भारत में हॉकी टीम भेजने से मना किया पाकिस्तान ने, चैंपियन्स ट्रॉफी में बांग्लादेश शामिल

पाकिस्तान हॉकी महासंघ  ने जालंधर और मोहाली में 27 अक्टूबर से पांच नवंबर तक होने वाली एशियाई चैम्पियंस ट्रॉफी पुरूष हॉकी में तटस्थ स्थान ना मिलने के कारण सरकार की नामंजूरी के कारण इस टूर्नामेंट से हट गया है। पाकिस्तान के हटने के साथ ही बांग्लादेश को इस टूर्नामेंट में शामिल कर लिया गया है।

गौरतलब है हॉकी की एशियाई चैंपियन्स ट्रॉफी में पाकिस्तान समेत आधा दर्जन टीमें शामिल थी। भारत और पाकिस्तान का मुक़ाबला 1 नवंबर को जालंधर में होना था, और यह मैच पंजाब दिवस के दिन ही होता।पिछले महीने पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने मोहाली में टूर्नामेंट के कार्यक्रम की घोषणा करते हुए पाकिस्तान की भागीदारी का दावा किया था। इस कार्यक्रम में हॉकी इंडिया महासचिव भोलानाथ सिंह समेत वरिष्ठ पदाधिकारी भी मौजूद थे । बांग्लादेश और ओमान को रिजर्व टीमों में रखा गया था।

इसके दो दिन बाद ही पाकिस्तान हॉकी महासंघ ने भारत में खेलने से इनकार करके एएचएफ से टूर्नामेंट तटस्थ स्थान पर कराने की मांग की थी।

मुंबई में 2008 के आतंकी हमले के बाद से भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय हॉकी नहीं खेली गई है। पाकिस्तान ने आखिरी बार भारत में 2023 एशियाई चैम्पियंस ट्रॉफी खेली थी जिसमें छह टीमों में वह पांचवें स्थान पर रहा था। पिछले साल भारत में हुए एशिया कप और जूनियर एशिया कप में भी पाकिस्तान ने भाग नहीं लिया था।

हॉकी इंडिया द्वारा जारी एक विज्ञप्ति के अनुसार छह टीमों के इस टूर्नामेंट में भारत के अलावा जापान, चीन, मलेशिया, दक्षिण कोरिया और बांग्लादेश भाग लेंगे। पंजाब में लगभग दो दशक बाद इस टूर्नामेंट के जरिये अंतरराष्ट्रीय हॉकी की वापसी हो रही है।जापान के आइची नागोया में हाल ही में एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर लॉस एंजिलिस ओलंपिक 2028 के लिये क्वालीफाई करने वाली भारतीय टीम चार बार खिताब जीत चुकी है।

भारतीय हॉकी टीम आखिरी बार 2006 में पाकिस्तान में श्रृंखला खेली थी।एशियाई चैम्पियंस ट्रॉफी को लेकर भारत के मुख्य कोच क्रेग फुल्टोन ने हॉकी इंडिया की एक विज्ञप्ति में कहा,‘‘ एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतना विशेष उपलब्धि थी लेकिन अब वह बीती बात है और फोकस हीरो एशियाई चैम्पियंस ट्रॉफी पर है।हमें उसी लय को कायम रखना होगा।’’

ओलंपिक मेजबानी पाने के लिए भारत को लड़ना होगा आधा दर्जन देशों से, नवंबर में होगा Presentation

 

भारतीय ओलंपिक संघ (IOA) ने इस सप्ताह की शुरुआत में अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (IOC) की ओर से 2036 ओलंपिक और पैरालंपिक खेलों की मेजबानी की दौड़ में शामिल शहरों और देशों के नामों की घोषणा का स्वागत किया है। हालांकि भारत को अगर मेजबानी पानी है तो जर्मनी, कतर  तुर्किए, हंगरी, दक्षिण कोरिया और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों से अपना प्रेजेंटेशन बेहतर बनाना होगा।

गुजरात के अहमदाबाद को केंद्र में रखते हुए भारत की ओलंपिक और पैरालंपिक खेलों की मेजबानी की योजना पिछले 18 महीनों में आईओसी के साथ हुई सकारात्मक और रचनात्मक बातचीत के माध्यम से तैयार की गई है।

भारत का विजन ‘Rising Together’ इस विचार को उजागर करता है कि 2036 आपसी तरक्की का एक बड़ा मौका हो सकता है। इस दौरान, खेलों के माध्यम से भारत में हो रहा बदलाव और ओलंपिक का भविष्य, खेलों की मेजबानी के जरिए एक साथ आगे बढ़ सकते हैं। भारत के लिए ओलंपिक और पैरालंपिक खेलों की मेजबानी खेलों को देश की रोजमर्रा की जिंदगी का अहम् हिस्सा बनाने का बड़ा मौका होगी। यह प्रोजेक्ट देश में खेलों से जुड़े बड़े बदलाव को आगे बढ़ाने में मदद कर सकता है।

इसका उद्देश्य लाखों युवाओं को सिर्फ खेल देखने के बजाय खुद खेलों में हिस्सा लेने के लिए प्रेरित करना, लोगों को ज्यादा स्वस्थ और एक्टिव जीवन जीने के लिए प्रोत्साहित करना और खेलों को शिक्षा व करियर के अवसरों से जोड़ना है। भारत में खेलों की मेजबानी का उद्देश्य सिर्फ एकवैश्विक प्रतियोगिता आयोजित करना नहीं है। इसके माध्यम से खेलों को लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का और गहरा हिस्सा बनाने के साथ ही भारत की ऊर्जा, युवा शक्ति और समाज को बदलने में खेलों की ताकत पर उसके भरोसे को और मजबूत करने में मदद मिलेगी।

ओलंपिक के लिए वर्ष 2036 में भारत में खेलों की मेजबानी एक नए दौर में जाने का मौका होगी। इससे ओलंपिक और पैरालंपिक अभियान का जुड़ाव दुनिया की सबसे युवा, तेजी से आगे बढ़ रही और डिजिटल रूप से जुड़ी आबादी वाले देशों में से एक से होगा। इससे खेलों से जुड़ी कई नई संभावनाएँ सामने आएँगी। एक अरब से ज्यादा लोगों तक खेलों की पहुँच होगी और ओलंपिक परिवार से नए खिलाड़ी, नए दर्शक और नए पार्टनर जुड़ सकेंगे।

भारत और ओलंपिक अभियान जब एक साथ, एक साझा उद्देश्य के साथ आगे बढ़ेंगे, तो यह उनके इतिहास का एक खास मौका होगा। यह भारत के रंगों, संस्कृति और जीवन का उत्सव होगा और देश की अनोखी सांस्कृतिक विविधता को दुनिया के सामने लाएगा।

भारतीय ओलंपिक संघ की अध्यक्ष पी. टी. उषा ने कहा, “वर्ष 2036 ओलंपिक और पैरालंपिक खेलों को लेकर भारत के विजन और उम्मीदों को आईओसी से मिली पहचान हमारे लिए बहुत सम्मान की बात है। हमें इस बात पर भी गर्व है कि हम भविष्य में होने वाले खेलों के संभावित मेजबानों के एक खास समूह का हिस्सा हैं।

हमारे लिए ‘Rising Together’ सिर्फ एक स्लोगन नहीं है। यह भारत की ऊर्जा, महत्वाकांक्षा और विविधता को एक साझा ओलंपिक सपने से जोड़ने की हमारी प्रतिबद्धता है। वर्ष 2036 के लिए अपना विजन तैयार करते हुए हम ऐसे खेलों की मेजबानी करने के लिए प्रतिबद्ध हैं, जो एक युवा, गतिशील और तेजी से आगे बढ़ रहे भारत की झलक पेश करें। साथ ही, इससे ओलंपिक और पैरालंपिक मूवमेंट को दुनिया भर में नई पीढ़ियों, नए समुदायों और नई जगहों तक पहुँचने में भी मदद मिले।”

उन्होंने कहा, “यदि हम अपने खिलाड़ियों, लोगों, शहरों और ओलंपिक व पैरालंपिक मूवमेंट के साथ मिलकर आगे बढ़ें, तो संभावनाएं बहुत बड़ी हैं। और जब भारत आगे बढ़े, तो हम चाहते हैं कि दुनिया भी हमारे साथ आगे बढ़े। हम IOC के साथ अपनी बातचीत जारी रखने और नवंबर के अंत में पहली बार फ्यूचर होस्ट कमीशन के सामने अपनी योजना रखने को लेकर उत्साहित हैं।”

भारत सरकार में केंद्रीय श्रम एवं रोजगार और युवा मामले एवं खेल मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया ने कहा, “वर्ष 2036 के लिए भारत की सोच एक सरल विचार पर आधारित है कि खेल हमारे देश के भविष्य को बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं। ओलंपिक और पैरालंपिक खेलों की मेजबानी लाखों युवा भारतीयों को खेलों में हिस्सा लेने के लिए प्रेरित करेगी। इससे स्वस्थ और ज्यादा सक्रीय समुदाय बनाने में मदद मिलेगी और युवाओं के लिए शिक्षा, रोजगार और सामाजिक विकास के नए अवसर भी बढ़ेंगे। भारत में खेलों की मेजबानी से देश के हर हिस्से में खेलों को लेकर बदलाव को और गति दी जा सकती है। इसके साथ ही, दुनिया के सबसे तेजी से आगे बढ़ रहे देशों में से एक में ओलंपिक मूवमेंट के लिए एक नया अध्याय शुरू कर सकते हैं।”

मेसी जैसा कोई नहीं: अर्जेंटीना की जर्सी में जब जादू ने आखिरी बार रंग दिखाया

मेसी जैसा कोई नहीं: अर्जेंटीना की जर्सी में जब जादू ने आखिरी बार रंग दिखाया

मेसी जैसा कोई नहीं: अर्जेंटीना की जर्सी में जब जादू ने आखिरी बार रंग दिखाया

फुटबॉल में कुछ खिलाड़ी मैच खत्म होने के साथ मैदान छोड़ते हैं और कुछ खिलाड़ी मैदान छोड़ने के बाद भी खेल का हिस्सा बने रहते हैं। लियोनेल मेसी दूसरी श्रेणी के खिलाड़ी हैं।

 

ब्यूनस आयर्स के एस्टाडियो मोनुमेंटल में 6 अक्टूबर की रात अर्जेंटीना ने बेनिन को 3-0 से हराया। मेसी ने एक गोल किया और दो गोल में असिस्ट दिया। लेकिन उस रात स्कोर से ज्यादा महत्वपूर्ण था वह पल, जब दुनिया ने अर्जेंटीना की नीली-सफेद जर्सी में मेसी को आखिरी बार देखा। 39 साल की उम्र में उन्होंने 21 साल लंबे अंतरराष्ट्रीय करियर पर विराम लगा दिया।

 

स्टेडियम में 85 हजार से ज्यादा लोग थे। 10वें मिनट में उनके नंबर 10 के सम्मान में तालियां बजीं। मैदान पर ‘Gracias’ लिखी विशाल जर्सी रखी गई। मैच खत्म होने के बाद आसमान में ड्रोन शो हुआ और हर तरफ एक ही भावना थी- धन्यवाद, लियो।

 

यह विदाई इसलिए भी भारी थी क्योंकि मेसी ने सिर्फ अर्जेंटीना के लिए फुटबॉल नहीं खेला। उन्होंने एक पूरी पीढ़ी की फुटबॉल की कल्पना को आकार दिया।

 

मेसी से दुनिया प्यार क्यों करती है?

इस सवाल का जवाब उनके गोल, ट्रॉफियों और रिकॉर्ड से कहीं बड़ा है। मेसी से प्यार करने के लिए अर्जेंटीना का होना जरूरी नहीं। उनके प्रशंसक दुनिया के लगभग हर कोने में हैं, क्योंकि उनके खेल में कुछ ऐसा था जो भाषा और देश की सीमाओं से बाहर चला जाता था।

 

गेंद उनके पास आती थी और अचानक खेल की रफ्तार बदल जाती थी। वह तीन खिलाड़ियों के बीच से निकल जाते थे। किसी को उम्मीद नहीं होती थी कि वह पास देंगे, लेकिन गेंद बिल्कुल सही जगह पहुंच जाती थी। कभी वह खुद गोल कर देते और कभी ऐसा पास देते कि साथी खिलाड़ी के लिए गोल करना सबसे आसान काम रह जाता।

 

उनका सबसे बड़ा हुनर शायद यही था कि वह उस चीज को पहले देख लेते थे, जिसे बाकी खिलाड़ी बाद में देख पाते थे।

 

मेसी ने फुटबॉल को जटिल नहीं बनाया। उन्होंने उसे आसान दिखाई देने वाला बना दिया। यही महान कलाकार की पहचान होती है।

 

उनके खेल में एक कलाकार क्यों नजर आता था?

मेसी को सिर्फ महान फुटबॉलर कहना उनके खेल के साथ थोड़ा अन्याय है। उनके पैरों में गेंद होती थी तो मैदान किसी कैनवास की तरह लगता था। डिफेंडर रंग थे, गेंद ब्रश और गोलपोस्ट अंतिम तस्वीर।

 

लेकिन इस कला में सबसे खूबसूरत बात उनकी सहजता थी। मेसी कभी-कभी ऐसे चलते हुए दिखाई देते थे जैसे खेल उनके लिए बहुत धीमा हो। फिर एक क्षण में वह गति बदलते और पूरी डिफेंस लाइन पीछे छूट जाती।

 

उनकी ड्रिब्लिंग में ताकत से ज्यादा संतुलन था। उनके पास में दिखावे से ज्यादा समझ थी। उनके गोल में सिर्फ शॉट नहीं, कोण और टाइमिंग की समझ थी। और उम्र बढ़ने के साथ यह कला खत्म नहीं हुई।

 

शरीर पहले जैसा तेज नहीं रहा, लेकिन दिमाग और बायां पैर अब भी खेल को पढ़ते रहे। 2026 विश्व कप में 39 की उम्र में भी वह अर्जेंटीना की टीम का हिस्सा रहे और छह विश्व कप खेलने वाले खिलाड़ियों में शामिल हुए। यही मेसी की सबसे बड़ी खूबी थी कि उन्होंने अपनी उम्र के साथ खेलना सीख लिया।

 

महानता की राह आसान नहीं थी

आज जिस मेसी को अर्जेंटीना में लगभग देवता जैसा सम्मान मिलता है, उनके लिए यह रिश्ता हमेशा इतना आसान नहीं था। एक समय था जब उन पर आरोप लगता था कि वह क्लब के लिए तो सब कुछ कर सकते हैं, लेकिन अर्जेंटीना के लिए नहीं।

 

2014 विश्व कप का फाइनल हारना, 2015 और 2016 में कोपा अमेरिका के फाइनल में हारना और लगातार बढ़ता दबाव, इन सबने मेसी को भीतर तक प्रभावित किया। 2016 में कोपा अमेरिका फाइनल हारने के बाद उन्होंने अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल से संन्यास तक घोषित कर दिया था।

 

लेकिन वह लौटे। और फिर वही वापसी उनकी कहानी का सबसे खूबसूरत हिस्सा बन गई।

 

2021 में अर्जेंटीना ने कोपा अमेरिका जीता। मेसी ने पहली बड़ी सीनियर अंतरराष्ट्रीय ट्रॉफी उठाई। अगले साल कतर में विश्व कप मिला। 2024 में एक और कोपा अमेरिका खिताब आया।

 

जिस खिलाड़ी पर कभी सवाल उठते थे कि वह अर्जेंटीना को कुछ नहीं दे पाया, वही बाद में देश के सबसे बड़े फुटबॉल नायक बन गया।

 

शायद इसी वजह से उनकी कहानी इतनी मानवीय है। वह हमेशा जीतते हुए खिलाड़ी नहीं थे। वह हारकर वापस आने वाले खिलाड़ी थे।

 

विश्व कप ने कहानी पूरी कर दी

मेसी के करियर की सबसे बड़ी कमी लंबे समय तक यही कही जाती रही कि उनके पास विश्व कप नहीं है। उनकी तुलना बार-बार डिएगो माराडोना से होती थी। हर हार के बाद सवाल उठता था कि क्या मेसी कभी वह कर पाएंगे, जो माराडोना ने 1986 में किया था।

 

फिर 2022 आया। कतर के फाइनल में अर्जेंटीना और फ्रांस आमने-सामने थे। वह मैच आज फुटबॉल इतिहास के सबसे यादगार फाइनल में गिना जाता है। 

 

अर्जेंटीना विश्व चैंपियन बना। मेसी के हाथ में विश्व कप था। उस पल के बाद उनकी महानता को साबित करने के लिए किसी तर्क की जरूरत नहीं रह गई। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि विश्व कप जीतने के बाद भी उन्होंने खेलना बंद नहीं किया।

 

2026 में उन्होंने अपना छठा विश्व कप खेला। अर्जेंटीना फाइनल तक पहुंचा, लेकिन स्पेन से हार गया। पराजय के बावजूद मेसी की कहानी अधूरी नहीं हुई। क्योंकि उनके पास वह ट्रॉफी पहले से थी, जिसका इंतजार उनके करियर के सबसे कठिन वर्षों में हुआ था।

 

आखिरी मैच में भी वही मेसी

बेनिन के खिलाफ आखिरी मैच में शायद सबसे खूबसूरत बात यही थी कि मेसी ने विदाई को औपचारिकता नहीं बनने दिया। उन्होंने निकोलस ओटामेंडी के गोल में मदद की। फिर निको पाज के गोल के लिए असिस्ट दिया और 71वें मिनट में पेनल्टी पर खुद गोल किया।

 

यानी आखिरी बार भी उन्होंने वही किया, जो पूरी जिंदगी करते आए थे, खेल को अपने आसपास बेहतर बनाना।

 

एक गोल। दो असिस्ट। और 3-0 की जीत। उनका अर्जेंटीना करियर 208 मैचों और 126 अंतरराष्ट्रीय गोलों के साथ खत्म हुआ। वह देश के सबसे ज्यादा मैच खेलने वाले और सबसे ज्यादा गोल करने वाले खिलाड़ी बनकर विदा हुए।

 

लेकिन आंकड़ों से ज्यादा महत्वपूर्ण वह दृश्य था, जब अंतिम सीटी के बाद मेसी भावुक होकर मैदान पर खड़े थे। उनकी आंखों में आंसू थे। शायद इसलिए कि इस बार वह जानते थे कि अब वापस आने का कोई अगला मैच नहीं है।

 

मेसी की सबसे बड़ी विरासत क्या है?

ट्रॉफियां? गोल? रिकॉर्ड? आठ बैलन डी’ओर? निश्चित तौर पर ये सब उनकी महानता का हिस्सा हैं। लेकिन मेसी की सबसे बड़ी विरासत शायद इससे आगे है।

 

उन्होंने दुनिया को बताया कि फुटबॉल सिर्फ ताकत और रफ्तार का खेल नहीं है। इसमें कल्पना भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने एक बच्चे को दुनिया का सबसे बड़ा फुटबॉल स्टार बनने की कहानी दी। उन्होंने लाखों बच्चों को यह सपना देखने की वजह दी कि गेंद को पैरों के करीब रखकर भी दुनिया जीती जा सकती है।

 

उन्होंने यह भी सिखाया कि महानता हमेशा शोर नहीं करती। मेसी मैदान पर बहुत कम बोलते थे। गेंद उनके लिए बोलती थी।

 

अब फुटबॉल कितना सूना होगा?

फुटबॉल खत्म नहीं होगा। नए खिलाड़ी आएंगे। नए सितारे बनेंगे। कोई अगला बड़ा गोल करेगा, कोई अगला रिकॉर्ड तोड़ेगा। लेकिन मेसी जैसा खिलाड़ी बार-बार नहीं आता। अब वह इंतजार नहीं होगा कि गेंद मेसी के पास कब आएगी।

 

वह क्षण नहीं होगा जब स्टेडियम में अचानक हजारों लोग एक साथ खड़े हो जाएं क्योंकि उन्हें पता है कि कुछ असाधारण होने वाला है।

 

कोई डिफेंडर उनके सामने खड़ा होगा, मेसी उसे देखेंगे, एक छोटा सा मूवमेंट होगा और अगले ही पल पूरा खेल बदल जाएगा। उस अनुभव का कोई विकल्प नहीं है।

 

अर्जेंटीना के लिए तो यह खालीपन और बड़ा है। मेसी अब सिर्फ टीम के कप्तान नहीं थे। वह उस टीम की पहचान बन चुके थे जिसने लंबे इंतजार और निराशाओं के बाद दुनिया को फिर अपने साथ खड़ा किया।

 

यह अंत नहीं, एक अध्याय का अंत है

मेसी ने अर्जेंटीना की जर्सी उतार दी है। फुटबॉल नहीं। वह क्लब फुटबॉल में इंटर मियामी के साथ खेलते रहेंगे। लेकिन अर्जेंटीना के नंबर 10 के रूप में उनकी कहानी अब पूरी हो चुकी है। और शायद यही इस विदाई की खूबसूरती है।

 

उन्होंने तब विदा ली, जब लोग यह नहीं पूछ रहे थे कि मेसी कब रिटायर होंगे? लोग पूछ रहे थे कि मेसी अभी क्यों रिटायर हों? क्योंकि उम्र ने उन्हें रोका नहीं था। आखिरी मैच में भी वह गोल कर रहे थे, असिस्ट दे रहे थे और खेल को अपनी शर्तों पर प्रभावित कर रहे थे।

 

लेकिन हर महान कहानी का एक अंतिम पन्ना होता है। मेसी का वह पन्ना ब्यूनस आयर्स में लिखा गया। आसमान में उनके नाम की रोशनी थी। स्टेडियम में हजारों आवाजें थीं। आंखों में आंसू थे। और अर्जेंटीना की नीली-सफेद जर्सी में एक आखिरी बार वही नंबर चमक रहा था- 10।

 

कुछ खिलाड़ी फुटबॉल खेलते हैं। कुछ खिलाड़ी फुटबॉल जीतते हैं। और कुछ ऐसे होते हैं, जिनके जाने पर लगता है कि फुटबॉल का एक हिस्सा अपने साथ चला गया। लियोनेल मेसी उसी आखिरी श्रेणी के खिलाड़ी हैं।

विदाई मैच में भी छाया मेस्सी का जादू, किया 1 गोल और 2 असिस्ट (Video)

करीब 20 साल तक अर्जेंटीना की राष्ट्रीय फुटबॉल टीम के लिए अपने पैर से दौड़-दौड़कर और खिलाड़ियों को छका कर गोल करने वाले लियोनेल मेस्सी ने अपने विदाई मैच को भी यादगार बनाया और बेनिन के खिलाफ 2 असिस्ट और 1 गोल किया। ब्यूनस आयर्स में बेनिन के खिलाफ होने वाले इस मैत्री मुकाबले को “The Night that no one wants to end” यानी ‘वह रात जिसे कोई खत्म नहीं करना चाहता’ नाम दिया गया था।

दुनिया के सबसे महान फुटबॉल खिलाड़ियों में शामिल 39 वर्षीय मेस्सी ने अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल से संन्यास का ऐलान करते हुए कहा था कि “अब समय आ गया है।” इस कारण यह मैच सिर्फ और सिर्फ लियोनेल मेस्सी के बारे में होने वाला था। जैसे साल 2012 में सचिन तेंदुलकर की विदाई सीरीज वेस्टइंडीज के खिलाफ हुई थी, और ऐसा हुआ भी।

मैस्सी का अंतिम 126वां गोल

ब्यूनस आयर्स के मोन्यूमेंटल स्टेडियम में खेले गए मैच में हजारों प्रशंसकों ने इस महान खिलाड़ी को जोरदार तालियों और नारों के साथ अंतिम विदाई दी।अर्जेंटीना के इस सुपरस्टार ने 85,000 प्रशंसकों के सामने अपने 21 साल लंबे अंतरराष्ट्रीय करियर का समापन किया जिसमें उन्होंने 126 गोल, 2022 विश्व कप खिताब और दो कोपा अमेरिका खिताब शामिल रहे।

मेस्सी द्वारा लिए गए कॉर्नर किक के बाद, डिफेंडर निकोलस ओटामेंडी ने हेडर से 48वें मिनट में गोल कर टीम के लिए गोल कर दिया। इसके बाद मेस्सी ने युवा प्रतिभा निकोलस पाज को पास दिया जिन्होंने 61वें मिनट में बाएं पैर से शानदार फिनिश के साथ गोल किया।दस मिनट बाद पेनल्टी पर मेस्सी ने बाएं पैर से गोल दाग दिय जिससे सर्वकालिक शीर्ष गोल स्कोरर के रूप में उनके गोलों की संख्या और बढ़ गई।दर्शकों ने उनके सम्मान में गाना शुरू किया, ‘‘Ole, Ole, Messi। ’’

GOAT जर्सी पहनकर मेस्सी ने खेला विदाई मैच

मेस्सी ने अपना अंतिम मैच (अर्जेंटीना के लिए उनका 208वां मैच) शानदार आतिशबाजी के प्रदर्शन के बीच खेला। उन्होंने विशेष संस्करण की जर्सी पहनी थी जिसमें मानक डिजाइन की तुलना में चौड़ी लंबी धारियां, एक विशाल सूरज और पीठ पर सुनहरे रंग का नंबर 10 था। पीठ के विवरण में प्रिंट में बकरे के सींग थे ‘गोट’ (GOAT) का संकेत जो जानवर और ‘Greatest of all time’ दोनों को संदर्भित करता है।

मेस्सी ने मैदान से दिया संदेश

अंतरराष्ट्रीय मैत्री मैच शुरू होने के दस मिनट बाद, रेफरी ने अर्जेंटीना के कप्तान को सम्मानित करने के लिए मैच रोक दिया। प्रतिद्वंद्वी और साथी खिलाड़ी उनका अभिवादन करने के लिए आगे आए जबकि प्रशंसक खड़े होकर तालियां बजाने लगे। मेस्सी ने हाथ उठाकर आभार जताया।मैच समाप्त होने के बाद, उन्होंने अपने साथियों को उन खिताबों के लिए धन्यवाद दिया जो उन्होंने जीते थे और उन्हें एक निर्देश दिया, ‘‘हमें एक मजबूत, एकजुट ग्रुप बनाना होगा क्योंकि कुछ लोग चाहते हैं कि राष्ट्रीय टीम असफल हो, और हमें उन्हें यह संतुष्टि नहीं देनी चाहिए। ’’

उरुग्वे ने भारत को फुटबॉल मैच में 6-1 से रौंदा, थापा ने किया एकमात्र गोल

 उरुग्वे ने मंगलवार को अंतरराष्ट्रीय मैत्री फुटबॉल मैच में दूसरे हाफ में आक्रामक प्रदर्शन करते हुए भारत को 6-1 से करारी शिकस्त दी।दो बार की विश्व चैंपियन टीम को डार्विन नुनेज ने 11वें मिनट में पेनल्टी को गोल में बदलकर बढ़त दिलाई। परमवीर सिंह को बॉक्स के अंदर फेडेरिको विनास के खिलाफ फाउल करने का दोषी ठहराए जाने के बाद उरुग्वे को पेनल्टी मिली थी।

हालांकि भारत ने शानदार जवाब देते हुए 22वें मिनट में अनिरुद्ध थापा के गोल से बराबरी कर ली। रयान विलियम्स के शॉट को गोलकीपर थियागो कार्डोजो ने रोक दिया लेकिन थापा ने रिबाउंड पर गोल कर दिया।

उरुग्वे ने 28वें मिनट में मैक्सिमिलियानो अराउजो के गोल से फिर बढ़त हासिल कर ली। भारतीय रक्षापंक्ति की चूक का फायदा उठाते हुए अराउजो ने नजदीक से गेंद को गोल में पहुंचाया।

पहले हाफ के आधे घंटे के तुरंत बाद बिजली चमकने के कारण खेल कुछ देर के लिए रोकना पड़ा। मौसम से जुड़ी इस बाधा के बाद मुकाबला दोबारा शुरू हुआ।दूसरे हाफ में भारत उरुग्वे के आक्रामक खेल का सामना नहीं कर सका। रोड्रिगो सालाजार ने 53वें मिनट में उरुग्वे की ओर से तीसरा गोल किया।

इसके छह मिनट बाद अराउजो ने अपना दूसरा गोल करके स्कोर 4-1 कर दिया और इसके साथ ही भारत की वापसी की उम्मीद लगभग खत्म हो गई।उरुग्वे ने भारतीय रक्षापंक्ति में मौजूद खाली जगहों का लगातार फायदा उठाया। जुआन मैनुअल सनाब्रिया ने 71वें मिनट में पांचवां गोल किया जबकि रोड्रिगो अगुइरे ने 86वें मिनट में छठा गोल दागकर भारत की करारी हार पूरी कर दी।

यह हार खालिद जमील की टीम के लिए अंतरराष्ट्रीय मैत्री मुकाबलों की श्रृंखला का निराशाजनक अंत रही। भारत ने इससे पहले पनामा के खिलाफ 1-1 से ड्रॉ खेला था और फिर शनिवार को पांच बार की विश्व चैंपियन ब्राजील के हाथों 0-4 से हार गया था।

दक्षिण अमेरिकी टीम के खिलाफ इस हाई प्रोफाइल मैत्री मैच के लिए भी विशाल सॉल्ट लेक स्टेडियम में दर्शकों की संख्या कम रही।इस 68,000 दर्शकों की क्षमता वाले स्टेडियम की कई सीटें खाली रहीं और तीनों दीर्घाओं (निचली, मध्य और ऊपरी) में काफी कम दर्शक नजर आए। इससे आयोजक अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ (एआईएफएफ) के लिए स्पष्ट संदेश गया।

कम दर्शकों की संख्या के बावजूद एआईएफएफ ने लोगों को स्टेडियम तक खींचने के लिए कई प्रयास किए थे।
इसी मैदान पर ब्राजील के खिलाफ भारत की हार के दौरान फीकी प्रतिक्रिया देखने के बाद आयोजकों ने उरुग्वे के खिलाफ मैच के टिकटों की कीमत कुछ ब्लॉकों में करीब 90 प्रतिशत तक घटा दी थी। 749 रुपये से शुरू होने वाले टिकट 199 रुपये में उपलब्ध कराए गए।

इसके अलावा मुफ्त पास भी बांटे गए जिनमें पिछले साल कोलकाता में हुए विवादित लियोनेल मेस्सी दौरे के टिकट खरीदने वाले लोगों को दिए गए 22,000 पास भी शामिल थे।इसके बावजूद किकऑफ के समय स्टेडियम में करीब 15,000 दर्शक ही मौजूद थे।

पूर्व स्टार फुटबॉलर बाइचुंग भूटिया ने इंदौर में शुरु की फुटबॉल एकेडमी

पूर्व स्टार फुटबॉलर बाइचुंग भूटिया ने इंदौर में शुरु की फुटबॉल एकेडमी

भारत के पूर्व स्टार फुटबॉलर  बाइचुंग भूटिया ने इंदौर के सुप्रसिद्ध स्कूल चोइथराम इंटरनेशनल स्कूल में बाइचुंग भूटिया फुटबॉल स्कूल (BBFS) की शुरुआत की। यह मध्यप्रदेश में उनकी फुटबॉल अकादमी का पहला केंद्र बन गया।  

स्वच्छ शहर में आगमन और उद्धाटन के बाद उन्होंने मीडियाकर्मियों से बातचीत की और कहा कि उनका लक्ष्य है फुटबॉल की नई खेप को विश्वस्तरीय सुविधाएँ मिल सके। भारत में फुटबॉल के भविष्य पर उन्होंने कहा कि यह विकासशील स्थिती में है और इस खेल के सामने कई चुनौतियां है।

भारत की फीफा रैंक बहुत नीचे है लेकिन बाइचुंग भूटिया का मानना है कि भारत में फुटबॉल की प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। असल चुनौती यह है कि वह मैदान तक आ सके और ज्यादा से ज्यादा प्रतियोगिताओं में भाग ले सकें।

उन्होंने कहा कि जेन जी यानि कि 16 साल से ज्यादा के बच्चे फुटबॉल में काफी रुचि दिखा रहे हैं यह भारत की फुटबॉल संस्कृति के लिए एक शुभ संकेत है।

ऐसा रहा है करियर

भूटिया ने अपना फुटबॉल करियर इस्ट बेंगाल क्लब के साथ शुरू किया जहां उन्होंने चार दौर आई लीग फुटबॉल टीम में बिताए हैं। जब भूटिया ने 1999 में इंग्लिश क्लब बरी ज्वाइन किया तो वह दूसरे ऐसे भारतीय बने जिसने यूरोप में प्रोफेशनली फुटबॉल खेला। उनके अलावा मोहम्मद सलीम भी यूरोप में प्रोफेशनली खेल चुके हैं।

बाद में बाइचुंग भूटिया ने कुछ समय के लिए मलेशिया के फुटबॉल क्लब पेराक एफए के लिए खेला। इसके अलावा वह जेसीटी मिल्स के लिए भी खेल चुके हैं। यहां उनके कार्यकाल के दौरान क्लब ने एक लीग भी जीती थी। भूटिया मोहन बागान के लिए भी खेल चुके हैं परंतु उनके दो कार्यकालों के दौरान टीम लीग नहीं जीत सकी।

बाइचुंग भूटिया के अंतराष्ट्रीय फूटबॉल के खिताबों में नेहरू कप, एलजी कप, एसएएफएफ चैंम्पियनशिप तीन बार और एएफसी चैलेंज कप शामिल हैं। भूटिय भारत के सर्वाधिन मैच खेलने वाले खिलाड़ी हैं। 2009 में उन्होंने नेहरू कप में खेलने के दौरान अपनी 100वीं कैप हासिल की मतलब यह उनका 100वां मैच था। उन्होंने कुल 104 कैप (टोपी) हासिल की हैं। 2011 के अगस्त में भूटिया ने अंतराष्ट्रीय फूटबॉल से संन्यास ले लिया। उनका आखिरी मैच 10 जनवरी 2012 को भारतीय नेशनल टीम और बायरेन मुनिक के बीच दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में हुआ था।

चक दे गर्ल्स का कमाल, पहली बार महिला हॉकी की रैंक भारतीय पुरुषों से बेहतर

विश्वकप में पहली बार बेहतरीन प्रदर्शन करने के बाद अब भारतीय महिला हॉकी टीम ने एक नया इतिहास रच दिया है। ऐसा पहली बार हुआ है कि महिला हॉकी टीम की रैंकिंग पुरुष हॉकी टीम से बेहतर हो। एशियाई खेलों में इन दोनों ही टीमों ने स्वर्ण पदक जीता।

महिला टीम ने चीन को सिर्फ 1 गोल के अंतर से हराकर ना केवल एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीता बल्कि स्वत ओलंपिक क्वालिफिकेशन भी पा लिया, अब पिछली बार की तरह टीम को क्वालिफाइंग टूर्नामेंट खेलने की जरूरत नहीं पड़ेगी। वहीं भारतीय पुरुष हॉकी टीम ने मलेशिया को 5-1 से बड़े अंतर से हराया और अपने स्वर्ण पदक का बचाव किया।

लेकिन कुल रैंकिंग की बात करें तो भारतीय महिला टीम सातवें पायदान पर है और भारतीय पुरुष टीम आठवें पायदान पर है। ऐसा भारतीय हॉकी इतिहास में पहली बार हुआ है कि महिला टीम की रैंक पुरुष टीम से बेहतर हो।

पहली बार महिला टीम हॉकी विश्वकप में पुरुष हॉकी टीम से निकली आगे

हॉकी विश्वकप में हमेशा भारतीय पुरुष टीम से महिला टीम कोसो पीछे रहती थी। ना जाने कितनी बार तो महिला टीम क्वालिफाय ही नहीं कर पाती थी। लेकिन अगस्त में खेले गए महिला टीम ने ना केवल क्वालिफाय किया बल्कि अपने पुरुष साथियों से बेहतर प्रदर्शन किया। इस बार उम्मीद की पुरुष टीम कम से कम सेमीफाइनल खेलेगी और महिला टीम से कोई उम्मीद ही नहीं थी। लेकिन भारतीय महिला टीम ने पांचवा पायदान पाया और पुरुष टीम को आठवां पायदान मिला।

टीम ने 5वें-छठे स्थान के लिए खेले गए मैच में दुनिया की नंबर 5 टीम जर्मनी को 3-1 से हराया।इस नतीजे से भारतीय महिला टीम को पांचवां स्थान मिला, जो 1974 में हुए पहले महिला वर्ल्ड कप (जिसमें वे चौथे स्थान पर रही थीं) के बाद से उनका वर्ल्ड कप में अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन है।टीम ने पूरे टूर्नामेंट में सिर्फ़ एक हार का सामना किया। उन्होंने चीन, इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसी बेहतर रैंकिंग वाली टीमों के साथ मैच ड्रॉ कराए और दक्षिण अफ्रीका को 6-1 से हराया।यह सब भारत ने तब किया जब दल में 11 युवा खिलाड़ी थे और अपना पहला विश्वकप खेल रहे थे।

पुरुष टीम ने पूल डी के मुकाबले में इंग्लैंड जैसी टीम से 4-2 से मैच गंवाया।वह भी मैच में बढ़त बनाने के बाद। इसके बाद टीम का पाकिस्तान के खिलाफ प्रदर्शन अच्छा था लेकिन 5-3 की स्कोरलाइन संतोषजनक नहीं थी।
अगले दौर में टीम को नीदरलैंड्स और अर्जेंटीना मिली। नीदरलैंड्स ने भारतीय टीम को 3-1 से हराया।अर्जेंटीना के खिलाफ भारत 3-5 से हारकर सेमीफाइनल की दौड़ से बाहर हो गया।


नखरेबाजों और नामी खिलाड़ियों को जापान ना भेजने की रणनीति काम आई

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एशियाड के लिए नखरेबज और नामी खिलाड़ियो से किनारा करने के संकेत खेल मंत्री मनसुख मांडविया ने जुलाई के पहले हफ्ते में ही दे दिया था। उन्होंने साफ साफ शब्दों में कहा था कि एशियाई खेल कोई ‘एक्सपोजर ट्रिप’ नहीं है और पदक उम्मीदों पर ही फोकस रखते हुए इस बार 600 से कम सदस्यीय दल ही भेजा जायेगा। ऐसा ही हुआ और 502 खिलाड़ियों का दल जापान गया।

खेलमंत्री ने मीडिया से बातचीत में साफ तौर पर कहा था कि जापान में एशियाई खेलों में महज भागीदारी के लिये लंबा चौड़ा दल नहीं भेजा जायेगा। मांडविया ने कहा था ,‘‘ एशियाई खेल कोई एक्सपोजर ट्रिप नहीं है। यह अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करके देश का नाम रोशन करने वाले खिलाड़ियों के लिये मंच है। इसमें पहले दौर में बाहर होने के लिये किसी को भेजने का कोई फायदा नहीं है। मैं बार बार कहता आया हूं कि अच्छा प्रदर्शन करने वालों के लिये ही भारतीय दल में जगह होगी।’’

उन्होंने कहा था , ‘‘एक्सपोजर कहीं और से भी हासिल किया जा सकता है, एशियाई खेल उसके लिये नहीं हैं। सिर्फ नौकरी पाने के लिये भागीदारी के मकसद से जाने के इच्छुक लोगों के नाम पर मंजूरी नहीं दी जायेगी।’’

उन्होंने कहा ,‘‘ इस बार चयन प्रक्रिया में पूरी पारदर्शिता और निष्पक्षता बरती गई है। इक्के दुक्के मामलों को छोड़कर कहीं कोई विवाद नहीं है और ये मामले भी सुलझ जायेंगे। चयन के मानदंडों के आधार पर ही दल चुना गया है। नौकरी पाने के लिये किसी को एशियाई या राष्ट्रमंडल खेल दल में शामिल करना या किसी के परिजन को सहयोगी स्टाफ बनाकर भेजना अब नहीं होगा।’’

विनेश फोगाट से किया किनारा

ओलंपियन महिला पहलवान विनेश फोगाट ट्रायल में एशियाई खेलों के लिये क्वालीफाई करने में विफल रही। 31 वर्षीय विनेश को 53 किग्रा वर्ग के सेमीफाइनल में मीनाक्षी गोयत ने हराया। इंदिरा गांधी स्टेडियम में महिलाओं की 53 किग्रा के चयन ट्रायल्स के सेमीफाइनल मुकाबले में मीनाक्षी गोयत ने विनेश फोगाट को 6-4 से हराया। इससे पहले ट्रायल्स के लिए खूब हंगामा हुआ और साफ पता चल रहा था कि विनेश ना ही फॉर्म में है और ना ही सरकार उनको एशियाड ले कर जाने में दिलचस्पी दिखा रही है।

मनिका बत्रा को डाला रिजर्व खिलाड़ियों की लिस्ट में

भारत की सबसे कामयाब टेबल टेनिस खिलाड़ियों में से एक, 31 वर्षीय मनिका बत्रा मुख्य टीम में जगह नहीं बना पाईं और उन्हें रिजर्व खिलाड़ियों में रखा गया। मुख्य टीम में उनके शामिल न होने की वजह घरेलू टूर्नामेंट में उनकी गैर-मौजूदगी थी। महिला टीम की कप्तानी श्रीजा अकुला थी, जो वर्ल्ड रैंकिंग में 45वें स्थान पर थी और भारत की सबसे ऊंची रैंकिंग वाली महिला टेबल टेनिस खिलाड़ी – वह मनिका से छह स्थान पीछे थी।हालांकि टेबल टेनिस में अपेक्षित परिणाम नहीं आ सका लेकिन मंत्रालय ने नियमों की अनदेखी नहीं सही।

दीपिका कुमारी और अतुन दास को नहीं भेजा गया जापान

चार बार की ओलंपियन दीपिका कुमारी, भारत के पूर्व नंबर एक तीरंदाज अतनु दास और एशियाई खेलों के पदक विजेता अभिषेक वर्मा जापान में होने वाले एशियाई खेलों के लिये भारतीय टीम में जगह बनाने में नाकाम रहे। कुमकुम मोहोद को महिला रिकर्व टीम में जगह मिली। कंपाउंड वर्ग में अनुभवी ज्योति सुरेखा वेन्नम अकेली अनुभवी तीरंदाज थी।पुरूष रिकर्व वर्ग में धीरज बोम्मदेवरा शीर्ष, नीरज चौहान दूसरे और यशदीप भोगे तीसरे स्थान पर रहे। इसका सुखद परिणाम यह रहा कि तीरंदाजी में इन सभी खिलाड़ियों ने पदक जीते।

प्रदर्शनकारी पहलवानों से लड़कर एशियाड पहुंचे सुजीत ने जीता गोल्ड मेडल (Video)

एशियाई खेलों में अपने चयन को लेकर कानूनी लड़ाई के तीन साल बाद, सुजीत कलकल ने एशियाई खेलों का चैंपियन बनकर एक शानदार सफर पूरा किया। स्वदेश पहुंचने पर उनका एयपोर्ट पर जोरदार स्वागत हुआ।उन्होंने पुरुषों की फ्रीस्टाइल 65 किग्रा फ़ाइनल में ताजिकिस्तान के वर्ल्ड मेडलिस्ट अब्दुलमजीद कुदिएव को 10-9 से हराकर ज़बरदस्त वापसी की।

मैच खत्म होने में दो मिनट से भी कम समय बचा था और सुजीत 2-9 से पीछे चल रहे थे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। 23 साल के सुजीत ने लगातार हमले किए और तेज़ी से तीन ‘टेकडाउन’ करके अंकों का अंतर कम किया। जब 11 सेकंड बचे थे, तब भी कुदिएव एक अंक से आगे थे, लेकिन सुजीत ने एक आखिरी ‘टेकडाउन’ हासिल कर लिया। इन दो अंकों ने उन्हें 10-9 से आगे कर दिया और खेलों की सबसे रोमांचक वापसी में से एक को पूरा किया।

8 साल बाद कुश्ती में भारत का पहला गोल्ड मेडल

यह 2018 के बाद एशियाई खेलों में कुश्ती में भारत का पहला गोल्ड मेडल था। सुजीत पुरुषों की 65 किग्रा फ्रीस्टाइल का खिताब जीतने वाले तीसरे भारतीय बन गए; उनसे पहले ओलंपिक मेडलिस्ट योगेश्वर दत्त (2014) और बजरंग पूनिया (2018) ने यह खिताब जीता था।इस जीत के साथ ही उस सफर का सुखद अंत हुआ, जिसकी शुरुआत तीन साल पहले निराशा के साथ हुई थी।

सुजीत ने 2022 के एशियाई खेलों (जो आखिरकार 2023 में हुए) के लिए 65 किग्रा कैटेगरी में ट्रायल की मांग करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। खेल मंत्रालय द्वारा रेसलिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया की मान्यता रद्द किए जाने के बाद भारतीय कुश्ती का कामकाज देख रही एड-हॉक कमेटी ने बजरंग पूनिया को सीधे टीम में एंट्री दे दी थी।

सुजीत ने महिला पहलवान अंतिम पंघाल के साथ मिलकर इस फैसले को कोर्ट में चुनौती दी। अंतिम आखिरकार टीम में जगह बनाने और ब्रॉन्ज मेडल जीतने में सफल रहीं, जबकि विनेश फोगाट को बिना ट्रायल के 53 किग्रा कैटेगरी में सीधे एंट्री दी गई। हालांकि, सुजीत को कोर्ट से कोई राहत नहीं मिली।

किस्मत का खेल देखिए, तीन साल पहले बजरंग हार गए थे, जिससे 65 किग्रा कैटेगरी में भारत का दबदबा खत्म हो गया था। बजरंग के 2018 में गोल्ड जीतने से पहले योगेश्वर ने 2014 में गोल्ड मेडल जीता था।

पिछली बार से 21 मेडल कम लाने के बावजूद भारत की चौथी रैंक बरकरार

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जापान के आइची-नागोया में खेले गए एशियाई खेलों में भारत ने धीमी शुरुआत करने के बावजूद अक्टूबर की शुरुआत में तेज रफ्तार से पदक जीतना शुरु किए जिसमें गोल्ड मेडल की अच्छी खासी संख्या रही। शुक्रवार को ही भारत ने विभिन्न खेलों में 6 गोल्ड मेडल जीते जिसमें महिला हॉकी टीम का फाइनल में चीन के खिलाफ आया गोल्ड सबसे खास रहा जो 44 साल बाद आया। यही कारण रहा कि भारत का आंकड़ा 80 पार जा पाया।अगर अंतिम दो दिनों में भारत ने 11 स्वर्ण पदकों की शानदार झड़ी नहीं लगाई होती तो शीर्ष पांच में जगह बनाना भी मुश्किल होता।

भारत 85 पदकों (21 स्वर्ण, 27 रजत, 37 कांस्य) के साथ पदक तालिका में चौथे स्थान पर रहा जो चीन के हांग्झोउ में हुए पिछले चरण से 21 कम है।चीन लगातार 12वें चरण में तालिका में शीर्ष पर रहा उसने 169 स्वर्ण, 89 रजत और 83 कांस्य सहित कुल 341 पदक जीते जो विदेश में आयोजित एशियाई खेलों में उसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है। मेजबान जापान 269 पदकों (83 स्वर्ण, 95 रजत और 91 कांस्य) के साथ दूसरे स्थान पर रहा। उसके बाद दक्षिण कोरिया के 39 स्वर्ण, 43 रजत और 68 कांस्य पदक थे।

मुक्केबाजों और तीरंदाजों के बेहतरीन प्रदर्शन का परिणाम है कि भारत पदकों की संख्या में 80 का आंकड़ा पार कर पाया। शनिवार को भारतीय पुरुष टीम मलेशिया के खिलाफ गोल्ड मेडल मैच में 5-1 से जीत दर्ज की। इसके अलावा पहलवानी में अमन सहरावत ने स्वर्ण, अंतिम पंघाल ने रजत और दीपक पुनिया ने कांस्य पदक जीतकर भारत का अभियान समाप्त किया।

भारत की महिला क्रिकेट टीम और पुरुष क्रिकेट टीम ने गोल्ड मेडल जीता है। वहीं भारत की कबड्डी की महिला और पुरुष टीम ने ईरान को हराकर गोल्ड जीता है। मीराबाई चानू ने पहली बार एशियाड में गोल्ड जीता। चोटिल होकर बाहर हो चुके नीरज चोपड़ा की गैर मौजूदगी में भी भारत के रोहित यादव और यशवीर सिंह ने रजत और कांस्य पदक जीता।

इसके अलावा कई एतिहासिक गोल्ड मेडल भारत को इन खेलों में मिले। कई खिलाड़ियों ने गोल्ड जीतकर लॉस एंजलिस ओलंपिक्स के लिए अपनी जगह बनाई। खासकर तीरंदाजी में भारत ने चौंकाने वाला प्रदर्शन किया रिकर्व तीरंदाजी महिला और पुरुष टीम ने गोल्ड जीतकर स्वत ओलंपिक क्वालिफाय किया। कुमद ने भी व्यक्तिगत स्पर्धा में गोल्ड जीता। इसके अलावा नीरू हांडा सबसे सफल एथलीट रहीं जिनको समापन समारोह में ध्वजवाहक बनने का गौरव प्राप्त हुआ।

TraP Shooting

उन्होंने आइची-नागोया में तीन मेडल – दो गोल्ड और एक सिल्वर – जीते। नीरू ने महिलाओं के ट्रैप इवेंट में गोल्ड मेडल जीता और एशियन गेम्स 2026 में व्यक्तिगत गोल्ड मेडल जीतने वाली पहली भारतीय बनीं। उन्होंने महिलाओं के ट्रैप टीम इवेंट में सिल्वर मेडल भी जीता और इसके बाद मिक्स्ड ट्रैप टीम इवेंट में एक और गोल्ड मेडल अपने नाम किया।

ग्रीको रोमन वर्ग में नितेश सिवाच और सुनील कुमार ने भी शानदार प्रदर्शन किया जिससे कुश्ती का कुल प्रदर्शन बेहद प्रभावशाली रहा।

भारत को शुरुआत में बैडमिंटन, शूटिंग, टेबल टेनिस और कनोइंग में निराशा हाथ लगी अन्यथा हांगजाउ में आए 107 पदकों से आगे या बराबरी पर भारतीय दल रहता। बैडमिंटन की स्टार जोड़ी सात्विकसाइराज रंकी रेड्डी और चिराग शेट्टी एकल प्रतियोगिता के क्वार्टर फाइनल में ही हार गए। यही हाल पीवी सिंधू का रहा। बैडमिंटन की पुरुष टीम ने टीम इवेंट में ब्रॉंज मेडल जीतकर इज्जत बचाई। टेबल टेनिस की टीम  ईरान जैसी टीम के सामने हार गई। वहीं

एक और स्टार खिलाड़ी जिन्होंने निराश किया वह थी मनु भाकर जो 10 मीटर और 25 मीटर की निशानेबाजी स्पर्धा में एक भी पदक नहीं ला सकी।सबसे बड़ा उलटफेर वॉलीबॉल टीम के साथ हुआ जुलाई से बड़ी बड़ी टीमों को हराने वाली टीम पाकिस्तान से हारकर खेलों से बाहर हो जाएगी किसी ने सोचा ना था।टेनिस में भारत को बड़ा झटका लगा और भारतीय खिलाड़ी 40 साल में पहली बार बिना किसी पदक के लौटे।