Asian Games के लिए इन दो शहरों ने भारतीय निशानेबाजों के लिए शुरु किया आखिरी प्रशिक्षण

 

नेशनल राइफल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एनआरएआई) ने आइची-नागोया में होने वाले 2026 एशियाई खेलों से पहले भारतीय निशानेबाजी टीम के लिए आखिरी प्रशिक्षण शिविर की घोषणा की है। राइफल और पिस्टल निशानेबाज 5 से 14 सितंबर तक भोपाल में एमपी स्टेट शूटिंग अकादमी में ट्रेनिंग करेंगे, जबकि शॉटगन टीम नई दिल्ली में करणी सिंह शूटिंग रेंज में ट्रेनिंग करेगी। स्कीट शिविर चार से 14 सितंबर तक और ट्रैप कैंप 10 से 18 सितंबर तक चलेगा।

एशियाई खेलों में निशानेबाजी प्रतियोगिता 17 सितंबर से 3 अक्टूबर तक जापान में आइची प्रीफेक्चुरल जनरल शूटिंग रेंज में होंगे। एनआरएआई के अध्यक्ष कलिकेश नारायण सिंह देव ने कहा कि ये कैंप निशानेबाजों को खेलों की तैयारी का आखिरी मौका देंगे। उन्होंने कहा, “ये तैयारी शिविर पोडियम तक पहुंचने के हमारे सफर में एक अहम कदम हैं। हमें अपने एथलीटों पर पूरा भरोसा है और हम उन्हें देश का नाम रोशन करने के लिए ज़रूरी वर्ल्ड-क्लास संसाधन उपलब्ध कराने के अपने वादे पर कायम हैं।”

एनआरएआई के महासचिव पवन कुमार ने कहा कि इन दो जगहों से निशानेबाजों को अपने-अपने इवेंट के हिसाब से बनी सुविधाओं में ट्रेनिंग करने का मौका मिलेगा।उन्होंने कहा, “भोपाल और नई दिल्ली में एक साथ इन कैंपों का आयोजन यह पक्का करता है कि हमारे एथलीट अपने-अपने इवेंट के हिसाब से सबसे अच्छे माहौल में ट्रेनिंग कर सकें। एडमिनिस्ट्रेटिव टीम ने लॉजिस्टिक्स, इंफ्रास्ट्रक्चर और सपोर्ट स्टाफ के बीच बेहतर तालमेल बिठाने के लिए बहुत मेहनत की है, जिससे टीम अपनी आखिरी तैयारियों पर पूरी तरह ध्यान दे सके।” एनआरएआई के हाई परफॉर्मेंस डायरेक्टर पियरे ब्यूचैम्प ने कहा , “इस अहम चरण में, हमारा ध्यान मात्रा से हटकर सटीकता, मानसिक तैयारी और तकनीकी सुधार पर केंद्रित हो जाता है। इन आखिरी कैंपों का स्ट्रक्चर हमारी स्पोर्ट्स साइंस और कोचिंग टीमों को हर एथलीट के परफॉर्मेंस मेट्रिक्स पर बारीकी से नज़र रखने और यह पक्का करने की सुविधा देता है कि एशियाई खेलों में रेंज पर उतरते समय वे अपनी बेहतरीन फॉर्म में हों।”

Asian Games में नीरज की जगह यह भाला फेंक खिलाड़ी करेगा एथलेटिक्स दल की अगुवाई

javelin throw

राष्ट्रमंडल खेलों में कांस्य पदक जीतने वाले भाला फेंक के एथलीट यशवीर सिंह को जापान में होने वाले एशियाई खेलों के लिए चोटिल नीरज चोपड़ा की जगह गुरुवार को 77 सदस्यीय भारतीय एथलेटिक्स टीम में शामिल किया गया जबकि लंबी दूरी के धावक अभिषेक पाल को कथित डोपिंग उल्लघंन के लिए नाडा (राष्ट्रीय डोपिंग रोधी एजेंसी) से नोटिस जारी किए जाने के बाद टीम से बाहर कर दिया गया।

भारतीय एथलेटिक्स महासंघ (एएफआई) ने लुधियाना में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में 19 सितंबर से चार अक्टूबर तक आइची-नागोया में होने वाले एशियाई खेलों के लिए 77 सदस्यीय ट्रैक एवं फील्ड टीम की घोषणा की। लुधियाना अभी राष्ट्रीय युवा चैंपियनशिप की मेजबानी कर रहा है।

पुरुषों की 110 मीटर बाधा दौड़ के धावक तेजस शिरसे को भी टीम से बाहर कर दिया गया है क्योंकि वह हाल ही में ग्लास्गो में हुए राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान चोटिल हो गए थे।अभिषेक को पिछले महीने नाडा ने नोटिस भेजा था क्योंकि उनके डोपिंग नमूने में महिलाओं की प्रजनन क्षमता बढ़ाने वाली दवा पाई गई थी।

खेल मंत्रालय ने इस महीने की शुरुआत में 73 सदस्यीय एथलेटिक्स टीम की घोषणा की थी जिसमें शिरसे और अभिषेक भी शामिल थे। मंत्रालय ने बुधवार को छह नए खिलाड़ियों को टीम में शामिल किया।

इन खिलाड़ियों में 200 मीटर की धाविका हरिता भद्रा, 400 मीटर दौड़ में भाग लेने वाली किरण पहल, पोल वॉल्टर सिंधुश्री जी, त्रिकूद की एथलीट आशा इलंगो, चक्का फेंक की खिलाड़ी सान्या यादव और हैमर थ्रोअर प्रवीण कुमार शामिल हैं।

इस तरह से पहले घोषित किए गए 73 खिलाड़ियों में से दो खिलाड़ियों अभिषेक और शिरसे के बाहर होने और बुधवार को छह खिलाड़ियों के जुड़ने से अंतिम संख्या 77 हो गई है।AFI ने आयोजकों से यह भी अनुरोध किया है कि पिछले एशियाई खेलों के दोहरे पदक विजेता अविनाश साबले को 5000 मीटर दौड़ में भाग लेने की अनुमति दी जाए। साबले की पसंदीदा 3000 मीटर स्टीपलचेज़ में उनकी भागीदारी सुनिश्चित है।

पिछले साल एसीएल सर्जरी कराने के बाद साबले ने इस सत्र में केवल एक ही दौड़ में हिस्सा लिया है। उन्होंने 2023 में हांगझोऊ एशियाई खेलों में 3000 मीटर स्टीपलचेज़ में स्वर्ण और 5000 मीटर में रजत पदक जीता था।

दस सितंबर को होने वाली प्रतियोगिता में एशियाई खेलों के लिए चुने गए अधिकतर एथलीट भाग लेंगे।गुलवीर सिंह और पारुल चौधरी एशियाई खेलों में तीन-तीन स्पर्धाओं में भाग लेंगे। गुलवीर 10,000 मीटर, 5000 मीटर और 1500 मीटर में जबकि पारुल 3000 मीटर स्टीपलचेज, 5000 मीटर और 1500 मीटर में हिस्सा लेंगी।

एशियाई खेल 2026 के लिए भारतीय एथलेटिक्स टीम इस प्रकार है:-

पुरुषों:-गुरिंदरवीर सिंह (100मी), अनिमेष कुजूर (100 मीटर, 200 मीटर, मिश्रित 4×100 मीटर रिले), राजेश रमेश (400 मीटर, 4×400 मीटर रिले), विशाल थेनारासु कयालविझी (400 मीटर, 4×400 मीटर रिले), कृष्ण कुमार (800 मी), मोहम्मद अफसल पुलिककलाकथ (800मी), यूनुस शाह (1500 मी), अभिषेक पाल (5000 मी, 10000 मी), गुलवीर सिंह (1500 मीटर, 5000 मीटर, 10000 मीटर)। सावन बरवाल (मैराथन), कार्तिक कारकेरा (मैराथन), तेजस शिरसे (110 मीटर बाधा दौड़), यशस पलाक्ष (400 मीटर बाधा दौड़), संतोष कुमार तमिलारासन (400 मीटर बाधा दौड़), अविनाश साबले (3000 मीटर स्टीपलचेज), प्रणव प्रमोद गुरव (मिश्रित 4×100 मीटर रिले), मोहम्मद अशफाक (4×400 मीटर रिले), धर्मवीर चौधरी (4×400 मीटर रिले), जय कुमार (4×400 मीटर रिले, मिश्रित 4×400 मीटर रिले), मनु थेक्किनालिल साजी (4×400 मीटर रिले, मिश्रित 4×400 मीटर रिले), आदर्श राम ज्योति शंकर (ऊंची कूद), सर्वेश कुशारे (ऊंची कूद) , कुलदीप कुमार (पोल वॉल्ट), देव मीना (पोल वॉल्ट), मुरली श्रीशंकर (लंबी कूद), शाहनवाज खान (लंबी कूद), प्रवीण चित्रवेल (ट्रिपल जंप) कार्तिक उन्नीकृष्णन (ट्रिपल जंप), करणवीर सिंह (गोला फेंक), तजिंदरपाल सिंह तूर (गोला फेंक), दमनीत सिंह (हथौड़ा फेंक), नीरज चोपड़ा (भाला फेंक), रोहित यादव (भाला फेंकने का खेल), तौफीक नौशाद (डेकाथलॉन), तेजस्विन शंकर (डेकाथलॉन)

महिला:– प्राची चौधरी (400 मी), गौतमी जयारमन (800 मी), पूजा (800मी, 1500मी), पारुल चौधरी (1500 मीटर, 5000 मीटर, 3000 मीटर स्टीपलचेज़), सीमा (5000 मी, 10000 मी), प्रियंका गोस्वामी (मैराथन रेस वॉक), मंजू रानी (मैराथन रेस वॉक), ज्योति याराजी (100 मीटर बाधा दौड़), नंदिनी कोंगन (100 मीटर बाधा दौड़), उन्नति अयप्पा बोलैंड (200मी), अनु राघवन (400 मीटर बाधा दौड़), विथ्या रामराज (400 मीटर बाधा दौड़), अंकिता ध्यानी (3000 मीटर स्टीपलचेज), तमन्ना (4×100 मीटर रिले, मिश्रित 4×100 मीटर रिले), नित्या गंधे (4×100 मीटर रिले), सरबानी नंदा (4×100 मीटर रिले), अबिनया राजराजन (4×100 मीटर रिले) स्नेहा सत्यनारायण (4×100 मीटर रिले, मिश्रित 4×100 मीटर रिले), सुदेशना शिवंकर (4×100 मीटर रिले), रशदीप कौर (4×400 मीटर रिले, मिश्रित 4×400 मीटर रिले), अनसा बाबू (4×400 मीटर रिले, मिश्रित 4×400 मीटर रिले),

लेजेंड्स बूट्स क्यों टांग देते हैं?

Messi

महान करियर का सबसे मुश्किल क्षण वह नहीं होता, जब आपको यह साबित करना हो कि आप अब भी जीत सकते हैं। मुश्किल क्षण वह होता है, जब आप यह तय करते हैं कि अब आपको कुछ और साबित करने की जरूरत नहीं है।

 

यही किसी महान खिलाड़ी की विदाई को इतना भावुक बना देता है। दुनिया आमतौर पर मानती है कि हार करियर खत्म करती है। लेकिन महान खिलाड़ी कई बार हार से पहले ही चले जाते हैं।

 

वे तब विदा होते हैं, जब तालियां अभी बाकी होती हैं। जब शरीर अभी कुछ और मुकाबले लड़ सकता है। जब दर्शक अभी एक और प्रदर्शन की मांग कर रहे होते हैं।

 

लियोनेल मेसी की विदाई कुछ ऐसी ही है।

 

39 साल की उम्र में मेसी अर्जेंटीना की जर्सी उतार रहे हैं—इसलिए नहीं कि दुनिया ने उन्हें बता दिया कि उनका समय खत्म हो गया है, बल्कि इसलिए कि उन्होंने खुद तय किया कि अब समय आ गया है।

यह फर्क महत्वपूर्ण है।

 

2022 में उन्होंने अर्जेंटीना को विश्व कप जिताया। 2026 में टीम को फिर फाइनल तक पहुंचाया और टूर्नामेंट में आठ गोल किए। अर्जेंटीना के लिए 207 मैच और 125 गोल के साथ वह अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल को अलविदा कह रहे हैं। क्लब फुटबॉल में उनकी कहानी अभी जारी है।

 

फिर भी उनके शब्दों में जीत का अहंकार नहीं, विदाई का दर्द है। फैसला उन्हें भीतर तक चोट पहुंचाता है, लेकिन वह समझते हैं कि यही सही समय है। मेसी की विदाई का सबसे मार्मिक हिस्सा यह नहीं कि वह जा रहे हैं। बल्कि यह कि वह तब जा रहे हैं जब उनके पास अभी भी देने के लिए कुछ बाकी दिखता है। 

 

यह बात सिर्फ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि मेसी दुनिया के महानतम फुटबॉलरों में से एक हैं। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मेसी ने तब रुकने का फैसला किया जब वे अभी भी मेसी थे।

 

यही विदाई को सुंदर बनाता है। 

 

शायद यही महानता की सबसे कठिन परीक्षा है— जब आप अभी भी अच्छा खेल सकते हों, तब यह पहचानना कि अब रुक जाना चाहिए।

चार लेजेंड्स, चार अलग विदाइयां

सचिन तेंदुलकर ने क्रिकेट इसलिए नहीं छोड़ा कि उनका क्रिकेट से प्रेम खत्म हो गया था। 24 साल और 200 टेस्ट के बाद उन्होंने उस खेल से विदाई ली, जिसे 11 साल की उम्र से उन्होंने अपना जीवन बना लिया था।

 

कल्पना कीजिए—जिस व्यक्ति की सुबह, दोपहर, शाम और पहचान क्रिकेट के इर्द-गिर्द बनी हो, उसके लिए क्रिकेट छोड़ना किसी नौकरी छोड़ने जैसा नहीं था।

 

उनके लिए वो अपने ही एक हिस्से से अलग होना था।

 

रोज नेट्स पर न जाना। ड्रेसिंग रूम में न लौटना। दर्शकों का शोर न होना। बल्ले से टकराती बॉल की आवाज न सुनना। फिर भी एक समय उन्होंने समझा कि एक सपना अपनी पूर्णता तक पहुंच चुका है।

 

रोजर फेडरर के सामने सवाल कुछ और था। शरीर वर्षों से संकेत दे रहा था—चोटें, सर्जरी, लंबी रिकवरी और बार-बार लौटने की कोशिश।

 

41 की उम्र में उन्होंने आखिरकार स्वीकार किया कि कभी-कभी दिमाग अब भी दौड़ना चाहता है, लेकिन शरीर अपनी सीमा पहले ही बता चुका होता है। फेडरर ने अपने शरीर की सुनी। 

 

राफेल नडाल की कहानी में शरीर के साथ समय भी खड़ा था। 38 की उम्र में, वर्षों की चोटों से जूझने के बाद, उन्होंने स्वीकार किया कि खेल अब पहले जैसी शर्तों पर संभव नहीं था।

 

नडाल ने अपने करियर को “much more successful than I could have ever imagined” कहकर पीछे देखा। 

सचिन ने कहा—“जब मेरा दिल कहता है कि अब समय आ गया है।”

 

फेडरर ने अपने शरीर का संदेश सुना।

 

और मेसी कह रहे हैं—दर्द हो रहा है, लेकिन समय आ गया है।

 

चार महान खिलाड़ी। चार अलग कारण।

 

लेकिन एक बात समान—  किसी ने दुनिया से यह प्रमाणपत्र नहीं मांगा कि अब उसका समय पूरा हो चुका है।

 

उन्होंने खुद पहचाना। महान खिलाड़ी सिर्फ यह नहीं जानते कि कितना खेलना है; वे यह भी जानते हैं कि कब खेलना बंद करना है।

यहीं खेल अचानक जिंदगी बन जाता है

हममें से ज्यादातर लोग कभी विश्व कप फाइनल नहीं खेलेंगे। किसी स्टेडियम में 70 हजार लोग हमारा नाम नहीं पुकारेंगे। लेकिन जीवन किसी न किसी मोड़ पर हमसे वही सवाल पूछेगा— अब रुकना कब है?

 

50 की उम्र के बाद यह सवाल और साफ सुनाई देता है। तीन दशक तक आपका परिचय आपके काम से रहा— मैं पत्रकार हूं। मैं डॉक्टर हूं। मैं अधिकारी हूं। मैं कारोबारी हूं। 

 

फिर एक दिन designation चला जाता है। विजिटिंग कार्ड बदल जाता है। कुर्सी पर कोई और बैठ जाता है। और पहली बार सवाल नौकरी का नहीं रहता।

 

सवाल यह होता है—मैं कौन हूं, जब मैं वह नहीं रहा जो इतने वर्षों तक था?

 

शायद रिटायरमेंट का असली डर वेतन या पद खोने का नहीं है। अपने उस रूप को खो देने का है, जो नौकरी के साथ बना था।

 

इसीलिए कुछ लोग रिटायर नहीं होते—भले ही उन्हें पैसों की जरूरत न हो। उन्हें काम से ज्यादा जरूरी होने का एहसास चाहिए।
 

लेकिन जरूरी होना और मूल्यवान होना एक बात नहीं

यह उम्र के साथ सीखा जाने वाला शायद सबसे कठिन सबक है। कोई संस्था हमसे बड़ी होती है।

 

अखबार हमारे बिना भी निकलता है। कंपनी नया नेतृत्व खोज लेती है। टीम नया कप्तान चुन लेती है। 

दुनिया आगे बढ़ जाती है।

 

यह समझना कि आप replaceable हैं, पहले चोट करता है। फिर मुक्त करता है। क्योंकि जब आपको हर कीमत पर अपनी जगह बचाने की जरूरत नहीं रहती, तब आप एक बेहतर सवाल पूछ सकते हैं— “अब मैं वह क्या दे सकता हूं, जो खुद को साबित करने में व्यस्त रहते हुए नहीं दे पाया?”

 

यहीं अनुभव की असली कीमत शुरू होती है।

 

खिलाड़ी कोच बनता है।

 

बॉस mentor बनता है।

 

विशेषज्ञ शिक्षक बनता है।

 

और जो व्यक्ति कभी जगह के लिए लड़ता था, वह किसी और के लिए जगह बनाने लगता है।

 

शायद उम्र का सबसे बड़ा विशेषाधिकार यही है कि कमरे का सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति बनने की जरूरत खत्म हो जाए और किसी दूसरे को महत्वपूर्ण बनाने में खुशी मिलने लगे।

 

रिटायरमेंट की कोई उम्र नहीं होती

  • फेडरर 41 पर रुके। 
  • नडाल 38 पर।
  • सचिन 40 पर।

 

कुछ लोग इससे बहुत आगे तक काम करते हैं। कुछ को करना चाहिए। कुछ को नहीं।

 

सवाल बस चार हैं— 

  • क्या मैं सीख रहा हूं?
  • क्या मैं योगदान दे रहा हूं?
  • क्या शरीर रुकने का संकेत दे रहा है?
  • और क्या मैं किसी युवा को अपनी जगह देने के लिए तैयार हूं?

 

अगर जवाब बदल रहे हैं, तो अगली पारी सामने है। जरूरी नहीं कि वह संन्यास हो—शायद सिर्फ भूमिका बदलनी हो।

 

भगवद्गीता की एक परिचित पंक्ति है— “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”

 

हम इसे आमतौर पर कर्म और उसके फल से विरक्ति के रूप में समझते हैं। लेकिन उम्र के एक पड़ाव पर इसका एक और अर्थ खुल सकता है— आपकी कीमत हमेशा स्कोरबोर्ड से तय नहीं हो सकती।

 

जिंदगी की पहली पारी में हम स्कोर गिनते हैं—पद, पैसा, पुरस्कार, उपलब्धियां, प्रभाव। 

 

दूसरी पारी में शायद सवाल बदल जाता है— “मैंने जो सीखा, अब उसका करूंगा क्या?” यहीं करियर धीरे-धीरे उपलब्धि से विरासत में बदलता है। 

 

हर किसी को विश्व कप फाइनल, 200वां टेस्ट या आखिरी ग्रैंड स्लैम जैसा विदाई मंच नहीं मिलेगा। हममें से अधिकांश की आखिरी विदाई बहुत शांत होगी। एक खाली होती मेज।

 

बदलता हुआ विजिटिंग कार्ड। एक आखिरी ईमेल। और बंद होता हुआ एक दरवाजा। लेकिन सवाल वही रहेगा— क्या हम तब रुकेंगे जब कोई और हमें बता देगा कि हमारा समय खत्म हो गया है?

 

या हममें इतनी समझ होगी कि उससे पहले पहचान लें कि हमारी सबसे अच्छी पारी अब कहीं और है? 

 

और फिर बात मेसी पर लौटती है।  

 

उन्होंने फुटबॉल नहीं छोड़ा है।

 

तेंदुलकर ने क्रिकेट छोड़ा, उसकी समझ नहीं।

 

फेडरर ने प्रतिस्पर्धी टेनिस छोड़ा, खेल से रिश्ता नहीं।

 

नडाल ने कोर्ट छोड़ा, टेनिस नहीं।

 

शायद महान संन्यास की यही खूबसूरती है— आप मंच छोड़ते हैं। अपनी कहानी नहीं।

 

क्योंकि महानता सिर्फ यह नहीं कि आपने खेल में कितने लंबे समय तक टिके रहे। महानता यह भी है कि कब समझा कि खेल ने आपको सब कुछ दे दिया है—और अब आपकी बारी है कुछ लौटाने की।

 

शायद बूट्स इसलिए नहीं टांगे जाते कि देने को कुछ नहीं बचा। कभी-कभी इसलिए टांगे जाते हैं क्योंकि जो बचा है, वह अगली पारी के लिए है।

फाइनल की हार से टूट चुके थे मेस्सी, नहीं कर पाए करियर का परिकथा अंत

शायद दुनिया के महानतम फुटबॉलर और इस खेल के जादूगर ने 20 जुलाई की रात को ही तय कर लिया था कि बस अब बहुत हुआ अब मैदान से विदाई ले लेने में ही भलाई है। 20 जुलाई की रात को उनके आंखो में आसूं थे क्योंकि वह लगातार अर्जेंटीना को विश्वकप नहीं जिता पाए थे और ना ही अपने करियर का परिकथा अंत कर पाए थे।

FIFA World Cup का टूर्नामेंट जिस हिसाब से जा रहा था ऐसा लग रहा था कि लियोनेल मेस्सी के करियर का परिकथा अंत होगा। लेकिन उनके हाथ ना ही खिताब लगा और ना ही पैर पर गोल्डन बूट लगा। मेस्सी के लिए बस एक बात अच्छी रही कि  वह पिछले साल विजेता टीम का हिस्सा थे अन्यथा इस महान फुटबॉलर को बिना किसी वैश्विक खिताब के रवाना होना पड़ता।

आखिरी सीटी बजने पर उनकी आंखों में नमी और चेहरे पर निराशा को सभी ने देखा। एक तरफ स्पेन के खिलाड़ी जश्न मना रहे थे तो दूसरी तरफ मेस्सी और उनकी टीम स्टेडियम के दक्षिणी छोर पर अर्जेंटीना के समर्थकों को धन्यवाद दे रही थी और शायद माफी भी मांग रही थी।

बार्सीलोना और पेरिस सेंट जर्मेन के साथ 12 लीग और चार चैम्पियंस लीग खिताब जीतने के बाद मेस्सी ने जब यूरोपीय फुटबॉल से विदा लेकर तीन साल पहले एमएलएस का रूख किया तो लोगों को लगा कि वह रिटायर होकर अमेरिका में बस जायेंगे ।

लेकिन वह एक बार फिर अर्जेंटीना को विश्व कप फाइनल तक ले गए जिनमें उनके खाते में आठ गोल आये और चार में वह सहायक रहे। विश्व कप में उनके 21 गोल हो गए हैं और शनिवार को तीसरे स्थान के मुकाबले में फ्रांस के कीलियन एमबाप्पे (22 गोल) के आगे निकलने तक वह शीर्ष पर थे। तीन विश्व कप फाइनल खेलने वाले पहले खिलाड़ी मेस्सी के 125 अंतरराष्ट्रीय गोल हैं और वह सिर्फ क्रिस्टियानो रोनाल्डो (146) से पीछे हैं।

स्पेन के खिलाड़ी आखिरी सीटी बजने के बाद मेस्सी को ढांढस बंधाने आये। मेस्सी मैदान पर बैठ गए और हाथ पीछे रखकर एकटक देखते रहे। उपविजेता का पदक लेने आये तो मुस्कुराने की कोशिश की लेकिन नाकाम रहे।फिर अपने विचारों में खोये हुए, दुख को छिपाने की कोशिश करते मैदान के एक कोने से चुपचाप बाहर चले गए। विश्व कप से आखिरी बार।इस मैच के लगभग 1.5 महीने बाद लियोनेल मेस्सी ने जूता टांग दिया।

927 गोलों पर रुका मेस्सी का करियर, नहीं तोड़ पाए रोनाल्डो का यह रिकॉर्ड

फुटबॉल के ‘बेताज बादशाह’ लियोनेल मेसी ने अपने करियर में 1,171 मैचों में 927 गोल करने के बाद अंतर्राष्ट्रीय फुटबॉल को अलविदा कहा है। मेसी ने अपने आखिरी मैच में चार गोल करके इंटर मियामी को शनिवार को मेहमान टीम सीएफ मॉन्ट्रियल पर रिकॉर्ड 7-1 से जीत दिलाई। मियामी के लिए मेसी के चार गोल के शानदार प्रदर्शन से उनके करियर के गोल की संख्या 1,171 मैचों में 927 हो गई है।

लगभग दो दशकों से, पुर्तगाल के क्रिस्टियानो रोनाल्डो और लियोनेल मेसी फुटबॉल की सबसे बड़ी व्यक्तिगत प्रतिद्वंद्विताओं में से एक में शामिल रहे हैं। उन्होंने बैलन डी’ओर, चैंपियंस लीग रिकॉर्ड, लीग खिताब और गोल करने के मील के पत्थर के लिए प्रतिस्पर्धा की है, और लगातार एक-दूसरे को असाधारण स्तर तक आगे बढ़ाया है। लेकिन संन्यास के बाद लियोनेल मेसी 1,000 करियर गोल की दौड़ में क्रिस्टियानो रोनाल्डो से पीछे रह गए हैं

शनिवार को मॉन्ट्रियल के खिलाफ इंटर मियामी की 7-1 से शानदार जीत में मेसी के चार गोल के प्रदर्शन ने उन्हें 1,171 मैचों में 927 करियर गोल तक पहुंचा दिया।इस बीच, रोनाल्डो 1000 गोल के मील के पत्थर के बहुत करीब हैं। पुर्तगाली सुपरस्टार ने 1,333 मैचों में 978 गोल किए हैं, जिससे वे 1,000 गोल से सिर्फ़ 22 गोल दूर हैं।

हालांकि, रोनाल्डो ने बार-बार साबित किया है कि उम्र उनके लिए कोई रुकावट नहीं है। 41 साल की उम्र में भी वे लगातार गोल कर रहे हैं। उन्होंने अपनी बेहतरीन फिटनेस और टॉप पर बने रहने की बेमिसाल चाहत के दम पर अपना करियर बनाया है। पुर्तगाली खिलाड़ी ने मेसी के मुकाबले करियर में 51 गोल ज़्यादा किए हैं।

अंतरराष्ट्रीय गोलो में मेस्सी से आगे रोनाल्डो

 

लियोनेल मेसी ने अपने करियर में 207 इंटरनेशनल मैचों में 125 गोल किए हैं, जिससे वे अर्जेंटीना के लिए अब तक के सबसे ज्यादा गोल करने वाले खिलाड़ी बन गए हैं। इंटरनेशनल फुटबॉल में सबसे ज्यादा गोल करने वालों की लिस्ट में भी मेसी दूसरे नंबर पर हैं, उनसे आगे सिर्फ उनके प्रतिद्वंद्वी क्रिस्टियानो रोनाल्डो हैं।

मेसी का भावुक विदाई संदेश : ‘मेरे पास देने के लिए अब कुछ नहीं बचा’ 

एक दिल तोड़ने वाले संदेश के ज़रिए, लियोनेल मेसी ने अर्जेंटीना की नेशनल टीम से रिटायर होने का अपना पक्का फ़ैसला सार्वजनिक किया। ऐतिहासिक कप्तान ने माना कि यह फ़ैसला उनकी आत्मा को गहरी चोट पहुँचाता है, लेकिन उन्होंने कहा कि उन्होंने दो दशकों तक इस जर्सी के लिए अपना सब कुछ दिया।

मेसी ने अपने संदेश में कहा, “मैंने अपना सब कुछ दिया, मेरे पास देने के लिए अब कुछ नहीं बचा।” रोसारियो में जन्मे इस स्टार ने अपने बयान में बताया कि अब पीछे हटने और नई पीढ़ी के लिए जगह बनाने का समय आ गया है। उन्होंने अपने परिवार, कोच, टीम के साथियों और फ़ैन्स का उन्हें मिले प्यार के लिए दिल से शुक्रिया अदा किया और भरोसा दिलाया कि अब वह स्टैंड्स से किसी भी दूसरे सपोर्टर की तरह टीम का हौसला बढ़ाएंगे।

सोचा-समझा और पक्का किया गया फ़ैसला : मेसी ने बताया कि उन्होंने ये शब्द 21 जुलाई को, विश्व कप फ़ाइनल खेलने के दो दिन बाद लिखे थे। उन्होंने यह भी बताया कि हाल की पारिवारिक घटनाओं ने ‘एल्बिसेलेस्टे’ (अर्जेंटीना टीम) के साथ इस शानदार दौर को खत्म करने के उनके फ़ैसले को और मज़बूत किया।

चाइना मास्टर्स के पहले मुकाबले में लक्ष्य सेन को मिल सकता है वॉकओवर, हटा यह फ्रेंच चैंपियन

Lakshya Sen

मंगलवार को शेनझेन स्पोर्ट्स सेंटर जिम्नेजियम में 1 से 6 सितंबर तक होने वाले सुपर 750 बैडमिंटन टूर्नामेंट चाइना मास्टर्स 2026 में भारत के शीर्ष बैडमिंटन खिलाड़ी लक्ष्य सेन, सात्विकसाईराज रंकीरेड्डी और चिराग शेट्टी खेलते हुए नज़र आएंगे।दुनिया के 13वें नंबर के खिलाड़ी लक्ष्य का पहला मुकाबला फ्रांस के नए वर्ल्ड चैंपियन एलेक्स लैनियर के खिलाफ होना था लेकिन उन्होंने अंतिम लम्हों से टूर्नामेंट से नाम वापस ले लिया। यह बुरे फॉर्म से गुजर रहे लक्ष्य सेन के लिए राहत की बात है।

21 साल के लैनियर अगस्त में नई दिल्ली में हुई वर्ल्ड चैंपियनशिप के फाइनल में जापान के कोडाई नारोका को हराकर पुरुष सिंगल्स का वर्ल्ड टाइटल जीतने वाले पहले फ्रांसीसी खिलाड़ी बने थे।

लैनियर और लक्ष्य के बीच पिछली भिड़ंत पिछले साल डेनमार्क ओपन के क्वार्टर फाइनल में हुई थी, जिसमें फ्रांसीसी शटलर ने 21-9, 21-14 से जीत हासिल की थी।25 साल के भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी वर्ल्ड चैंपियनशिप में अमेरिका के दुनिया के 92वें नंबर के खिलाड़ी गैरेट टैन से दूसरे राउंड में मिली हार के बाद वापसी करने की कोशिश करेंगे।

आयुष शेट्टी, जिन्होंने नई दिल्ली में पहले राउंड में चीन के 2025 वर्ल्ड चैंपियन शी युकी को हराया था, इस टूर्नामेंट में हिस्सा नहीं ले रहे हैं।दो बार की ओलंपिक मेडलिस्ट पीवी सिंधु भी भारतीय टीम में शामिल नहीं हैं। पूर्व वर्ल्ड नंबर 1 किदांबी श्रीकांत पुरुष सिंगल्स में भारत के दूसरे प्रतिनिधि होंगे। 33 साल के भारतीय खिलाड़ी जून में सुपर 300 टूर्नामेंट, यूएस ओपन में रनर-अप रहे थे।

दुनिया के नंबर 5 खिलाड़ी सात्विकसाईराज रंकीरेड्डी और चिराग शेट्टी शेनझेन में भारत की डबल्स चुनौती की अगुवाई करेंगे। चौथी वरीयता प्राप्त इस जोड़ी ने मई में सिंगापुर बैडमिंटन ओपन (एक और सुपर 750 टूर्नामेंट) जीता था और नई दिल्ली में हुई वर्ल्ड चैंपियनशिप के क्वार्टर फाइनल तक का सफर तय किया था।

भारत महिला सिंगल्स में तीन होनहार युवा खिलाड़ियों – उन्नति हुड्डा, तन्वी शर्मा और देविका सिहाग – को उतारेगा।ताज़ा बैडमिंटन रैंकिंग में दुनिया की नंबर 25 खिलाड़ी, 18 साल की उन्नति ने नई दिल्ली में अपने पहले वर्ल्ड चैंपियनशिप में दूसरे राउंड तक जगह बनाई थी, जहाँ उन्हें कनाडा की मिशेल ली से तीन गेम के कड़े मुकाबले में हार का सामना करना पड़ा था।

दुनिया की नंबर 26 खिलाड़ी तन्वी के लिए यह सीज़न शानदार रहा है और उन्होंने ताइपे ओपन में अपना पहला बीडब्ल्यूएफ वर्ल्ड टूर खिताब जीता है। वहीं, देविका ने इस साल की शुरुआत में सुपर 300 टूर्नामेंट, थाईलैंड मास्टर्स जीता था। ये तीनों खिलाड़ी आइची-नागोया में होने वाले आगामी एशियाई खेलों के लिए भारत की महिला टीम का हिस्सा हैं।

मिक्स्ड डबल्स में भी भारत का प्रतिनिधित्व ध्रुव कपिला-तनीषा क्रास्टो और रोहन कपूर-रुत्विका शिवानी गद्दे करेंगे।शेनझेन में महिला डबल्स में भारत का कोई प्रतिनिधित्व नहीं होगा। ट्रीसा जॉली और गायत्री गोपीचंद, जिन्होंने पिछले हफ़्ते नई दिल्ली में वर्ल्ड चैंपियनशिप में ऐतिहासिक ब्रॉन्ज़ मेडल जीता था, इस टूर्नामेंट में हिस्सा नहीं ले रही हैं।

चाइना मास्टर्स, एशियाई खेलों के लिए भारत की 20 सदस्यीय बैडमिंटन टीम के कई सदस्यों के लिए तैयारी का एक अच्छा मौका भी होगा। एशियाई खेल जापान के आइची-नागोया में 19 सितंबर से 4 अक्टूबर तक आयोजित होंगे।

लक्ष्य, श्रीकांत, उन्नति, तन्वी, देविका, सात्विक, चिराग, अर्जुन, हरिहरन, ध्रुव और तनीषा – एशियाई खेलों की बैडमिंटन टीम के ये 11 सदस्य शेनझेन में मुकाबला करेंगे।2005 में इस टूर्नामेंट की शुरुआत के बाद से किसी भी भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी ने चाइना मास्टर्स नहीं जीता है।

फुटबॉल के जादूगर लियोनेल मेसी ने कहा अंतरराष्ट्रीय करियर को अलविदा

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फुटबॉल के जादूगर लियोनेल मेसी ने 207 कैप जीतने के बाद अर्जेंटीना ड्यूटी से अपनी सेवानिवृत्ति की घोषणा की है। 2005 में अर्जेंटीना में पदार्पण करने वाले 39 वर्षीय खिलाड़ी ने 2022 में विश्व कप जीता और इस गर्मी और 2014 में उपविजेता रहे। उन्होंने दो कोपा अमेरिका खिताब भी हासिल किए।

मेसी ने एक बयान में लिखा: “यह एक ऐसा निर्णय था जिसने दुख पहुंचाया – और अभी भी अंदर तक दर्द पहुंचाता है – लेकिन मैं समझता हूं कि समय आ गया है। मैं आपसे कसम खाता हूं कि मैंने हमेशा अपना सब कुछ दिया – न केवल इन पिछले कुछ वर्षों में जब हमने सब कुछ जीता, बल्कि उससे पहले भी; मैंने हमेशा इस जर्सी के लिए मैदान पर संघर्ष किया और सब कुछ छोड़ दिया, ताकि आपको खुशी मिल सके और फुटबॉल के माध्यम से आपको अर्जेंटीना होने पर गर्व महसूस हो सके।”

उन्होंने कहा, “समय कम होता जा रहा है, अध्याय ख़त्म होने वाले हैं, और यह वह बात है जिसने मुझे बहुत आहत किया है। मैं राष्ट्रीय टीम का हिस्सा बनना पसंद करता हूं, प्यार करता हूं और हमेशा पसंद करूंगा। मेरे पास जो कुछ भी था, मैंने दे दिया है; मेरे पास देने के लिए कुछ भी नहीं बचा है, और इसके अलावा, कुछ महान युवा खिलाड़ी भी आ रहे हैं जो यहां आने के योग्य हैं।”

मेसी ने कहा कि उन्होंने विश्व कप फाइनल के दो दिन बाद 21 जुलाई को अपना सेवानिवृत्ति वक्तव्य लिखा था, और पिछले महीने उनके पिता जॉर्ज की मृत्यु ने पुष्टि की थी कि इसे प्रकाशित करने और अपने अंतरराष्ट्रीय करियर को समाप्त करने का यह सही समय था।

मेसी ने अपने पिता की मृत्यु के बाद एक बयान लिखा था जिसमें कहा गया था कि उन्हें इस बारे में “काफी संदेह” था कि क्या वह “बहुत लंबे समय तक” खेलते रहेंगे। उन्होंने तब खुलासा किया कि स्पेन के हाथों अर्जेंटीना की विश्व कप फाइनल हार में उन्हें किस हद तक संघर्ष करना पड़ा था। उन्होंने लिखा, ”मेरे पैर अब और नहीं चल सकते।” “इस बार मैंने खुद को अपनी शारीरिक सीमाओं से परे धकेलने की कोशिश की, लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सका।”

मेसी इंटर मियामी के लिए खेलते हैं, जहां उनका अनुबंध 2028 तक चलना था। उन्होंने पिछले शनिवार को पहली बार मेजर लीग सॉकर मैच में चार गोल किए और सीएफ मॉन्ट्रियल को 7-1 से हराने के लिए प्रेरित किया।

Asian Games में भवानी देवी करेंगी 20 सदस्यीय तलवारबाजी दल की अगुवाई

ओलंपियन CA भवानी देवी दो महीने के अंतराल के बाद प्रतिस्पर्धी गतिविधियों में वापसी करते हुए आगामी एशियाई खेलों के लिए चुनी गई 20 सदस्यीय भारतीय तलवारबाजी टीम की अगुवाई करेंगी।भवानी देवी इस साल आयोजित एशियाई सीनियर तलवारबाजी चैंपियनशिप में हिस्सा लेने के बाद आइची-नागोया एशियाई खेलों में प्रतिस्पर्धा करेंगी।

चयनित सभी खिलाड़ी मंगलवार से 15 सितंबर तक पटियाला के राष्ट्रीय खेल संस्थान (एनआईएस) में राष्ट्रीय तैयारी शिविर में हिस्सा लेंगे। इसके बाद टीम 16 सितंबर को सीधे आइची-नागोया रवाना होगी जहां प्रतियोगिता से पहले परिस्थितियों से अभ्यस्त होने की तैयारी की जाएगी।

भारतीय तलवारबाजी संघ (एफएआई) की चयन समिति ने राष्ट्रीय रैंकिंग और इस साल प्रमुख अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में खिलाड़ियों के प्रदर्शन के आधार पर टीम का चयन किया। इनमें एशियाई सीनियर तलवारबाजी चैंपियनशिप, विश्व तलवारबाजी चैंपियनशिप और राष्ट्रमंडल तलवारबाजी चैंपियनशिप शामिल हैं।

 टीम में तीनों वर्गों फॉयल, एपी और साबरे में मजबूत खिलाड़ी शामिल हैं।एपी वर्ग में महिलाओं की टीम में तनिक्षा खत्री और प्राची लोहान प्रमुख दावेदार होंगी। दोनों ने राष्ट्रमंडल तलवारबाजी चैंपियनशिप में क्रमश: स्वर्ण और कांस्य पदक जीतकर प्रभावित किया था।

राष्ट्रमंडल तलवारबाजी चैंपियनशिप में पुरुष साबरे में स्वर्ण पदक जीतने वाले करण सिंह गुर्जर के प्रदर्शन से इस वर्ग में भारत की पदक की उम्मीदें मजबूत हुई हैं। वहीं तेजस मनोज पाटिल ने पुरुष फॉयल में अपना स्थान पक्का किया है। उन्होंने राष्ट्रमंडल चैंपियनशिप में ऐतिहासिक कांस्य पदक जीता था और इस प्रतियोगिता के सीनियर फॉयल वर्ग में पदक जीतने वाले पहले भारतीय तलवारबाज बने थे।

एफएआई के महासचिव राजीव मेहता ने टीम की तैयारियों और पदक की संभावनाओं पर भरोसा जताया।उन्होंने बताया कि टीम 16 सितंबर को आइची-नागोया के लिए रवाना होगी।

भारतीय तलवारबाजी टीम:

फॉयल:

पुरुष: सचिन, सनासम हेमाश सिंह, आदित्य, तेजस मनोज पाटिल।

महिला: जॉयस अशिता स्टालिनराज, नोरेम मीना देवी, कनुप्रिया चावला, सोनिया देवी वाइखोम।

एपी:

महिला: तनिक्षा खत्री, प्राची लोहान, मितवा चौधरी, यशकीरत कौर, हायर।

साबरे:

पुरुष: करण सिंह, गिशो निधि केपी, लक्ष्य बादसर, विशाल थापर।

महिला: भवानी देवी सीए, श्रेया गुप्ता, जेफरलिन जे एस, श्रुति जोशी।

हार से निराश नोवाक जोकोविच कोर्ट पर ही रोने लग गए, वीडियो हुआ वायरल

Novak Djokovic

हार या असफलता बड़े से बड़े लोगों के आंसू निकलवा देती है। इसका एक नजारा आज अमेरिकी ओपन में दिखा जब सर्बिया के महान खिलाड़ी 1-3 से पीछे हो गए और अंत में टूर्नामेंट के पहले दौर से ही बाहर हो गए। रिकॉर्ड 24 बार के ग्रैंड स्लैम चैंपियन नोवाक जोकोविच को यह रास नहीं आया और वह कोर्ट पर ही रोने लग गए जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर खासा वायरल हो रहा है।

रविवार को चार घंटे 36 मिनट तक चले पांच सेटों के इस मैराथन मैच में जोकोविच को अर्जेंटीना के मारियानो नावोन से 7-6 (5), 5-7, 4-6, 6-2, 6-1 से हार का सामना करना पड़ा।यूएस ओपन के पहले दौर में इससे पहले जोकोविच का रिकॉर्ड 19-0 था और उन्होंने 2006 के ऑस्ट्रेलियन ओपन के बाद से किसी भी ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंट में अपना पहला मैच नहीं हारा था।

जोकोविच ने कहा, ‘‘यह एक अच्छा रिकॉर्ड है। लेकिन मैं इसके बारे में ज्यादा नहीं सोच रहा हूं। बेशक मुझे अतीत की सभी उपलब्धियों पर बहुत गर्व रहा है, लेकिन अब समय बदल गया है।’चौथी वरीयता प्राप्त और चार बार के चैंपियन 39 वर्षीय जोकोविच फ्लशिंग मीडोज में काफी परेशान नजर आए। मैच के दौरान उन्हें उल्टी हुई और पैरों में भी तकलीफ हुई। इस बीच उन्होंने 70 बेजा गलतियां की। जोकोविच की पत्नी जेलेना भी स्टेडियम में मौजूद थी और वह भी काफी परेशान नजर आ रही थी।

जोकोविच ने कहा, ‘‘आज मैं सहज होकर नहीं खेल पा रहा था। मैं अपने खेल का आनंद नहीं ले रहा था। मैं मैच के चौथे गेम की बाद ही संघर्ष कर रहा था। दुर्भाग्य से इस साल मेरे साथ लगातार ऐसा हो रहा है। मुझे कोर्ट पर उल्टियां हो रही हैं। यह गंभीर मसला बन गया है।’’

जोकोविच यूएस ओपन में तीसरे दौर से पहले कभी नहीं हारे थे। यह उनके करियर में किसी ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंट के पहले दौर में सबसे लंबी अवधि का मैच था।यूएस ओपन में अपने पदार्पण के ठीक 21 साल बाद मिली इस हार से अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह इस या किसी भी ग्रैंड स्लैम में जोकोविच का आखिरी मैच था।

पहले सेट के दौरान उनका मैच बीच में ही रोक दिया गया ताकि बारिश के कारण आर्थर ऐश स्टेडियम की छत को बंद किया जा सके।बचपन से ही जोकोविच को अपना आदर्श मानने वाले नावोन ने मैच के बाद कहा, ‘‘मेरे लिए यह बहुत मुश्किल था क्योंकि आप इस कोर्ट पर सर्वकालिक महान खिलाड़ी के खिलाफ खेल रहे थे।’’

उन्होंने कहा, ‘‘निश्चित रूप से कोर्ट पर यह मेरा अब तक का सबसे बेहतरीन अनुभव रहा है। यह शानदार कोर्ट है और सबसे बड़ा मंच है। जिस तरह से हमने खेल दिखाया वह अद्भुत था। मेरे कहने का मतलब है की पांच सेट तक मैच चला। मैं बहुत खुश हूं और यह बयां करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं।’’

पहली बार चक दे गर्ल्स Girls हॉकी विश्वकप में Boys से निकली आगे

हॉकी विश्वकप में हमेशा भारतीय पुरुष टीम से महिला टीम कोसो पीछे रहती थी। ना जाने कितनी बार तो महिला टीम क्वालिफाय ही नहीं कर पाती थी। लेकिन इस बार महिला टीम ने ना केवल क्वालिफाय किया बल्कि अपने पुरुष साथियों से बेहतर प्रदर्शन किया। इस बार उम्मीद की पुरुष टीम कम से कम सेमीफाइनल खेलेगी और महिला टीम से कोई उम्मीद ही नहीं थी। लेकिन भारतीय महिला टीम ने पांचवा पायदान पाया और पुरुष टीम को आठवां पायदान मिला।

अगले महीने जापान में होने वाले एशियाई खेलों से पहले मनोबल बढ़ाने वाली जीत के साथ, भारतीय महिला हॉकी टीम ने हॉकी वर्ल्ड कप में शानदार समापन किया। टीम ने 5वें-छठे स्थान के लिए खेले गए मैच में दुनिया की नंबर 5 टीम जर्मनी को 3-1 से हराया। यह मैच गुरुवार शाम को खेला गया।

इस नतीजे से भारतीय महिला टीम को पांचवां स्थान मिला, जो 1974 में हुए पहले महिला वर्ल्ड कप (जिसमें वे चौथे स्थान पर रही थीं) के बाद से उनका वर्ल्ड कप में अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन है।टीम ने पूरे टूर्नामेंट में सिर्फ़ एक हार का सामना किया। उन्होंने चीन, इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसी बेहतर रैंकिंग वाली टीमों के साथ मैच ड्रॉ कराए और दक्षिण अफ्रीका को 6-1 से हराया। आखिर में, मुख्य कोच शुअर्ड मरिने के मार्गदर्शन में जर्मनी के खिलाफ जीत के साथ उन्होंने अपना अभियान पूरा किया।पहले मैच में चीन के खिलाफ 2-2 की बराबरी और फिर ऑस्ट्रेलिया से 0-0 की बराबरी। टीम नीदरलैंड्स से भी सिर्फ 2 गोल से हारी।यह सब भारत ने तब किया जब दल में 11 युवा खिलाड़ी थे और अपना पहला विश्वकप खेल रहे थे।

वहीं पुरुष टीम ने खासा निराश किया। पुरुष टीम की आलोचना पूर्व भारतीय गोलकीपर श्रीजेश ने भी की। हरमनप्रीत सिंह ने ने अंतिम मैच में गोल दागकर खुद को शीर्ष 5 गोल स्कोरर में स्थापित कर दिया लेकिन कुल मिलाकर टीम का अभियान निराशाजनक रहा।पूर्व खिलाड़ियों का मानना है कि धीमी शुरूआत, मौके गंवाने और डिफेंस में चूक से आगे यह समस्या और बड़ी है और इसका हल काफी पहले निकाला जाना चाहिये था।

पुरुष टीम ने पूल डी के मुकाबले में इंग्लैंड जैसी टीम से 4-2 से मैच गंवाया।वह भी मैच में बढ़त बनाने के बाद। इसके बाद टीम का पाकिस्तान के खिलाफ प्रदर्शन अच्छा था लेकिन 5-3 की स्कोरलाइन संतोषजनक नहीं थी।

अगले दौर में टीम को नीदरलैंड्स और अर्जेंटीना मिली। नीदरलैंड्स ने भारतीय टीम को 3-1 से हराया। नीदरलैंड से हारने के बाद भारत पूल ई से अंतिम चार की दौड़ से लगभग बाहर ही हो गया था लेकिन अर्जेंटीना की इंग्लैंड पर जीत के बाद तकनीकी तौर पर उसके रास्ते खुले थे । इसके लिये उसे कम से कम तीन गोल के अंतर से जीत दर्ज करनी थी।  लेकिन भारत ने पहले छह मिनट में ही दो गोल गंवा दिये और इस दबाव से टीम निकल ही नहीं सकी। अर्जेंटीना के खिलाफ भारत 3-5 से हारकर सेमीफाइनल की दौड़ से बाहर हो गया।

लेकिन निराशाजनक अभियान और ज्यादा निराशाजनक तब हो जब सातवें और आठवें पायदान के लिए भारत बेल्जियम से भिड़ा।भारतीय पुरुष हॉकी टीम को एफआईएच विश्व कप सह-मेजबान बेल्जियम के खिलाफ सातवें / आठवें स्थान के क्लासीफिकेशन के रोमांचक मुकाबले में शूटआउट में 3-4 से हार का सामना करना पड़ा।निर्धारित समय में दोनों टीमें 3-3 से बराबरी पर रहीं, लेकिन शूटआउट में बेल्जियम ने बाजी मारकर भारत को एफआईएच विश्व कप में आठवें स्थान पर रहने के लिए मजबूर कर दिया।