UN ने बदला दुनिया का नक्शा, अमेरिका ने विरोध किया:नए मैप में अफ्रीका बड़ा, यूरोप-US छोटे; 164 देशों ने पक्ष में वोट दिया

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने शुक्रवार को दुनिया के नक्शे को लेकर एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पास किया। इसमें पुराने मर्केटर वर्ल्ड मैप की जगह ऐसे नक्शे के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया गया है, जिसमें देशों और महाद्वीपों का आकार उनके असली क्षेत्रफल के ज्यादा करीब दिखाई देता है। नए नक्शे में अफ्रीका पहले से काफी बड़ा, जबकि यूरोप और उत्तरी अमेरिका छोटे नजर आएंगे। एशिया के कुछ हिस्सों का आकार भी तुलनात्मक रूप से छोटा दिखेगा। यह प्रस्ताव टोगो ने पेश किया था और इसे अफ्रीकी संघ (African Union) का समर्थन मिला। संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रस्ताव के पक्ष में 164 देशों ने वोट दिया, जबकि 6 देश वोटिंग से दूर रहे। अमेरिका अकेला देश था जिसने प्रस्ताव के खिलाफ वोट किया। अमेरिका ने प्रस्ताव का विरोध क्यों किया? अमेरिका ने इस पहल की कड़ी आलोचना की। अमेरिकी प्रतिनिधि यारिना फेरेन्सेविच ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र को दुनिया की असली समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए, न कि 16वीं सदी के नक्शे को बदलने जैसी बहस पर। उन्होंने इसे एक वैचारिक एजेंडा बताया और कहा कि ऐसी बहसों की वजह से संयुक्त राष्ट्र अपनी विश्वसनीयता खो रहा है। वहीं, अफ्रीकी संघ ने इस फैसले का स्वागत किया। उसने इसे दुनिया का नक्शा ज्यादा सटीक और बराबरी वाला बनाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया। मौजूदा नक्शे में आखिर दिक्कत क्या थी? दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले नक्शों में से एक मर्केटर नक्शा है। इसे यूरोपियन मैप मेकर जेरार्डस मर्केटर ने 1569 में बनाया था। इस नक्शे की एक बड़ी खासियत है कि यह समुद्र में रास्ता तय करने और जहाजों के नेविगेशन के लिए काफी उपयोगी है। लेकिन पूरी गोल धरती को सपाट नक्शे पर दिखाने की वजह से इसमें देशों और महाद्वीपों का आकार असल से अलग नजर आने लगता है। जैसे-जैसे कोई इलाका भूमध्य रेखा से दूर जाता है, वह नक्शे पर जरूरत से ज्यादा बड़ा दिखाई देने लगता है। यही वजह है कि उत्तरी और दक्षिणी हिस्सों के कई इलाके असल से काफी बड़े नजर आते हैं। ग्रीनलैंड इसका सबसे मशहूर उदाहरण है। मर्केटर नक्शे में ग्रीनलैंड दक्षिण अमेरिका के लगभग बराबर दिखाई देता है। लेकिन असल में दोनों के आकार में बहुत बड़ा अंतर है। ग्रीनलैंड का क्षेत्रफल करीब 22 लाख वर्ग किलोमीटर है। यह लगभग डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो के बराबर है। वहीं अफ्रीका का क्षेत्रफल करीब 3 करोड़ वर्ग किलोमीटर है। यानी अफ्रीका ग्रीनलैंड से करीब 14 गुना बड़ा है। फिर भी मर्केटर नक्शे को देखकर दोनों का आकार लगभग एक जैसा लग सकता है। यही वह फर्क है जिसे अब कम करने की कोशिश हो रही है। अफ्रीकी देश नक्शा बदलने की मांग क्यों कर रहे थे? अफ्रीकी देशों का कहना है कि बात सिर्फ नक्शे पर किसी देश या महाद्वीप के छोटा-बड़ा दिखने की नहीं है। दुनिया का नक्शा यह भी तय करता है कि हम अलग-अलग हिस्सों को किस नजर से देखते हैं। UN के सामने रखे गए प्रस्ताव में कहा गया था कि मर्केटर नक्शे में अफ्रीका का वास्तविक आकार काफी छोटा नजर आता है। लंबे समय तक ऐसी तस्वीर देखने से लोगों के मन में अफ्रीका के आकार और वैश्विक महत्व को लेकर गलत धारणा बन सकती है। प्रस्ताव में लैटिन अमेरिका और दक्षिण एशिया का भी जिक्र है। इसमें कहा गया है कि नक्शे में इन क्षेत्रों का छोटा नजर आना उनकी विकास जरूरतों, बुनियादी ढांचे और आर्थिक क्षमता को भी कम करके आंकने की धारणा बना सकता है। अफ्रीकी देश टोगो के विदेश मंत्री रॉबर्ट डुसे ने कहा कि नक्शे सिर्फ भूगोल समझने का साधन नहीं हैं, बल्कि वे शिक्षा और लोगों की सोच को भी प्रभावित करते हैं। न्यूजीलैंड भी पुराने नक्शे से परेशान था अफ्रीका अकेला ऐसा इलाका नहीं है जिसे पुराने नक्शे से शिकायत रही है। न्यूजीलैंड भी लंबे समय से दुनिया के नक्शे पर अपनी जगह को लेकर मजाक करता रहा है। 2018 में न्यूजीलैंड के एक पर्यटन विज्ञापन में तत्कालीन प्रधानमंत्री जैसिंडा आर्डर्न भी नजर आई थीं। इसमें मजाकिया अंदाज में दिखाया गया था कि दुनिया के कई नक्शों में न्यूजीलैंड जैसे गायब ही हो जाता है। दरअसल, मर्केटर नक्शे में न्यूजीलैंड नीचे दाईं ओर एकदम किनारे पर दिखाई देता है। कई बार नक्शे में वह पूरी तरह छूट भी जाता है। इक्वल अर्थ नक्शे के कुछ रूपों में ओशिनिया को केंद्र के करीब लाया जाता है। इससे ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों की स्थिति भी ज्यादा प्रमुख नजर आती है। क्या UN का फैसला सभी पर लागू होगा? नहीं। संयुक्त राष्ट्र महासभा का यह प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्य नहीं है। यानी यह देशों, स्कूलों, किताबों के प्रकाशकों या टेक कंपनियों को मर्केटर नक्शा हटाने के लिए मजबूर नहीं करता। लेकिन इससे नक्शे बनाने और पढ़ाने में ऐसे तरीकों को बढ़ावा मिल सकता है, जिनमें देशों और महाद्वीपों का वास्तविक क्षेत्रफल ज्यादा सही दिखाई दे। मर्केटर नक्शे को पूरी तरह खत्म करने की भी बात नहीं कही गई है। समुद्री और हवाई नेविगेशन में इसका इस्तेमाल जारी रह सकता है, क्योंकि इसमें दिशाओं को सही रखने की खासियत है। ———————– यह खबर भी पढ़ें… 80 साल बाद पहली बार महिला बन सकती UN चीफ:रेस में अभी 8 दावेदार, इनमें 5 महिलाएं; गुयाना की बिर्केट सबसे आगे UN के 80 साल के इतिहास में पहली बार कोई महिला महासचिव बन सकती है। फिलहाल इस रेस में कुल 8 दावेदार हैं। इनमें 5 महिलाएं हैं। पूरी खबर पढ़ें…

दुनिया का नक्शा बदलने की तैयारी, UN में आज वोटिंग:यूरोप-रूस-कनाडा का साइज छोटा होगा, अफ्रीका-दक्षिण अमेरिका को फायदा

बचपन से किताबों, टीवी और इंटरनेट पर हम दुनिया का जो नक्शा देखते आए हैं, उसमें कई देशों और महाद्वीपों का आकार असल से काफी अलग दिखता है। अब इसे बदलने की कोशिश हो रही है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा में शुक्रवार को इस प्रस्ताव पर वोटिंग होगी। इसमें ऐसा विश्व नक्शा अपनाने की बात है, जिसमें देशों और महाद्वीपों का आकार जमीन पर उनके असली आकार के करीब दिखे।

अगर यह प्रस्ताव पास होता है, तो दुनिया का नक्शा काफी बदल जाएगा। अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका बड़े दिखेंगे, जबकि ग्रीनलैंड, यूरोप और कनाडा मौजूदा नक्शे के मुकाबले छोटे नजर आएंगे।

इस बदलाव की मुहिम कुछ अफ्रीकी देशों ने शुरू की है। उनका कहना है कि मौजूदा नक्शे में अफ्रीका को उसके असली आकार से काफी छोटा दिखाया जाता रहा है। मौजूदा नक्शे में आखिर दिक्कत क्या है? दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले नक्शों में से एक मर्केटर नक्शा है। इसे यूरोपियन मैप मेकर जेरार्डस मर्केटर ने 1569 में बनाया था। इस नक्शे की एक बड़ी खासियत है कि यह समुद्र में रास्ता तय करने और जहाजों के नेविगेशन के लिए काफी उपयोगी है। लेकिन पूरी गोल धरती को सपाट नक्शे पर दिखाने की वजह से इसमें देशों और महाद्वीपों का आकार असल से अलग नजर आने लगता है। जैसे-जैसे कोई इलाका भूमध्य रेखा से दूर जाता है, वह नक्शे पर जरूरत से ज्यादा बड़ा दिखाई देने लगता है। यही वजह है कि उत्तरी और दक्षिणी हिस्सों के कई इलाके असल से काफी बड़े नजर आते हैं। ग्रीनलैंड इसका सबसे मशहूर उदाहरण है। मर्केटर नक्शे में ग्रीनलैंड दक्षिण अमेरिका के लगभग बराबर दिखाई देता है। लेकिन असल में दोनों के आकार में बहुत बड़ा अंतर है। ग्रीनलैंड का क्षेत्रफल करीब 22 लाख वर्ग किलोमीटर है। यह लगभग डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो के बराबर है। वहीं अफ्रीका का क्षेत्रफल करीब 3 करोड़ वर्ग किलोमीटर है। यानी अफ्रीका ग्रीनलैंड से करीब 14 गुना बड़ा है। फिर भी मर्केटर नक्शे को देखकर दोनों का आकार लगभग एक जैसा लग सकता है। यही वह फर्क है जिसे अब कम करने की कोशिश हो रही है। अफ्रीकी देशों को आखिर दिक्कत क्या है अफ्रीकी देशों का कहना है कि बात सिर्फ नक्शे पर किसी देश या महाद्वीप के छोटा-बड़ा दिखने की नहीं है। दुनिया का नक्शा यह भी तय करता है कि हम अलग-अलग हिस्सों को किस नजर से देखते हैं। UN के सामने रखे गए प्रस्ताव में कहा गया है कि मर्केटर नक्शे में अफ्रीका का वास्तविक आकार काफी छोटा नजर आता है। लंबे समय तक ऐसी तस्वीर देखने से लोगों के मन में अफ्रीका के आकार और वैश्विक महत्व को लेकर गलत धारणा बन सकती है। प्रस्ताव में लैटिन अमेरिका और दक्षिण एशिया का भी जिक्र है। इसमें कहा गया है कि नक्शे में इन क्षेत्रों का छोटा नजर आना उनकी विकास जरूरतों, बुनियादी ढांचे और आर्थिक क्षमता को भी कम करके आंकने की धारणा बना सकता है। अब दिखेगी दुनिया की ज्यादा सही तस्वीर UN के सामने रखे गए प्रस्ताव का नाम ‘करेक्ट द मैप’ है। इसे अफ्रीकी संघ के सदस्य देशों और बहामास ने मिलकर आगे बढ़ाया है। इसमें मर्केटर नक्शे की जगह ऐसे नक्शे इस्तेमाल करने की बात कही गई है, जिनमें दुनिया के अलग-अलग हिस्से उनके वास्तविक क्षेत्रफल के ज्यादा करीब दिखाई दें। इनमें ‘इक्वल अर्थ’ नक्शा खास है। इसे 2018 में पेश किया गया था। इसका मकसद दुनिया के देशों और महाद्वीपों का आकार इस तरह दिखाना है कि वह जमीन पर उनके असली क्षेत्रफल के ज्यादा करीब नजर आए। इस नक्शे में बदलाव पहली नजर में ही दिखाई देता है… यानी जमीन पर कुछ नहीं बदलता, सिर्फ उसे नक्शे पर दिखाने का तरीका बदल जाता है। न्यूजीलैंड भी पुराने नक्शे से परेशान अफ्रीका अकेला ऐसा इलाका नहीं है जिसे पुराने नक्शे से शिकायत रही है। न्यूजीलैंड भी लंबे समय से दुनिया के नक्शे पर अपनी जगह को लेकर मजाक करता रहा है। 2018 में न्यूजीलैंड के एक पर्यटन विज्ञापन में तत्कालीन प्रधानमंत्री जैसिंडा आर्डर्न भी नजर आई थीं। इसमें मजाकिया अंदाज में दिखाया गया था कि दुनिया के कई नक्शों में न्यूजीलैंड जैसे गायब ही हो जाता है। दरअसल, मर्केटर नक्शे में न्यूजीलैंड नीचे दाईं ओर एकदम किनारे पर दिखाई देता है। कई बार नक्शे में वह पूरी तरह छूट भी जाता है। इक्वल अर्थ नक्शे के कुछ रूपों में ओशिनिया को केंद्र के करीब लाया जाता है। इससे ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों की स्थिति भी ज्यादा प्रमुख नजर आती है। फ्रांस भी नए नक्शे के समर्थन में इस मुहिम को फ्रांस का भी समर्थन मिला है। फ्रांस के विदेश मंत्री जीन-नोएल बारो ने शुक्रवार को कहा कि उनका देश ऐसे नक्शों का इस्तेमाल करेगा, जिनमें देशों और महाद्वीपों का आकार जमीन पर उनके असली क्षेत्रफल के ज्यादा करीब दिखे। उन्होंने कहा कि मौजूदा नक्शे में अमेरिका, रूस और चीन जैसे देश अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और दक्षिण-पूर्व एशिया के मुकाबले ज्यादा बड़े और प्रमुख नजर आते हैं। बारो ने कहा कि नक्शे पर बार-बार दिखने वाला यह फर्क धीरे-धीरे लोगों की सोच पर भी असर डालता है। इसलिए अब दुनिया को नक्शे पर ज्यादा सही तरीके से दिखाने का समय आ गया है। अफ्रीका ने पहले खुद बदला नक्शा अफ्रीका सिर्फ यह शिकायत नहीं कर रहा कि उसे दुनिया के नक्शे पर छोटा दिखाया जाता है। उसने इसे बदलने की शुरुआत खुद कर दी है। अफ्रीकी संघ ने मार्च में इक्वल अर्थ नक्शे को अपनाने का फैसला किया। इसके बाद अप्रैल में टोगो ने अफ्रीकी संघ की ओर से संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों से भी ऐसे नक्शों को अपनाने की अपील की। यानी अब कोशिश सिर्फ अफ्रीका के नक्शे बदलने तक सीमित नहीं है। अफ्रीकी देश चाहते हैं कि दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाले नक्शों में भी महाद्वीपों का आकार ज्यादा सही दिखाई दे। जुलाई में संयुक्त राष्ट्र महासभा में इस मुद्दे पर शुरुआती बातचीत हुई और अब मामला वोटिंग तक पहुंच गया है। अफ्रीकी संघ की आयुक्त अम्मा ट्वुम-अमोआ ने मार्च में कहा था कि अफ्रीका को लंबे समय से नक्शों पर उसके असली आकार से छोटा दिखाया जाता रहा है। उनके मुताबिक, अब समय आ गया है कि दुनिया अफ्रीका को सिर्फ नक्शे पर नहीं, बल्कि उसके इतिहास, संस्कृति, अर्थव्यवस्था और वैश्विक भूमिका के हिसाब से भी देखे। गूगल मैप का भी नक्शा बदलेगा अब सवाल सिर्फ स्कूलों में टंगे नक्शों या किताबों में छपे मैप का नहीं है। दुनिया का नक्शा बदलने की यह बहस हमारे मोबाइल की स्क्रीन तक पहुंच सकती है। आज हम दुनिया को कागज से ज्यादा गूगल मैप्स जैसे डिजिटल मैप पर देखते हैं। इन प्लेटफॉर्म पर भी धरती को स्क्रीन पर दिखाने के लिए नक्शे के अलग-अलग प्रोजेक्शन का इस्तेमाल होता है। यही वजह है कि UN का प्रस्ताव टेक कंपनियों को भी इस बहस में शामिल करना चाहता है। प्रस्ताव में कंपनियों से कहा गया है कि वे ज्यादा सटीक प्रोजेक्शन अपनाने और इसके लिए UN के सदस्य देशों व क्षेत्रीय संगठनों के साथ मिलकर काम करने पर विचार करें। यानी अगर आने वाले समय में ज्यादा सटीक प्रोजेक्शन को व्यापक रूप से अपनाया जाता है, तो जिस दुनिया को हम फोन पर देखते हैं, उसका नक्शा भी बदल सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि UN का प्रस्ताव पास होते ही अगले दिन गूगल मैप्स खोलने पर पूरी दुनिया बदली हुई नजर आएगी। इसके बाद अलग-अलग टेक कंपनियों, देशों और संस्थानों को अपने स्तर पर फैसला लेना होगा। तो क्या सच में दुनिया का नक्शा बदल जाएगा? अगर संयुक्त राष्ट्र महासभा का प्रस्ताव पास हो जाता है, तो इसका मतलब यह नहीं होगा कि पूरी दुनिया में एक ही नया नक्शा इस्तेमाल करना अनिवार्य हो जाएगा। लेकिन इससे नक्शे बनाने और पढ़ाने में ऐसे तरीकों को बढ़ावा मिल सकता है, जिनमें देशों और महाद्वीपों का वास्तविक क्षेत्रफल ज्यादा सही दिखाई दे। दुनिया तो वही रहेगी। अफ्रीका, ग्रीनलैंड, यूरोप, दक्षिण अमेरिका और भारत अपनी जगह पर ही रहेंगे। फर्क सिर्फ इतना होगा कि नक्शे पर वे जैसे दिखते हैं, वह जमीन पर उनके असली आकार के ज्यादा करीब होगा।

Physicswallah में है बहुत जान, बुल केस में दिख सकता है 82% तक उछाल; मोतीलाल ओसवाल बुलिश

एडटेक प्लेटफॉर्म फिजिक्सवाला के शेयर की कीमत आगे 82 प्रतिशत तक बढ़ने की उम्मीद है। ब्रोकरेज फर्म मोतीलाल ओसवाल ने शेयर के लिए ‘बाय’ रेटिंग के साथ कवरेज शुरू किया है। टारगेट प्राइस 200 रुपये प्रति शेयर रखा है। यह पिछली क्लोजिंग से 66 प्रतिशत ज्यादा है। बुल केस में टारगेट प्राइस 220 रुपये है, जो शेयर के पिछले बंद भाव से करीब 82.5 प्रतिशत ज्यादा है। ब्रोकरेज का व्यू सामने आने के बाद फिजिक्सवाला के शेयर में 4 सितंबर को दिन में 8.5 प्रतिशत तक की बढ़त दिखी। बीएसई पर शेयर 130.85 रुपये के हाई तक गया।

ब्रोकरेज का कहना है कि फिजिक्सवाला भारत के सबसे बड़े एजुकेशन प्लेटफॉर्म्स में से एक है। इसे भारतीय एडटेक में सबसे ज्यादा कैपिटल-एफिशिएंट (पूंजी के लिहाज से कुशल) बिजनेस मॉडल में से एक पर बनाया गया है। कंपनी ने YouTube के जरिए एक बड़ा ‘फ्री-टू-पेड’ फनल बनाया है। इससे वह कम लागत पर स्टूडेंट्स को जोड़ पाती है और ऑनलाइन, हाइब्रिड और ऑफलाइन ऑफरिंग्स के जरिए उनसे कमाई कर पाती है। मोतीलाल ओसवाल के मुताबिक, अभी कंपनी के पास भारत की सबसे बड़ी एजुकेशन कम्युनिटीज में से एक है। इसके 10 करोड़ से ज्यादा YouTube सब्सक्राइबर हैं। फिजिक्सवाला ने वित्त वर्ष 2023-2026 के दौरान रेवेन्यू में 74% की कंपाउंडेड ग्रोथ हासिल की है।

ब्रोकरेज ने कहा कि फिजिक्सवाला का ऑनलाइन बिजनेस ही इसकी वैल्यू का मुख्य आधार है। अनुमान है कि पेड-यूजर ग्रोथ, कैटेगरी के विस्तार और AI-बेस्ड मॉनेटाइजेशन की मदद से कंपनी का ऑनलाइन रेवेन्यू FY26-30 के दौरान 28% CAGR (कंपाउंडेड एनुअल ग्रोथ रेट) से बढ़ेगा। कंपनी का ऑफलाइन बिजनेस, ऑनलाइन बिजनेस के मुकाबले प्रति यूजर ज्यादा औसत रेवेन्यू (ARPU) वाली मॉनेटाइजेशन लेयर उपलब्ध कराता है। ब्रोकरेज को उम्मीद है कि FY26-30 के दौरान ऑफलाइन रेवेन्यू 20% CAGR से बढ़ेगा और मुनाफे में भी सुधार होगा।

बुल केस

बुल केस सिनेरियो में, मोतीलाल ओसवाल ने फिजिक्सवाला के शेयर के लिए टारगेट प्राइस ₹220 प्रति शेयर दिया है। इस मामले में ब्रोकरेज का मानना है कि कंपनी का ऑनलाइन रेवेन्यू FY26-37 के दौरान 22% CAGR से बढ़ सकता है। इसकी वजह है ऐसे मार्केट में लगातार मार्केट शेयर बढ़ना, जहां अभी बहुत कम पहुंच है। Physicswallah प्लेटफॉर्म 48.7 लाख स्टूडेंट्स को सर्विस देता है। ब्रोकरेज ने कहा कि ऑनलाइन ग्रोथ, वॉल्यूम और प्राइसिंग दोनों से बढ़ेगी। FY26-37 के दौरान यूनीक ट्रांजेक्शन करने वाले यूजर्स के मामले में 14% की CAGR दिखेगी। प्रति यूजर औसत लागत (ACPU) में 7% की CAGR दिखेगी। सेंटर्स के ज्यादा इस्तेमाल और नेटवर्क के लगातार विस्तार से ऑफलाइन रेवेन्यू FY26-37 के दौरान 17.5% की CAGR से बढ़ेगा।

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बेयर केस

बेयर केस सिनेरियो में मोतीलाल ओसवाल ने ₹110 प्रति शेयर का टारगेट प्राइस दिया है। यह शेयर की पिछली क्लोजिंग से 9% कम है। ब्रोकरेज ने कहा कि इस सिनेरियो में फिजिक्सवाला का ऑनलाइन रेवेन्यू FY26-37 के दौरान 16.7% CAGR से बढ़ेगा। रेवेन्यू पर डिजिटल-फर्स्ट एडटेक प्लेयर्स, ऑफलाइन इंस्टीट्यूट्स और AI-बेस्ड पर्सनलाइज्ड लर्निंग से कॉम्पिटिशन का असर पड़ेगा। बेयर केस सिनेरियो में FY26-37 के दौरान कंपनी का ऑफलाइन रेवेन्यू 15.7% CAGR से बढ़ने की संभावना है।

Physicswallah के लिए मुख्य जोखिम

  • कॉम्पिटिशन बढ़ना
  • ऑफलाइन कामकाज और सेंटर्स के इस्तेमाल में कमजोरी
  • फैकल्टी के ज्यादा संख्या में नौकरी छोड़ने से छात्रों के नतीजों और ब्रांड की इमेज पर असर
  • कोचिंग संस्थानों, विज्ञापन या डेटा प्राइवेसी से जुड़े नियमों में प्रतिकूल बदलाव

शेयर 6 महीनों में 60 प्रतिशत मजबूत

Physicswallah के शेयर को फिलहाल 8 एनालिस्ट कवर कर रहे हैं। इनमें से 7 ने “बाय” की सलाह दी है। एक ने “होल्ड” रेटिंग दी है। कंपनी की शुरुआत 2016 में एक YouTube चैनल के तौर पर हुई थी। शेयर की फेस वैल्यू 1 रुपये है। कंपनी नवंबर 2025 में लिस्ट हुई थी। IPO 3480 करोड़ रुपये का था। शेयर 6 महीनों में 60 प्रतिशत और 3 महीनों में 20 प्रतिशत चढ़ा है। कंपनी की सालाना आम बैठक 25 सितंंबर 2026 को होने वाली है।

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SBI PO 2026 Mains Admit Card: स्टेट बैंक ने जारी किया पीओ मेन्स परीक्षा का एडमिट कार्ड, 12 सितंबर को होगी परीक्षा

SBI PO 2026 Mains Admit Card: भारतीय स्टेट बैंक (SBI) ने प्रोबेशनरी अधिकारिक (PO) मुख्य एडमिट कार्ड 2026 जारी कर दिया है। यह परीक्षा 12 सितंबर, 2026, रविवार को आयोजित की जाएगी। परीक्षा में शामिल होने के योग्य उम्मीदवार एसबीआई पीओ मेन्स हॉल टिकट आधिकारिक वेबसाइट sbi.bank.in से डाउनलोड कर सकते हैं। इस परीक्षा में एसबीआई पीओ भर्ती 2026 प्रीलिमनरी परीक्षा में सफल घोषित उम्मीदवार हिस्सा ले सकेंगे।

एसबीआई पीओ भर्ती 2026 मुख्य परीक्षा के लिए शॉर्टलिस्ट उम्मीदवार लॉगिन विंडो में अपने लॉगिन क्रेडेंशियल जैसे रजिस्ट्रेशन नंबर या रोल नंबर और पासवर्ड/DOB डालकर अपना एडमिट कार्ड चेक और डाउनलोड कर सकते हैं। आवेदकों के अपने कॉल लेटर डाउनलोड करने के बाद, उन्हें गलतियों और गड़बड़ियों को चेक करने के लिए ठीक से देखना होगा। किसी भी गड़बड़ी के मामले में, कैंडिडेट्स को तुरंत एग्जाम कराने वाली बॉडी से संपर्क करना होगा और परीक्षा की तारीख से पहले उन्हें ठीक करवाना होगा। एसबीआई पीओ भर्ती 2026 परीक्षा विज्ञापन संख्या CRPD/PO/2026-27/09 के तहत कुल 1,500 वैकेंसी के लिए आयोजित की जा रही है।

ध्यान रखें, परीक्षार्थियों के लिए अपना हॉल टिकट परीक्षा केंद्र ले जाना अनिवार्य है। एडमिट कार्ड के साथ कैंडिडेट्स को अपना वैलिड फोटो ID प्रूफ भी साथ लाना होगा। इन दोनों के बिना उन्हें परीक्षा केंद्र में प्रवेश नहीं दिया जाएगा। यह परीक्षा में शामिल होने के लिए सबसे जरूरी डॉक्युमेंट होता है। इसमें परीक्षा के विवरण के साथ ही परीक्षा केंद्र का पूरा पता, आईडी और परीक्षा के लिए जरूरी निर्देश होते हैं। कैंडिडेट अपना एसबीआई पीओ भर्ती 2026 मुख्य परीक्षा एडमिट कार्ड 12 सितंबर तक डाउनलोड कर सकते हैं।

एसबीआई पीओ भर्ती 2026 मुख्य परीक्षा के दिन के लिए निर्देश

12 सितंबर को होने वाले एसबीआई पीओ भर्ती 2026 मुख्य परीक्षा में शामिल होने वाले सभी उम्मीदवारों को परीक्षा प्रक्रिया आसान बनाने के लिए नीचे दी गई गाइडलाइंस को फॉलो करना होगा।

  • उम्मीदवारों को परीक्षा के दिन एडमिट कार्ड की हार्ड कॉपी ले जानी होगी। डिजिटल/सॉफ्ट कॉपी की इजाजत नहीं होगी।
  • एप्लिकेंट को यह पक्का करना होगा कि एडमिट कार्ड पर फोटो और सिग्नेचर साफ हों।
  • आखिरी मिनट में किसी भी तरह की परेशानी से बचने के लिए कैंडिडेट को एग्जाम सेंटर पर आधा घंटा पहले पहुंचना होगा।
  • एप्लिकेंट को एडमिट कार्ड के साथ अपना वैलिड ID प्रूफ भी साथ रखना होगा।

एसबीआई पीओ कॉल लेटर 2026: जरूरी डॉक्यूमेंट्स

एसबीआई पीओ मेन्स परीक्षा के दिन कैंडिडेट को एग्जाम सेंटर पर एडमिट कार्ड के साथ एक वैलिड ओरिजिनल ID प्रूफ भी ले जाना होगा। नीचे उन डॉक्यूमेंट्स की लिस्ट दी गई है जिन्हें एसबीआई पीओ 2026 परीक्षा में बैठने वाले एप्लीकेंट पहचान के सबूत के तौर पर इस्तेमाल कर सकते हैं:

  • वोटर ID कार्ड
  • PAN कार्ड
  • बैंक पासबुक
  • आधार कार्ड
  • ड्राइविंग लाइसेंस
  • राशन कार्ड

Railway Apprentice 2026: बिना लिखित परीक्षा के सदर्न रेलवे में भर्ती का मौका, 4400 से ज्यादा पदों पर भर्ती के लिए आवेदन शुरू

Bihar Teacher Recruitment 4.0: 21 सितंबर से शुरू होंगे बिहार टीआरई 4 के लिए आवेदन? सरकार ने बढ़ाए म्यूजिक टीचर के पद

Bihar Teacher Recruitment 4.0: बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) ने जल्द ही स्कूल शिक्षक भर्ती परीक्षा के चौथे चरण (TRE-4.0) की शुरुआत कर सकता है। आयोग ने मंगलवार शाम को बताया कि चौथे चरण की स्कूल शिक्षक भर्ती परीक्षा के लिए आवेदन 21 सितंबर से शुरू हो सकता है। बिहार टीआरई 4.0 के लिए आवेदन की शुरुआत एक औपचारिक संशोधित विज्ञापन जारी होने और ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया में जरूरी बदलावों के बाद हो सकता है।

यह अपडेट बीपीएससी के आधिकारिक एक्स हैंडल पर उपलब्ध था। ट्वीट में लिखा है, “एडवरटाइजमेंट नंबर-14/2026, चौथे फेज के स्कूल टीचर रिक्रूटमेंट एग्जामिनेशन (TRE-4.0) के तहत, स्कूल टीचर के पदों पर नियुक्ति के लिए आवेदन प्रक्रिया, संशोधित विज्ञापन और ऑनलाइन आवेदन में जरूरी बदलावों के बाद, तारीख-21.09.2026 से शुरू होने की संभावना है।”

बीपीएससी टीआरई भर्ती प्रक्रिया में अलग-अलग स्कूल स्तर पर 32388 टीचिंग पद शामिल होंगे। कुल वैकेंसी में से, क्लास 1 से 5 के लिए 3,847 पोस्ट, क्लास 6 से 8 के लिए 8,563, क्लास 9 और 10 के लिए 3,877, और क्लास 11 और 12 के लिए 16,101 पोस्ट तय की गई हैं।

राज्य भर के सरकारी स्कूलों में 32,388 टीचर पदों को भरने के उद्देश्य से बीपीएससी टीआरई 4.0 आयोजित करने की तैयारी कर रहा है। इससे पहले, 31 अगस्त को, बीपीएससी ने टीआरई 4.0 के लिए आवेदन प्रक्रिया को टालने का ऐलान किया था। जबकि आवेदन प्रक्रिया 1 सितंबर से शुरू होने वाला था।

आधिकारिक रिलीज में कहा गया था, “शिक्षा विभाग, बिहार के अंतर्गत 1 सितंबर से शुरू होने वाले चौथे चरण के स्कूल शिक्षक भर्ती परीक्षा (TRE-4.0) के तहत स्कूल शिक्षकों के कुल 32,388 खाली पदों पर नियुक्ति के लिए ऑनलाइन आवेदन प्रोसेस में बदलाव की वजह से टाल दिए गए हैं। इस विज्ञापन से जुड़ी तारीख की घोषणा जल्द ही की जाएगी।” शिक्षा के क्षेत्र में करियर बनाने के इच्छुक राज्य के ढेरों उम्मीदवार कई मुख्य मांगों को लेकर विरोध कर रहे थे। इसमें एग्जाम पैटर्न में बदलाव और नेगेटिव मार्किंग लागू करना शामिल था। विरोध कर रहे उम्मीदवारों से बातचीत के बाद, राज्य सरकार ने हाल ही में घोषणा की कि टीआरई 4.0 एक ही चरण में आयोजित किया जाएगा।

टीआरई 4.0 की वैकेंसी बढ़ाई गई

राज्य सरकार ने उम्मीदवारों की म्यूजिक टीचर के पदों की संख्या बढ़ाने की मांग के बाद, पदों की संख्या 111 बढ़ा दी।

IBPS RRB Recruitment 2026: 13000 से ज्यादा पदों पर भर्ती के लिए आईबीपीएस ने जारी किया नोटिफिकेशन, आधिकारिक वेबसाइट पर आवेदन शुरू

यूपीपीईटी-2026: अब अभ्यर्थी 7 सितंबर तक कर सकेंगे ऑनलाइन आवेदन

यूपीपीईटी-2026: अब अभ्यर्थी 7 सितंबर तक कर सकेंगे ऑनलाइन आवेदन

UP PET 2026: उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (यूपी एसएसएससी) ने प्रारम्भिक अर्हता परीक्षा-2026 (पीईटी-2026) के अभ्यर्थियों को बड़ी राहत दी है। आयोग ने पीईटी-2026 के लिए पंजीकरण, शुल्क जमा करने और ऑनलाइन आवेदन पत्र सबमिट करने की अंतिम तिथि 1 सितंबर से बढ़ाकर 7 सितंबर 2026 कर दी है। इस संबंध में आयोग की ओर से सूचना जारी कर दी गई है।

 

आयोग द्वारा जारी पत्र के अनुसार प्रारम्भिक अर्हता परीक्षा-2026 (पीईटी-2026) का विज्ञापन 1 अगस्त 2026 को प्रकाशित किया गया था। इसके तहत ऑनलाइन आवेदन की प्रक्रिया 3 अगस्त 2026 से शुरू हुई थी। पहले पंजीकरण, शुल्क जमा करने और ऑनलाइन आवेदन पत्र सबमिट करने की अंतिम तिथि 1 सितंबर 2026 निर्धारित की गई थी। अब आयोग ने अभ्यर्थियों को अतिरिक्त अवसर देते हुए इस अंतिम तिथि को 7 सितंबर 2026 तक विस्तारित कर दिया है।

7 सितंबर तक जमा कर सकेंगे शुल्क और आवेदन

नई व्यवस्था के अनुसार पीईटी-2026 में शामिल होने के इच्छुक अभ्यर्थी अब 7 सितंबर 2026 तक पंजीकरण कर सकते हैं, निर्धारित आवेदन शुल्क जमा कर सकते हैं और ऑनलाइन आवेदन पत्र सबमिट कर सकते हैं। इससे उन अभ्यर्थियों को राहत मिलेगी जो किसी कारणवश निर्धारित समय सीमा में आवेदन प्रक्रिया पूरी नहीं कर सके हैं। आवेदन की अंतिम तिथि बढ़ाए जाने के बाद अभ्यर्थियों को अपना आवेदन समय रहते पूरा करने का अतिरिक्त अवसर मिल गया है।

आवेदन में संशोधन की अंतिम तिथि 8 सितंबर

आयोग ने स्पष्ट किया है कि शुल्क समायोजन एवं आवेदन पत्र में संशोधन की अंतिम तिथि 8 सितंबर 2026 ही रहेगी। यानी अभ्यर्थियों को आवेदन सबमिट करने के बाद यदि निर्धारित प्रावधानों के तहत किसी प्रकार का संशोधन करना है तो उसके लिए 8 सितंबर तक का समय रहेगा। अभ्यर्थियों को सलाह दी गई है कि वे आवेदन की नई समय सीमा का ध्यान रखते हुए प्रक्रिया पूरी करें और अंतिम समय का इंतजार न करें।

 

आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि केवल पंजीकरण, शुल्क जमा करने और ऑनलाइन आवेदन पत्र सबमिट करने की अंतिम तिथि में बदलाव किया गया है। पीईटी-2026 के लिए आवेदन प्रक्रिया, आवेदन शुल्क, चयन का आधार, निर्धारित शर्तें एवं अन्य दिशा-निर्देश वही रहेंगे, जो आयोग द्वारा पूर्व में जारी विज्ञापन में प्रकाशित किए गए हैं। इसलिए अभ्यर्थियों को पीईटी-2026 के मूल विज्ञापन में दिए गए सभी नियमों और निर्देशों के अनुसार ही आवेदन प्रक्रिया पूरी करनी होगी।

Tempsens IPO Listing: 111% का लिस्टिंग गेन, पैसा डबल, ₹300 का शेयर ₹634 पर लिस्ट

Tempsens IPO Listing: आईपीओ को 184 गुना से अधिक बोली मिलने के बाद अब टेंपसेंस इंस्ट्रूमेंट्स के शेयरों की आज घरेलू मार्केट में धांसू एंट्री हुई और आईपीओ निवेशकों का पैसा डबल से ज्यादा हो गया। इसके आईपीओ के तहत निवेशकों को ₹300 के भाव पर शेयर जारी हुए हैं। आज BSE पर इसकी ₹634.00 और NSE पर ₹631.20 पर एंट्री हुई है यानी कि आईपीओ निवेशकों को करीब 111% का लिस्टिंग गेन (Tempsens Listing Gain) मिला। हालांकि आईपीओ निवेशकों की खुशी थोड़ी ही देर में हल्की फीकी हो गई जब शेयर टूट गए। मुनाफावसूली के चलते टूटकर BSE पर यह ₹600.10 (Tempsens Share Price)  पर आ गया यानी कि आईपीओ निवेशक अब 100.03% मुनाफे में हैं।

Tempsens IPO के पैसे कैसे होंगे खर्च

टेंपसेंस का ₹650 करोड़ का आईपीओ 20-24 अगस्त तक खुला था। इसे हर कैटेगरी के निवेशकों का जबरदस्त रिस्पांस मिला और ओवरऑल यह 184.22 गुना सब्सक्राइब हुआ था। इसमें क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल बायर्स (QIB) के लिए आरक्षित हिस्सा 302.88 गुना, नॉन-इंस्टीट्यूशनल इनवेस्टर्स (NII) का हिस्सा 314.44 गुना और खुदरा निवेशकों का हिस्सा 61.00 गुना और एंप्लॉयीज का हिस्सा 124.95 गुना भरा था।

इस आईपीओ के तहत ₹95 करोड़ के नए शेयर जारी हुए हैं। इसके अलावा ₹4 की फेस वैल्यू वाले 1.85 करोड़ शेयरों की ऑफर फॉर सेल विंडो के तहत बिक्री हुई है। ऑफर फॉर सेल का पैसा तो शेयर बेचने वाले शेयरहोल्डर्स को मिला है। वहीं नए शेयरों के जरिए जुटाए गए पैसों में से ₹18.13 करोड़ कर्ज हल्का करने कैपिटल एक्सपेंडिचर, ₹55.00 करोड़ कर्ज हल्का करने, ₹14.18 करोड़ आम कॉरपोरेट उद्देश्यों और ₹50.65 करोड़ आईपीओ से जुड़े एक्सपेंसेज पर खर्च होंगे।

Tempsens Instruments के बारे में

टेंपसेंस इंस्ट्रूमेंट्स फैक्ट्रियों और बड़ी इंडस्ट्रीज के लिए तापमान से जुड़े प्रोडक्ट्स बनाती है। यह तापमान नापने वाले सेंसर, मशीनों/प्रोसेस को गर्म करने वाले हीटर और खास तरह के इंडस्ट्रियल केबल बनाती है। मार्च 2026 में टेंपरेचर सेंसर सेगमेंट में इसकी करीब 10.5% हिस्सेदारी है। रेवेन्यू के हिसाब से यह देश में कॉन्टैक्ट और नॉन-कॉन्टैक्ट टेंपरेचर सेंसर बनाने वाली सबसे बड़ी कंपनी है तो इलेक्ट्रिकल हीटर्स के मामले में सबसे बड़ी कंपनियों में शुमार है। यह MRO (मेटेंनेंस, रिपेयर एंड ऑपरेशंस) का भी काम देखती है। इसका कारोबार भारत के अलावा 80 से अधिक देशों में फैला हुआ है।

कंपनी के वित्तीय सेहत की बात करें तो यह लगातार मजबूत हो रही है। वित्त वर्ष 2024-26 में इसका शुद्ध मुनाफा सालाना करीब 32% की रफ्तार यानी CAGR से बढ़कर ₹71.07 करोड़ और टोटल इनकम करीब 28% के सीएजीआर से ₹455.86 करोड़ पर पहुंच गया। मार्च 2026 तिमाही के आखिरी में कंपनी पर ₹77.95 करोड़ का टोटल कर्ज था जबकि रिजर्व और सरप्लस में ₹465.16 करोड़ पड़े थे।

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डिस्क्लेमर: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

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Fake Medicine

Fake Medicines India: जनस्वास्थ्य (Public Health) के मोर्चे पर एक बेहद डरावनी और चिंताजनक सच्चाई सामने आई है। बाजार में मिलने वाली नकली दवाएं और हेल्थकेयर प्रोडक्ट्स पहली नजर में बिल्कुल असली जैसे दिखते हैं। इनकी पैकेजिंग, ब्रांडिंग और डिजाइन की नकल इतनी सफाई से की जाती है कि आम मरीज या ग्राहक के लिए असली और नकली का फर्क पहचानना लगभग असंभव हो जाता है। खास बात यह है कि दिल्ली क्राइम ब्रांच ने हाल ही में कैंसर की नकली दवाओं के कारोबार का भंडाफोड़ किया है। देश के 17 राज्यों में फैले इस कारोबार के सिलसिले में 17 लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार भी किया है।

एएसपीए-क्रिसिल (ASPA-CRISIL) की हालिया जारी स्टेट ऑफ काउंटरफिटिंग इन इंडिया 2025” रिपोर्ट के अनुसार, भारत में सर्वे किए गए हर तीन में से लगभग एक उपभोक्ता (33%) ने पिछले 12 महीनों के दौरान किसी न किसी नकली हेल्थकेयर प्रोडक्ट का सामना किया है। यह समस्या कपड़े या इलेक्ट्रॉनिक्स के नकली होने से कहीं ज्यादा खतरनाक है, क्योंकि यहाँ सीधे मरीज की जान दांव पर लगी होती है।

 

Fake Medicine

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स्थानीय मेडिकल स्टोर से लेकर ऑनलाइन ऐप्स तक जाल

अक्सर यह माना जाता है कि नकली सामान केवल अनधिकृत या ऑनलाइन बाजारों में मिलता है, लेकिन यह सर्वे इस भ्रम को तोड़ता है। जिन लोगों का सामना नकली हेल्थकेयर प्रोडक्ट्स से हुआ:

  • 63% लोगों ने स्थानीय रिटेल मेडिकल स्टोर्स को इसका स्रोत बताया।
  • 60% लोगों को ऑनलाइन एग्रीगेटर प्लेटफॉर्म्स (दवा डिलीवरी ऐप्स) के जरिए नकली उत्पाद मिले।
  • लगभग एक-तिहाई लोगों को मल्टी-ब्रांड स्टोर्स और सोशल मीडिया विज्ञापनों के जरिए यह सामान बेचा गया।

कीमत का अंतर : नकली हेल्थकेयर प्रोडक्ट्स असली की तुलना में औसतन 18% सस्ते होते हैं। हालांकि, रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि 96% लोग अंजाने में नकली दवाएं खरीदते हैं, असली समस्या यह है कि मरीज के पास दुकान पर खड़े होकर असलियत जांचने का कोई आसान जरिया नहीं है।

पैकेजिंग पर भरोसा ही सबसे कमजोर कड़ी

सर्वे के अनुसार, केवल 52% उपभोक्ता ही दवा या हेल्थकेयर प्रोडक्ट खरीदने से पहले उसकी असलियत जांचते हैं। हालांकि, 60% लोगों को यह मुगालता रहता है कि वे खुद नकली सामान पहचान सकते हैं।
लोग आमतौर पर इन चीजों को देखकर फैसला लेते हैं:

  1. पैकेजिंग की क्वालिटी (66%)
  2. होलोग्राम (48%)
  3. क्यूआर कोड (40%)

लेकिन आज के आधुनिक जालसाज पैकेजिंग डिजाइन और ब्रांडिंग की हुबहू नकल कर लेते हैं। यही वजह है कि विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ डिब्बा देखकर दवा के असली होने का अंदाजा लगाना जानलेवा साबित हो सकता है।

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2018 से 2025 के बीच दर्ज हुए 521 मामले

एएसपीए (ASPA) के काउंटरफिट न्यूज़ रिपॉजिटरी के अनुसार, वर्ष 2018 से 2025 के बीच हेल्थकेयर क्षेत्र में जालसाजी के 521 आधिकारिक मामले दर्ज किए गए।

  • महामारी में सबसे बड़ा संकट: कोविड-19 (2020-2021) के दौरान नकली पीपीई किट, मास्क, कफ सिरप, जीवनरक्षक दवाओं और यहाँ तक कि नकली वैक्सीन के मामलों में भारी उछाल देखा गया था।

 

Fake Medicine

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नकली दवा का मुद्दा सिर्फ आर्थिक नुकसान का नहीं, बल्कि सीधे जीवन और मृत्यु का है। भले ही उपभोक्ताओं में जागरूकता बढ़ रही हो, लेकिन जब तक हर दवा की रीयल-टाइम प्रामाणिकता (Authenticity) जांचने की मजबूत और आसान डिजिटल व्यवस्था लागू नहीं होती, तब तक जनस्वास्थ्य पर यह बड़ा खतरा मंडराता रहेगा।

हर 1,000 व्यूज पर ₹60! इस चीनी प्लेटफॉर्म ने क्रिएटर्स का खींचा ध्यान, YouTube को देगा कड़ी टक्कर

चीनी वीडियो-शेयरिंग प्लेटफॉर्म Bilibili अपने घरेलू बाजार से बाहर तेजी से विस्तार कर रहा है। ऐसे में एक खास कमाई के आंकड़े ने दुनिया भर के क्रिएटर्स का ध्यान अपनी ओर खींचा है। X पर RT की एक पोस्ट के अनुसार, Bilibili क्रिएटर्स को हर 1,000 व्यूज के लिए लगभग $0.70 (करीब 60 रुपये) का भुगतान कर रहा है। अगर यह दावा सही है, तो यह कदम प्लेटफॉर्म को कंटेंट क्रिएटर्स को आकर्षित करने में मदद कर सकता है क्योंकि यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर YouTube को टक्कर दे रहा है। हालांकि, कंपनी ने खुद इस पेमेंट की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।

Bilibili की रिपोर्टेड पेमेंट

यह जानकारी RT के जरिए सामने आई, जिसने Bilibili के क्रिएटर प्रोग्राम पर चर्चा करते हुए यह आंकड़ा बताया। अगर यह सही है, तो एक मिलियन व्यूज पाने वाले क्रिएटर्स टैक्स और प्लेटफॉर्म के किसी भी एडजस्टमेंट से पहले लगभग $700 कमा सकते हैं। हालांकि, Bilibili के ऑफिशियल क्रिएटर प्रोग्राम डॉक्यूमेंटेशन में किसी तय CPM या RPM का जिक्र नहीं है।

इसके बजाय, प्लेटफॉर्म का कहना है कि कमाई ऑडियंस की लोकेशन, एडवर्टाइजर की डिमांड, कंटेंट कैटेगरी और मॉनेटाइजेशन प्रोडक्ट्स जैसी चीजों के आधार पर अलग-अलग हो सकती है। इसमें यह भी बताया गया है कि अनुमानित रेवेन्यू को इनवैलिड ट्रैफिक, रिफंड, फ्रॉड का पता लगाने, टैक्स और पॉलिसी लागू करने के आधार पर एडजस्ट किया जा सकता है।

मॉनेटाइजेशन के लिए जरूरी शर्तें

Bilibili के क्रिएटर प्रोग्राम की पॉलिसी के अनुसार, मॉनेटाइजेशन के लिए अप्लाई करने से पहले क्रिएटर्स के पास कम से कम 100 सब्सक्राइबर और 2,000 वैलिड पब्लिक व्यूज होने चाहिए। हालांकि, इन शर्तों को पूरा करने के बाद भी मोनेटाइजेशन मिलना तय नहीं है। क्योंकि प्लेटफॉर्म हर चैनल की जांच करता है। इसमें कंटेंट ओरिजिनल है या नहीं, कॉपीराइट नियमों का पालन हो रहा है या नहीं, कम्युनिटी गाइडलाइंस का उल्लंघन तो नहीं हुआ और अकाउंट की स्थिति जैसी चीजें देखी जाती हैं।

यह प्लेटफॉर्म खरीदे गए व्यूज, फेक सब्सक्राइबर, ऑटोमेटेड एंगेजमेंट और दूसरे तरह के बनावटी ट्रैफिक पर भी रोक लगाता है। इसके अलावा, क्रिएटर्स को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके द्वारा अपलोड किए गए सभी कंटेंट के मालिकाना हक उनके पास हों या उन्हें उस कंटेंट से कमाई करने की अनुमति मिली हो।

Bilibili का ग्लोबल विस्तार जारी है

यह पेमेंट की जानकारी तब सामने आई है जब Bilibili अपने इंटरनेशनल प्लान को तेजी से आगे बढ़ा रही है। सेमाफोर (Semafor) की एक पुरानी रिपोर्ट के अनुसार, कंपनी ने अपना इंटरनेशनल ऐप फिर से लॉन्च किया है। इसके अलावा, वह इंग्लिश भाषा की वेबसाइट बना रही है और अमेरिका, यूरोप, जापान और लैटिन अमेरिका जैसे मार्केट में कम्युनिटी मैनेजर की भर्ती शुरू कर दी है।

बता दें कि Bilibili खुद को ऐसे क्रिएटर्स के लिए एक डेस्टिनेशन के तौर पर भी पेश कर रही है, जो नए ऑडियंस तक पहुंचना चाहते हैं और साथ ही कमाई का नए जरिया बनाना चाहते हैं। विज्ञापन के अलावा, कंपनी एक मार्केटप्लेस भी बना रही है जो स्पॉन्सरशिप के मौकों के लिए क्रिएटर्स को ब्रांड्स से जोड़ेगा।

हालांकि, प्रति 1,000 व्यूज पर $0.70 के पेमेंट की जानकारी ने काफी दिलचस्पी पैदा की है, लेकिन क्रिएटर्स को यह ध्यान रखना चाहिए कि Bilibili ने अभी तक आधिकारिक तौर पर स्टैंडर्ड पेमेंट रेट की पुष्टि नहीं की है। फिलहाल, प्लेटफॉर्म की पब्लिश्ड पॉलिसी में सिर्फ यह बताया गया है कि कमाई कई बातों पर निर्भर करेगी और जैसे-जैसे इसका ग्लोबल क्रिएटर इकोसिस्टम विकसित होगा, इसमें बदलाव हो सकता है।

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पहले डॉल्फिन को साइकिल से बांधा, फिर बनाने लगा रील! वायरल वीडियो ने सोशल मीडिया पर मचा दिया बवाल

सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। वीडियो में एक शख्स कथित तौर पर गंगा नदी की डॉल्फिन को साइकिल से बांधकर उसके साथ रील बनाता नजर आ रहा है। फुटेज सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। कई यूजर्स ने इस घटना को बेहद शर्मनाक बताते हुए वन्यजीवों के साथ इस तरह के व्यवहार पर सवाल उठाए हैं। दावा किया जा रहा है कि मामला बिहार का है और वीडियो में दिख रहा व्यक्ति डॉल्फिन के साथ रील बना रहा था। घटना से जुड़े एक अन्य वीडियो को लेकर डॉल्फिन के मृत होने की बात भी कही जा रही है।

हालांकि, वायरल वीडियो और उससे जुड़े सभी दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। लोगों ने संबंधित अधिकारियों से मामले की जांच करने और आरोप सही पाए जाने पर जिम्मेदार व्यक्ति के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है।

पहले जिंदा नजर आई डॉल्फिन

वायरल पोस्ट में दो वीडियो का जिक्र है। पहले फुटेज में डॉल्फिन जिंदा दिखाई देती है और कथित तौर पर उसे साइकिल से बांधा गया है। इसके बाद सामने आए दूसरे वीडियो में वही जानवर मृत नजर आने का दावा किया गया है। इस दौरान शख्स के उसके साथ रील बनाने की बात कही जा रही है।

तेल निकालने के लिए पकड़ने का भी दावा

सोशल मीडिया पोस्ट्स में दावा किया गया है कि यह घटना बिहार की है और इसमें नेटालाल कुमार नाम के एक व्यक्ति का कथित तौर पर शामिल होना बताया जा रहा है। पोस्ट में यह भी दावा किया गया कि डॉल्फिन को कथित रूप से उसका तेल निकालने के लिए पकड़ा गया था और बाद में घटना का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाला गया।

‘रील के लिए लुप्तप्राय जीव को क्यों बनाया कंटेंट?’

वीडियो सामने आने के बाद यूजर्स ने सवाल उठाया कि सोशल मीडिया पर कुछ सेकेंड की लोकप्रियता के लिए किसी दुर्लभ वन्यजीव के साथ इस तरह का व्यवहार कैसे किया जा सकता है। कई लोगों ने बिहार पुलिस और वन विभाग से मामले की जांच कर दोष साबित होने पर सख्त कार्रवाई की मांग की।

गंगा डॉल्फिन को लेकर क्यों बढ़ी चिंता?

गंगा नदी की डॉल्फिन एक लुप्तप्राय प्रजाति है और इसके संरक्षण को लेकर लंबे समय से प्रयास किए जा रहे हैं। वायरल पोस्ट में दावा किया गया है कि दुनिया में इनकी संख्या करीब 5,000 ही रह गई है। ऐसे में एक डॉल्फिन की कथित मौत ने संरक्षण को लेकर चिंता और बढ़ा दी है।

यूजर्स ने पुलिस और वन विभाग को किया टैग

मामले को लेकर कई सोशल मीडिया यूजर्स ने बिहार पुलिस, पर्यावरण मंत्रालय और वन्यजीव संरक्षण संगठनों को टैग किया। एक यूजर ने मांग की कि अगर किसी व्यक्ति ने जानबूझकर संरक्षित जीव को नुकसान पहुंचाया है, तो उसके खिलाफ कानून के तहत कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।

कानूनी कार्रवाई की उठी मांग

कुछ यूजर्स ने दावा किया कि भारत में गंगा डॉल्फिन को कानूनी संरक्षण प्राप्त है और इसे नुकसान पहुंचाने पर जेल व जुर्माने का प्रावधान है। हालांकि, वायरल वीडियो से जुड़े दावों की आधिकारिक पुष्टि स्वतंत्र रूप से नहीं हुई है। इसलिए घटना की वास्तविक परिस्थितियों और जिम्मेदार व्यक्ति की भूमिका की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।

डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट सोशल मीडिया पर यूज़र द्वारा शेयर किए गए कंटेंट पर आधारित है। मनीकंट्रोल इन दावों की न तो स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है और न ही इनका समर्थन करता है।

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