3 करोड़ सैलरी भी है कम! पार्थिव पटेल ने क्यों नहीं किया चीफ सेलेक्टर के लिए आवेदन? जानें वजह

अजीत अगरकर के जाने के बाद से बीसीसीआई नए चीफ सेलेक्टर की तलाश जारी है। वहीं ऐसी खबरे थी की पूर्व भारतीय विकेटकीपर पार्थिव पटेल को इस पद का प्रमुख दावेदार माना जा रहा है। ऐसी चर्चाएं भी थीं कि अगर पटेल इस पद के लिए आवेदन करते हैं, तो उन्हें बोर्ड का पूरा समर्थन मिल सकता है। वहीं आवेदन करने की आखिरी तारीख बीत जाने के बावजूद पार्थिव पटेल ने इस पद के लिए अपना नाम नहीं दिया। वहीं रिपोर्ट में ऐसा दावा किया जा रहा है कि चीफ सेलेक्टर को मिलने वाली सैलरी की वजह से पार्थिव ने आवेदन नहीं किया है। आइए जानते हैं क्या है पूरा मामला

इस वजह से पार्थिव ने नहीं दिया नाम

द टेलीग्राफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने आर्थिक कारणों के चलते मुख्य चयनकर्ता बनने का फैसला छोड़ दिया। BCCI इस पद के लिए उन्हें हर साल 3 करोड़ रुपये देने को तैयार था, लेकिन यह जिम्मेदारी स्वीकार करने पर उन्हें गुजरात टाइटंस में अपनी कोचिंग की नौकरी और कमेंट्री से होने वाली कमाई छोड़नी पड़ सकती थी। ऐसे में उन्हें इस पद को चुनने से आर्थिक नुकसान होने की आशंका थी। फिलहाल, साउथ जोन के चयनकर्ता प्रज्ञान ओझा इस जिम्मेदारी को संभाल रहे हैं।

वहीं, वेस्ट जोन से एक नए चयनकर्ता को भी टीम में शामिल किया जाना है। इस पद के लिए पूर्व भारतीय क्रिकेटर वसीम जाफर और रमेश पोवार के नामों की चर्चा हो रही है। दोनों को मुख्य चयनकर्ता बनने की दौड़ में मजबूत दावेदार माना जा रहा है।

अश्विन ने सैलरी को लेकर उठाए सवाल

भारत के पूर्व स्पिनर रविचंद्रन अश्विन ने हाल ही में अपने यूट्यूब चैनल पर चयनकर्ताओं की सैलरी को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि, BCCI में चयनकर्ता के पद पर मिलने वाली रकम इतनी नहीं है कि बड़े और अनुभवी क्रिकेटर इस जिम्मेदारी को लेने के लिए आगे आएं। अश्विन ने कहा कि, ‘अगर सेलेक्टर्स की सैलरी बढ़ाई जाती है, तो इस पद के लिए बड़े और अनुभवी क्रिकेटर आगे आ सकते हैं। उन्होंने सौरव गांगुली, राहुल द्रविड़ और अनिल कुंबले जैसे दिग्गजों का उदाहरण देते हुए कहा कि अच्छे स्तर के चयनकर्ताओं को लाने के लिए इस पद को आर्थिक रूप से आकर्षक बनाना जरूरी है।”

हेड कोच जितनी मिले सैलरी

अश्विन ने आगे कहा, “चयनकर्ता बनने के बाद पूर्व क्रिकेटर मीडिया में काम नहीं कर सकते, खिलाड़ियों पर खुलकर चर्चा नहीं कर सकते और न ही कहीं कोचिंग दे सकते हैं, क्योंकि इससे हितों के टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है। इसके अलावा, उन्हें पूरे साल घरेलू क्रिकेट और IPL पर नजर रखनी पड़ती है। अश्विन का मानना है कि अगर मुख्य चयनकर्ता को भारतीय टीम के मुख्य कोच के बराबर वेतन मिले, तो इस पद के लिए बेहतर अनुभव और योग्यता वाले लोग सामने आएंगे।” उन्होंने यह पूछकर अपनी बात खत्म की कि क्या बोर्ड पहले उन पेडिग्री वाले सिलेक्टर्स को चाहता था।

Mithun Chakraborty: मशहूर अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती बंगाल सरकार के सलाहकार नियुक्त! कैबिनेट मंत्री का मिला दर्जा, सैलरी और अन्य सुविधाएं

Mithun Chakraborty: मशहूर अभिनेता और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेता मिथुन चक्रवर्ती को बुधवार (7 अक्टूबर) को पश्चिम बंगाल सरकार का सांस्कृतिक सलाहकार नियुक्त किए जाने के साथ ही कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया गया। एक आधिकारिक अधिसूचना के मुताबिक, मिथुन को सूचना और सांस्कृतिक मामलों के विभाग में तत्काल प्रभाव से सांस्कृतिक सलाहकार नियुक्त किया गया है। बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने हाल में घोषणा की थी कि मिथुन को पश्चिम बंगाल सरकार का सांस्कृतिक सलाहकार बनाया जाएगा। ताजा आदेश तुरंत लागू हो गया है। यह अगले आदेश तक प्रभावी रहेगा।

इस नियुक्ति की औपचारिक सूचना कार्मिक और प्रशासनिक सुधार विभाग (IAS सेल) द्वारा 6 अक्टूबर, 2026 को जारी की गई थी। आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, सरकार की मंजूरी के बाद पश्चिम बंगाल के राज्यपाल के आदेश से जारी की गई थी। प्रशासन ने इस बात पर जोर दिया कि यह रणनीतिक फैसला पूरी तरह से जनसेवा के हित में लिया गया है, जो सांस्कृतिक नीति और क्षेत्रीय मनोरंजन पहलों को सुव्यवस्थित करने के राज्य के बड़े प्रयासों को दर्शाता है।

सुविधा और सैलरी

मिथुन चक्रवर्ती को पश्चिम बंगाल सरकार में सूचना एवं सांस्कृतिक मामलों के विभाग में कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिला है। इसके तहत उन्हें कैबिनेट मंत्री के समकक्ष सुविधाएं मिलेंगी। इनमें सरकारी बंगला, आधिकारिक कार, सुरक्षा, स्टाफ, मेडिकल और यात्रा की सुविधाएं शामिल हैं। मूल सैलरी पश्चिम बंगाल में कैबिनेट मंत्री का ₹51,000 प्रति माह है। साथ में सत्कार भत्ता और क्षतिपूर्ति भत्ता आदि शामिल है। हालांकि, सलाहकार पद का सटीक पैकेज अभी आधिकारिक रूप से घोषित नहीं हुआ है। इसलिए अभी इसकी आधिकारिक पुष्टि होना बाकी है।

मुख्य सचिवालय से मंजूरी

इस प्रशासनिक आदेश पर पश्चिम बंगाल सरकार के मुख्य सचिव मनोज कुमार अग्रवाल ने आधिकारिक तौर पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। यह निर्देश चक्रवर्ती को सांस्कृतिक पहलों, सिनेमा के बुनियादी ढांचे के विस्तार और राज्य समर्थित कला कार्यक्रमों की देखरेख के लिए एक पूर्ण कैबिनेट मंत्री के समान कानूनी अधिकार और संस्थागत विशेषाधिकार देता है। यह हाई-प्रोफाइल नियुक्ति राज्य के प्रशासनिक तंत्र और सांस्कृतिक क्षेत्र के बीच एक महत्वपूर्ण संस्थागत कड़ी का काम करती है, जिससे यह मशहूर अभिनेता पश्चिम बंगाल की रणनीतिक सांस्कृतिक पहलों की कमान संभालेंगे।

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‘बंगाल का गौरव’ माने जाने वाले मिथुन चक्रवर्ती भारतीय सिनेमा के दिग्गज अभिनेता हैं, जिन्होंने दशकों से राष्ट्रीय मंच पर पश्चिम बंगाल के सांस्कृतिक समुदाय का प्रतिनिधित्व किया है। उन्होंने मृणाल सेन की 1976 की प्रशंसित आर्ट-हाउस फिल्म ‘मृगया’ से अभिनय की शुरुआत की। उन्होंने अपने पहले ही फिल्मी प्रदर्शन के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का प्रतिष्ठित राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता। इस बड़ी सफलता के बाद, चक्रवर्ती हिंदी और बंगाली दोनों तरह के सिनेमा में स्टार बन गए। और देखते ही देखते उन्होंने देश के सबसे मशहूर जन-नायकों और लंबे समय तक सांस्कृतिक राजदूतों में से एक के रूप में अपनी पहचान बनाई।

ड्राइवर को 53,000 रुपये महीना देने पर बोले अंकुर वारिकू, बताया इसे ‘बेहतरीन निवेश’ क्यों मानते हैं

नौकरी की शुरुआत अक्सर सैलरी से होती है, लेकिन कई बार सालों के साथ रिश्ता सिर्फ काम और पैसे तक सीमित नहीं रहता। लेखक और उद्यमी अंकुर वारिकू ने अपने परिवार के ड्राइवर दयानंद की कहानी शेयर करते हुए कुछ ऐसा ही अनुभव बताया। दयानंद पिछले 13 साल से उनके परिवार के साथ हैं और इस दौरान उनकी भूमिका एक ड्राइवर से बढ़कर भरोसेमंद साथी जैसी हो गई।

13 साल पहले 15 हजार थी सैलरी

वारिकू के मुताबिक, दयानंद ने करीब 13 साल पहले उनके परिवार के साथ 15,000 रुपये महीने की सैलरी पर काम शुरू किया था। आज उन्हें 53,350 रुपये प्रति माह मिलते हैं। इसके अलावा उनके परिवार को हेल्थ इंश्योरेंस, दिवाली पर एक महीने की अतिरिक्त सैलरी और एक स्कूटी जैसी सुविधाएं भी दी जाती हैं।

ड्राइवर से बढ़कर परिवार का भरोसेमंद सदस्य

वारिकू ने बताया कि समय के साथ दयानंद का काम सिर्फ गाड़ी चलाने तक नहीं रहा। वह परिवार के बच्चों को उनकी क्लास और दूसरी गतिविधियों तक ले जाते हैं, जरूरी काम संभालते हैं और घर की डुप्लीकेट चाबियां भी उनके पास रहती हैं।

यानी परिवार ने उन्हें सिर्फ कर्मचारी नहीं, बल्कि ऐसा व्यक्ति माना जिस पर घर और परिवार की सुरक्षा को लेकर आंख बंद करके भरोसा किया जा सके।

सुबह 4:30 बजे उठना और समय की पाबंदी

वारिकू ने दयानंद की दिनचर्या और काम के प्रति रवैये की भी तारीफ की। उनके अनुसार, दयानंद सुबह करीब 4:30 बजे उठते हैं और रात 8:30 बजे तक सो जाते हैं। वह समय के बेहद पाबंद हैं और काम में कभी देर नहीं करते। उनकी जिम्मेदारी और सकारात्मक रवैये ने परिवार का भरोसा और मजबूत किया।

‘वह हमारा समय और मानसिक तनाव बचाते हैं’

वारिकू के मुताबिक, दयानंद की अहमियत सिर्फ उनके द्वारा किए जाने वाले काम में नहीं है। वह परिवार के कई रोजमर्रा के काम संभालकर उनका समय और मानसिक बोझ कम करते हैं। इसी वजह से वारिकू ने उन्हें परिवार के पैसों का सबसे अच्छा निवेश बताया। उनका कहना था कि मेहनती लोगों के साथ उदार होना जिंदगी में आगे बढ़ने के सबसे भरोसेमंद तरीकों में से एक है।

सोशल मीडिया पर लोगों ने पूछ लिया- निवेश किसका?

वारिकू की पोस्ट को जहां कई लोगों ने पसंद किया, वहीं कुछ यूजर्स ने उनके ‘इन्वेस्टमेंट’ वाले नजरिए पर सवाल भी उठाए। एक यूजर ने कहा कि असल निवेश दयानंद का है, जिन्होंने 13 साल तक लगातार मेहनत करके यह भरोसा कमाया। उसके मुताबिक, हर दिन अपनी जिम्मेदारी निभाना और परिवार का विश्वास बनाए रखना दयानंद की असली मेहनत है।

13 साल की वफादारी के बाद 53 हजार पर भी सवाल

एक अन्य यूजर ने यह सवाल उठाया कि 13 साल तक लगातार काम करने और कभी देर न करने वाले कर्मचारी की सैलरी को लेकर ‘उदारता’ की बात क्यों की जा रही है। इस प्रतिक्रिया में सवाल किया गया कि इतने लंबे समय तक सेवा देने के बाद 53,350 रुपये मासिक वेतन वास्तव में कितना उचित है।

असली कहानी सैलरी से ज्यादा भरोसे की है

इस पूरी चर्चा ने एक दिलचस्प सवाल खड़ा कर दिया है क्या लंबे समय तक चलने वाले रोजगार रिश्ते की कीमत सिर्फ सैलरी से तय की जा सकती है? वारिकू के लिए दयानंद भरोसे, जिम्मेदारी और मानसिक सुकून का हिस्सा हैं। वहीं आलोचना करने वालों के लिए यह कहानी कर्मचारी की मेहनत और उसके उचित मेहनताने पर सवाल उठाती है।

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बिचौलियों का खेल खत्म! आउटसोर्स कर्मचारियों के लिए योगी सरकार का नया प्लान, जानिए कैसे 20 लाख लोगों की बदलेगी जिंदगी

उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार बहुत जल्द बिचौलियों का खेल खत्म करने की तैयारी की रही है। राज्य सरकार आउटसोर्स कर्मचारियों के लिए सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़ाने पर तेजी से काम कर रही है। उत्तर प्रदेश कॉरपोरेशन फॉर आउटसोर्सिंग सर्विसेज (UPCOS) के लॉन्च से करीब 3.5 लाख आउटसोर्स कर्मचारी और उनके परिवार एक नए कल्याणकारी ढांचे के केंद्र में आ गए हैं। सरकार का कहना है कि परिवार के सदस्यों को शामिल करने पर इस पहल से 17 से 20 लाख लोग लाभांवित हो सकते हैं।

सरकार की व्यवस्था से दूर होंगी आउटसोस वर्करों की चिंताएं

बीजेपी के लिए यह प्रशासनिक सुधार से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। आउटसोर्स कर्मचारी सरकारी विभागों, हॉस्पिटल, लोकल बॉडी और दूसरे सार्वजनिक संस्थानों में काम करते हैं। इससे वे एक बड़ा कार्यबल बन जाते हैं जिनका सीधा लिंक सरकारी मशीनरी से होता है। नए सिस्टम का मकसद उनकी कुछ पुरानी चिंताओं को दूर करना है, जिसमें वेतन में देरी, एजेंसियों द्वारा कटौती, सामाजिक सुरक्षा की कमी और नौकरी को लेकर अनिश्चितता शामिल है।

आउटसोर्स कर्मियों के बैंक खाते में जाएगी सैलरी

यूपीसीओएस के तहत, सैलरी सीधे वर्कर के बैंक अकाउंट में भेजी जाएगी, जबकि ईपीएफ और ईएसआई योगदान नियमित जमा किए जाएंगे। सरकार ने कहा है कि आउटसोर्सिंग एजेंसियों को वर्कर की सैलरी से सर्विस चार्ज काटने की इजाजत नहीं होगी। कैटेगरी के आधार पर 20 लाख रुपये से 40 लाख रुपये के एक्सीडेंट इंश्योरेंस की भी घोषणा की गई है।

बड़े वेलफेयर मॉडल पर काम कर रही सरकार

प्रदेश सरकार के हाल के फैसले बताते हैं कि वह एक बड़े वेलफेयर मॉडल पर आगे बढ़ रही है। इसके तहत नकद लाभ को एक बड़े वेलफेयर मॉडल का केंद्र बिंदु माना जा रहा है। इसमें स्वास्थ्य, बीमा और रोजगार सुरक्षा भी शामिल है। हाल ही में पंचायत असिस्टेंट का मानदेय बढ़ाने पर सहमती के साथ ही सरकार ने रोजगार और सामाजिक आर्थिक सुरक्षा से जुड़े कई सहूलियतें प्रदान करने की घोषणा की। इसी तरह अगस्त में 3.5 लाख से अधिक मिड-डे मील कुक का मानदेय बढ़ाने का फैसला किया था। सरकार ने उन्हें कैशलेस हेल्थ कवर सहित कई अन्य सुविधाओं की घोषणा की थी। आंगनवाड़ी वर्कर्स को भी बढ़ते वेलफेयर नेट में लाया गया है। 8 सितंबर को, योगी ने हेल्पर्स और हेल्थ इंश्योरेंस के लिए उनके महीने के मानदेय को 8,000 रुपये से बढ़ाकर 12,000 रुपये करने की घोषणा की। बड़ी वेलफेयर स्कीमों की तुलना में अलग-अलग रकम कम लग सकती है, लेकिन राजनीतिक महत्व कवर किए जा रहे ग्रुप्स की संख्या और नेचर में है।

कल्याणकारी योजनाओं की सोच में बदलाव

लखनऊ में गिरी इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज में एसोसिएट प्रोफेसर नोमिता पी कुमार ने कहा कि इन उपायों से सरकार की कल्याकारी योजनाओं की सोच में बदलाव का संकेत मिलता है। उन्होंने कहा, “पंचायत असिस्टेंट के मानदेय में 50% की बढ़ोतरी से लेकर आंगनवाड़ी वर्कर, मिड-डे मील कुक और आउटसोर्स कर्मचारियों के लिए बढ़ी हुई आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा तक, उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले वेलफेयर पॉलिटिक्स का एक नया पैटर्न उभर रहा है।”

Salary Management: सैलरी आते ही पैसा खत्म हो जाता है? ये 5 खास फॉर्मूले करेंगे आपकी मदद

Salary Management: हर महीने सैलरी आती है और कुछ ही दिनों में अकाउंट खाली होने लगता है। EMI, किराया, राशन, बच्चों के खर्च, शॉपिंग और बाहर खाने जैसे खर्च मिलकर बजट बिगाड़ देते हैं। महीने के आखिर में बचत के नाम पर कुछ नहीं बचता।

इससे बचने का एक आसान तरीका है सैलरी को मिलते ही 5 अलग-अलग हिस्सों में बांटना। हर हिस्से का एक तय काम होता है। इससे आपको पहले से पता रहता है कि कितना पैसा खर्च करना है और कितना बचाना है।

सैलरी को 5 हिस्सों में कैसे बांटें

इस फॉर्मूले में सैलरी का 50% जरूरी खर्च के लिए रखा जाता है। 20% निवेश, 10% इमरजेंसी फंड, 10% निजी खर्च और 10% बड़े लक्ष्यों के लिए रखा जा सकता है। इसे तीन 30, 50 और 60 हजार अलग-अलग सैलरी के उदाहरण से समझिए।

खर्च का हिस्सा₹30,000 सैलरी₹50,000 सैलरी₹60,000 सैलरी
जरूरी खर्च के लिए 50%₹15,000₹25,000₹30,000
निवेश के लिए 20%₹6,000₹10,000₹12,000
इमरजेंसी फंड 10%₹3,000₹5,000₹6,000
निजी खर्च 10%₹3,000₹5,000₹6,000
बड़े लक्ष्य के लिए 10%₹3,000₹5,000₹6,000
कुल₹30,000₹50,000₹60,000

यह कोई सख्त नियम नहीं है। आप अपनी सैलरी, EMI और परिवार की जरूरत के हिसाब से इन हिस्सों में बदलाव कर सकते हैं।

1. जरूरी खर्च के लिए 50%

सबसे पहले जरूरी खर्च का हिस्सा अलग करना चाहिए। इसमें घर का किराया, EMI, राशन, बिजली-पानी का बिल, बच्चों की फीस और रोजमर्रा की जरूरी चीजें शामिल हो सकती हैं।

अगर आपकी सैलरी ₹50,000 है तो इस हिस्से में करीब ₹25,000 रखे जा सकते हैं। कोशिश करें कि जरूरी खर्च लगातार इससे ऊपर न जाएं। अगर ऐसा हो रहा है तो बजट में कटौती की गुंजाइश तलाशनी चाहिए।

2. निवेश के लिए 20%

दूसरा हिस्सा भविष्य के लिए है। ₹50,000 की सैलरी में इसका मतलब ₹10,000 हर महीने निवेश करना है।

इस पैसे को आपके लक्ष्य और जोखिम के हिसाब से अलग-अलग निवेश विकल्पों में लगाया जा सकता है। मसलन, लंबी अवधि के लक्ष्यों के लिए SIP, जबकि PPF या VPF जैसे विकल्प भी आपकी जरूरत के मुताबिक इस्तेमाल किए जा सकते हैं।

सबसे जरूरी बात यह है कि निवेश सैलरी आने के बाद हो। महीने के आखिर में जो पैसा बचे, उससे निवेश करने की आदत अक्सर काम नहीं करती।

3. इमरजेंसी के लिए 10%

अचानक आने वाले खर्चों के लिए अलग पैसा होना बहुत जरूरी है। इसके लिए सैलरी का 10% अलग रखा जा सकता है। ₹50,000 की सैलरी में यह रकम ₹5,000 महीने होगी। मेडिकल इमरजेंसी, नौकरी जाने या अचानक किसी बड़े जरूरी खर्च के समय ये पैसा काम आ सकता है।

जब तक पर्याप्त इमरजेंसी फंड तैयार न हो जाए, इस रकम को दूसरे खर्चों में इस्तेमाल करने से बचना चाहिए।

4. निजी खर्च के लिए 10%

बजट बनाने का मतलब यह नहीं है कि हर महीने सिर्फ बिल और निवेश ही किया जाए। घूमने-फिरने, मनोरंजन और अपनी पसंद के खर्च के लिए भी पैसा अलग रखना जरूरी है।

₹50,000 की सैलरी में ₹5,000 इस हिस्से में रखे जा सकते हैं। इससे बाहर खाना, फिल्म, छोटी-मोटी शॉपिंग या घूमने जैसे खर्च किए जा सकते हैं।

इसका फायदा यह है कि आपको हर छोटे खर्च के बाद यह नहीं सोचना पड़ेगा कि बजट बिगड़ गया। बस तय सीमा के अंदर खर्च करना होगा।

5. बड़े लक्ष्यों के लिए 10%

पांचवां हिस्सा उन लक्ष्यों के लिए रखें जिन्हें आप आने वाले कुछ सालों में पूरा करना चाहते हैं। इसमें गाड़ी खरीदना, घर का डाउन पेमेंट, बच्चों की पढ़ाई, शादी या कोई बड़ा पर्सनल गोल शामिल हो सकता है।

₹50,000 की सैलरी में इसके लिए ₹5,000 महीने अलग किए जा सकते हैं। जैसे-जैसे सैलरी बढ़े, इस हिस्से को भी बढ़ाया जा सकता है। इमरजेंसी फंड बनने के बाद उस हिस्से को भी निवेश किया जा सकता है।

फॉर्मूले में अपने हिसाब से करें बदलाव

50:20:10:10:10 का यह फॉर्मूला हर व्यक्ति के लिए बिल्कुल एक जैसा नहीं हो सकता। अगर आपकी EMI ज्यादा है तो जरूरी खर्च का हिस्सा बढ़ सकता है। वहीं, कर्ज कम है और आय ज्यादा है तो निवेश का हिस्सा 20% से ऊपर भी रखा जा सकता है।

आखिर में मकसद सिर्फ सैलरी को 5 हिस्सों में बांटना नहीं है। मकसद यह है कि सैलरी आते ही हर रुपये को एक काम दे दिया जाए, ताकि महीने के अंत में यह सवाल न उठे कि पैसा आखिर गया कहां।

शेयर, सोना और बैंक एफडी, इनमें निवेश का इनवेस्टर्स का आखिरी मकसद क्या है?

Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी निवेश, लोन, टैक्स, बीमा या दूसरे वित्तीय फैसले लेने से पहले संबंधित एक्सपर्ट्स से सलाह जरूर लें। मनीकंट्रोल किसी भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट या सर्विस की सिफारिश नहीं करता।

मुंबई में शख्स 1 लाख की सैलरी में से 50,000 का देता था किराया , चार्टर्ड अकाउंटेंट बोला मेरे लिए ये बेस्ट ‘इन्वेस्टमेंट’ है

चार्टर्ड अकाउंटेंट और कंटेंट क्रिएटर कुशल लोढ़ा ने बताया है कि कैसे मुंबई में रहते हुए उन्होंने एक बार अपनी महीने की सैलरी का आधा हिस्सा किराए पर खर्च कर दिया था। उन्होंने बताया कि वे महीने के ₹1 लाख कमाते थे और लोअर परेल में घर के लिए ₹50,000 किराया देते थे।

लोढ़ा के लिए ज्यादा किराया सिर्फ रहने का खर्च नहीं था। उनका मानना ​​था कि वे जिस इलाके में रहते थे, उसका उनकी सोच, लक्ष्यों और काम करने के तरीके पर सीधा असर पड़ता था। उन्होंने कहा कि यह फैसला सही था, भले ही उनके आस-पास के लोगों ने इस पर सवाल उठाए हों।

लोढ़ा 50,000 महीना किराया देते थे

लोढ़ा ने अपने X पोस्ट में कहा, “जब मैं महीने में ₹1 लाख कमाता था तो मैं लोअर परेल में रहने चला गया और ₹50,000 किराया देता था।” उन्होंने कहा कि लोगों को यह समझना मुश्किल लगता था कि वह अपनी कमाई का इतना बड़ा हिस्सा किराए पर क्यों खर्च करना चाहते थे।

कुछ लोगों ने तो इस फैसले के लिए उन्हें “पागल” भी कहा। हालांकि लोढ़ा के मुताबिक लोअर परेल में रहने से उन्हें ऐसा माहौल मिला, जिसने उनके करियर और काम को देखने का नजरिया बदल दिया। उन्हें लगा कि उनके आस-पास के लोग, जीवनशैली और मौकों ने उन्हें बड़े सपने देखने के लिए प्रेरित किया।

उन्होंने कहा- अपनी सैलरी का 50% किराए पर खर्च करने के लिए सबने मुझे पागल कहा। लेकिन उस माहौल ने मेरे सोचने और काम करने के तरीके को पूरी तरह बदल दिया।”

उन्होंने किराए को एक निवेश के तौर पर देखा

लोढ़ा ने कहा कि हर महीने जो रकम वह देते थे, उसे सिर्फ घर के किराए के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। उनके लिए आस-पास का माहौल भी जरूरी था क्योंकि वह उनकी महत्वाकांक्षाओं पर असर डाल सकता था। कभी-कभी किसी जगह की कीमत उसके किराए से नहीं मापी जाती। यह उस महत्वाकांक्षा से मापी जाती है, जो वह आपके अंदर पैदा करती है। उनकी बातों से इस बात पर भी चर्चा शुरू हो गई है कि क्या किसी खास इलाके में रहने के लिए ज्यादा खर्च करने से ऐसे फायदे हो सकते हैं, जिन्हें पैसों में मापना मुश्किल हो।

यूजर्स ने माहौल की अहमियत पर चर्चा की

कई यूजर्स लोढ़ा की बात से सहमत थे और उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति के आस-पास का माहौल उसकी तरक्की में भूमिका निभा सकता है। एक यूजर ने कहा कि महत्वाकांक्षी लोगों और नए मौकों के बीच रहने का ऐसा असर हो सकता है जिसे हमेशा आंकड़ों के जरिए नहीं दिखाया जा सकता।

यूजर्स ने माहौल की अहमियत पर चर्चा की

कई यूजर्स लोढ़ा की बात से सहमत थे और उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति के आस-पास का माहौल उसकी तरक्की में भूमिका निभा सकता है। एक यूजर ने कहा कि महत्वाकांक्षी लोगों और नए मौकों के बीच रहने का ऐसा असर हो सकता है जिसे हमेशा आंकड़ों के जरिए नहीं दिखाया जा सकता।

एक यूजर ने कमेंट सेक्शन में कहा, “यह आपको जीवन की जो गुणवत्ता देता है, उसे असल में पैसों के रूप में नहीं मापा जा सकता। यह हमें कई ऐसी चीज़ें देता है जिन्हें मापा नहीं जा सकता। और हर चीज़ का विश्लेषण नहीं किया जाना चाहिए। जीवन में भावनात्मक फ़ैसलों की भी जरूरत होती है।”

Salary vs EMI: सैलरी आते ही EMI से खाली हो जाता है अकाउंट? कर्ज के जाल से निकलने के लिए अपनाएं ये 3 आसान स्टेप्स

Debt Management Tips: महीने की पहली तारीख को सैलरी क्रेडिट होने का मैसेज आता है और कुछ ही घंटों में EMIs कटने के बाद अकाउंट खाली लगने लगता है। अगर आपकी सैलरी का भी एक बड़ा हिस्सा पर्सनल लोन, क्रेडिट कार्ड बिल और होम लोन की किश्तों में जा रहा है, तो बचत करना तो दूर, रोजमर्रा के खर्चे संभालना भी चुनौती बन जाता है।

ऐसी स्थिति में अक्सर लोग किसी इमरजेंसी खर्च से निपटने के लिए एक और नया लोन या क्रेडिट कार्ड इस्तेमाल कर लेते हैं, जो उन्हें एक गंभीर ‘डेट ट्रैप’ यानी कर्ज के जाल में फंसा देता है।

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) भी अपने वित्तीय साक्षरता अभियानों में बार-बार आगाह करता है कि पुराना कर्ज चुकाने के लिए नया लोन लेना बहुत खतरनाक साबित हो सकता है। अगर आप भी EMI के दबाव से परेशान हैं, तो इन 3 आसान स्टेप्स के जरिए अपनी वित्तीय स्थिति पर दोबारा नियंत्रण पा सकते हैं।

कर्ज के दबाव को कम करने का 3-स्टेप फॉर्मूला

स्टेप 1: जानिए पैसा कहां जा रहा है और महंगे कर्ज पहले खत्म कीजिए

कोई भी रणनीति बनाने से पहले आपको अपनी मौजूदा वित्तीय स्थिति की पूरी तस्वीर साफ देखनी होगी। अपनी हर EMI, क्रेडिट कार्ड का कुल बकाया, यूटिलिटी बिल्स और राशन/किराए जैसे फिक्स्ड खर्चों को एक कागज पर लिखें। क्रेडिट कार्ड बकाया और पर्सनल लोन पर ब्याज दरें बहुत ज्यादा होती हैं, जबकि होम लोन या कार लोन तुलनात्मक रूप से सस्ते होते हैं।

सभी कर्जों को एक साथ भरने के बजाय सबसे महंगे कर्ज (हाई-इंटरेस्ट लोन) को पहले चुकाने का लक्ष्य बनाएं। बाकी कर्जों की सिर्फ मिनिमम EMI देते रहें और जितनी भी एक्स्ट्रा बचत हो, उसे सबसे महंगे लोन को बंद करने में लगाएं।

स्टेप 2: एक छोटा कैश बफर जरूर तैयार करें

जब बजट पहले से टाइट हो, तो महीने के ₹1,000 या ₹2,000 बचाना भी मुश्किल लगता है। लेकिन यही छोटी बचत आपकी ढाल बनती है। अगर अचानक कोई मेडिकल इमरजेंसी या गाड़ी की खराबी आ जाए, तो इमरजेंसी फंड न होने पर आपको दोबारा क्रेडिट कार्ड का सहारा लेना पड़ता है।

रिजर्व बैंक का मानना है कि हर परिवार के पास एक छोटा कैश बफर होना चाहिए ताकि आपात स्थिति में नया कर्ज न लेना पड़े। शुरुआत में ₹5,000 से ₹10,000 का छोटा बफर बनाएं, फिर धीरे-धीरे इसे 3-6 महीने के आवश्यक खर्चों के बराबर ले जाएं।

स्टेप 3: सैलरी इंक्रीमेंट या बोनस का बुद्धिमानी से इस्तेमाल करें

साल में जब भी सैलरी बढ़े, बोनस मिले या कोई टैक्स रिफंड आए, तो उस पूरे पैसे को नए शौक या लाइफस्टाइल पर खर्च करने की गलती न करें। मिली हुई एक्स्ट्रा राशि का कम से कम 50% से 70% हिस्सा अपने सबसे महंगे लोन के प्रिंसिपल को चुकाने में लगाएं। इससे आपका आने वाला ब्याज काफी घट जाता है।

लोन की प्री-पेमेंट करने से पहले अपने बैंक के नियमों और प्री-पेमेंट चार्जेस की जांच जरूर कर लें। RBI के नियमों के अनुसार बैंकों को लोन की शर्तों में प्री-पेमेंट चार्जेस का पारदर्शी खुलासा करना अनिवार्य है।

पुराने लोन को चुकाने के लिए कभी न लें नया लोन!

कई बार लोग EMI कम करने के लिए लोन कंसोलिडेशन या री-फाइनेंसिंग का सहारा लेते हैं। जब बैंक किसी नए लोन में कम EMI दिखाता है, तो लोग आकर्षित हो जाते हैं। लेकिन ध्यान रखें कि EMI इसलिए कम दिखती है क्योंकि लोन की अवधि बढ़ा दी जाती है।

लोन की अवधि बढ़ाने से आपकी महीने की किस्त तो छोटी हो सकती है, लेकिन बैंक को जाने वाला कुल ब्याज बहुत बढ़ जाता है। इसके अलावा, देर से भुगतान करने पर आपको न केवल लेट फीस और अतिरिक्त ब्याज देना पड़ेगा, बल्कि आपका CIBIL स्कोर भी खराब होगा, जिससे भविष्य में इमरजेंसी लोन मिलना मुश्किल हो जाएगा।

क्या हो लोन रीपेमेंट की बेस्ट स्ट्रेटजी

कर्ज के जाल से बाहर निकलने का रास्ता किसी जादुई फॉर्मले से नहीं, बल्कि सही वित्तीय अनुशासन से निकलता है। जब धीरे-धीरे आपकी एक-एक EMI खत्म होगी, तो उससे बचने वाला पैसा ही आपकी भविष्य की बचत और निवेश की नींव बनेगा। पहला लक्ष्य स्थिति को बिगड़ने से रोकना है, और दूसरा लक्ष्य हर एक्स्ट्रा रुपये को किसी नए कर्ज में फंसाने के बजाय उससे निकलने का जरिया बनाना है।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

रेल यात्रियों के लिए बड़ी खुशखबरी! 25 अगस्त से दक्षिण से पूर्व भारत को जोड़ेगी नई अमृत भारत ट्रेन, जानिए रूट, स्टॉपेज और टाइमिंग

New Amrit Bharat Train: भारतीय रेलवे लंबी दूरी का सफर तय करने वाले यात्रियों के लिए एक बड़ा तोहफा लेकर आया है। रेलवे 25 अगस्त से तमिलनाडु के कोयंबटूर जंक्शन को झारखंड के धनबाद जंक्शन से जोड़ने वाली एक नई अमृत भारत एक्सप्रेस ट्रेन सेवा शुरू करने जा रहा है। यह नई वीकली ट्रेन दक्षिण भारत को पूर्व भारत से जोड़ने का काम करेगी। अपनी यात्रा के दौरान यह ट्रेन देश के सात राज्यों से होकर गुजरेगी। इससे कम बजट में लंबी दूरी की यात्रा करने वाले यात्रियों को आधुनिक और आरामदायक सुविधा मिलेगी।

सात राज्यों से होकर गुजरेगी ट्रेन, इन यात्रियों को मिलेगा बड़ा फायदा

द हिंदू की रिपोर्ट और रेलवे प्रेस रिलीज के मुताबिक यह नई अमृत भारत एक्सप्रेस तमिलनाडु से शुरू होकर आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार से गुजरते हुए झारखंड पहुंचेगी। रेलवे द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक इस सेवा से छात्रों, डेली सैलरीड क्लास, छोटे व्यापारियों, परिवारों और सीनियर सिटिजंस को बड़ा फायदा मिलेगा।

आपको बता दें कि अमृत भारत एक्सप्रेस में अपग्रेडेड कोच, बेहतर सीटें, हाई एंड सेफ्टी फीचर्स और लोगों के लिए तमाम सुविधाएं शामिल की गई हैं। इसका मुख्य उद्देश्य किराए को किफायती रखते हुए लंबी दूरी की यात्रा को अधिक आरामदायक और सुरक्षित बनाना है।

इस ट्रेन के कुल कोच कॉम्बिनेशन की बात करें तो इसमें 8 स्लीपर क्लास कोच, 11 जनरल सेकंड क्लास कोच, 2 दिव्यांगजन यात्रियों की सुविधा वाले लगेज-कम-ब्रेक वैन कोच और 1 पेंट्री कार कोच शामिल रहेगा।

हफ्ते में इस दिन चलेगी धनबाद-कोयंबटूर अमृत भारत एक्सप्रेस

ट्रेन नंबर 22363 (धनबाद-कोयंबटूर अमृत भारत साप्ताहिक एक्सप्रेस) धनबाद जंक्शन से हर शनिवार को शाम 4:10 बजे खुलेगी और सोमवार को शाम 6:30 बजे कोयंबटूर जंक्शन पहुंचेगी। वहीं वापसी में ट्रेन नंबर 22364 (कोयंबटूर-धनबाद अमृत भारत साप्ताहिक एक्सप्रेस) कोयंबटूर जंक्शन से हर मंगलवार को सुबह 7:50 बजे खुलेगी और गुरुवार को दोपहर 1:00 बजे धनबाद जंक्शन पहुंचेगी।

मुख्य स्टेशनों की समय सारिणी और टाइमिंग

धनबाद से कोयंबटूर जाने वाली ट्रेन (22363) के मुख्य स्टेशनों का शेड्यूल नीचे दिया गया है-

जोलारपेट्टई: दोपहर 1:50 बजे आगमन – 1:55 बजे प्रस्थान

सेलम: दोपहर 3:12 बजे आगमन – 3:15 बजे प्रस्थान

इरोड: शाम 4:15 बजे आगमन – 4:20 बजे प्रस्थान

तिरुपुर: शाम 5:03 बजे आगमन – 5:05 बजे प्रस्थान

कोयंबटूर से धनबाद जाने वाली ट्रेन (22364) का मुख्य स्टेशनों पर टाइमिंग शेड्यूल इस प्रकार रहेगा:

तिरुपुर: सुबह 8:28 बजे आगमन – 8:30 बजे प्रस्थान

इरोड: सुबह 9:20 बजे आगमन – 9:25 बजे प्रस्थान

सेलम: सुबह 10:17 बजे आगमन – 10:20 बजे प्रस्थान

जोलारपेट्टई: दोपहर 12:45 बजे आगमन – 12:50 बजे प्रस्थान

दक्षिण और पूर्व के बीच मजबूत होगी रेल कनेक्टिविटी

यह नई अमृत भारत एक्सप्रेस ट्रेन सेवा कोयंबटूर और धनबाद के बीच सीधा साप्ताहिक संपर्क स्थापित करने के साथ-साथ देश के कई प्रमुख हिस्सों को आपस में जोड़ेगी। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार से होकर गुजरने की वजह से यह ट्रेन दक्षिण भारत के यात्रियों को मध्य, उत्तरी और पूर्वी भारत के कई महत्वपूर्ण शहरों से सीधे कनेक्ट करेगी।

EPF Retirement Investment: रिटायरमेंट के बाद नियमित कमाई के लिए EPF का पैसा कहां लगाएं? एक्सपर्ट्स से जानिए

EPF Retirement Investment: कई सैलरीड कर्मचारी रिटायरमेंट के समय Employees’ Provident Fund (EPF) में काफी अच्छा खासा पासा जमा कर लेते हैं। लेकिन जैसे ही सैलरी बंद होती है, असली चुनौती शुरू होती है। सवाल यह होता है कि इस पैसे को लंबे समय तक कैसे चलाया जाए। क्या पूरा पैसा EPF में ही रखा जाए या महंगाई से बचने के लिए कुछ हिस्सा बाजार से जुड़े निवेश में लगाया जाए? कितना जोखिम लेना सही होगा? और एकमुश्त रकम से नियमित आय कैसे बनाई जाए?

अगर आपके पास EPF में बड़ा कॉर्पस है, तो रिटायरमेंट के बाद लक्ष्य सिर्फ पैसे को सुरक्षित रखना नहीं होता। जरूरी यह भी है कि यह पैसा आने वाले वर्षों में आपके खर्चों को पूरा करने के लिए काम करता रहे।

रिटायरमेंट के बाद EPF पर ब्याज कैसे मिलता है

रिटायरमेंट के बाद EPF पर मिलने वाले ब्याज को लेकर अक्सर उलझन रहती है। Kustodian Life के फाउंडर कुणाल काबरा बताते हैं कि EPF नियमों के मुताबिक- 58 साल को आधिकारिक रिटायरमेंट उम्र माना जाता है। रिटायरमेंट के बाद EPF में योगदान बंद हो जाता है, लेकिन बैलेंस पर कुछ समय तक ब्याज मिलता रहता है।

नियम दो तरह से लागू होते हैं। अगर कोई व्यक्ति 58 साल की उम्र में रिटायर होता है, तो उसके EPF बैलेंस पर तीन साल तक यानी 61 साल की उम्र तक ब्याज मिलता है। लेकिन अगर कोई 58 साल से पहले रिटायर होता है, तो उसे ब्याज सिर्फ 58 साल की उम्र तक ही मिलेगा। इसका मतलब है कि 58 साल एक तरह से कट-ऑफ उम्र है। तीन साल तक ब्याज मिलने का फायदा तभी मिलता है, जब रिटायरमेंट आधिकारिक उम्र यानी 58 साल पर हो।

इसे उदाहरण से समझिए

अब मान लीजिए कि अगर कोई 57 साल में रिटायर होता है, तो उसे ब्याज 60 साल तक मिलेगा। अगर कोई 55 साल में रिटायर होता है, तो ब्याज 58 साल तक मिलेगा। यहां तक कि अगर कोई 45 साल में रिटायर होता है, तब भी ब्याज केवल 58 साल तक ही मिलेगा।

आमतौर पर EPF पर मिलने वाली ब्याज दर करीब 8 प्रतिशत के आसपास रहती है, लेकिन यह ब्याज इन्हीं तय सीमाओं के भीतर मिलता है। यहां तक कि अगर कोई व्यक्ति 58 के बाद भी काम करता रहे, तब भी नए EPF योगदान आम तौर पर बंद हो जाते हैं। ब्याज 61 साल की उम्र तक ही सीमित रहता है। इसी वजह से एक्सपर्ट मानते हैं कि रिटायरमेंट के बाद केवल EPF पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होता।

फिक्स्ड इनकम का इंतजाम जरूरी

रिटायरमेंट के बाद सुरक्षित निवेश वाले हिस्से में भी केवल एक साधन पर निर्भर रहना सही नहीं माना जाता। Master Capital Services में वेल्थ मैनेजमेंट की AVP आकांक्षा शुक्ला कहती हैं कि EPF मुख्य रूप से बचत जमा करने का साधन है, न कि रिटायरमेंट में नियमित आय देने वाला साधन।

इसलिए रिटायरमेंट के बाद बचत को इस तरह व्यवस्थित करना जरूरी होता है कि उससे नियमित आय मिलती रहे। उदाहरण के तौर पर Senior Citizens’ Savings Scheme (SCSS) अपेक्षाकृत ज्यादा और स्थिर आय दे सकती है। वहीं बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट भी अपनी सादगी और तय रिटर्न की वजह से कई लोगों की पसंद बने रहते हैं, खासकर उन लोगों के लिए जो मासिक आय चाहते हैं।

इसके अलावा डेट म्यूचुअल फंड पोर्टफोलियो में लचीलापन और लिक्विडिटी जोड़ सकते हैं। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इनके जरिए जरूरत के मुताबिक समय-समय पर पैसे निकालना आसान हो सकता है।

रिटायरमेंट में भी इक्विटी की भूमिका

कई रिटायर्ड लोगों को लगता है कि इक्विटी से पूरी तरह दूर रहना सुरक्षित रहेगा। लेकिन ऐसा करने से एक और जोखिम पैदा हो सकता है। समय के साथ महंगाई आपकी खरीद क्षमता को कम कर सकती है।

आकांक्षा शुक्ला के मुताबिक, बढ़ती औसत उम्र और महंगाई को देखते हुए रिटायरमेंट पोर्टफोलियो में इक्विटी की भूमिका अब धीरे धीरे जरूरी होती जा रही है।

आमतौर पर 15 से 20 प्रतिशत तक इक्विटी निवेश, खासकर लार्ज-कैप, इंडेक्स या हाइब्रिड फंड के जरिए, पोर्टफोलियो को लंबे समय में बढ़ने में मदद कर सकता है। यहां मकसद बहुत ज्यादा रिटर्न कमाना नहीं होता, बल्कि यह सुनिश्चित करना होता है कि आपका कॉर्पस समय के साथ खत्म न हो।

सही एसेट एलोकेशन क्यों जरूरी है

रिटायरमेंट के बाद पोर्टफोलियो का संतुलन बहुत महत्वपूर्ण होता है। इससे एक तरफ नियमित आय मिलती रहती है और दूसरी तरफ महंगाई से भी बचाव होता है।

आकांक्षा शुक्ला के अनुसार अगर किसी के पास करीब 3 करोड़ रुपये का कॉर्पस है, तो निवेश को चार हिस्सों में बांटना एक सामान्य रणनीति हो सकती है। इसमें EPF और अन्य फिक्स्ड इनकम साधन, डेट निवेश, इक्विटी और एक छोटा इमरजेंसी फंड शामिल हो सकता है। असल में यह डिस्ट्रीब्यूशन कुछ इस तरह हो सकता है:

  • 40 से 50 प्रतिशत फिक्स्ड इनकम
  • 30 से 35 प्रतिशत डेट निवेश
  • 15 से 20 प्रतिशत इक्विटी
  • और एक छोटा इमरजेंसी फंड

एकमुश्त रकम से नियमित आय कैसे बनाएं

रिटायरमेंट के समय मिलने वाली बड़ी रकम को सही तरीके से निवेश करना जरूरी होता है। Arihant Capital Markets की CEO Wealth स्वाति जैन के अनुसार, पूरी रकम एक साथ निवेश करने की बजाय Systematic Transfer Plan (STP) का इस्तेमाल किया जा सकता है।

इसमें पैसा पहले कम जोखिम वाले डेट या लिक्विड फंड में रखा जाता है और फिर 6 से 12 महीनों के दौरान धीरे धीरे इक्विटी या हाइब्रिड फंड में ट्रांसफर किया जाता है। इससे बाजार के उतार चढ़ाव का जोखिम कम हो जाता है।

नियमित आय के लिए Systematic Withdrawal Plan (SWP) भी बेहतर तरीका हो सकता है। इसमें निवेश से तय अंतराल पर एक निश्चित रकम निकाली जाती है, जिससे नियमित कैश फ्लो बना रहता है।

एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि एक से दो साल के खर्च के बराबर रकम सुरक्षित निवेश में रखी जाए, ताकि बाजार गिरने के समय मजबूरी में पैसे निकालने की जरूरत न पड़े। इसके बाद SWP के जरिए नियमित आय बनाई जा सकती है।

रिटायरमेंट में सुरक्षित निकासी कितनी हो

स्वाति जैन के मुताबिक, इसके लिए बकेट रणनीति अपनाना इस्तेमाल हो सकता है। इसमें छोटे समय की जरूरतों के लिए डेट निवेश से SWP किया जाता है और लंबी अवधि की ग्रोथ के लिए इक्विटी में निवेश रखा जाता है।

एक्सपर्ट्स आम तौर पर 4 से 5 प्रतिशत सालाना निकासी को सुरक्षित मानते हैं। यानी अगर किसी के पास 3 करोड़ रुपये का कॉर्पस है, तो वह सालाना लगभग 12 से 15 लाख रुपये निकाल सकता है। यह दर आम तौर पर 20 से 25 साल तक टिकाऊ मानी जाती है, बशर्ते पोर्टफोलियो संतुलित बना रहे। अगर शुरुआती वर्षों में इससे ज्यादा पैसा निकाला जाए, तो भविष्य में कॉर्पस जल्दी खत्म होने का खतरा बढ़ सकता है।

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Viral Post: ₹1.84 लाख से ₹75 लाख की सैलरी तक कैसे पहुंचा युवक? सोशल मीडिया पर शेयर किया अपना सीक्रेट

इंजीनियरिंग की डिग्री या बड़े कॉलेज से पढ़ाई किए बिना भी अच्छी नौकरी और सैलरी हासिल की जा सकती है। सोशल मीडिया पर किए गए एक पोस्ट में यूजर ने अपनी नौकरी और कमाई से जुड़ी कहानी शेयर की है। यूजर ने बताया कि उसने करीब नौ साल के करियर में अपनी सालाना कमाई ₹1.84 लाख से बढ़ाकर ₹75 लाख कर ली। अपनी कहानी से यूजर ने बताया कि सही स्किल और लगातार मेहनत के दम पर बिना बड़े कॉलेज बैकग्राउंड के भी करियर में अच्छी ग्रोथ हासिल की जा सकती है। सोशल मीडिया पर ये पोस्ट तेजी से वायरल हो रहा है।

Reddit के r/IndianWorkplace सबरेडिट पर इस प्रोफेशनल ने अपनी करियर जर्नी शेयर किया है। रेडिट पर शेयर किए गए इस पोस्ट को X पर एक यूजर ने शेयर किया है। यूजर ने कहा कि, उसने यह कहानी उन लोगों का हौसला बढ़ाने के लिए शेयर की है, जो नौकरी जाने या B.Tech डिग्री न होने से परेशान हैं। उसके मुताबिक, मेहनत और बेहतर स्किल्स से करियर में सफलता हासिल की जा सकती है।

₹1.84 लाख सालाना से शुरू किया करियर

पोस्ट के अनुसार, इस प्रोफेशनल ने एक Tier-3 कॉलेज से कंप्यूटर एप्लीकेशन के साथ मैथ में B.Sc. की पढ़ाई की। इसके बाद उसे WITCH कंपनी में कैंपस प्लेसमेंट के जरिए पहली नौकरी मिली। उसने अपने करियर की शुरुआत महज ₹1.84 लाख सालाना सैलरी से की थी, जो टेक्नोलॉजी सेक्टर में काम करने वाले कई लोगों को काफी कम लग सकती है। करियर के शुरुआती चार सालों में उसकी सैलरी में ज्यादा बढ़ोतरी नहीं हुई।

 

कोविड के बाद बढ़ी सैलरी

कोविड-19 के दौर तक उसकी सालाना कमाई करीब ₹4.5 लाख पहुंची थी। इसके बाद नौकरी के बाजार में आए बदलाव के बीच उसे एक बड़ी कंपनी में काम करने का मौका मिला, जहां उसका सालाना पैकेज ₹8 लाख हो गया। इस तरह उसकी सैलरी में एक साथ करीब 78 फीसदी की बढ़ोतरी हुई और उसके करियर को आगे बढ़ने का नया रास्ता मिला। इसके करीब एक साल बाद उसकी कमाई में एक और बड़ा बदलाव आया। मौजूदा नौकरी से संतुष्ट न होने के कारण उसने दूसरी कंपनियों में अवसर तलाशने शुरू किए।

कुछ ही सालों में सालाना सैलरी ₹42.2 लाख हो गई

इस दौरान उसे कई नौकरी के ऑफर मिले और बेहतर विकल्प मिलने के बाद उसने ₹17.4 लाख सालाना पैकेज पर नई नौकरी तय की। यह उसकी पिछली ₹8 लाख सालाना सैलरी से दोगुने से भी ज्यादा थी। अगले तीन सालों में उसने कॉर्पोरेट सेक्टर में काम जारी रखा और कई चुनौतियों के बावजूद अपनी कमाई बढ़ाता रहा। समय-समय पर मिलने वाली सैलरी बढ़ोतरी के चलते उसका सालाना पैकेज करीब ₹30 लाख तक पहुंच गया। इसके बाद उसने बेहतर कमाई और काम का अच्छा माहौल पाने के लिए एक स्टार्टअप का रुख किया। यह फैसला उसके लिए फायदेमंद रहा और उसकी सालाना सैलरी बढ़कर ₹42.2 लाख हो गई।

नौकरी से निकाला भी गया

करियर में सबसे बड़ा बदलाव उस समय आया, जब स्टार्टअप में काम करने के करीब एक साल बाद उसे नौकरी से निकाल दिया गया। हालांकि, उसने इसे अपने करियर का अंत मानने के बजाय इस समय का इस्तेमाल आगे की नौकरी की तैयारी में किया। इसके बाद उसे एक दूसरे स्टार्टअप में काम करने का मौका मिला, जहां उसका सालाना पैकेज बढ़कर ₹75 लाख हो गया। यह उसकी पिछली ₹42.2 लाख की सैलरी से करीब 77 फीसदी ज्यादा थी। यूजर के मुताबिक, करियर में आगे बढ़ने के लिए सिर्फ डिग्री नहीं, बल्कि स्किल्स, लगातार सीखना और सही फैसले ज्यादा जरूरी हैं। समस्या हल करने की क्षमता भी सफलता में अहम भूमिका निभाती है।

सैलरी को लेकर करे नेगोशिएशन

Reddit यूजर ने अपनी कहानी में बताया कि नौकरी बदलते समय सैलरी पर बातचीत करना कितना जरूरी है। उन्होंने पहला ऑफर तुरंत स्वीकार करने के बजाय बेहतर पैकेज के लिए बातचीत की, जिससे उनकी सालाना सैलरी ₹8 लाख से बढ़कर ₹17.4 लाख हो गई। उन्होंने ये भी बताया कि नौकरी जाना हमेशा करियर के लिए नुकसान नहीं होता। उनके मामले में ₹42 लाख सालाना पैकेज वाली नौकरी छूटने के बाद उन्हें ऐसा मौका मिला, जहां उनकी कमाई बढ़कर ₹75 लाख सालाना हो गई।