1997 में कॉर्बेट आई थी सोनाकली, 21 साल तक रानी बनकर रही और अब कहा अलविदा! 80 साल की हथिनी को अंतिम विदाई में मिला गार्ड ऑफ ऑनर

रामनगर के कॉर्बेट टाइगर रिजर्व की करीब 80 साल की हथिनी सोनाकली का निधन हो गया। सोनाकली ने शनिवार रात इलाज के दौरान अंतिम सांस ली। सोनाकली का उम्र से जुड़ी बीमारियों से ग्रस्त थी। वहीं इलाज कै दौरान उसकी मौत हुई। अधिकारियों ने सोमवार को इसकी जानकारी दी। सोनाकली कई सालों तक वन्यजीव संरक्षण और रेस्क्यू अभियानों का हिस्सा रही थी। उनके निधन के बाद रविवार को वन विभाग के कर्मचारियों ने पूरे राजकीय सम्मान के साथ उन्हें अंतिम विदाई दी। इस दौरान उन्हें सेरेमोनियल सैल्यूट भी दिया गया।

कई अभियानों में निभाई मुख्य भुमिका

कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के डायरेक्टर साकेत बडोला ने सोनाकली की मौत को रिजर्व के लिए बड़ी क्षति बताया। उन्होंने कहा कि सोनाकली ने कई बाघों को बचाने के अभियानों में अहम भूमिका निभाई थी। सोनाकली की उम्र बढ़ने और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की वजह से साल 2018 में रिटायर कर दिया गया था।

कब लाया गया था टाइगर रिजर्व

सोनाकली को साल 1997 में कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में लाया गया था। उन्होंने 1997 से 2002 तक ढिकाला जोन में काम किया। इसके बाद 2002 से 2016 तक हल्दूपाराव और कालागढ़ क्षेत्रों में तैनात रहीं। साल 2016 में उन्हें फिर ढिकाला रेंज में जिम्मेदारी दी गई, जहां उन्होंने रिटायरमेंट तक काम किया। वन्यजीवों की सुरक्षा और बाघों को बचाने के कई अभियानों में अहम योगदान देने वाली सोनाकली 23 जनवरी 2018 को रिटायर हो गई थीं।

21 साल तक किया काम

सोनाकली ने लगभग 21 साल तक ढिकाला, हल्दूपड़ाव-कालागढ़ और ढिकाला रेंज मे अलग-अलग इलाकों में वन विभाग के साथ काम किया। इस दौरान उसने कई चुनौतीपूर्ण अभियानों में वनकर्मियों की मदद की और वन्यजीवों को बचाने में अहम योगदान दिया। सोनाकली ने अपने कार्यकाल के दौरान कई मुश्किल अभियानों में वन विभाग की मदद की थी। साल 2011 में उसने एक आदमखोर बाघ को पकड़ने के अभियान में अहम भूमिका निभाई।

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नितिन गडकरी ने बताया भविष्य के हाईटेक हाईवे का पूरा रोडमैप, FASTag एनुअल पास और MLFF सिस्टम का जिक्र कर किए बड़े ऐलान

सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने आज गुजरात के नर्मदा जिले के एकता नगर में स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के टेंट सिटी 2 में “चिंतन शिविर 2026 – हाईवे इंफ्रास्ट्रक्चर पर एक राष्ट्रीय सम्मेलन” का उद्घाटन किया। इस शिविर का मकसद भारत के हाईवे इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने पर दो दिनों तक केंद्रित चर्चा के लिए दिशा तय करना है।

शिविर में ये राज्य परिवहन मंत्री भी हुए शामिल

“गतिशक्ति से प्रगति” के मंत्र के साथ आयोजित इस शिविर में राज्यों के परिवहन और PWD मंत्री, राज्य PWD के वरिष्ठ अधिकारी, लागू करने वाली एजेंसियां ​​और अन्य संबंधित पक्ष हाईवे के विकास, प्रोजेक्ट को लागू करने और इंफ्रास्ट्रक्चर डिलीवरी से जुड़े अहम मुद्दों पर चर्चा करने के लिए एक साथ आए हैं। सड़क परिवहन और राजमार्ग राज्य मंत्री हर्ष मल्होत्रा ​​ने भी उद्घाटन सत्र को संबोधित किया।

गडकरी ने किया संबोधित

उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए गडकरी ने कहा कि ‘चिंतन शिविर’ केंद्र और राज्यों के लिए एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान करता है, ताकि वे मिलकर विचार-विमर्श कर सकें, जमीनी स्तर के अनुभव साझा कर सकें और हाईवे विकास में उभरती चुनौतियों के व्यावहारिक समाधान के लिए मिलकर काम कर सकें। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि देश भर में प्रोजेक्ट के कार्यान्वयन और बुनियादी ढांचे के परिणामों को बेहतर बनाने के लिए, विभिन्न राज्यों द्वारा अपनाए गए सफल तौर-तरीकों को साझा किया जाना चाहिए, उनका मूल्यांकन किया जाना चाहिए और जहां भी उचित हो, उन्हें अपनाया जाना चाहिए।

हाईवे डेवलपमेंट में इन चीजों पर दिया जोर

मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि हाईवे डेवलपमेंट में क्वालिटी, सुरक्षा, रफ्तार और वर्ल्ड-क्लास स्टैंडर्ड्स पर ध्यान दिया जाना चाहिए। उन्होंने डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) स्टेज पर पहले से प्लानिंग और तैयारी पर ज्यादा जोर देने को कहा, जिसमें सही सर्वे, अलाइनमेंट प्लानिंग, जमीन अधिग्रहण, यूटिलिटी शिफ्टिंग और समय पर जरूरी मंजूरी लेना शामिल है। उन्होंने कहा कि शुरुआती स्टेज पर बेहतर तैयारी से देरी कम करने, लागत बढ़ने से रोकने और हाईवे प्रोजेक्ट्स की क्षमता बेहतर करने में मदद मिल सकती है।

प्लानिंग और प्रोजेक्ट डिजाइन पर कही ये बड़ी बात

गडकरी ने इस बात पर जोर दिया कि हाईवे की प्लानिंग और प्रोजेक्ट डिजाइन में शुरू से ही सड़क सुरक्षा को शामिल किया जाना चाहिए। दुर्घटना की आशंका वाली जगहों की पहचान करने और प्लानिंग व कंस्ट्रक्शन स्टेज के दौरान सुरक्षा के सही उपाय करने से हाईवे को ज्यादा सुरक्षित बनाने और सड़क दुर्घटनाओं को कम करने में मदद मिल सकती है।

दो दिन के चिंतन शिविर में कई अहम सेशन होंगे, जिनमें PM गतिशक्ति और इंटीग्रेटेड इंफ्रास्ट्रक्चर प्लानिंग, जमीन अधिग्रहण और भूमि राशि, मॉडल कंसेशन एग्रीमेंट और रेटिंग, सुरक्षित और ग्रीन हाईवे का डिजाइन, सड़क सुरक्षा और टोल में सुधार और क्वालिटी एश्योरेंस और प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग जैसे विषय शामिल होंगे। इन सेशन का मकसद हाईवे डेवलपमेंट को और बेहतर बनाने के लिए लागू करने में आने वाली चुनौतियों से निपटना, बेहतरीन तरीकों को साझा करना और व्यावहारिक व दोहराए जा सकने वाले समाधान खोजना है।

सस्टेनेबिलिटी और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी चिंतन शिविर के एजेंडे का एक अहम हिस्सा हैं। गडकरी ने पर्यावरण के अनुकूल कंस्ट्रक्शन तरीकों और नए व रीसाइकल किए गए मटीरियल के ज्यादा इस्तेमाल को बढ़ावा देने की जरूरत पर बात की। साथ ही पर्यावरण और वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए उचित उपाय सुनिश्चित करने की बात कही। इसी संदर्भ में उद्घाटन सत्र के दौरान पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण उपायों पर एक दस्तावेज जारी किया गया।

इस सेशन के दौरान ‘सस्टेनेबल ट्रांसपोर्ट के नजरिए पर ब्रिक्स (BRICS) संग्रह’ भी लॉन्च किया गया। इसमें ट्रांसपोर्ट सेक्टर में सस्टेनेबल तरीकों पर अलग-अलग नजरिए को एक साथ लाया गया और भविष्य के लिए तैयार इंफ्रास्ट्रक्चर पर बातचीत में एक इंटरनेशनल पहलू जोड़ा गया।

टेक्नोलॉजी-आधारित सुधारों पर भी जोर दिया

केंद्रीय परिवहन मंत्री ने हाईवे यात्रा को ज्यादा कुशल और सुविधाजनक बनाने के लिए टेक्नोलॉजी-आधारित सुधारों पर भी जोर दिया, जिनमें FASTag एनुअल पास और मल्टी-लेन फ्री फ्लो (MLFF) शामिल हैं। ये पहल टोलिंग सिस्टम को आधुनिक बनाने, ट्रैफिक की आवाजाही को बेहतर बनाने और हाईवे इस्तेमाल करने वालों के अनुभव को बेहतर बनाने पर मंत्रालय के लगातार फोकस को दिखाती हैं।

दो दिनों तक चलने वाली इन चर्चाओं का मकसद प्रोजेक्ट प्लानिंग और मॉनिटरिंग को मजबूत करना, हाईवे की क्वालिटी और सुरक्षा को बेहतर बनाना, सस्टेनेबल इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा देना और भविष्य के लिए तैयार हाईवे इंफ्रास्ट्रक्चर के काम में तेजी लाना होगा। गडकरी ने सभी स्टेकहोल्डर्स से सुरक्षित, हाई-क्वालिटी और भविष्य के लिए तैयार हाईवे इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने की दिशा में मिलकर काम करने का आह्वान किया, ताकि ‘विकसित भारत’ के विज़न के अनुरूप तेजी से आर्थिक विकास और मजबूत कनेक्टिविटी में योगदान दिया जा सके।

Project Rhino: प्रोजेक्ट चीता के बाद अब देश में शुरू होगा प्रोजेक्ट राइनो, वर्ल्ड राइनो डे पर पीएम मोदी ने किया ऐलान

Project Rhino: प्रोजेक्ट चीता के चार साल बाद और इसकी सफलता के बाद देश में एक ओर वन्यजीव संरक्षण अभियान शुरू किया जा रहा है। प्रोजेक्ट चीता की पहल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की थी। इसके बाद अब एक सींग वाले गैंडों के संरक्षण के लिए एक बार फिर पीएम ने प्रोजेक्ट राइनो की घोषणा की है। आज विश्व गैंडा दिवस पर प्रधानमंत्री ने इस प्रोजेक्ट को शुरू करने का ऐलान किया। इस प्रोग्राम का मकसद एक सींग वाले बड़े गैंडों की सुरक्षा, रहने और फलने-फूलने की पर्याप्त व्यवस्था और संरक्षण के लिए रेंज राज्यों को वित्तीय और तकनीकी सहायता देना है।

पीएम मोदी ने एक्स पर की घोषणा

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर सरकार की गैंडों के संरक्षण की पहल की घोषणा करते हुए, प्रधानमंत्री ने कहा, “देश में प्रजातियों के संरक्षण को आगे बढ़ाते हुए, मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि रेंज राज्यों को सुरक्षा, हैबिटैट मैनेजमेंट, जेनेटिक सुधार और पॉपुलेशन डायनामिक्स समझने के लिए वित्तीय और तकनीकी मदद देने के लिए प्रोजेक्ट राइनो शुरू किया गया है।”

प्रधानमंत्री ने गैंडों की लोकप्रिय प्रजाति के लिए खुशी जताई और वन्यजीव सुरक्षा में सबसे आगे रहने वाले वनकर्मियों और कंजर्वेशनिस्ट की लगातार कोशिशों की तारीफ की। PM मोदी ने अपने पोस्ट लिखा, “वर्ल्ड राइनो डे पर, हम शानदार एक सींग वाले बड़े गैंडे का जश्न मनाते हैं और इसकी सुरक्षा में सबसे आगे रहने वाले सभी लोगों की तारीफ करते हैं।” प्रधानमंत्री ने दुनिया भर में गैंडों के संरक्षण में असम की अहम भूमिका पर जोर दिया। उन्होंने कहा, “असम में अब दुनिया की लगभग 80% गैंडों की आबादी है और गैंडों के शिकार को खत्म करने के लिए काजीरंगा की कोशिशों की बहुत तारीफ हुई है।”

एक्स पर पोस्ट अपने संदेश में पीएम ने ने दूसरे भारतीय राज्यों में गैंडों के संरक्षण और उनकी प्रजाति को लाने में हुई तरक्की पर भी जोर दिया। साथ ही, उन्होंन उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में सफल कोशिशों की ओर इशारा किया। उन्होंने आगे कहा, “एक तरफ, बिहार और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों में गैंडे या तो वापस आ गए हैं या पूरी तरह सुरक्षित हैं। दूसरी ओर, दुधवा (उत्तर प्रदेश) में गैंडों को फिर से लाने की सफलता इतिहास बना रही है। यह दिखाता है कि हमारे लोग जानवरों की सुरक्षा और रेंज वाले राज्यों में सक्रिय वन्यजीव प्रबंधन के लिए कितना प्रतिबद्ध हैं।”

यह प्रोजेक्ट भारत के वन्यजीव प्रबंधन ढांचे को मजबूत बनाता है और उसे विस्तार देता है। यह असम पश्चिम बंगाल, बिहार और उत्तर प्रदेश के दुधवा में सफल एक सींग वाले गैंडों के पुन: दाखिल होने के प्रोग्राम सहित रेंज राज्यों में सफल संरक्षण पहलों पर आगे बढ़ता है।

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कोडिंग छोड़कर जंगलों में रहकर, जानवरों से सीखा बिजनेस और खड़ा कर दिया करोड़ों का स्टार्टअप!

13 साल तक टेक्नोलॉजी की दुनिया में काम करने के बाद हैदराबाद के एक इंजीनियर ने अपना करियर बदलने का फैसला किया। उन्होंने IT की नौकरी छोड़कर वाइल्डलाइफ के अपने पुराने शौक को ही बिजनेस का रूप दे दिया। इस तरह ‘वाइल्डलाइफ व्हिस्परर्स’ की शुरुआत हुई, जो जानवरों और नेचर से मिलने वाली सीख को कॉर्पोरेट ट्रेनिंग से जोड़ती है। बिना किसी बाहरी फंडिंग के शुरू हुई इस कंपनी ने पहले ही साल करीब 80 लाख रुपये का रेवेन्यू कमाया।

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टेक से वाइल्डलाइफ तक

2010 में इलेक्ट्रॉनिक्स और कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने हैदराबाद, चेन्नई और मुंबई में काम किया। इसके बाद 2014 में डेटा साइंस में मास्टर्स करने के लिए अमेरिका चले गए। IT में काम करते हुए भी उनका नेचर और जानवरों से प्यार कम नहीं हुआ। वीकेंड पर वह DSLR कैमरा लेकर जंगल और नेशनल पार्क घूमने निकल जाते थे। धीरे-धीरे भारत, अमेरिका और अफ्रीका के कई नेशनल पार्कों में ट्रैवल ने उनकी इस दिलचस्पी को और बढ़ा दिया।

 

 

फोटोग्राफी से मिला नया बिजनेस विजन

शुरुआत में वाइल्डलाइफ फोटोग्राफी उनके लिए जानवरों की फोटो लेने का एक शौक था। लेकिन बाद में उन्हें समझ आया कि जंगल सिर्फ खूबसूरत तस्वीरों के लिए नहीं, बल्कि जानवरों का व्यवहार, उनका एक-दूसरे के साथ जुड़ाव और मुश्किल कंडीशन में उनका सर्वाइव करना इंसानों को भी बहुत कुछ सिखा सकता है। इसी सोच ने आगे चलकर उनके बिजनेस आइडिया की नींव रखी।

 

 

जंगली जानवरों ने सिखाया कॉर्पोरेट मैनेजमेंट

‘वाइल्डलाइफ व्हिस्परर्स’ में जंगल और जानवरों के उदाहरणों के जरिए कॉर्पोरेट टीमों को कई जरूरी बातें सिखाई जाती हैं। जैसे, शेरों से टीमवर्क, चींटियों से काम बांटने यानी डेलिगेशन और मधुमक्खियों से खतरे के समय मिलकर काम करने की सीख ली जाती है। इन उदाहरणों को लीडरशिप, टीमवर्क, मुश्किल समय में मजबूती से टिके रहने और माइंडफुलनेस जैसे सब्जेक्ट से जोड़ा जाता है।

 

 

जंगल बना ट्रेनिंग क्लासरूम

यह बिजनेस सिर्फ ऑफिस में बैठकर होने वाली सामान्य ट्रेनिंग तक सीमित नहीं है। कंपनी कॉर्पोरेट वर्कशॉप के साथ-साथ कई दिनों तक चलने वाले जंगल के एक्सपीरियंस भी कराती है। इन प्रोग्राम्स में टीम के लोगों को नेचर के पास ले जाकर ऐसी एक्टिविटी कराई जाती हैं, जिनसे वे लीडरशिप और मुश्किल हालात में सही फैसला लेने जैसी चीजें सीख सकें। इस तरह जंगल एक तरह से उनका अलग और अनोखा ट्रेनिंग क्लासरूम बन जाता है।

 

लाखों के आइडिया का हिट फॉर्मूला

इस अनोखे बिजनेस आइडिया को कॉर्पोरेट कंपनियों से अच्छा रिस्पॉन्स मिला। रिपोर्ट के मुताबिक, बिना इन्वेस्टमेंट के शुरू हुई ‘वाइल्डलाइफ व्हिस्परर्स’ ने अपने पहले साल में करीब 80 लाख रुपये का रेवेन्यू कमाया। कंपनी ने परफेटी वैन मेले और सीमेंस डिजिटल जैसी कंपनियों के साथ काम किया है। इस बिजनेस में टेक्नोलॉजी और कॉर्पोरेट एक्सपेरिएंस को नेचर और वाइल्डलाइफ के जुनून के साथ जोड़कर एक बिल्कुल अलग तरह का मॉडल तैयार किया गया है।

 

यह कहानी बताती है कि करियर शिफ्ट करने के साथ अपने जुनून पर भरोसा करना भी जरूरी है। सही सोच और मेहनत के साथ पसंद के काम को भी एक सफल बिजनेस बनाया जा सकता है। नेचर से सीख लेकर शुरू किया गया यह अनोखा सफर दूसरों को भी अपनी स्किल और इंटरेस्ट को नए तरीके से देखने के लिए इंस्पिरेशन देता है।

पहले डॉल्फिन को साइकिल से बांधा, फिर बनाने लगा रील! वायरल वीडियो ने सोशल मीडिया पर मचा दिया बवाल

सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। वीडियो में एक शख्स कथित तौर पर गंगा नदी की डॉल्फिन को साइकिल से बांधकर उसके साथ रील बनाता नजर आ रहा है। फुटेज सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। कई यूजर्स ने इस घटना को बेहद शर्मनाक बताते हुए वन्यजीवों के साथ इस तरह के व्यवहार पर सवाल उठाए हैं। दावा किया जा रहा है कि मामला बिहार का है और वीडियो में दिख रहा व्यक्ति डॉल्फिन के साथ रील बना रहा था। घटना से जुड़े एक अन्य वीडियो को लेकर डॉल्फिन के मृत होने की बात भी कही जा रही है।

हालांकि, वायरल वीडियो और उससे जुड़े सभी दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। लोगों ने संबंधित अधिकारियों से मामले की जांच करने और आरोप सही पाए जाने पर जिम्मेदार व्यक्ति के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है।

पहले जिंदा नजर आई डॉल्फिन

वायरल पोस्ट में दो वीडियो का जिक्र है। पहले फुटेज में डॉल्फिन जिंदा दिखाई देती है और कथित तौर पर उसे साइकिल से बांधा गया है। इसके बाद सामने आए दूसरे वीडियो में वही जानवर मृत नजर आने का दावा किया गया है। इस दौरान शख्स के उसके साथ रील बनाने की बात कही जा रही है।

तेल निकालने के लिए पकड़ने का भी दावा

सोशल मीडिया पोस्ट्स में दावा किया गया है कि यह घटना बिहार की है और इसमें नेटालाल कुमार नाम के एक व्यक्ति का कथित तौर पर शामिल होना बताया जा रहा है। पोस्ट में यह भी दावा किया गया कि डॉल्फिन को कथित रूप से उसका तेल निकालने के लिए पकड़ा गया था और बाद में घटना का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाला गया।

‘रील के लिए लुप्तप्राय जीव को क्यों बनाया कंटेंट?’

वीडियो सामने आने के बाद यूजर्स ने सवाल उठाया कि सोशल मीडिया पर कुछ सेकेंड की लोकप्रियता के लिए किसी दुर्लभ वन्यजीव के साथ इस तरह का व्यवहार कैसे किया जा सकता है। कई लोगों ने बिहार पुलिस और वन विभाग से मामले की जांच कर दोष साबित होने पर सख्त कार्रवाई की मांग की।

गंगा डॉल्फिन को लेकर क्यों बढ़ी चिंता?

गंगा नदी की डॉल्फिन एक लुप्तप्राय प्रजाति है और इसके संरक्षण को लेकर लंबे समय से प्रयास किए जा रहे हैं। वायरल पोस्ट में दावा किया गया है कि दुनिया में इनकी संख्या करीब 5,000 ही रह गई है। ऐसे में एक डॉल्फिन की कथित मौत ने संरक्षण को लेकर चिंता और बढ़ा दी है।

यूजर्स ने पुलिस और वन विभाग को किया टैग

मामले को लेकर कई सोशल मीडिया यूजर्स ने बिहार पुलिस, पर्यावरण मंत्रालय और वन्यजीव संरक्षण संगठनों को टैग किया। एक यूजर ने मांग की कि अगर किसी व्यक्ति ने जानबूझकर संरक्षित जीव को नुकसान पहुंचाया है, तो उसके खिलाफ कानून के तहत कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।

कानूनी कार्रवाई की उठी मांग

कुछ यूजर्स ने दावा किया कि भारत में गंगा डॉल्फिन को कानूनी संरक्षण प्राप्त है और इसे नुकसान पहुंचाने पर जेल व जुर्माने का प्रावधान है। हालांकि, वायरल वीडियो से जुड़े दावों की आधिकारिक पुष्टि स्वतंत्र रूप से नहीं हुई है। इसलिए घटना की वास्तविक परिस्थितियों और जिम्मेदार व्यक्ति की भूमिका की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।

डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट सोशल मीडिया पर यूज़र द्वारा शेयर किए गए कंटेंट पर आधारित है। मनीकंट्रोल इन दावों की न तो स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है और न ही इनका समर्थन करता है।

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असम में बाढ़ में घायल हथिनी ‘जॉयमोती’ को मिला नया जीवन, इलाज के लिए वंतारा किया गया एयरलिफ्ट

जॉयमोती नाम की 53 साल की मादा हाथी, जो जुलाई के दूसरे हफ्ते में नागालैंड और असम में आई बाढ़ के पानी में बह गई थी, को अब गुजरात के जामनगर स्थित वंतारा ले जाया जा रहा है। संगठन ने शुक्रवार को बताया कि हाथी को तुरंत और विशेषज्ञ पशु चिकित्सा इलाज की जरूरत है, इसलिए उसे एयरलिफ्ट किया जा रहा है।

बाढ़ के दौरान जॉयमोती को स्थानीय लोगों ने सरकारी एजेंसियों के साथ मिलकर रेस्क्यू किया था। बाढ़ में बहने के बाद हाथी को कई गंभीर चोटें आई हैं। उसके माथे, दाहिने कान, पूंछ के ऊपर, बाईं अंदरूनी जांघ और पेट पर घाव हैं। साथ ही, उसके बाहरी जननांग के पास गहरी चोट भी है, जिसमें कीड़े पड़ गए थे।

उसकी दाहिनी आंख भी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई है, जिसकी वजह से उस आंख की रोशनी पूरी तरह चली गई है और लगातार पानी भी निकल रहा है। इसके अलावा, उसके बाएं पिछले पैर में काफी समय से लंगड़ाने की समस्या है। यह समस्या उसे जंगल में पेड़ काटने के दौरान लगी चोट और फ्रैक्चर के कारण हुई थी। इस वजह से उसे सामान्य तरीके से चलने और खाना-पानी तक पहुंचने में परेशानी होती है।

रेस्क्यू के बाद जॉयमोती को स्थानीय स्तर पर प्राथमिक उपचार और शुरुआती पशु चिकित्सा सुविधा दी गई। इसमें घावों की ड्रेसिंग, दर्द की दवा, मल्टीविटामिन और मिनरल सप्लीमेंट्स के साथ जरूरी सपोर्टिव ट्रीटमेंट शामिल था। हालांकि, उसके शरीर पर कई जगह गंभीर चोटें हैं। साथ ही उसकी उम्र ज्यादा है और पहले से ही चलने-फिरने में परेशानी है। इन सभी वजहों से उसे तुरंत किसी विशेषज्ञ अस्पताल में इलाज की जरूरत थी।

हाथी को मेडिकल कारणों से किया गया शिफ्ट

हालांकि, वंतारा ने स्पष्ट किया है कि यह स्थानांतरण पूरी तरह से मेडिकल कारणों से किया जा रहा है। सड़क मार्ग के बजाय हवाई मार्ग से ले जाने का निर्णय हाथी को विशेष अस्पताल तक पहुंचाने में लगने वाले शारीरिक तनाव और समय को कम करने के लिए लिया गया है। पहुंचते ही जॉयमोती की पूरी पशु चिकित्सा जांच की जाएगी, जिसमें उसके घावों, आंखों की स्थिति और पोषण एवं सहायक देखभाल संबंधी सभी आवश्यकताओं का ध्यान रखा जाएगा।

बता दें कि किसी हाथी को गंभीर इलाज के लिए हवाई रास्ते से अस्पताल ले जाना भारत में अपनी तरह का पहला प्रयास है। इसके लिए पशु चिकित्सकों, एनिमल केयर टीम और लॉजिस्टिक्स से जुड़े लोगों ने काफी तैयारी की है।

जॉयमोती को ले जाने की पूरी प्रक्रिया में उसकी सेहत, आराम और सुरक्षा का खास ध्यान रखा गया। यात्रा से पहले मेडिकल जांच और तैयारी से लेकर विमान में चढ़ाने, उड़ान के दौरान उसकी निगरानी और अस्पताल पहुंचने तक हर चरण को सावधानी से पूरा किया गया।

वन्तारा असम में तीन वन्यजीव पशु चिकित्सा केंद्र स्थापित करेगी

इसके अतिरिक्त, वन्तारा ने असम में तीन वन्यजीव पशु चिकित्सा केंद्र स्थापित करने का प्रस्ताव दिया है, जिनमें हाथियों के लिए एक विशेष केंद्र भी शामिल है, ताकि वन्यजीवों की आपातकालीन पशु चिकित्सा देखभाल के लिए स्थानीय क्षमता को मजबूत किया जा सके। प्रस्तावित केंद्रों में प्रजाति-विशिष्ट सुविधाएं और पशु चिकित्सा सहायता उपलब्ध होगी, जिससे जरूरतमंद जानवरों को आपातकालीन स्थिति में उनके रहने के स्थान के पास ही समय पर और उचित उपचार मिल सकेगा। इन केंद्रों का संचालन पूरी तरह से असम वन विभाग द्वारा स्वतंत्र रूप से किया जाएगा।

इसका उद्देश्य स्थानीय क्षमता को मजबूत करना है ताकि असम में हाथियों और अन्य वन्यजीवों को उनके घर के पास ही उच्च गुणवत्ता वाली देखभाल मिल सके और विशेष उपचार की आवश्यकता होने पर लंबी दूरी के परिवहन की आवश्यकता न पड़े।

बता दें कि रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर अनंत अंबानी द्वारा स्थापित वंतारा एक पशु कल्याण और वन्यजीव संरक्षण संगठन है।

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ग्लो झील ने रचा इतिहास! अरुणाचल प्रदेश को मिली पहली रामसर साइट

अरुणाचल प्रदेश के लिए बड़ी खुशखबरी सामने आई है। राज्य के लोहित जिले में ग्लो झील को भारत की 101वीं रामसर साइट का दर्जा मिला है। यह उपलब्धि राज्य के लिए बेहद खास मानी जा रही है और इससे अरुणाचल प्रदेश को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली है।

ग्लो झील (Glow Lake)

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अरुणाचल प्रदेश के लोहित जिले में स्थित ग्लो झील को रामसर साइट घोषित किया गया है। यह राज्य की पहली वेटलैंड है, जिसे रामसर कन्वेंशन के तहत अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली है। यह उपलब्धि अरुणाचल प्रदेश के लिए काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। रामसर साइट बनने का मतलब है कि यह झील पर्यावरण और जैव-विविधता के लिहाज से बेहद खास है। अब इस प्राकृतिक धरोहर की सुरक्षा और संरक्षण पर पहले से ज्यादा ध्यान दिया जाएगा। इससे आने वाले समय में झील को सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी।

 

रामसर साइट (Ramsar Site)

Glow Lake - A Unique Destination With Friendly Atmosphere

रामसर साइट उन वेटलैंड यानी आर्द्रभूमियों को कहा जाता है, जिनका पर्यावरण और बायोडाइवर्सिटी के लिए विशेष महत्व होता है। इन जगहों को इंटरनेशनल लेवल पर संरक्षण के लिए चुना जाता है। ऐसी जगहों पर कई दुर्लभ पौधे, पक्षी और वन्यजीव रहते हैं। साथ ही ये जल संरक्षण, बाढ़ नियंत्रण और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाती हैं। इसलिए इनकी सुरक्षा पूरी दुनिया के लिए जरूरी मानी जाती है।

 

मीठे पानी की झील (Freshwater lake)

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ग्लो झील ऊंचाई पर मीठे पानी की झील है। इसमें पहाड़ों से निकलने वाली बारहमासी जलधाराओं का साफ पानी आता है। झील चारों ओर से घने जंगलों और प्राकृतिक हरियाली से घिरी हुई है, जिससे यहां का वातावरण बेहद शांत और सुंदर दिखाई देता है। इस इलाके में 150 से ज्यादा तरह के पेड़ और 49 प्रकार के ऑर्किड पाए जाते हैं। यही वजह है कि इसे पूर्वी हिमालय का एक बायोडाइवर्सिटी हॉटस्पॉट माना जाता है।

 

पर्यावरण के लिए जरूरी (Importance for Environment)

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ग्लो झील केवल एक खूबसूरत टूरिस्ट डेस्टिनेशन नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण के लिए भी जरुरी है। यह झील पानी को सुरक्षित रखने, आसपास की नदियों में जल प्रवाह बनाए रखने और प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने में मदद करती है। इसके अलावा यह कार्बन को संग्रहित करने में भी भूमिका निभाती है, जिससे जलवायु परिवर्तन के इफेक्ट को कम करने में मदद मिलती है। साइंटिस्ट भी इस झील को महत्वपूर्ण मानते हैं।

 

लोगों और टूरिस्म को फायदा (Benefits for Local Communities and Tourism)

रामसर साइट का दर्जा मिलने के बाद इस एरिया में इको-टूरिज्म को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। इससे देश-विदेश से ज्यादा टूरिस्ट यहां आ सकते हैं, जिससे यहां के लोगों को रोजगार और आय के नए अवसर मिलेंगे। लोकल आदिवासी समुदाय अपनी संस्कृति और प्राकृतिक विरासत को सुरक्षित रखते हुए टूरिस्म से जुड़ सकेंगे। इससे इलाके का डेवेलप भी होगा और लोगों की आजीविका भी बेहतर होगी।

संरक्षण और रिसर्च (Conservation and Research)

रामसर साइट बनने के बाद ग्लो झील के संरक्षण के लिए विशेष प्रबंधन योजनाएं तैयार की जाएंगी। इसके साथ ही इस क्षेत्र को बेहतर कानूनी सुरक्षा और इंटरनेशनल एक्सपर्ट की टेक्निकल सलाह भी मिल सकेगी। भविष्य में यहां साइंटिस्ट रिसर्च, पर्यावरण अध्ययन और बायोडाइवर्सिटी पर निगरानी के लिए फंड मिलने की संभावना भी बढ़ जाएगी।

 

प्राकृतिक धरोहर की रक्षा (Protection of natural heritage)

अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू (Pema Khandu) ने ग्लो झील को रामसर साइट का दर्जा मिलने पर खुशी जताई। उन्होंने कहा कि यह राज्य के लिए गर्व की बात है और इससे बायोडाइवर्सिटी कंजर्वेशन को नई मजबूती मिलेगी। उन्होंने यह भी कहा कि इस उपलब्धि से पर्यावरण संरक्षण के साथ ही आने वाली जनरेशन भी राज्य की इस अनमोल प्राकृतिक धरोहर की रक्षा के लिए प्रेरित होंगी।