1997 में कॉर्बेट आई थी सोनाकली, 21 साल तक रानी बनकर रही और अब कहा अलविदा! 80 साल की हथिनी को अंतिम विदाई में मिला गार्ड ऑफ ऑनर

रामनगर के कॉर्बेट टाइगर रिजर्व की करीब 80 साल की हथिनी सोनाकली का निधन हो गया। सोनाकली ने शनिवार रात इलाज के दौरान अंतिम सांस ली। सोनाकली का उम्र से जुड़ी बीमारियों से ग्रस्त थी। वहीं इलाज कै दौरान उसकी मौत हुई। अधिकारियों ने सोमवार को इसकी जानकारी दी। सोनाकली कई सालों तक वन्यजीव संरक्षण और रेस्क्यू अभियानों का हिस्सा रही थी। उनके निधन के बाद रविवार को वन विभाग के कर्मचारियों ने पूरे राजकीय सम्मान के साथ उन्हें अंतिम विदाई दी। इस दौरान उन्हें सेरेमोनियल सैल्यूट भी दिया गया।

कई अभियानों में निभाई मुख्य भुमिका

कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के डायरेक्टर साकेत बडोला ने सोनाकली की मौत को रिजर्व के लिए बड़ी क्षति बताया। उन्होंने कहा कि सोनाकली ने कई बाघों को बचाने के अभियानों में अहम भूमिका निभाई थी। सोनाकली की उम्र बढ़ने और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की वजह से साल 2018 में रिटायर कर दिया गया था।

कब लाया गया था टाइगर रिजर्व

सोनाकली को साल 1997 में कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में लाया गया था। उन्होंने 1997 से 2002 तक ढिकाला जोन में काम किया। इसके बाद 2002 से 2016 तक हल्दूपाराव और कालागढ़ क्षेत्रों में तैनात रहीं। साल 2016 में उन्हें फिर ढिकाला रेंज में जिम्मेदारी दी गई, जहां उन्होंने रिटायरमेंट तक काम किया। वन्यजीवों की सुरक्षा और बाघों को बचाने के कई अभियानों में अहम योगदान देने वाली सोनाकली 23 जनवरी 2018 को रिटायर हो गई थीं।

21 साल तक किया काम

सोनाकली ने लगभग 21 साल तक ढिकाला, हल्दूपड़ाव-कालागढ़ और ढिकाला रेंज मे अलग-अलग इलाकों में वन विभाग के साथ काम किया। इस दौरान उसने कई चुनौतीपूर्ण अभियानों में वनकर्मियों की मदद की और वन्यजीवों को बचाने में अहम योगदान दिया। सोनाकली ने अपने कार्यकाल के दौरान कई मुश्किल अभियानों में वन विभाग की मदद की थी। साल 2011 में उसने एक आदमखोर बाघ को पकड़ने के अभियान में अहम भूमिका निभाई।

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50 mph से ज्यादा की रफ्तार से गोता लगा समंदर को चीरती ये चिड़िया कौन है? इस गजब क्लिक पर फोटोग्राफर को मिला बड़ा अवॉर्ड

आज जब कुछ ही सेकंड में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ऐसी तस्वीरें बना सकता है, जो पहली नजर में बिल्कुल असली लगती हैं, ऐसे समय में जंगल और आसमान के बीच कैमरे से कैद की गई एक सच्ची तस्वीर की अहमियत और बढ़ जाती है। Bird Photographer of the Year प्रतियोगिता की इस साल की विजेता तस्वीरों ने इसी बात को एक बार फिर सामने रखा है। प्रतियोगिता के निदेशक विल निकोल्स ने कहा कि इस साल की तस्वीरें याद दिलाती हैं कि प्रकृति की असली तस्वीर का कोई विकल्प नहीं है।

उनके मुताबिक, प्रतियोगिता में शामिल हर फोटो जंगल में घटे किसी वास्तविक पल की कहानी कहती है एक ऐसा पल, जिसे कैमरे में कैद करने के लिए फोटोग्राफर को लंबे इंतजार, धैर्य और मेहनत से गुजरना पड़ा।

एक क्लिक के पीछे छिपी होती है लंबी कहानी

पक्षियों की तस्वीर लेना सिर्फ कैमरा उठाकर शटर दबा देना नहीं है। कई बार फोटोग्राफर को घंटों या उससे भी ज्यादा समय तक किसी खास पक्षी के व्यवहार का इंतजार करना पड़ता है। कभी सही रोशनी का इंतजार होता है, तो कभी पक्षी के सही दिशा में देखने का। यही वजह है कि ऐसी तस्वीरों में सिर्फ खूबसूरती नहीं, बल्कि उस पल तक पहुंचने वाले इंसान की मेहनत भी दिखाई देती है। निकोल्स का कहना है कि लोग वास्तविक कहानियों को वास्तविक लोगों के जरिए देखना और महसूस करना हमेशा पसंद करेंगे। यही वजह है कि इस प्रतियोगिता की तस्वीरें सिर्फ पक्षियों की सुंदरता नहीं दिखातीं, बल्कि इंसान और प्रकृति के बीच रिश्ते को भी सामने लाती हैं।

तस्वीरों से संरक्षण की मुहिम को भी ताकत

Bird Photographer of the Year का मकसद केवल दुनिया की शानदार पक्षी तस्वीरों को सम्मान देना नहीं है। प्रतियोगिता के जरिए पक्षियों और उनके संरक्षण को लेकर जागरूकता बढ़ाने की कोशिश भी की जाती है। इस साल प्रतियोगिता ने Birds on the Brink नाम की संस्था को 5,000 पाउंड से ज्यादा की आर्थिक मदद दी। यह संस्था दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में स्थानीय स्तर पर पक्षियों के संरक्षण से जुड़े प्रयासों के लिए अनुदान देती है।

जब तस्वीर बनती है बदलाव की वजह

निकोल्स के मुताबिक, संरक्षण की कोशिशों को सफल बनाने में आम लोगों का समर्थन बेहद जरूरी है। और लोगों तक प्रकृति की अहमियत पहुंचाने में तस्वीरें बड़ी भूमिका निभा सकती हैं। एक खूबसूरत पक्षी की तस्वीर शायद कुछ सेकंड के लिए किसी की नजर रोक दे, लेकिन वही तस्वीर अगर उसे उस पक्षी और उसके प्राकृतिक आवास के बारे में सोचने पर मजबूर कर दे, तो कैमरे की एक क्लिक जागरूकता की शुरुआत बन सकती है।

(डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट सोशल मीडिया पर यूज़र द्वारा शेयर किए गए कंटेंट पर आधारित है। मनीकंट्रोल इन दावों की न तो स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है और न ही इनका समर्थन करता है।)

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Project Cheetah के चार साल पूरे होने पर मिला अनोखा तोहफा, मादा चीता ने दिया 4 शावकों को जन्म

Project Cheetah: भारत में चीतों का नामोनिशान 1952 में पूरी तरह से समाप्त होने की घोषणा के बाद आज एक ऐसी खबर आई है, जिससे प्रोजेक्ट चीता से जुड़ा हर एक शख्स बेहद खुश है। मध्य प्रदेश के कुनो नेशनल पार्क में भारत में जन्मी एक मादा चीता ने चार बच्चों को जन्म दिया है। यह खबर प्रोजेक्ट चीता के चार पूरा होने के ठीक एक दिन बाद मिली है। इससे भारत में चीतों की आबादी फिर से शुरू करने के प्रयासों को प्रोत्साहन मिला है।

केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने सोशल मीडिया पर एक तस्वीर और वीडियो के साथ इस उपलब्धि की जानकारी साझा की। उन्होंने इसे प्रोजेक्ट चीता के लिए “सच में ऐतिहासिक और खुशी का पल” बताया। यादव ने कुनो नेशनल पार्क और प्रोजेक्ट चीता टीमों को बधाई देते हुए कहा, “चार साल, चार नई जिंदगी — उम्मीद, हिम्मत और भारत में चीता संरक्षण की बढ़ती सफलता का एक सुंदर प्रतीक।”

चार शावकों को जन्म देने वाली मादा चीता का नाम KGP12 बताया जा रहा है। यह कुनो में पैदा हुए उन भारतीय चीतों में से एक है, जो इस प्रजाति को देश में फिर से लाए जाने के बाद पैदा हुए थे। बता दें, प्रोजेक्ट चीता को भारत में चीतों की आबादी फिर से शुरू करने के मकसद से 17 सितंबर 2022 को लॉन्च किया गया था। इसके लिए नामीबिया से आठ अफ्रीकी चीतों को कुनो नेशनल पार्क लाया गया था। बाद में दक्षिण अफ्रीका से और चीतों के आने के साथ प्रोग्राम को और विस्तार मिला।

1952 में भारत में चीता की प्रजाति के खत्म होने की घोषणा की गई थी। इसके बाद जंगली चीतों की नस्ल को बनाने की भारत की कोशिशों में यह जन्म एक और अहम पड़ाव है। इसके बाद भारत स्थानीय तौर पर खत्म होने के बाद चीतों को जंगल में फिर से लाने वाला एकमात्र देश बन गया। चार स्वस्थ शावकों का जन्म खास तौर पर अहम है क्योंकि दूसरी पीढ़ी का जन्म इस बात का संकेत देते हैं कि फिर से लाई गई आबादी भारतीय हालात के हिसाब से ढलने लगी है।

वाइल्डलाइफ बायोलॉजिस्ट जंगल में सफल ब्रीडिंग को एक कामयाब कंजर्वेशन प्रोग्राम के सबसे मजबूत संकेतों में से एक मानते हैं। इससे पहले सीएनबीसी नेटवर्क 18 की रिपोर्ट में बताया गया था कि देश में प्रोजेक्ट चीता के चार साल पूरे होने पर देश में चीतों की आबादी बढ़कर 52 हो गई है, जिसमें 32 देश में पैदा हुए हैं। पिछले चार सालों में, प्रोजेक्ट चीता को कामयाबी और नाकामी दोनों का सामना करना पड़ा है, जिसमें बीमारी, चोट और पर्यावरण की चुनौतियों के कारण कई बड़े चीतों और शावकों की मौत शामिल है।

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Project Cheetah at four: भारत में 52 हुई चीतों की आबादी, प्रोजेक्ट चीता के 4 साल पूरे होने पर दीयों से रोशन होगा कूनो का टिकटोली गेट

Project Cheetah at four: चार साल पहले साल 2022 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की खास पहल पर भारत में शुरू किए प्रोजेक्ट चीता का ऐसा शानदार कल किसी ने नहीं सोचा होगा। चीतों को फिर से लाने से लेकर उनके बच्चों को जिंदा रखने तक, भारत ने कई चुनौतियों का सामना करते हुए अनोखी उपलब्धि हासिल की है। सीएनबीसी नेटवर्क 18 की रिपोर्ट के मुताबिक देश में प्रोजेक्ट चीता के चार साल पूरे होने पर देश में चीतों की आबादी बढ़कर 52 हो गई है, जिसमें 32 देश में पैदा हुए थे।

17 सितंबर को चार साल पूरा होने के मौके पर अधिकारियों ने इस सफर को याद किया। 17 सितंबर, 2022 को, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नामीबिया से आठ जंगली चीतों को मध्य प्रदेश के कुनो नेशनल पार्क में छोड़ा गया था। चीतों को फिर से बसाने के प्रोग्राम के अगले चरण में चीतों के लिए रहने की सही जगह को बढ़ाना और भारत में चीतों की एक बड़ी, लंबे समय तक चलने वाली मेटा-पॉपुलेशन बनाना शामिल है। इस खास उपलब्धि का जश्न मनाने के लिए इस परियोजना के चार साल पूरे होने पर 17 सितंबर को कूनो के टिकटोली गेट पर हजारों दीप जलाए जाएंगे। यह आयोजन सेवा संकल्प अभियान के तहत होगा।

दुनिया का सबसे तेज रफ्तार वाला जमीनी जानवर चीता अब भारत में अपनी संख्या बढ़ा रहा है। भारत में इसकी कुल आबादी का 60% यानी 32 चीते भारत में पैदा हुए हैं। इनमें से 49 चीते कुनो नेशनल पार्क में हैं, जबकि तीन और गांधी सागर सैंक्चुअरी में हैं, दोनों मध्य प्रदेश में हैं। अफ्रीकी महाद्वीप पर नामीबिया से शुरू हुआ यह सफर गांधी सागर सैंक्चुअरी तक पहुंच गया है।

सीएनबीसी नेटवर्क 18 की रिपोर्ट के मुताबिक अधिकारी ने कहा, “चीतों को फिर से लाने के पहले साल में टीम को कई चुनौतियों का सामना किया। इस दौरान, उन्होंने भारतीय हालात के हिसाब से चीतों के व्यवहार, सेहत और मैनेजमेंट का अनुभव हासिल किया।” भारत में पैदा हुए शावकों के बचने और उनके विकास पर ध्यान दिया गया। डॉक्यूमेंट के मुताबिक, 13 शावक जन्म के एक साल से ज्यादा समय तक जिंदा रहे। तीसरे साल (2025) में, चीतों को खुले जंगल वाले इलाकों में छोड़ दिया गया। अधिकारियों ने बताया कि 12 जिलों में फैले एक इंटरस्टेट इलाके में उन पर 24 घंटे नजर रखी गई, और चीतों ने धीरे-धीरे खुद को ढाल लिया।

उन्होंने कहा कि ब्रीडिंग करने वाली मादाओं का बनना और चौथे साल में शावकों की दूसरी पीढ़ी का सफलतापूर्वक जिंदा रहना इस प्रोग्राम की बड़ी कामयाबी है। प्रोजेक्ट के अलग-अलग पड़ावों का ज़िक्र करते हुए, अधिकारी ने कहा कि नामीबिया से लाए गए आठ चीतों में से तीन जिंदा हैं। इनके साथ, भारत में पैदा हुए 22 शावकों को मिलाकर, नामीबिया में पैदा हुए चीतों और उनके बच्चों की कुल संख्या 25 हो गई है।

अधिकारियों ने बताया कि 18 फरवरी, 2023 को, दक्षिण अफ्रीका से 12 चीते लाए गए थे, और उनमें से आठ जिंदा हैं। भारत में दस शावकों के जन्म के साथ, दक्षिण अफ्रीका मूल के बचे हुए चीतों और उनके बच्चों की आबादी 18 हो गई है। इस ग्रुप में से 15 KNP में और तीन गांधी सागर में हैं।

इस साल फरवरी में, बोत्सवाना से नौ चीते भारत लाए गए, जिससे भारत में चीतों की बहाली के लिए इंटरनेशनल बेस और मज़बूत हुआ। कुनो में कुल 49 चीतों में से 17 खुले जंगल में हैं, जिनमें 10 नर और सात मादा हैं, जबकि 32 सॉफ्ट-रिलीज बाड़ों में हैं। अधिकारी ने कहा कि इनमें पांच नर, आठ मादा और एक साल से कम उम्र के 19 शावक शामिल हैं।

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कोडिंग छोड़कर जंगलों में रहकर, जानवरों से सीखा बिजनेस और खड़ा कर दिया करोड़ों का स्टार्टअप!

13 साल तक टेक्नोलॉजी की दुनिया में काम करने के बाद हैदराबाद के एक इंजीनियर ने अपना करियर बदलने का फैसला किया। उन्होंने IT की नौकरी छोड़कर वाइल्डलाइफ के अपने पुराने शौक को ही बिजनेस का रूप दे दिया। इस तरह ‘वाइल्डलाइफ व्हिस्परर्स’ की शुरुआत हुई, जो जानवरों और नेचर से मिलने वाली सीख को कॉर्पोरेट ट्रेनिंग से जोड़ती है। बिना किसी बाहरी फंडिंग के शुरू हुई इस कंपनी ने पहले ही साल करीब 80 लाख रुपये का रेवेन्यू कमाया।

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टेक से वाइल्डलाइफ तक

2010 में इलेक्ट्रॉनिक्स और कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने हैदराबाद, चेन्नई और मुंबई में काम किया। इसके बाद 2014 में डेटा साइंस में मास्टर्स करने के लिए अमेरिका चले गए। IT में काम करते हुए भी उनका नेचर और जानवरों से प्यार कम नहीं हुआ। वीकेंड पर वह DSLR कैमरा लेकर जंगल और नेशनल पार्क घूमने निकल जाते थे। धीरे-धीरे भारत, अमेरिका और अफ्रीका के कई नेशनल पार्कों में ट्रैवल ने उनकी इस दिलचस्पी को और बढ़ा दिया।

 

 

फोटोग्राफी से मिला नया बिजनेस विजन

शुरुआत में वाइल्डलाइफ फोटोग्राफी उनके लिए जानवरों की फोटो लेने का एक शौक था। लेकिन बाद में उन्हें समझ आया कि जंगल सिर्फ खूबसूरत तस्वीरों के लिए नहीं, बल्कि जानवरों का व्यवहार, उनका एक-दूसरे के साथ जुड़ाव और मुश्किल कंडीशन में उनका सर्वाइव करना इंसानों को भी बहुत कुछ सिखा सकता है। इसी सोच ने आगे चलकर उनके बिजनेस आइडिया की नींव रखी।

 

 

जंगली जानवरों ने सिखाया कॉर्पोरेट मैनेजमेंट

‘वाइल्डलाइफ व्हिस्परर्स’ में जंगल और जानवरों के उदाहरणों के जरिए कॉर्पोरेट टीमों को कई जरूरी बातें सिखाई जाती हैं। जैसे, शेरों से टीमवर्क, चींटियों से काम बांटने यानी डेलिगेशन और मधुमक्खियों से खतरे के समय मिलकर काम करने की सीख ली जाती है। इन उदाहरणों को लीडरशिप, टीमवर्क, मुश्किल समय में मजबूती से टिके रहने और माइंडफुलनेस जैसे सब्जेक्ट से जोड़ा जाता है।

 

 

जंगल बना ट्रेनिंग क्लासरूम

यह बिजनेस सिर्फ ऑफिस में बैठकर होने वाली सामान्य ट्रेनिंग तक सीमित नहीं है। कंपनी कॉर्पोरेट वर्कशॉप के साथ-साथ कई दिनों तक चलने वाले जंगल के एक्सपीरियंस भी कराती है। इन प्रोग्राम्स में टीम के लोगों को नेचर के पास ले जाकर ऐसी एक्टिविटी कराई जाती हैं, जिनसे वे लीडरशिप और मुश्किल हालात में सही फैसला लेने जैसी चीजें सीख सकें। इस तरह जंगल एक तरह से उनका अलग और अनोखा ट्रेनिंग क्लासरूम बन जाता है।

 

लाखों के आइडिया का हिट फॉर्मूला

इस अनोखे बिजनेस आइडिया को कॉर्पोरेट कंपनियों से अच्छा रिस्पॉन्स मिला। रिपोर्ट के मुताबिक, बिना इन्वेस्टमेंट के शुरू हुई ‘वाइल्डलाइफ व्हिस्परर्स’ ने अपने पहले साल में करीब 80 लाख रुपये का रेवेन्यू कमाया। कंपनी ने परफेटी वैन मेले और सीमेंस डिजिटल जैसी कंपनियों के साथ काम किया है। इस बिजनेस में टेक्नोलॉजी और कॉर्पोरेट एक्सपेरिएंस को नेचर और वाइल्डलाइफ के जुनून के साथ जोड़कर एक बिल्कुल अलग तरह का मॉडल तैयार किया गया है।

 

यह कहानी बताती है कि करियर शिफ्ट करने के साथ अपने जुनून पर भरोसा करना भी जरूरी है। सही सोच और मेहनत के साथ पसंद के काम को भी एक सफल बिजनेस बनाया जा सकता है। नेचर से सीख लेकर शुरू किया गया यह अनोखा सफर दूसरों को भी अपनी स्किल और इंटरेस्ट को नए तरीके से देखने के लिए इंस्पिरेशन देता है।

ग्लो झील ने रचा इतिहास! अरुणाचल प्रदेश को मिली पहली रामसर साइट

अरुणाचल प्रदेश के लिए बड़ी खुशखबरी सामने आई है। राज्य के लोहित जिले में ग्लो झील को भारत की 101वीं रामसर साइट का दर्जा मिला है। यह उपलब्धि राज्य के लिए बेहद खास मानी जा रही है और इससे अरुणाचल प्रदेश को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली है।

ग्लो झील (Glow Lake)

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अरुणाचल प्रदेश के लोहित जिले में स्थित ग्लो झील को रामसर साइट घोषित किया गया है। यह राज्य की पहली वेटलैंड है, जिसे रामसर कन्वेंशन के तहत अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली है। यह उपलब्धि अरुणाचल प्रदेश के लिए काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। रामसर साइट बनने का मतलब है कि यह झील पर्यावरण और जैव-विविधता के लिहाज से बेहद खास है। अब इस प्राकृतिक धरोहर की सुरक्षा और संरक्षण पर पहले से ज्यादा ध्यान दिया जाएगा। इससे आने वाले समय में झील को सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी।

 

रामसर साइट (Ramsar Site)

Glow Lake - A Unique Destination With Friendly Atmosphere

रामसर साइट उन वेटलैंड यानी आर्द्रभूमियों को कहा जाता है, जिनका पर्यावरण और बायोडाइवर्सिटी के लिए विशेष महत्व होता है। इन जगहों को इंटरनेशनल लेवल पर संरक्षण के लिए चुना जाता है। ऐसी जगहों पर कई दुर्लभ पौधे, पक्षी और वन्यजीव रहते हैं। साथ ही ये जल संरक्षण, बाढ़ नियंत्रण और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाती हैं। इसलिए इनकी सुरक्षा पूरी दुनिया के लिए जरूरी मानी जाती है।

 

मीठे पानी की झील (Freshwater lake)

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ग्लो झील ऊंचाई पर मीठे पानी की झील है। इसमें पहाड़ों से निकलने वाली बारहमासी जलधाराओं का साफ पानी आता है। झील चारों ओर से घने जंगलों और प्राकृतिक हरियाली से घिरी हुई है, जिससे यहां का वातावरण बेहद शांत और सुंदर दिखाई देता है। इस इलाके में 150 से ज्यादा तरह के पेड़ और 49 प्रकार के ऑर्किड पाए जाते हैं। यही वजह है कि इसे पूर्वी हिमालय का एक बायोडाइवर्सिटी हॉटस्पॉट माना जाता है।

 

पर्यावरण के लिए जरूरी (Importance for Environment)

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ग्लो झील केवल एक खूबसूरत टूरिस्ट डेस्टिनेशन नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण के लिए भी जरुरी है। यह झील पानी को सुरक्षित रखने, आसपास की नदियों में जल प्रवाह बनाए रखने और प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने में मदद करती है। इसके अलावा यह कार्बन को संग्रहित करने में भी भूमिका निभाती है, जिससे जलवायु परिवर्तन के इफेक्ट को कम करने में मदद मिलती है। साइंटिस्ट भी इस झील को महत्वपूर्ण मानते हैं।

 

लोगों और टूरिस्म को फायदा (Benefits for Local Communities and Tourism)

रामसर साइट का दर्जा मिलने के बाद इस एरिया में इको-टूरिज्म को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। इससे देश-विदेश से ज्यादा टूरिस्ट यहां आ सकते हैं, जिससे यहां के लोगों को रोजगार और आय के नए अवसर मिलेंगे। लोकल आदिवासी समुदाय अपनी संस्कृति और प्राकृतिक विरासत को सुरक्षित रखते हुए टूरिस्म से जुड़ सकेंगे। इससे इलाके का डेवेलप भी होगा और लोगों की आजीविका भी बेहतर होगी।

संरक्षण और रिसर्च (Conservation and Research)

रामसर साइट बनने के बाद ग्लो झील के संरक्षण के लिए विशेष प्रबंधन योजनाएं तैयार की जाएंगी। इसके साथ ही इस क्षेत्र को बेहतर कानूनी सुरक्षा और इंटरनेशनल एक्सपर्ट की टेक्निकल सलाह भी मिल सकेगी। भविष्य में यहां साइंटिस्ट रिसर्च, पर्यावरण अध्ययन और बायोडाइवर्सिटी पर निगरानी के लिए फंड मिलने की संभावना भी बढ़ जाएगी।

 

प्राकृतिक धरोहर की रक्षा (Protection of natural heritage)

अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू (Pema Khandu) ने ग्लो झील को रामसर साइट का दर्जा मिलने पर खुशी जताई। उन्होंने कहा कि यह राज्य के लिए गर्व की बात है और इससे बायोडाइवर्सिटी कंजर्वेशन को नई मजबूती मिलेगी। उन्होंने यह भी कहा कि इस उपलब्धि से पर्यावरण संरक्षण के साथ ही आने वाली जनरेशन भी राज्य की इस अनमोल प्राकृतिक धरोहर की रक्षा के लिए प्रेरित होंगी।

27 गैंडों के शिकार से Zero Poaching तक, एक अफसर ने बदल दी जंगल की तस्वीर | IFS Sandeep Kumar

एक समय था, जब काज़ीरंगा में हर साल गैंडों का शिकार होना आम बात थी।

आज वही काज़ीरंगा दुनिया के सामने इस बात की मिसाल है कि सही नेतृत्व, आधुनिक तकनीक और लोगों की साझेदारी से दशकों पुराना संकट भी खत्म किया जा सकता है।

IFS संदीप कुमार और उनकी टीम ने साबित कर दिया कि जब इरादा मज़बूत हो, तो बदलाव सिर्फ़ संभव नहीं… इतिहास बन जाता है. 🦏

27 गैंडों के शिकार से Zero Poaching तक, एक अफसर ने बदल दी जंगल की तस्वीर | IFS Sandeep Kumar | Kaziranga | Assam

[ Kaziranga National Park, Rhino Conservation, IFS Sandeep Kumar, Wildlife Conservation, Assam Forests, Environmental Action, Civic Responsibility, Grassroots Impact]

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Video: 4-5 मीटर लंबे विशाल फन फैलाए इस किंग कोबरा को कैसे नंगे हाथ सिर्फ पाइप और बैग से पकड़ लिया, Pipe में क्यों घुस जाते हैं Snake?

सोशल मीडिया पर वन्यजीवों और सांपों के रेस्क्यू के कई वीडियो वायरल होते हैं, लेकिन हाल ही में एक्स (पहले ट्विटर) पर सामने आया एक वीडियो लोगों के होश उड़ा रहा है। इस वीडियो में एक जांबाज रेस्क्यूअर महज एक साधारण पाइप और बैग की मदद से 4 से 5 मीटर लंबे विशालकाय किंग कोबरा को बेहद आसानी से पकड़ते हुए नजर आ रहा है। इस हैरान कर देने वाले रेस्क्यू वीडियो पर भारतीय वन सेवा (IFS) के अधिकारी हिमांशु त्यागी ने अपनी प्रतिक्रिया दी है और वैज्ञानिक नजरिए से समझाया है कि आखिर खुले में आक्रामक दिखने वाला सांप खुद ब खुद पाइप के अंदर क्यों घुस जाता है।

वायरल वीडियो में क्या है?

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट किए गए इस वीडियो में देखा जा सकता है कि एक कंक्रीट की संकरी गली में एक विशालकाय किंग कोबरा फन फैलाए बैठा है। सांप की लंबाई करीब 4-5 मीटर है। इतने बड़े और खतरनाक सांप को पकड़ने के लिए रेस्क्यूअर ने किसी भारी-भरकम उपकरण या बल का प्रयोग नहीं किया, बल्कि उसने बेहद सूझबूझ के साथ सांप के आगे एक पाइप और उससे जुड़ा बैग रख दिया। कुछ ही पलों में वह खतरनाक किंग कोबरा बिना किसी आक्रामकता के बेहद शांति से खुद उस पाइप के रास्ते बैग के अंदर चला गया।

इस वीडियो को यहां नीचे देखिए

Pipe में क्यों घुस जाते हैं सांप? IFS अफसर ने समझाया विज्ञान

IFS अधिकारी हिमांशु त्यागी ने इस वायरल वीडियो का विश्लेषण करते हुए बताया कि सांप का इस तरह खुद पाइप में चले जाना कोई जादू नहीं बल्कि जीव विज्ञान है। उन्होंने इसके पीछे थिग्मोटैक्सिस (Thigmotaxis) नाम के एक विशेष व्यवहार को जिम्मेदार ठहराया है।

सुरक्षा की तलाश (Thigmotaxis): आईएफएस त्यागी के मुताबिक जब किंग कोबरा जैसी प्रजाति का सांप किसी कंक्रीट की गली जैसी खुली जगह पर खुद को असुरक्षित या खतरे में महसूस करता है तो उसकी जन्मजात प्रवृत्ति उसे किसी तंग, अंधेरी और बंद जगह की तलाश करने के लिए प्रेरित करती है। रेस्क्यू के दौरान जब सांप के सामने पाइप लाया गया तो उसने उस बंद और अंधेरी जगह को अपने छिपने और सुरक्षित रहने का ठिकाना मान लिया और वह खुद-ब-खुद उसमें दाखिल हो गया।

क्यों कारगर और सुरक्षित है पाइप और बैग का यह तरीका?

आमतौर पर सांपों को पकड़ने के लिए स्टिक का इस्तेमाल किया जाता है या उन्हें बलपूर्वक दबोचा जाता है। इससे सांप और रेस्क्यूअर दोनों के लिए खतरा बढ़ जाता है। लेकिन पाइप और बैग की यह तकनीक सबसे सुरक्षित मानी जाती है क्योंकि इसमें सांप को जबरन पकड़ने या उस पर दबाव बनाने के बजाय उसे खुद अपनी मर्जी से आगे बढ़ने का मौका दिया जाता है। इस तरीके से रेस्क्यू करने पर सांप बहुत कम तनाव में आता है और इंसानों को काटने या रेस्क्यू के दौरान होने वाले जोखिम का खतरा भी काफी हद तक कम हो जाता है।

शिकारी स्वभाव पर भारी पड़ता है आत्मरक्षा का भाव

किंग कोबरा सांपों के साम्राज्य का एपेक्स प्रेडेटर यानी शीर्ष शिकारी माना जाता है। ये दूसरे सांपों का भी शिकार करता है। वे शिकार की तलाश करने के लिए अपने जैकोब्सन्स ऑर्गन के माध्यम से रासायनिक संकेतों का उपयोग करते हैं। आईएफएस त्यागी ने स्पष्ट किया कि जब किंग कोबरा खुद को किसी विपरीत परिस्थिति या रेस्क्यू के माहौल में पाता है तो उसका यह शिकारी स्वभाव पीछे छूट जाता है। ऐसे समय में अपनी जान बचाने और सुरक्षित आश्रय खोजने का उसका जन्मजात रक्षात्मक व्यवहार सबसे पहले सक्रिय हो जाता है और जैसे ही उसे भागने या छिपने का विकल्प (पाइप के रूप में) मिलता है वह उसकी तरफ बढ़ जाता है।