सरकार को चैन नहीं लेने देगी कांग्रेस

ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस पार्टी ने फैसला कर लिया है कि वह सरकार को चैन नहीं लेने देगी। इसके लिए उसने तय किया है कि वह सरकार के हर फैसले को संदिग्ध बना देगी और हर कदम पर उससे सवाल करेगी। इसका पता नहीं कितना राजनीतिक लाभ मिलेगा लेकिन यह जरूर है कि भाजपा और सरकार के तंत्र को जवाब देने में बड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर और पहले से चल रहे विवादों को छोड़ दें तो हाल के दो मामले ऐसे हैं, जिनमें ऊपरी तौर पर कोई गड़बड़ी नहीं दिख रही है लेकिन कांग्रेस ने इसे मुद्दा बना दिया और ऐसा विवाद खड़ा किया कि सरकार बैकफुट पर आ गई है।

पहला मामला अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो के भारत दौरे से जुड़ा है। विदेश मंत्री एस जयशंकर और रूबियो की मुलाकात मुंबई में तय हुई है। इस पर राहुल गांधी ने कहा कि अमेरिका के विदेश मंत्री ने अपने कर्मचारी को मुंबई तलब किया। इस बात को कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने भी आगे बढ़ाया। अब सोचें, भारत के दौरे पर आ रहे अमेरिका के विदेश मंत्री से अगर भारत के विदेश मंत्री देश के किसी और शहर में मिलेंगे तो यह कहा जाएगा कि उनको वहां तलब किया गया? भारत के विदेश मंत्री को अमेरिकी विदेश मंत्री का कर्मचारी बता कर राहुल कौन सा नैरेटिव सेट कर रहे हैं? लेकिन उन्होंने जानते बूझते ऐसा कर दिया क्योंकि उनको पता है कि सरकार इस पर भी बैकफुट पर आएगी। कई बार ऐसा होता है कि नेता राजधानी से इतर दूसरे शहरों में मिलते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन गए तो राष्ट्रपति शी जिनपिंग से उनकी मुलाकात वुहान में हुई। तो क्या कहा जा सकता है कि मोदी ने जिनपिंग को वुहान तलब किया?

बहरहाल, दूसरा मामला जनगणना के नियमों में बदलाव का है। भारत के महापंजीयक ने अगले साल होने वाली जनगणना में सरकारी कर्मचारियों और शिक्षकों के अलावा निजी स्कूलों के शिक्षकों व कर्मचारियों और वॉलंटियर्स को भी शामिल करने का फैसला किया है। महापंजीयक कार्यालय की ओर से इसका आदेश निकला तो कांग्रेस ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के लोगों के लिए रोजगार योजना है। जबकि यह एक अच्छी पहल है कि वॉलंटियर्स को प्रशिक्षण देकर इस तरह के कामों में लगाया जाए। इससे स्कूलों में शिक्षकों की कमी से होने वाली समस्याएं कम होंगी, स्कूलों में पढ़ाई का काम कम प्रभावित होगा और सरकारी कार्यालयों के कामकाज में आने वाली बाधा भी दूर होगी। इसी तरह की योजना के तहत अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली में अपनी सरकार रहते हुए अपने कार्याकर्ताओं को सिविल डिफेंस वॉलंयिटर्स के रूप में भर्ती किए थे। अपने लोगों को बस मार्शल में रखा था और चौराहों पर तख्ती लेकर खड़े होने के लिए भी अपने लोगों को चुना था। अगर यह रोजगार की भी योजना है तो इससे कुछ लोगों को काम मिलेगा।

जनगणना के नए नियम पर विवाद क्यों

छह साल की देरी से हो रही जनगणना के लिए इसके नियमों में संशोधन किया गया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन आने वाले भारत के महापंजीयक कार्यालय ने जनगणना अधिनियम 1948 की धारा 18 की उपधारा एक के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए जनगणना नियम 1990 में कुछ और बदलाव करने के लिए निर्देश जारी किए हैं। इनमें प्रस्तावित बदलावों को लेकर कांग्रेस पार्टी ने आपत्ति दर्ज कराई है। कांग्रेस की आपत्तियों पर बात करने से पहले उन दो बदलावों को रेखांकित करने की आवश्यकता है, जो अपनी प्रकृति में बिल्कुल नई हैं। पहला, महापंजीयक कार्यालय ने पहली बार सरकारी स्कूलों व कार्यालयों के कर्मियों के साथ साथ निजी स्कूलों और ट्रस्टों के कर्मियों को भी जनगणना के काम में शामिल करने का प्रस्ताव किया है और दूसरा, किसी सामान्य नागरिक को भी बतौर वॉलंटियर इसमें शामिल करने का प्रस्ताव है। महापंजीयक कार्यालय की ओर से 16 अक्टूबर को जारी अधिसूचना के मुताबिक, ‘ऐसा कोई व्यक्ति, जिसे राज्य सरकार या संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन, प्रगणक के रूप में कर्तव्यों का निष्पादन करने के लिए उपयुक्त समझे’ उसे जनगणना के काम में लगाया जा सकता है।

कांग्रेस ने इस प्रस्ताव पर आपत्ति की है। कांग्रेस का कहना है कि राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के लोगों को जनगणना के काम में शामिल करने के लिए यह बदलाव किया जा रहा है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने दावा किया है कि इस साल 10 से 12 जुलाई को कर्नाटक के बेलगाम में आरएसएस के कार्यकर्ताओं का एक बड़ा प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया गया था, जिसका एकमात्र एजेंडा जनगणना 2027 था। उनका कनहा है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 26 मई 2026 को देश की बदलती डेमोग्राफी पर सुझाव देने के लिए एक उच्चस्तरीय कमेटी का गठन किया था। उस कमेटी में सभी सदस्य आरएसएस हैं और उसके सुझाव पर ही जनगणना के नियमों में बदलाव किया जा रहा है। कांग्रेस को आशंका है कि डेमोग्राफी पर बनी कमेटी और आरएसएस के लोगों को जनगणना में शामिल करके एसआईआर की तरह जनगणना के आंकड़ों में भी खतरनाक तरीके से हेरफेर किया जाएगा। हालांकि खतरनाक रूप से क्या हेराफेरी हो सकती है यह कांग्रेस ने नहीं बताया है। फिर भी कांग्रेस की आशंका को आधारहीन बता कर खारिज नहीं किया जा सकता है। लेकिन सवाल है कि क्या भारत में ऐसी एक व्यवस्था की आवश्यकता नहीं है, जहां वालंटियर्स यानी स्वैच्छिक कार्यकर्ताओं की मदद से जनगणना, मतदाता सूची के पुनरीक्षण, सामाजिक व आर्थिक सर्वेक्षण, नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे जैसे काम कराए जाएं?

ध्यान रहे दुनिया भर के देशों में ऐसी व्यवस्था है। पता नहीं कांग्रेस और दूसरी पार्टियों ने कभी इसका अध्ययन करने का प्रयास किया है या नहीं कि अमेरिका में लगभग पूरा चुनाव वालंटियर्स की देखरेख में होता है। वहां भारत के चुनाव आयोग जैसी कोई केंद्रीय संस्था नहीं है। राज्यों में अपनी अपनी संस्थाएं हैं। लेकिन उनमें भी बहुत लंबी चौड़ी वर्क फोर्स नहीं है और न चुनाव कराने के लिए स्कूलों के शिक्षक व सरकारी कर्मचारियों को बड़े पैमाने पर शामिल किया जाता है। थोड़े से सरकारी कर्मचारी और ढेर सारे वॉलंटियर मिल कर चुनाव कराते हैं। दशकों से ऐसे ही चुनाव होते हैं और डोनाल्ड ट्रंप के आने से पहले किसी ने चुनाव प्रक्रिया में गड़बड़ी के आरोप भी नहीं लगाए थे। भारत में इस तरह की व्यवस्था बनाने की बहुत आवश्यकता है।

भारत में आजादी के बाद से ही तदर्थ प्रक्रिया चल रही है। सरकारी कर्मचारियों को और उसमें भी सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को किसी भी तरह की ड्यूटी में लगा दिया जाता है। मतदाता सूची का ‘संक्षिप्त’ या ‘विशेष संक्षिप्त’ या ‘विशेष गहन’ पुनरीक्षण होना है तो सरकारी शिक्षक करेंगे, मतदान कराना है तो सरकारी शिक्षक कराएंगे, मतगणना करनी है तो सरकारी शिक्षक करेंगे, सामाजिक व आर्थिक सर्वे करना हो, नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे करना हो, पशुओं की गिनती करनी हो, टीकाकरण करना हो, कोरोना या बाढ़ जैसी कोई महामारी में राहत बांटना हो, सारे काम सरकारी शिक्षकों को करने होते हैं। कुछ दिन पहले ही एक शिक्षक ने सोशल मीडिया में तंज करते हुए कहा कि वह तो अच्छा है कि सरकार कृषि कार्य नहीं कराती है अन्यथा फसलों की बुवाई, कटाई भी सरकारी स्कूल के शिक्षक करते। सचमुच ऐसी ही स्थिति है। इसका सीधा असर शिक्षा व्यवस्था पर पड़ता है। अभी एसआईआर की प्रक्रिया चल रही है तो राजधानी दिल्ली जैसे राज्य में सैकड़ों स्कूल एक एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। सरकारी स्कूलों के शिक्षकों से ये सब काम कराने से साल के कई महीने तक पढ़ाई, लिखाई का काम लगभग पूरी तरह से ठप्प रहता है।

सरकार ने अब अनुदान प्राप्त और बिना अनुदान वाले निजी स्कूलों के शिक्षकों को भी इसमें शामिल करने का प्रस्ताव दिया है। इससे वहां भी सरकारी स्कूलों जैसे ही पढ़ाई प्रभावित होगी। ऐसा लग रहा है कि सरकार स्कूली शिक्षा को पूरी तरह से बरबाद करने का संकल्प किए हुए है। वैसे पिछले दिनों आरएसएस से जुड़े रहे एक युवा स्कॉलर के मुंह से सुनने को मिला कि स्कूली शिक्षा को लेकर ‘भाई साहेब’ लोग क्या सोच रहे हैं। एक ‘भाई साहेब’ ने उस युवा स्कॉलर से कहा था कि कॉलेज पहुंचने वाले युवा इतने आंदोलित इसलिए हो रहे हैं क्योंकि देश में आज भी बड़ी संख्या में अच्छे स्कूल चल रहे हैं, जहां से वे पढ़ कर आते हैं। कॉलेज और यूनिवर्सिटीज की पढ़ाई और प्रशासन की व्यवस्था तो पिछले कुछ बरसों में पूरी तरह से बिगाड़ दी गई है। लेकिन चूंकि वे अच्छे स्कूल से आते हैं तो बिगड़े हुई व्यवस्था वाले कॉलेजों में एडजस्ट होने में उनको दिक्कत होती है। सो, इसका उपाय यह है कि स्कूली शिक्षा को भी वैसे ही बरबाद कर दिया जाए जैसे कॉलेज और यूनिवर्सिटीज को किया गया है।

बहरहाल, अगर सरकार गंभीर है तो उसे कांग्रेस की आलोचना की परवाह नहीं करनी चाहिए और देश में ऐसे कामों के लिए वॉलंटियर्स का नेटवर्क तैयार करना चाहिए। इससे देश के युवाओं को सीजनल रोजगार भी मिलेगा और यह बड़ी वर्क फोर्स तैयार होगी। ध्यान रहे देश की आबादी डेढ़ सौ करोड़ है और यहां जनगणना और चुनाव से लेकर अलग अलग तरह के सर्वेक्षण का काम बहुत बड़े पैमाने पर होता है। इसके लिए पढ़े, लिखे बेरोजगार नौजवानों को अगर वालंटियर के तौर पर शामिल किया जाए तो यह योजना ग्रामीण रोजगार की मनरेगा जैसी योजना से बड़ी हो सकती है और इसमें ज्यादा लोगों को रोजगार मिल सकता है। इसके लिए बहुत गहन गंभीर प्रशिक्षण की आवश्यकता भी नहीं होती है। सरकार एक बार प्रशिक्षण की व्यवस्था करके वालंटियर्स की फौज तैयार कर सकती है। यह वर्क फोर्स सरकारी कामकाज तो करेगी ही साथ ही निजी कंपनियों, विज्ञापन एजेंसियों, चुनावी सर्वे करने वाली कंपनियों आदि के लिए भी उपलब्ध रहेगी।

इस मामले में कांग्रेस की आलोचना का कोई खास आधार नहीं है। अगर सरकारी शिक्षक ही जनगणना करेंगे तो क्या गारंटी है कि जयराम रमेश जिस हेरफेर की आशंका जता रहे हैं वह नहीं होगी? आखिर मतदाता सूची का काम तो सरकारी लोग ही कर रहे हैं तो क्या कांग्रेस को उस पर भरोसा है? जयराम रमेश को यह समझना चाहिए सरकारी और निजी शिक्षकों में भी संघ और भाजपा के प्रति रूझान रखने वाले लोग होंगे और कांग्रेस व विपक्ष को पसंद करने वाले भी होंगे। वैसे ही चुनाव कराने या जनगणना के लिए वॉलंटियर नियुक्त होंगे तो उसमें भी हर विचार और राजनीतिक रूझान वाले लोग होंगे। अगर पेशेवर तरीके से कामकाज का वातावरण बनता है, तकनीक का बेहतर इस्तेमाल होता है और निगरानी की ईमानदार व्यवस्था बनती है तो वॉलंटियर वाली व्यवस्था एक साथ भारत की कई समस्याओं का समाधान कर सकती है।

EPFO: सैलरी ₹25,000 है तो तुरंत करें यह काम! EPFO के नए नियम से होगा बड़ा फायदा, जानें स्टेप-बाय-स्टेप प्रोसेस

EPFO Wage Limit Hike: केंद्र सरकार ने बीतें दिनों कर्मचारियों की मिनिमम सैलरी को लेकर एक बड़ा ऐलान किया था। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के तहत अनिवार्य सामाजिक सुरक्षा कवरेज के लिए मासिक वेतन सीमा को ₹15,000 से बढ़ाकर ₹25,000 प्रति माह कर दिया गया। 17 सितंबर से लागू हुए इस फैसले के बाद लगभग 51 लाख से अधिक नए कर्मचारियों को अब प्रोविडेंट फंड, पेंशन और इंश्योरेंस (EDLI) के दायरे में लाया जाएगा।

वैसे सिर्फ ₹25,000 से कम वेतन होना ही पात्रता की एकमात्र गारंटी नहीं है। कर्मचारियों को संबंधित योजनाओं के नियमों और शर्तों को पूरा करना होगा। आइए विस्तार से समझते हैं कि इस नई लिमिट का आपको कैसे फायदा मिलेगा और आप अपनी पात्रता कैसे चेक कर सकते हैं।

नए नियम के तहत कौन-कौन हो सकता है शामिल?

यह बदलाव मुख्य रूप से उन कर्मचारियों के लिए सबसे ज्यादा फायदेमंद है, जो पहले सिर्फ इसलिए EPF कवरेज से बाहर थे क्योंकि उनका मूल वेतन (Basic Salary + DA) ₹15,000 प्रति माह से अधिक था।

श्रम मंत्रालय के अनुसार, जिन कर्मचारियों का वेतन ₹15,000 से ₹25,000 के बीच है और वे संबंधित शर्तों को पूरा करते हैं, उन्हें अब EPF के तहत नामांकित किया जा सकता है। जो कर्मचारी पहले से ही EPF के सदस्य हैं, उनका योगदान उनके लागू वेज बेस और सदस्यता की स्थिति पर निर्भर करेगा।

EPF, EPS और EDLI में कैसे कराएं अपना नामांकन?

कर्मचारी व्यक्तिगत रूप से किसी अलग सार्वजनिक फॉर्म के जरिए तीनों योजनाओं में सीधे रजिस्ट्रेशन नहीं कर सकते। इसके लिए नियोक्ता को ही प्रक्रिया पूरी करनी होती है:

एलिजिबिलिटी चेक करें: सबसे पहले यह पक्का करें कि आपका मासिक वेतन ₹25,000 से अधिक नहीं है और आप योजना की अन्य शर्तों को पूरा करते हैं।

HR या पेरोल टीम से संपर्क करें: अपने नियोक्ता की HR या अकाउंट्स टीम से संपर्क करें ताकि वे आपकी पात्रता सत्यापित कर आपका एनरोलमेंट शुरू कर सकें।

जरूरी दस्तावेज दें: अपनी पहचान, रोजगार विवरण, आधार विवरण और बैंक खाते की जानकारी नियोक्ता को सौंपें।

कंट्रिब्यूशन वेरिफाई करें: नामांकन पूरा होने के बाद अपनी सैलरी स्लिप और EPFO पासबुक चेक करें ताकि यह पक्का हो सके कि पीएफ कटौती और योगदान सही से दर्ज हो रहा है।

EPF, EPS और EDLI से आपको क्या-क्या फायदे मिलेंगे?

योजना का नाम मुख्य लाभ
कर्मचारी भविष्य निधि (EPF)कर्मचारी और नियोक्ता के योगदान और उस पर मिलने वाले ब्याज के जरिए रिटायरमेंट के लिए बड़ा फंड बनता है।
कर्मचारी पेंशन योजना (EPS) अर्हता सेवा और पेंशन नियमों के आधार पर पात्र सदस्यों को आजीवन पेंशन मिलती है।
कर्मचारी जमा सम्बद्ध बीमा (EDLI) EPF सदस्यता से जुड़ा मुफ्त जीवन बीमा कवर, जिसके तहत अनहोनी की स्थिति में नॉमिनी को क्लेम की राशि मिलती है।

क्या अब आपकी PF कटौती बढ़ जाएगी?

नई वेज सीलिंग लागू होने से पात्र कर्मचारियों के योगदान की गणना के लिए वेतन आधार बढ़ सकता है। नए ढांचे के तहत, अंशदान के लिए अधिकतम वेतन सीमा ₹25,000 या कर्मचारी का वास्तविक वेतन जो भी कम हो वो मानी जाएगी।

इस गणित को ऐसे समझिए, अगर आपके ₹25,000 के पूरे वेतन आधार पर 12% पीएफ कटता है, तो कर्मचारी का मासिक योगदान ₹3,000 होगा। नियोक्ता का 12% योगदान नियमानुसार EPF और EPS में बंटेगा, जबकि EDLI का प्रीमियम अलग से पूरी तरह नियोक्ता द्वारा दिया जाएगा।

कनाडा से अलग होने पर आज अल्बर्टा में वोटिंग:70% लोग साथ रहने के पक्ष में, तेल की कमाई को लेकर 50 साल पुराना झगड़ा

कनाडा के अल्बर्टा प्रांत में 19 अक्टूबर को जनमत संग्रह हो रहा है। इसमें लोग तय करेंगे कि प्रांत को कनाडा का हिस्सा बने रहना चाहिए या नहीं। इप्सोस-ग्लोबल न्यूज के सर्वे में अल्बर्टा के करीब 70% लोग कनाडा के साथ बने रहने के पक्ष में हैं। इसके बावजूद अलग देश बनाने की मांग करने वाले लोग पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। अल्बर्टा में अलग देश बनाने की मांग कोई नई बात नहीं है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह तेल से होने वाली कमाई और केंद्र सरकार के साथ पैसों के बंटवारे को लेकर नाराजगी है। अल्बर्टा में तेल का चौथा सबसे बड़ा भंडार अल्बर्टा में दुनिया के प्रमाणित तेल भंडार के मामले में चौथा सबसे बड़ा भंडार है। यहां का तेल उद्योग, रोजगार और कमाई का बड़ा जरिया है। अलग देश बनाने के समर्थकों का कहना है कि अल्बर्टा केंद्र सरकार को बहुत पैसा देता है, लेकिन उसे बदले में उतना फायदा नहीं मिलता। उनका आरोप है कि प्रांत की कमाई का इस्तेमाल कनाडा के दूसरे हिस्सों की मदद के लिए किया जाता है। वर्ष 2015 में जस्टिन ट्रूडो के प्रधानमंत्री बनने के बाद यह विवाद फिर बढ़ा। उनकी सरकार ने कार्बन टैक्स और प्रदूषण घटाने के लिए कई नियम लागू किए। अल्बर्टा के तेल उद्योग से जुड़े लोगों ने इनका विरोध किया। उनका मानना था कि इन नियमों से तेल का कारोबार प्रभावित होगा। क्या वोटिंग के बाद अल्बर्टा अलग देश बन जाएगा? नहीं। इस जनमत संग्रह में लोगों से सीधे यह फैसला नहीं कराया जा रहा कि अल्बर्टा तुरंत अलग देश बने या नहीं। उनसे पूछा जा रहा है कि क्या अलग होने की दिशा में आगे बढ़ने के लिए कानूनी प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए। लोगों के सामने दो विकल्प हैं- 1. कनाडा का हिस्सा बने रहना 2. भविष्य में अलग होने पर फैसला लेने के लिए जनमत संग्रह की प्रक्रिया शुरू करना अगर लोग दूसरे विकल्प के पक्ष में वोट देते हैं, तब भी अल्बर्टा तुरंत अलग देश नहीं बन जाएगा। इसके लिए कनाडा की केंद्र सरकार, दूसरे प्रांतों और वहां रहने वाले मूल निवासी समुदायों के साथ बातचीत करनी होगी। अलग होने की स्थिति में कई सवालों पर फैसला लेना होगा। इनमें संसाधनों का बंटवारा, अधिकार और कनाडा के साथ भविष्य के रिश्ते शामिल हैं। प्रधानमंत्री कार्नी अल्बर्टा के हैं, अलग के पक्ष में नहीं कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी खुद अल्बर्टा में पले-बढ़े हैं। वे भी मानते हैं कि प्रांत के लोगों में नाराजगी है। हालांकि, वे अल्बर्टा को कनाडा से अलग करने के पक्ष में नहीं हैं। उन्होंने लोगों को आगाह किया है कि वे अलग होने के पक्ष में वोट न करें। ऐसा फैसला देश में लंबे समय तक राजनीतिक खींचतान और अनिश्चितता पैदा कर सकता है। कार्नी ने कहा कि केंद्र सरकार की नीतियों के कारण अल्बर्टा के कई लोगों को ऐसा लगता है, जैसे उनके अपने संसाधन भी उनके नहीं हैं। हालांकि सरकार अल्बर्टा के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश कर रही है। मुख्यमंत्री अलग होने के खिलाफ फिर जनमत संग्रह क्यों करा रहीं? अल्बर्टा के मुख्यमंत्री डेनियल स्मिथ ने पिछले साल जनमत संग्रह कराने की प्रक्रिया आसान कर दी थी। इसके बाद आजादी का मुद्दा राज्य की राजनीति में और चर्चा में आ गया। हालांकि, स्मिथ खुद अल्बर्टा को कनाडा से अलग करने के पक्ष में नहीं हैं। उन्होंने कहा कि वे अलग होने के खिलाफ वोट दे रही हैं। एक्सपर्ट्स के मुताबिक इस जनमत संग्रह के पीछे स्मिथ की अपनी पार्टी की राजनीति भी है। उनकी पार्टी में कई लोग अल्बर्टा को अलग देश बनाने के पक्ष में हैं। स्मिथ जनमत संग्रह के जरिए अपनी ही पार्टी के नेताओं और समर्थकों के बीच चल रहे मतभेदों को सुलझाना चाहती हैं। जनमत संग्रह के अलावा 9 और सवाल पूछे जा रहे अल्बर्टा में सिर्फ आजादी के मुद्दे पर ही वोटिंग नहीं हो रही है। लोगों से कुल 10 सवालों पर राय मांगी जा रही है। 1. अल्बर्टा की आजादी: क्या अल्बर्टा को कनाडा से अलग होकर स्वतंत्र देश बन जाना चाहिए? 2. प्रवासियों की संख्या: क्या अल्बर्टा सरकार को प्रांत में आने वाले प्रवासियों की संख्या सीमित करने का अधिकार मिलना चाहिए? 3. स्थानीय लोगों को प्राथमिकता: क्या नौकरियों में अल्बर्टा के लोगों को बाहर से आने वाले लोगों के मुकाबले प्राथमिकता दी जानी चाहिए? 4. स्वास्थ्य सेवाओं पर अलग नियम: क्या अस्थायी रूप से रहने वाले लोगों को सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं देने के लिए अलग नियम बनाए जाने चाहिए? 5. शिक्षा की सुविधाएं: क्या अस्थायी रूप से रहने वाले लोगों के बच्चों को सरकारी शिक्षा देने पर कुछ पाबंदियां लगाई जानी चाहिए? 6. सरकारी आर्थिक मदद: क्या सरकारी आर्थिक सहायता और दूसरी सुविधाएं पाने के लिए लोगों के लिए अल्बर्टा में कम से कम 12 महीने रहना जरूरी होना चाहिए? 7. वोट देने के लिए पहचान पत्र: क्या प्रांतीय चुनाव में वोट देने वालों के लिए नागरिकता का सबूत दिखाना जरूरी होना चाहिए? 8. प्रांतों को जज चुनने का अधिकार: क्या अल्बर्टा और दूसरे प्रांतों को अपनी अदालतों के जज चुनने का अधिकार मिलना चाहिए? 9. कनाडा की सीनेट खत्म करना: क्या देश की संसद के ऊपरी सदन सीनेट को खत्म कर देना चाहिए? 10. प्रांतों को ज्यादा अधिकार: क्या स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मामलों में प्रांतीय सरकारों को केंद्र सरकार के मुकाबले ज्यादा अधिकार मिलने चाहिए? मुख्यमंत्री स्मिथ ने पहले प्रस्ताव के खिलाफ और बाकी नौ प्रस्तावों का समर्थन करने की अपील की है। उनका कहना है कि इससे केंद्र सरकार के साथ बातचीत में अल्बर्टा को ज्यादा ताकत मिलेगी। ट्रम्प सरकार पर अलगाववादियों को बढ़ावा देने का आरोप ट्रम्प सरकार पर अलग देश की मांग कर रहे लोगों को बढ़ावा देने का आरोप है। कई रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि अमेरिका के अधिकारी अल्बर्टा के अलगाववादी नेताओं से मिलते हैं और उनकी मदद करते हैं। CNN की एक रिपोर्ट के मुताबिक ट्रम्प की सत्ता में वापसी को अलगाववादी अल्बर्टा को अलग करने के लिए सही समय मान रहे हैं। कुछ अलगाववादी अल्बर्टा को स्वतंत्र देश बनाने की बजाय अमेरिका का 51वां राज्य बनाने की बात भी कर रहे हैं। फरवरी में कैलगरी और एडमॉन्टन के बीच हाईवे पर एक बिलबोर्ड भी लगा, जिसमें अल्बर्टा को USA में मिलाने की अपील की गई थी। अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बैसेंट ने भी इसी साल जनवरी में ऐसा संकेत दिया था। उन्होंने कहा था कि अल्बर्टा के पास बहुत सारे प्राकृतिक संसाधन हैं और वह अमेरिका का स्वाभाविक साझेदार है। उन्होंने यह भी कहा कि अल्बर्टा के लोग स्वतंत्र सोच वाले हैं और ऐसी चर्चा है कि वहां के लोग कनाडा में बने रहने या अलग होने पर जनमत संग्रह करा सकते हैं।

कनाडा से अलग होने पर आज अल्बर्टा में वोटिंग:70% लोग साथ रहने के पक्ष में, तेल की कमाई को लेकर 50 साल पुराना झगड़ा

कनाडा के अल्बर्टा प्रांत में 19 अक्टूबर को जनमत संग्रह हो रहा है। इसमें लोग तय करेंगे कि प्रांत को कनाडा का हिस्सा बने रहना चाहिए या नहीं। इप्सोस-ग्लोबल न्यूज के सर्वे में अल्बर्टा के करीब 70% लोग कनाडा के साथ बने रहने के पक्ष में हैं। इसके बावजूद अलग देश बनाने की मांग करने वाले लोग पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। अल्बर्टा में अलग देश बनाने की मांग कोई नई बात नहीं है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह तेल से होने वाली कमाई और केंद्र सरकार के साथ पैसों के बंटवारे को लेकर नाराजगी है। अल्बर्टा में तेल का चौथा सबसे बड़ा भंडार अल्बर्टा में दुनिया के प्रमाणित तेल भंडार के मामले में चौथा सबसे बड़ा भंडार है। यहां का तेल उद्योग, रोजगार और कमाई का बड़ा जरिया है। अलग देश बनाने के समर्थकों का कहना है कि अल्बर्टा केंद्र सरकार को बहुत पैसा देता है, लेकिन उसे बदले में उतना फायदा नहीं मिलता। उनका आरोप है कि प्रांत की कमाई का इस्तेमाल कनाडा के दूसरे हिस्सों की मदद के लिए किया जाता है। वर्ष 2015 में जस्टिन ट्रूडो के प्रधानमंत्री बनने के बाद यह विवाद फिर बढ़ा। उनकी सरकार ने कार्बन टैक्स और प्रदूषण घटाने के लिए कई नियम लागू किए। अल्बर्टा के तेल उद्योग से जुड़े लोगों ने इनका विरोध किया। उनका मानना था कि इन नियमों से तेल का कारोबार प्रभावित होगा। क्या वोटिंग के बाद अल्बर्टा अलग देश बन जाएगा? नहीं। इस जनमत संग्रह में लोगों से सीधे यह फैसला नहीं कराया जा रहा कि अल्बर्टा तुरंत अलग देश बने या नहीं। उनसे पूछा जा रहा है कि क्या अलग होने की दिशा में आगे बढ़ने के लिए कानूनी प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए। लोगों के सामने दो विकल्प हैं- 1. कनाडा का हिस्सा बने रहना 2. भविष्य में अलग होने पर फैसला लेने के लिए जनमत संग्रह की प्रक्रिया शुरू करना अगर लोग दूसरे विकल्प के पक्ष में वोट देते हैं, तब भी अल्बर्टा तुरंत अलग देश नहीं बन जाएगा। इसके लिए कनाडा की केंद्र सरकार, दूसरे प्रांतों और वहां रहने वाले मूल निवासी समुदायों के साथ बातचीत करनी होगी। अलग होने की स्थिति में कई सवालों पर फैसला लेना होगा। इनमें संसाधनों का बंटवारा, अधिकार और कनाडा के साथ भविष्य के रिश्ते शामिल हैं। प्रधानमंत्री कार्नी अल्बर्टा के हैं, अलग के पक्ष में नहीं कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी खुद अल्बर्टा में पले-बढ़े हैं। वे भी मानते हैं कि प्रांत के लोगों में नाराजगी है। हालांकि, वे अल्बर्टा को कनाडा से अलग करने के पक्ष में नहीं हैं। उन्होंने लोगों को आगाह किया है कि वे अलग होने के पक्ष में वोट न करें। ऐसा फैसला देश में लंबे समय तक राजनीतिक खींचतान और अनिश्चितता पैदा कर सकता है। कार्नी ने कहा कि केंद्र सरकार की नीतियों के कारण अल्बर्टा के कई लोगों को ऐसा लगता है, जैसे उनके अपने संसाधन भी उनके नहीं हैं। हालांकि सरकार अल्बर्टा के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश कर रही है। मुख्यमंत्री अलग होने के खिलाफ फिर जनमत संग्रह क्यों करा रहीं? अल्बर्टा के मुख्यमंत्री डेनियल स्मिथ ने पिछले साल जनमत संग्रह कराने की प्रक्रिया आसान कर दी थी। इसके बाद आजादी का मुद्दा राज्य की राजनीति में और चर्चा में आ गया। हालांकि, स्मिथ खुद अल्बर्टा को कनाडा से अलग करने के पक्ष में नहीं हैं। उन्होंने कहा कि वे अलग होने के खिलाफ वोट दे रही हैं। एक्सपर्ट्स के मुताबिक इस जनमत संग्रह के पीछे स्मिथ की अपनी पार्टी की राजनीति भी है। उनकी पार्टी में कई लोग अल्बर्टा को अलग देश बनाने के पक्ष में हैं। स्मिथ जनमत संग्रह के जरिए अपनी ही पार्टी के नेताओं और समर्थकों के बीच चल रहे मतभेदों को सुलझाना चाहती हैं। जनमत संग्रह के अलावा 9 और सवाल पूछे जा रहे अल्बर्टा में सिर्फ आजादी के मुद्दे पर ही वोटिंग नहीं हो रही है। लोगों से कुल 10 सवालों पर राय मांगी जा रही है। 1. अल्बर्टा की आजादी: क्या अल्बर्टा को कनाडा से अलग होकर स्वतंत्र देश बन जाना चाहिए? 2. प्रवासियों की संख्या: क्या अल्बर्टा सरकार को प्रांत में आने वाले प्रवासियों की संख्या सीमित करने का अधिकार मिलना चाहिए? 3. स्थानीय लोगों को प्राथमिकता: क्या नौकरियों में अल्बर्टा के लोगों को बाहर से आने वाले लोगों के मुकाबले प्राथमिकता दी जानी चाहिए? 4. स्वास्थ्य सेवाओं पर अलग नियम: क्या अस्थायी रूप से रहने वाले लोगों को सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं देने के लिए अलग नियम बनाए जाने चाहिए? 5. शिक्षा की सुविधाएं: क्या अस्थायी रूप से रहने वाले लोगों के बच्चों को सरकारी शिक्षा देने पर कुछ पाबंदियां लगाई जानी चाहिए? 6. सरकारी आर्थिक मदद: क्या सरकारी आर्थिक सहायता और दूसरी सुविधाएं पाने के लिए लोगों के लिए अल्बर्टा में कम से कम 12 महीने रहना जरूरी होना चाहिए? 7. वोट देने के लिए पहचान पत्र: क्या प्रांतीय चुनाव में वोट देने वालों के लिए नागरिकता का सबूत दिखाना जरूरी होना चाहिए? 8. प्रांतों को जज चुनने का अधिकार: क्या अल्बर्टा और दूसरे प्रांतों को अपनी अदालतों के जज चुनने का अधिकार मिलना चाहिए? 9. कनाडा की सीनेट खत्म करना: क्या देश की संसद के ऊपरी सदन सीनेट को खत्म कर देना चाहिए? 10. प्रांतों को ज्यादा अधिकार: क्या स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मामलों में प्रांतीय सरकारों को केंद्र सरकार के मुकाबले ज्यादा अधिकार मिलने चाहिए? मुख्यमंत्री स्मिथ ने पहले प्रस्ताव के खिलाफ और बाकी नौ प्रस्तावों का समर्थन करने की अपील की है। उनका कहना है कि इससे केंद्र सरकार के साथ बातचीत में अल्बर्टा को ज्यादा ताकत मिलेगी। ट्रम्प सरकार पर अलगाववादियों को बढ़ावा देने का आरोप ट्रम्प सरकार पर अलग देश की मांग कर रहे लोगों को बढ़ावा देने का आरोप है। कई रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि अमेरिका के अधिकारी अल्बर्टा के अलगाववादी नेताओं से मिलते हैं और उनकी मदद करते हैं। CNN की एक रिपोर्ट के मुताबिक ट्रम्प की सत्ता में वापसी को अलगाववादी अल्बर्टा को अलग करने के लिए सही समय मान रहे हैं। कुछ अलगाववादी अल्बर्टा को स्वतंत्र देश बनाने की बजाय अमेरिका का 51वां राज्य बनाने की बात भी कर रहे हैं। फरवरी में कैलगरी और एडमॉन्टन के बीच हाईवे पर एक बिलबोर्ड भी लगा, जिसमें अल्बर्टा को USA में मिलाने की अपील की गई थी। अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बैसेंट ने भी इसी साल जनवरी में ऐसा संकेत दिया था। उन्होंने कहा था कि अल्बर्टा के पास बहुत सारे प्राकृतिक संसाधन हैं और वह अमेरिका का स्वाभाविक साझेदार है। उन्होंने यह भी कहा कि अल्बर्टा के लोग स्वतंत्र सोच वाले हैं और ऐसी चर्चा है कि वहां के लोग कनाडा में बने रहने या अलग होने पर जनमत संग्रह करा सकते हैं।

PM VBRY: पहली नौकरी पर ₹15,000 का तोहफा! जानिए EPFO की इस खास स्कीम के बारे में

PM Viksit Bharat Rozgar Yojana PM VBRY: फॉर्मल सेक्टर में पहली बार नौकरी शुरू करने वाले युवाओं के लिए केंद्र सरकार की ओर से बड़ी खुशखबरी है। प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना (PM-VBRY) के तहत पहली बार नौकरी जॉइन करने वाले योग्य कर्मचारियों को ₹15,000 तक का इंसेंटिव दिया जा रहा है। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) के माध्यम से संचालित इस योजना का मुख्य उद्देश्य देश के युवाओं को फॉर्मल रोजगार से जोड़ना और ईपीएफ (EPF) सिस्टम में उनका स्वागत करना है।

वैसे यह ₹15,000 का इंसेंटिव सभी को एकमुश्त या खुद-ब-खुद नहीं मिलेगा। इसके लिए सरकार और ईपीएफओ ने कुछ जरूरी शर्तें, सैलरी सीमा और सर्विस पीरियड तय किया है।

कब से कब तक की नौकरियों पर मिलेगा फायदा?

यह योजना 1 अगस्त 2025 से 31 जुलाई 2027 के बीच सर्जित होने वाली नई नौकरियों पर लागू होगी। अगर कर्मचारी का मासिक ईपीएफ वेतन ₹1 लाख प्रति माह तक है, तो वह इस योजना के तहत योग्य माना जाएगा। इंसेंटिव की राशि कर्मचारी के 1 महीने के ईपीएफ वेज के बराबर (अधिकतम ₹15,000 की सीमा तक) होगी।

कौन है ₹15,000 इंसेंटिव के लिए योग्य?

PM-VBRY के ‘पार्ट-ए’ के तहत इंसेंटिव पाने के लिए कर्मचारी को पहली बार ईपीएफ सदस्य बनना अनिवार्य है। पात्रता की मुख्य शर्तें नीचे टेबल में दी गई हैं:

पात्रता की शर्तइसका क्या मतलब है?
पहली बार EPF मेंबरशिपकर्मचारी 1 अगस्त 2025 से पहले कभी भी ईपीएफ का अंशदान करने वाला सदस्य (छूट प्राप्त पीएफ ट्रस्ट समेत) नहीं होना चाहिए।
जॉइनिंग की तारीख नौकरी में कार्यभार संभालने की तिथि 1 अगस्त 2025 से 31 जुलाई 2027 के बीच होनी चाहिए।
मासिक सैलरी कर्मचारी का मासिक वेतन ₹1 लाख तक होना चाहिए (योजना की परिभाषा के अनुसार)।
सर्विस की अवधिपहली किस्त के लिए 6 महीने और दूसरी किस्त के लिए 12 महीने की निरंतर सेवा आवश्यक है।
एंप्लॉयर कम्प्लायंसजिस कंपनी/संस्था में काम कर रहे हैं, उसने ईपीएफओ में जरूरी रिपोर्टिंग और कंट्रीब्यूशन (ECR) दाखिल किया हो।

 कैसे मिलेगी ₹15,000 की रकम?

यह इंसेंटिव कर्मचारियों को सीधे दो किस्तों में दिया जाएगा:

किस्तजरूरी शर्त  अधिकतम राशि
पहला किस्त निरंतर 6 महीने की योग्य सेवा पूरी होने पर ₹7,500
दूसरी किस्त 12 महीने की सेवा और फाइनेंशियल लिटरेसी प्रोग्राम पूरा करने परबाकी बची राशि (कुल ₹15,000 तक)

ध्यान दें: इंसेंटिव की राशि योग्य सैलरी के आधार पर तय होगी, इसलिए हर किसी को फ्लैट ₹15,000 नहीं मिलेंगे। इसके अलावा, दूसरी किस्त तुरंत कैश में निकालने योग्य नहीं हो सकती है; गाइडलाइंस के मुताबिक इसे किसी उपयुक्त सेविंग्स इंस्ट्रूमेंट या डिपॉजिट अकाउंट में तय समय के लिए रखा जा सकता है।

फाइनेंशियल लिटरेसी कोर्स क्यों है जरूरी?

दूसरी किस्त पाने के लिए फाइनेंशियल लिटरेसी प्रोग्राम को पूरा करना अनिवार्य बनाया गया है। 6 महीने की नौकरी पूरी होने पर पहली किस्त मिल जाएगी, लेकिन पूरे ₹15,000 पाने के लिए कर्मचारी को 12 महीने की नौकरी के साथ-साथ इस कोर्स को भी पूरा करना होगा।

इसके लिए कर्मचारी PM-VBRY के ऑफिशियल पोर्टल पर जाकर पूरी गाइडेंस ले सकते हैं। पोर्टल पर यूनिवर्सल अकाउंट नंबर (UAN) जनरेट करने और यूएएन-आधार लिंकिंग से जुड़ी जानकारियां भी उपलब्ध हैं।

पैसा बैंक खाते में कैसे आएगा?

सरकार ने साफ किया है कि पार्ट-ए के तहत इंसेंटिव का भुगतान सीधे कर्मचारी के आधार-सीडेड बैंक अकाउंट (DBT) में आधार ब्रिज पेमेंट सिस्टम के जरिए किया जाएगा। इसलिए कर्मचारियों को अपने बैंक खाते और यूएएन को आधार से लिंक रखना जरूरी है।

एंप्लॉयर्स के लिए अलग लाभ

इस योजना में कंपनियों/नियुक्तियों के लिए भी अलग प्रावधान (‘पार्ट-बी’) है, जहां एंप्लॉयर को हर नए योग्य कर्मचारी पर ₹3,000 प्रति माह तक का इंसेंटिव मिल सकता है। इसे कर्मचारियों के ₹15,000 वाले व्यक्तिगत इंसेंटिव से जोड़कर न देखें।

यूरोप के 6 देशों में शिक्षा-महंगाई पर प्रदर्शन:फ्रांस में 1800 लोग गिरफ्तार, स्पेन में घर खरीदना मुश्किल, ग्रीस में 10 साल में किराया 3 गुना

यूरोप के 6 देशों में पढ़ाई का बढ़ता खर्च, महंगाई, बेरोजगारी और महंगे घरों के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं। फ्रांस में स्कूलों की खराब हालत और शिक्षकों की कमी के हिंसक विरोध में अब तक 1800 लोग गिरफ्तार हुए हैं। स्पेन में घर खरीदना तो दूर, किराया चुकाना भी मुश्किल हो गया है। वहीं, ग्रीस में 10 साल में किराया 3 गुना बढ़ चुका है। बेल्जियम, इटली और अल्बानिया में भी छात्र शिक्षा पर खर्च बढ़ाने, रोजगार और बेहतर सुविधाओं की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे हैं। फ्रांस: 140 शहरों में 8 लाख लोग सड़कों पर उतरे फ्रांस में स्कूलों की खराब हालत, शिक्षकों की कमी और बढ़ती महंगाई के विरोध में 17 अक्टूबर को 140 शहरों में प्रदर्शन हुए। करीब 8 लाख लोग सड़कों पर उतरे। इसमें छात्र संगठनों के साथ ट्रेड यूनियन और कर्मचारी भी शामिल थे। पेरिस, मार्सेई और बोर्डो समेत कई शहरों में तोड़फोड़ और लूटपाट हुई। लीमोज में 143 साल पुराने ऐतिहासिक सिटी हॉल में आग लगा दी गई और कई गाड़ियों को जला दिया गया। 18 अक्टूबर तक करीब 1800 लोगों को गिरफ्तार किया गया। वहीं, 500 से ज्यादा पुलिसकर्मियों, सुरक्षाकर्मियों और दमकलकर्मियों के घायल होने की खबर है। प्रधानमंत्री सेबास्टियन लेकोर्नू और राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने हिंसा की निंदा की है। सरकार का कहना है कि कुछ हिंसक समूहों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन का फायदा उठाया। इटली: स्कूलों की हालत पर 30 अक्टूबर को हड़ताल का ऐलान इटली में छात्र शिक्षा पर कम सरकारी खर्च, जर्जर स्कूलों और पढ़ाई के बढ़ते खर्च के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। रोम और ट्यूरिन समेत कई शहरों में छात्रों ने स्कूलों पर कब्जा कर लिया। 16 अक्टूबर को रोम में हजारों छात्र शिक्षा मंत्रालय की ओर मार्च करते हुए पहुंचे। उन्होंने शिक्षा मंत्री ग्यूसेपे वाल्दितारा के फैसलों का विरोध किया। इससे पहले हुए प्रदर्शनों में पुलिस के साथ झड़प और पथराव की घटनाएं भी हुई थीं। अब छात्र संगठन इस आंदोलन से कर्मचारियों को भी जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों ने 30 अक्टूबर को देशव्यापी हड़ताल का ऐलान किया है। छात्रों की मांग है कि शिक्षा पर सरकारी खर्च बढ़ाया जाए, स्कूलों की हालत सुधारी जाए और सस्ते हॉस्टल उपलब्ध कराए जाएं। स्पेन: बढ़ते किराए के खिलाफ प्रदर्शन स्पेन में महंगे घरों और बढ़ते किराए के खिलाफ आंदोलन कई शहरों में फैल गया है। राजधानी मैड्रिड के सोल चौक पर प्रदर्शनकारी कई दिनों से टेंट लगाकर बैठे हैं। सितंबर के आखिर में 87 साल की एक बुजुर्ग महिला को किराया बढ़ने के कारण घर से निकाल दिया गया था। इसके बाद आंदोलन तेज हो गया। प्रदर्शनकारी किराए पर नियंत्रण लगाने, लोगों को घरों से निकालने पर रोक लगाने और सस्ते सरकारी मकान बनाने की मांग कर रहे हैं। किराएदारों के संगठन और आवास अधिकारों के लिए काम करने वाले समूह आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं। मैड्रिड के अलावा दूसरे शहरों में भी रैलियां निकाली गई हैं। प्रधानमंत्री पेद्रो सांचेज की सरकार ने आवास संकट दूर करने के लिए कदम उठाने की बात कही है, लेकिन प्रस्तावित उपायों पर राजनीतिक सहमति नहीं बन पाई है। इस बीच, 29 नवंबर को समय से पहले चुनाव कराने का ऐलान भी किया गया है। ग्रीस: हॉस्टल की कमी के खिलाफ टेंट लगाकर प्रदर्शन ग्रीस की राजधानी एथेंस में छात्रों ने संसद के सामने टेंट लगाकर प्रदर्शन किया। छात्र हॉस्टल की कमी, महंगे किराए और पढ़ाई के बढ़ते खर्च से परेशान हैं। छात्र संगठनों के मुताबिक, देश में बहुत कम छात्रों को हॉस्टल मिल पाते हैं। करीब 96% छात्रों को हॉस्टल की सुविधा नहीं मिलती, जबकि पिछले 10 साल में कमरों का किराया तीन गुना हो गया है। कुछ छोटे कमरों का मासिक किराया 600 यूरो तक पहुंच गया है। प्रदर्शनकारी किराए की सीमा तय करने, सरकारी हॉस्टल बनाने, स्कॉलरशिप बढ़ाने और यूनिवर्सिटीज का बजट बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। आंदोलन का नेतृत्व छात्र संगठन कर रहे हैं। बेल्जियम: शिक्षा बजट में कटौती के खिलाफ गुस्सा बेल्जियम की राजधानी ब्रुसेल्स में शिक्षा बजट में कटौती और सुधारों के विरोध में छात्रों ने मार्च निकाला। इस दौरान कुछ प्रदर्शनकारियों ने तोड़फोड़ की और पुलिस पर चीजें फेंकीं। जवाब में पुलिस ने आंसू गैस छोड़ी और पानी की बौछारों का इस्तेमाल किया। 18 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदर्शन के दौरान 150 लोगों को गिरफ्तार किया गया। पांच पुलिसकर्मियों को मामूली चोटें आईं। प्रदर्शन का नेतृत्व छात्र संगठन कर रहे हैं। सरकार ने हिंसा की निंदा की है और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की बात कही है। अल्बानिया: प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग अल्बानिया की राजधानी तिराना में महंगी पढ़ाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और यूनिवर्सिटीज की खराब हालत के खिलाफ छात्रों का आंदोलन तेज हो गया है। हजारों युवा 15 अक्टूबर को शिक्षा मंत्रालय के बाहर जुटे और प्रधानमंत्री एदी रामा के इस्तीफे की मांग की। प्रदर्शन के दौरान कुछ लोगों ने पुलिस पर पथराव किया। सरकारी इमारतों और बैंकों में भी आग लगा दी गई। पांच दिन से चल रहे आंदोलन में 167 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इस दौरान कई पुलिसकर्मी और प्रदर्शनकारी घायल हुए है। आंदोलन में छात्र संगठनों के अलावा सरकार से नाराज दूसरे लोग भी शामिल हैं। प्रधानमंत्री रामा ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया है। उन्होंने छात्रों से बातचीत की पेशकश की, लेकिन तोड़फोड़ करने वालों पर कार्रवाई की बात भी कही। उनका कहना है कि हिंसा से अल्बानिया के यूरोपीय संघ में शामिल होने की कोशिश को नुकसान पहुंच सकता है। ———————— यह खबर भी पढ़ें… फ्रांस में बार-बार क्यों भड़कते हैं प्रदर्शन: पेंशन से लेकर महंगाई तक, सरकार के फैसलों पर सड़कों पर उतर आते हैं लोग फ्रांस में स्कूलों की खराब हालत को लेकर शुरू हुआ छात्र आंदोलन अब महंगाई और ईंधन की बढ़ती कीमतों के खिलाफ बड़े विरोध में बदल गया है। पूरी खबर पढ़ें…

पंजाब के संगरूर में भीषण सड़क हादसा, तेज रफ्तार कार ने 8 मनरेगा मजदूरों को कुचला, कई घायल

पंजाब के संगरूर जिले में रविवार शाम एक दर्दनाक सड़क हादसा हो गया। इस हादसे में आठ MGNREGA मजदूरों की जान चली गई। वहीं कई गंभीर रूप से घायल हो गए। ये हादसा लहरागागा इलाके के चोटियां गांव के पास जाखल रोड पर हुआ। इस हादसे के समय करीब 23 महिला और पुरुष मजदूर सड़क किनारे काम कर रहे थे। इसी दौरान तेज रफ्तार से आ रही एक कार अचानक बेकाबू हो गई और मजदूरों की ओर मुड़ गई। इस तेज रफ्तार कार ने काम कर रहे मजदूरों को कुचल दिया। घटना के बाद मौके पर अफरा-तफरी मच गई और घायलों को इलाज के लिए नजदीकी अस्पतालों में पहुंचाया गया।

आठ लोगों की हुई मौत

तेज रफ्तार कार को संभालने से पहले ही वह सड़क किनारे काम कर रहे कई मजदूरों से टकरा गई। इस हादसे में आठ मजदूरों की मौत हो गई, जबकि कई अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। घायलों को तुरंत इलाज के लिए आसपास के अस्पतालों में भर्ती कराया गया। फिलहाल, हादसा किन परिस्थितियों में हुआ और इसमें प्रभावित लोगों से जुड़ी पूरी जानकारी सामने आने का इंतजार है।

कौन चला रहा था कार

इंडिया टूडे के मुताबिक, इस दुर्घटना में शामिल कार शेवरले मैग्नम थी, जिसका नंबर PB11 CP 0080 बताया गया। कार चलाने वाले व्यक्ति की पहचान रायधराना गांव के परगट सिंह काला के रूप में हुई है। घटना के बाद हादसे से जुड़ी जानकारी और राहत व्यवस्था को लेकर चर्चा हो रही है।

तेज रफ्तार कार ने मारी मजदूरों को टक्कर 

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पंजाब के संगरूर जिले में हुए सड़क हादसे में जान गंवाने वाले आठ मजदूरों की पहचान कर्मजीत कौर, जीवन सिंह, निकी, सरबजीत कौर, रणजीत कौर, कर्मजीत, रानी कौर और देस राज के रूप में हुई है। ये सभी महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत सड़क पर काम कर रहे थे। इसी दौरान तेज रफ्तार कार ने मजदूरों को टक्कर मार दी, जिससे आठ लोगों की मौत हो गई और कई अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए।

अब गोवा जाने की जरूरत नहीं! बिहार में मिलेगा वाटर स्पोर्ट्स का रोमांच, जानिए कहां-कहां उठा सकेंगे मजा

वाटर स्पोर्ट्स या वाटर एडवेंचर का नाम आते ही गोवा, केरल या दूसरे पर्यटन स्थलों का ख्याल आता है। लेकिन जल्द इसके लिए आपको दूर नहीं जाना पड़ेगा। बिहार में आप वाटर स्पोर्ट्स का आनंद उठा सकेंगे। राज्य के बड़े जलाशयों में वाटर स्पोर्ट्स को बढ़ावा देने का प्लान है। इसके लिए बांका, जमुई, मुंगेर, लखीसराय और रोहतास के कई जलाशयों की पहचान की जा चुकी है। पटना में गंगा नदी में पहले से ही बोटिंग और वाटर स्पोर्ट्स जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं।

बिहार के पांच जिलों में वाटर स्पोर्ट्स शुरू करने की तैयारी

बिहार में पर्यटन को नया आयाम देने के उद्देश्य से नौ बड़े जलाशयों और एक बराज क्षेत्र में वाटर स्पोर्ट्स गतिविधियों की संभावनाएं तलाशी गई हैं। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग ने इन जलाशयों के इस्तेमाल के लिए जल संसाधन विभाग से अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) मांगा था। जल संसाधन विभाग ने निर्धारित शर्तों के साथ एनओसी दे दिया है। इससे इन स्थानों पर वाटर स्पोर्ट्स शुरू करने का रास्ता खुल गया है। अब दूसरे विभागों से मंजूरी हासिल करने की प्रक्रिया चल रही है।

वाटर स्पोर्ट्स के लिए इन जलाशयों की पहचान की गई है

बांका के बदुआ और ओढ़नी जलाशयों को वाटर स्पोर्ट्स के लिए बेस्ट माना गया है। इससे बांका में पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। जमुई में तीन जलाशयों को चिह्नित किया गया है। गड़ही, अपर किऊल और नागी-नकटी जलाशय आने वाले समय में वाटर स्पोर्ट्स के नए केंद्र बन सकते हैं। मुंगेर के खड़गपुर और आंजन-कुकुरझप जलाशयों को भी इस योजना में शामिल किया गया है। लखीसराय के मोरवे जलाशय को भी वाटर स्पोर्ट्स के लिए चिह्नित किया गया है। रोहतास जिले के इंद्रपुरी बराज क्षेत्र को भी वाटर स्पोर्ट्स गतिविधियों के लिए बेस्ट माना गया है।

पटना में पहले से उपलब्ध है गंगा में बोटिंग सुविधा

बिहार में वाटर स्पोर्ट्स की संभावनाएं केवल इन पांच जिलों तक सीमित नहीं हैं। पटना में गंगा नदी के दीघा घाट और गांधी घाट जैसे स्थानों पर बोटिंग तथा नौका विहार के ऑप्शन उपलब्ध हैं। इसके अलावा राजगीर की घोड़ा कटोरा झील और पांडु पोखर में भी बोटिंग जैसी गतिविधियों का अनुभव लिया जा सकता है। रोहतास के करमचट डैम में भी विकल्प मौजूद हैं।

सिर्फ पर्यटन नहीं, राज्य में नए रोजगार के भी खुलेंगे रास्ते

बिहार के जलाशयों में वाटर स्पोर्ट्स को बढ़ावा मिलने से राज्य में पर्यटन को  नई गति मिल सकती है। स्थानीय स्तर पर बोटिंग संचालन, पर्यटक सुविधाओं, खानपान, परिवहन और अन्य सेवाओं से जुड़े रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं। इसके साथ ही आसपास के छोटे व्यवसायों को भी फायदा मिलने की संभावना है।

(पटना से सच्चिदानंद की रिपोर्ट)

आपके PF के पैसे का क्या होता है? जानिए EPFO कहां इन्वेस्ट करता है और कैसे तय होता है ब्याज

Where EPFO invests PF money: नौकरीपेशा लोगों की सैलरी से हर महीने प्रोविडेंट फंड (PF) के नाम पर जो कटौती होती है, उसे हम भविष्य की सुरक्षा का सबसे बड़ा आधार मानते हैं। जितनी रकम आपकी सैलरी से कटती है, उतना ही योगदान आपकी कंपनी भी आपके खाते में जमा करती है।

लेकिन क्या कभी आपने यह जानने की कोशिश की है कि आपकी तिजोरी में जमा होने वाले करोड़ों-अरबों रुपये आखिर कहां जाते हैं? क्या यह पैसा किसी बैंक में रखा रहता है या कहीं और निवेश होता है? कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) आपके इस पैसे को सुरक्षित रखने और उस पर शानदार रिटर्न (जैसे हालिया 8.25% ब्याज) देने के लिए क्या रणनीति अपनाता है, आइए इसे विस्तार से समझते हैं।

EPFO आपके पैसे का क्या करता है?

EPFO कोई साधारण बैंक नहीं है, बल्कि भारत के श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के अधीन काम करने वाला एक बड़ा वैधानिक निकाय है। कर्मचारियों के इस विशाल फंड के प्रबंधन की जिम्मेदारी सेंट्रल बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज (CBT) के पास होती है। बोर्ड के तय नियमों और सुरक्षा मानकों के तहत इस पैसे को देश के अलग-अलग वित्तीय और सरकारी साधनों में निवेश किया जाता है। इस निवेश से होने वाली कमाई से ही आपके पीएफ खाते में हर साल ब्याज का पैसा भेजा जाता है।

कहां-कहां होता है पीएफ का निवेश?

सरकार के तय दिशा-निर्देशों के मुताबिक, ईपीएफओ निवेशकों के पैसे की सुरक्षा और बेहतर रिटर्न के बीच संतुलन बनाने के लिए फंड को दो मुख्य हिस्सों में बांटता है:

  1. सुरक्षित डेट इंस्ट्रूमेंट्स: लगभग 85% तक
  2. इक्विटी यानी शेयर बाजार (Equity – ETFs): 15% तक

पोर्टफोलियो श्रेणी संभावित आवंटन % मुख्य साधन
सरकारी प्रतिभूतियां (G-Secs)45% – 65% केंद्र सरकार के बॉन्ड्स, स्टेट डेवलपमेंट लोन (SDLs)
कॉरपोरेट बॉन्ड्स व डेट20% – 45%PSUs, सरकारी वित्तीय संस्थानों व सुरक्षित कॉरपोरेट बॉन्ड्स
इक्विटी (शेयर बाजार) 5% – 15%केवल इंडेक्स आधारित एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स (ETFs – Nifty 50, Sensex)
शॉर्ट-टर्म डेट/मनी मार्केट0% – 5% लिक्विडिटी और तात्कालिक नकदी प्रबंधन के लिए ट्राइ-पार्टी रेपो (TREPS)

85% पैसा जाता है पूरी तरह सुरक्षित सरकारी डेट में

ईपीएफओ अपने पास आने वाले कुल फंड का करीब 85 हिस्सा ऐसी जगहों पर लगाता है जहां डूबने का जोखिम न के बराबर होता है:

सरकारी बॉन्ड्स और स्टेट डेवलपमेंट लोन: ईपीएफओ का एक बहुत बड़ा हिस्सा केंद्र और राज्य सरकारों की विकास योजनाओं के बॉन्ड्स में लगा होता है। इससे देश का बुनियादी ढांचा (सड़कें, बिजली, रेलवे) मजबूत होता है और पीएफ के लिए तयशुदा रिटर्न सुनिश्चित होता है।

PSU के कॉरपोरेट बॉन्ड्स: भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) और अन्य महारत्न कंपनियों के सुरक्षित डेट सिक्योरिटीज में भी यह पैसा निवेश किया जाता है।

15% हिस्सा शेयर बाजार में: क्या आपका पैसा जोखिम में है?

साल 2015 से पहले ईपीएफओ शेयर बाजार में निवेश नहीं करता था। लेकिन कम ब्याज दरों की चुनौती से निपटने और रिटर्न बढ़ाने के लिए सरकार ने अगस्त 2015 से इक्विटी में 5% से 15% तक निवेश करने की अनुमति दी।

सीधे शेयरों की खरीद नहीं: ईपीएफओ कभी भी किसी कंपनी विशेष के शेयर सीधे बाजार से नहीं खरीदता।

केवल इंडेक्स ETFs का सहारा: यह निवेश केवल BSE Sensex और NSE Nifty-50 जैसे शीर्ष सूचकांकों को ट्रैक करने वाले ETFs के जरिए किया जाता है, जिससे जोखिम काफी हद तक कम हो जाता है।

ईपीएफओ कैसे तय करता है आपका सालाना ब्याज?

वित्तीय वर्ष के दौरान डेट बॉन्ड्स से मिलने वाला तय ब्याज और इक्विटी (ETFs) की बिक्री से हुआ मुनाफा जोड़ा जाता है। सेंट्रल बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज (CBT) सभी आंकड़ों का विश्लेषण कर ब्याज दर का प्रस्ताव तैयार करता है। वित्त मंत्रालय की मुहर लगने के बाद तय ब्याज दर कर्मचारियों के पीएफ खातों में क्रेडिट कर दी जाती है।