अनगिनत विद्रोह और वो बुनियादी सवाल!

शुरुआत के तीन दिन के अंदर ‘सत्याग्रह’ वेबसाइट पर संघर्ष (या समस्याओं) की 30 हजार से अधिक कहानियां दर्ज कराई गईं। उनमें सबसे ज्यादा संख्या शिक्षा, भ्रष्टाचार, जातीय भेदभाव, स्वास्थ्य सेवाओं, श्रम अधिकारों, और किसान से जुड़े मुद्दों की रहीं। इनसे संबंधित प्रवृष्टियां हजारों की संख्या में आईं।… वोट चोरी बड़ा मुद्दा है, जिसने भारत के राजनीतिक रूप से जागरूक तबकों को उद्वेलित किया है। इनके साथ जमीनी संघर्षों  को भी जोड़ कर देखें, तो बेशक इस समय देश में मौजूद बेचैनी के आलम का अंदाजा लगता है।

सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने हाल में अपने एक सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा- “जून में हुए CJP प्रदर्शनों ने देश में असंख्य छोटे‑बड़े विद्रोहों को जन्म दिया है। (मुख्य निर्वाचन आयुक्त) ज्ञानेश कुमार द्वारा की गई ‘वोट चोरी’ अब स्वतंत्रता के बाद भारत का सबसे बड़ा मुद्दा बन गई है। यह हमारे लोकतंत्र की जड़ पर चोट करती है। सरकार की अपने ‘तोते’ ज्ञानेश को बचाने के लिए प्रदर्शनों को दबाने की कोशिशें उलटी पड़ रही हैं। इससे जनता का गुस्सा और बढ़ रहा है, जो अब उबाल पर है।”

दरअसल, भूषण ने अंग्रेजी में लिखे इस पोस्ट में ‘million mutinies in the country’ लिखा, जिसका अनुवाद हमने ‘असंख्य छोटे-बड़े विद्रोहों’ के रूप में किया है। यह उपमा संभवतः उन्होंने मशहूर लेखक वी.एस. नॉयपॉल की पुस्तक A Million Mutinies Now से ली है। यह किताब नॉयपॉल की भारत संबंधी त्रि-कथा (Trilogy) की आखिरी रचना है, जो 1990 में प्रकाशित हुई थी।

नॉयपॉल की A Million Mutinies Now का सार है कि भारत की सतह पर दिखने वाली हलचल और उथल-पुथल किसी आने वाले विनाश का संकेत नहीं, बल्कि एक “बौद्धिक और सामाजिक जागरण” का परिणाम है। यह छोटे-छोटे विद्रोहों का ऐसा महा-समुद्र है, जो अंततः भारत को अपनी वास्तविक पहचान और स्वतंत्रता की ओर ले जा रहा है।

नायपॉल ने यह किताब 1980 के दशक में भारत यात्रा पर आने के बाद लिखी थी। यहां घूमते हुए उन्हें अहसास हुआ कि स्वतंत्रता के बाद का भारत अब ऐसे दौर में पहुंच गया है, जहां समाज के हर हिस्से में छोटे‑छोटे विद्रोह और असंतोष दिखाई देते हैं। लेकिन ये विद्रोह किसी बड़े क्रांतिकारी आंदोलन की तरह नहीं हैं, बल्कि जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र, राजनीति और व्यक्तिगत आकांक्षाओं से जुड़े संघर्ष हैं। नायपॉल ने इसे भारत के बदलते समाज का प्रतीक माना- जहां लोग अब चुप नहीं रहते, बल्कि अपनी पहचान और अधिकारों के लिए आवाज़ उठाते हैं।

संदर्भ के लिए यह उल्लेख कर लेना उचित होगा कि नॉयपॉल दरअसल संप्रदाय, जाति, क्षेत्र एवं भाषा की पहचान जता रही गतिविधियों से प्रभावित थे, जिन्हें भारतीय नवजागरण के दौर में संकीर्ण एवं भारत की राष्ट्रीय एकता के लिए चुनौती समझा जाता था। नेहरूवादी नीतियों एवं भारतीय धर्मनिरपेक्षता के वे कड़े आलोचक थे। उनका मानना था कि भारत में धर्मनिरपेक्षता का उपयोग अक्सर ऐतिहासिक सच्चाइयों और मध्यकालीन (यानी मुस्लिम) आक्रमणों के घावों को छिपाने के राजनीतिक हथकंडे के रूप में किया गया। अपनी इसी सोच के आधार पर नॉयपॉल ने बाबरी मस्जिद को तोड़ने के लिए हुए राम जन्मभूमि आंदोलन को भारत में एक ऐतिहासिक सांस्कृतिक जागरण के रूप में देखा।

इस रूप में समझा जाएगा कि नरेंद्र मोदी का शासन उस कथित “ऐतिहासिक सांस्कृतिक जागरण” का ठोस परिणाम है। यानी आज देश जहां है, वह 1980-90 के दशकों की ‘Million Mutinies’ का परिणाम है। मगर अब बात जिन ‘Million Mutinies’ की हो रही है, वो दरअसल, उन परिणामों से बनी जकड़न से निकलने की जद्दोजहद की मिसाल हैं।

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने हाल में इन ‘छोटे-मोटे विद्रोहों’ को साझा मंच प्रदान करने की एक सराहनीय पहल की। सत्याग्रह (http://rahulgandhi।in/satyagraha वेबसाइट की शुरुआत करते हुए उन्होंने लिखाः “देशभर में लोग अपने हक़ के लिए लड़ रहे हैं- और अक्सर अकेले लड़ रहे हैं। Gen Z, छात्र, किसान, आदिवासी, दलित, महिलाएं- हर संघर्ष की अपनी कहानी है। पर जो आवाज़ अकेली उठती है, वो अक्सर दब जाती है। ‘सत्याग्रह’ इन्हीं आवाज़ों को एक नक्शे पर साथ लाने की पहल है। बापू ने यही सिखाया था- सच सबसे बड़ा हथियार है। पर उससे भी बड़ा हथियार है, एकता में सच के साथ खड़े होना। अगर आप भी किसी अन्याय से लड़ रहे हैं- अपनी कहानी भेजिए। दो मिनट लगेंगे। आपकी कहानी नक्शे पर आएगी। आप देखेंगे कि आपकी तरह और कौन-कौन लड़ रहा है। और मैं जो कर सकता हूं, करुंगा- संसद में, सड़क पर, खत लिखकर, जहां भी मेरी ज़रूरत हो वहां आपके साथ खड़े होकर- नेता विपक्ष के रूप में ये मेरी ज़िम्मेदारी है। अपने सत्याग्रह की कहानी मुझे यहां बताएं।”

इस पहल की शुरुआत के तीन के अंदर ‘सत्याग्रह’ वेबसाइट पर संघर्ष (या समस्याओं) की 30 हजार से अधिक कहानियां दर्ज कराई गईं। उनमें सबसे ज्यादा संख्या शिक्षा, भ्रष्टाचार, जातीय भेदभाव, स्वास्थ्य सेवाओं, श्रम अधिकारों, और किसान से जुड़े मुद्दों की रहीं। इनसे संबंधित प्रवृष्टियां हजारों की संख्या में आईं। जबकि “वोट चोरी” से संबंधित जिस संघर्ष को प्रशांत भूषण ने “स्वतंत्रता के बाद भारत का सबसे बड़ा मुद्दा” बताया है, उससे संबंधित सिर्फ 559 (सात अक्टूबर को दिन में एक बजे तक) शिकायतें दर्ज हुईं।

फिर भी यह निर्विवाद है कि वोट चोरी बड़ा मुद्दा है, जिसने भारत के राजनीतिक रूप से जागरूक तबकों को उद्वेलित किया है। कॉकरोच जनता पार्टी के इस आंदोलन में उतरने और उसे मिले भारी समर्थन से जाहिर है कि अभिजात्य वर्ग के एक बड़े हिस्से में भी “चुनावों को नियंत्रित” कर लिए जाने के आरोप को गंभीरता से लिया गया है। इस कारण मीडिया, सोशल मीडिया, और आम चर्चाओं में यह सवाल सर्वोपरि बना हुआ है।

इनके साथ जमीनी संघर्षों (जिनमें से कई ने राहुल गांधी की वेबसाइट पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है) को भी जोड़ कर देखें, तो बेशक इस समय देश में मौजूद बेचैनी के आलम का अंदाजा लगता है। इनके परिणामस्वरूप कई क्षेत्रों में सामाजिक अस्थिरता की स्थिति है। आर्थिक दबाव और उस कारण जन्में संघर्षों की कहानी तो लगभग पूरे देश में साकार होती दिखती है। लेकिन उनका कोई सकल एवं राष्ट्र-व्यापी प्रभाव उभरता अभी तक नजर नहीं आया है।

इस सिलसिले में व्लादीमीर इलिच लेनिन का वो कथन अक्सर याद आता है, जिसमें उन्होंने कहा था- There are no people– yet there is a mass of people। इस पूरे कथन का सार था- “जनता बहुत है, असंतोष भी बहुत है, लेकिन नेतृत्व नहीं है। कामगार वर्ग और समाज के अलग‑अलग हिस्सों से हर साल असंतुष्ट लोग सामने आते हैं, जो विरोध करना चाहते हैं और निरंकुश शासन के खिलाफ संघर्ष में मदद देने को तैयार हैं। पर समस्या यह है कि उन्हें दिशा देने वाले नेता और संगठनकर्ता नहीं हैं, जो सबकी ताकत को एकजुट करके संगठित और सामंजस्यपूर्ण आंदोलन बना सकें।” (On Organization)

इस कथन का आशय यह भी था कि संगठित करने वाले सक्षम नेतृत्व और रणनीतिकारों के अभाव के कारण क्रांतिकारी आंदोलन की ऊर्जा बिखर जाती है और उसका प्रभाव सीमित हो जाता है। इस बात की पुष्टि वैसे तो आधुनिक इतिहास के हर दौर में हुई है, लेकिन खासकर 21वीं सदी में इसके उदाहरण भरे-पड़े हैं। 2010 का दशक दुनिया भर में विशाल जन आंदोलनों के उभार का रहा। 2011 तो ऐसा वर्ष था, जब अमेरिकी पत्रिका टाइम ने अपनी सालाना रवायत के तहत “The Protester” को Person of the Year घोषित किया। उसका संदर्भ अरब स्प्रिंग (ट्यूनिशिया, मिस्र, लीबिया, सीरिया, बहरीन आदि में जन विद्रोह, अमेरिका में Occupy Wall Street आंदोलन, यूरोप (खास कर ग्रीस और स्पेन) में आर्थिक संकट के खिलाफ प्रदर्शनों, भारत में अन्ना आंदोलन, और मेक्सिको तथा अन्य कई देशों में अलग-अलग मुद्दों पर जन आंदोलनों से बना था।

मशहूर लेखक और पत्रकार विन्सेंट बोविन ने उन आंदोलन का लगभग एक दशक तक अध्ययन करने के बाद “If We Burn: The Mass Protest Decade and the Missing Revolution” नाम की किताब लिखी, जिसका प्रकाशन 2023 में हुआ। उसमें उन्होंने यही समझने की कोशिश की है कि 2010–20 के वैश्विक जन आंदोलन संरचनात्मक बदलाव में क्यों नहीं बदल पाए? उन्होंने लिखा कि ऐसे संघर्षों से अधिक से अधिक संबंधित देश में राजनीतिक शून्यता पैदा होती है, लेकिन यह क्षणिक या अस्थायी घटना बन कर रह जाती है। बेविन्स ने लिखा है:

“जन आंदोलन के दशक में, सड़कों पर (जन आक्रोश के) हुए अचानक विस्फोटों ने कई बार क्रांतिकारी हालात पैदा किए। लेकिन साधारण विरोध प्रदर्शन ऐसे हालात का लाभ उठाने के लिए बहुत कमजोर साबित होते हैं, और इस तरह के विरोध प्रदर्शन इस मोर्चे पर नाकाम रह जाते हैं। अगर आप मानते हैं कि आप एक बेहतर समाज बना सकते हैं… तो आपको खुद उस राजनीतिक खालीपन में प्रवेश करना चाहिए। लेकिन अलग‑अलग कारणों से सड़क पर उतरे बिखरे हुए व्यक्तियों के समूह सीधे सत्ता अपने हाथ में नहीं ले सकते, कम-से-कम पूरे समूह के रूप में तो नहीं ही। अगर कोई व्यक्ति समूह उस राजनीतिक खालीपन में जाकर जनता के नाम पर सत्ता लेता है, तो वह एक प्रकार के अग्रिम दस्ते (vanguard) की भूमिका निभाता है, जो एक विशेष वैचारिक परियोजना से प्रेरित होता है। कुछ आदर्शवादी, सत्ता‑विरोधी विचारधाराओं में मान लिया गया कि उथल-पुथल से ही नया समाज बन जाएगा, लेकिन अब तक ऐसा नहीं हो पाया है।”

अर्थ यह कि सिर्फ सड़क पर हुआ विरोध क्रांति को दिशा नहीं दे सकता। सत्ता हाथ में लेने के लिए संगठित नेतृत्व और वैचारिक परियोजना की ज़रूरत होती है। मार्क्सवादी क्रांति के संदर्भ में ऐसी एक चर्चित टिप्पणी लेनिन की भी है। उन्होंने कहा था- “अक्सर कहा जाता है कि श्रमिक वर्ग स्वाभाविक रूप से समाजवाद की ओर आकर्षित होता है। यह बिल्कुल सही है, क्योंकि समाजवादी सिद्धांत श्रमिक वर्ग की दुर्दशा के कारणों को अन्य किसी भी अन्य सिद्धांत से अधिक गहराई से और सही ढंग से उजागर करता है। इसी वजह से मजदूर इसे आसानी से अपना लेते हैं- बशर्ते कि यह सिद्धांत खुद ‘स्वतःस्फूर्तता’ के आगे न झुक जाए और उस ‘स्वतःस्फूर्त’ बनी स्थिति को अपने अधीन कर ले। कामगार वर्ग स्वाभाविक रूप से समाजवाद की ओर बढ़ता है; फिर भी, सबसे व्यापक और लगातार नए रूपों में उभरती हुई पूंजीवादी विचारधारा भी स्वाभाविक रूप से कामगार वर्ग पर हावी रहती है।”

फिलहाल, भारत में बात मजदूर तबकों की लड़ाई की नहीं हो रही है। अभी संदर्भ पूंजीवादी ढांचे के तहत मिली सीमित आजादियों और अधिकारों की रक्षा का है। यह गौरतलब है कि इन आजादियों और अधिकारों को अधिक बड़े जन समूहों के साथ साझा करने पर एक दौर में राजी हुए शासक वर्ग इस युग में आकर ऐसी “रियायत” को माकूल और मुनासिब नहीं मान रहे हैं। यह एक वैश्विक परिघटना है। दुनिया भर में आम जन से ऐसी “रियायतों” को छीन लेने की परियोजना इस दौर की हकीकत है। इसके लिए लगभग हर जगह (जहां चुनावी लोकतंत्र है) धुर दक्षिणपंथी ताकतों को शासक समूहों ने अपना औजार बनाया है, जिन्होंने नफरत और विभेद की रणनीति से आम जन को भटकाने की अपनी क्षमता साबित की है।

लाजिम है कि ऐसी कोशिशों के खिलाफ प्रभावित जन समूहों ने प्रतिरोध का रास्ता अख्तियार किया है। जिस समय भारत में ‘Million Mutinies’ की बात हो रही है, उसी समय फ्रांस, स्पेन, जर्मनी और यहां तक कि पाकिस्तान में भी हो रहे बड़े जन प्रदर्शनों ने दुनिया का ध्यान खींच रखा है। कहा जा सकता है कि एक बार फिर “The Protester” अग्रिम कतार में आ खड़ा हुआ है। इससे संभव है कि कुछ जगह राजनीतिक शून्य पैदा हो। लेकिन उससे वो पृष्ठभूमि कितनी बदलेगी, जिसकी वजह से आवाम के हासिल अधिकारों पर तलवारें चली हैं और जिनसे आहत होकर लोग प्रतिरोध जताने के लिए प्रेरित हुए हैं?

जैसाकि ऊपर चर्चा हुई, भारत में ‘वोट चोरी’ एक बड़ा मसला है, लेकिन मुद्दे और भी हैं, जैसी झलक राहुल गांधी की पहल ‘सत्याग्रह’ पर देखने को मिली है। बल्कि एक तर्क यह हो सकता है कि उन समस्याओं (शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, रोजगार, रोजमर्रा की जिंदगी से संबंधित अन्य मसलों) से परेशान लोग अपनी वोट की ताकत से मौजूदा शासन तंत्र में कोई अस्थिरता पैदा ना करें, इसलिए उनके वोट के प्रभाव को कमजोर करना शासक वर्गों की फिलहाल सर्वोच्च प्राथमिकता बन गई है। इसलिए- एक व्यक्ति एक वोट, समान मूल्य- के सिद्धांत को व्यवहार में बचाना इस समय की भले सबसे बड़ी जरूरत हो, लेकिन इस सवाल को सिर्फ इससे ही बांध कर नहीं रखा जा सकता। यह कहना और बार-बार दोहराना जरूरी है कि वोट का अधिकार अपने-आप में अंतिम लक्ष्य नहीं है, बल्कि यह आम जिंदगी को बेहतर बनाने का एक माध्यम भर है और इसीलिए महत्त्वपूर्ण है।

इस लिहाज से अधिक दूरगामी महत्त्व का प्रश्न यह है कि दशकों तक वोट का अधिकार मिले रहने के बावजूद बहुसंख्यक जनता की जिंदगी में उसका असर सीमित क्यों बना रहा और क्या गारंटी है कि आगे ऐसा नहीं होगा? इस नजरिए से वह बदलाव जरूरी हो जाता है, जैसा 2010-20 के दशक में ना हो पाने का जिक्र और उसके कारणों की पड़ताल विन्सेंट बोविन ने अपनी पुस्तक If We Burn में की है। इसलिए मौजूदा ‘Million Mutinies’ को mass of people के बीच no people की हकीकत से अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए। बोविन ने दशक भर पुराने आंदोलनों से टिकाऊ बदलाव ना होने के लिए जिस vanguard की कमी को जिम्मेदार माना, आज असल सवाल वही है कि भारत में उस शर्त को पूरा करने बारे में क्या चर्चा हो रही है? इसकी जरूरत पर कितना जोर दिया जा रहा है, और इस विकल्प की तैयारी के लिए क्या प्रयास हो रहे हैं?

यूपी का शख्स मुंबई में नाई का काम करके हर महीने कमाता है करीब 1 लाख रुपये, हफ्ते में 6 दिन करता है मेहनत

भारत में सरकारी नौकरी को अक्सर सुरक्षित भविष्य और अच्छी जिंदगी की गारंटी माना जाता है। लेकिन मुंबई में काम करने वाले उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ निवासी एक नाई की कहानी इस सोच से अलग नजर आती है। दावा है कि वह महीने में करीब 1 लाख रुपये कमाता है। दिलचस्प बात यह है कि इतनी कमाई के बावजूद वह एंट्री-लेवल सरकारी नौकरी मिलने पर भी अपना मौजूदा काम छोड़ना नहीं चाहता।

लेखक और फंड मैनेजर हर्ष गुप्ता मधुसूदन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इस नाई के साथ हुई बातचीत साझा की। उनकी पोस्ट के मुताबिक, नाई हफ्ते में छह दिन सुबह से रात तक काम करता है। यात्रा के बुनियादी खर्च निकालने के बाद उसकी मासिक कमाई करीब एक लाख रुपये बताई गई है।

मेहनत और आजादी को मानता है अपनी सबसे बड़ी पूंजी

हर्ष के मुताबिक, बातचीत के दौरान नाई ने कहा कि काम करने और मेहनत करने वालों के लिए अवसरों की कमी नहीं है। वह अपने काम को पसंद करता है और इसमें मिलने वाली आजादी उसके लिए अहम है। यही वजह है कि वह सरकारी नौकरी के बजाय अपना मौजूदा काम जारी रखना चाहता है।

उसकी कहानी ने रोजगार को लेकर एक दिलचस्प सवाल खड़ा किया है क्या अच्छी कमाई और संतुष्टि के लिए सरकारी नौकरी ही एकमात्र रास्ता है? हालांकि, एक व्यक्ति का अनुभव पूरे रोजगार बाजार की तस्वीर नहीं बताता।

आजमगढ़ से लखनऊ तक का सफर हुआ आसान, विकास से खुश है परिवार

बातचीत में उत्तर प्रदेश के विकास का जिक्र भी आया। हर्ष के अनुसार, नाई ने बताया कि पहले उसके गांव से लखनऊ पहुंचने में 7-8 घंटे लगते थे। अब बेहतर सड़कों के कारण उतने ही समय में आना-जाना संभव हो गया है, वह भी रास्ते में चाय और खाने के लिए रुकने के बाद।

नाई ने देश में हुए विकास कार्यों पर खुशी जताई। उसने बताया कि गांव में उसके परिवार को कुछ सरकारी योजनाओं का लाभ मिला है, हालांकि शहर में ऐसा लाभ नहीं मिला।

टैक्स भरने पर गर्व, बेटे की पढ़ाई पर भी ध्यान

इस कहानी का एक और पहलू उसकी पारिवारिक जिंदगी है। हर्ष के मुताबिक, नाई की कमाई से टैक्स कटता है और वह गर्व के साथ इनकम टैक्स रिटर्न भी दाखिल करता है। कई बार उसे रिफंड भी मिलता है।

उसका एक छोटा बेटा है, जिसे वह निजी प्री-स्कूल में पढ़ाता है। उसकी पत्नी भी कमाई में योगदान देती थी, लेकिन फिलहाल बच्चे की देखभाल के लिए काम से ब्रेक पर है।

सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस, क्या हर किसी के लिए ऐसे अवसर हैं?

पोस्ट वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आईं। कुछ यूजर्स ने नाई की मेहनत और आत्मनिर्भरता की तारीफ की। वहीं, कुछ ने सवाल उठाया कि क्या एक नाई के लिए हर महीने एक लाख रुपये कमाना आम बात है। कुछ लोगों ने इस कमाई के दावे की तुलना दूसरे शहरों में नाइयों की आमदनी से भी की।

दूसरी ओर, कुछ यूजर्स ने कहा कि एक व्यक्ति की सफलता को देश में रोजगार की पूरी स्थिति का प्रमाण नहीं माना जा सकता। उन्होंने शिक्षित युवाओं के रोजगार, शिक्षा की गुणवत्ता और महिलाओं की सुरक्षा जैसे मुद्दे भी उठाए।

हर्ष ने अपनी पोस्ट के अंत में व्यंग्य करते हुए लिखा कि उनका मन नाई से कहने का हुआ कि वह भारत और अपनी जिंदगी को लेकर इतनी सकारात्मक सोच छोड़कर सोशल मीडिया पर देश की नाकामियों के बारे में पढ़े, लेकिन वह ऐसा कह नहीं सके।

इस कहानी का असली पहलू यही है कि जहां कुछ लोग सरकारी नौकरी को सफलता मानते हैं, वहीं कुछ के लिए अपने काम में कमाई, संतुष्टि और आजादी ज्यादा मायने रखती है।

(डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट सोशल मीडिया पर यूज़र द्वारा शेयर किए गए कंटेंट पर आधारित है। मनीकंट्रोल इन दावों की न तो स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है और न ही इनका समर्थन करता है।)

छोटे भाई का अंतिम संस्कार मेरा इंतजार कर रहा है, ट्रेन लेट मत करना… पैसेंजर ने की भावुक अपील तो रेलवे ने दिया ये जवाब

ट्रेन से पटना का सफर होगा आसान, नई रेल लाइन परियोजना से मेन रूट पर घटेगा दबाव

पटना की सबसे व्यस्त रेल लाइनों में से एक पर ट्रेनों का दबाव कम होने जा रहा है। दानापुर मंडल की नेउरा-दनियावां नई रेललाइन परियोजना के तहत करीब 20 किलोमीटर लंबे नेउरा-जट डुमरी रेलखंड के निरीक्षण का काम पूरा हो गया। रेलवे संरक्षा आयुक्त ने यह निरीक्षण किया। जट डुमरी से नेउरा तक विशेष ट्रेन का 120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से ट्रायल किया गया, जो पूरी तरह सफल रहा। इस रेलखंड पर मालगाड़ियों का परिचालन शुरू हो गया है।

पटना-दानापुर-किऊल रेलमार्ग पर दबाव घटेगा

इस नए रेलखंड के चालू होने से पटना-दानापुर-किऊल रेलमार्ग पर ट्रेनों का दबाव कम हो जाएगा। खासकर मालगाड़ियों के लिए यह वैकल्पिक रास्ता उपलब्ध होगा, जिससे मुख्य रेलमार्ग पर यात्री ट्रेनों के संचालन को आसान बनाने में मदद मिलेगी। नेउरा जंक्शन और जट डुमरी जंक्शन के बीच गोनपुरा स्टेशन बनाया गया है। अधपा, चामुचक और बाजिदपुर में हाल्ट बनाया गया है। नेउरा स्टेशन पहले से पटना-आरा रेलखंड पर और जट डुमरी स्टेशन पटना-गया रेलखंड पर मौजूद हैं।

रेल लाइन के निरीक्षण का काम हुआ पूरा

करीब 20 किलोमीटर के इस रेलखंड पर रेल यातायात को सुरक्षित और सुचारू बनाने के लिए 3 बड़े पुल, 16 छोटे पुल, 5 सीमित ऊंचाई वाले पुल, 2 रोड ओवरब्रिज, एक रेल ओवर रेल और 12 रोड अंडरब्रिज बनाए गए हैं। 8 अक्टूबर को रेलवे संरक्षा आयुक्त ने नए रेलखंड का निरीक्षण किया। अधिकारियों के मुताबिक, अब दूसरी ओर से आने वाली मालगाड़ियों को पटना की ओर लाने के बजाय नेउरा से जट डुमरी, दनियावां, बिहारशरीफ और बरबीघा होते हुए शेखपुरा की तरफ भेजा जा सकेगा। वहां से यह मार्ग किऊल-गया रेललाइन से जुड़ जाएगा।

आउटर पर ट्रेनों को नहीं करना पड़ेगा इंतजार

नई व्यवस्था शुरू होने के बाद मुख्य रेललाइन का इस्तेमाल उन्हीं मालगाड़ियों के लिए होगा, जिन्हें दानापुर या फतुहा यार्ड में माल उतारना है। डीडीयू और हावड़ा की ओर जाने वाली लंबी दूरी की मालगाड़ियों को नेउरा-जटडुमरी-दनियावां वैकल्पिक रेलमार्ग से गुजारा जाएगा। इससे पटना के व्यस्त रेलखंड पर मालगाड़ियों का दबाव कम होगा और यात्री ट्रेनों के परिचालन के लिए अधिक जगह उपलब्ध होगी। आउटर पर ट्रेनों के इंतजार और शंटिंग के कारण होने वाली देरी में भी कमी आने की उम्मीद है।

50 लाख से ज्यादा लोगों को होगा फायदा 

इस रेललाइन से पटना, नालंदा और शेखपुरा जिलों के बड़ी आबादी को फायदा मिलेगा। नई रेललाइन से इन इलाकों की सीधी रेल कनेक्टिविटी बेहतर होगी, वहीं व्यापार, कृषि उत्पादों की आवाजाही और स्थानीय रोजगार को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। रेलवे के अनुसार, यह लाइन दानापुर-पटना-किऊल-झाझा की अत्यधिक व्यस्त मुख्य रेललाइन के लिए बाईपास के रूप में भी काम करेगी। इस परियोजना के तहत जट डुमरी से दनियावां तक 22.74 किलोमीटर लंबे रेलखंड पर पहले ही ट्रेनों का परिचालन शुरू हो चुका है। अब नेउरा-जट डुमरी खंड के जुड़ने से इस वैकल्पिक रेलमार्ग की उपयोगिता और बढ़ जाएगी।

(पटना से सच्चिदानंद की रिपोर्ट)

वेंस बोले-वीजा लेकर अमेरिका में काम करने वाले बंधुआ मजदूर:भारत का जवाब- अमेरिकी अर्थव्यवस्था यही संभाल रहे; H-1B वीजा लेने वालों मे 71% भारतीय

अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने H-1B वीजा पर अमेरिका में काम करने वाले विदेशी कर्मचारियों को ‘बंधुआ मजदूर’ बताया है। भारत ने वेंस के बयान पर कड़ी आपत्ति जताई है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में प्रवासियों की अहम भूमिका रही है। भारत ने यह भी कहा कि भारतीय पेशेवर अमेरिका की अर्थव्यवस्था, नई तकनीक, रिसर्च और रोजगार बढ़ाने में अहम योगदान देते हैं। इससे दोनों देशों को फायदा होता है। अमेरिका में H-1B वीजा पाने वालों में 71% भारतीय हैं। वेंस बोले- विदेशी कर्मचारियों की जगह अमेरिकी लोगों को नौकरी दें वेंस ने माइक्रोसॉफ्ट पर वीजा व्यवस्था का गलत इस्तेमाल करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि कंपनियों को विदेशी कर्मचारियों की जगह अमेरिकी लोगों को नौकरी देनी चाहिए। वेंस के मुताबिक, पिछले एक साल में माइक्रोसॉफ्ट ने 6,000 अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी से निकाला, जबकि इसी दौरान कंपनी को 6,300 H-1B वीजा और करीब 3,000 ग्रीन कार्ड का फायदा मिला। उन्होंने इस व्यवस्था को शर्मनाक बताते हुए इसे खत्म करने की बात कही। H-1B वीजा और ग्रीन कार्ड में क्या अंतर है H-1B वीजा के जरिए अमेरिकी कंपनियां दूसरे देशों के कुशल पेशेवरों को नौकरी पर रख सकती हैं। वहीं, ग्रीन कार्ड अमेरिका में स्थायी रूप से रहने और काम करने की अनुमति देता है। ग्रीन कार्ड के लिए PERM प्रक्रिया के तहत कंपनी को यह साबित करना होता है कि संबंधित नौकरी के लिए योग्य अमेरिकी कर्मचारी उपलब्ध नहीं था और विदेशी कर्मचारी को नौकरी देने से अमेरिकी कर्मचारियों की सैलरी या काम करने की स्थिति पर बुरा असर नहीं पड़ेगा। 8 आईटी कंपनियों के ग्रीन कार्ड प्रोग्राम पर रोक अमेरिकी सरकार ने 8 बड़ी आईटी कंपनियों को ग्रीन कार्ड से जुड़ी PERM प्रक्रिया से सस्पेंड कर दिया है। इनमें भारत की इन्फोसिस, टाटा, विप्रो, HCL और कॉग्निजेंट के साथ माइक्रोसॉफ्ट, एडोबी और कैपजेमिनी शामिल हैं। अमेरिकी सरकार का आरोप है कि कंपनियां विदेशी कर्मचारियों को नौकरी देकर अमेरिकी लोगों के रोजगार के अवसर कम कर रही हैं। हालांकि, PERM प्रक्रिया पर रोक लगने से पहले से जारी H-1B वीजा अपने आप रद्द नहीं होते। लेकिन इन कंपनियों के जिन कर्मचारियों की ग्रीन कार्ड प्रक्रिया चल रही है, उन्हें देरी का सामना करना पड़ सकता है। पूरी खबर यहां पढ़ें… ——————- ये खबर भी पढ़ें… अमेरिका में 2 लाख भारतवंशी वोटर्स के नाम कटे:मिडटर्म चुनाव में ट्रम्प को हार का डर; 2024 में 65% ने डेमोक्रेट्स को वोट दिया था अमेरिका की वोटर लिस्ट से 2 लाख भारतीय मूल के वोटर्स का नाम कट गया है। इन लोगों के नाम उन 26 राज्यों में काटे गए हैं, जहां ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी की सरकार है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

Waste to Wealth: कचरे के ढेर से खड़ा किया ₹250 करोड़ का स्टार्टअप! जयपुर के दो दोस्तों की ये अनोखी कहानी हैरान कर देगी

Jaipur Waste Management Startup: देशभर में आज स्वच्छता अभियान को लेकर शहरों में इंदौर से आगे निकलने की होड़ है, जिसके लिए प्रशासन और शहरों की संस्थाएं लगातार लोगों को कचरे और साफ-सफाई के प्रति जागरूक करती हैं। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो इस बीड़े को खुद उठाते हैं। ऐसे ही जयपुर के दो युवा हैं, जिन्होंने कचरे और वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम के स्टार्टअप से ₹250 करोड़ का साम्राज्य खड़ा कर दिया। आज यह सिर्फ एक सफल स्टार्टअप ही नहीं है, बल्कि ‘फोर्ब्स अंडर-30’ की लिस्ट तक इनके स्टार्टअप का डंका बज चुका है।

जयपुर के अभिषेक गुप्ता और अभिनव शेखर वशिष्ठ ने 2018 में ‘वीवॉइस लैब’ (WeVOIS Labs) कंपनी की शुरुआत की और आज उनका यह स्टार्टअप 25 से अधिक शहरों में काम कर रहा है। ‘वीवॉइस लैब’ के इस क्लीन-टेक स्टार्टअप की कहानी जयपुर के इन दोनों युवाओं के 2016 में कॉलेज कैंपस सफाई अभियान और वेस्ट अवेयरनेस कैंपेन से शुरू हुई थी। उस समय कॉलेज के इस सफाई अभियान को उन्होंने सिर्फ एक प्रोजेक्ट के रूप में नहीं देखा, बल्कि कचरे और सफाई के स्थाई समाधान पर विचार शुरू किया और यहीं से ‘वीवॉइस लैब’ स्टार्टअप की नींव पड़ी।

6 लाख टन से ज्यादा वेस्ट कचरा प्रोसेस करती है ‘वीवॉइस लैब’

आंकड़ों के अनुसार देश में हर साल 62 मिलियन टन कचरा निकलता है, जिसे या तो खुले में फेंक दिया जाता है या जला दिया जाता है। लेकिन जयपुर के अभिषेक गुप्ता और अभिनव शेखर की कंपनी ‘वीवॉइस लैब’ वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम के रूप में अपनी खास पहचान रखती है। इस कंपनी का सिस्टम पूरी तरह इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) पर आधारित है। इसमें हर घर, होटल और अस्पताल को ‘रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन’ (RFID) टैग दिया जाता है, जिससे कचरा उठाने से लेकर प्रोसेस होने तक रियल-टाइम मॉनिटरिंग होती है। इसमें कचरा कब उठा, किसने उठाया, कितना उठा, वर्कर की उपस्थिति, परफॉर्मेंस और प्रोसेस पर खास निगरानी रखी जाती है।

जयपुर की इस ‘वीवॉइस लैब’ कंपनी के जरिए हजारों वर्कर्स को रोजगार भी मिल रहा है। फिलहाल वीवॉइस लगभग ₹250 करोड़ का क्लीन-टेक स्टार्टअप बन चुका है, जो 25 शहरों में काम कर रहा है और हर साल 6 से 7 लाख टन से ज्यादा वेस्ट प्रोसेस कर रहा है।

गांवों में भी शुरू किया ‘रूरल स्मार्ट विलेज सेंटर’

कचरे का निपटान और जागरूकता फैलाने का ‘वीवॉइस लैब’ का काम सिर्फ शहरों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह गांवों में भी ‘रूरल स्मार्ट विलेज सेंटर’ के रूप में काम कर रहा है। यहां वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम के साथ-साथ लोगों को रोजगार और स्वच्छता की शिक्षा भी दी जा रही है। हाल ही में ‘वीवॉइस लैब’ ने बिसलेरी के साथ मिलकर जयपुर में हर महीने 30 टन प्लास्टिक वेस्ट उठाना शुरू किया है। साथ ही 300 टन क्षमता वाला टेक्सटाइल वेस्ट रीसाइकलिंग प्लांट भी शुरू किया है। आने वाले समय में 10 और शहरों को इस सिस्टम से जोड़ा जाएगा, ताकि 3 हजार टन प्लास्टिक वेस्ट को लैंडफिल में जाने से रोका जा सके।

लंबे समय से जयपुर के ये दो युवा टेक्सटाइल कचरे के वैज्ञानिक रीसाइक्लिंग से रोजगार और पर्यावरण संरक्षण को एक नई दिशा देने पर काम कर रहे हैं। कुछ ही दिनों में राजधानी जयपुर में ‘वीवॉइस लैब’ द्वारा टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग यूनिट शुरू की गई है, जिसके बाद से कचरे के सस्टेनेबल डेवलपमेंट के लक्ष्यों पर काम किया जा रहा है।

‘वीवॉइस लैब’ के जरिए किस प्रकार होती है टनों कचरे की रीसाइकलिंग

‘वीवॉइस लैब’ खासतौर पर शहरों को स्वच्छ और पर्यावरण-अनुकूल बनाने में मील का पत्थर साबित हो चुकी है, जो अलग-अलग तरीकों से कचरे की रीसाइकलिंग करती है। ‘वीवॉइस लैब’ के वर्कर्स द्वारा एकत्रित कचरे का उपयोग अलग-अलग रूपों में किया जाता है; जैसे गीले कचरे को खाद बनाने के लिए भेजा जाता है, जबकि सूखे कचरे से कागज, प्लास्टिक, धातु, कांच और वस्त्र जैसी सामग्रियां बनाने के लिए उसे अलग-अलग छांटा जाता है।

कंपनी की ‘रीसूत्र’ यूनिट में अत्याधुनिक तकनीक का उपयोग किया जाता है, जो कपड़ा अपशिष्ट को ट्रैक, प्रोसेस और पुनः उपयोग योग्य उत्पादों में परिवर्तित करने में सक्षम है। आमतौर पर एकत्रित कचरे का अधिकांश भाग लैंडफिल स्थलों (कचरे के ढेरों) में डाल दिया जाता है, जिससे हानिकारक गैसों का उत्सर्जन होता है और पर्यावरण प्रदूषित होता है। लेकिन लैंडफिल स्थलों पर कचरे के ढेर को रोकने के लिए, ‘वीवॉइस लैब’ ने नगर निकायों की सहायता से प्रायोगिक परीक्षण भी किया है।

‘वीवॉइस लैब’ जनरेट कर रही है लोगों के लिए रोजगार

जयपुर की ‘वीवॉइस लैब’ एक अपशिष्ट प्रबंधन कंपनी है जो कचरे के संग्रहण, ट्रैकिंग, पृथक्करण और पुनर्चक्रण  में सुधार के लिए तकनीक का उपयोग करती है। इसके साथ ही कंपनी का मुख्य फोकस टेक्सटाइल अपशिष्ट को पुनः उपयोगी संसाधनों में बदलकर सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा देने पर रहता है। इसके अलावा कंपनी अधिक से अधिक लोगों के लिए रोजगार उपलब्ध करा रही है, जो एक स्मार्ट सिस्टम के जरिए काम करता है।

कंपनी में एक खास ‘रूट मैनेजर सॉफ्टवेयर’ डिजाइन किया गया है, जो सहायकों के लिए आपके घर तक पहुंचने और समय पर सेवा प्रदान करने का मार्ग निर्धारित करता है। साथ ही, कंपनी का सुव्यवस्थित अलर्ट प्रबंधन प्रणाली वाला मोबाइल ऐप उपभोक्ताओं को निर्धारित पिकअप से पहले हर बार सूचना प्राप्त करने में सक्षम बनाता है।

रिपोर्ट: अंकित राजपूत

नोएडा की रामलीला बनी रोजगार और कारोबार का बड़ा जरिया, जानिए 10 दिनों में कैसे होता है करोड़ों का कारोबार

नोएडा: नोएडा के मेले को सिर्फ धार्मिक मंच समझने की गलती न करें, इसकी पूरी तस्वीर जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे। नोएडा स्टेडियम में होने वाली ये 10 दिन की रामलीला असल में करोड़ों रुपये की इकोनॉमी है, जो हजारों हाथों को रोजगार देती है। आस्था के साथ-साथ ये नोएडा का सबसे बड़ा लोकल बिजनेस सीजन बन चुका है। आइए समझते हैं 40 लाख के मंच से करोड़ों के बाजार तक का पूरा गणित।

40 लाख का मंच, 1000 लोगों को काम

सनातन धर्म रामलीला समिति के महासचिव संजय बाली के मुताबिक, मुख्य रामलीला मंच के आयोजन पर ही 35 से 40 लाख रुपये खर्च होते हैं। लेकिन ये पैसा सीधे मार्केट में जाता है। मंच बनाने में 20-30 कारीगर, टेंट लगाने में 30-40 मजदूर, इसके अलावा साउंड-लाइट वाले, CCTV ऑपरेटर, सिक्योरिटी गार्ड, चाय-पानी वाले – मिलाकर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 1000 से ज्यादा लोगों को 10 दिन का पक्का रोजगार मिलता है।

कलाकार और राम बारात का बजट

इस बार समिति ने टीवी कलाकारों को बुलाया है, जिन पर ही 5 से 7 लाख रुपये का बजट है। राम बारात भी इकोनॉमी का बड़ा हिस्सा है। एक बारात में 10 से 12 बैंड बुक होते हैं। यानी एक ही रात में बैंड वालों की भी बंपर कमाई।

मेले की रौनक: 20 झूले और 300 दुकानें

रामलीला के साथ लगने वाला मेला इसकी इकोनॉमी को 3 गुना कर देता है। मेले के ठेकेदार शुभम के मुताबिक, मेले को बसाने में ही 35-40 लाख रुपये लगते हैं।

ऐसा बनाया गया बिजनेस मॉडल

1. झूला इकोनॉमी: करीब 20 बड़े-छोटे झूले लगते हैं। इन्हें चलाने के लिए 300 लोगों का स्टाफ लगता है। एक झूले का टिकट 50-100 रुपये है और रोजाना हजारों लोग झूला झूलते हैं।

2. फूड और फुटकर इकोनॉमी: मेले में 250-300 फूड और सामान के स्टॉल लगते हैं। स्टॉल का किराया 200 रुपये से लेकर 20,000 रुपये तक है। 10 दिन में हर स्टॉल वाला लाखों की बिक्री करता है।

3. स्टेडियम के बाहर की इकोनॉमी: स्टेडियम के बाहर सैकड़ों अस्थायी चाट, चाय, गुब्बारे, खिलौने वाले भी अपनी दुकान लगा लेते हैं, जिनका कोई हिसाब ही नहीं।

रोज 7000 दर्शक मतलब लोकल दुकानदारों की चांदी

आयोजकों के मुताबिक रोजाना 5 से 7 हजार लोग रामलीला देखने और 5-7 हजार लोग मेला घूमने आते हैं। यानी रोज 10-14 हजार की भीड़। इस भीड़ से नोएडा स्टेडियम के आसपास के ऑटो वाले, ई-रिक्शा वाले, चाय वाले, रेस्टोरेंट और छोटी दुकानों की बिक्री 3 गुना बढ़ जाती है। अंदाजा लगाया जा रहा है कि 10 दिन के इस आयोजन में मेले, झूले और फूड स्टॉल से ही 2 से 3 करोड़ रुपये का टर्नओवर होता है। 40 लाख लगाकर 3 करोड़ घुमाने वाली इकोनॉमी ही नोएडा की रामलीला की असली ताकत है। नोएडा से सुमित राजपूत की रिपोर्ट।

NEA कर रहा GST में कटौती की मांग! जानिए क्यों संकट में पड़े नोएडा के छोटे-बड़े कारखाने

नोएडा: नोएडा के छोटे और मध्यम उद्योग बढ़ती लागत के दबाव से जूझ रहे हैं। नोएडा एंटरप्रेन्योर्स एसोसिएशन के मुताबिक, पिछले 18 महीनों में भू-राजनीतिक तनाव और युद्ध के बीच पॉलीमर, मेटल, कॉपर, इलेक्ट्रिकल सामान, सोल्डर, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स और ईंधन जैसी जरूरी चीजों की कीमतों में 150 से 200 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है। एसोसिएशन के अध्यक्ष विपिन मल्हन और उपाध्यक्ष सुधीर के मुताबिक, कच्चे माल और ईंधन की लागत बढ़ने से उद्योगों में उत्पादन पर असर पड़ा है। खासकर छोटे उद्योगों के लिए बढ़ते खर्च के बीच बाजार में मुकाबला करना मुश्किल हो रहा है और कई इकाइयां बंद होने की कगार पर पहुंच गई हैं।

बढ़ते खर्च से छोटे उद्योगों का कारोबार मुश्किल में

नोएडा एंटरप्रेन्योर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष विपिन मल्हन और उपाध्यक्ष सुधीर के मुताबिक, कच्चे माल की कीमत बढ़ने से उत्पादन का खर्च बढ़ रहा है, जबकि उद्योगों के लिए उसी हिसाब से अपने उत्पादों की कीमत बढ़ाना आसान नहीं है। इसका असर उद्योगों के पास कारोबार चलाने के लिए उपलब्ध पैसों पर भी पड़ रहा है। छोटे और मध्यम उद्योगों के सामने कर्मचारियों की लागत, बिजली, ईंधन और दूसरे खर्चों के साथ महंगे कच्चे माल का बोझ बढ़ गया है। उद्यमियों का कहना है कि यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो कई छोटी औद्योगिक इकाइयों के पास कारोबार बंद करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा। इससे रोजगार पर भी असर पड़ने की आशंका है।

एक साल के लिए GST घटाकर 5% करने की मांग

नोएडा एंटरप्रेन्योर्स एसोसिएशन ने सरकार से औद्योगिक उत्पादों पर लगने वाली 18 प्रतिशत GST दर को एक साल के लिए घटाकर 5 प्रतिशत करने की मांग की है। एसोसिएशन का कहना है कि इससे मुश्किलों का सामना कर रहे उद्योगों को तुरंत राहत मिल सकती है। उद्यमियों के मुताबिक, GST में कुछ समय के लिए कटौती से कारोबार में पैसों की कमी का दबाव कम होगा और उद्योगों को उत्पादन जारी रखने में मदद मिलेगी। उनका कहना है कि अगर उद्योग चलते रहे तो वे आगे भी GST और दूसरे करों का भुगतान करते रहेंगे, जबकि इकाइयां बंद होने पर सरकार की कमाई पर भी असर पड़ सकता है।

उद्योगों को राहत मिलेगी तो रोजगार भी बचेंगे

एसोसिएशन ने सरकार से कच्चे माल और ईंधन की बढ़ती कीमतों को कम करने के लिए भी ठोस कदम उठाने की मांग की है। उद्यमियों का कहना है कि नोएडा जैसे औद्योगिक शहरों में बड़ी संख्या में छोटे और मध्यम उद्योग लोगों को रोजगार देते हैं और सप्लाई चेन से जुड़े हैं। यदि खर्च का दबाव कम होता है तो ये इकाइयां बाजार में मुकाबला करते हुए उत्पादन जारी रख सकती हैं। एसोसिएशन के मुताबिक, कच्चे माल की कीमतों में 150 से 200 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है और कई उद्योग बंद होने की कगार पर पहुंच गए हैं। नोएडा से सुमित राजपूत की रिपोर्ट।

 

अमेरिका ने माइक्रोसॉफ्ट, TCS, विप्रो, इंफोसिस को ग्रीन कार्ड प्रोग्राम से सस्पेंड किया, H-1B के दुरुपयोग का आरोप

ट्रंप प्रशासन ने माइक्रोसॉफ्ट, TCS और इंफोसिस समेत कई टेक कंपनियों के खिलाफ बड़ा कदम उठाया है। अमेरिका ने इन कंपनियों को एक इमिग्रेशन प्रोग्राम से सस्पेंड कर दिया है। प्रशासन का आरोप है कि इन कंपनियों ने वर्कर वीजा सिस्टम का बड़े पैमाने पर गलत इस्तेमाल किया।

अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने गुरुवार को वॉशिंगटन में इसकी जानकारी दी। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य से अमेरिका में किसी कंपनी ने इस सिस्टम का माइक्रोसॉफ्ट से ज्यादा गलत इस्तेमाल नहीं किया है।

Infosys, Wipro और HCL भी कार्रवाई के दायरे में

अमेरिकी श्रम सचिव Keith Sonderling ने बताया कि Microsoft के अलावा कई दूसरी टेक कंपनियों पर भी कार्रवाई हुई है। इनमें Cognizant Technology Solutions, Infosys, TCS, Wipro, HCL Technologies और Capgemini शामिल हैं।

Sonderling ने कहा कि इस मामले में कई संघीय जांच चल रही हैं। जिस प्रोग्राम पर कार्रवाई हुई है, वह अमेरिकी कंपनियों को विदेशी कर्मचारियों के लिए स्थायी निवास यानी ग्रीन कार्ड स्पॉन्सर करने में मदद करता है।

ट्रंप प्रशासन क्यों सख्त हुआ?

ट्रंप प्रशासन लंबे समय से इमिग्रेशन सिस्टम पर सख्ती की बात करता रहा है। अब कानूनी और गैर-कानूनी दोनों रास्तों से होने वाले प्रवासन पर कार्रवाई बढ़ाई जा रही है।

H-1B वीजा प्रोग्राम भी लंबे समय से ट्रंप के समर्थकों के निशाने पर है। उनका कहना है कि इस प्रोग्राम से अमेरिकी कर्मचारियों के रोजगार के अवसर प्रभावित होते हैं।

ट्रंप समर्थक यह भी आरोप लगाते रहे हैं कि H-1B सिस्टम में बड़े पैमाने पर गलत इस्तेमाल होता है। इसी वजह से यह प्रोग्राम अमेरिकी इमिग्रेशन पॉलिसी की बहस में लगातार बना हुआ है।

कंपनियों के लिए क्या मतलब है?

इस फैसले से सबसे बड़ी चिंता विदेशी कर्मचारियों को अमेरिका में लंबे समय तक रखने की प्रक्रिया को लेकर है। ग्रीन कार्ड स्पॉन्सरिंग पर असर पड़ने से कंपनियों के लिए विदेशी कर्मचारियों की लॉन्ग टर्म प्लानिंग मुश्किल हो सकती है।

इसका असर खासकर उन भारतीय आईटी कंपनियों पर पड़ सकता है, जिनका अमेरिकी कारोबार बड़ा है और जो बड़ी संख्या में भारतीय टेक प्रोफेशनल्स को अमेरिका में भेजती हैं। हालांकि, इस फैसले का वास्तविक वित्तीय असर कितना होगा, यह आगे होने वाली संघीय जांच और सरकार के अगले कदमों पर निर्भर करेगा।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

ओलंपिक मेजबानी पाने के लिए भारत को लड़ना होगा आधा दर्जन देशों से, नवंबर में होगा Presentation

 

भारतीय ओलंपिक संघ (IOA) ने इस सप्ताह की शुरुआत में अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (IOC) की ओर से 2036 ओलंपिक और पैरालंपिक खेलों की मेजबानी की दौड़ में शामिल शहरों और देशों के नामों की घोषणा का स्वागत किया है। हालांकि भारत को अगर मेजबानी पानी है तो जर्मनी, कतर  तुर्किए, हंगरी, दक्षिण कोरिया और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों से अपना प्रेजेंटेशन बेहतर बनाना होगा।

गुजरात के अहमदाबाद को केंद्र में रखते हुए भारत की ओलंपिक और पैरालंपिक खेलों की मेजबानी की योजना पिछले 18 महीनों में आईओसी के साथ हुई सकारात्मक और रचनात्मक बातचीत के माध्यम से तैयार की गई है।

भारत का विजन ‘Rising Together’ इस विचार को उजागर करता है कि 2036 आपसी तरक्की का एक बड़ा मौका हो सकता है। इस दौरान, खेलों के माध्यम से भारत में हो रहा बदलाव और ओलंपिक का भविष्य, खेलों की मेजबानी के जरिए एक साथ आगे बढ़ सकते हैं। भारत के लिए ओलंपिक और पैरालंपिक खेलों की मेजबानी खेलों को देश की रोजमर्रा की जिंदगी का अहम् हिस्सा बनाने का बड़ा मौका होगी। यह प्रोजेक्ट देश में खेलों से जुड़े बड़े बदलाव को आगे बढ़ाने में मदद कर सकता है।

इसका उद्देश्य लाखों युवाओं को सिर्फ खेल देखने के बजाय खुद खेलों में हिस्सा लेने के लिए प्रेरित करना, लोगों को ज्यादा स्वस्थ और एक्टिव जीवन जीने के लिए प्रोत्साहित करना और खेलों को शिक्षा व करियर के अवसरों से जोड़ना है। भारत में खेलों की मेजबानी का उद्देश्य सिर्फ एकवैश्विक प्रतियोगिता आयोजित करना नहीं है। इसके माध्यम से खेलों को लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का और गहरा हिस्सा बनाने के साथ ही भारत की ऊर्जा, युवा शक्ति और समाज को बदलने में खेलों की ताकत पर उसके भरोसे को और मजबूत करने में मदद मिलेगी।

ओलंपिक के लिए वर्ष 2036 में भारत में खेलों की मेजबानी एक नए दौर में जाने का मौका होगी। इससे ओलंपिक और पैरालंपिक अभियान का जुड़ाव दुनिया की सबसे युवा, तेजी से आगे बढ़ रही और डिजिटल रूप से जुड़ी आबादी वाले देशों में से एक से होगा। इससे खेलों से जुड़ी कई नई संभावनाएँ सामने आएँगी। एक अरब से ज्यादा लोगों तक खेलों की पहुँच होगी और ओलंपिक परिवार से नए खिलाड़ी, नए दर्शक और नए पार्टनर जुड़ सकेंगे।

भारत और ओलंपिक अभियान जब एक साथ, एक साझा उद्देश्य के साथ आगे बढ़ेंगे, तो यह उनके इतिहास का एक खास मौका होगा। यह भारत के रंगों, संस्कृति और जीवन का उत्सव होगा और देश की अनोखी सांस्कृतिक विविधता को दुनिया के सामने लाएगा।

भारतीय ओलंपिक संघ की अध्यक्ष पी. टी. उषा ने कहा, “वर्ष 2036 ओलंपिक और पैरालंपिक खेलों को लेकर भारत के विजन और उम्मीदों को आईओसी से मिली पहचान हमारे लिए बहुत सम्मान की बात है। हमें इस बात पर भी गर्व है कि हम भविष्य में होने वाले खेलों के संभावित मेजबानों के एक खास समूह का हिस्सा हैं।

हमारे लिए ‘Rising Together’ सिर्फ एक स्लोगन नहीं है। यह भारत की ऊर्जा, महत्वाकांक्षा और विविधता को एक साझा ओलंपिक सपने से जोड़ने की हमारी प्रतिबद्धता है। वर्ष 2036 के लिए अपना विजन तैयार करते हुए हम ऐसे खेलों की मेजबानी करने के लिए प्रतिबद्ध हैं, जो एक युवा, गतिशील और तेजी से आगे बढ़ रहे भारत की झलक पेश करें। साथ ही, इससे ओलंपिक और पैरालंपिक मूवमेंट को दुनिया भर में नई पीढ़ियों, नए समुदायों और नई जगहों तक पहुँचने में भी मदद मिले।”

उन्होंने कहा, “यदि हम अपने खिलाड़ियों, लोगों, शहरों और ओलंपिक व पैरालंपिक मूवमेंट के साथ मिलकर आगे बढ़ें, तो संभावनाएं बहुत बड़ी हैं। और जब भारत आगे बढ़े, तो हम चाहते हैं कि दुनिया भी हमारे साथ आगे बढ़े। हम IOC के साथ अपनी बातचीत जारी रखने और नवंबर के अंत में पहली बार फ्यूचर होस्ट कमीशन के सामने अपनी योजना रखने को लेकर उत्साहित हैं।”

भारत सरकार में केंद्रीय श्रम एवं रोजगार और युवा मामले एवं खेल मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया ने कहा, “वर्ष 2036 के लिए भारत की सोच एक सरल विचार पर आधारित है कि खेल हमारे देश के भविष्य को बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं। ओलंपिक और पैरालंपिक खेलों की मेजबानी लाखों युवा भारतीयों को खेलों में हिस्सा लेने के लिए प्रेरित करेगी। इससे स्वस्थ और ज्यादा सक्रीय समुदाय बनाने में मदद मिलेगी और युवाओं के लिए शिक्षा, रोजगार और सामाजिक विकास के नए अवसर भी बढ़ेंगे। भारत में खेलों की मेजबानी से देश के हर हिस्से में खेलों को लेकर बदलाव को और गति दी जा सकती है। इसके साथ ही, दुनिया के सबसे तेजी से आगे बढ़ रहे देशों में से एक में ओलंपिक मूवमेंट के लिए एक नया अध्याय शुरू कर सकते हैं।”

US Student Visa Shock: अमेरिका में पढ़ाई के बाद नौकरी के लिए अब देने होंगे 70,000 डॉलर, Trump सरकार का नया प्रस्ताव, भारतीय छात्रों पर सबसे बड़ी मार

वॉशिंगटन: अमेरिका में पढ़ रहे भारतीय छात्रों को बड़ा झटका लग सकता है। ट्रंप प्रशासन ने विदेशी छात्रों के लिए काम से जुड़े नियमों में बड़ा बदलाव प्रस्तावित किया है। अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (DHS) ने वैकल्पिक व्यावहारिक प्रशिक्षण (OPT) के तहत काम करने वाले अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए 70,000 डॉलर की फीस प्रस्तावित की है। हालांकि, यह शुल्क सीधे छात्रों से नहीं, बल्कि उन संस्थानों से लिया जाना प्रस्तावित है जो छात्रों के OPT की सिफारिश करते हैं।

पहली बार OPT के लिए 70,000 डॉलर, नवीनीकरण पर 30,000 डॉलर

प्रस्ताव के तहत किसी एफ-1 वीजा वाले छात्र के लिए पहली बार OPT की सिफारिश करने पर संबंधित संस्थान को 70,000 डॉलर का शुल्क देना होगा। इसके बाद OPT के प्रत्येक नवीनीकरण या अगली सिफारिश पर 30,000 डॉलर का शुल्क प्रस्तावित है। फिलहाल OPT आवेदन की फीस इससे काफी कम है।

क्या है OPT?

OPT एक ऐसा कार्यक्रम है जिसके तहत एफ-1 वीजा पर अमेरिका में पढ़ने वाले अंतरराष्ट्रीय छात्रों को अपनी पढ़ाई से जुड़े क्षेत्र में काम करने का मौका मिलता है। सामान्य तौर पर छात्र स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद एक साल तक काम कर सकते हैं, जबकि पात्र विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (STEM) की डिग्री वाले छात्रों को अतिरिक्त दो साल का OPT मिल सकता है।

DHS ने क्यों लिया यह फैसला?

DHS का कहना है कि प्रस्तावित शुल्क का उद्देश्य वीजा कार्यक्रम में धोखाधड़ी और दुरुपयोग को रोकना, आव्रजन व्यवस्था की निगरानी मजबूत करना और अमेरिकी कर्मचारियों की सुरक्षा करना है। विभाग ने OPT को कम लागत वाली विदेशी श्रम व्यवस्था के रूप में इस्तेमाल किए जाने की चिंताओं का भी उल्लेख किया है।

भारतीय छात्रों पर भी पड़ सकता है असर

अमेरिका में बड़ी संख्या में भारतीय छात्र विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित जैसे क्षेत्रों में पढ़ाई करते हैं। ऐसे में अगर यह प्रस्ताव लागू होता है, तो विश्वविद्यालयों और अंतरराष्ट्रीय छात्रों से जुड़े रोजगार पर इसका असर पड़ सकता है। उच्च शिक्षा से जुड़े संगठनों ने भी आशंका जताई है कि इतनी बड़ी फीस से अमेरिका में पढ़ाई और पढ़ाई के बाद नौकरी करने के लिए आने वाले विदेशी छात्रों की संख्या प्रभावित हो सकती है।

अभी लागू नहीं हुआ है प्रस्ताव

यह शुल्क अभी लागू नहीं हुआ है। प्रस्ताव पर जनता से टिप्पणियां मांगी जाएंगी और इसके बाद DHS अंतिम फैसला लेगा। प्रस्ताव को कानूनी चुनौती मिलने की संभावना भी जताई गई है।

अगर यह प्रस्ताव अंतिम रूप से लागू होता है, तो अमेरिका में पढ़ाई के बाद नौकरी करने की योजना बना रहे भारतीय समेत विदेशी छात्रों और उन्हें OPT के जरिए काम पर रखने वाले संस्थानों के लिए यह बड़ा बदलाव होगा। इससे छात्रों की पढ़ाई के बाद अमेरिका में नौकरी पाने की प्रक्रिया और उससे जुड़ी लागत पर असर पड़ सकता है।