हर महीने मिलेगी ₹3,000 की गारंटीड पेंशन, दुकानदारों और व्यापारियों के लिए है ये खास स्कीम, ऐसे करें अप्लाई

NPS for Traders Scheme Update: अगर आप एक छोटे व्यापारी, दुकानदार या सेल्फ-एंप्लॉयड हैं और बुढ़ापे की आर्थिक सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं, तो आपके लिए बड़ी खबर है। केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने व्यापारियों और दुकानदारों से ‘व्यापारियों के लिए राष्ट्रीय पेंशन योजना’ में तुरंत रजिस्ट्रेशन कराने की अपील की है।

इस सरकारी पेंशन योजना का सबसे बड़ा फायदा यह है कि 60 वर्ष की उम्र पूरी होने के बाद लाभार्थी को हर महीने ₹3,000 यानी सालाना ₹36,000 की न्यूनतम पक्की पेंशन दी जाती है। आइए जानते हैं कि इस योजना का लाभ कौन-कौन उठा सकता है और इसके लिए आवेदन की क्या प्रक्रिया है।

NPS Traders Scheme: क्या है योजना की सबसे बड़ी खासियत?

व्यापारियों और दुकानदारों के लिए शुरू की गई इस पेंशन योजना का उद्देश्य उन लोगों को बुढ़ापे में वित्तीय सुरक्षा प्रदान करना है, जो ईपीएफओ जैसी किसी औपचारिक रिटायर्ड पेंशन व्यवस्था के दायरे में नहीं आते हैं।

50% योगदान सरकार का: यह एक स्वैच्छिक और सह-अंशदायी योजना है। इसमें जितना योगदान व्यापारी जमा करेगा, ठीक उतनी ही 50% राशि केंद्र सरकार अपनी जेब से जमा करेगी।

मामूली मासिक निवेश: आपकी उम्र के हिसाब से आपको हर महीने महज ₹55 से ₹200 तक का योगदान देना होता है।

गारंटीड रिटर्न: 60 साल की उम्र पूरी होते ही आपको आजीवन ₹3,000 प्रति माह की एश्योर्ड पेंशन मिलना शुरू हो जाएगी।

NPS-Traders: मुख्य पात्रता और विशेषताएं

NPS-Traders: मुख्य पात्रता और विशेषताएं

कैसे करें आवेदन और कहां कराएं रजिस्ट्रेशन?

इस योजना में खुद को रजिस्टर कराना बेहद आसान है:

जन सेवा केंद्र (CSC): आप अपने नजदीकी कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) पर जाकर आधार कार्ड और बचत बैंक खाते के विवरण के साथ आवेदन कर सकते हैं।

ऑनलाइन पोर्टल: योजना के आधिकारिक ऑनलाइन पोर्टल पर जाकर भी खुद से सेल्फ-एनरोलमेंट किया जा सकता है।

आधिकारिक आंकड़े: सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 26 नवंबर 2025 तक व्यापारियों और स्व-रोजगार व्यक्तियों के लिए राष्ट्रीय पेंशन योजना के तहत 60,538 लोग पंजीकृत हो चुके हैं।

किन बातों का ध्यान रखना है जरूरी?

वित्तीय विशेषज्ञों के अनुसार, असंगठित क्षेत्र और छोटे दुकानदारों को पेंशन सुरक्षा के दायरे में लाने के लिए यह एक बेहद प्रभावी कदम है। फाइनेंशियल फर्म Floatr के सह-संस्थापक अमित एचएल का कहना है, ‘आज के समय में ₹3,000 की मासिक पेंशन का कुछ मूल्य हो सकता है, लेकिन आज से दो-तीन दशक बाद महंगाई के कारण इसकी क्रय शक्ति कम हो जाएगी। इसलिए, जैसे-जैसे योजना आगे बढ़े, सरकार को समय-समय पर इस पेंशन राशि की समीक्षा करके इसे बढ़ाने पर भी विचार करना चाहिए ताकि यह लंबी अवधि में भी सार्थक बनी रहे।’

कानपुर में 96 करोड़ की लागत से तैयार हुआ पहला कन्वेंशन सेंटर, लेदर और टेक्सटाइल हब को मिला नया मंच, जानिए खासियतें

उत्तर प्रदेश की औद्योगिक राजधानी कानपुर के उद्यमियों के लिए एक बड़ी और ऐतिहासिक खुशखबरी सामने आई है। शहर में पहला भव्य कन्वेंशन सेंटर बनकर पूरी तरह तैयार हो चुका है, जो यहां के औद्योगिक कारोबार को एक नई वैश्विक पहचान देने जा रहा है। 96.10 करोड़ रुपये की लागत से तैयार यह कन्वेंशन सेंटर महज एक भव्य इमारत नहीं है, बल्कि कानपुर के लेदर, टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग और प्लास्टिक जैसे तमाम बड़े उद्योगों के लिए व्यापार विस्तार का एक नया और विशाल प्लेटफॉर्म साबित होगा।

अब तक कानपुर में ऐसी किसी आधुनिक संरचना का अभाव था, जहां बड़े स्तर के ट्रेड फेयर, एक्सपो, प्रोडक्ट लॉन्च, बिजनेस कॉन्फ्रेंस और B2B (बिजनेस-टू-बिजनेस) मीटिंग्स का आयोजन एक साथ किया जा सके। इसके चलते स्थानीय उद्यमियों को अपने उत्पादों की नुमाइिश लगाने या विदेशी खरीदारों से बैठक करने के लिए दिल्ली, मुंबई, लखनऊ और ग्रेटर नोएडा जैसे शहरों का रुख करना पड़ता था। अब इस कन्वेंशन सेंटर के शुरू होने से कानपुर के व्यापारियों को देश-विदेश के सप्लायरों, डीलरों, निवेशकों और खरीदारों को सीधे अपने ही शहर में आमंत्रित करने का शानदार मौका मिलेगा।

एक्सपो से लेकर B2B मीटिंग तक, कानपुर बनेगा नया बिजनेस डेस्टिनेशन

कानपुर की पहचान लंबे समय से मैन्युफैक्चरिंग और प्रोडक्शन के एक मजबूत केंद्र के रूप में रही है, लेकिन बड़े व्यावसायिक आयोजनों के हिसाब से इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी हमेशा खटकती थी। यह नया कन्वेंशन सेंटर इसी कमी को हमेशा के लिए दूर करने का काम करेगा।

इस सेंटर में अब लेदर फेयर, फुटवियर एक्सपो, टेक्सटाइल शो, इंजीनियरिंग व मशीनरी प्रदर्शनी, स्टार्टअप इवेंट्स, निवेशक सम्मेलन और कॉर्पोरेट B2B मीटिंग्स का आसानी से संचालन किया जा सकेगा। इससे एक ही छत के नीचे उत्पादों के प्रदर्शन, खरीदारों से संवाद और मौके पर ही कारोबारी सौदे फाइनल करने का पूरा सिस्टम काम करेगा। विशेष रूप से निर्यात आधारित (एक्सपोर्ट ओरिएंटेड) उद्योगों के लिए यह व्यवस्था कारगर साबित होगी, क्योंकि विदेशी बायर्स अब सीधे कानपुर आकर उत्पादों की गुणवत्ता देख सकेंगे और नए ऑर्डर दे सकेंगे।

होटल से लेकर ट्रांसपोर्ट तक, पूरे सर्विस सेक्टर को मिलेगा बड़ा आर्थिक लाभ

कन्वेंशन सेंटर का सकारात्मक प्रभाव केवल एक्सपो लगाने वाले उद्योगपतियों तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका बड़ा आर्थिक लाभ शहर के पूरे सर्विस सेक्टर को मिलेगा। जब देश और दुनिया भर से खरीदार, उद्यमी और व्यापारी आयोजनों में शामिल होने कानपुर आएंगे, तो शहर के होटल, रेस्टोरेंट, टैक्सी और ट्रांसपोर्ट सेवाओं की मांग में भारी उछाल आएगा।

इसके साथ ही इवेंट मैनेजमेंट, प्रिंटिंग, विज्ञापन और स्थानीय खान-पान से जुड़ी गतिविधियों को भी अतिरिक्त काम मिलेगा। यह कन्वेंशन सेंटर एक तरफ जहां स्थानीय उद्योगों को सीधा बाजार उपलब्ध कराएगा, वहीं दूसरी तरफ अप्रत्यक्ष रूप से कानपुर की पूरी अर्थव्यवस्था और रोजगार के अवसरों को मजबूत गति प्रदान करेगा।

औद्योगिक विकास का मील का पत्थर: जानिए अधिकारियों और विशेषज्ञों की राय

काउंसिल फॉर लेदर एक्सपोर्ट के वाइस चेयरमैन मुख्तारुल अमीन ने इस उपलब्धि पर खुशी जताते हुए कहा कि यह कन्वेंशन सेंटर कानपुर की औद्योगिक ग्रोथ के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि कानपुर में विभिन्न क्षेत्रों के उद्योग बड़े पैमाने पर काम कर रहे हैं, लेकिन अपने उत्पादों के प्रदर्शन और विदेशी खरीदारों से सीधे संवाद के लिए शहर में ऐसी आधुनिक सुविधा नहीं थी। अब कन्वेंशन सेंटर शुरू होने से उद्योगों को अपने ही घर में एक बड़ा अंतर्राष्ट्रीय मंच मिल गया है।

कानपुर मंडल के मंडलायुक्त एवं डायरेक्टर ऑफ इंडस्ट्रीज विजयंत पांडियन ने बताया कि कन्वेंशन सेंटर के बन जाने से शहर में बड़े एक्सपो और बिजनेस मीट आयोजित करने का रास्ता साफ हो गया है। उन्होंने कहा कि शहर को लंबे समय से इस तरह के इंफ्रास्ट्रक्चर की दरकार थी। हालांकि सेंटर के निर्माण के बाद इसके संचालन की प्रक्रियाओं में थोड़ा समय लगा, लेकिन अब इसके शुरू होने से उद्यमियों के साथ-साथ आम नागरिकों को भी बड़ा फायदा मिलेगा और दूसरे बड़े शहरों पर निर्भरता पूरी तरह खत्म हो जाएगी।

अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस है कानपुर का कन्वेंशन सेंटर

96.10 करोड़ रुपये की परियोजना लागत से तैयार यह कन्वेंशन सेंटर विश्वस्तरीय सुविधाओं से लैस है। इसमें प्रदर्शनियों के लिए 16000 वर्गफुट और 12000 वर्गफुट के दो विशाल प्रदर्शनी हॉल बनाए गए हैं। इसके अलावा 300 लोगों की क्षमता वाला एक कॉन्फ्रेंस हॉल और 100-100 लोगों की क्षमता वाले 3 अलग-अलग मीटिंग रूम तैयार किए गए हैं।

बाहर से आने वाले विशेष मेहमानों और कारोबारियों के ठहरने के लिए परिसर में ही 6 अतिथि कमरे और 2 लग्जरी सुइट डेवलप किए गए हैं। खान-पान की बेहतरीन व्यवस्था के लिए 8,000 वर्गफुट में फैला एक बड़ा फूड कोर्ट बनाया गया है, जबकि वाहनों की सुविधा के लिए 68 गाड़ियों की क्षमता वाली कवर्ड पार्किंग की व्यवस्था भी की गई है। एक्सपो, ट्रेड फेयर, बिजनेस मीटिंग, कॉन्फ्रेंस और प्रोडक्ट लॉन्च जैसे बड़े आयोजनों के लिए अब यह केंद्र कानपुर की नई पहचान बनने जा रहा है।

(कानपुर से अखंड प्रताप सिंह की रिपोर्ट)

मध्य प्रदेश के युवाओं के लिए खुशखबरी! इस साल 1 लाख पदों पर होंगी सरकारी भर्तियां, जानिए सरकार का पूरा प्लान

अगर आप सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे हैं तो आपके लिए अच्छी खबर है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने शनिवार को कहा कि राज्य सरकार इस साल बड़ी संख्या में सरकारी भर्तियां करने की तैयारी में है। सरकार की योजना करीब एक लाख युवाओं को सरकारी नौकरी देने की है। मुख्यमंत्री ने कहा कि ये कदम राज्य के युवाओं को रोजगार के बेहतर अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में उठाया जा रहा है।

85 हजार से ज्यादा सरकारी पदों पर होगी भर्ती

इंदौर में हिंदू इकोनॉमिक फोरम के एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री मोहन यादव ने बताया कि पिछले ढाई साल में राज्य के अलग-अलग विभागों में 85 हजार से ज्यादा सरकारी पदों पर भर्ती की गई है। उन्होंने कहा कि सरकार रोजगार के अवसर बढ़ाने पर लगातार काम कर रही है और इसी क्रम में इस साल करीब एक लाख और सरकारी पदों पर युवाओं की भर्ती की जाएगी।

मुख्यमंत्री ने निवेशकों से की अपील

मुख्यमंत्री मोहन यादव ने निवेशकों से मध्य प्रदेश में उद्योग लगाने की अपील की। उन्होंने कहा कि राज्य में कारोबार के लिए अनुकूल माहौल है और बिजली की लागत भी कम है। सरकार के पास करीब एक लाख एकड़ का लैंड बैंक है। उन्होंने बताया कि ऊर्जा, खनन और फूड प्रोसेसिंग जैसे क्षेत्रों में निवेश की अच्छी संभावनाएं हैं। मुख्यमंत्री ने बताया कि पिछले ढाई साल में मध्य प्रदेश सरकार ने निवेशकों के साथ करीब 35 लाख करोड़ रुपये के समझौते किए हैं। ये समझौते ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट और अन्य कार्यक्रमों के दौरान हुए। उन्होंने कहा कि इनमें से करीब 33 प्रतिशत निवेश प्रस्तावों को जमीन पर उतारने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।

सीएम ने क्या कहा

मुख्यमंत्री मोहन यादव ने बताया कि मध्य प्रदेश सरकार राज्य से अंतरराष्ट्रीय हवाई सेवाएं बढ़ाने के लिए एयरलाइंस को आर्थिक सहायता दे रही है। इसी नीति के तहत जुलाई में इंदौर से अबू धाबी के लिए सीधी उड़ान शुरू की गई। वहीं, अगले महीने भोपाल से शारजाह के लिए भी फ्लाइट शुरू करने की तैयारी है। कार्यक्रम के दौरान मोहन यादव ने ‘हिंदुत्व’ को देश की संस्कृति, जीवनशैली और मूल्यों से जुड़ी अवधारणा बताया। उन्होंने कहा कि यह लोगों को एक-दूसरे से जोड़ने की भावना को दर्शाता है। अपने विरोधियों पर टिप्पणी करते हुए यादव ने कहा कि ‘हिंदुत्व’ शब्द से कुछ लोगों को परेशानी होती है।

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विलोप के करीब पहुंची मध्यमार्गी राजनीति

समाजवाद को सकारात्मक नजरिए देखने वाले नौजवान अमेरिकियों की संख्या बढ़ती जा रही है। सोशल मीडिया पर पूंजीवाद बनाम समाजवाद की बहस व्यापक चर्चा का विषय बनी हुई है। यह संकेत है कि कम्युनिस्ट और समाजवादी विचारधाराएं, जिन्हें कभी अमेरिका में कलंकित और वर्जित माना जाता था, अब हाशिये से निकलकर मुख्यधारा की चेतना में प्रवेश करती दिख रही हैं- विशेषकर युवा पीढ़ी के बीच।

यूरोपीय राजनीति की खिसक रही भू-गर्भीय परतों (Tectonic Plates) से उठते भूकंपीय झटकों का सितंबर में जर्मनी शिकार बना। पहले हफ्ते में सैक्सनी-अनहाल्ट पहला जर्मन प्रांत बना, जहां नव-नाजीवादी ऑल्टरनेटिव्स फॉर ड्यूशलैंड (एएफडी) पार्टी प्रादेशिक चुनाव जीतने में कामयाब रही (वहां वह लगभग 44 फीसदी वोट पाकर सबसे बड़ी पार्टी बनी)। यह किसी आम स्थिति में अचानक पैदा हुई विसंगति नहीं थी। बल्कि यह एक दशक से अधिक समय से उभरते रूझान का ठोस रूप ग्रहण कर लेना भर था। इस बात की पुष्टि 20 सितंबर को जर्मनी के मेक्लेनबर्ग– वेस्टर्न पोमेरेनिया प्रांत में एएफडी की जीत से हुई। वहां वह 38 प्रतिशत से अधिक वोटों के साथ पहले स्थान पर रही।

उसी रोज जर्मनी की राजधानी बर्लिन में एक दूसरे किस्म का सियासी भूकंप आया। वहां डाई लिंके (द लेफ्ट) पार्टी सबसे आगे रही, जिसे पश्चिमी मीडिया धुर-वामपंथी बताता है। इन तीन नतीजों ने यह साफ कर दिया है कि जर्मनी की राजनीति तेजी से दक्षिण एवं वाम की ‘चरम’ (extreme) धुरियों के बीच बंटती जा रही है। इस तरह सेंटर राइट- क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक पार्टी (सीडीयू) और सेंटर लेफ्ट- सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (एसपीडी) के बीच सत्ता की अदला-बदली का जारी लगभग आठ दशक से जारी खेल अब खत्म हो रहा है। उचित ही इसे जर्मन राजनीति में मध्य मार्ग के विलोप के रूप में देखा गया है।

और यह सिर्फ जर्मनी का रुझान नहीं है। वैसे तो यह ट्रेंड चुनावी लोकतंत्र वाले तमाम देशों में उभरा है, लेकिन पश्चिमी देशों में इस नई राजनीतिक परिघटना की खास झलक देखी जा सकती है। कुछ महीनों के बाद इस रुझान की पुष्टि संभवतः फ्रांस में भी होगी, जहां अगले साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में मुख्य गोलबंदी “धुर वामपंथी” नेता ज्यां ल्यूक मेलेन्शॉ और धुर दक्षिणपंथी नेता मेरी ली पेन के बीच हो रही है।

यह घटनाक्रम आने वाले वक्त में संभावित राजनीतिक टकराव का संकेत है। डाई लिंके की जीत और मेलेन्शॉ को मिल रही लोकप्रियता दुनिया में नए तेवर वाले वामपंथ के उदय की मिसाल हैं। और ऐसे संकेत सिर्फ यूरोप तक सीमित नहीं हैं। डाई लिंके की जीत के सिलसिले में यह बात सामने आई कि इस पार्टी ने बर्लिन में अपने चुनावी अभियान को न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी से सीख लेते हुए डिजाइन किया। बर्लिन में डाई लिंके का चेहरा तुर्किश मूल की सोशलिस्ट एलीफ एराल्प हैं। उनकी टीम ममदानी के प्रचार अभियान का अध्ययन करने न्यूयॉर्क गई। वहां से वह ये सबक लेकर लौटी कि बिखरे हुए अनगिनत मुद्दों को उठाने के बजाय दो या तीन ऐसे मुद्दे लिए जाएं, जिनकी वजह ‘लोगों की रात की नींद उड़ी रहती है’।

न्यूयॉर्क की तरह ही बर्लिन में भी नवोदित लेफ्ट ने मकान किराये को अपना केंद्रीय मुद्दा बनाया। साथ में रोजमर्रा की चीजों की महंगाई और परिवहन पर ध्यान केंद्रित किया गया। उसके साथ हज़ारों स्वयंसेवकों को संगठित किया गया, ताकि वे घर घर जाकर चर्चा कर सकें। और उसका असर हुआ- ठीक न्यूयॉर्क की तरह। अब एराल्प बर्लिन की मेयर कार्यालय के दरवाजे तक पहुंच चुकी हैं।

एक जर्मन विश्लेषक ने लिखा है- यह तथ्य कि पूंजीवादी विरोधी वामपंथ ने बर्लिन में जीत हासिल की है, पुष्टि करता है कि उदारवादी (लिबरल) और मध्यमार्गी (सेंटरिस्ट) विकल्पों का पतन और “बाज़ार लोकतंत्र” का ढहना जारी है। वह पार्टी सिस्टम ढह रहा है, जो नव-उदारवाद के दौरान एक ही केंद्र- पूंजी से नियंत्रित रहा, भले दिखावटी तौर पर कई पार्टियों के रूप में उसके अनेक चेहरे सामने रहे हों।

गुजरे डेढ़ दशक में दुनिया के बहुत बड़े हिस्से में धुर-दक्षिणपंथ का बढ़ना सबसे मजबूत राजनीतिक परिघटना रही है। ऐसा उन विशाल निराश समूहों की प्रतिक्रिया से संभव हुआ, जिन्होंने नव-उदारवादी भूमंडलीकरण के विनाशकारी परिणामों को झेला और एक मुकाम आकर उसे ठुकराना शुरू किया। अर्थव्यवस्था का उत्तरोत्तर वित्तीयकरण, वेतन की अस्थिरता, बेरोजगारी, आवास का दुर्लभ होना, स्वास्थ्य सेवाओं की महंगाई, शिक्षा का व्यापारीकरण, आम इन्फ्रास्ट्रक्चर का क्षय- आदि के कारणों से उपजे जन असंतोष का लाभ धुर दक्षिणपंथी दलों ने उठाया। किसी ‘आंतरिक शत्रु’ के खिलाफ नफरत भरे अभियान चलाना, काल्पनिक प्रभु वर्ग (मोटे तौर पर पहले सत्ता से लाभान्वित रहे समूहों) को तमाम समस्याओं के लिए जिम्मेदार ठहराना, अयथार्थ समाधान पेश करना- आदि ऐसा तरीका रहा है, जिसे लगभग हर देश में उन दलों ने अपनाया है। इनकी बदौलत धुर-दक्षिणपंथियों को कामयाबी मिली है।

उन्हें यह सफलता इसलिए भी मिली, क्योंकि पारंपरिक वामपंथ ने नव-उदारवाद के हाथों अपनी हार को स्वीकार कर लिया। वे दल बाजार, बड़ी कंपनियों, और अंतरराष्ट्रीय पूंजी के समन्वित हमलों के आगे झुक गए। उन्होंने बिना आलोचनात्मक रुख अपनाए उस एजेंडे को स्वीकार कर लिया, जो शासक वर्ग उनके लिए तैयार किया था। मसलन, पहचान आधारित मुद्दों और woke culture के समर्थन में उन्होंने अपना सारा जोर लगाया, जबकि आम जन के रोजमर्रा के सवालों से उन्होंने नेता तोड़ लिया।

ट्रेड यूनियनों का बदलाव के बड़े सपनों को छोड़ देना, वर्ग-आधारित पार्टियों का विघटन और वर्ग चेतना को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी से उनका मुंह मोड़ लेना- ये सब इसी दौर की कहानियां हैं। इस दौर में पूंजी बनाम श्रम की बहस को हाशिये में चले जाने दिया गया और यह शिक्षा नजरअंदाज दी गई कि पूंजी का बेलगाम संकेंद्रण धन उत्पन्न करने के अन्य दो स्रोतों- प्रकृति और श्रम- को नष्ट कर देता है।

इसी दौर में धुर-दक्षिणपंथ “समाधान” बनकर उभरा। उसने मुसीबत के असली स्रोतों से ध्यान हटा कर अल्पसंख्यकों, प्रवासियों, या कम्युनिस्ट प्रतीकों को निशाने पर लिया। पश्चिमी देशों में पारंपरिक वामपंथ और मध्यमार्गी दलों ने इनमें से कुछ सवालों पर धुर-दक्षिणपंथ को अपनी मौन सहमति दी, जबकि कुछ मुद्दों पर उसे सीधे चुनौती देने से वे बचते रहे। उसी का नतीजा अब उनका खुद हाशिये पर चले जाना और उससे पैदा हुए खालीपन को भरने के लिए नए तेवर वाले वामपंथ का उभरना है।

इस प्रक्रिया को फिलहाल अमेरिका भी साफ देखा जा सकता है। वहां नए वामपंथी तेवर की नुमाइंदगी Democratic Socialists of America (डीएसए) कर रहा है। हालांकि यह स्वायत्त राजनीतिक समूह है, लेकिन चुनावी सिस्टम की मजबूरियों के कारण वह डेमोक्रेटिक पार्टी के अंदर अपने को संगठित किए हुए है। इस समय जोहरान ममदानी डीएसए का सबसे प्रखर चेहरा हैं। लेकिन उसके अनेक चेहरे इस वर्ष डेमोक्रेटिक प्राइमरी (उम्मीदवार चुनने की प्रक्रिया) में कामयाब रहे, और तीन नवंबर को होने वाले मध्य-अवधि चुनावों में डेमोक्रेटिक उम्मीदवार के तौर पर मैदान में हैं। उनके नतीजों पर सबका ध्यान टिका हुआ है।

यह घटनाक्रम अमेरिका में आए एक बड़े बदलाव को जाहिर करता है। इस सिलसिले में ब्रिटिश अर्थशास्त्री जॉन रॉस की यह टिप्पणी काबिल-ए-गौर हैः

“पिछली बार जब किसी सोशलिस्ट उम्मीदवार को अमेरिकी चुनाव में गंभीरता से लिया गया, तो वह 1912 में था, जब यूजीन डेब्स को राष्ट्रपति पद के लिए 6 फीसदी वोट मिले। यह बहुत कम था, लेकिन नगण्य नहीं था। उसके बाद पहली बार हो रहा है, जब डीएसए चुनाव जीत रहा है। उनके सदस्य कांग्रेस में हैं। उन्होंने दो सीटें जीतीं। उन्होंने सीनेट के लिए डेमोक्रेटिक उम्मीदवारी हासिल की है। न्यूयॉर्क के मेयर ममदानी डीएसए के सदस्य हैं। यह पहली बार है कि जब उम्मीदवार खुले तौर पर समाजवादी के रूप में खड़े हो रहे हैं। इसका अपवाद सिर्फ बर्नी सैंडर्स हैं, जो डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट हैं, लेकिन वे निर्दलीय के रूप में ही चुनाव लड़ते रहे।।।।।

अमेरिकी अखबार पढ़ें, तो मुझे लगता है वॉल स्ट्रीट जर्नल लगभग हर दिन डीएसए की निंदा करने वाला लेख छापता है, और न्यूयॉर्क टाइम्स आदि भी। और यह चौंकाने वाला है। यह तो शायद संवैधानिक भी न हो कि अमेरिकी कांग्रेस किसी विशिष्ट संगठन की निंदा करने के लिए मतदान करे, क्योंकि यह कहा जा सकता है कि यह अमेरिकी संविधान के प्रथम संशोधन के खिलाफ है, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार सुनिश्चित करता है। लेकिन ऐसा इसीलिए हुआ, क्योंकि अब मामला गंभीर है।।।।

इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिका समाजवादी बनने जा रहा है। दुर्भाग्य से मेरे जीवन काल में ऐसा नहीं होगा। यहां मेरा मतलब वास्तविक समाजवाद से है- यानी उस अर्थ में, जिसमें अर्थव्यवस्था का अधिकांश हिस्सा राजकीय स्वामित्व में आ जाता है, आपके सामने औपचारिक समाजवादी समाज होता है, और श्रमिक वर्ग समाज में अग्रणी शक्ति होता है।”

यहां जॉन रॉस ने कांग्रेस (अमेरिकी संसद) के जिस प्रस्ताव का जिक्र किया, वह निचले सदन हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव ने पिछले एक सितंबर को पारित किया। 192 के मुकाबले 220 मतों के बहुत से पारित इस प्रस्ताव में “समाजवाद” की निंदा की गई। डीएसए का इसमें नाम लेकर जिक्र किया गया। इसके अलावा हाल में अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी के नेता बार बार कम्युनिस्ट खतरे का जिक्र करते रहे हैं। उन्होंने डीएसए उम्मीदवारों का उल्लेख कर कहा है कि “कम्युनिज़्म हमारा दुश्मन है”। बीते चार जुलाई को अमेरिकी स्वतंत्रता की 250वीं सालगिरह के मौके पर राष्ट्र के नाम संबोधन में ट्रंप ने एक चौथाई से ज्यादा समय कम्युनिस्ट खतरे के उल्लेख और कम्युनिज्म के कथित अत्याचारों की चर्चा में लगाया।

इसके बावजूद हकीकत यह है कि समाजवाद को सकारात्मक नजरिए देखने वाले नौजवान अमेरिकियों की संख्या बढ़ती जा रही है। सोशल मीडिया पर पूंजीवाद बनाम समाजवाद की बहस व्यापक चर्चा का विषय बनी हुई है। यह संकेत है कि कम्युनिस्ट और समाजवादी विचारधाराएं, जिन्हें कभी अमेरिका में कलंकित और वर्जित माना जाता था, अब हाशिये से निकलकर मुख्यधारा की चेतना में प्रवेश करती दिख रही हैं- विशेषकर युवा पीढ़ी के बीच। और अब बात चर्चा से आगे निकल कर यहां पहुंच गई है कि खुद को सोशलिस्ट बताने वाले उम्मीदवार चुनाव जीतने लगे हैं।

इस घटनाक्रम ने डीएसए की नीतियों और कार्यक्रम को चर्चा के केंद्र में लाया है। आम धारणा यही है कि डीएसए नॉर्डिक सोशल डेमोक्रेसी का अमेरिकी संस्करण है। नॉर्डिक मॉडल निजी स्वामित्व, प्रतिस्पर्धी बाज़ार, और बड़े निजी कॉरपोरेट्स को चुनौती नहीं देता। वह महज सामूहिक सौदेबाजी (यानी यूनियन अधिकारों) को मजबूत करने और उदार कल्याणकारी राज्य की धारणा पर आधारित है। नॉर्डिक मॉडल के तहत राज्य अधिक कर लगाता है, अधिक विनियमन करता है, और अधिक सार्वजनिक सेवाएं प्रदान करता है, लेकिन अर्थव्यवस्था का स्वामित्व और संचालन मुख्य रूप से निजी पूंजी ही करती है।

व्यवहार में डीएसए की राजनीति चाहे जो हो, अपने प्रोग्राम में वह इससे कहीं आगे गया है। उसका कार्यक्रम पूंजीवादी स्वामित्व को केंद्रीय समस्या मानता है। वह कंपनी संचालन, निवेश, संसाधन आवंटन आदि का दायित्व सार्वजनिक संस्थानों, श्रमिक संगठनों और लोकतांत्रिक निकायों की ओर ट्रांसफर करना चाहता है। संघीय स्तर पर रोजगार गारंटी, 32 घंटे का कार्य सप्ताह, पूर्ण वेतन के साथ पर्यटन अवकाश,  व्यक्तिगत शुल्क के बिना सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा, प्री-स्कूल से विश्वविद्यालय तक मुफ्त शिक्षा, छात्र ऋण की समाप्ति, किराया नियंत्रण, बड़े पैमाने पर सामाजिक आवास का निर्माण आदि उसके कार्यक्रम का हिस्सा हैं। संसाधन जुटाने के लिए वह वेल्थ टैक्स, कॉरपोरेट टैक्स की ऊंची दरों तथा उत्तराधिकार कर लगाने की मांग करता है।

डीएसए का राजनीतिक सुधार कार्यक्रम भी उतना ही व्यापक है। यह अमेरिकी सीनेट और इलेक्टॉरल कॉलेज को समाप्त करने, आनुपातिक प्रतिनिधित्व लागू करने, बहुदलीय लोकतंत्र लागू करने, राष्ट्रपति पद और सुप्रीम कोर्ट का ढांचा फिर से तय करने, और कार्यपालिका तथा न्यायपालिका को कहीं अधिक कड़े विधायी नियंत्रण के अधीन लाने आदि जैसी बात करता है।

अमेरिकी सिस्टम के भीतर से ऐसे सुधारों को लागू करवा पाना असंभव समझा जाता है। जबकि बाहरी जन हस्तक्षेप से सिस्टम को पलटना डीएसए की रणनीति का हिस्सा नहीं है। इसीलिए उसके कार्यक्रमों को अक्सर हवाई बताया जाता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उनका कोई महत्त्व नहीं है। डीएसए को इस बात का श्रेय दिया जाएगा कि उसने अमेरिका में उन मुद्दों को लोकप्रियता दिलाई, जिनसे वहां का शासक वर्ग ना सिर्फ नफरत करता है, बल्कि भयभीत भी होता है।

बीसवीं सदी वयस्क मताधिकार आधारित लोकतांत्रिक प्रणाली की स्थापना के लिए हुए आंदोलनों के कारण जनता के राजनीतिक अधिकारों का विस्तार हुआ था। बोल्शेविक क्रांति ने उसमें आर्थिक एवं सामाजिक पक्ष जोड़े। लेकिन एक मुकाम के बाद शासक वर्ग उस चेतना को भटकाने और सिस्टम पर फिर से अपना पूरा शिकंजा कसने में कामयाब हो गया। मौजूदा दौर में धुर-दक्षिणपंथ को उसने अपना राजनीतिक औजार बनाया है। उसके प्रतिवाद के रूप में अब नए तेवर वाला वामपंथ सामने आया है। हालांकि इसकी सीमाएं हर जगह स्पष्ट हैं, फिर भी इसका उदय स्वागतयोग्य है, क्योंकि इनसे नई संभावनाएं खुलती हैं।

भारत के राजनीतिक क्षितिज पर अभी ऐसी किसी संभावना के संकेत नजर नहीं आते, तो उसकी वजह यहां शासक वर्ग के चलाए उस वैचारिक एजेंडे का अभी भी प्रभावशाली बने रहना है, जिसके जरिए आम जन की रोजमर्रा की समस्याओं को विमर्श से बाहर धकेला गया है। बहरहाल, यहां की नई पीढ़ी अगर सीखना चाहे, तो वह पश्चिम में उभरी संभावनाओं और उनकी सीमाओं का अध्ययन कर सकती है। हालांकि अपनी राजनीति विकसित करने के लिए शिक्षा का असल स्रोत तो अपनी वस्तुगत परिस्थितियां और आवाम हो ही सकते हैं। खैर, यह एक बिल्कुल अलग मुद्दा है।

ब्रिटेन में भारतीय छात्रों में 20% कमी की आशंका:वजह- वीजा में सख्ती; ऐसा हुआ तो ब्रिटेन को सालाना ₹10 हजार करोड़ का घाटा

अब ब्रिटेन में भी भारतीयों छात्रों की संख्या में भारी कमी आने की आशंका है। अमेरिका में ट्रम्प राज में भारतीय छात्र मुश्किलें झेल रहे थे, लेकिन अब वैसे ही हालात ब्रिटेन में भी हो रहे हैं। सेंटर फॉर ग्लोबल हायर एजुकेशन (सीजीएचई) यूके की रिपोर्ट में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। 2027 के मई-जून के दाखिलों (समर इनटेक) में भारतीय छात्रों की संख्या में 20% तक की कमी आ सकती है। इस साल सितंबर तक भारतीय छात्रों को लगभग 83 हजार स्टूडेंट वीजा मिले थे। अगले साल ये घटकर 63 हजार रहने की आशंका है। इसका सबसे बड़ा कारण ब्रिटेन की एंडी बर्नहैम सरकार की सख्त वीजा नीतियां हैं। ब्रिटेन में ग्रेजुएट वर्क वीजा डेढ़ साल किया गया दरअसल, ब्रिटेन में राष्ट्रवादी पार्टियों जैसे रिफॉर्म यूके के तेजी से उभरने के कारण वीजा में सख्ती हो रही है। रिफॉर्म यूके के एजेंडे में स्थानीयों को रोजगार देना प्रमुख है। इसलिए बर्नहैम सरकार अमेरिका की तर्ज पर वीजा जारी करने में बैकग्राउंड चेक में सख्ती बरत रही है। ब्रिटेन में ग्रेजुएट वर्क वीजा को दो साल से घटाकर अब डेढ़ साल कर दिया गया है। इससे स्टूडेंट्स को पढ़ाई के बाद ब्रिटेन में नौकरी और रिसर्च करने के लिए कम समय मिल पाएगा। भारत में ब्रिटेन की 9 यूनिवर्सिटी के कैंपस खुले वीजा में सख्ती के बीच एक राहत भी है। ब्रिटेन की साउथैम्पटन, लिवरपूल, यॉर्क जैसी 9 यूनिवर्सिटी ने भारत में अपने कैंपस खोलने का ऐलान किया है। इनमें से कुछ में पढ़ाई भी शुरू हो चुकी है। जानकारों का मानना है कि भारतीय छात्र यहां पर दाखिले लेकर ब्रिटेन के स्तर की पढ़ाई कर सकते हैं। आने वाले समय में ब्रिटेन की और यूनिवर्सिटी भी आएंगी। 4 सवाल-जवाब में समझें इसका असर क्या; जर्मनी-फ्रांस-आयरलैंड होंगे नए स्टडी हब भारतीय छात्रों की कमी से क्या असर? भारतीय छात्रों की संख्या में कमी से ब्रिटेन की इकोनॉमी को सालाना लगभग 10 हजार करोड़ रुपए का घाटा झेलना पड़ेगा। लेकिन ब्रिटेन की सरकार सियासी हितों के साधने के फेर में वीजा नियम सख्त कर रही। छात्र अब किन देशों का रुख करेंगे? जर्मनी, आयरलैंड और फ्रांस में भारतीय छात्र रुख करेंगे। इन देशों में स्टूडेंट वीजा की अप्रूवल रेट 90% तक है। जर्मनी की सरकारी यूनिवर्सिटी में फीस माफी है। वीजा मुद्दे का क्या हल हो सकता है? भारत-ब्रिटेन एफटीए (फ्री ट्रेड एग्रीमेंट) में भारत की ओर से स्टूडेंट और प्रोफेशनल वीजा में रियायत का पॉइंट रखा गया था। ब्रिटेन की तत्कालीन ऋषि सुनक और फिर स्टारमर सरकारों ने अड़ियल रुख अपना कर वीजा प्रावधानों को हटा दिया था। डिपेंडेंट वीजा में भी दिक्कतें क्यों? ब्रिटेन में छात्रों और प्रोफेशनल्स को मिलने वाले डिपेंडेंट (आश्रितों) वीजा में भी सख्ती की गई है। यानी अब ब्रिटेन में आने वाले छात्र और प्रोफेशनल्स पत्नी, बच्चों और पैरेंट्स को साथ नहीं ला पाएंगे। इसके लिए 58 लाख रुपए सालाना की न्यूनतम वेतन सीमा रखी गई है। ——————————-

ब्रिटेन में भारतीय छात्रों में 20% कमी की आशंका:वजह- वीजा में सख्ती; ऐसा हुआ तो ब्रिटेन को सालाना ₹10 हजार करोड़ का घाटा

अब ब्रिटेन में भी भारतीयों छात्रों की संख्या में भारी कमी आने की आशंका है। अमेरिका में ट्रम्प राज में भारतीय छात्र मुश्किलें झेल रहे थे, लेकिन अब वैसे ही हालात ब्रिटेन में भी हो रहे हैं। सेंटर फॉर ग्लोबल हायर एजुकेशन (सीजीएचई) यूके की रिपोर्ट में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। 2027 के मई-जून के दाखिलों (समर इनटेक) में भारतीय छात्रों की संख्या में 20% तक की कमी आ सकती है। इस साल सितंबर तक भारतीय छात्रों को लगभग 83 हजार स्टूडेंट वीजा मिले थे। अगले साल ये घटकर 63 हजार रहने की आशंका है। इसका सबसे बड़ा कारण ब्रिटेन की एंडी बर्नहैम सरकार की सख्त वीजा नीतियां हैं। ब्रिटेन में ग्रेजुएट वर्क वीजा डेढ़ साल किया गया दरअसल, ब्रिटेन में राष्ट्रवादी पार्टियों जैसे रिफॉर्म यूके के तेजी से उभरने के कारण वीजा में सख्ती हो रही है। रिफॉर्म यूके के एजेंडे में स्थानीयों को रोजगार देना प्रमुख है। इसलिए बर्नहैम सरकार अमेरिका की तर्ज पर वीजा जारी करने में बैकग्राउंड चेक में सख्ती बरत रही है। ब्रिटेन में ग्रेजुएट वर्क वीजा को दो साल से घटाकर अब डेढ़ साल कर दिया गया है। इससे स्टूडेंट्स को पढ़ाई के बाद ब्रिटेन में नौकरी और रिसर्च करने के लिए कम समय मिल पाएगा। भारत में ब्रिटेन की 9 यूनिवर्सिटी के कैंपस खुले वीजा में सख्ती के बीच एक राहत भी है। ब्रिटेन की साउथैम्पटन, लिवरपूल, यॉर्क जैसी 9 यूनिवर्सिटी ने भारत में अपने कैंपस खोलने का ऐलान किया है। इनमें से कुछ में पढ़ाई भी शुरू हो चुकी है। जानकारों का मानना है कि भारतीय छात्र यहां पर दाखिले लेकर ब्रिटेन के स्तर की पढ़ाई कर सकते हैं। आने वाले समय में ब्रिटेन की और यूनिवर्सिटी भी आएंगी। 4 सवाल-जवाब में समझें इसका असर क्या; जर्मनी-फ्रांस-आयरलैंड होंगे नए स्टडी हब भारतीय छात्रों की कमी से क्या असर? भारतीय छात्रों की संख्या में कमी से ब्रिटेन की इकोनॉमी को सालाना लगभग 10 हजार करोड़ रुपए का घाटा झेलना पड़ेगा। लेकिन ब्रिटेन की सरकार सियासी हितों के साधने के फेर में वीजा नियम सख्त कर रही। छात्र अब किन देशों का रुख करेंगे? जर्मनी, आयरलैंड और फ्रांस में भारतीय छात्र रुख करेंगे। इन देशों में स्टूडेंट वीजा की अप्रूवल रेट 90% तक है। जर्मनी की सरकारी यूनिवर्सिटी में फीस माफी है। वीजा मुद्दे का क्या हल हो सकता है? भारत-ब्रिटेन एफटीए (फ्री ट्रेड एग्रीमेंट) में भारत की ओर से स्टूडेंट और प्रोफेशनल वीजा में रियायत का पॉइंट रखा गया था। ब्रिटेन की तत्कालीन ऋषि सुनक और फिर स्टारमर सरकारों ने अड़ियल रुख अपना कर वीजा प्रावधानों को हटा दिया था। डिपेंडेंट वीजा में भी दिक्कतें क्यों? ब्रिटेन में छात्रों और प्रोफेशनल्स को मिलने वाले डिपेंडेंट (आश्रितों) वीजा में भी सख्ती की गई है। यानी अब ब्रिटेन में आने वाले छात्र और प्रोफेशनल्स पत्नी, बच्चों और पैरेंट्स को साथ नहीं ला पाएंगे। इसके लिए 58 लाख रुपए सालाना की न्यूनतम वेतन सीमा रखी गई है। ——————————-

रांची में जल्द शुरू होगा नाइट मार्केट, झारखंड की संस्कृति की मिलेगी झलक

रांची के लोगों के लिए अच्छी खबर है। सिटी में नाइट मार्केट बनने जा रहा है। एक तरफ इससे रांची के लोगों को शॉपिंग का नया एक्सपीरियंस मिलेगा तो दूसरी तरफ रोजगार के बड़े मौके बनेंगे। नाइट मार्केट के लिए जमीन की पहचान कर ली गई है। आइए इस नाइट मार्केट की खास बातें जानते हैं।

ग्रामीण महिलाओं को एलॉट होंगे आउटलेट

रांची में प्रस्तावित नाइट मार्केट की खास बात यह है कि इसमें ग्रामीण महिलाओं को प्राथमिकता के साथ फूड आउटलेट एलॉट किया जाएगा। इतना ही नहीं आउटलेट शुरू करने के लिए उन्हें सब्सिडी भी दी जाएगी। इस मार्केट के लिए करमटोली चौक के करीब स्थित करमटोली तालाब के पास 51 डिसमिल जमीन की पहचान कर ली गई है। इस जमीन की बाउंड्री भी हो गई है।

शॉपिंग के साथ लजीज व्यंजन का उठा सकेंगे लुत्फ

रांची के नगर आयुक्त सुशांत गौरव ने कहा, “ग्रामीण महिलाओं से आउटलेट का कोई रेंट नहीं लिया जाएगा। अपने घर खाना बनाने वाली महिलाओं को आउटलेट मिलेगा। उनके आउटलेट को प्रमोट किया जाएगा और उनको पलाश ब्रैंड से भी जोड़ा जाएगा। नाइट मार्केट को ऐसे प्लेटफॉर्म के रूप में विकसित करने का प्लान है, जहां शहर के लोग शॉपिंग के नए एक्सपीरियंस के साथ ही लजीज व्यंजन का लुफ्त उठा सकेंगे।

नाइट मार्केट में मिलेगी झारखंड की संस्कृति की झलक 

नाइट मार्केट के जरिए न सिर्फ झारखंड के व्यंजन को पहचान मिलेगी बल्कि बल्कि लोगों को हेल्दी फूड भी उपलब्ध होगा। खासतौर पर यहां मिलेट प्रोडक्ट्स यह उपलब्ध होंगे। इनमें मड़वा, बाजरा, मकई, घोड़ा चावल, मडवा के बने लड्डू, मकई लड्डू व बिस्किट, बांस के अचार शामिल हैं। यहां पर सिटी के लोगों को झारखंड के सोहराय पेंटिंग की खूबसूरत कलाकृति भी देखने को मिलेगी। नाइट मार्केट की साज-सज्जा का खास ध्यान रखने का प्लान है।

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शहर के लोगों में नाइट मार्केट को लेकर उत्साह

गौरव ने कहा कि यह सिर्फ नाइट मार्केट नहीं होगा बल्कि यहां आप झारखंड की संस्कृति और आदिवासियों की जिंदगी के बारे में जान सकेंगे। लोग नाइट पार्क में झारखंड के खानपान, यहां के कपड़े, यहां की पेंटिंग को एक्सप्लोर कर सकेंगे। उन्होंने कहा कि खासकर राज्य के बाहर के लोगों को नाइट मार्केट में पूरे झारखंड को करीब से देखने का मौका मिलेगा। सिटी के लोगों में नाइट मार्केट को लेकर काफी उत्साह है।

(रांची से शिखा श्रेया की रिपोर्ट)

बिचौलियों का खेल खत्म! आउटसोर्स कर्मचारियों के लिए योगी सरकार का नया प्लान, जानिए कैसे 20 लाख लोगों की बदलेगी जिंदगी

उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार बहुत जल्द बिचौलियों का खेल खत्म करने की तैयारी की रही है। राज्य सरकार आउटसोर्स कर्मचारियों के लिए सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़ाने पर तेजी से काम कर रही है। उत्तर प्रदेश कॉरपोरेशन फॉर आउटसोर्सिंग सर्विसेज (UPCOS) के लॉन्च से करीब 3.5 लाख आउटसोर्स कर्मचारी और उनके परिवार एक नए कल्याणकारी ढांचे के केंद्र में आ गए हैं। सरकार का कहना है कि परिवार के सदस्यों को शामिल करने पर इस पहल से 17 से 20 लाख लोग लाभांवित हो सकते हैं।

सरकार की व्यवस्था से दूर होंगी आउटसोस वर्करों की चिंताएं

बीजेपी के लिए यह प्रशासनिक सुधार से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। आउटसोर्स कर्मचारी सरकारी विभागों, हॉस्पिटल, लोकल बॉडी और दूसरे सार्वजनिक संस्थानों में काम करते हैं। इससे वे एक बड़ा कार्यबल बन जाते हैं जिनका सीधा लिंक सरकारी मशीनरी से होता है। नए सिस्टम का मकसद उनकी कुछ पुरानी चिंताओं को दूर करना है, जिसमें वेतन में देरी, एजेंसियों द्वारा कटौती, सामाजिक सुरक्षा की कमी और नौकरी को लेकर अनिश्चितता शामिल है।

आउटसोर्स कर्मियों के बैंक खाते में जाएगी सैलरी

यूपीसीओएस के तहत, सैलरी सीधे वर्कर के बैंक अकाउंट में भेजी जाएगी, जबकि ईपीएफ और ईएसआई योगदान नियमित जमा किए जाएंगे। सरकार ने कहा है कि आउटसोर्सिंग एजेंसियों को वर्कर की सैलरी से सर्विस चार्ज काटने की इजाजत नहीं होगी। कैटेगरी के आधार पर 20 लाख रुपये से 40 लाख रुपये के एक्सीडेंट इंश्योरेंस की भी घोषणा की गई है।

बड़े वेलफेयर मॉडल पर काम कर रही सरकार

प्रदेश सरकार के हाल के फैसले बताते हैं कि वह एक बड़े वेलफेयर मॉडल पर आगे बढ़ रही है। इसके तहत नकद लाभ को एक बड़े वेलफेयर मॉडल का केंद्र बिंदु माना जा रहा है। इसमें स्वास्थ्य, बीमा और रोजगार सुरक्षा भी शामिल है। हाल ही में पंचायत असिस्टेंट का मानदेय बढ़ाने पर सहमती के साथ ही सरकार ने रोजगार और सामाजिक आर्थिक सुरक्षा से जुड़े कई सहूलियतें प्रदान करने की घोषणा की। इसी तरह अगस्त में 3.5 लाख से अधिक मिड-डे मील कुक का मानदेय बढ़ाने का फैसला किया था। सरकार ने उन्हें कैशलेस हेल्थ कवर सहित कई अन्य सुविधाओं की घोषणा की थी। आंगनवाड़ी वर्कर्स को भी बढ़ते वेलफेयर नेट में लाया गया है। 8 सितंबर को, योगी ने हेल्पर्स और हेल्थ इंश्योरेंस के लिए उनके महीने के मानदेय को 8,000 रुपये से बढ़ाकर 12,000 रुपये करने की घोषणा की। बड़ी वेलफेयर स्कीमों की तुलना में अलग-अलग रकम कम लग सकती है, लेकिन राजनीतिक महत्व कवर किए जा रहे ग्रुप्स की संख्या और नेचर में है।

कल्याणकारी योजनाओं की सोच में बदलाव

लखनऊ में गिरी इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज में एसोसिएट प्रोफेसर नोमिता पी कुमार ने कहा कि इन उपायों से सरकार की कल्याकारी योजनाओं की सोच में बदलाव का संकेत मिलता है। उन्होंने कहा, “पंचायत असिस्टेंट के मानदेय में 50% की बढ़ोतरी से लेकर आंगनवाड़ी वर्कर, मिड-डे मील कुक और आउटसोर्स कर्मचारियों के लिए बढ़ी हुई आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा तक, उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले वेलफेयर पॉलिटिक्स का एक नया पैटर्न उभर रहा है।”

₹2 लाख/वर्ग मीटर जमीन, 12-20 हजार/वर्ग फीट बिक रहे फ्लैट? समझिए ग्रेटर नोएडा के बोड़ाकी के पास प्रॉपर्टी को क्यों लग रहे पंख

ग्रेटर नोएडा का बोड़ाकी और उसके आसपास का क्षेत्र आने वाले समय में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) के एक विशाल इंफ्रास्ट्रक्चर हब के रूप में आकार लेता दिख रहा है। रेलवे स्टेशन, इंटरनेशनल बस अड्डा और लगभग 600 एकड़ में प्रस्तावित मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक्स हब जैसी महत्वाकांक्षी परियोजनाओं की वजह से इस इलाके के रियल एस्टेट बाजार में जबरदस्त उछाल देखा जा रहा है। बुनियादी ढांचे के इस बड़े विस्तार से आसपास के सेक्टरों में जमीन, आवासीय फ्लैट और कमर्शियल प्रॉपर्टी की मांग और कीमतों में भारी बदलाव देखने को मिल रहा है।

बोड़ाकी बनेगा NCR का प्रमुख ट्रांसपोर्ट और बिजनेस हब

दादरी के पास बोड़ाकी में स्थित मौजूदा रेलवे हॉल्ट को एक आधुनिक मल्टी-मॉडल रेलवे टर्मिनल (ग्रेटर नोएडा टर्मिनल) के रूप में विकसित किया जा रहा है। इस परियोजना के तैयार होने से गौतमबुद्ध नगर के लाखों यात्रियों की ट्रेन पकड़ने के लिए दिल्ली या गाजियाबाद जाने की मजबूरी समाप्त हो जाएगी। प्रस्तावित स्टेशन में 12 प्लेटफॉर्म होंगे, साथ ही बड़ी संख्या में यार्ड और लूप लाइनें तैयार की जाएंगी। दावों के मुताबिक यहां वंदे भारत और राजधानी जैसी लंबी दूरी की एक्सप्रेस ट्रेनों के संचालन और रखरखाव की अत्याधुनिक सुविधाएं होंगी। भविष्य में पूर्वांचल की दिशा में जाने वाली कई प्रमुख ट्रेनों का संचालन यहां से जोड़े जाने की संभावना है।

कनेक्टिविटी को और मजबूत बनाने के लिए इस टर्मिनल को ‘नमो भारत’ रैपिड रेल नेटवर्क से भी जोड़ा जाएगा। इसके अलावा, बोड़ाकी में लगभग 14 एकड़ क्षेत्र में एक आधुनिक बस अड्डा, वर्कशॉप और सीएनजी स्टेशन स्थापित करने की योजना है। स्टेशन परिसर में होटल, प्रमुख फूड चेन और कमर्शियल स्पेस भी विकसित किए जाएंगे, जिससे यह क्षेत्र सिर्फ एक स्टेशन न रहकर बड़ा ट्रांसपोर्ट और बिजनेस हब बनेगा।

600 एकड़ में फैलेगा मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक्स हब

SVG Realty के चेयरमैन व डायरेक्टर और रियल एस्टेट एक्सपर्ट अंकुर मित्तल बताते हैं कि प्रस्तावित रेलवे स्टेशन के समीप लगभग 600 एकड़ क्षेत्र में मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक्स हब विकसित करने की योजना है। इसमें वेयरहाउस, कोल्ड स्टोरेज, लोकल ट्रेन और लंबी दूरी की रेल कनेक्टिविटी जैसी इंटिग्रेटेड सुविधाएं शामिल होंगी।

इन सुविधाओं के विकसित होने से केवल आम यात्रियों को ही सहूलियत नहीं मिलेगी, बल्कि स्थानीय स्तर पर व्यापक रोजगार, बड़े कारोबार और कमर्शियल गतिविधियों के मौके पैदा होंगे। इसी वजह से बोड़ाकी और इसके आसपास के क्षेत्रों में रियल एस्टेट निवेशकों की रुचि तेजी से बढ़ी है।

जमीन के रेट: डेढ़ लाख से दो लाख रुपये प्रति वर्ग मीटर

एक्सपर्ट्स के मुताबिक ग्रेटर नोएडा में जमीन की उपलब्धता और सेक्टरों के विकास की स्थिति के हिसाब से रेट्स में अंतर देखा जा रहा है। विकसित सेक्टर की बात करें तो अथॉरिटी के प्लॉटों की कीमतें लगभग 2 लाख रुपये प्रति वर्ग मीटर तक पहुंच गई हैं। सेमी-डेवलप सेक्टर में भी जमीन के दाम लगभग 1.5 लाख रुपये प्रति वर्ग मीटर के आसपास देखे जा रहे हैं। किसानों के सेमी-कमर्शियल प्लॉट की कीमत 1 लाख रुपये से लेकर 1.25 लाख रुपये प्रति वर्ग मीटर के आसपास बताई जा रही है।

बालाजी होम्स के रियल एस्टेट एक्सपर्ट संजय कुमार के मुताबिक, बोड़ाकी जंक्शन के पास स्थित इटा, ओमिक्रॉन और म्यू प्रमुख सेक्टरों में शामिल हैं, जहां विकास के काम तेजी से चल रहे हैं। प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय बस अड्डे और रेलवे जंक्शन के कारण इन सेक्टरों में प्रॉपर्टी की कीमतें करीब 1.5 लाख रुपये प्रति वर्ग मीटर तक बताई जा रही हैं।

12 हजार से 20 हजार रुपये प्रति वर्ग फीट पहुंचे फ्लैट्स के दाम

टाटा, गोदरेज और हीरो रियल्टी जैसे देश के प्रमुख रियल एस्टेट डेवलपर्स इस क्षेत्र में अपने प्रोजेक्ट्स ला चुके हैं। नए लॉन्च हो रहे आवासीय प्रोजेक्ट्स में फ्लैटों के रेट 12 हजार रुपये प्रति वर्ग फीट से शुरू होकर लग्जरी सेगमेंट में 20 हजार रुपये प्रति वर्ग फीट तक पहुंच रहे हैं। कामकाजी वर्ग और निवेशकों के बीच स्टूडियो अपार्टमेंट्स की मांग में भी इजाफा हुआ है। कमर्शियल प्रोजेक्ट्स में 500 से 600 वर्ग फीट के स्टूडियो अपार्टमेंट तैयार किए जा रहे हैं, जिनकी दरें 10 हजार रुपये से 13 हजार रुपये प्रति वर्ग फीट के बीच हैं।

अल्फा से बोड़ाकी तक कमर्शियल कॉरिडोर में तेजी

अल्फा से बोड़ाकी के बीच करीब 5 किलोमीटर के दायरे में कमर्शियल गतिविधियों की मांग काफी बढ़ी है। ग्राउंड फ्लोर रिटेल स्पेस 30,000 रुपये से 35,000 रुपये प्रति वर्ग फीट, अपर फ्लोर कमर्शियल स्पेस करीब 20,000 रुपये प्रति वर्ग फीट और ऑफिस स्पेस 12,000 रुपये से 13,000 रुपये प्रति वर्ग फीट तक जा रहे हैं।

रेलवे कनेक्टिविटी, रैपिड रेल, लॉजिस्टिक्स हब और बस अड्डे जैसी बड़ी विकास परियोजनाओं के चलते बोड़ाकी और आसपास के सेक्टरों का रियल एस्टेट मार्केट इस समय आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। हालांकि यहां ये भी समझना जरूरी है कि किसी भी प्रॉपर्टी का अंतिम मूल्य उसकी सटीक लोकेशन, प्रोजेक्ट की स्थिति और मिलने वाली सुविधाओं पर निर्भर करता है।

(ग्रेटर नोएडा से पवन गुप्ता की रिपोर्ट)

पटना में खुलेगा बिहार का पहला महिला विश्वविद्यालय, प्रोफेसर्स भी महिलाएं होंगी

बिहार सरकार ने बेटियों की उच्च शिक्षा की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। राज्य में महिलाओं के लिए ऐसी यूनिवर्सिटी शुरू होने जा रही है, जिसमें स्टूडेंट्स के साथ प्रोफेसर्स भी महिलाएं होंगी। राज्य के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने पिछले महीने इसका ऐलान किया था। 23 सितंबर को राज्य कैबिनेट की बैठक में इस प्रस्ताव पर मुहर लग गई।

सरकार ने शुरुआती फंड को मंजूरी दी

राज्य सरकार ने विश्वविद्यालय के संचालन के लिए प्रारंभिक राशि को मंजूरी दे दी है। राज्य के पहले महिला विवि का निर्माण पटना में होगा और इसकी पहचान मां सीता के नाम पर होगी। कैबिनेट की बैठक में बिहार विशिष्ट विश्वविद्यालय अधिनियम, 2026 के तहत दो विश्वविद्यालयों की स्थापना का फैसला किया गया। विश्वविद्यालय के पदाधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन के लिए सरकार ने 15 करोड़ रुपये के फंड को प्रशासनिक मंजूरी दे दी है।

अभी अधिकांश महिला कॉलेज दो यूनिवर्सिटी के तहत आते हैं

अभी राज्य की राजधानी पटना में मौजूद अधिकांश महिला कॉलेज पटना विश्वविद्यालय या पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के तहत आते हैं। सूत्रों के मुताबिक आगे पटना के अधिकांश महिला कॉलेज महिला विश्वविद्यालय के तहत आ सकते हैं। पटना विश्वविद्यालय के अधीन आने वाले महिला कॉलेजों में बदलाव की संभावना नहीं है। अभी पटना में श्री अरविंद महिला कॉलेज, गंगा देवी महिला कॉलेज, जेडी वीमेंस कॉलेज सहित करीब दर्जनभर महिला कॉलेज हैं।

अभी करीब एक दर्जन महिला कॉलेज हैं

पटना विश्वविद्यालय के अधीन जिले में करीब 10 कॉलेज हैं। इनमें महिलाओं के लिए समर्पित 2 प्रमुख कॉलेज हैं-पटना वीमेंस कॉलेज और मगध महिला कॉलेज। अगर पाटलिपुत्र यूनिवर्सिटी की बात करें तो इसके तहत पटना जिले में 6 प्रमुख महिला कॉलेज हैं। इनमें गंगा देवी महिला महाविद्यालय, जेडी वीमेंस कॉलेज, खगौल स्थित महिला कॉलेज, गर्दनीबाग स्थित राजकीय महिला महाविद्यालय, गुलजारबाग स्थित राजकीय महिला महाविद्यालय और बिहटा का बी.बी.एम.बी.जी. कन्या महाविद्यालय शामिल हैं।

कुलपति और प्रोफेसर्स भी महिलाएं होंगी

महिला विश्वविद्यालय बनने की खबर से छात्राओं में खुशी की लहर है। जेडी वीमेंस कॉलेज की छात्रा रुनझुन प्रिया ने कहा कि महिला विश्वविद्यालय बनने से उन्हें उच्च शिक्षा हासिल करने में आसानी होगी। छात्राओं से लेकर कुलपति तक सभी महिलाएं होंगी, जिससे लड़कियों की दिलचस्पी उच्च शिक्षा में बढ़ेगी। एक दूसरी छात्रा ने कहा कि अगर विश्वविद्यालय में पढ़ाई के साथ शोध और रोजगार से जुड़ी सुविधाएं मिलती हैं, तो यह छात्राओं के लिए काफी उपयोगी साबित हो सकता है।

शोध और रोजगार के पर्याप्त असर पर फोकस जरूरी

पटना यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफेसर और पूर्व डीएसपी डॉ. अखिलेश कुमार ने कहा कि किसी भी नए शैक्षणिक संस्थान की स्थापना एक अच्छी पहल है और इसका स्वागत किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि महिला विश्वविद्यालय की जरूरत और इसकी उपयोगिता को जेंडर इक्वालिटी के नजरिए से भी देखने की आवश्यकता है। हालांकि, उन्होंने कहा कि अगर महिला विश्वविद्यालय में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर शोध और रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराए जाते हैं, तो यह सरकार की एक पॉजिटिव पहल साबित हो सकती है।

(पटना से सच्चिदानंद की रिपोर्ट)