपा के टिकट पर चुनाव लड़े थे। उन्होंने शानदार जीत भी दर्ज की थी। लेकिन 2024 के राज्यसभा चुनाव के बाद से राकेश प्रताप सिंह सपा को धोखा देकर अपनी पार्टी के अन्य बागी विधायकों के साथ चले गए। इसके बाद अखिलेश यादव ने साल 2025 के जून महीने में राकेश सिंह को सपा से निकाल दिया था।

विनोद चतुर्वेदी के बारे में जानें

जालौन जिले की कालपी विधानसभा सीट से विधायक विनोद चतुर्वेदी भी  BJP में शामिल हो गए हैं। उन्होंने 2022 में समाजवादी पार्टी (SP) के टिकट पर निषाद पार्टी के उम्मीदवार छोटे सिंह को 2,816 वोटों से हराकर कालपी विधानसभा सीट पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी। कालपी निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने से पहले चतुर्वेदी ने यूपी के जालौन जिले में उरई विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया था। वे 2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में इंडियन नेशनल कांग्रेस (INC) के उम्मीदवार के तौर पर उरई सीट से चुने गए थे।

अखिलेश पर बोला हमला

राकेश प्रताप सिंह ने उनके BJP में शामिल होने पर ANI से कहा, “मैं अपने क्षेत्रवासियों का धन्यवाद देता हूं जिन्होंने हमारा समर्थन किया और मुझसे अनुरोध किया कि भाजपा की सदस्यता लीजिए। उन लोगों ने मुझसे कहा कि वे मेरे साथ हैं… 98% लोग जो अपना बूथ जिताते या हराते थे, वे समाजवादी पार्टी का परित्याग करेंगे और BJP की सदस्यता लेंगे।” उन्होंने आगे कहा, “विधायक विनोद चतुर्वेदी, अभय सिंह और मैं स्वयं भाजपा में शामिल हो रहा हूं। हमारे साथ ऐसे करीब 1000 लोग जो जनप्रतिनिधि या पूर्व जनप्रतिनिधि हैं वो शामिल होंगे…लगभग 1 दर्जन विधायक मंच पर मौजूद रहेंगे।”

इसके अलावा राकेश प्रताप सिंह ने एक X पोस्ट में लिखा, “14 अक्टूबर 2026 का दिन मेरे राजनीतिक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और भावनात्मक दिन है। यह मेरे लिए केवल भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण करने का अवसर नहीं, बल्कि सनातन की रक्षा, अपनी आस्था, अपने संस्कारों और अपने सिद्धांतों के साथ एक नई राजनीतिक यात्रा प्रारंभ करने का बहुमूल्य दिन है।”

उन्होंने आगे कहा, “मैंने अपने राजनीतिक जीवन में सदैव अपनी सनातन संस्कृति, धार्मिक आस्था और सामाजिक मूल्यों को सर्वोपरि रखा है। बीते समय में समाजवादी पार्टी के भीतर सनातन धर्म, हमारी धार्मिक परंपराओं और पवित्र ग्रंथों को लेकर जिस प्रकार की टिप्पणियां और घटनाएं सामने आईं, उनसे मेरी भावनाएँ बार-बार आहत हुईं। विशेष रूप से जब मुझ जैसे सैकड़ों विधायकों एवं राजनैतिक व्यक्तियों को आराध्य मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम जी के दर्शन करने ना जाने देना, तो वह क्षण मेरे लिए अत्यंत पीड़ादायक था। उसी दिन मेरे मन में यह विचार दृढ़ हो गया था कि जिस राजनीतिक विचारधारा के साथ मेरी आस्था और मेरा अंतर्मन सहमत नहीं है, उसके साथ आगे बढ़ना मेरे लिए संभव नहीं होगा।”

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सनातन धर्म में गिरावत, विकृति की वजह

मनुस्मृति 1/91 से यह विचार भी सामने आता है कि जन्म के आधार पर किसी व्यक्ति को ऊंचा या नीचा नहीं माना जाना चाहिए। शिक्षा के अवसर सभी को मिलने चाहिए। लेकिन महाभारत के युद्ध के बाद समाज को व्यवस्थित करने वाली वर्ण व्यवस्था में बदलाव आने लगा। जो वर्ण व्यवस्था पहले योग्यता और कर्म के आधार पर निर्धारित होती थी, वह धीरे-धीरे जन्म आधारित व्यवस्था में बदलने लगी। वर्ण भी पैतृक संपत्ति की तरह पिता से पुत्र को मिलने लगा। इसी परिवर्तन ने समाज में ऊंच-नीच की भावना को बढ़ावा दिया।

द्वापर युग में महाभारत के युद्ध से पहले ही ब्राह्मणत्व का ह्रास शुरू हो गया था। ब्राह्मण अपने मूल कर्तव्यों से दूर होने लगे थे। वे गुरुकुलों को छोड़कर राजकुमारों को पढ़ाने के लिए राजमहलों और उनके घरों तक जाने लगे थे। दूसरी ओर राजाओं और राजकुमारों में उच्छृंखलता बढ़ रही थी। वे धर्म, राज्य और शासन की अपने ढंग से व्याख्या करने लगे थे। जरासंध जैसे राजा चक्रवर्ती सम्राट बनने की महत्वाकांक्षा में निर्दोष राजाओं और उनके राजवंशों को समाप्त करने के प्रयास में लगे हुए थे।

महाभारत के युद्ध के बाद केंद्रीय सत्ता के अभाव में इन प्रवृत्तियों को और बढ़ने का अवसर मिला। राजनीतिक अस्थिरता ने वैदिक धर्म के ह्रास और उसमें विकृतियां पैदा होने की परिस्थितियां बनाईं। महाभारत के युद्ध में केवल बड़ी संख्या में मनुष्यों का ही संहार नहीं हुआ, बल्कि अनेक विद्वानों और मनीषियों की मृत्यु के साथ ज्ञान-विज्ञान, कला और कौशल की परंपराओं को भी भारी क्षति पहुंची।

आपसी फूट के कारण कौरवों, पांडवों और यादवों का विनाश हुआ। लेकिन आपसी फूट का वही रोग आज भी भारतीय समाज में बना हुआ है। पता नहीं इस भयंकर रोग से कब मुक्ति मिलेगी या यह भारतीयों को सुख-शांति से वंचित कर दुख के सागर में डुबोता रहेगा। आज भी हिंदू समाज का एक बड़ा हिस्सा आपसी फूट और संघर्ष के उसी रास्ते पर चलता दिखाई देता है, जिस पर दुर्योधन चला था। लोग अपने ही समाज और देश को नुकसान पहुंचा रहे हैं।

भारतीय प्राचीन शास्त्रों के अध्येताओं के अनुसार स्वायंभुव मनु से लेकर पांडवों तक आर्यों का चक्रवर्ती राज्य रहा। इसके बाद आपसी विरोध और संघर्ष के कारण उनका पतन शुरू हुआ। दूसरे शब्दों में कहें तो इस देश को जितना नुकसान गृहकलह ने पहुंचाया, उतना शायद किसी एक अन्य कारण ने नहीं पहुंचाया।

इसका परिणाम यह हुआ कि देश का पूरा वातावरण सनातन वैदिक जीवन मूल्यों के ह्रास और उनमें विकृतियां पैदा होने का कारण बनने लगा। राजनीतिक पराजय ने केवल क्षत्रियों के पराक्रम और शक्ति को ही कमजोर नहीं किया, बल्कि भारतीय चिंतन, आत्मगौरव, अस्मिता और आत्मसम्मान की भावना को भी गहरी चोट पहुंचाई।

चारों ओर से आक्रमणों और संकटों से घिरे भारतीय इतने भयभीत और असुरक्षित महसूस करने लगे कि उन्होंने अपने धर्म और समाज की रक्षा के लिए अपने चारों ओर एक सुरक्षा कवच बनाने का प्रयास किया। उद्देश्य था कि सनातन वैदिक धर्म सुरक्षित बना रहे। यह उपाय कुछ हद तक कारगर भी हुआ, लेकिन इसका एक दूसरा परिणाम निकला। भारतीय समाज धीरे-धीरे अपने धर्म के मूल स्रोत वेदों से ही दूर होता चला गया। वेदों का नाम तो लोगों को मालूम था, लेकिन उनके ज्ञान और शिक्षाओं से उनका संबंध कमजोर पड़ता गया।

स्थिति यहां तक पहुंची कि जो ब्राह्मण वर्ग कभी वेदों को अपना सर्वस्व मानता था, वह भी वेदों और उनके वास्तविक अर्थों से अपरिचित होने लगा। दुख की बात है कि आज भी वेदों के वास्तविक ज्ञाता विद्वानों की कमी बनी हुई है। यही देश की अवनति और पतन का एक प्रमुख कारण है।

वैदिक मान्यता के अनुसार ब्राह्मण वह है जो वेदों का ज्ञाता हो, स्वार्थ से मुक्त हो, परमात्मा के तत्व को समझता हो, विशाल हृदय वाला हो और सबके कल्याण की कामना करता हो। जो भेदभाव से ऊपर उठकर समाज का मार्गदर्शन करे, वही ब्राह्मण कहलाने का अधिकारी है।

लेकिन दुर्भाग्य से विद्या और ज्ञान के आधार पर ब्राह्मण कहलाने की परंपरा धीरे-धीरे जन्म के आधार पर ब्राह्मण होने की व्यवस्था में बदल गई। कुछ लोगों ने केवल जन्म के आधार पर स्वयं को ब्राह्मण घोषित करना शुरू कर दिया। यह धारणा भी प्रचारित की गई कि ब्राह्मण के मुख से निकला वचन स्वयं भगवान का वचन है और जो ब्राह्मण से विरोध करता है, उसका नाश हो जाता है। ‘ब्रह्मवाक्यं जनार्दनः’ और ‘ब्रह्मद्रोही विनश्यति’ जैसे कथन इसी धारणा के प्रतीक हैं। इन कथनों का अपना धार्मिक संदर्भ हो सकता है, लेकिन जब इन्हें उनके मूल संदर्भ से अलग करके स्वार्थ के लिए इस्तेमाल किया गया तो इनसे समाज में अनेक बुराइयां पैदा हुईं।

इस प्रकार वैदिक ज्ञान से दूर हो चुके स्वार्थी और अशिक्षित तथाकथित ब्राह्मणों ने भारतीय समाज की सोचने-समझने की शक्ति को कमजोर किया। उन्होंने ज्ञान पर अपना अधिकार बनाए रखने का प्रयास किया और दूसरे वर्गों को शिक्षा से वंचित रखा।

इसके पीछे उनका स्वार्थ था। अशिक्षित व्यक्ति को भ्रमित करना आसान होता है। उसे अपने हित में इस्तेमाल करना भी सरल होता है। इसलिए दूसरे वर्गों को शिक्षित होने से रोकने की प्रवृत्ति बढ़ी। इसका सबसे अधिक प्रभाव क्षत्रियों पर पड़ा, क्योंकि उस समय राजसत्ता उन्हीं के हाथों में थी। धर्म और ज्ञान के क्षेत्र में मर्यादाओं का इससे बड़ा उल्लंघन क्या हो सकता था?

जिस समाज को कभी गुण, कर्म और योग्यता के आधार पर ब्राह्मणत्व प्राप्त करने वाले विद्वानों ने उन्नति के शिखर तक पहुंचाया था, उसी समाज को जन्म के आधार पर ब्राह्मण होने का दावा करने वालों ने संकट में डाल दिया।

दोनों में बुनियादी अंतर था। पहले ब्राह्मणत्व का आधार गुण, कर्म, ज्ञान और योग्यता थी। बाद में जन्म को ही उसका आधार बना दिया गया। पहले साधना और अध्ययन जरूरी थे, बाद में बिना साधना के भी जन्म के आधार पर श्रेष्ठता का दावा होने लगा।

किसी समाज को आगे बढ़ाने का मूल आधार साधना, परिश्रम और योग्यता है। लेकिन आज समाज को इस रास्ते पर आगे बढ़ने की प्रेरणा और मार्गदर्शन देने वालों की कमी दिखाई देती है।

वैदिक काल में धर्म का एक प्रमुख आधार यज्ञ था। शतपथ ब्राह्मण 1/5/1/7 में कहा गया है, ‘यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म।’ अर्थात यज्ञ श्रेष्ठतम कर्म है। यज्ञ का उद्देश्य एक ओर पर्यावरण की शुद्धि माना गया था तो दूसरी ओर वह व्यक्ति की आध्यात्मिक साधना का माध्यम भी था। लेकिन समय के साथ यज्ञ की परंपरा में भी विकृतियां पैदा होने लगीं।

वाममार्गियों ने यज्ञ में पशुबलि की प्रथा शुरू की। जबकि निरुक्त 2/11 के अनुसार यज्ञ को ‘अध्वर’ अर्थात अहिंसक कहा गया है। स्वार्थ और मांसाहार की इच्छा से प्रेरित लोगों ने वेद मंत्रों की अपने अनुकूल व्याख्या की। उन्होंने पशुबलि ही नहीं, बल्कि गौबलि और नरबलि जैसी प्रथाओं को भी धार्मिक कर्मकांड का हिस्सा बना दिया।

वैदिक ग्रंथों में गाय को ‘अघ्न्या’ कहा गया है। अर्थात जिसे मारा नहीं जाना चाहिए। ऋग्वेद 10/87/16 का उल्लेख करते हुए लेखक पशुबलि, गौबलि और नरबलि के निषेध की बात करता है।

यः पौरुषेयेण क्रविषा समङ्क्ते यो अश्वेन पशुना यातुधानः।

यो अघ्न्याया भरति क्षीरमग्ने तेषां शीर्षाणि हरसापि वृश्च।

समाज में शिक्षा और वैदिक ज्ञान की कमी के कारण लोगों को भ्रमित करना आसान हो गया था। इसका लाभ उन पुरोहितों ने उठाया जो अपनी इच्छाओं और स्वार्थ के अनुसार धार्मिक कर्मकांडों की व्याख्या करने लगे थे।

इस तरह यज्ञ जैसी धार्मिक और आध्यात्मिक परंपरा पशुबलि जैसी प्रथाओं से विकृत होने लगी। पशुहिंसा को यज्ञ का आवश्यक हिस्सा बताने वाले लोग आज तक यह सिद्ध नहीं कर पाए कि किसी जीव की बलि देकर उसे स्वर्ग पहुंचाया जा सकता है। वे न तो अपने प्रियजनों को मारकर स्वर्ग भेज सके और न ही यज्ञ की वेदी पर किसी मृत व्यक्ति को फिर जीवित कर सके।

इससे लेखक यह निष्कर्ष निकालता है कि पशुबलि का औचित्य सिद्ध करने वाले विधान स्वार्थी पुरोहितों ने अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए बनाए थे।

महर्षि दयानंद सरस्वती ने भी यज्ञ में पशुबलि और पशुहत्या का पूरी तरह निषेध किया था। उनके अनुसार अश्वमेध, गोमेध और नरमेध का अर्थ घोड़े, गाय या मनुष्य की बलि देना नहीं है। उनकी व्याख्या में राष्ट्र की उन्नति और अभिवृद्धि के लिए किए जाने वाले कार्य अश्वमेध हैं। अन्न की अभिवृद्धि से जुड़े कार्य गोमेध हैं और मनुष्य का अंतिम संस्कार नरमेध है। लेकिन वैदिक ज्ञान से दूर होते जाने के कारण समय के साथ यज्ञ की मूल भावना विकृत होती गई।

महर्षि दयानंद की तरह गौतम बुद्ध ने भी सामाजिक और धार्मिक कुरीतियों का विरोध किया। उन्होंने यज्ञ में पशुबलि और हिंसा की प्रथाओं को स्वीकार नहीं किया। जब पशुबलि को वेदों के अनुकूल बताया गया तो गौतम बुद्ध वेदों की प्रामाणिकता स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हुए।

वैदिक धर्म की एक प्रमुख विशेषता एकेश्वरवाद रही है। वेदों में एक परमेश्वर की महिमा का वर्णन मिलता है। ऋग्वेद 1/164/46 के अनुसार इंद्र, मित्र, वरुण आदि उसी एक प्रकाशस्वरूप परमात्मा के नाम हैं। इसी मंत्र में कहा गया है कि सत्य एक है, लेकिन विद्वान उसे अनेक नामों से पुकारते हैं।

‘एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति।’

ऋग्वेद 10/114/5 में भी इसी विचार को व्यक्त किया गया है।

‘एकं सन्तं बहुधा कल्पयन्ति।’

अर्थात एक ही तत्व की अनेक रूपों में कल्पना की जाती है। कठोपनिषद में भी एक परमात्मा के अनेक रूपों में प्रकट होने का विचार मिलता है।

‘एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति।’

आचार्य यास्क ने भी इस विचार का समर्थन किया। उनके अनुसार एक ही देवता अपने ऐश्वर्य और गुणों के कारण अनेक रूपों में स्तुति का विषय बनता है।

‘महाभाग्याद् देवताया एक आत्मा बहुधा स्तूयते।’ निरुक्त 7/4

इसी प्रकार शतपथ ब्राह्मण 14/7/2/22 में कहा गया है।

मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति।

मनसैवानुद्रष्टव्यमेतदप्रमेयं ध्रुवम्।

इसका आशय है कि जो परम सत्य को अनेक अलग-अलग रूपों में देखता है, वह जन्म-मृत्यु के चक्र में पड़ा रहता है। परम तत्व को मन और आत्मज्ञान से समझना चाहिए, क्योंकि वह अत्यंत सूक्ष्म और स्थायी है।

इस प्रकार वैदिक ग्रंथों में ईश्वर की अवधारणा स्पष्ट रूप से प्रस्तुत की गई है। लेकिन समय के साथ यह धारणा मजबूत होती गई कि देवता एक नहीं, बल्कि अनेक हैं। इस विचार को बढ़ावा देने में वेदों की कर्मकांड आधारित व्याख्याओं की भी भूमिका रही। अलग-अलग देवताओं की स्तुति और उनके अलग नामों के कारण यह धारणा बनने लगी कि सभी देवता स्वतंत्र और अलग-अलग अस्तित्व रखते हैं।

आचार्य यास्क जैसे विद्वानों ने भी कुछ सीमा तक देवताओं के अलग-अलग स्वरूपों की व्याख्या स्वीकार की थी। लेकिन धीरे-धीरे विभिन्न देवताओं के स्वतंत्र व्यक्तित्व, चरित्र और धार्मिक परंपराएं विकसित होने लगीं। इससे वैदिक धर्म की एकेश्वरवाद की मूल भावना कमजोर हुई। इसका प्रभाव हिंदू समाज की एकता पर भी पड़ा।

जो समाज पहले एक परमात्मा की अवधारणा से जुड़ा हुआ था, उसमें अलग-अलग देवताओं और आस्थाओं के आधार पर समुदाय बनने लगे। विभिन्न समूहों के अपने-अपने आराध्य और धार्मिक केंद्र हो गए। परिणामस्वरूप समाज अनेक संप्रदायों में बंटता चला गया।

वैदिक ग्रंथों के अनुसार प्राचीन समाज में व्यक्ति का वर्ण उसके गुण और कर्म के आधार पर निर्धारित होता था। ‘वर्ण’ शब्द की उत्पत्ति ‘वृ’ धातु से हुई है, जिसका अर्थ वरण करना या चुनना है। इसका आशय यह है कि वर्ण जन्म से अपने आप प्राप्त नहीं होता था, बल्कि व्यक्ति को अपनी योग्यता और कर्म के आधार पर उसे प्राप्त करना पड़ता था।

वर्ण कोई पैतृक संपत्ति नहीं थी जो पिता से पुत्र को विरासत में मिल जाए। उसे विद्या की तरह अध्ययन, परिश्रम और साधना से प्राप्त करना होता था। जैसे किसी योग्य और विद्वान पिता का पुत्र केवल जन्म लेने से पिता की विद्या और योग्यता प्राप्त नहीं कर सकता, उसे स्वयं अध्ययन और परिश्रम करना पड़ता है। उसी प्रकार वर्ण की योग्यता भी व्यक्ति को स्वयं अर्जित करनी होती थी।

यह एक न्यायसंगत व्यवस्था थी, क्योंकि इसमें जन्म के बजाय व्यक्ति की योग्यता और कर्म को महत्व दिया गया था।

मनुस्मृति में वर्णों के लिए बताए गए कर्म भी इसी विचार की पुष्टि करते हैं। मनुस्मृति के पहले अध्याय में चारों वर्णों के कार्यों का वर्णन मिलता है। मनुस्मृति 1/88 के अनुसार ब्राह्मण का प्रमुख कार्य अध्ययन और अध्यापन करना, यज्ञ करना और कराना तथा पूरे समाज को अच्छे मार्ग पर चलने की प्रेरणा देना था। समाज के कल्याण की चिंता करना भी उसका कर्तव्य था।

मनुस्मृति 1/89 के अनुसार क्षत्रिय का कार्य अध्ययन करने के साथ देश की बाहरी और आंतरिक शत्रुओं से रक्षा करना तथा राज्य में शांति और व्यवस्था बनाए रखना था।

मनुस्मृति 1/90 के अनुसार वैश्य का कार्य अध्ययन के अलावा पशुपालन, कृषि, व्यापार, उद्योग और दूसरे आर्थिक कार्यों के माध्यम से संपत्ति अर्जित करना था।

शूद्र का कार्य अन्य तीन वर्णों की सेवा, सहायता और श्रम से जुड़े काम करना माना गया था।

मनुस्मृति 1/91 से यह विचार भी सामने आता है कि जन्म के आधार पर किसी व्यक्ति को ऊंचा या नीचा नहीं माना जाना चाहिए। शिक्षा के अवसर सभी को मिलने चाहिए। वेदों का ज्ञान और विद्या पूरे समाज के लिए उपलब्ध होने चाहिए। लेकिन महाभारत के युद्ध के बाद समाज को व्यवस्थित करने वाली वर्ण व्यवस्था में बदलाव आने लगा।

जो वर्ण व्यवस्था पहले योग्यता और कर्म के आधार पर निर्धारित होती थी, वह धीरे-धीरे जन्म आधारित व्यवस्था में बदलने लगी। अब व्यक्ति का वर्ण उसके गुण, कर्म और विद्या से तय होने के बजाय परिवार और जन्म से निर्धारित होने लगा। वर्ण भी पैतृक संपत्ति की तरह पिता से पुत्र को मिलने लगा।

इस परिवर्तन ने समाज में ऊंच-नीच की भावना को बढ़ावा दिया। जन्म के आधार पर श्रेष्ठता और हीनता की धारणाएं मजबूत होने लगीं। गौतम धर्मसूत्र जैसे ग्रंथों के अध्ययन से पता चलता है कि बाद के समय में शूद्रों को समाज में निम्न स्थान दिया जाने लगा था।

गौतम धर्मसूत्र 1/1 के अनुसार उन्हें वेद पढ़ने और यज्ञ करने के अधिकार से वंचित रखा गया। कई स्मृति और सूत्र ग्रंथों में शूद्रों के उपनयन संस्कार का विधान भी नहीं मिलता।

उस समय उपनयन संस्कार शिक्षा प्राप्त करने की एक महत्वपूर्ण शर्त माना जाता था। इसलिए उपनयन के अधिकार से वंचित होने का अर्थ शिक्षा के अवसरों से भी वंचित होना था। वर्णों के आधार पर दंड व्यवस्था में भी भेदभाव होने लगा। एक जैसा अपराध करने पर अलग-अलग वर्णों के लोगों को अलग-अलग दंड दिए जाते थे।

इस प्रकार समय के साथ न समाज में सभी वर्णों की स्थिति समान रही और न ही उनके लिए कानून और दंड की व्यवस्था समान रही। जो वर्ण व्यवस्था मूल रूप से समाज के संगठन, विभिन्न कार्यों के संचालन और सभी के विकास के उद्देश्य से बनाई गई थी, वह धीरे-धीरे ऊंच-नीच और जन्म आधारित भेदभाव की व्यवस्था में बदल गई। यही सनातन वैदिक धर्म में ह्रास और विकृति का एक बड़ा कारण बना।

युवा आंदोलन और सत्ता का दायित्व !

छात्रों को राजनीति में सक्रिय रूप से भाग लेना चाहिए। फिर वो चाहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य हों, किसी समाजवादी आन्दोलन के सदस्य हों, किसी वामपंथी आन्दोलन के सदस्य हों या किसी गांधीवादी आन्दोलन के सदस्य हों या नए जन्में सीजेपी के समर्थक ही क्यों हों। जो भी हो उन्हें इस प्रक्रिया से बहुत कुछ सीखने को मिलता है।

एक बार फिर से देश में युवाओं ने सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा दी है। यह कोई नई बात नहीं है, जब-जब छात्र राजनैतिक व्यवस्था के विरूद्ध सड़क पर उतरते हैं, तब-तब ये सवाल उठता है कि क्या छात्रों को राजनीति करनी चाहिए? इस सवाल के उत्तर अपनी-अपनी दृष्टि से हर समुदाय देता है। जो राजनैतिक दल सत्ता में होते हैं, वे छात्र आन्दोलन की भर्त्सना करते हैं। उसे हतोत्साहित करते हैं और जब छात्र काबू में नहीं आते, तो उनका दमन भी करते हैं। फिर वो चाहे अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ स्वतंत्रता आन्दोलन में कूंदने वाले छात्र हों या 70 के दशक में गुजरात के नवनिर्माण आन्दोलन से शुरू होकर जयप्रकाश नारायण के संपूर्णं क्रांति के आव्हान पर कूंदने वाले छात्र हों, जिन्होने इंदिरा गांधी की सत्ता पलट दी थी या फिर अन्ना हजारे के आन्दोलन में कूंदने वाले छात्र हों। लेकिन देश में कॉक्रोच जनता पार्टी के पिछले आंदोलन और देश भर में चल रहे ताज़ा आंदोलन ने इस सवाल को दोबारा जगा दिया है युवा और सरकार के आंदोलन का हल कैसे निकले?

रोचक बात ये है कि जो दल सत्ता में आकर छात्रों का दमन करते हैं, वही दल जब विपक्ष में होते हैं, तो छात्र आन्दोलनों को हवा देकर ही अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकते हैं। इसमें कोई दल अपवाद नहीं हैं। अगर शिक्षा संस्थानों और अभिभावकों की दृष्टि से देखा जाऐ, तो भी दो मत हैं। जो संस्थान या अभिभावक चाहते हैं कि उनके निर्देशन में युवा केवल पढ़ाई पर ध्यान दें, डिग्री हासिल करें और नौकरी करे, वे नहीं चाहते कि उनके छात्र किसी भी तरह की राजनीति में हिस्सा ले।

मगर एक दूसरा वर्ग उन शिक्षकों और अभिभावकों का है, जो अपने छात्रों में पूर्णं विश्वास रखते हैं और जानते हैं कि चाहे वे छात्र राजनीति में कितना ही हिस्सा क्यों न लें, उन्हें अपने भविष्य को लेकर पूरी स्पष्टता है। इसलिए वे पढ़ाई की कीमत पर आन्दोलन नहीं करेंगे। ऐसे संस्थान और अभिभावक छात्रों को रचनात्मक राजनीति करने से नहीं रोकते।

अगर निष्पक्ष मूल्यांकन करें, तो हम पाऐंगे कि जो छात्र केवल पढ़ाई पर ध्यान देते हैं और रट्टू तोते की तरह इम्तेहान पास करते जाते हैं, उनके व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विकास नहीं होता। प्रायः ऐसे नौजवानों में समाजिक सारोकार भी नहीं होते। उनका व्यक्तित्व एकांगी हो जाता है और जीवन के संघर्षों में वे उतनी मजबूती से नहीं खड़े हो पाते, जितना कि वे छात्र खड़े होते हैं, जिन्होंने शिक्षा के साथ सामाजिक सरोकार को बनाऐ रखा हो। जो छात्र विज्ञान, शोध या तकनीकी के क्षेत्र में जाते हैं, उनकी बात दूसरी है। उनका ध्यान अपने विषय पर ही केंद्रित रहता है और वे अपने संपूर्णं अंगों को कछुऐ की तरह समेटकर एक ही दिशा में लगातार काम करते जाते हैं।

अपने जीवन में मैंने भी अलग-अलग तरह माहौल में अनुभव प्राप्त किये हैं। जब तक मैं कॉलेज में पढ़तो था, तो मेरा व्यक्तित्व दो धुरियों में बटां था। मेरे पिता जो एक बड़े शिक्षाविद् थे, उनके विचार यही थे कि मैं पढ़ू और नौकरी करूं। जबकि मेरी मां जो कि संस्कृत की विद्वान थी और मथुरा के रमणरेती वाले महाराज श्रद्धेय गुरू शरणनानंद जी की लखनऊ विश्विद्यालय की सहपाठी थीं, वे छात्र जीवन से ही गांधीवादी विचारधारा और सामाजिक सरोकारों को लेकर बहुत सक्रिय रहीं थीं। उनका ही प्रभाव मुझ पर ज्यादा पड़ा और 18 वर्ष की आयु में एक स्वयंसेवक के रूप में पिछड़े गाँवों में सेवा कार्य करने घर छोड़कर चला गया।

1974 के उस दौर में मैंने गाँव की गरीबी और बदहाली में जीवन के अनूठे अनुभव प्राप्त किये। उसका ही परिणाम है कि आजतक मैं धन कमाने की दौड़ में न पड़कर समाज, राष्ट्र या सनातन धर्म के विषयों पर अपनी ऊर्जा पूरी निष्ठा से लगाता रहा हूं। अगर इसे अपने मुंह मियाँ मिट्ठू न माना जाऐ, तो देश में जो लोग मुझे जानते हैं, वो ये भी जानते हैं कि मैंने प्रभु कृपा भारत में कई बार इतिहास रचा है। ये निर्भीकता और समाज के प्रति समर्पण का ये भाव इसीलिए आया क्योंकि मैंने पढ़ाई के साथ समाज का भी अध्ययन जारी रखा। अन्यथा मैं आज किसी तंत्र की नौकरी में जीवन बिताकर खाली बैठा होता। जैसा आईसीएस रहे जेसी माथुर ने सेवानिवृत्त होने के बाद एक सुप्रसिद्ध बौद्धिक पत्रिका ‘दिनमान’ में एक श्रृंखला लिखी थी। जिसका मूल था कि ‘मैं आईसीएस में रहते हुए, एक मशीन का पुर्जा था, जिसका न दिल था, न दिमाग था’।

कल का आईसीएस ही आज का आईएएस है। पिछले 40 वर्षों में मैं सैंकड़ों आईएएस अधिकारियों से संपर्क रहा है और मैं दावे से कह सकता हूं कि, वही आईएसएस अधिकारी जीवन में कुछ ठोस और रचनात्मक कार्य कर पाते हैं, जो अपनी नौकरी के मायाजाल के बाहर, समाज से जुड़कर सहज जीवन जीते हैं और अपनी संवेदनशीलता को मरने नहीं देते। बाकी तो पूरी जिंदगी अच्छी पोस्टिंग और प्रमोशन के चक्कर में ही काट देते हैं। इसके कुछ अपवाद हो सकते हैं। पर आमतौर पर यही अनुभव रहा है।

इसलिए मैं इस बात का समर्थक हूं कि छात्रों को राजनीति में सक्रिय रूप से भाग लेना चाहिए। फिर वो चाहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य हों, किसी समाजवादी आन्दोलन के सदस्य हों, किसी वामपंथी आन्दोलन के सदस्य हों या किसी गांधीवादी आन्दोलन के सदस्य हों या नए जन्में सीजेपी के समर्थक ही क्यों हों। जो भी हो उन्हें इस प्रक्रिया से बहुत कुछ सीखने को मिलता है। प्रांतीय और केंद्र सरकार का ये दायित्व है कि वे छात्र राजनीति पर तब तक अंकुश न लगायें, जब तक कि वह हिंसात्मक या विध्वंसात्मक न हो। ऐसी छात्र राजनीति समाज की घुटन को ‘सेफ्टी वाल्व’ के रूप में बाहर निकालती है और ये राज सत्ता के हित में ही होता है। इसलिए जब कभी देश का युवा सड़कों पर उतरे तो उसे गंभीरता से लिया जाए न कि दमनकारी रवैये से।

एक आश्रम में हुई घटना का विश्लेषण

प्रेमानंद महाराज के शिष्यों का माधुकरी माँगना भी सोशल मीडिया का ग्लैमर बन गया। पिछले कुछ वर्षों में प्रेमानंद महाराज की लोकप्रियता को बढ़ाने और उनकी मार्केटिंग करने के जितने प्रयास हुए वैसा ब्रज में पहले कभी नहीं देखा गया। यह ब्रज की भक्ति परंपरा के अनुकूल नहीं था। परिणामतः केलि कुंज की आलोचनाएं भी होने लगी।

वृंदावन के संत प्रेमानंद महाराज के आश्रम में हुई घटना दुर्भाग्यपूर्ण है। एक नौजवान भक्त की ऐसी रहस्यमय मृत्यु समाज और पुलिस के लिए चुनौतीपूर्ण है। इसकी जाँच हो रही है। पर इससे ज़्यादा चिंता की बात यह है कि कुछ सनातन धर्म विरोधी लोग इस दुर्घटना के लिए प्रेमानंद महाराज को ज़िम्मेदार ठहराकर उनपर कीचड़ उछाल रहे हैं। इस विषय में जो बात मैं आगे कहने जा रहा हूँ वो ऐसे आलोचकों को मेरा निष्पक्ष जवाब है। पर इसके साथ ही मैं उन बातों को भी यहाँ रखूँगा जिनको लेकर प्रेमानंद महाराज के चाहने वालों में भी लंबे समय से मंथन चल रहा है।

भक्तों को लगता है कि महाराज अपने चेलों के जाल में उलझ गए हैं। वे चेले जो महाराज की तपस्या को सोशल मीडिया पर वायरल करवाने की धुन में ब्रज के रसिक संतों की रहनी और आचरण को भूल बैठे हैं। आरोप है कि ऐसे चेले संपत्ति बनाने, कालोनियाँ बनाने और अपने-अपने साम्राज्य स्थापित करने में जुटे हैं।

प्रेमानंद महाराज एक लंबे अरसे से वृंदावन में रहकर तपस्वी का जीवन जी रहे थे। वे भीषण गर्मी के दिनों में भी घंटों यमुना जी की तपती रेत में पड़े रहकर भजन किया करते थे। प्रायः वे वृन्दावन की कँटीली झाड़ियों के बीच बैठ कर भी भजन करते थे। उन्होंने बरसों तक न भला खाया, न भला पहना। हम वृंदावनवासी जानते हैं कि वे वृन्दावन की गलियों में भिक्षा माँगकर रोटी खाते थे। 7-8 बरस पहले तक उनका नाम भी कोई नहीं जानता था। उनके दैन्य और तपस्या की प्रशंसा हर ब्रजवासी करता आया है। वे भी ब्रजवासियों के प्रति भारी श्रद्धा का भाव रखते हैं।

अब से कुछ वर्ष पहले तक यमुना किनारे एक बगीची में, अपने चंद शिष्यों के बीच वे प्रवचन किया करते थे। धीरे-धीरे उनके प्रवचन की लोकप्रियता बढ़ने लगी। देखते ही देखते लगभग हजार भक्त हर प्रातः उनका प्रवचन सुनने आने लगे। उस दौर में मैं भी प्रायः उनका प्रवचन सुनने उस बगीची में जाता था। धीरे-धीरे इस भीड़ में ऐसे युवाओं की संख्या बढ़ने लगी जो आईआईटी – आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से पढ़ कर देश विदेश में अपनी लाखों की नौकरी छोड़ कर आ गए और प्रेमानंद महाराज के शिष्य बन कर पीली चादर ओढ़ ली।

इन्हीं शिष्यों में कुछ ऐसे शिष्य भी थे जिन्होंने महाराज के प्रति अपने गहरे प्रेम को प्रदर्शित करने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लेना शुरू किया। पूरी दुनिया में उन्हें इतना प्रचारित कर दिया कि विराट कोहली से लेकर तमाम जानी-मानी हस्तियां  उनके दर्शन को आने लगी। महाराज की मार्केटिंग इस कदर की गई कि उनके दर्शन के लिए आधी रात से हज़ारों की भीड़ जमा होने लगी। इस भीड़ के कारण वृंदावन की यातायात व्यवस्था भी बाधित हुई। महाराज जब रात में सड़क पर पैदल निकलते तो हज़ारों लोग उनके दर्शन को खड़े रहते।

फिर तो वहाँ पैसे की वर्षा होने लगी। अब संपत्तियां खरीदने व बड़े-बड़े आश्रम बनाने की होड़ लग गई। यमुना की खादर में अवैध रूप से कॉलोनी बनाने के आरोप भी इन्हीं शिष्यों पर लगे। महाराज के दर्शन के लिए एडवांस टोकन मिलने लगे और भारी तामझाम का एक सुनियोजित आडंबर रच दिया गया।

इतना ही नहीं प्रेमानंद महाराज के कुछ वर्ष पहले ही बने शिष्य भी अब सोशल मीडिया पर अपनी मार्केटिंग करवाने लगे। किसी को शिव का स्वरूप बताया जाने लगा तो किसी को ब्रह्म ऋषि। सैंकड़ों सालों से ब्रज के संत घर-घर रोटी माँग कर प्रसाद पाते थे। इसे माधुकरी कहते हैं। ब्रज में ये संतों का सामान्य शिष्टाचार है।

पर किसी ने भी कभी इसे प्रचारित कर सेलिब्रिटी बनने की कोशिश नहीं की। प्रेमानंद महाराज के शिष्यों का माधुकरी माँगना भी सोशल मीडिया का ग्लैमर बन गया। पिछले कुछ वर्षों में प्रेमानंद महाराज की लोकप्रियता को बढ़ाने और उनकी मार्केटिंग करने के जितने प्रयास हुए वैसा ब्रज में पहले कभी नहीं देखा गया। यह ब्रज की भक्ति परंपरा के अनुकूल नहीं था। परिणामतः केलि कुंज की आलोचनाएं भी होने लगी। इसी सबके बीच महाराज के शिष्यों में सत्ता और संपत्ति को लेकर गुटबाजी और झगड़े शुरू हो गए।

इस सब से विचलित हो कर प्रेमानंद महाराज वृंदावन के अपने नए बने आश्रमों को छोड़ कर यमुना के उस पार बेल वन में चले गए। वहाँ जो बृजवासी गांव वाले रहते हैं वे परेशान हैं क्योंकि रात भर महाराज के दर्शनार्थी आते हैं। ब्रजवासी बच्चे घर से निकल जाए तो भीड़ में खो जाते हैं। सारे रास्ते जाम हो जाते हैं। अब वहाँ भी चेलों द्वारा कालोनियां बनाने का खेल चालू हो गया है। महाराज के प्रति श्रद्धा रखने वाले हम जैसे लाखों भक्त हैं। उनके शिष्य रसिक दुलारी शरण की मृत्यु से उस श्रद्धा में कोई कमी नहीं आई है। पर इतना अवश्य है कि अब समय आ गया है कि जब प्रेमानंद महाराज शिष्यों के बनाये इस आडंबर के जाल से निकल कर अपने मूल स्वरूप में लौट आएँ।

जहाँ तक रसिक दुलारी शरण की मृत्यु का प्रश्न है तो सच्चाई तो पुलिस जांच के बाद ही सामने आएगी। पर इतना अवश्य है कि युवा साधकों के बीच ऐसी दुर्घटना होना कोई नई बात नहीं है। साधना की प्रारंभिक अवस्था में अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण न रख पाने के कारण कई युवा साधक अपने लिंग को हानि पहुँचा देते हैं। ये उनकी नासमझी या उत्साह के अतिरेक में उठाया गया एक मूर्खतापूर्ण कदम होता है। इन्द्रियों पर नियंत्रण, मन पर नियंत्रण होने के बाद होता है। अगर मन वास्तव में भगवत भक्ति में रम जाए तो हमारी सभी इंद्रियाँ स्वयं ही शांत हो जाती हैं।

इस तरह के जबरन किए गए प्रयासों से इन्द्रियों पर नियंत्रण नहीं होता ये हर साधक को जानना चाहिए। इस घटना का जो भी परिणाम हो इससे प्रेमानंद महाराज की प्रतिष्ठा में कोई आंच नहीं आएगी। पर उनके इर्द-गिर्द जमा शिष्यों को इससे सबक लेकर आत्मवालोकन करना चाहिए।

भारत में सच्चे संतों की कमी नहीं!

आज देश में सनातन धर्म के नाम पर शोर मचाने वाले ऐसे हज़ारों धर्मध्वजी, आत्मघोषित ‘संत’ गुरु, कथावाचक आदि सोशल मीडिया और समाज में छा गए हैं, जिनका आचरण दूर-दूर तक संतों जैसा नहीं है। रंगमंच के कलाकारों के जैसे रंगबिरंगे चमकीले-भड़कीले डिज़ाइनर वस्त्र पहन कर सरकारी सुरक्षाकर्मियों के साये में विशाल पंडालों में श्रोताओं के सम्मुख स्वयं को किसी राजाधिराज की तरह प्रस्तुत करना आम हो गया है। इसलिए कहावत है, ‘पानी पीजिए छान कर, गुरु कीजिए जान कर।’

बाबा नीब करौरी के जीवन के पूर्वार्ध पर बनी फ़िल्म ‘हनुमान अंश’ ने देश-विदेश के सनातनधर्मियों के हृदय को स्पर्श किया है। पिछले हफ़्ते जब थिएटर में मैं ये फ़िल्म देख रहा था तो अपनी भावनाओं को रोक नहीं पाया और आँखे कई बार छलछला गईं। कारण ये कि नीब करौरी बाबा का तो नहीं पर उन जैसे कुछ संतों का सानिध्य पिछले 28 वर्षों में मुझे निरंतर प्राप्त हुआ है। इन संतों की सहजता, दरिद्र नारायण के प्रति करुणा और अमीर-ग़रीब के बीच कोई फ़र्क़ न करने की प्रवृत्ति ने मुझे बहुत प्रभावित किया।

1998 में जब बरसाना के विरक्त संत श्री रमेश बाबा से मिला तो वे मानगढ़ की पहाड़ी पर एक खण्डहर-नुमा कमरे में रहते थे। जिसमें जून की गर्म दोपहरी में आती गर्म हवा के थपेड़ों को रोकने के लिए खिड़कियों पर फटी बोरियों को भिगो कर टांगा हुआ था। जब बाबा ने मुझे ब्रज की सांस्कृतिक धरोहरों को सजाने संवारने का आदेश दिया तो उन्होंने यह भी कहा कि, “भगवान दीनबंधु दीनानाथ हैं, धनीबंधु वीआईपीनाथ नहीं। पहले फ़क़ीर बनो, तब ब्रज की सेवा करना।”

बाबा के सानिध्य में 2002-05 के बीच मैंने भी ऐसा जीवन जीने का प्रयास किया। बोरी बिछा कर सोना, भिक्षा माँग कर रोटी खाना और बेहद साधारण कपड़े पहनना। पर इतना ही काफ़ी नहीं था। अपने स्वभाव में दीनता लाने का भी अभ्यास करना था। इस तरह बाबा ने अनेक प्रकार से ब्रज सेवा के लिए प्रशिक्षित किया। उनके प्रताप से जो कुछ ब्रज में धरोहरों के जीर्णोद्धार के कार्य हुए वो जग-जाहिर हैं।

इसी तरह बरसाना की पीली पोखर पर रहने वाले विरक्त संत विनोद बाबा भी हैं। जिनके तप, सादगी, करुणा और हृदय की विशालता को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। मेरी मित्र मीरा बोरवाँकर जो महाराष्ट्र की चर्चित पुलिस अधिकारी रही और जिसके जीवन पर बॉलीवुड की फ़िल्म ‘मर्दानी’ बनी, वो श्री विनोद बाबा के दर्शन को तैयार नहीं थी। पर मैं उसे ले गया। बाबा को देखते ही वो ऐसी स्तब्ध हुई कि वहाँ उनके सामने घंटों बैठने की इच्छा व्यक्त करने लगी। ‘हनुमान अंश’ के अनेक प्रसंग ऐसे हैं जैसे मैंने उपरोक्त दोनों संतों के जीवन में प्रत्यक्ष अनुभव किए हैं। ‘संत हृदय नवनीत समाना’। जिस तरह बादल रात में चुपचाप किसान के खेत पर बिना बताए वर्षा करके चले जाते हैं, वैसे ही संत भी हमारे जीवन में अपनी कृपा की वृष्टि अनायास ही करते रहते हैं। गोवर्धन के सियाराम बाबा, वृंदावन के कृपाविलास वाले महाराज, पिछले कुछ वर्षों में प्रेमानंद जी महाराज और केरल की संत माता अमृतानंदमयी ‘अम्मा’ के सानिध्य में मुझे ऐसे ही अनेक अनुभव हुए हैं। इन सभी संतों ने मुझ पर अपना वात्सल्य खूब उड़ेला है। इसीलिए ‘हनुमान अंश’ फ़िल्म देखते समय मुझे बार-बार ऐसे प्रसंग याद आ रहे थे और आँसूँ थम नहीं रहे थे।

सच्चे संत हमारी पात्रता को नहीं देखते, वे तो अहैतुकि कृपा करते हैं। नीब करौरी बाबा का जीवन भी ऐसा ही था।  उन्होंने आडंबर और वैभव रहित सादगी भरा जीवन आम जनमानस के लिए समर्पित किया था। उनके क्रियाकलाप ये सिद्ध करने के लिए काफ़ी हैं कि संत को आपके पद, धन, रुतबे और हैसियत से कुछ लेना-देना नहीं होता। दुर्भाग्य की बात यह है कि आज देश में सनातन धर्म के नाम पर शोर मचाने वाले ऐसे हज़ारों धर्मध्वजी, आत्मघोषित ‘संत’ गुरु, कथावाचक आदि सोशल मीडिया और समाज में छा गए हैं, जिनका आचरण दूर-दूर तक संतों जैसा नहीं है।

रंगमंच के कलाकारों के जैसे रंगबिरंगे चमकीले-भड़कीले डिज़ाइनर वस्त्र पहन कर सरकारी सुरक्षाकर्मियों के साये में विशाल पंडालों में श्रोताओं के सम्मुख स्वयं को किसी राजाधिराज की तरह प्रस्तुत करना आम हो गया है। मोह-माया त्यागने का उपदेश देना और स्वयं वैभव युक्त जीवन जीना, सत्ताधीशों के आगे-पीछे मंडराना या उनके सानिध्य में गर्वित होना, अपने ही संसाधनों से मीडिया में स्वयं को ‘परम श्रद्धेय गुरुदेव’ जैसे अलंकारों से प्रचारित करवाना और खुलेआम धर्म का व्यापार करना इनके लिए आम बात है। आम जनता अपने जीवन के कष्टों से मुक्ति पाने के लिए धर्म की शरण लेती है। पर उन्हें मिलता है ‘ऊँची दुकान और फीका पकवान’।

पिछले तीस वर्षों में मैंने इस कॉलम में कई बार लिखा है कि जिसके सम्मुख बैठ कर आपकी भौतिक कामनाएँ समाप्त हो जाएँ और आध्यात्मिक जिज्ञासा का वेग प्रबल हो जाए, वही सच्चा संत है। बाक़ी तो सब धार्मिक मनोरंजन हैं। हमें भगवान या सच्चे संत से कुछ कह कर माँगना नहीं होता। नीब करौरी बाबा की तरह वे स्वयं ही जान लेते हैं कि हमें क्या चाहिए या हमारा भला किसमें है। भगवान श्री कृष्ण भगवद्गीता के 18वें अध्याय के 61वें श्लोक में कहते हैं कि, ‘ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥’ अर्थात् हे अर्जुन! ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में निवास करते हैं। तो उनसे कुछ बोल कर मांगने की क्या ज़रूरत है?

देश के कोने-कोने में ऐसे सच्चे संतों की कमी नहीं है जो हमें तत्वज्ञान भी करा सकते हैं और हमारी व्यग्रता को भी शांत कर सकते हैं। ऐसे संतों को हमसे धन या संसाधन पाने की अपेक्षा नहीं होती। उन्हें जबरन शिष्य बनाने की इच्छा भी नहीं होती। ऐसे संत तो हमारे लाख बार नाक रगड़ने के बाद भी हमारी पात्रता को देख कर अपना शिष्य स्वीकार करते हैं। आजकल तो देश में थोक में शिष्य बनाने का व्यापार चल रहा है। ‘जैसा गुरु वैसा चेला, दोनों मिलकर ठेलमठेला’। लगभग 500 वर्ष पूर्व महाप्रभु वल्लभाचार्य जी ब्रज चौरासी कोस यात्रा के दौरान एक जंगल में पड़े विशालकाय अजगर को देख कर ठिठक गए। उस अजगर को हज़ारों चींटियां खा रही थीं। वो दर्द से छटपटा रहा था। महाप्रभु ने वहीं ठहर कर श्रीमद् भगवद् के 108 पाठ करने के निर्णय किया। उनके अचंभित शिष्यों ने इसका कारण पूछा। महाप्रभु ने कहा कि ये अजगर पिछले जन्म में आत्मघोषित गुरु था। इसने हज़ारों लोगों को दीक्षा देकर अपना शिष्य बनाया। पर न तो वो अपना उद्धार कर सका और न ही अपने हज़ारों शिष्यों का। वही शिष्य इस जन्म में ये हज़ारों चींटियाँ बन कर उसका शरीर खा रही हैं। इसलिए कहावत है, ‘पानी पीजिए छान कर, गुरु कीजिए जान कर।’

हे राम! मोदी-शाह ने लोकतंत्र का सब तो खा लिया!

यों रामजी को भी क्या याद करें! आखिर खुद रामजी को भी मोदी-शाह ने कम बेच नहीं खाया। उनके मंदिर तक को चोरों का अड्डा बनाया। रामजी भी सोचते होंगे इन दो इंसानों के अहंकार, भूख के नाश के लिए वे क्या अवतार धरें! या अभी इंतजार करें कि इनका और क्या-क्या खाना बाकी है? किस मर्यादा को इन्होने बख्शा है। मंदिर हो, सनातन धर्म की सत्यता, नैतिकता, चरित्र, मर्यादाओं को राक्षसों जैसे तहस-नहस किया है। लोकतंत्र, संसद, सरकार, जांच एजेंसियां, मीडिया, विश्वविद्यालयों, राज्यपाल, नौकरशाही, न्यायपालिका, लोकजीवन—सभी की ऐसी-तैसी की है। और पिछले दस महीनों से मां भारती की संतानों, इंसानों, नागरिकों, उनके वोटों को भी खा जा रहे हैं। ऐसा तो रावण राज में भी नहीं था। ज्ञात इतिहास के किसी भी लोकतंत्र में नहीं था।

लोकतंत्र यानी मनुष्य व्यवस्था आखिर है क्या? यदि मनुष्य (नागरिक) को यह भी मालूम न हो, भरोसा न रहे कि देश विशेष में पैदा हुआ वह नेचुरली नागरिक, मतदाता है या नहीं तो वह क्या व्यवस्था हुई? बतौर मतदाता देश की सूची में वह नेचुरली है भी? और नहीं है तो क्यों, किसने काटा? किसके आदेश से वापस जुड़ता है या नहीं जुड़ता तो आखिर कैसी तो यह व्यवस्था है या लोकतंत्र है?

मगर मोदी-शाह ने अंधभक्तों की ऐसी फौज बनाई है जो मानती-सोचती है कि रावण जो करता था वही हिंदू राष्ट्र की राजनीति है, शासन का राजधर्म है।

तभी 1950 से अपनाए गए गणतंत्र का सब खा जाना है। कौम-नस्ल व सभ्यता का राक्षसी छप्पन भोग बनाना है।

सोचें, जून 2025 से तीस राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की मतदाता ड्राफ्ट सूची से तेरह करोड़ से अधिक नाम बाहर हुए हैं। अभियान इस सही दलील से शुरू हुआ कि लिस्ट से मृत, स्थानांतरित, डुप्लीकेट आदि नाम हटने चाहिए। पर इसकी आड़ में प्रक्रिया क्या हुई? और प्रक्रिया का कर्ता कौन था? स्वाभाविक है भारत का चुनाव आयोग। चुनाव आयोग के कर्ता हैं तीन समान अधिकारों वाले चुनाव आयुक्त। कानून में दो टूक उल्लेखित है कि तीनों सदस्य अपनी बैठक में विचार करेंगे। यदि तीनों में किसी बात पर सर्वानुमति हुई तब प्रक्रिया, नियम बनेगा और उस अनुसार काम आगे बढ़ेगा।

बतौर मिसाल नए मतदाता के Form 6 का सत्य है। इसे तीन सदस्यीय चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार (यानी एक सदस्य) ने अकेले की मनमानी में लागू किया। इसे लेकर मई में चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने बाकायदा फाइल पर लिखा कि नियमों में बदलाव किए बिना Form 6 इस तरह नहीं बदला जा सकता। संधू सहमत हुए। यानी तीन सदस्यीय आयोग में दो की राय सामने थी। फिर भी ECINet पर नया declaration आ गया। जुलाई में मामला सार्वजनिक हुआ। 13 अगस्त को संधू ने फाइल पर इसे “unauthorised and illegal” बताया और तुरंत हटाने को कहा ताकि young और first-time voters परेशान न हों। फिर भी Form ऑनलाइन मौजूद था। इस तरह मनमाने काम होने का चौदह दफा का रिकॉर्ड, आपत्तियां आज जगजाहिर है। हां, ज्ञानेश कुमार के साथी बाकी दोनों चुनाव आयुक्त—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने दस महीनों में कम-से-कम चौदह बार लिखित आपत्ति दर्ज की है। मां भारती की जमीन पर जन्म लेने वाले मनुष्यों, लोगों, नेचुरल नागरिकों के नाम कटने, जुड़ने यानी जिंदा या मृत की लिस्ट के मामलों में। मतलब ये मसले कि किसका नाम मतदाता सूची में जुड़े, किसका कटे, नए मतदाता का Form 6 कैसा हो और भारत की पूरी मतदाता सूची के डिजिटल डेटाबेस को कौन नियंत्रित करे!

सोचें, मोदी-शाह के इस रावणी डिजिटल इंडिया पर। चुनाव आयोग वर्षों से कहता आया है कि मतदाता सूची स्थानीय स्तर पर वैधानिक Electoral Registration Officer यानी ERO बनाता और नियंत्रित करता है। मगर दोनों चुनाव आयुक्तों ने ECINet के जरिए electoral-roll database के “gradual centralisation” पर आपत्ति की। उनका सवाल था कि दिल्ली का आईटी सिस्टम जमीन पर कानून से अधिकार पाए ERO की शक्तियां क्यों सीमित कर रहा है? चिंता इतनी गंभीर हुई कि दोनों चुनाव आयुक्त देश के कैबिनेट सचिव तक पहुंचे।

लेकिन भारत राष्ट्र के कैबिनेट सचिव की भी औकात नहीं है जो वह सोचे, अपनी आत्मा को जगाए या कोई पूछताछ करें या जवाब दें।

नतीजतन आज क्या तस्वीर है? भारत के एक अरब मतदाताओं के मालिक नरेंद्र मोदी-अमित शाह है।

संघ परिवार: किस का पैरोकार?

आरएसएस

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अमेरिका में कहा: “यदि कोई हिन्दू सोचे, कि भारत में कोई मुस्लिम नहीं रहना चाहिए, तो वह हिन्दू नहीं है। यदि आप अपने को हिन्दू कहना चाहते हैं, तो आप को विश्वास होना चाहिए कि सभी रास्ते एक ही लक्ष्य की ओर जाते हैं।” पूछना चाहिए: यदि वे इतना अभेद मानते हैं, तो उन के शिष्य ने ‘कांग्रेस मुक्त भारत‘ का नारा किसलिए दिया? भाजपा और कांग्रेस दोनों का तो लक्ष्य ही नहीं, रास्ता, देश, समाज सब कुछ एक है।

आरएसएस नेता ने अमेरिका में कहा: “यदि कोई हिन्दू सोचे, कि भारत में कोई मुस्लिम नहीं रहना चाहिए, तो वह हिन्दू नहीं है। यदि आप अपने को हिन्दू कहना चाहते हैं, तो आप को विश्वास होना चाहिए कि सभी रास्ते एक ही लक्ष्य की ओर जाते हैं।”

पूछना चाहिए: यदि वे इतना अभेद मानते हैं, तो उन के शिष्य ने ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का नारा किसलिए दिया? भाजपा और कांग्रेस दोनों का तो लक्ष्य ही नहीं, रास्ता, देश, समाज सब कुछ एक है।

जब आप इस्लाम व हिन्दू धर्म का लक्ष्य एक मानते हैं; तब आरएसएस एवं कांग्रेस तो सहोदर जैसे हैं — एक ही हिन्दू समाज के जाए! तब इस से इतना द्वेष क्यों? एक ओर, विजातीय, नृशंस, साम्राज्यवादी मतवाद को सनातन धर्म के समान उद्देश्यधारी बता रहे! जबकि घर में ऐसी घृणा कि एक राष्ट्रीय दल को मिटा देने की घोषणा। यह दोहरी मति क्या दर्शाती है?

यह भी पूछें: जब आप ने “हिन्दुओं का ठेका नहीं ले रखा” — तब क्या मुसलमानों का ठेका ले लिया, जो उन्हें अतिरिक्त बल पहुँचा कर हिन्दुओं पर चोट करते रहते हैं? इस्लामियों की पैरोकारी करते हैं जिन्हें ताकत, समझ, और नजर की कमी नहीं!

पर सब से ऊपर यह प्रश्न:  किस हिन्दू ने कहा कि ‘भारत में मुसलमान नहीं रहना चाहिए’? यदि उत्तर न मिले, तो यह अनुचित आरोप था। उस से हिन्दुओं की घोर बदनामी हुई। पूरी दुनिया में हुई!

आखिर संघ नेता के मुँह से — जो खुद हिन्दू हैं और इतने महत्वपूर्ण जिन के पैर भारत का प्रधानमंत्री छूता है — यह आरोप कि हिन्दू सोचते हैं कि भारत में मुसलमान न रहे, हिन्दुओं को फासिस्ट, असहिष्णु, साबित करने के सिवा और क्या था? अखिल विश्व को संदेश गया कि भारत में मुसलमान पीड़ित, वंचित हैं! क्या यही सच है?

सच तो उलटा है। यहाँ मुस्लिम नेता ही सदैव धमकी देते और दंगे करते रहे हैं। यह पंडित नेहरू और डॉ. अंबेडकर ने भी कहा था कि दंगे करना मुस्लिम राजनीति का औजार है। जिस पर तब जिन्ना से लेकर आज के ओवैसी जूनियर तक घमंड भी दिखाते रहे हैं। पश्चिमी पंजाब, सिंध, और कश्मीर से हिन्दुओं को मुस्लिमों ने मार भगाया। शेष भारत के लिए भी वही मकसद है, जिस की झलक असम, बंगाल में मिलती रहती है।

पर संघ नेता ने उलटा ही संदेश दुनिया को दिया! उन का बयान हिन्दुओं पर एक क्रूर चोट है। यहाँ हजार साल से हिन्दू ही इस्लामियों से पीड़ित होता रहा है। तब उसी को उत्पीड़क कहना? आज यदि भारत में न्याय होता तो संघ नेता को कठघरे में खड़ा कर हिसाब लेता। पर अफसोस! अंग्रेजों के जाते ही यहाँ सामुदायिक न्याय उठ गया।

फलत: आज भी भारत के अनेक इलाकों में हिन्दू ही असुरक्षित जीवन झेलते हैं। उस जिहाद से सशंकित जिस का घोषित मकसद दुनिया को गैर-मुस्लिमों (काफिरों) से खाली कराना है। इस क्रम में गत आठ दशकों में ही एक तिहाई से अधिक भारत हिन्दुओं से खाली करा चुका है!

संघ नेता यह सब जानते हैं।  क्या उन्होंने कभी कश्मीर में संघ की रैली की है? क्या आज भी कर सकते हैं? जबकि मुसलमान भारत के किसी भी शहर में रैली कर सकते हैं। सो, जिस ने कश्मीर को हिन्दुओं से खाली करा लिया उस पर कुछ कहने के बजाए उन्होंने आक्रामक को ही पीड़ित बता दिया!

वह भी, जब इस्लामी नेता, संगठन अपनी टेक दुहराते रहते हैं। जो उन के संस्थापक की बुनियादी टेक थी। यह मुहम्मद के शब्द थे: ‘‘तुम सुरक्षित रहोगे, अगर इस्लाम कबूल कर लो। यह पूरी दुनिया अल्लाह की और मेरी है।’’ (सहीह बुखारी, 4:53:392)। उसी टेक पर तब से इस्लाम का अभियान बढ़ता गया है।

आज भी मुस्लिम नेता मुहम्मद की बातों को अपना कानून मानते व लागू करते हैं। जो लाहौर, ढाका, श्रीनगर, पहलगाम, आदि में लागू किया। आज संघ-भाजपा राज में भी देश में अनेक गाँव, मुहल्ले हिन्दुओं से खाली हो रहे हैं। संघ के अपने अखबार में भी उस की रिपोर्टें, फोटो समेत छपती रही हैं।

वही इस्लाम का लक्ष्य है। उसी पर बढ़ते, लड़ते उस के लड़ाके जान लेते और देते हैं। उसी टेक पर कि मूर्तिपूजकों, क्रिश्चियनों, नास्तिकों, आदि को सब को इस्लाम कबूल करना होगा। सीधे-सीधे नहीं, तो ‘जेरे खंजर’ (अल्लामा इकबाल)।

क्या हिन्दू धर्म का भी वही लक्ष्य है, जो संघ नेता ने कहा?

तमाम मुहम्मदी दस्तों, खलीफाओं, मौलानाओं, सुल्तानों, लीडरों ने जब जहाँ जितना जोर चला, गैर-मुस्लिमों को यही विकल्प दिया था:  इस्लाम या मौत! यह दुनिया भर की तारीख में दर्ज है। वह जगह-जगह अभी भी हो रहा है — जिस समय संघ के नेता उलटे बयान देकर हिन्दुओं को बदनाम कर रहे हैं।

यह कितना बड़ा धर्म-द्रोह, सत्य-द्रोह, देश-द्रोह है — इसे ठंडे दिमाग से परखना चाहिए। जिस समय जम्मू-कश्मीर, मुर्शिदाबाद, मराड, कैराना, उदयपुर, पहलगाम, आदि अनेक जगहों में हिन्दू भगाए और कत्ल किए जा रहे हैं, और जिस पर संघ-भाजपा चुप रहते हैं — उसी समय ये मुस्लिमों को भारत में उत्पीड़ित जैसे होने का सर्टिफिकेट दे रहे हैं!

इस का लाभ उठाते हुए स्थानीय जिहादी जहाँ-तहाँ हिन्दू बस्तियाँ खाली करा लेंगे। जिस का पहले तो समाचार दबाया जाएगा। यदि किसी ने छाप भी दिया, तब कहा जाएगा: ‘आखिर मुसलमान कितना बर्दाश्त करेंगे, प्रतिक्रिया होगी ही’! यानी, भारत में मुसलमानों की हिंसा ‘उत्पीड़ित का प्रतिरोध’ है।

इस झूठी दलील को बल पहुँचाना वह धर्म-द्रोह है जो भारत के हिन्दू नेता अपने ही समाज के विरुद्ध करते रहे हैं। गाँधी, नेहरू से लेकर वाजपेई, भागवत तक ने अपने-अपने तरीके यह किया है — उत्पीड़क जिहाद को ढाल दे देना, और उत्पीड़ित हिन्दू की ही भर्त्सना।

यही करके हिन्दू नेता अपनी मतिहीनता, अज्ञान, और  अटपटापन छिपाते रहे हैं। ताकि उन की आरामपसंद राजनीति चलती रहे। ऊपर से महात्मा, उदार, मानवतावादी, चमत्कारी होने का सेहरा भी मिले।

यदि इस अन्याय को कोई कठघरे में खड़ा नहीं करता, तो यह लुप्त नहीं हो जाता! अनेक देसी-विदेशी इतिहासकार इसे दर्ज करते रहे हैं। जिस का कभी खंडन नहीं हुआ, क्योंकि किया ही नहीं जा सकता। केवल मौन के षड्यंत्र से उसे दबाने की कोशिश रही है।

केवल 1947 से अब तक हुई हिंसा में मुसलमानों की तुलना में नौ गुना हिन्दू मारे गए हैं। सामूहिक विस्थापन के आँकड़े भी वही कहते हैं। पाकिस्तान -बंगलादेश से उत्पीड़न के मारे हिन्दू लाखों में भारत आते रहे, जबकि उसी कारण भारत से पाकिस्तान जाने वाले मुस्लिम कोई न थे!

सो, मुस्लिम राजनीति की स्थाई विशेषता रही है: आरोप लगाना, शिकायत करना, माँगें रखना, कोसना, और दंगे करना। हिन्दू राजनीति की स्थाई विशेषता: मान लेना, छूट देना, खुशामद करना, भीरुता, आत्म-निन्दा, और आत्म-समर्पण। इसी क्रम में भारत तोड़ एक अलग इस्लामी ‘पाक’ देश भी बन गया।

उन्हीं विशेषताओं का लाभ उठाकर मुस्लिम नेता बची ‘नापाक’ जमीन भी पाक बनाने की योजना में लगे हुए हैं। क्योंकि बचे भारत में भी किसी शासक ने आज तक हिन्दुओं से नहीं पूछाः कि ‘‘क्या हमारे राज में तुम सुरक्षित महसूस करते हो?’’

यह विगत अस्सी सालों से भारत का सब से उपेक्षित सवाल है। इसीलिए यहाँ नन्दीमर्ग, मराड, गोधरा, कैराना, शाहीन बाग जैसी घटनाएं अनवरत दुहराती हुई हैं। हिन्दुओं पर उत्पीड़न से किसी राजनीतिक हानि का भय नहीं। उन्हें हिन्दू नेता भी बेधड़क चोट पहुँचाते हैं।

इस प्रकार, हिन्दू समाज दरअसल नेतृत्वविहीन है! उस के कथित नेता भ्रामक या निजी स्वार्थ की दुनिया में रहते हैं।  इस्लामियों की सेवा, उन से शाबासी पाने, अपने को महात्मा और दैवी बताने की झक पालते हैं। हिन्दुओं से ही वोट, धन और शक्ति हासिल करते हैं, फिर उन्हीं पर चोट करते हैं। यह कितनी मूढ़ता, और कितना विश्वासघात है — इस का हिसाब इतिहास करेगा।

जब वोट लेना हो तब संघ परिवार हिन्दुओं पर एकाधिकार जताता है। यह प्रचार कि दूसरे दलों को वोट देने वाला हिन्दू ‘प्रॉब्लम’ है। वैसे हिन्दू को सोशल मीडिया पर गालियाँ दी जाती हैं। जिसे उन का आईटी सेल प्रेरित करता है। किन्तु जब हिन्दुओं पर संकट आए, तब ‘हमने हिन्दुओं का ठेका नहीं ले रखा’ कह कर पल्ला झाड़ लेना। यह विश्वासघात नहीं तो क्या है?

पर यही वर्तमान युग की हिन्दू राजनीति है। गाँधीजी से आज तक बार-बार देखी जाती:  सज्जन पर चढ़ना और दुर्जन से बचना। अज्ञानी, अहंकारी, आरामपसंद राजनीति। जिसे ज्ञान, न्याय, या कर्तव्य से अधिक कुर्सी से लगाव है। जिस समुदाय में निरंतर ऐसे ही नेता रहें, उस का भविष्य भाग्य-भरोसे ही है।

क्या RSS पर बैन लगाएंगे ट्रम्प:अमेरिका के धार्मिक कमीशन ने क्यों की ये सिफारिश; मोहन भागवत के अमेरिकी दौरे पर हंगामा बढ़ा

संघ प्रमुख मोहन भागवत अमेरिका के दौरे पर हैं। इस बीच वहां मांग उठ रही हैं- RSS पर बैन लगे। यह मांग अमेरिकी सरकार का धार्मिक स्वतंत्रता आयोग USCIRF के चेयरमैन डॉ. आसिफ महमूद और कमिश्नर जीन मिल्स ने की है। मार्च में इसी आयोग ने अपनी सालाना रिपोर्ट में भी RSS पर प्रतिबंध की सिफारिश की थी। इस मांग का आधार क्या है, RSS पर क्या आरोप लगाए गए हैं और क्या ट्रम्प RSS पर बैन लगाएंगे; इसी पर आज का एक्सप्लेनर… सवाल-1: अमेरिका में RSS पर पाबंदी को लेकर कौन सवाल उठा रहा है? जवाब: मोहन भागवत 25 अगस्त से 19 दिन के विदेश दौरे पर हैं। पहला पड़ाव अमेरिका है, फिर कनाडा और ब्रिटेन। RSS पर प्रतिबंधों को लेकर तीन प्रमुख लोगों ने बयान दिए हैं- 19 अगस्त को USCIRF के कमिश्नर जीन मिल्स ने कहा, ‘RSS नेता भले ही भारतीय सरकार से जुड़े हों, लेकिन उन्हें अमेरिका में हाई-लेवल मीटिंग्स और डिप्लोमेसी में तरजीह नहीं दी जानी चाहिए। अमेरिकी सरकार को धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन के दोषी पाए गए RSS सदस्यों पर बैन लगाना चाहिए।’ USCIRF के चेयरमैन डॉ. आसिफ महमूद ने भी कहा, ‘भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी RSS के सदस्य हैं। ये एक ऐसा भारतीय संगठन है, जिससे जुड़े समूहों ने ईसाई और मुस्लिम समेत धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमले किए हैं। अब RSS नेता मोहन भागवत अमेरिका आ रहे हैं।’ कमीशन की पूर्व चेयरपर्सन नादिन मेंजा ने भी अमेरिकी मैगजीन ‘प्रोविडेंस’ में लिखा, ‘भागवत जिस एकता और सद्भाव की बात करते हैं, वह संघ की जमीनी हरकतों से बिल्कुल अलग है। संघ के रवैये के लिए उसे बैन किया जाना चाहिए।’ सवाल-2: तो फिर इन बयानों का आधार क्या है और इसके पीछे की दलील क्या है? जवाब: RSS पर पाबंदी की बात मार्च 2026 से शुरू हुई। अमेरिका के धार्मिक स्वतंत्रता आयोग ने अपनी सालाना रिपोर्ट जारी की। इसमें भारत से जुड़े 2 पन्ने हैं। इनमें 23 घटनाओं का जिक्र है- इन 10 प्रमुख घटनाओं के अलावा 13 और घटनाओं का जिक्र है, जिसमें 28 में से 12 राज्यों में धर्मांतरण विरोधी कानूनों, रेवरेंड फ्रैंकलिन ग्राहम का वीजा रद्द करने और गौ संरक्षण के नाम पर हत्या करने जैसी घटनाएं शामिल हैं। इन घटनाओं में USCIRF ने विश्व हिंदू परिषद (VHP), भारतीय जनता पार्टी (BJP) या उसकी सरकारों, हिंदू राष्ट्रवादी नेता और संगठन का जिक्र किया है, लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का सिर्फ एक जगह जिक्र है। वो भी Targeted Sanctions, यानी प्रतिबंध लगाने की सिफारिश के सेक्शन में। USCIRF का कहना है कि RSS की संपत्तियां जब्त कर लेनी चाहिए और उसके सदस्यों के अमेरिका आने पर रोक या वीजा रद्द कर देना चाहिए। सवाल-3: RSS पर बैन की मांग करने वाला ये USCIRF आखिर है क्या?
जवाब: USCIRF की शुरुआत 3 दशक पहले हुई… आयोग बनने की कहानी आयोग का स्ट्रक्चर USCIRF में संसद के जरिए नियुक्त 9 कमिश्नर होते हैं, जो दोनों पार्टियों से होते हैं। एक कमिश्नर को चेयरमैन बनाया जाता है। फिलहाल पाकिस्तानी मूल के डॉ. आसिफ महमूद इसके चेयरमैन हैं। आयोग का काम आयोग की ताकत आयोग अपनी सालाना रिपोर्ट अमेरिकी विदेश मंत्रालय को सौंपता जरूर है, लेकिन खुद कोई कार्रवाई नहीं कर सकता, सिर्फ सिफारिशें देता है। सवाल-4: क्या वाकई अमेरिका में RSS पर बैन लग सकता है?
जवाबः नहीं, फिलहाल ऐसा नहीं लगता। इसकी 4 बड़ी वजहें हैं… सवाल-5: पाबंदी की इस मांग पर भारत सरकार और RSS का क्या रुख है?
जवाबः भारत के विदेश मंत्रालय ने USCIRF को पूर्वाग्रह से ग्रसित और जीरो भरोसे वाली संस्था बताया है। मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने 21 अगस्त को कहा, ‘USCIRF सालों से भारत के खिलाफ भ्रामक, गलत और भड़काऊ बयान देती रही है। हमें ऐसी संस्थाओं को नजरअंदाज करना चाहिए, क्योंकि ये अपने छिपे हुए एजेंडे के तहत काम करती हैं और इनकी कोई विश्वसनीयता नहीं बची है।’ वहीं RSS ने फिलहाल इस पर कोई बात नहीं कही है। हालांकि 24 अगस्त को VHP के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल ने सोशल मीडिया ‘X’ पर लिखा, ‘USCIRF के मन में सनातन धर्म, हिंदू समाज और भारत के प्रति गहरी नफरत है। हाल में RSS के प्रति जो नफरत दिखाई है, वह हिंदूफोबिया से प्रेरित उसके जाने-पहचाने एजेंडे का एक हिस्सा है।’ मार्च में भारत के पूर्व जजों और अधिकारियों ने एक बयान जारी कर USCIRF रिपोर्ट को दिमागी तौर पर दिवालिया और स्वार्थी बताया था। 275 अफसरों ने इस बयान पर दस्तखत किए थे, जिसमें 25 रिटायर्ड जज, 10 राजदूतों समेत 119 रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट्स और 131 आर्म्ड फोर्सेस के अधिकारी थे। सवाल-6: USCIRF पर क्यों उठ रहे हैं सवाल, पाकिस्तान से क्या है कनेक्शन?
जवाबः USCIRF के मौजूदा चेयरमैन डॉ. आसिफ महमूद पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी हैं। वे पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के गुजरात जिले के खारियान गांव में जन्मे। उन्होंने कराची के सिंध मेडिकल कॉलेज से मेडिकल डिग्री ली, फिर 1990 के दशक के आखिर में अमेरिका चले गए। अमेरिका के कैलिफोर्निया में महमूद प्रैक्टिस करने लगे। बाद में अमेरिका की नागरिकता मिल गई। उन्होंने डेमोक्रेटिक पार्टी से राजनीति भी की है। 2008 से 2016 तक डेमोक्रेटिक नेशनल कन्वेंशन में डेलिगेट रहे। 2022 में कैलिफोर्निया से अमेरिकी कांग्रेस के लिए चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए। फिर 2024 में डेमोक्रेटिक हाउस माइनॉरिटी लीडर हाकीम जेफ्रीज ने उन्हें USCIRF में नियुक्त हुए। जुलाई 2026 में चेयरमैन चुने गए। 2019 में जब भारत सरकार ने आर्टिकल 370 हटाया, तब महमूद ने जम्मू-कश्मीर में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों की जांच के लिए अमेरिकी संसदीय सुनवाई कराने के लिए लॉबिंग की थी। महमूद ने कहा था, ‘कश्मीरी अकेले नहीं हैं। हम तब तक उनके साथ खड़े रहेंगे, जब तक कि उन सभी के मानवाधिकार सुरक्षित नहीं हो जाते।’ महमूद पर सवाल उठते रहे हैं- ——————————–
ये भी पढ़ें- ‘मोहन भागवत का कार्यक्रम सिर्फ हिंदुओं के लिए नहीं’: आयोजक बोले- 16 धर्मों के लोग आएंगे, विरोध करने वाले भी आएं HSS के ग्लोबल कोऑर्डिनेटर सौमित्र गोखले ने 2019 में अमेरिका के ह्यूस्टन में हाऊडी मोदी कार्यक्रम करवाया था, जिसमें 50 हजार लोग जमा हुए थे। इस बार चीफ गेस्ट RSS प्रमुख मोहन भागवत हैं। कई संगठन उनका विरोध कर रहे हैं। दैनिक भास्कर ने अमेरिकन हिंदूज फॉर एंगेंजमेंट एंड डायलॉग के डायरेक्टर सुदेश अग्रवाल और प्रवक्ता प्रिया सामंत से बात की। पढ़िए पूरी बातचीत…

Aja Ekadashi 2026 Date: भादों की पहली एकादशी होगी अजा एकादशी, इस दिन बन रहे दुर्लभ संयोग में पूजा और व्रत का मिलेगा राजसुख

Aja Ekadashi 2026 Date: हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष स्थान है। यह व्रत हर हिंदू माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने से सभी कष्टों का निवारण होता है। ऐसा ही एक व्रत है अजा एकादशी का भी। यह व्रत भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को किया जाता है। यह भादों माह की पहली एकादशी होती है। यह भगवान विष्णु को समर्पित एक अत्यंत पवित्र व्रत है। सनातन धर्म में इस एकादशी का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। आइए जानें इस साल ये व्रत कब किया जाएगा, किस दुर्लभ योग में पूजा और व्रत करने से मिलेगा राजसुख और इसका महत्व क्या है?

अजा एकादशी 2026 तारीख

भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 6 सितंबर को शाम 07:29 बजे शुरू होगी और 7 सितंबर को शाम 5 बजकर 3 मिनट तक रहेगी। उदयातिथि के आधार पर अजा एकादशी का व्रत 7 सितंबर दिन सोमवार को रखा जाएगा। इस व्रत का पारण 8 सितंबर मंगलवार को सुबह में 6 बजकर 2 मिनट से सुबह 8 बजकर 33 मिनट के बीच कर सकते हैं।

सर्वार्थ सिद्धि योग में अजा एकादशी

इस बार की अजा एकादशी पर सर्वार्थ सिद्धि योग शाम को 06 बजकर 14 मिनट पर बनेगा और यह अगले दिन 8 सितंबर को सुबह 06 बजकर 02 मिनट तक रहेगा। व्रत वाले दिन प्रात:काल से लेकर सुबह 06:41 ए एम तक व्यतीपात योग है, उसके बाद से वरीयान् योग बनेगा, जो 8 सितंबर को तड़के 03:38 ए एम तक है, फिर परिघ योग होगा।

अजा एकादशी 2026 मुहूर्त

यदि आपको अजा एकादशी का व्रत रखना है तो पूजा का मुहूर्त सुबह में 06:02 ए एम से 07:36 ए एम तक है, उसके बाद सुबह में 09:10 ए एम से 10:45 ए एम तक है। इस समय में आप भगवान विष्णु की पूजा कर सकते हैं। उस दिन ब्रह्म मुहूर्त 04:31 ए एम से 05:16 ए एम तक है, वहीं अभिजीत मुहूर्त दिन में 11:54 ए एम से दोपहर 12:44 पी एम तक है।

अजा एकादशी महत्व

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र ने अपने खोए हुए राज्य, परिवार और सम्मान को वापस पाने के लिए महर्षि गौतम के सुझाव पर अजा एकादशी का व्रत किया था। इस व्रत के प्रभाव से उन्हें उनका सब कुछ पुनः प्राप्त हो गया था। माना जाता है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से अजा एकादशी का व्रत रखता है और भगवान विष्णु की पूजा करता है, उसके समस्त पाप और पूर्व जन्म के बुरे कर्म नष्ट हो जाते हैं। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, इस दिन विधि-विधान से पूजा और व्रत करने से अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल की प्राप्ति होती है।

पूजा विधि

  • एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लें।
  • भगवान विष्णु के ऋषिकेश स्वरूप की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर उन्हें पीले फूल, तुलसी दल, फल, धूप और दीप अर्पित करें।
  • अजा एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें और अंत में भगवान विष्णु की आरती करें।
  • इस दिन गरीबों या जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र या तिल का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
  • द्वादशी तिथि को शुभ मुहूर्त में व्रत का पारण किया जाता है।