अमेरिका बोला- पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार, उससे बातचीत जरूरी:रुबियो बोले- विदेश नीति के लिए ये जरूरी, भारत भी ईरान से दोस्ती रखता है

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने मंगलवार को कहा कि पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार हैं और उसकी भौगोलिक स्थिति भी ऐसी है कि अमेरिका के लिए उससे बातचीत करना जरूरी है। नेटवर्क18 को दिए एक इंटरव्यू में रुबियो ने कहा कि अमेरिका को उन देशों के साथ भी राजनयिक संबंध बनाए रखने पड़ते हैं, जिनसे उसके मतभेद हैं। रुबियो ने भारत का उदाहरण देते हुए कहा कि भारत भी ईरान के साथ संबंध रखता है और वहां के नेताओं से मुलाकात करता है। उनके मुताबिक, विदेश नीति में अलग-अलग देशों के साथ रिश्तों का संतुलन बनाए रखना मुश्किल है, लेकिन ऐसा करना जरूरी है। रुबियो बोले- अमेरिका आतंकवाद का समर्थन करने वालों के खिलाफ अमेरिकी विदेश मंत्री ने कहा कि अमेरिका दुनिया में कहीं भी आतंकवाद का समर्थन करने वालों के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के साथ बातचीत जारी रहने से अमेरिका को उन गतिविधियों को रोकने की कोशिश करने का मौका मिल सकता है, जिनसे भारत को चिंता होती है। रुबियो ने कहा, ये मुश्किल फैसले हैं, लेकिन विदेश नीति के तहत हमें ऐसा करना पड़ता है। मुझे लगता है कि यह सकारात्मक भी हो सकता है। अगर हमारे पाकिस्तान के साथ संबंध हैं और हम उससे बात कर सकते हैं, तो इससे हमें उन गतिविधियों को हतोत्साहित करने में मदद मिल सकती है, जिनसे भारत चिंतित है। रुबियो बोले- ईरान पर कट्टरपंथी शिया धर्मगुरुओं का कंट्रोल रुबियो ने ईरान के नेतृत्व की आलोचना करते हुए कहा कि वहां की सरकार के साथ किसी समझौते पर पहुंचना मुश्किल है। उन्होंने कहा, दुर्भाग्य से, वे समझौता करना नहीं जानते। वहां कट्टरपंथी शिया धर्मगुरुओं का नियंत्रण है। मैं सभी शिया धर्मगुरुओं की बात नहीं कर रहा, बल्कि उन कट्टरपंथी धर्मगुरुओं की बात कर रहा हूं, जो धार्मिक विचारधारा से प्रेरित हैं। ऐसे लोगों के साथ समझौता करना बहुत मुश्किल है। होर्मुज में तेल की आवाजाही 80 से 100% हुई रुबियो ने कहा कि होर्मुज से तेल और दूसरे ऊर्जा संसाधनों की सप्लाई जारी है। उनके मुताबिक, इस रास्ते से जहाजों की आवाजाही और तेल की सप्लाई संघर्ष शुरू होने से पहले के स्तर की 80 से 100% तक बनी हुई है। रुबियो ने ईरान पर आरोप लगाया कि वह उन व्यापारिक जहाजों पर हमले कर रहा है, जिनका युद्ध से कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने कहा कि इन जहाजों पर सवार नाविकों की जान भी खतरे में पड़ रही है। रुबियो ने दुनिया के देशों से ऐसे हमलों की निंदा करने की अपील की। उन्होंने ईरान के इन हमलों की तुलना दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी की नाजी सेना की पनडुब्बियों से की। रुबियो के मुताबिक, उस दौर में भी पनडुब्बियों से व्यापारिक जहाजों को निशाना बनाया जाता था। उन्होंने कहा कि दुनिया को ऐसे हमलों के खिलाफ एकजुट होना चाहिए। फैक्ट चेक: स्ट्रैटेजिक एनर्जी मैप वेबसाइट के मुताबिक 20 अक्टूबर को होर्मुज से गुजरने वाले तेल टैंकरों की संख्या सामान्य दिनों के मुकाबले करीब 99% घट गई थी। यानी, अगर युद्ध से पहले एक दिन में 100 टैंकर गुजरते थे, तो इस आंकड़े के मुताबिक अब केवल 1 टैंकर गुजर रहा था। भारतीय नाविकों की मौत का जिक्र किया रुबियो ने कहा कि अमेरिका ईरान के ड्रोन और मिसाइल हमलों से समुद्री जहाजों की रक्षा कर रहा है। उनके मुताबिक, जहाजों को निशाना बनाने के लिए दागे जाने वाले ज्यादातर ड्रोन और मिसाइलों को रास्ते में ही नष्ट कर दिया जाता है। हालांकि, कुछ हमले जहाजों तक पहुंच जाते हैं और नुकसान पहुंचाते हैं। उन्होंने खास तौर पर भारतीय नाविकों की मौत का जिक्र किया। रुबियो ने कहा कि इन हमलों में कई भारतीय नाविकों की जान गई है। इसकी एक वजह यह भी है कि समुद्री व्यापार में बड़ी संख्या में भारतीय नाविक काम करते हैं। नोट- पश्चिम एशिया में युद्ध के दौरान अब तक 11 भारतीय नाविकों की मौत की खबर सामने आई है। वहीं 2 भारतीय नाविक लापता बताए गए हैं। ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाता रहेगा अमेरिका रुबियो ने कहा कि अमेरिका ईरान पर आर्थिक दबाव बनाए रखेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि ईरान अपने संसाधनों का इस्तेमाल आम लोगों की जिंदगी बेहतर बनाने के बजाय आतंकवाद को समर्थन देने और मिसाइल-ड्रोन बनाने में करता है। रुबियो ने आरोप लगाया कि ईरान को मिलने वाले पैसे और संसाधनों का इस्तेमाल देश के विकास के बजाय आतंकवाद को समर्थन देने और व्यापारिक जहाजों को निशाना बनाने वाले हथियार तैयार करने में किया जाता है। रुबियो के बयान के तीन बड़े संकेत

अमेरिका के इनकार किया, अब ब्रिटेन सऊदी की मदद करेगा:टाइफून विमान भेजने का ऐलान, हूती विद्रोहियों के हमले से तेल ठिकानों की हिफाजत होगी

ब्रिटेन ने अपने टाइफून लड़ाकू विमान सऊदी अरब भेजने का ऐलान किया है। ये विमान हूती विद्रोहियों के ड्रोन और मिसाइल हमलों से सऊदी शहरों और तेल ठिकानों की रक्षा करेंगे। ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय ने मंगलवार को यह भी साफ कहा कि वे हूती ठिकानों पर सीधे हमला नहीं करेंगे। बीते 2 महीने से हूती और सऊदी के बीच संघर्ष शुरू हो गया है। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक सऊदी अरब ने हूती विद्रोहियों के खिलाफ सीधे अमेरिकी सैन्य हमले की मांग की थी, लेकिन ट्रम्प ने इससे इनकार कर दिया। अब ब्रिटेन सऊदी की मदद के लिए आगे आया है। ब्रिटेन ने सऊदी की मदद का फैसला क्यों लिया? ब्रिटेन के रक्षा मंत्री वेस स्ट्रीटिंग ने कहा कि सऊदी अरब पर हूतियों के लगातार हमले बेहद निंदनीय हैं। खास तौर पर रियाद के एयरपोर्ट को निशाना बनाया जाना दिखाता है कि हूती क्षेत्र में तनाव बढ़ाने के लिए किस हद तक जा रहे हैं। उन्होंने कहा, इसी वजह से मैंने आज ब्रिटेन की ओर से और सैन्य मदद को मंजूरी दी है। रॉयल एयर फोर्स के टाइफून विमान ड्रोन और मिसाइलों से सऊदी हवाई क्षेत्र की रक्षा के लिए उड़ान भरेंगे।
स्ट्रीटिंग ने कहा कि हूतियों के हमलों से पश्चिम एशिया में स्थिरता को खतरा है। इससे ऊर्जा आपूर्ति और व्यापारिक रास्ते भी प्रभावित हो सकते हैं। इसका असर ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। पहले भी मदद दे चुका है ब्रिटेन सऊदी अरब सरकार के अनुरोध पर ब्रिटेन सितंबर में भी अतिरिक्त सैन्य सहायता देने पर सहमत हुआ था। तब उसने रॉयल एयर फोर्स का वॉयेजर विमान देने की घोषणा की थी। इस विमान का इस्तेमाल हवा में दूसरे विमानों में ईंधन भरने के लिए किया जाता है। अब ब्रिटेन टायफून के अलावा एटलस A400M परिवहन विमान और सैन्य सलाहकार भी भेजेगा। परिवहन विमान का इस्तेमाल सऊदी अरब के भीतर सैन्य उपकरण पहुंचाने के लिए किया जाएगा। ब्रिटिश सैन्य सलाहकार सऊदी अधिकारियों की मदद करेंगे। रिपोर्ट- ट्रम्प सरकार ने हूती विद्रोहियों से सीक्रेट डील की 16 सितंबर की एक्सिओस की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका ने यमन के हूती विद्रोहियों के साथ सीक्रेट डील की है। इस डील के तहत हूतियों ने अमेरिका को भरोसा दिया है कि वे लाल सागर में अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय जहाजों को निशाना नहीं बनाएंगे। यह डील पिछले महीने ओमान की राजधानी मस्कट के अमेरिकी दूतावास में हुई थी। इसमें हूती प्रतिनिधियों ने भरोसा दिया था कि वे सऊदी अरब के अलावा दूसरे जहाजों को बाब-अल-मंदेब से गुजरने देंगे। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी कहा था कि अमेरिका हूतियों के साथ सीधे बातचीत कर रहा है। हालांकि, किसी औपचारिक गुप्त समझौते की सार्वजनिक पुष्टि नहीं हुई थी। पाकिस्तान ने भी सऊदी की मदद से इनकार किया यरुशलम पोस्ट की पिछले महीने की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी ने मक्का डिफेंस अलायंस के साथी पाकिस्तान से मदद मांगी थी। लेकिन पाकिस्तान ने यमन में लड़ने के लिए अपनी सेना या सैन्य संसाधन भेजने से इनकार कर दिया है। पाकिस्तान ने कहा कि उसकी सेना सऊदी अरब की जमीन की रक्षा के लिए तैनात की जा सकती है, लेकिन वह किसी दूसरे देश की जमीन पर युद्ध में शामिल नहीं होगी। ‘एक पर हमला, मतलब तीनों पर हमला।’ इसी सिद्धांत के साथ पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने 7 अगस्त को ‘मक्का जॉइंट डिफेंस पैक्ट’ पर साइन किया था। तीनों देशों के बीच इस समझौते को कई जानकारों ने ‘मुस्लिम नाटो’ की दिशा में एक अहम कदम माना था।

अमेरिका ने इनकार किया, अब ब्रिटेन सऊदी की मदद करेगा:टाइफून विमान भेजने का ऐलान, हूती विद्रोहियों के हमले से रक्षा करेगा

ब्रिटेन ने अपने टाइफून लड़ाकू विमान सऊदी अरब भेजने का ऐलान किया है। ये विमान हूती विद्रोहियों के ड्रोन और मिसाइल हमलों से सऊदी शहरों और तेल ठिकानों की रक्षा करेंगे। ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय ने मंगलवार को यह भी साफ कहा कि वे यमन में हूती ठिकानों पर हमला नहीं करेंगे। बीते 2 महीने से हूती और सऊदी के बीच संघर्ष शुरू हो गया है। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक सऊदी अरब ने हूती विद्रोहियों के खिलाफ सीधे अमेरिकी सैन्य हमले की मांग की थी, लेकिन ट्रम्प ने इससे इनकार कर दिया। अब ब्रिटेन सऊदी की मदद के लिए आगे आया है। 4 यूरोपीय देशों ने मिलकर बनाया टायफून विमान टाइफून केवल हमला करने वाला लड़ाकू विमान नहीं है। यह दुश्मन के विमानों को रोकने, हवाई क्षेत्र की सुरक्षा करने और जरूरत पड़ने पर जमीन पर हमला करने में सक्षम है। इसका रडार दूर से दूसरे विमानों का पता लगाने में मदद करता है। जरूरत पड़ने पर यह उनका पीछा कर सकता है और हवा में मिसाइल से उन्हें निशाना बना सकता है। इसे यूरोप के चार देशों- ब्रिटेन, जर्मनी, इटली और स्पेन के सहयोग से विकसित किया गया था। इसका निर्माण किसी एक देश का अकेला प्रोजेक्ट नहीं है। ब्रिटेन ने सऊदी की मदद का फैसला क्यों लिया? ब्रिटेन के रक्षा मंत्री वेस स्ट्रीटिंग ने कहा कि सऊदी अरब पर हूतियों के लगातार हमले बेहद निंदनीय हैं। खास तौर पर रियाद के एयरपोर्ट को निशाना बनाया जाना दिखाता है कि हूती क्षेत्र में तनाव बढ़ाने के लिए किस हद तक जा रहे हैं। उन्होंने कहा, इसी वजह से मैंने आज ब्रिटेन की ओर से और सैन्य मदद को मंजूरी दी है। रॉयल एयर फोर्स के टाइफून विमान ड्रोन और मिसाइलों से सऊदी हवाई क्षेत्र की रक्षा के लिए उड़ान भरेंगे। स्ट्रीटिंग ने कहा कि हूतियों के हमलों से पश्चिम एशिया में स्थिरता को खतरा है। इससे ऊर्जा आपूर्ति और व्यापारिक रास्ते भी प्रभावित हो सकते हैं। इसका असर ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। पहले भी मदद दे चुका है ब्रिटेन सऊदी अरब सरकार के अनुरोध पर ब्रिटेन सितंबर में भी सैन्य सहायता देने पर सहमत हुआ था। हालांकि तब उसने रॉयल एयर फोर्स का वॉयेजर विमान देने की घोषणा की थी। इस विमान का इस्तेमाल हवा में दूसरे विमानों में ईंधन भरने के लिए किया जाता है। अब ब्रिटेन टायफून के अलावा एटलस A400M परिवहन विमान और सैन्य सलाहकार भी भेजेगा। परिवहन विमान का इस्तेमाल सऊदी अरब के भीतर सैन्य उपकरण पहुंचाने के लिए किया जाएगा। ब्रिटिश सैन्य सलाहकार सऊदी अधिकारियों की मदद करेंगे। ट्रम्प सरकार ने हूती विद्रोहियों से सीक्रेट डील की 16 सितंबर की एक्सिओस की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका ने यमन के हूती विद्रोहियों के साथ सीक्रेट डील की है। इस डील के तहत हूतियों ने अमेरिका को भरोसा दिया है कि वे लाल सागर में अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय जहाजों को निशाना नहीं बनाएंगे। यह डील पिछले महीने ओमान की राजधानी मस्कट के अमेरिकी दूतावास में हुई थी। इसमें हूती प्रतिनिधियों ने भरोसा दिया था कि वे सऊदी अरब के अलावा दूसरे जहाजों को बाब-अल-मंदेब से गुजरने देंगे। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी कहा था कि अमेरिका हूतियों के साथ सीधे बातचीत कर रहा है। हालांकि, किसी औपचारिक गुप्त समझौते की सार्वजनिक पुष्टि नहीं हुई थी। पाकिस्तान ने भी सऊदी की मदद से इनकार किया यरुशलम पोस्ट की पिछले महीने की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी ने मक्का डिफेंस अलायंस के साथी पाकिस्तान से मदद मांगी थी। लेकिन पाकिस्तान ने यमन में लड़ने के लिए अपनी सेना या सैन्य संसाधन भेजने से इनकार कर दिया है। पाकिस्तान ने कहा कि उसकी सेना सऊदी अरब की जमीन की रक्षा के लिए तैनात की जा सकती है, लेकिन वह किसी दूसरे देश की जमीन पर युद्ध में शामिल नहीं होगी। ‘एक पर हमला, मतलब तीनों पर हमला।’ इसी सिद्धांत के साथ पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने 7 अगस्त को ‘मक्का जॉइंट डिफेंस पैक्ट’ पर साइन किया था। तीनों देशों के बीच इस समझौते को कई जानकारों ने ‘मुस्लिम नाटो’ की दिशा में एक अहम कदम माना था। ———————–
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सऊदी अरब हूतियों को क्यों नहीं हरा पा रहा:अमेरिकी इंटेलिजेंस और एडवांस हथियार भी बेअसर
सऊदी अरब के पास दुनिया के सबसे आधुनिक हथियारों में शामिल लड़ाकू विमान और मिसाइलें हैं। अमेरिका भी उसे हथियार और खुफिया जानकारी देकर मदद करता रहा है। इसके बावजूद सऊदी अरब यमन के हूती विद्रोहियों को हरा नहीं पाया। पूरी खबर यहां पढ़ें…

Mohan Bhagwat: ‘सिर्फ सत्ता बदलने से समस्याएं खत्म नहीं होतीं’, फ्रांस-बांग्लादेश के हालात का जिक्र कर बोले मोहन भागवत

Mohan Bhagwat: देश में हाल के दिनों में हो रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने मंगलवार को कहा कि “भारत को कमजोर करने” की कोशिशें की जा रही हैं। उन्होंने कहा कि इन कोशिशों को “कुछ ऐसे तत्वों का समर्थन मिल रहा है, जो अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं से प्रेरित हैं।”

RSS के विजयादशमी समारोह में, फ्रांस, अल्बानिया, बांग्लादेश और नेपाल में चल रही अशांति की ओर इशारा करते हुए RSS प्रमुख मोहन भागवत ने कहा, “कुछ पश्चिमी ताकतें समाजों को अस्थिर करने की कोशिश कर रही हैं। फ्रांस और अल्बानिया में जो हो रहा है, उसे देखिए; साथ ही बांग्लादेश और नेपाल के घटनाक्रमों पर भी नजर डालिए। बाहरी प्रभाव इस तरह की अशांति को बढ़ावा दे रहे हैं, जिसमें सत्ता परिवर्तन की बातें भी शामिल हैं। लेकिन, केवल सत्ता परिवर्तन से किसी देश की समस्याएं हल नहीं हो जातीं।”

भागवत ने आगे कहा, “भारत और संघ को कमजोर करने की कोशिशें की जा रही हैं। पिछले एक दशक में, भारत ने अनुशासित तरीके से प्रगति की है, और कुछ ऐसी ताकतें हैं जो इस प्रगति में बाधा डालना चाहती हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी कोशिशों को कुछ ऐसे तत्वों का साथ मिल रहा है, जो अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं से प्रेरित हैं।”

भागवत ने आरोप लगाया कि दुनिया भर में इस तरह की गतिविधियां चलाई जाती हैं, ताकि अपने स्वार्थ साधने वाले लोग और उनके “मोहरे” अपना दबदबा बनाए रखें। उन्होंने कहा कि भारत की तरक्की इन कोशिशों के आड़े आती है।

उन्होंने कहा कि “असली समस्या यह है कि समाज को इन चुनौतियों को समझने की जरूरत है। लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन एक अहम हिस्सा हैं, लेकिन विरोध का मकसद समस्याओं का समाधान खोजना होना चाहिए, न कि समाज में और ज्यादा बंटवारा पैदा करना।”

बता दें कि RSS प्रमुख की यह टिप्पणी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेंद्र कुमार की नियुक्ति में कथित अनियमितताओं को लेकर चल रहे विरोध-प्रदर्शनों के बीच आई है।

भागवत ने की युवाओं की तारीफ

अपने संबोधन के दौरान भागवत ने देश और दुनिया के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित करने का श्रेय भारत की युवा पीढ़ी को दिया। उन्होंने कहा कि समाज के भीतर हुए इस प्रयास ने इन ताकतों के कथित मंसूबों को नाकाम कर दिया है।

एक विकासशील देश में विरोध-प्रदर्शनों और आंदोलनों के बारे में बात करते हुए, RSS प्रमुख ने कहा कि समस्याएं बनी रहेंगी क्योंकि भारत अभी पूरी तरह से विकसित नहीं हुआ है। उन्होंने कहा, “अगर समस्याएं हैं, तो आंदोलन भी होंगे। लोकतंत्र में आंदोलन तो होंगे ही।”

मोहन भागवत ने हाल ही में हुई ‘फ्लाईदुबई’ (Flydubai) घटना का भी जिक्र किया, उन्होंने कहा, “RSS हिंदू चेतना को जगाने और पूरे समाज को एक सुसंगठित और मजबूत समाज के रूप में ढालने का काम कर रहा है… इन्हीं मूल्यों ने कैप्टन स्मित मच्छार को वह करने के लिए प्रेरित किया, जो उन्होंने किया…”

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Food Safety : बिस्किट में भरा भूसा, दूध में डिटर्जेंट और यूरिया, उपभोक्ता अपने सेहत की कैसे करें सुरक्षा !

Food Safety : दूध और डेयरी प्रोडक्ट में डिटर्जेंट और यूरिया, घी में जानवर की चर्बी,लाल मिर्च पाउडर में लाल मिट्टी, धनिया पाउडर में लकड़ी का बुरादा, जीरा में घास के बीज और अब बिस्किट में जानवरों की खिलाने वाला भूसा!ये सब फूड रेगुलेटर के छापों पकड़ा गया और साबित हो चुका है, फिर भी भारत में मिलावट का खेल धड़ल्ले से जारी है आखिर क्यों? कैसे रुकेगा मिलावट का काला कारोबार? आज कंज्यूमर अड्डा में इसी पर बात की गई है।

सबसे पहले समझते हैं कि फसाई (FSSAI) के छापों में ताजा खुलासा क्या हुआ है। FSSAI ने कंज्यूर्स की शिकायत पर की जांच की तो पाया कि प्रिया गोल्ड बिस्किट में ‘फाइबर’ के सोर्स के रूप में जानवरों को खिलाने वाला चोकर का इस्तेमाल किया जा रहा था । जांच में मिली चोकर की बोरियों पर साफ लिखा था कि ये केवल मवेशियों के खाने के लिए है। इसके अलावा फूड प्रोसेसिंग प्लांट में साफ-सफाई और वेस्ट मैनेजमेंट के नियमों का भारी उल्लंघन भी पाया गया। FSSAI ने कंपनी का लाइसेंस निलंबित कर दिया है।

दूसरा मामला है दूध में डिटर्जेंट और कास्टिक सोडा मिलाने का। डोडला डेयरी (Dodla Dairy) के फुल क्रीम दूध के सैंपल स्टैंडर्ड टेस्टिंग में फेल हो गए। जब रेफरल लैब से जांच कराई गई तो दूध में डिटर्जेंट की पुष्टि हुई। इस दूध में फैट भी तय मात्रा से कम था और ये मानव शरीर के लिए असुरक्षित और हानिकारक घोषित किया गया।

तीसरा मामला है पीली किशमिश में जहरीला पेस्टिसाइड का। UEIR Organic Foods की पीली किशमिश के सैंपल में तय सीमा से ज्यादा कीटनाशक पाए गए। कंज्यूमर इस प्रोडक्ट को ‘ऑर्गेनिक’ और हेल्दी मानकर खा रहे हैं। जबकि इनमें मौजूद केमिकल अवशेष उल्टा सेहत को नुकसान पहुंचा रहे हैं। हां अब तक तो आप यह जान ही गए होंगे की फसाई (FSSAI) भारत का फूड रेग्यूलेटर है।

मिलावट के तरीके

दूध और डेयरी उत्पाद में डिटर्जेंट, यूरिया, स्टार्च मिलाया जाता है। वहीं, घी और मक्खन में वेजीटेबल तेल, चर्बी, स्टार्च मिलाया जाता है। हल्दी पाउडर में लेड क्रोमेट और मेटानिल येलो मिला जाता है। लाल मिर्च पाउडर में ईंट का चूरा और लाल मिट्टी मिलाई जाती है। धनिया पाउडर में लकड़ी का बुरादा, गोबर और भूसी मिलाई जाती है। काली मिर्च में पपीते के बीज मिला दिए जाते हैं। जीरा में घास के बीज और झाड़ू के तिनके मिला दिए जाते हैं। हींग में स्टार्च, गोंद और राल मिलाए जाते हैं। वहीं, सरसों के तेल में आर्जिमोन तेल और सस्ता पाम ऑयल मिला दिया जाता है। शहद में चीनी की चाशनी, राइस सिरप गुड़ का घोल मिलाया जाता है। वहीं, चीनी और गुड़ में चाक पाउडर और वॉशिंग सोडा मिला दिया जाता है। हरी सब्जियों में मैलाकाइट ग्रीन की मिलावट की जाती है। वहीं, फल पकाने के लिए कैल्शियम कार्बाइड या एथिलीन गैस का इस्तेमाल होता है।

मिलावट की सजा

मानक पूरे ना करने पर लाइसेंस रद्द या निलंबित किया जा सकता है। सब-स्टैंडर्ड खाद्य पदार्थ के लिए 5 लाख रुपए तक जुर्माना लगाया जा सकता है। गलत ब्रांडिंग/भ्रामक प्रचार के लिए 3-10 लाख रुपए तक जुर्माना लगाया जा सकता है। असुरक्षित भोजन पर 6 महीने तक जेल और 1 लाख रुपए तक जुर्माना लगाया जा सकता है। भोजन से चोट या बीमारी होने पर 1 साल जेल की जेल और 3 लाख जुर्माना हो सकता है। भोजन से गंभीर बीमारी होने पर 6 साल जेल और 5 लाख रुपए जुर्माना हो सकता है। भोजन से मृत्यु होने पर आजीवन कारावास और 10 लाख जुर्माना लगाया जा सकता है।

यहां दर्ज करें शिकायत 

FSSAI के Food Safety Connect ऐप पर और FSSAI के टोल-फ्री नंबर पर मिलावट की शिकायत दर्ज कराई जा सकती है।

खरीदारी के समय इन बातों पर ध्यान दें

पैकिंग पर FSSAI लाइसेंस नंबर होना चाहिए। एगमार्क (Agmark) / FSSAI लोगो होना चाहिए। अनचाही या असामान्य महक/स्वाद नहीं होना चाहिए। विश्वसनीय और सीलबंद पैकेट ही खरीदें।

 

 

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जनगणना के नए नियम पर विवाद क्यों

छह साल की देरी से हो रही जनगणना के लिए इसके नियमों में संशोधन किया गया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन आने वाले भारत के महापंजीयक कार्यालय ने जनगणना अधिनियम 1948 की धारा 18 की उपधारा एक के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए जनगणना नियम 1990 में कुछ और बदलाव करने के लिए निर्देश जारी किए हैं। इनमें प्रस्तावित बदलावों को लेकर कांग्रेस पार्टी ने आपत्ति दर्ज कराई है। कांग्रेस की आपत्तियों पर बात करने से पहले उन दो बदलावों को रेखांकित करने की आवश्यकता है, जो अपनी प्रकृति में बिल्कुल नई हैं। पहला, महापंजीयक कार्यालय ने पहली बार सरकारी स्कूलों व कार्यालयों के कर्मियों के साथ साथ निजी स्कूलों और ट्रस्टों के कर्मियों को भी जनगणना के काम में शामिल करने का प्रस्ताव किया है और दूसरा, किसी सामान्य नागरिक को भी बतौर वॉलंटियर इसमें शामिल करने का प्रस्ताव है। महापंजीयक कार्यालय की ओर से 16 अक्टूबर को जारी अधिसूचना के मुताबिक, ‘ऐसा कोई व्यक्ति, जिसे राज्य सरकार या संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन, प्रगणक के रूप में कर्तव्यों का निष्पादन करने के लिए उपयुक्त समझे’ उसे जनगणना के काम में लगाया जा सकता है।

कांग्रेस ने इस प्रस्ताव पर आपत्ति की है। कांग्रेस का कहना है कि राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के लोगों को जनगणना के काम में शामिल करने के लिए यह बदलाव किया जा रहा है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने दावा किया है कि इस साल 10 से 12 जुलाई को कर्नाटक के बेलगाम में आरएसएस के कार्यकर्ताओं का एक बड़ा प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया गया था, जिसका एकमात्र एजेंडा जनगणना 2027 था। उनका कनहा है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 26 मई 2026 को देश की बदलती डेमोग्राफी पर सुझाव देने के लिए एक उच्चस्तरीय कमेटी का गठन किया था। उस कमेटी में सभी सदस्य आरएसएस हैं और उसके सुझाव पर ही जनगणना के नियमों में बदलाव किया जा रहा है। कांग्रेस को आशंका है कि डेमोग्राफी पर बनी कमेटी और आरएसएस के लोगों को जनगणना में शामिल करके एसआईआर की तरह जनगणना के आंकड़ों में भी खतरनाक तरीके से हेरफेर किया जाएगा। हालांकि खतरनाक रूप से क्या हेराफेरी हो सकती है यह कांग्रेस ने नहीं बताया है। फिर भी कांग्रेस की आशंका को आधारहीन बता कर खारिज नहीं किया जा सकता है। लेकिन सवाल है कि क्या भारत में ऐसी एक व्यवस्था की आवश्यकता नहीं है, जहां वालंटियर्स यानी स्वैच्छिक कार्यकर्ताओं की मदद से जनगणना, मतदाता सूची के पुनरीक्षण, सामाजिक व आर्थिक सर्वेक्षण, नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे जैसे काम कराए जाएं?

ध्यान रहे दुनिया भर के देशों में ऐसी व्यवस्था है। पता नहीं कांग्रेस और दूसरी पार्टियों ने कभी इसका अध्ययन करने का प्रयास किया है या नहीं कि अमेरिका में लगभग पूरा चुनाव वालंटियर्स की देखरेख में होता है। वहां भारत के चुनाव आयोग जैसी कोई केंद्रीय संस्था नहीं है। राज्यों में अपनी अपनी संस्थाएं हैं। लेकिन उनमें भी बहुत लंबी चौड़ी वर्क फोर्स नहीं है और न चुनाव कराने के लिए स्कूलों के शिक्षक व सरकारी कर्मचारियों को बड़े पैमाने पर शामिल किया जाता है। थोड़े से सरकारी कर्मचारी और ढेर सारे वॉलंटियर मिल कर चुनाव कराते हैं। दशकों से ऐसे ही चुनाव होते हैं और डोनाल्ड ट्रंप के आने से पहले किसी ने चुनाव प्रक्रिया में गड़बड़ी के आरोप भी नहीं लगाए थे। भारत में इस तरह की व्यवस्था बनाने की बहुत आवश्यकता है।

भारत में आजादी के बाद से ही तदर्थ प्रक्रिया चल रही है। सरकारी कर्मचारियों को और उसमें भी सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को किसी भी तरह की ड्यूटी में लगा दिया जाता है। मतदाता सूची का ‘संक्षिप्त’ या ‘विशेष संक्षिप्त’ या ‘विशेष गहन’ पुनरीक्षण होना है तो सरकारी शिक्षक करेंगे, मतदान कराना है तो सरकारी शिक्षक कराएंगे, मतगणना करनी है तो सरकारी शिक्षक करेंगे, सामाजिक व आर्थिक सर्वे करना हो, नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे करना हो, पशुओं की गिनती करनी हो, टीकाकरण करना हो, कोरोना या बाढ़ जैसी कोई महामारी में राहत बांटना हो, सारे काम सरकारी शिक्षकों को करने होते हैं। कुछ दिन पहले ही एक शिक्षक ने सोशल मीडिया में तंज करते हुए कहा कि वह तो अच्छा है कि सरकार कृषि कार्य नहीं कराती है अन्यथा फसलों की बुवाई, कटाई भी सरकारी स्कूल के शिक्षक करते। सचमुच ऐसी ही स्थिति है। इसका सीधा असर शिक्षा व्यवस्था पर पड़ता है। अभी एसआईआर की प्रक्रिया चल रही है तो राजधानी दिल्ली जैसे राज्य में सैकड़ों स्कूल एक एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। सरकारी स्कूलों के शिक्षकों से ये सब काम कराने से साल के कई महीने तक पढ़ाई, लिखाई का काम लगभग पूरी तरह से ठप्प रहता है।

सरकार ने अब अनुदान प्राप्त और बिना अनुदान वाले निजी स्कूलों के शिक्षकों को भी इसमें शामिल करने का प्रस्ताव दिया है। इससे वहां भी सरकारी स्कूलों जैसे ही पढ़ाई प्रभावित होगी। ऐसा लग रहा है कि सरकार स्कूली शिक्षा को पूरी तरह से बरबाद करने का संकल्प किए हुए है। वैसे पिछले दिनों आरएसएस से जुड़े रहे एक युवा स्कॉलर के मुंह से सुनने को मिला कि स्कूली शिक्षा को लेकर ‘भाई साहेब’ लोग क्या सोच रहे हैं। एक ‘भाई साहेब’ ने उस युवा स्कॉलर से कहा था कि कॉलेज पहुंचने वाले युवा इतने आंदोलित इसलिए हो रहे हैं क्योंकि देश में आज भी बड़ी संख्या में अच्छे स्कूल चल रहे हैं, जहां से वे पढ़ कर आते हैं। कॉलेज और यूनिवर्सिटीज की पढ़ाई और प्रशासन की व्यवस्था तो पिछले कुछ बरसों में पूरी तरह से बिगाड़ दी गई है। लेकिन चूंकि वे अच्छे स्कूल से आते हैं तो बिगड़े हुई व्यवस्था वाले कॉलेजों में एडजस्ट होने में उनको दिक्कत होती है। सो, इसका उपाय यह है कि स्कूली शिक्षा को भी वैसे ही बरबाद कर दिया जाए जैसे कॉलेज और यूनिवर्सिटीज को किया गया है।

बहरहाल, अगर सरकार गंभीर है तो उसे कांग्रेस की आलोचना की परवाह नहीं करनी चाहिए और देश में ऐसे कामों के लिए वॉलंटियर्स का नेटवर्क तैयार करना चाहिए। इससे देश के युवाओं को सीजनल रोजगार भी मिलेगा और यह बड़ी वर्क फोर्स तैयार होगी। ध्यान रहे देश की आबादी डेढ़ सौ करोड़ है और यहां जनगणना और चुनाव से लेकर अलग अलग तरह के सर्वेक्षण का काम बहुत बड़े पैमाने पर होता है। इसके लिए पढ़े, लिखे बेरोजगार नौजवानों को अगर वालंटियर के तौर पर शामिल किया जाए तो यह योजना ग्रामीण रोजगार की मनरेगा जैसी योजना से बड़ी हो सकती है और इसमें ज्यादा लोगों को रोजगार मिल सकता है। इसके लिए बहुत गहन गंभीर प्रशिक्षण की आवश्यकता भी नहीं होती है। सरकार एक बार प्रशिक्षण की व्यवस्था करके वालंटियर्स की फौज तैयार कर सकती है। यह वर्क फोर्स सरकारी कामकाज तो करेगी ही साथ ही निजी कंपनियों, विज्ञापन एजेंसियों, चुनावी सर्वे करने वाली कंपनियों आदि के लिए भी उपलब्ध रहेगी।

इस मामले में कांग्रेस की आलोचना का कोई खास आधार नहीं है। अगर सरकारी शिक्षक ही जनगणना करेंगे तो क्या गारंटी है कि जयराम रमेश जिस हेरफेर की आशंका जता रहे हैं वह नहीं होगी? आखिर मतदाता सूची का काम तो सरकारी लोग ही कर रहे हैं तो क्या कांग्रेस को उस पर भरोसा है? जयराम रमेश को यह समझना चाहिए सरकारी और निजी शिक्षकों में भी संघ और भाजपा के प्रति रूझान रखने वाले लोग होंगे और कांग्रेस व विपक्ष को पसंद करने वाले भी होंगे। वैसे ही चुनाव कराने या जनगणना के लिए वॉलंटियर नियुक्त होंगे तो उसमें भी हर विचार और राजनीतिक रूझान वाले लोग होंगे। अगर पेशेवर तरीके से कामकाज का वातावरण बनता है, तकनीक का बेहतर इस्तेमाल होता है और निगरानी की ईमानदार व्यवस्था बनती है तो वॉलंटियर वाली व्यवस्था एक साथ भारत की कई समस्याओं का समाधान कर सकती है।

गले मिलने का दिखावा और जबकि असल ताकत?

trump and musk

भारत जैसी विश्व व्यवस्था चाहता है, वैसी खुद क्यों नहीं बनाता?…. किसी बड़े नेता तक पहुँच होने से यह पता नहीं चलता कि मुलाकात के बाद कौन-सी शर्तें कायम रहीं। असली परीक्षा तब होती है जब दोनों देशों के हित टकराते हैं। व्यक्तिगत कूटनीति तभी सार्थक होती है जब संस्थाएँ उस पहुँच को स्थायी राष्ट्रीय लाभ में बदल सकें। ऐसा नहीं होने पर गले मिलने की तस्वीर एक ऐसा विज्ञापन बन जाती है जिसके दावों को वास्तविक बातचीत और समझौतों ने अभी साबित नहीं किया है।

पश्चिमी देशों के बुद्धिजीवियों और रणनीतिक विशेषज्ञों की बैठकों में भारत की वैश्विक हैसियत पर अक्सर ऐसे चर्चा होती है, मानो दुनिया की सबसे बड़ी मेज पर उसके लिए कुर्सी रखी जानी बाकी हो। पश्चिम को भारत का महत्व स्वीकार करना चाहिए। उसकी रणनीतिक स्वायत्तता का सम्मान करना चाहिए। ऐसी शर्तें नहीं थोपनी चाहिए जिनसे एक अनिवार्य साझेदार नाराज हो जाए। मान लिया गया है कि दुनिया की बड़ी शक्तियों में भारत का शामिल होना तय है। बस यह फैसला होना बाकी है कि उसे कहाँ बैठाया जाएगा।

इस सोच में दम है। भारत का विशाल बाजार, उसकी भौगोलिक स्थिति, तकनीकी प्रतिभा और सैन्य शक्ति उसे अंतरराष्ट्रीय सौदेबाजी में पर्याप्त ताकत देते हैं। क्वाड के जरिए सहयोग, सेमीकंडक्टर क्षेत्र में निवेश और रक्षा उत्पादन में साझेदारी ऐसे साझा हित हैं जिन्हें कोई गंभीर सरकार नजरअंदाज नहीं कर सकती। पश्चिम के दोहरे मानदंडों पर भारत की आपत्तियाँ भी बेबुनियाद नहीं हैं। जो देश अपनी सुविधा के अनुसार कभी संप्रभुता का सम्मान करते हैं और कभी उसकी अनदेखी, उन्हें दूसरों को सिद्धांतों पर कायम रहने का उपदेश देने का कितना अधिकार है?

लेकिन किसी देश का अनिवार्य होना उसे दबाव से सुरक्षित नहीं बना देता। उसकी उपयोगिता सौदेबाजी में ताकत जरूर देती है, मगर यह गारंटी नहीं कि उस पर दबाव नहीं डाला जाएगा। कोई देश आपकी जरूरतों के कारण आपको गले भी लगा सकता है और आपकी कमजोरियों का फायदा उठाकर दबाव भी बना सकता है। निमंत्रण और शिकंजा, दोनों साथ आ सकते हैं।

यहीं भारत के बढ़ते वैश्विक महत्व की चमकदार कहानी भ्रामक हो जाती है। किसी ताकतवर देश के लिए उपयोगी होना और उस उपयोगिता की शर्तें स्वयं तय करने की ताकत रखना, दो अलग बातें हैं।

इस फर्क को समझने के लिए भारतीय रणनीतिकारों को विदेशों की ओर देखने की जरूरत नहीं है। अपने ही देश की कॉरपोरेट अर्थव्यवस्था में इसका उदाहरण मौजूद है।

मुंबई हवाई अड्डे का नियंत्रण जीवीके समूह से अदाणी समूह के हाथों में जाने की घटना को देखें। जीवीके के पास एक महत्वपूर्ण रणनीतिक संपत्ति थी। हवाई अड्डे के संचालन का अनुभव था। बड़े निवेशकों से संबंध थे। इसके बावजूद कर्ज, वित्तीय कठिनाइयों और जाँच एजेंसियों की कार्रवाइयों का सिलसिला उसके हवाई अड्डा कारोबार के आसपास बना। अंततः अदाणी समूह ने उसका नियंत्रण हासिल कर लिया।

बाद में जीवीके के उपाध्यक्ष ने इस बात से इनकार किया कि किसी दबाव के कारण हवाई अड्डा बेचना पड़ा। उनका यह खंडन भी घटनाक्रम का हिस्सा है। लेकिन उन परिस्थितियों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता जिनके कारण यह सौदा राजनीतिक विवाद का विषय बना। यहाँ मुद्दा सौदे को लेकर किसी एक विवादित दावे को सही या गलत ठहराना नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि किसी संपत्ति का मालिक होना कितना मायने रखता है, यदि उसे बनाए रखने के लिए जरूरी पूँजी, पहुँच या अनुमति किसी दूसरे के नियंत्रण में हो?

कंपनी की बैलेंस शीट पर अरबों की संपत्ति दिखाई दे सकती है, जबकि उसके पीछे छिपी निर्भरता नजर नहीं आती। कोई स्थापित कारोबारी तब तक सुरक्षित दिखाई देता है जब तक उसकी सुरक्षा की शर्तें नहीं बदलतीं।

संप्रभु देशों के सामने भी यही समस्या होती है। फर्क इतना है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इसके परिणाम कहीं अधिक खतरनाक हो सकते हैं। अमेरिका अपने बाजार, तकनीक, वित्तीय व्यवस्था और सुरक्षा संबंधों तक पहुँच के जरिए दूसरे देशों पर दबाव बना सकता है। जरूरी नहीं कि उसका नियंत्रण हर क्षेत्र में हो। दबाव प्रभावी बनाने के लिए इतना पर्याप्त है कि वह ऐसी किसी चीज तक पहुँच रोक सके जिसका विकल्प सामने वाला देश आसानी से नहीं खोज सकता।

भारत के पास भी सौदेबाजी के लिए पर्याप्त संसाधन हैं। मगर असली सवाल यह है कि भारत अपनी किसी महत्वपूर्ण जरूरत की आपूर्ति रुकने पर कितने समय तक टिक सकता है? और दूसरी तरफ, अमेरिका या कोई दूसरा साझेदार भारत से मिलने वाले लाभ के बिना कितने समय तक रह सकता है?

रणनीतिक स्वायत्तता की असली परीक्षा इसी असमान सहनशक्ति में होती है।

इसका अर्थ यह नहीं कि अंतरराष्ट्रीय संबंध किसी गणितीय समीकरण के अनुसार चलते हैं। सरकारें गलत आकलन करती हैं। गठबंधन बदलते हैं। घरेलू विरोध के कारण नेताओं की समझौता करने की क्षमता सीमित होती है। आर्थिक और सैन्य शक्ति के साथ विश्वसनीयता, जनमत और संस्थाओं के प्रति भरोसा भी परिणामों को प्रभावित करते हैं।

बड़ी शक्तियाँ अक्सर दूसरों से सहयोग के बदले उनके व्यवहार में बदलाव की माँग करती हैं। शर्तें लगाती हैं, जबकि अपने ऊपर वैसी ही निगरानी या जवाबदेही स्वीकार नहीं करतीं। उनका पाखंड उन शर्तों को समाप्त नहीं करता। उलटे, निर्भर देश के लिए उनकी कीमत और बढ़ा देता है। इसलिए भारत के सामने दो परस्पर जुड़े काम हैं। पहला, ऐसी क्षमता विकसित करना जिससे वह बाहरी दबाव का सामना कर सके। दूसरा, ऐसी विश्वसनीयता अर्जित करना जिससे दूसरे देश भी उसके साथ खड़े होने को तैयार हों।

इन दोनों का सीधा संबंध भारत की घरेलू शासन व्यवस्था से है। स्वतंत्र नियामक संस्थाएँ हों तो निवेश के लिए राजनीतिक पहुँच पर निर्भरता कम होती है। विश्वसनीय न्यायपालिका हो तो सत्ता के कृपापात्र समूहों से बाहर रहकर कारोबार खड़ा करने का जोखिम घटता है। खुली प्रतिस्पर्धा हो तो देश की उत्पादन क्षमता का आधार व्यापक बनता है। विश्वविद्यालयों में असहमति और स्वतंत्र विचार की गुंजाइश हो तो वह बौद्धिक स्वतंत्रता विकसित होती है जिसके बिना तकनीकी आत्मनिर्भरता संभव नहीं।

यही संस्थाएँ किसी शक्तिशाली साझेदार के शर्तें लगाने पर देश को अधिक विकल्प देती हैं। इनके कमजोर होने पर राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा कुछ कंपनियों, कुछ फैसलों और कुछ व्यक्तियों पर निर्भर होती चली जाती है। मगर नई दिल्ली में भारत की ताकत का सार्वजनिक प्रदर्शन अक्सर व्यक्तिगत कूटनीति के इर्दगिर्द घूमता दिखाई देता है।

प्रधानमंत्री का विदेशी नेताओं से गले मिलना इसकी सबसे पहचानी जाने वाली तस्वीर है। सामने खड़े नेता से आत्मीयता दिखाई जाती है और उस दृश्य को भारत की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा के प्रमाण के रूप में प्रसारित किया जाता है। गले मिलना आत्मीयता का संकेत हो सकता है। लेकिन उससे वह सब साबित नहीं होता जो तस्वीर देखकर नागरिकों को समझाया जाता है।

किसी बड़े नेता तक पहुँच होने से यह पता नहीं चलता कि मुलाकात के बाद कौन-सी शर्तें कायम रहीं। असली परीक्षा तब होती है जब दोनों देशों के हित टकराते हैं। भारत किस बात से इनकार कर सकता है? क्या हासिल कर सकता है? और मतभेद होने पर संबंध कितना दबाव सह सकता है?

व्यक्तिगत कूटनीति तभी सार्थक होती है जब संस्थाएँ उस पहुँच को स्थायी राष्ट्रीय लाभ में बदल सकें। ऐसा नहीं होने पर गले मिलने की तस्वीर एक ऐसा विज्ञापन बन जाती है जिसके दावों को वास्तविक बातचीत और समझौतों ने अभी साबित नहीं किया है।

भारत की विदेश नीति के प्रचार और वास्तविक आचरण के बीच यह अंतर केवल व्यक्तिगत कूटनीति तक सीमित नहीं है। एक अधिक न्यायपूर्ण विश्व व्यवस्था की भारत की माँग में भी यही सवाल उठता है।

नई दिल्ली का विरोध सही है जब शक्तिशाली देश नियमों को अपनी सुविधा के अनुसार मोड़ते हैं, असहमति जताने वालों को दंडित करते हैं या विशेषाधिकार अपने लिए सुरक्षित रखते हैं। लेकिन जब ऐसे ही सवाल भारत के भीतर उठते हैं तो उसकी दलील का नैतिक वजन कम होने लगता है। मतदाता सूचियों को लेकर विवाद, विपक्षी नेताओं के विरुद्ध जाँच एजेंसियों के चुनिंदा इस्तेमाल के आरोप, निवारक हिरासत और विरोध प्रदर्शनों पर प्रतिबंध जैसे सवाल लोकतांत्रिक विश्वसनीयता से जुड़े हैं। इंटरनेट बंद करने की कार्रवाइयों का लोगों की आजीविका और आवश्यक सेवाओं तक पहुँच पर पड़ने वाला नुकसान भी दस्तावेजों में दर्ज है।

इन सवालों का उत्तर संप्रभुता का हवाला देकर नहीं दिया जा सकता। संप्रभुता तो यह तय करती है कि इनके जवाब देने की जिम्मेदारी किसकी है। ऐसा नहीं कि दूसरे देशों की आलोचना करने से पहले भारत को हर मामले में आदर्श बनना होगा। भारतीय नागरिकों के अधिकारों की परीक्षा लेने का अधिकार वाशिंगटन को नहीं है। लेकिन जो सरकार दुनिया से कहती है कि साझा शक्ति और न्यायपूर्ण व्यवस्था के उसके दृष्टिकोण पर भरोसा किया जाए, उसे यह भी स्वीकार करना होगा कि अपने देश में उसे सौंपी गई सत्ता का इस्तेमाल कैसे होता है, इसकी पड़ताल होगी।

यही कसौटी व्यापार नीति पर भी लागू होती है।

भारत के पास कमजोर आजीविकाओं की रक्षा करने और अपनी औद्योगिक क्षमता विकसित करने के उचित कारण हैं। इन उद्देश्यों के पक्ष में ठोस तर्क दिए जा सकते हैं। लेकिन इनके नाम पर हर व्यापारिक बाधा को जायज नहीं ठहराया जा सकता, जबकि दूसरे देशों की ऐसी ही पाबंदियों को मुक्त और निष्पक्ष व्यापार के विरुद्ध बताया जाए।

एक न्यायसंगत व्यापार नीति को स्पष्ट करना चाहिए कि संरक्षण किसे दिया जा रहा है, उससे कौन-सी नई क्षमता विकसित होगी और कब संरक्षण पाने वाले उद्योगों को खुली प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। वरना रणनीतिक स्वायत्तता एक भव्य नाम बनकर रह जाएगी, जिसके पीछे राजनीतिक पहुँच रखने वाले कारोबारियों को प्रतिस्पर्धा से बचाने की व्यवस्था चलती रहेगी।

दुनिया में प्रभावशाली भूमिका निभाने का भारत का दावा मजबूत है। लेकिन उसकी वास्तविक उपलब्धि इस पर निर्भर करेगी कि देश की विशाल आबादी और संस्थाएँ मिलकर कितनी व्यापक उत्पादन क्षमता, प्रतिभा और स्वतंत्र शक्ति विकसित करती हैं।

जिस देश में कारोबारी स्थापित कंपनियों को चुनौती दे सकते हों, नागरिक अधिकारियों से सवाल कर सकते हों और संस्थाएँ सत्ता की नाराजगी सह सकती हों, उसके पास कहीं अधिक ताकत होती है। उसकी तुलना में वह देश कमजोर स्थिति में होगा जहाँ अवसर और सफलता का रास्ता सत्ता तक विशेष पहुँच से होकर गुजरता हो।

ऐसी घरेलू शक्ति विकसित हो जाने से अमेरिका का दबाव, चीन की चुनौती या पश्चिम के दोहरे मानदंड समाप्त नहीं हो जाएँगे। लेकिन भारत के पास उनका सामना करने के अधिक विकल्प होंगे। साथ ही एक अलग विश्व व्यवस्था की उसकी माँग उन देशों को भी अधिक विश्वसनीय लगेगी जो स्वयं अपनी स्वतंत्रता और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ाना चाहते हैं।

भारत यह तय नहीं कर सकता कि उससे अधिक शक्तिशाली देश उसकी निर्भरताओं की परीक्षा लेंगे या नहीं। लेकिन वह यह जरूर तय कर सकता है कि उसकी अपनी घरेलू व्यवस्था उन निर्भरताओं को बढ़ाएगी या कम करेगी।

कैमरे हटते ही गले मिलना समाप्त हो जाता है। उसके बाद जो बचता है, वही असली ताकत है। भारत अपने बूते क्या बना सकता है, कितना दबाव सह सकता है और जिन नियमों पर दुनिया को चलने की सलाह देता है, उन पर स्वयं कितना भरोसा पैदा कर सकता है।

अल्बानिया में प्रदर्शनकारियों ने सुप्रीम कोर्ट के साथ क्या किया? जानिए ऐसा वहां क्या हुआ कि बवाल इस हद तक पहुंच गया

Albania Supreme Court Fire: भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और शिक्षा व्यवस्था की बदहाली से सुलग रहे अल्बानिया में अब गृहयुद्ध जैसे हालात हो गए है। राजधानी तिराना में पिछले कई दिनों से चल रहे सरकार विरोधी प्रदर्शन इतने हिंसक हो गए कि गुस्साई भीड़ ने सीधे देश के सुप्रीम कोर्ट के दफ्तरों को ही आग के हवाले कर दिया। आखिर क्यों भड़का है यूरोप के इस छोटे से देश में ऐसा जनसैलाब कि पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच जंग छिड़ गई है? आइए आपको बताते हैं इसकी असली वजह।

क्यों भड़का इतना बड़ा बवाल?

अल्बानिया में यह प्रदर्शन ‘फ्लेमिंगो’ नामक नागरिक और छात्र आंदोलन के बैनर तले हो रहा है। हाई स्कूल और यूनिवर्सिटी के छात्र सोशलिस्ट प्रधानमंत्री एडी रामा (Edi Rama) के इस्तीफे की मांग को लेकर लगातार सड़कों पर हैं।

यह पूरा विवाद तब और भड़क उठा जब सरकार ने एक ऐसे क्षेत्र में बड़े लक्जरी पर्यटन विकास की अनुमति दे दी, जो फ्लेमिंगो का प्राकृतिक आवास माना जाता है। इस प्रोजेक्ट के तार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दामाद जारेड कुशनर से जुड़े होने के कारण मामला और संवेदनशील हो गया।

भ्रष्टाचार, शिक्षा और महंगाई की मार

अल्बानिया के युवा देश में बढ़ती बेरोजगारी, चरम पर पहुंच चुके भ्रष्टाचार, और जर्जर होती सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था से निराश हैं। जनता का आरोप है कि सरकार आम नागरिकों की बुनियादी जरूरतों को नजरअंदाज कर रही है।

वैसे प्रधानमंत्री एडी रामा ने इन हिंसक प्रदर्शनों की कड़ी निंदा करते हुए कहा है कि प्रदर्शनकारियों को बाहरी तत्वों और वामपंथी उग्रवादी समूहों (एंटीफा) द्वारा वैचारिक रूप से कट्टर बनाया गया है।

लगातार छठे दिन भी जारी इस हिंसक संघर्ष ने अल्बानिया की सरकार के सामने गंभीर राजनीतिक संकट खड़ा कर दिया है, और सुरक्षा एजेंसियों के लिए इस जन-आक्रोश को संभालना बड़ी चुनौती बन गया है।

फ्रांस, इटली और स्पेन में भी भारी हिंसा और आगजनी

वैसे सिर्फ अल्बानिया ही नहीं है जो विरोध प्रदर्शनों की आग में झुलस रहा है। फ्रांस, इटली, स्पेन और पुर्तगाल की सड़कों पर भी जनसैलाब उमड़ पड़ा है, जिसने कई प्रमुख यूरोपीय शहरों को रणक्षेत्र में बदल दिया है।

फ्रांस में पिछले तीन हफ्तों से हाई स्कूल के छात्र शिक्षा संसाधनों की कमी के खिलाफ नाकाबंदी कर रहे थे, जो अब व्यापक महंगाई विरोधी आंदोलन बन चुका है। पेरिस, मार्सेली, ल्यों और लिमोगेस में भारी लूटपाट और हिंसा हुई। लिमोगेस में 19वीं सदी के सिटी हॉल में आग लगा दी गई।

राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने हिंसा की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि ‘जिन्होंने लूटपाट की है और गणतंत्र को गिराने की कोशिश की है, उन्हें जवाबदेह ठहराया जाएगा।’ अब तक 2,400 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है।

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस हिंसा के लिए प्रवासियों को जिम्मेदार ठहराते हुए लिखा, ‘माइग्रेंट्स ने फ्रांस पर कब्जा कर लिया है, उन्हें तुरंत सीमाएं बंद करनी चाहिए!’ वैसे फ्रांसीसी अधिकारियों ने इस हिंसा में प्रवासियों की भूमिका से इनकार किया है।

स्पेन की राजधानी मैड्रिड के ‘पुएर्ता डेल सोल’ स्क्वायर पर हफ्तों से सैकड़ों तंबू गड़े हुए हैं, जो घरों के आसमान छूते किरायों और बेदखली के खिलाफ विरोध जता रहे हैं। यह विरोध 87 वर्षीय मैरीकार्मेन की बेदखली के बाद अस्पताल में हुई मौत के बाद शुरू हुआ।

स्पेन में न्यूनतम वेतन 1,221 यूरो (~$1,370) है, जबकि 80 वर्ग मीटर के अपार्टमेंट का औसत किराया 1,130 यूरो (~$1,270) है। यानी युवा अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा केवल रहने पर खर्च कर रहे हैं। जनता के दबाव के कारण संसद में हाउसिंग बिल पास न होने पर प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज ने नवंबर में मध्यावधि चुनाव कराने की घोषणा की है।

इटली में महंगाई दर बढ़कर 4.2% पर पहुंच गई है। मिलान, ट्यूरिन और बोलोग्ना में हिंसक झड़पें हुईं। मिलान में पुलिस गाड़ियों पर वॉटर कैनन चलाए गए और 271 लोगों को गिरफ्तार किया गया जिनमें अधिकांश नाबालिग है। अब ’17 अक्टूबर आंदोलन’ ने हर शनिवार स्थायी प्रदर्शन का आह्वान किया है।

वहीं बाल्कन देश सर्बिया में पिछले दो सालों से भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन चला रहे छात्र आगामी चुनावों में पूर्व सत्तावादी नेता अलेक्जेंडर वुसिक की वापसी को चुनौती दे रहे हैं।

ट्रम्प मिडटर्म चुनाव हार सकते हैं:महंगाई और ईरान जंग से लोकप्रियता घटी, अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार दूरी बना रहे

अमेरिका में 3 नवंबर को होने वाले मिडटर्म चुनाव राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की पार्टी के लिए मुश्किल खड़ी कर सकते हैं। महंगाई, ईरान के साथ जंग और ट्रम्प की घटती लोकप्रियता के बीच रिपब्लिकन पार्टी के लिए कांग्रेस में अपना बहुमत बचाना चुनौती बन गया है। 10 प्रमुख जनमत सर्वेक्षणों में से सिर्फ 1 में रिपब्लिकन पार्टी आगे है। मिडटर्म चुनाव में राष्ट्रपति नहीं चुना जाता। इसमें अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस के दोनों सदनों- हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट की सीटों के लिए वोटिंग होती है। फिलहाल दोनों सदनों में रिपब्लिकन पार्टी को मामूली बहुमत है। अगर डेमोक्रेट्स जरूरी सीटें जीत लेते हैं, तो वे एक या दोनों सदनों में बहुमत हासिल कर सकते हैं। इससे ट्रम्प के लिए अपने एजेंडे को लागू करना मुश्किल हो सकता है। 1. ट्रम्प की लोकप्रियता में गिरावट, 30% तक रेटिंग पहुंची अमेरिका में ट्रम्प के कामकाज से खुश लोगों की संख्या घट रही है। अलग-अलग सर्वे में सिर्फ 30 से 36% लोग ही उनके काम से खुश हैं। NBC न्यूज के सर्वे में 34% लोगों ने ट्रम्प के कामकाज को सही बताया। वॉशिंगटन पोस्ट-ABC न्यूज के सर्वे में 33% और फॉक्स न्यूज के सर्वे में 36% लोगों ने उनका समर्थन किया। प्यू रिसर्च सेंटर के सर्वे में ट्रम्प को सबसे कम, यानी 30% लोगों का समर्थन मिला। ये ट्रम्प के पहले कार्यकाल से भी कम हैं। पहले कार्यकाल में ट्रम्प की अप्रूवल रेटिंग सबसे कम जनवरी 2021 में संसद में दंगाईयों के घुसने वाली घटना के बाद हुई थी। तब उनकी रेटिंग 34% पहुंच गई थी। 2. अमेरिकी जनता महंगाई से परेशान 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रम्प ने वादा किया था कि वे महंगाई कम करेंगे और लोगों का खर्च घटाएंगे। लेकिन अब बढ़ती कीमतें उनकी पार्टी के लिए परेशानी बन रही हैं। अमेरिका में अंडे, दूध, ब्रेड, मांस और सब्जियां जैसी बुनियादी चीजों के दाम 20% से 30% तक महंगे हो चुके हैं। घर का किराया औसतन 1.60 लाख रुपए पहुंच गया है जो अब तक सबसे ऊंचा स्तर है। तेल-गैस की कीमतों में करीब 20% का इजाफा हुआ है। हालांकि लोगों की तनख्वाह में थोड़ी बढ़ोतरी हुई है, लेकिन महंगाई की वजह से उन्हें इसका फायदा नहीं मिला। रॉयटर्स-इप्सोस के सर्वे में 78% लोगों ने कहा कि चीजों के दाम उनकी कमाई से ज्यादा तेजी से बढ़ रहे हैं। AP की रिपोर्ट के मुताबिक, 65% अमेरिकी मानते हैं कि महंगाई के लिए ट्रम्प की नीतियां जिम्मेदार हैं। राष्ट्रीय सर्वेक्षणों के मुताबिक लगभग 37% से अधिक अमेरिकी महंगाई और बढ़ती कीमतों को देश की सबसे बड़ी और गंभीर समस्या मानते हैं। ऐसे में महंगाई कम करना राष्ट्रपति ट्रम्प के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। 3. ईरान जंग से बढ़ी मुश्किल, विदेश नीति से भी नाराज लोग ईरान के साथ जंग ट्रम्प के लिए एक और परेशानी बन गई है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, जंग के कारण पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर दबाव बढ़ा है। इससे अमेरिकी लोगों का रोजमर्रा का खर्च बढ़ सकता है। NBC न्यूज के सर्वे में सिर्फ 29% लोगों ने ईरान जंग को संभालने के ट्रम्प के तरीके को सही माना। वहीं, फॉक्स न्यूज के सर्वे में 64% लोगों ने उनकी विदेश नीति को गलत बताया। हालांकि, ट्रम्प की अपनी पार्टी रिपब्लिकन के समर्थकों में उन्हें अब भी समर्थन मिल रहा है। AP के सर्वे में 69% रिपब्लिकन मतदाताओं ने उनकी विदेश नीति को सही माना। ईरान जंग का चुनाव पर कितना असर पड़ेगा, यह अभी साफ नहीं है। लेकिन अगर जंग के कारण पेट्रोल-डीजल महंगा होता है और लोग ट्रम्प की नीतियों से नाराज रहते हैं, तो इसका नुकसान उनकी रिपब्लिकन पार्टी को हो सकता है। 4. अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार ट्रम्प से दूरी बनाने लगे ट्रम्प की लोकप्रियता घटने का असर उनकी अपनी पार्टी पर भी दिख रहा है। रॉयटर्स की अक्टूबर में आई रिपोर्ट के मुताबिक, मुकाबले वाली 62 सीटों में से 41 सीटों पर रिपब्लिकन उम्मीदवार ट्रम्प की कुछ नीतियों से असहमति जता रहे हैं या उनसे दूरी बनाकर चल रहे हैं। ये उम्मीदवार ट्रम्प की सभी नीतियों का विरोध नहीं कर रहे। वे कुछ मुद्दों पर उनसे अलग राय रखकर उन लोगों का समर्थन हासिल करना चाहते हैं, जो किसी पार्टी के पक्के समर्थक नहीं हैं। इन उम्मीदवारों के सामने मुश्किल यह है कि ट्रम्प के करीब रहने पर उनकी गिरती लोकप्रियता का नुकसान उठाना पड़ सकता है। वहीं, उनसे ज्यादा दूरी बनाने पर ट्रम्प के वफादार समर्थक नाराज हो सकते हैं। संसद में बहुमत खोने पर ट्रम्प को क्या नुकसान होगा अगर डेमोक्रेटिक पार्टी कांग्रेस के एक या दोनों सदनों में बहुमत हासिल कर लेती है, तो ट्रम्प के लिए अपने फैसलों को लागू करना मुश्किल हो सकता है। कांग्रेस में बजट, सरकारी खर्च और नए कानूनों से जुड़े अहम फैसले लिए जाते हैं। ऐसे में डेमोक्रेट्स के पास बहुमत होने पर वे ट्रम्प के प्रस्तावों को रोक सकते हैं और उनके प्रशासन के कामकाज की जांच भी बढ़ा सकते हैं। हालांकि, रिपब्लिकन पार्टी के पास कुछ फायदे भी हैं। रॉयटर्स के मुताबिक, पार्टी के पास चुनाव प्रचार पर खर्च करने के लिए मजबूत संसाधन हैं। इसके अलावा, डेमोक्रेटिक पार्टी के कुछ उम्मीदवारों को लेकर मध्यमार्गी मतदाताओं की चिंता भी रिपब्लिकन के पक्ष में जा सकती है। ——————– ये खबर भी पढ़ें… ट्रम्प ने इजराइलियों से कहा- नेतन्याहू को दोबारा प्रधानमंत्री बनाएं:किसी और को चुना तो ईरान के खिलाफ अमेरिका को अकेले लड़ना पड़ेगा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इजराइल के लोगों से प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को दोबारा प्रधानमंत्री चुनने की अपील की है। उन्होंने कहा कि बीबी नेतन्याहू आपको कभी निराश नहीं करेंगे। पूरी खबर यहां पढ़ें…

Airtel के नए वॉइस-only रिचार्ज प्लान लॉन्च, ₹185 से शुरू; कॉलिंग और SMS के लिए नहीं मिलेगा डेटा

Airtel के नए वॉइस-only रिचार्ज प्लान लॉन्च, ₹185 से शुरू; कॉलिंग और SMS के लिए नहीं मिलेगा डेटा

टेलीकॉम कंपनी भारती एयरटेल ने भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) के नए नियमों के अनुरूप केवल वॉइस कॉलिंग और SMS वाले प्रीपेड रिचार्ज प्लान पेश किए हैं। कंपनी ऐसा करने वाली पहली टेलीकॉम ऑपरेटर बन गई है। इन प्लान में अनलिमिटेड कॉलिंग और SMS की सुविधा मिलेगी, लेकिन मोबाइल इंटरनेट डेटा शामिल नहीं होगा।

 

एयरटेल के नए प्लान ₹185, ₹203 और ₹206 की कीमत में उपलब्ध हैं। इन्हें कंपनी की वेबसाइट और मोबाइल ऐप पर सूचीबद्ध किया गया है। ये प्लान उन ग्राहकों के लिए उपयोगी हो सकते हैं जिन्हें मुख्य रूप से फोन कॉल और मैसेजिंग की जरूरत होती है।

 

Airtel के ₹185, ₹203 और ₹206 वाले प्लान में क्या मिलेगा?

 

एयरटेल के तीनों नए प्लान में लोकल, STD और रोमिंग कॉलिंग अनलिमिटेड है। साथ ही, प्रत्येक प्लान में 300 SMS मिलेंगे। इन रिचार्ज में मोबाइल डेटा नहीं दिया जाएगा।

 

 ₹185, ₹203 और ₹206 के रिचार्ज में क्या है अंतर?

 

₹185 का प्लान: यह तीनों विकल्पों में सबसे सस्ता है और इसकी वैधता 28 दिन है। जिन ग्राहकों को कम कीमत में कॉलिंग की सुविधा चाहिए, उनके लिए यह विकल्प उपयोगी हो सकता है।

 

₹203 का प्लान: इसकी वैधता 30 दिन है। ₹185 वाले प्लान की तुलना में ₹18 अधिक खर्च करके दो दिन की अतिरिक्त वैधता मिलती है।

 

₹206 का प्लान: यह एक कैलेंडर महीने के लिए वैध है। इसका मतलब है कि इसकी वैधता निश्चित रूप से 30 दिन की नहीं होती, बल्कि हर महीने उसी तारीख के आधार पर नवीनीकृत होती है।

 

रिचार्ज चुनते समय सिर्फ कीमत ही नहीं, बल्कि वैधता और अपनी जरूरतों को भी देखना जरूरी है।

 

किन ग्राहकों के लिए उपयोगी हैं ये वॉइस-only प्लान?

 

एयरटेल के ये रिचार्ज खास तौर पर उन ग्राहकों के काम आ सकते हैं जिन्हें मोबाइल डेटा की जरूरत कम पड़ती है। इनमें शामिल हैं:

 

फीचर फोन इस्तेमाल करने वाले ग्राहक: जिन्हें मुख्य रूप से कॉलिंग और SMS चाहिए।

 

दूसरा मोबाइल नंबर रखने वाले लोग : जो एक नंबर का इस्तेमाल केवल कॉल करने या प्राप्त करने के लिए करते हैं।

 

Wi-Fi पर निर्भर यूजर: जो घर या ऑफिस में Wi-Fi से इंटरनेट चलाते हैं और मोबाइल डेटा पैक नहीं चाहते।

 

कम खर्च में रिचार्ज चाहने वाले ग्राहक: जो लंबी वैधता वाले महंगे पैक के बजाय कम अवधि का रिचार्ज करना चाहते हैं।

 

ऐसे ग्राहकों के लिए डेटा वाले प्लान पर खर्च करना जरूरी नहीं हो सकता, खासकर तब जब वे मोबाइल इंटरनेट का इस्तेमाल बहुत कम करते हों।

 

TRAI के नए नियम के बाद आए वॉइस-only प्लान

 

एयरटेल के इन प्लान की शुरुआत TRAI के उस निर्देश के बाद हुई है, जिसमें टेलीकॉम कंपनियों से केवल वॉइस कॉल और SMS की सुविधा वाले विशेष टैरिफ वाउचर उपलब्ध कराने को कहा गया था।

 

सितंबर में नियामक ने निर्देश दिया था कि कंपनियां डेटा सेवाओं को शामिल किए बिना केवल वॉइस कॉल और SMS वाले विशेष टैरिफ वाउचर पेश करें और उनके शुल्क में उचित कमी करें। TRAI के टेलीकॉम कंज्यूमर प्रोटेक्शन (तेरहवें संशोधन) विनियम, 2026 के तहत 30 दिन या उससे कम वैधता वाले ऐसे वाउचर उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया।

 

इसका उद्देश्य उन ग्राहकों को ऐसा रिचार्ज विकल्प देना है जिन्हें इंटरनेट डेटा की जरूरत नहीं है। हालांकि, ग्राहकों को रिचार्ज करने से पहले एयरटेल ऐप या वेबसाइट पर प्लान की मौजूदा कीमत, वैधता और सुविधाओं की पुष्टि कर लेनी चाहिए।