नीदरलैंड के प्रधानमंत्री रॉब जेटेन 2027 में पिता बनेंगे। उन्होंने सोमवार को सोशल मीडिया पर इसकी घोषणा की। जेटेन के पार्टनर निकोलस कीनन अर्जेंटीना के हॉकी खिलाड़ी हैं। जेटेन और उनके पार्टनर कीनन ने अपनी खुशी जाहिर करते हुए लिखा, हमारी जिंदगी में एक बहुत खास मेहमान आने वाला है। नन्हे बच्चे, 2027 में तुमसे मुलाकात होगी। डच मीडिया के मुताबिक बच्चे के जन्म के लिए सरोगेसी की मदद ली गई है। उनकी दो महिला दोस्तों ने इस प्रक्रिया में मदद की। एक ने अंडाणु दान किया, जबकि दूसरी बच्चे को जन्म देंगी। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जेटेन ऐसे पहले डच प्रधानमंत्री होंगे, जिनके कार्यकाल में उनके बच्चे का जन्म होगा। टिकटॉक वीडियो से शुरू हुई कहानी, सुपरमार्केट में मिले साल 2021 में, जेटन और उनके एक साथी डच नेता के बीच का एक ब्रोमांस वाला ट्रेडिंग वीडियो टिकटॉक पर बहुत वायरल हुआ था। इसमें दोनों नेता एक दूसरे के साथ मस्ती करते, हंसते और डांस करते दिखे थे। वीडियो वायरल होने के बाद रॉब जेटन युवाओं के बीच मशहूर हो गए। साल 2022 में कीनन ने एक सुपरमार्केट में जेटेन को देखा और उन्हें वायरल वीडियो की वजह से पहचान गए। इस दौरान दोनों की बातचीत शुरू हुई। कीनन ने बाद में एक इंटरव्यू में बताया था कि जेटेन ने उन्हें इंस्टाग्राम पर मैसेज भेजकर बातचीत शुरू की थी। शुरुआत में दोनों का रिश्ता निजी रहा लेकिन अगस्त 2023 में दोनों ने अपने रिश्ते को सार्वजनिक कर दिया। नवंबर 2024 में दोनों ने सगाई की घोषणा की। दोनों की शादी जून 2026 में होनी थी, लेकिन जेटेन के प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने इसे कुछ समय के लिए टाल दिया है। नीदरलैंड समलैंगिक विवाह को मान्यता देने वाला पहला देश नीदरलैंड दुनिया का पहला देश था, जिसने 2001 में समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता दी। जेटेन देश के पहले खुले तौर पर समलैंगिक प्रधानमंत्री हैं। हालांकि, वे दुनिया के पहले समलैंगिक प्रधानमंत्री नहीं हैं। उनसे पहले भी दूसरे देशों में खुले तौर पर समलैंगिक नेता सरकार के प्रमुख रह चुके हैं। सिर्फ 39 साल की उम्र में प्रधानमंत्री बने जेटेन दुनिया के 8 समलैंगिक प्रधानमंत्री 1. योहाना सिगुर्दार्दोतिर – आइसलैंड (2009–2013): वे दुनिया की पहली खुले तौर पर समलैंगिक सरकार प्रमुख बनीं। वे लेस्बियन थीं। उनकी 1970 में शादी हुई थी। उनके 2 बच्चे भी हुए। 1985 में वह एक महिला पत्रकार के करीब आईं। इसके 2 साल बाद उन्होंने तलाक ले लिया। जून 2010 में समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता मिलने पर दोनों ने शादी कर ली। 2. एलियो दी रूपो – बेल्जियम (2011–2014): वे बेल्जियम ही नहीं दुनिया के पहले खुले तौर पर गे प्रधानमंत्री बने। 1996 में उप-प्रधानमंत्री रहने के दौरान उन पर 16 साल के बच्चे के साथ संबंध बनाने का आरोप लगा था। तब पहली बार उनकी पहचान उजागर हुई थी। 3. जेवियर बेटेल – लक्जमबर्ग (2013–2023): बेटेल ने 2008 में पहली बार बताया था कि वे समलैंगिक हैं। PM बनने के डेढ़ साल बाद 2015 में उन्होंने अपने पुरुष पार्टनर गौथियर डेस्टने से शादी की। वे पहले ऐसे गे प्रधानमंत्री बने जिन्होंने पद पर रहते हुए शादी की। 4. लियो वराडकर – आयरलैंड (2017–2024): आयरलैंड में मई 2015 में समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने के लिए जनमत संग्रह होना था। भारतीय मूल के लियो वराडकर तब स्वास्थ्य मंत्री थे। उन्होंने इस जनमत संग्रह को समर्थन देने के लिए पहली बार अपनी समलैंगिक पहचान सार्वजनिक की। 5. एना ब्रनाबिच – सर्बिया (2017–2024): वे सर्बिया की पहली महिला प्रधानमंत्री थीं। वे लेस्बियन हैं। फरवरी 2019 में उनकी पार्टनर ने एक बेटे को जन्म दिया। ऐसे में वे पहली समलैंगिक प्रधानमंत्री बनीं, जिनकी महिला पार्टनर ने उनके कार्यकाल के दौरान बच्चे को जन्म दिया। 6. जेवियर एस्पोट – अंडोरा (2019 से): वे अंडोरा के प्रधानमंत्री हैं और खुले तौर पर समलैंगिक हैं। प्रधानमंत्री बनने के 4 साल बाद 2023 में उन्होंने अपनी समलैंगिक पहचान सार्वजनिक की। 7. गैब्रियल अत्ताल – फ्रांस (2024): वे फ्रांस के पहले खुले तौर पर समलैंगिक प्रधानमंत्री बने। 2018 में जब वे मैक्रों की पार्टी के सांसद थे तब पहली बार उनके एक बचपन के दोस्त ने खुलासा किया था कि उनका संबंध एक नेता स्तेफान सेजुर्ने से है। दोस्त ने आरोप लगाया कि सेजुर्ने की वजह से अत्ताल का राजनीतिक करियर आगे बढ़ा। 8. रॉब जेटेन- नीदरलैंड (2026 से): वे नीदरलैंड के पहले खुले तौर पर समलैंगिक प्रधानमंत्री हैं। उन्होंने फरवरी 2026 में पद संभाला। 17 साल की उम्र में पहली बार एक लड़के से प्यार होने के बाद उन्होंने अपने परिवार और दोस्तों के सामने अपनी पहचान का खुलासा किया था।
नीदरलैंड के प्रधानमंत्री रॉब जेटेन 2027 में पिता बनेंगे। उन्होंने सोमवार को सोशल मीडिया पर इसकी घोषणा की। जेटेन के पार्टनर निकोलस कीनन अर्जेंटीना के हॉकी खिलाड़ी हैं। जेटेन और उनके पार्टनर कीनन ने अपनी खुशी जाहिर करते हुए लिखा, हमारी जिंदगी में एक बहुत खास मेहमान आने वाला है। नन्हे बच्चे, 2027 में तुमसे मुलाकात होगी। डच मीडिया के मुताबिक बच्चे के जन्म के लिए सरोगेसी की मदद ली गई है। उनकी दो महिला दोस्तों ने इस प्रक्रिया में मदद की। एक ने अंडाणु दान किया, जबकि दूसरी बच्चे को जन्म देंगी। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जेटेन ऐसे पहले डच प्रधानमंत्री होंगे, जिनके कार्यकाल में उनके बच्चे का जन्म होगा। टिकटॉक वीडियो से शुरू हुई कहानी, सुपरमार्केट में मिले साल 2021 में, जेटन और उनके एक साथी डच नेता के बीच का एक ब्रोमांस वाला ट्रेडिंग वीडियो टिकटॉक पर बहुत वायरल हुआ था। इसमें दोनों नेता एक दूसरे के साथ मस्ती करते, हंसते और डांस करते दिखे थे। वीडियो वायरल होने के बाद रॉब जेटन युवाओं के बीच मशहूर हो गए। साल 2022 में कीनन ने एक सुपरमार्केट में जेटेन को देखा और उन्हें वायरल वीडियो की वजह से पहचान गए। इस दौरान दोनों की बातचीत शुरू हुई। कीनन ने बाद में एक इंटरव्यू में बताया था कि जेटेन ने उन्हें इंस्टाग्राम पर मैसेज भेजकर बातचीत शुरू की थी। शुरुआत में दोनों का रिश्ता निजी रहा लेकिन अगस्त 2023 में दोनों ने अपने रिश्ते को सार्वजनिक कर दिया। नवंबर 2024 में दोनों ने सगाई की घोषणा की। दोनों की शादी जून 2026 में होनी थी, लेकिन जेटेन के प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने इसे कुछ समय के लिए टाल दिया है। नीदरलैंड समलैंगिक विवाह को मान्यता देने वाला पहला देश नीदरलैंड दुनिया का पहला देश था, जिसने 2001 में समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता दी। जेटेन देश के पहले खुले तौर पर समलैंगिक प्रधानमंत्री हैं। हालांकि, वे दुनिया के पहले समलैंगिक प्रधानमंत्री नहीं हैं। उनसे पहले भी दूसरे देशों में खुले तौर पर समलैंगिक नेता सरकार के प्रमुख रह चुके हैं। सिर्फ 39 साल की उम्र में प्रधानमंत्री बने जेटेन दुनिया के 8 समलैंगिक प्रधानमंत्री 1. योहाना सिगुर्दार्दोतिर – आइसलैंड (2009–2013): वे दुनिया की पहली खुले तौर पर समलैंगिक सरकार प्रमुख बनीं। वे लेस्बियन थीं। उनकी 1970 में शादी हुई थी। उनके 2 बच्चे भी हुए। 1985 में वह एक महिला पत्रकार के करीब आईं। इसके 2 साल बाद उन्होंने तलाक ले लिया। जून 2010 में समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता मिलने पर दोनों ने शादी कर ली। 2. एलियो दी रूपो – बेल्जियम (2011–2014): वे बेल्जियम ही नहीं दुनिया के पहले खुले तौर पर गे प्रधानमंत्री बने। 1996 में उप-प्रधानमंत्री रहने के दौरान उन पर 16 साल के बच्चे के साथ संबंध बनाने का आरोप लगा था। तब पहली बार उनकी पहचान उजागर हुई थी। 3. जेवियर बेटेल – लक्जमबर्ग (2013–2023): बेटेल ने 2008 में पहली बार बताया था कि वे समलैंगिक हैं। PM बनने के डेढ़ साल बाद 2015 में उन्होंने अपने पुरुष पार्टनर गौथियर डेस्टने से शादी की। वे पहले ऐसे गे प्रधानमंत्री बने जिन्होंने पद पर रहते हुए शादी की। 4. लियो वराडकर – आयरलैंड (2017–2024): आयरलैंड में मई 2015 में समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने के लिए जनमत संग्रह होना था। भारतीय मूल के लियो वराडकर तब स्वास्थ्य मंत्री थे। उन्होंने इस जनमत संग्रह को समर्थन देने के लिए पहली बार अपनी समलैंगिक पहचान सार्वजनिक की। 5. एना ब्रनाबिच – सर्बिया (2017–2024): वे सर्बिया की पहली महिला प्रधानमंत्री थीं। वे लेस्बियन हैं। फरवरी 2019 में उनकी पार्टनर ने एक बेटे को जन्म दिया। ऐसे में वे पहली समलैंगिक प्रधानमंत्री बनीं, जिनकी महिला पार्टनर ने उनके कार्यकाल के दौरान बच्चे को जन्म दिया। 6. जेवियर एस्पोट – अंडोरा (2019 से): वे अंडोरा के प्रधानमंत्री हैं और खुले तौर पर समलैंगिक हैं। प्रधानमंत्री बनने के 4 साल बाद 2023 में उन्होंने अपनी समलैंगिक पहचान सार्वजनिक की। 7. गैब्रियल अत्ताल – फ्रांस (2024): वे फ्रांस के पहले खुले तौर पर समलैंगिक प्रधानमंत्री बने। 2018 में जब वे मैक्रों की पार्टी के सांसद थे तब पहली बार उनके एक बचपन के दोस्त ने खुलासा किया था कि उनका संबंध एक नेता स्तेफान सेजुर्ने से है। दोस्त ने आरोप लगाया कि सेजुर्ने की वजह से अत्ताल का राजनीतिक करियर आगे बढ़ा। 8. रॉब जेटेन- नीदरलैंड (2026 से): वे नीदरलैंड के पहले खुले तौर पर समलैंगिक प्रधानमंत्री हैं। उन्होंने फरवरी 2026 में पद संभाला। 17 साल की उम्र में पहली बार एक लड़के से प्यार होने के बाद उन्होंने अपने परिवार और दोस्तों के सामने अपनी पहचान का खुलासा किया था।

Lucknow Cafe Owner Shiva Sharma Case: नवाबों के शहर लखनऊ में 28 वर्षीय कैफे मालिक शिवा शर्मा की संदिग्ध मौत का मामला अब सिर्फ एक क्राइम स्टोरी नहीं, बल्कि खाकी के लिए साख का सवाल बन चुका है। घटना के 10वें दिन भी आरोपी फैशन मॉडल श्रद्धा दुबे पुलिस की पकड़ से बाहर है, वहीं दूसरी तरफ इस हाई-प्रोफाइल केस में लापरवाही और गाज गिरने का बड़ा दौर शुरू हो गया है। सोमवार को प्रशासनिक फेरबदल करते हुए लखनऊ के डीसीपी, एसीपी और हजरतगंज थाना प्रभारी को उनके पदों से हटा दिया गया है। 25 हजार की इनामी मॉडल का एक सनसनीखेज इंटरव्यू वीडियो भी सामने आया है, जिसने पूरी जांच की दिशा ही मोड़ दी है।
क्या है पूरा मामला?
5वीं मंजिल से रहस्यमयी मौत या हत्या? : बीती 9 अक्टूबर को हजरतगंज के बालू अड्डा इलाके के ‘अवध ग्रीन अपार्टमेंट’ से गिरकर कैफे मालिक शिवा शर्मा की मौत हो गई थी। शुरुआती तौर पर इसे हादसा या खुदकुशी माना जा रहा था, लेकिन मृतक की मां रंजना शर्मा के बयानों और साक्ष्यों ने पुलिस की थ्योरी बदल दी। मां का आरोप है कि शिवा की लिव-इन पार्टनर व फैशन मॉडल श्रद्धा दुबे, उसकी बहन रश्मि और साथियों ने शिवा को बेरहमी से पीटा, प्रताड़ित किया और बालकनी से नीचे फेंक दिया।
पुलिस अफसरों का तबादला
मामले में लापरवाही और जांच में देरी की सुगबुगाहट के बीच शासन ने सख्त कदम उठाया है। डीसीपी (मध्य) विक्रांत वीर को यूपी पुलिस मुख्यालय से संबद्ध कर दिया गया। एसीपी रजनीश वर्मा को क्राइम ब्रांच में भेज दिया गया। हजरतगंज थाना प्रभारी (SO) विक्रम सिंह को लाइन हाजिर कर दिया गया है।
फरार मॉडल का ‘इंटरव्यू बम’ और आत्महत्या का दावा
जब पुलिस मॉडल श्रद्धा दुबे, उसकी बहन और सहयोगी दानिश की तलाश में नेपाल बॉर्डर तक खाक छान रही है, तभी श्रद्धा का एक रिकॉर्डेड इंटरव्यू सामने आया। वीडियो में उसने खुद को बेकसूर बताते हुए दावा किया कि शिवा पर 15-20 लाख रुपए का कर्ज था और उसने आर्थिक तंगी में आत्महत्या की है।
उसने कहा- घटना वाले दिन शिवा ने खुद को बाथरूम में बंद किया और अचानक बालकनी से छलांग लगा दी। श्रद्धा ने कहा कि मैं भगोड़ी नहीं हूं, पुलिस के सामने सच रखूंगी। साथ ही सोशल मीडिया पर एक ऑडियो भी वायरल हुआ, जिसमें शिवा कथित तौर पर श्रद्धा के 6 लाख के गहने बेच देने की बात मान रहा है।
नेपाल भागने की आशंका और पुलिस का शिकंजा
श्रद्धा का महिंद्रा स्कॉर्पियो-एन वाहन बहराइच के रूपईडीहा में लावारिस हालत में मिला है, जो नेपाल सीमा से महज 1 किलोमीटर दूर है। पुलिस को अंदेशा है कि आरोपी नेपाल सीमा पार कर चुके हैं। तीनों मुख्य आरोपियों पर 25-25 हजार रुपए का इनाम घोषित कर दिया गया है। फिलहाल, शिवा के परिजनों की मांग है कि जब आरोपी बेकसूर है, तो वह पुलिस के सामने आने के बजाय क्यों भाग रही है?
Tata Trusts Charity Spending: देश के सबसे बड़े धर्मार्थ संगठनों में से एक टाटा ट्रस्ट्स ने वित्त वर्ष 2026 में अपनी चैरिटी खर्च में रिकॉर्ड बढ़ोतरी की है। नवीनतम वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, टाटा ट्रस्ट्स द्वारा दिया जाने वाला कुल दान पिछले दो वर्षों से लगातार बढ़ रहा है और FY26 में इसमें 70 प्रतिशत से अधिक का भारी उछाल आया है।
आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026 में टाटा ट्रस्ट्स ने ₹1,556 करोड़ के अनुदान वितरित किए, जबकि इससे पिछले साल (FY25) यह आंकड़ा ₹902 करोड़ था। पिछले दो सालों का कुल खर्च मिलाकर ₹2,458 करोड़ पहुंच गया है, जो कि FY21 से FY24 के चार सालों में किए गए कुल आवंटन के लगभग बराबर है।
महामारी के बाद फिर पकड़ी रफ्तार
टाटा ट्रस्ट्स ने कोविड-19 महामारी के समय अपना फंड आवंटन काफी बढ़ाया था:
- FY21: ₹841 करोड़
- FY22: ₹860 करोड़
महामारी के बाद इसमें थोड़ी गिरावट देखी गई थी। FY23 में ₹400 करोड़ और FY24 में ₹523 करोड़ का खर्च हुआ था। वैसे FY25 और FY26 में ट्रस्ट ने एक बार फिर सामाजिक कल्याण के लिए फंड में अभूतपूर्व बढ़ोतरी की है।
कहां और कैसे खर्च हुआ ₹1,556 करोड़ का फंड?
FY26 में बांटे गए ₹1,556 करोड़ के कुल फंड को दो मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया गया है:
संस्थागत अनुदान और प्रत्यक्ष क्रियान्वयन खर्च: कुल फंड का 80% से अधिक हिस्सा शिक्षण संस्थानों और अस्पतालों जैसी संस्थाओं को सीधे तौर पर दिया गया।
व्यक्तिगत अनुदान: शेष ₹200 करोड़ का उपयोग स्वास्थ्य, शिक्षा और गरीबी उन्मूलन जैसे व्यक्तिगत कारणों के लिए जरूरतमंदों को सहायता देने में हुआ।
सेक्टर-वाइज खर्च का ब्योरा
टाटा ट्रस्ट्स ने देश के अलग-अलग क्षेत्रों के विकास के लिए भारी फंड जारी किया है:
ग्रामीण उत्थान: सबसे बड़ा हिस्सा यानी ₹450 करोड़ ग्रामीण विकास परियोजनाओं को दिया गया। इसमें आजीविका के साधन उपलब्ध कराने और वित्तीय समावेशन के कार्यक्रम शामिल हैं।
शिक्षा क्षेत्र: शिक्षा से जुड़ी योजनाओं और पहलों पर ₹270 करोड़ खर्च किए गए।
कैंसर देखभाल: कैंसर के इलाज और सुविधाओं के लिए ₹178 करोड़ की वित्तीय सहायता दी गई। टाटा ट्रस्ट्स ‘टाटा कैंसर केयर फाउंडेशन’ (TCCF) को फंड देता है, जो कई अस्पतालों का संचालन करता है और वंचित मरीजों को वित्तीय सहायता प्रदान करता है।
चेयरमैन नोएल टाटा का विजन: हेल्थकेयर रहेगा मुख्य फोकस
वित्त वर्ष 2026 के लिए जारी चेयरमैन लेटर में टाटा ट्रस्ट्स के अध्यक्ष नोएल टाटा ने स्पष्ट किया कि निकट भविष्य में हेल्थकेयर ट्रस्ट की सबसे बड़ी प्राथमिकता बना रहेगा।
उन्होंने कहा, ‘हम चिकित्सा संकट का सामना कर रहे परिवारों का समर्थन करना जारी रखेंगे। इसके साथ ही, कैंसर देखभाल के ऐसे मॉडल को मजबूत कर रहे हैं जिससे इलाज मरीजों के घर के करीब लाया जा सके। हम देशभर में 40 से 50 गैर-लाभकारी जनरल अस्पतालों का एक नेटवर्क तैयार करने पर काम कर रहे हैं। यह मॉडल ऐसा होगा कि जो लोग इलाज का खर्च उठा सकते हैं, वे उन लोगों की मदद करेंगे जो इसका खर्च नहीं उठा सकते।’
उन्होंने भारत में विश्वस्तरीय संस्थानों के निर्माण पर जोर देते हुए आगे कहा, ‘भारतीय मूल के विद्वान और पेशेवर दुनिया के बेहतरीन संस्थानों में अपनी छाप छोड़ रहे हैं। भारत को ऐसे और संस्थानों की जरूरत है जो इस प्रतिभा को तराश सकें, ताकि युवाओं को बाहर देखे बिना यहीं सीखने, खोजने और योगदान देने का अवसर मिले।’
Climate impact ON wheat: जलवायु परिवर्तन का असर अब हमारी थाली तक पहुंच सकता है। जी हां, जिस गेहूं से हर दिन करोड़ों लोगों की रोटी बनती है, उसकी पोषण संबंधी गुणवत्ता और प्रोटीन संरचना भविष्य में बदल सकती है। एक नई वैज्ञानिक स्टडी में सामने आया है कि वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) का स्तर बढ़ने से गेहूं के प्रोटीन की संरचना में महत्वपूर्ण बदलाव हो सकते हैं। इसका असर न केवल आटे और ब्रेड की क्वालिटी पर पड़ सकता है, बल्कि गेहूं से जुड़ी कुछ स्वास्थ्य समस्याओं के लिहाज से भी यह महत्वपूर्ण हो सकता है।
स्टडी में खुलासा हुआ है कि वातावरण में बढ़ती CO₂ गेहूं की प्रोटीन संरचना को बदल सकती है। इसका असर बेकिंग गुणवत्ता पर पड़ने के संकेत मिले हैं। जर्मनी के लीबनिज इंस्टीट्यूट फॉर फूड सिस्टम्स बायोलॉजी और टेक्निकल यूनिवर्सिटी ऑफ म्यूनिख से जुड़े शोधकर्ताओं के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन के निष्कर्ष प्रतिष्ठित जर्नल फूड केमिस्ट्री (Food Chemistry) में प्रकाशित हुए हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में गेहूं की खेती पर विचार करते समय केवल उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं होगा। अनाज की गुणवत्ता और उसमें मौजूद प्रोटीन के प्रकारों को भी समझना जरूरी है।
हवा में बढ़ती CO₂ से गेहूं पर कितना असर?
स्टडी के अनुसार, वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा लगातार बढ़ रही है। वर्ष 1980 में इसका स्तर लगभग 340 पार्ट्स पर मिलियन (ppm) था, जो 2024 में बढ़कर करीब 425 ppm तक पहुंच गया। अनुमान है कि वर्ष 2050 तक यह स्तर 600 ppm तक जा सकता है। गेहूं दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण खाद्य फसलों में से एक है। ऐसे में वातावरण में CO₂ की बढ़ती मात्रा के बीच इसकी खेती और अनाज की क्वालिटी में होने वाले बदलावों को समझना बेहद जरूरी है। वैज्ञानिकों ने इसी सवाल का जवाब तलाशने के लिए गेहूं की अलग-अलग किस्मों पर प्रयोग किया।
10 किस्मों पर हुआ प्रयोग, सामने आए चौंकाने वाले बदलाव
शोधकर्ताओं ने सर्दियों में उगाई जाने वाली गेहूं की 10 खेती की किस्मों को वास्तविक कृषि और पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुरूप उगाया। इनमें से कुछ पौधों को सामान्य परिस्थितियों में मौजूद CO₂ के स्तर पर रखा गया। जबकि अन्य पौधों को 546 ppm की बढ़ी हुई CO₂ में उगाया गया। फसल तैयार होने के बाद वैज्ञानिकों ने गेहूं के दानों में मौजूद प्रोटीन का बारीकी से विश्लेषण किया। इसके लिए हाई-रिजॉल्यूशन मास स्पेक्ट्रोमेट्री तकनीक का इस्तेमाल किया गया।
स्टडी में विशेष रूप से ग्लूटेन प्रोटीन, एमाइलेज/ट्रिप्सिन इनहिबिटर्स (ATIs), प्यूरोइंडोलिन और सीलिएक रोग से संबंधित कुछ पेप्टाइड्स पर ध्यान दिया गया। नतीजों से पता चला कि CO₂ कॉन्सेंट्रेशन का स्तर बढ़ने पर गेहूं के अलग-अलग प्रोटीन समूहों में एक जैसा बदलाव नहीं हुआ। कुछ प्रोटीन बढ़े। जबकि कुछ की मात्रा घट गई। इसका मतलब है कि जलवायु परिवर्तन गेहूं की प्रोटीन संरचना को प्रभावित कर सकता है।
बढ़ेगा एक तरह का प्रोटीन, घट सकता है ग्लूटेन
इस स्टडी में पाया गया कि बढ़ी हुई CO₂ कॉन्सेंट्रेशन में गेहूं के दानों में एमाइलेज/ट्रिप्सिन इनहिबिटर्स (ATIs) की मात्रा बढ़ गई। दूसरी ओर, प्यूरोइंडोलिन, ग्लूटेन प्रोटीन और सीलिएक रोग से एक्टिव हो सकने वाले कुछ पेप्टाइड्स की मात्रा में कमी देखी गई। ATIs ऐसे प्रोटीन हैं जिनकी संभावित हेल्थ संबंधी भूमिका पर वैज्ञानिक अध्यन करते रहे हैं। इनकी मात्रा बढ़ने का असर मानव स्वास्थ्य के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकता है।
लेकिन इस स्टडी के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि बढ़ी हुई CO₂ में उगा गेहूं सीधे तौर पर लोगों को बीमार कर देगा। वैज्ञानिकों ने यह भी स्पष्ट किया कि ग्लूटेन प्रोटीन की मात्रा घटने के साथ गेहूं की बेकिंग गुणवत्ता में गिरावट देखी गई। यानी प्रोटीन की संरचना में बदलाव का असर रोटी, ब्रेड और गेहूं से बनने वाले दूसरे खाद्य पदार्थों की निर्माण संबंधी विशेषताओं पर पड़ सकता है।
क्या गेहूं से जुड़ी बीमारियों का खतरा भी बदल सकता है?
अध्ययन का एक महत्वपूर्ण पहलू गेहूं से संबंधित स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़ा है। शोधकर्ताओं ने पाया कि CO₂ बढ़ने के कारण ATIs और सीलिएक रोग से सक्रिय होने वाले कुछ पेप्टाइड्स की मात्रा में बदलाव हुआ। सीलिएक रोग एक प्रतिरक्षा सिस्टम से जुड़ी बीमारी है, जिसमें ग्लूटेन के सेवन से छोटी आंत को नुकसान पहुंच सकता है।
हालांकि, स्टडी में कुछ संबंधित पेप्टाइड्स की मात्रा घटने का संकेत मिला। जबकि ATIs की मात्रा बढ़ी। इसलिए इन बदलावों का कुल स्वास्थ्य प्रभाव क्या होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, यह समझने के लिए आगे अध्ययन करना जरूरी है कि गेहूं में प्रोटीन संरचना के ये बदलाव वास्तव में मानव शरीर की जैविक और प्रतिरक्षा संबंधी प्रतिक्रियाओं को किस तरह प्रभावित करते हैं। फिलहाल इस शोध को गेहूं से जुड़ी बीमारियों में निश्चित वृद्धि या कमी का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
हर गेहूं की किस्म पर एक जैसा असर नहीं
पीटीआई के मुताबिक, इस अध्ययन में एक और अहम बात सामने आई कि सभी गेहूं की किस्मों में बदलाव समान नहीं थे। प्रमुख शोधकर्ता सबरीना गाइस्लिट्ज के अनुसार, प्रोटीन संरचना में परिवर्तन की सीमा काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि गेहूं की कौन-सी किस्म उगाई गई है। यह निष्कर्ष भविष्य की खेती के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। यदि कुछ किस्में बढ़ी हुई CO₂ परिस्थितियों में अपनी गुणवत्ता बेहतर बनाए रखती हैं, तो उन किस्मों की पहचान और विकास पर ध्यान दिया जा सकता है। हालांकि, इसके लिए अलग-अलग जलवायु परिस्थितियों और कृषि क्षेत्रों में और परीक्षण करने होंगे।
भविष्य की खेती के लिए क्या है सबक?
इस स्टडी से साफ संकेत मिलता है कि जलवायु परिवर्तन का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जाना चाहिए कि खेतों में कितना अनाज पैदा हो रहा है। यह भी देखना होगा कि उस अनाज में किस तरह के प्रोटीन मौजूद हैं। उसकी बेकिंग गुणवत्ता कैसी है। उसके सेवन से जुड़े संभावित स्वास्थ्य पहलुओं पर क्या प्रभाव पड़ सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, भविष्य में गेहूं की ऐसी किस्में विकसित करने की जरूरत होगी, जो बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियों में भी अच्छी पैदावार के साथ बेहतर गुणवत्ता बनाए रख सकें।

मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन ने व्यक्तिगत शोक और दुःख की इस कठिन घड़ी में भी जनहित के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बनाए रखी है। अपने पैतृक गांव नेमरा (रामगढ़) में मातृशोक के बीच भी उन्होंने राज्यभर से पहुंचे लोगों की समस्याएं सुनीं और उनके त्वरित समाधान के निर्देश दिए।
मुख्यमंत्री ने नेमरा में मौजूद एक-एक व्यक्ति से मिलकर उनका कुशलक्षेम जाना और बेहद आत्मीयता के साथ उनकी फरियादें सुनीं। जनता की शिकायतों पर कड़ा रुख अपनाते हुए उन्होंने अधिकारियों को सभी मामलों का गुणवत्तापूर्ण और त्वरित निदान सुनिश्चित करने को कहा, ताकि किसी भी फरियादी को निराश न लौटना पड़े।
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उन्होंने कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी राज्य की जनता को ही अपना सबसे बड़ा परिवार मानकर उनके साथ खड़े रहने का संदेश दिया। मुख्यमंत्री से उनके पैतृक गांव नेमरा में सांसद विजय हांसदा, नलिन सोरेन, विधायक सरयू राय, अनंत प्रताप देव एवं अमित महतो ने मुलाकात की।
छत्तीसगढ़ स्थित जशपुर राजपरिवार के सदस्यों ने भी मुलाकात की। इस दौरान महाराजा-सह-पूर्व सांसद रणविजय सिंह जूदेव, महारानी अमृता सिंह जूदेव, युवराज यश प्रताप जूदेव और राजकुमार आर्य प्रताप जूदेव ने मुख्यमंत्री से मिलकर अपनी गहरी संवेदनाएं प्रकट की।
Pic Credit : ANI
राजधानी पटना में रहने वाले लोगों को अगर बिहटा या कोईलवर जाना हो, तो अक्सर जाम और लंबी दूरी की परेशानी से गुजरना पड़ता है। उस दिशा में जाने का नाम सुनते ही लोग गहरी चिंता में चले जाते हैं। कोई न कोई बहाना ढूंढ़ने लग जाते हैं लेकिन आने वाले समय में इसी रूट पर लोग लॉन्ग ड्राइव पर जाएंगे। ऐसा इसीलिए, क्योंकि पटना के दीघा से कोईलवर तक जेपी गंगा पथ का विस्तार होने वाला है। अभी जो दूरी डेढ़ से दो घंटे में तय होती है, वही आने वाले समय में महज 30-35 मिनट में पूरा हो सकेगी। इस सड़क के विस्तार से पटना और पश्चिमी क्षेत्र के बीच मजबूत कनेक्टिविटी स्थापित होगी।
पूरा पटना जिला हो जाएगा कवर
अब तक दीघा से दीदारगंज तक फैला जेपी गंगापथ पटना के पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों के बीच आवागमन का एक अहम ऑप्शन बन चुका है। अब इसे पश्चिम दिशा में कोईलवर तक ले जाने की तैयारी है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत दीघा से कोईलवर तक 35.65 किमी यानी लगभग 36 किलोमीटर लंबी फोरलेन सड़क बनाई जानी है। इसका निर्माण हैदराबाद की कंपनी विश्व समुद्रा करेगी।
दो हिस्सों में बनेगी सड़क, बांध पर भी सड़क
जेपी गंगापथ के इस विस्तार में सबसे खास बात इसकी बनावट होगी। पूरी सड़क को दो हिस्सों में विकसित किया जाएगा। परियोजना के तहत दीघा से शेरपुर तक करीब 18 किलोमीटर लंबी एलिवेटेड फोरलेन सड़क बनाई जाएगी। इसके बाद शेरपुर से कोईलवर तक लगभग 18 किलोमीटर सड़क बांध पर बनेगी। इस तरह शहर से निकलने के बाद वाहनों को लंबे समय तक ट्रैफिक और संकरी सड़कों की समस्या से जूझने की जरूरत नहीं पड़ेगी। यह सड़क दीघा जेपी सेतु से शुरू होकर दानापुर, शाहपुर, शेरपुर और बिहटा होते हुए कोईलवर के नए पुल से जुड़ेगी।
6500 करोड़ रुपये की परियोजना, चार साल में पूरा करने का लक्ष्य
जेपी गंगापथ का विस्तार सिर्फ एक सड़क परियोजना नहीं, बल्कि पटना की भविष्य की यातायात व्यवस्था को ध्यान में रखकर तैयार किया जा रहा बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट है। इसके निर्माण पर 6495.78 करोड़ यानी करीब 6500 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। इसका निर्माण हाइब्रिड एनुइटी मॉडल (HAM) के तहत किया जाएगा। इस मॉडल में निर्माण एजेंसी और सरकार दोनों की वित्तीय भागीदारी होगी।
पूर्वांचल एक्सप्रेसवे तक पहुंचेगा पटना का रास्ता
इस परियोजना का असर केवल पटना और कोईलवर के बीच यात्रा तक सीमित नहीं रहेगा। इसके पूरा होने से राजधानी की पश्चिमी दिशा में कनेक्टिविटी मजबूत होगी और आगे पूर्वांचल एक्सप्रेसवे तक पहुंचने का रास्ता भी अधिक सुविधाजनक बन सकता है। इसके जरिए पटना से बक्सर और फिर उत्तर प्रदेश की ओर यात्रा करने वाले लोगों को फायदा मिलने की उम्मीद है। बक्सर के रास्ते गंगा नदी पार कर उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल एक्सप्रेसवे तक पहुंचने से अयोध्या और दिल्ली की दिशा में सफर भी आसान हो सकता है।
पटना से सच्चिदानंद की रिपोर्ट
झारखंड की राजस्थानी रांची के नगरी स्थित 150 एकड़ जमीन में रिम्स 2 का निर्माण काफी तेजी से हो रहा है। रिम्स 2 एक सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल होगा, जिसमें 2800 से अधिक बेड होंगे। इसके निर्माण में 4186 करोड़ की लागत आएगी। रिम्स के पीआरओ राजीव रंजन बताते हैं, इसमें प्रत्येक वर्ष एमबीबीएस की 200 सीटों पर नामांकन होगा, जिसे 250 यूजी सीटों, 200 पीजी सीटों और 200 सुपर स्पेशलाइजेशन सीटों तक बढ़ाया जा सकेगा।
पढ़ाई के लिए बाहर जाने की जरूरत नहीं
राजीव रंजन बताते हैं, राज्य के छात्रों को अब मेडिकल की प्रैक्टिस या पढ़ाई के लिए बाहर जाने की जरूरत नहीं होगी। यह मेडिकल कॉलेज प्रैक्टिस करने वाले चिकित्सकों और सर्जनों और मेडिकल साइंटिस्टों की शिक्षा, मेडिकल रिसर्च और मरीजों की देखभाल के लिए एडवांस्ड मेडिकल टेक्नोलाजी के इस्तेमाल में लीडरशिप देने का काम करेगी।
एशियन डेवलपमेंट बैंक करेगा सहयोग
रिम्स 2 के निर्माण के लिए एशियन डेवलपमेंट बैंक सहयोग करेगा। निर्माण प्रक्रिया पूरे तीन चरणों में पूरी की जाएगी। पहले चरण में एशियन डेवलपमेंट बैंक के साथ राज्य सरकार के फंड का इस्तेमाल होगा। पहले चरण में डॉक्टर और छात्रों के रहने के लिए आवास, एकेडमिक बिल्डिंग व मुख्य अस्पताल परिसर का निर्माण होगा।
5 साल में पूरा होगा प्रोजेक्ट
इसे बनने में पूरे 5 साल का समय लगने वाला है। जमीन चिन्हित कर और टेंडर प्रक्रिया भी पूरी की जा रही है। स्वास्थ्य विभाग ने इसकी पूरी जिम्मेदारी झारखंड स्टेट बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कारपोरेशन लिमिटेड (जेएसबीसीसीएल) को सौंपी है, जिसके द्वारा इस संस्थान के डिजाइन तैयार करने व निर्माण सहित पांच वर्ष के इस प्रोजेक्ट के लिए टेंडर आमंत्रित जैसे अहम काम जल्द निपटे जाएंगे।
सारी हाईटेक सुविधाओं से लैस होगा अस्पताल
राजीव रंजन बताते हैं, अस्पताल पूरा हाईटेक सुविधाओं के साथ लैस होगा। लोगों की सुविधा व सेफ्टी का पूरा ध्यान रखा जाएगा। खासतौर पर भवन में लिफ्ट्स फायर फाइटिंग सिस्टम, फायर अलार्म सिस्टम, न्यूमेटिक ट्यूब सिस्टम, न्यूमेटिक वेस्ट और लांड्री कलेक्शन सिस्टम, आटोमेटेड फार्मेसी डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम, सालिड वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम, आटोमेटेड वर्टिकल स्टोरेज रिट्रीवल सिस्टम, नर्स कॉल सिस्टम, हैंगर सिस्टम और भी कई सारे सुविधाएं देखने को मिलेगी।
रांची से शिखा श्रेया की रिपोर्ट
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RRB NTPC Graduate Level Recruitment: रलवे भर्ती बोर्ड (RRB) ने अपने भर्ती पैटर्न में बड़े बदलाव की घोषणा की है। इसके तहत, स्टेशन मास्टर के पदों पर अलग से भर्ती की प्रक्रिया चलाई जाएगी। बोर्ड ने हाल ही में एनटीपीसी ग्रेजुएट लेवल पोस्ट के लिए 3548 पदों पर भर्ती निकली है। इस बार नोटिफिकेशन से स्टेशन मास्टर के पदों को अलग कर दिया गया है। रेलवे की ओर से जारी नोटिफिकेशन के मुताबिक अब स्टेशन मास्टर के लिए अलग से नोटिफिकेशन जारी किया जाएगा। इसके साथ ही इस पद के लिए आयोजित होने वाली एग्जाम में भी बदलाव किया गया है।
स्टेशन मास्टर भर्ती के लिए होगी एक ही परीक्षा
आरआरबी स्टेशन मास्टर भर्ती के लिए एक ही ऑनलाइन लिखित परीक्षा आयोजित होगी। दैनिक भास्कर की खबर के अनुसार, पद संख्या की तुलना में 8 गुना उम्मीदवारों को कंप्यूटर बेस्ड एप्टीट्यूड टेस्ट (CBAT) के लिए बुलाया जाएगा। इसके बाद कंप्यूटर आधारित एप्टीट्यूड टेस्ट (CBAT), डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन और मेडिकल टेस्ट का आयोजन किया जाएगा। यह फैसला रेलवे की स्टेशन मास्टर भर्ती को पहले से सरल बनाने के लिए लिया गया है।
क्या है सीबीएटी ?
सीबीएटी यानी कंप्यूटर बेस्ड एप्टीट्यूड टेस्ट, उम्मीदवारों की उन क्षमताओं का आकलन करने के लिए आयोजित किया जाता है, जो स्टेशन मास्टर जैसे यात्रियों की सुरक्षा से जुड़े पदों पर काम करते हैं। इसमें ध्यान केंद्रित करने की क्षमता, तेजी से और सही निर्णय लेने की योग्यता, निर्देशों को समझने और उनका पालन करने की क्षमता और एक साथ कई जानकारियों पर ध्यान देने की योग्यता को परखा जाता है।
आरआरबी एनटीपीसी ग्रेजुएट्स भर्ती 2026 में बदलाव
एनटीपीसी ग्रेजुएट्स लेवल भर्ती 2026 के नोटिफिकेशन के अनुसार, जिन पदों पर भर्ती के लिए पहले कंप्यूटर आधारित टाइपिंग स्किल टेस्ट (CBTST) हुआ करता था, वह अब नहीं होगा। हालांकि कैंडिडेट्स को कंप्यूटर और टाइपिंग की जानकारी होनी चाहिए।
वहीं, एनटीपीसी ग्रेजुएट्स लेवल भर्ती 2026 परीक्षा पैटर्न के तहत 3 चरणों में परीक्षा होगी। पहले चरण में कंप्यूटर आधारित स्क्रीन टेस्ट (CBT-1) होगा। दूसरे फेज में CBT-2 होगा। तीसरे चरण में दस्तावेज सत्यापन और मेडिकल टेस्ट होगा।
आरआरबी एनटीपीसी 2026 भर्ती नया नोटिफिकेशन जारी
आरआरबी ने एनटीपीसी ग्रेजुएट लेवल भर्ती 2026 का नोटिफिकेशन परीक्षा में हुए टाइपिंग टेस्ट के बदलावों के साथ जारी किया है। इसके अनुसार, गुड्स ट्रेन मैनेजर और चीफ कमर्शियल कम टिकट सुपरवाइजर भर्ती के लिए टाइपिंग टेस्ट नहीं होगी। रेलवे भर्ती बोर्ड यानी RRB ने NTPC ग्रेजुएट लेवल भर्ती 2026 के शॉर्ट नोटिफिकेशन में पदों की संख्या 3477 थी। इसे डिटेल नोटिफिकेशन में बढ़ाकर 3548 किया गया है।
जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने बड़ी कार्रवाई की है। एजेंसी ने श्रीनगर में लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के पाकिस्तानी आतंकियों को कथित तौर पर पनाह देने के मामले में ये कार्रवाई की है। NIA ने श्रीनगर स्थित हजरतबल के दानिहामा गांव में गुलाम मोहम्मद मीर उर्फ मामा गैस की आवासीय संपत्ति को जब्त कर लिया है। ये कार्रवाई 2026 में दर्ज जम्मू जोन से जुड़े एक मामले में की गई है। एजेंसी ने गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA की धारा 25 के तहत यह कदम उठाया है। संपत्ति पर कार्रवाई से पहले NIA के महानिदेशक से जरूरी मंजूरी भी ली गई थी।
आतंकियों को पनाह देने और सबूत छिपाने का आरोप
NIA की जांच के मुताबिक, आरोपी की इस संपत्ति का इस्तेमाल कथित तौर पर पाकिस्तानी आतंकियों को पनाह देने और आतंकी नेटवर्क से जुड़े आपत्तिजनक साक्ष्य छिपाने के लिए किया गया था। जांच एजेंसी ने संपत्ति और सीमा पार से संचालित आतंकी साजिश के बीच सीधा संबंध सामने आने का दावा किया है।
6 अप्रैल को तलाशी के दौरान मिले थे दो संदिग्ध
ये मामला 31 मार्च 2026 को श्रीनगर के जकूरा पुलिस स्टेशन में FIR नंबर 24/2026 के तहत दर्ज किया गया था। इसके बाद राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने इसे अपने हाथ में लेकर जांच आगे बढ़ाई। जांच के सिलसिले में 6 अप्रैल 2026 को हजरतबल के दानिहामा इलाके में गुलाम मोहम्मद मीर के घर पर छापेमारी की गई। एजेंसी के मुताबिक, इस कार्रवाई के दौरान अबू हुरैरा और खुबैब नाम के दो संदिग्ध पाकिस्तानी आतंकियों की मौजूदगी का पता चला, जिनके लश्कर-ए-तैयबा से संबंध होने का आरोप है। तलाशी में संदिग्ध विस्फोटक सामग्री, डिजिटल डिवाइस और जांच से जुड़े अन्य सामान भी बरामद किए गए।
जांच में हुए कई खुलासे
NIA की जांच में स्थानीय ओवर ग्राउंड वर्कर्स (OGWs) के एक नेटवर्क का खुलासा होने की बात कही गई है। एजेंसी के अनुसार, ये लोग पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा के हैंडलर्स के साथ कथित तौर पर समन्वय कर पाकिस्तानी आतंकियों की घुसपैठ, आवाजाही, ठहरने और अन्य लॉजिस्टिक सहायता की व्यवस्था कर रहे थे। जांच एजेंसी को आशंका है कि, इस नेटवर्क का इस्तेमाल सरकारी प्रतिष्ठानों, सुरक्षा बलों और आम नागरिकों को निशाना बनाने वाले आतंकी हमलों को अंजाम देने के लिए किया जाना था।
NIA की तफ्तीश जारी
NIA अब इस आतंकी नेटवर्क से जुड़े अन्य ओवर ग्राउंड वर्कर्स, मददगारों और पाकिस्तान स्थित हैंडलर्स से संपर्क रखने वाले लोगों की पहचान करने में जुटी है। एजेंसी का कहना है कि पूरे आतंकी सपोर्ट नेटवर्क का पर्दाफाश करने के लिए जांच जारी है।


