PF खाते से कब और कितनी बार निकाल सकते हैं एडवांस पैसा? जानिए मेडिकल, शादी, मकान और पढ़ाई के लिए क्या हैं नियम

EPFO Advance Withdrawal Rules: अगर आप कहीं नौकरी करते हैं, तो हर महीने आपकी सैलरी से एक तय हिस्सा कटता है। जितनी रकम आपकी सैलरी से कटती है, उतनी ही रकम आपकी कंपनी भी आपके प्रोविडेंट फंड यानी PF खाते में जमा करती है। यह जमा पैसा आपकी रिटायरमेंट के लिए एक बड़ा सहारा बनता है।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि जरूरत पड़ने पर आप रिटायरमेंट से पहले भी अपने पीएफ खाते से एडवांस पैसा निकाल सकते हैं?

कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) ने पीएफ एडवांस से जुड़े नियमों को काफी आसान और पारदर्शी बना दिया है। नए नियमों (EPF Scheme, 2026) के तहत आंशिक निकासी के लिए न्यूनतम मेंबरशिप की अवधि को घटाकर 12 महीने कर दिया गया है।

किस काम के लिए कितनी बार निकाल सकते हैं पीएफ का पैसा?

ईपीएफओ ने विभिन्न जरूरतों को तीन मुख्य श्रेणियों- जरूरी जरूरतें, मकान से जुड़ी जरूरतें और विशेष परिस्थितियां में बांटा है:

निकासी का कारण कितनी बार निकाल सकते हैं एडवांस?
इलाज/मेडिकल जरूरतेंकोई सीमा नहीं (जितनी बार चाहें निकाल सकते हैं)
बच्चों की पढ़ाईमेंबरशिप के दौरान कुल 10 बार
शादी (स्वयं या बच्चों की)मेंबरशिप के दौरान कुल 5 बार
मकान/प्लाट/होम लोनमेंबरशिप के दौरान कुल 5 बार
विशेष परिस्थितियांएक वित्तीय वर्ष में 2 बार तक

1. मेडिकल इमरजेंसी के लिए निकासी

अगर आपको या आपके परिवार के किसी सदस्य को अचानक इलाज के लिए पैसों की जरूरत पड़ती है, तो आप पीएफ से एडवांस निकाल सकते हैं। मेडिकल इमरजेंसी के लिए निकासी की कोई अधिकतम सीमा नहीं रखी गई है।

2. बच्चों की पढ़ाई और शादी के लिए

बच्चों की उच्च शिक्षा के खर्चों को पूरा करने के लिए आप पूरी नौकरी (मेंबरशिप) के दौरान 10 बार तक एडवांस निकाल सकते हैं। वहीं, अगर परिवार में या खुद की शादी का खर्च उठाना है, तो इसके लिए 5 बार तक निकासी की अनुमति दी गई है।

3. मकान खरीदने, बनाने या होम लोन चुकाने के लिए

अगर आप नया घर या प्लॉट खरीदना चाहते हैं, घर का निर्माण कराना चाहते हैं, घर का रेनोवेशन कराना चाहते हैं या पुराने होम लोन की किस्त चुकाना चाहते हैं, तो आप अपने पीएफ खाते का इस्तेमाल कर सकते हैं। आवास से जुड़ी जरूरतों के लिए आप 5 बार तक एडवांस पैसा निकाल सकते हैं।

4. विशेष परिस्थितियों के लिए

केंद्रीय बोर्ड द्वारा अधिसूचित कुछ विशेष या आपातकालीन परिस्थितियों में भी कर्मचारियों को राहत दी जाती है। ऐसी स्थिति में कर्मचारी एक वित्तीय वर्ष में दो बार एडवांस निकाल सकते हैं।

आप अपने पीएफ से कितना पैसा निकाल सकते हैं?

ईपीएफओ के नए दिशा-निर्देशों के अनुसार, अगर आपकी मेंबरशिप को 12 महीने पूरे हो चुके हैं, तो आप अपने पीएफ बैलेंस का 75% तक एडवांस निकाल सकते हैं। इस बैलेंस में आपका अंशदान, कंपनी का अंशदान और उस पर मिला ब्याज शामिल होता है।

पीएफ एडवांस निकालने से पहले अपनी पात्रता की जांच जरूर कर लें। इसके लिए आप सीधे ईपीएफओ के आधिकारिक मेम्बर सेवा पोर्टल पर जाकर ऑनलाइन आवेदन जमा कर सकते हैं।

How to Buy Home: ₹30000 की सैलरी में भी खरीद सकते हैं अपना घर, समझिए कैसे बनाएं पूरा प्लान

How to Buy Home: अपना घर खरीदने का सपना हर कोई देखता है। लेकिन महीने की सैलरी ₹30,000 के आसपास हो, तो लगता है कि आज के जमाने में घर खरीदना शायद मुमकिन नहीं है। किराया, राशन, बिजली का बिल और बच्चों की फीस देने के बाद बचता ही कितना है? ऐसे में होम लोन की EMI चुकाना बड़ी जिम्मेदारी लगती है।

हालांकि, कम सैलरी में भी घर खरीदा जा सकता है। इसके लिए जरूरी है कि आप अपनी कमाई के हिसाब से घर चुनें। बड़ा लोन लेने के बजाय ऐसी EMI रखें, जिसे हर महीने आसानी से चुका सकें। आइए, उदाहरण से समझते हैं कि ₹30,000 की सैलरी में घर खरीदने का प्लान कैसे बना सकते हैं।

₹30,000 की सैलरी पर कितना होम लोन लें?

BASIC Home Loan के CEO और को-फाउंडर अतुल मोंगा का कहना है कि अगर आप ₹10 लाख का होम लोन लेते हैं, तो ब्याज दर और लोन की अवधि के हिसाब से EMI करीब ₹10,000 हो सकती है। मोंगा के मुताबिक, अगर आपकी सैलरी ₹30,000 है, तो घर खरीदना सिर्फ कमाई पर निर्भर नहीं करता। ये भी जरूरी है कि आप घर खरीदने की कितनी अच्छी तैयारी करते हैं। घर

इसे एक उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए कि आपकी सैलरी ₹30,000 है। इसमें से ₹8,000 घर और किराने, ₹3,000 बिजली और दूसरे बिलों, ₹4,000 आने-जाने और ₹5,000 परिवार के अन्य खर्चों में जाते हैं। इस तरह कुल खर्च ₹20,000 हुआ। अब आपके पास ₹10,000 बचते हैं।

सैलरी के हिसाब से खर्च का पूरा हिसाब समझें

महीने का हिसाबरकम
कुल सैलरी₹30,000
राशन और घर का खर्च₹8,000
बिजली, मोबाइल और दूसरे बिल₹3,000
आने-जाने का खर्च₹4,000
परिवार के दूसरे खर्च₹5,000
कुल खर्च₹20,000
खर्च के बाद बची रकम₹10,000

ये सिर्फ उदाहरण है। आप अपने परिवार के खर्च के हिसाब से इसमें बदलाव कर सकते हैं। जैसे कि कुछ पैसे बचाकर इमरजेंसी के लिए रख सकते हैं।

डाउन पेमेंट के लिए पैसे कैसे जुटाएं?

बैंक आमतौर पर घर की पूरी कीमत का लोन नहीं देते। घर खरीदते समय आपको भी कुछ पैसा लगाना पड़ता है। इसी को डाउन पेमेंट कहते हैं। इसके अलावा रजिस्ट्री और स्टांप ड्यूटी जैसे खर्च भी हो सकते हैं।

मान लीजिए, आपको ₹15 लाख का घर पसंद आया। बैंक ₹12 लाख का लोन देने को तैयार है। ऐसे में बाकी ₹3 लाख आपको अपनी तरफ से लगाने होंगे। रजिस्ट्री और दूसरे खर्चों के लिए अलग से पैसा भी चाहिए हो सकता है।

इसलिए घर खरीदने से पहले बचत शुरू करें। हर महीने ₹5,000 बचाने पर एक साल में ₹60,000 जमा होंगे। इसी तरह, तीन साल में ब्याज को छोड़कर ₹1.80 लाख जमा हो सकते हैं। अगर परिवार से आर्थिक मदद मिले या बोनस की रकम बचा सकें, तो डाउन पेमेंट का लक्ष्य जल्दी पूरा हो सकता है।

होम लोन लेने से पहले इन बातों का रखें ध्यान

अतुल मोंगा के मुताबिक, होम लोन लेने से पहले सबसे पहले अलग-अलग बैंकों की ब्याज दरें और प्रोसेसिंग फीस देखें। सिर्फ कम ब्याज दर देखकर लोन लेने से बचना चाहिए। लोन की अवधि और दूसरी शर्तें भी समझना जरूरी है।

कमाई और बैंकिंग रिकॉर्ड व्यवस्थित रखने से आवेदन की प्रक्रिया आसान हो सकती है। अगर भविष्य में आपकी कमाई बढ़ती है और आपके पास अतिरिक्त पैसा आता है, तो लोन की कुछ रकम पहले चुकाने पर भी विचार कर सकते हैं। इसे पार्ट-प्रीपेमेंट कहते हैं। इससे बकाया लोन और कुल ब्याज घट सकता है।

मोंगा का कहना है कि आखिरकार मकसद सिर्फ होम लोन लेना नहीं होना चाहिए। जरूरी यह है कि लोन की रकम इतनी हो, जिसकी EMI परिवार लंबे समय तक आसानी से चुका सके। इसके लिए परिवार के दूसरे जरूरी खर्चों और भविष्य के वित्तीय लक्ष्यों से समझौता नहीं करना पड़े।

हेल्थ पॉलिसी के बावजूद हॉस्पिटल का 3 लाख बिल जेब से भरना है, FD तोड़े या किसी से उधार लें?

Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी निवेश, लोन, टैक्स, बीमा या दूसरे वित्तीय फैसले लेने से पहले संबंधित एक्सपर्ट्स से सलाह जरूर लें। मनीकंट्रोल किसी भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट या सर्विस की सिफारिश नहीं करता।

1 करोड़ रुपये हैं तो FD, म्यूचुअल फंड या इक्विटी में कहां लगाएं पैसा? उम्र के हिसाब से जानिए पूरा प्लान

मान लीजिए कि कोई प्रॉपर्टी बेचने या विरासत में मिली रकम के कारण आपके बैंक खाते में 1 करोड़ रुपये आ गए हैं। इन सभी पैसों को फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) में डाल देना सबसे आसान विकल्प लग सकता है। वहीं, पूरी रकम को शेयर या म्यूचुअल फंड में लगाने से बेहतर ग्रोथ मिल सकती है, लेकिन इसमें बाजार के उतार-चढ़ाव के कारण आपकी बचत को नुकसान होने का जोखिम भी रहता है। चुनौती यह है कि इन दोनों के बीच एक सही संतुलन कैसे बनाया जाए।

इसकी शुरुआत आप अपनी उम्र को ध्यान में रखकर कर सकते हैं। 30 की उम्र वाले किसी व्यक्ति के पास नियमित सैलरी का सहारा हो सकता है, जो बाजार कमजोर होने पर काम आ सकती है। वहीं, रिटायर हो चुके व्यक्ति को अपने रोजमर्रा के खर्चों, मेडिकल बिलों और अन्य जरूरतों के लिए इसी 1 करोड़ रुपये पर निर्भर रहना पड़ सकता है। आपका निवेश प्लान इसी अंतर को ध्यान में रखकर तैयार किया जाना चाहिए।

30 की उम्र में, समय का फायदा उठाएं

अगर रिटायरमेंट में अभी भी 25 या 30 साल का समय है, तो आपके पास बाजार के उतार-चढ़ाव को संभालने के लिए काफी समय है। आप अपनी रकम का एक हिस्सा डायवर्सिफाइड इक्विटी म्यूचुअल फंड में लगा सकते हैं। इनमें लंबे समय में अच्छी ग्रोथ की संभावना तो होती है, लेकिन रिटर्न की कोई गारंटी नहीं होती।

उदाहरण के लिए, 35 साल के किसी व्यक्ति को लें, जिसे नियमित सैलरी मिलती है। अगर आने वाले समय में कोई बड़ा खर्च नहीं है, तो आप अपनी रकम को इस तरह बांट सकते हैं। 60 लाख रुपये इक्विटी फंड में, 30 लाख रुपये फिक्स्ड-इनकम निवेश (जैसे FD या बॉन्ड) में और 10 लाख रुपये ऐसी बचत में जिसे जरूरत पड़ने पर आसानी से निकाला जा सके। लेकिन, अगर आप अगले 3 सालों में घर खरीदने की योजना बना रहे हैं, तो यह बंटवारा बदल जाएगा। घर के डाउन पेमेंट के लिए जरूरी पैसों को इस बात पर निर्भर नहीं छोड़ना चाहिए कि उस समय शेयर बाजार कैसा प्रदर्शन करेगा। इसके बजाय, इस रकम को ऐसे निवेश विकल्पों में रखें जो अपेक्षाकृत स्थिर हों।

40 और 50 की उम्र में, जोखिम पर ज्यादा ध्यान दें

इस उम्र तक पहुंचते-पहुंचते, रिटायरमेंट अब कोई दूर की बात नहीं रह जाती। बच्चों की स्कूल-कॉलेज की फीस, होम लोन की किस्तें और माता-पिता की स्वास्थ्य संबंधी जरूरतें आपकी मासिक आय का एक बड़ा हिस्सा ले सकती हैं। ऐसे में अगर आपको जल्द ही पैसों की जरूरत पड़े और आपके निवेश की वैल्यू में भारी गिरावट आ जाए, तो स्थिति को संभालना मुश्किल हो सकता है। 40 के दशक के आखिर में चल रहे लोग अपनी कुल रकम का 40 से 60 प्रतिशत हिस्सा इक्विटी में लगाने पर विचार कर सकते हैं, जबकि बाकी हिस्सा फिक्स्ड-इनकम प्रोडक्ट्स और लिक्विड सेविंग्स में रखा जा सकता है। यह सिर्फ एक उदाहरण है। जिस व्यक्ति के पास पेंशन या कोई पक्की आय का साधन है, वह उस व्यक्ति की तुलना में अधिक जोखिम उठा सकता है, जिसे रिटायरमेंट के बाद मुख्य रूप से इसी पैसे पर निर्भर रहना है।

फिक्स्ड डिपॉजिट, उपयुक्त डेट फंड और सरकारी बचत योजनाओं पर विचार किया जा सकता है। किसी भी विकल्प को चुनने से पहले उस पर लगने वाले टैक्स और पैसे निकालने के नियमों को जरूर देख लें। अगर किसी जरूरी खर्च के समय आपका पैसा कहीं फंस जाए, तो बहुत अधिक रिटर्न का वादा भी किसी काम का नहीं रहता।

60 की उम्र के बाद, मासिक खर्चों के लिए योजना बनाएं

रिटायर होने वाले लोगों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह होता है कि उनका पैसा कितने समय तक चलेगा। घर के नियमित खर्च, दवाइयों का खर्च और अचानक आने वाले अस्पताल के बिल धीरे-धीरे आपकी बचत को कम कर सकते हैं। कुछ पैसा सेविंग्स अकाउंट या शॉर्ट-टर्म डिपॉजिट में रखने से तुरंत आने वाली जरूरतों को पूरा करने में मदद मिल सकती है। बाकी बची रकम को उपयुक्त फिक्स्ड-इनकम निवेशों में लगाया जा सकता है। अगर आप बाजार के जोखिम को उठा सकते हैं, तो इसमें कुछ हिस्सा इक्विटी में भी निवेश किया जा सकता है।

पूरी रकम को बिना सोचे-समझे निवेश न करें

निवेश करने से पहले, इमरजेंसी फंड के लिए कुछ पैसा अलग रख लें और महंगे कर्ज चुका दें। यह भी जांच लें कि आपका हेल्थ इंश्योरेंस पर्याप्त है या नहीं, खासकर तब जब आप रिटायरमेंट के करीब हों। साथ ही, उन खर्चों का भी ध्यान रखें जिन्हें टाला नहीं जा सकता।

साल में एक बार अपने निवेश की समीक्षा (रिव्यू) जरूर करें। अगर आपके पोर्टफोलियो का कोई एक हिस्सा बाकी हिस्सों की तुलना में बहुत तेजी से बढ़ गया है, तो आपको उसे फिर से संतुलित (रीबैलेंस) करने की जरूरत पड़ सकती है। याद रखें कि डेट प्रोडक्ट्स में भी जोखिम होता है, और टैक्स व अन्य शुल्क आपके रिटर्न को कम कर सकते हैं।

1 करोड़ रुपये की रकम आपको एक अच्छी शुरुआत दे सकती है, लेकिन यह सिर्फ इस बात पर निर्भर नहीं करता कि आपके पास कितनी रकम है, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करता है कि आपने उसे कहां निवेश किया है। अपने भविष्य के खर्चों को ध्यान में रखकर निवेश करें, न कि सिर्फ अपनी उम्र या किसी और के बताए गए रिटर्न को देखकर।

(डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सार्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

IIFL Finance Q2 Results: NBFC कंपनी का मुनाफा 103% बढ़ा, फोकस में रहेगा स्टॉक

IIFL Finance Q2 Results: NBFC कंपनी IIFL Finance ने वित्त वर्ष 2027 की सितंबर तिमाही में शानदार नतीजे पेश किए हैं। कंपनी का नेट प्रॉफिट सालाना आधार पर 103.7% बढ़कर 766.4 करोड़ रुपये हो गया। पिछले साल इसी तिमाही में कंपनी ने 376.3 करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया था।

कंपनी की नेट इंटरेस्ट इनकम (NII) भी 50.2% बढ़कर 2,161 करोड़ रुपये पहुंच गई। ये वो कमाई है, जो कर्ज पर मिलने वाले ब्याज और उधार पर चुकाए जाने वाले ब्याज के अंतर से होती है। कंपनी का कुल एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) सालाना आधार पर 38% बढ़कर 1.24 लाख करोड़ रुपये हो गया।

गोल्ड लोन कारोबार में 90% की ग्रोथ

IIFL Finance की ग्रोथ में गोल्ड लोन कारोबार की बड़ी भूमिका रही। इस सेगमेंट का AUM सालाना आधार पर 90% बढ़कर 65,729 करोड़ रुपये हो गया। पिछली तिमाही के मुकाबले इसमें 13% की बढ़ोतरी हुई। गोल्ड लोन में ग्रॉस NPA 0.90% रहा।

होम लोन का AUM पिछली तिमाही के मुकाबले 4% बढ़कर 43,070 करोड़ रुपये पहुंच गया। इस सेगमेंट में ग्रॉस NPA घटकर 1.38% रह गया। वहीं, छोटे कारोबारियों को दिए जाने वाले सिक्योर्ड MSME लोन का AUM 11% बढ़कर 11,948 करोड़ रुपये हो गया। कंपनी बिना गारंटी वाले लोन में अपना जोखिम घटा रही है।

बैड लोन की स्थिति में सुधार

सितंबर तिमाही में IIFL Finance का ग्रॉस NPA 1.5% रहा। यह पिछली तिमाही से 0.07 प्रतिशत अंक कम है। हालांकि, नेट NPA 0.05 प्रतिशत अंक बढ़कर 0.9% हो गया। कंपनी का प्रोविजन कवरेज रेशियो 91% रहा। मतलब कंपनी ने खराब कर्ज से होने वाले संभावित नुकसान के लिए पर्याप्त रकम अलग रखी है।

कंपनी की वित्तीय स्थिति भी मजबूत बनी हुई है। इसका कैपिटल एडिक्वेसी रेशियो 23.5% और लिक्विडिटी 13,805 करोड़ रुपये रही। वित्त वर्ष 2027 की पहली छमाही में कंपनी का रिटर्न ऑन इक्विटी (ROE) 20.1% रहा।

AI के इस्तेमाल पर जोर

IIFL Finance लोन की जांच, कलेक्शन और ग्राहकों से बातचीत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल बढ़ा रही है। कंपनी के मुताबिक, प्रॉपर्टी के बदले छोटे और मझोले कारोबारियों को दिए जाने वाले लोन के 85% से ज्यादा आवेदनों के क्रेडिट असेसमेंट में AI का इस्तेमाल हो रहा है।

कंपनी ने गोल्ड लोन ब्रांचों में भी AI बेस्ड फ्रॉड डिटेक्शन सिस्टम लगाया है। यह सिस्टम अब तक सोने के गहनों की 11 लाख से ज्यादा तस्वीरों का एनालिसिस कर चुका है। कंपनी बैंकिंग पार्टनरशिप बढ़ाकर भी अपना कारोबार मजबूत करना चाहती है।

शेयर में हल्की तेजी

IIFL Finance का शेयर 15 अक्टूबर को NSE पर 0.53% बढ़कर 598 रुपये पर बंद हुआ। आगे कंपनी का फोकस सिक्योर्ड लोन बढ़ाने, खराब कर्ज पर नियंत्रण रखने और बैंकों के साथ साझेदारी मजबूत करने पर रहेगा।

कंपनी इक्विटी के जरिए नया फंड जुटाने की योजना पर भी काम कर रही है। इसके लिए जुलाई 2026 में शेयरधारकों से जरूरी मंजूरी मिल चुकी है।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

PF Withdrawal: EPFO का बड़ा तोहफा: अब पीएफ खाते से निकाल सकेंगे 75% एडवांस! जानिए ये नए नियम

EPFO Partial Withdrawal Rules: कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के अंशधारकों के लिए पीएफ खाते से पैसे निकालने के नियमों को और आसान बना दिया गया है। कर्मचारी भविष्य निधि योजना के तहत, अब बीमारी, बच्चों की पढ़ाई, शादी और घर खरीदने जैसी जरूरतों के लिए पीएफ कॉर्पस से बड़ा हिस्सा निकाला जा सकता है।

नए नियमों के मुताबिक, आंशिक निकासी के समय कर्मचारियों को अपने पात्र पीएफ बैलेंस का कम से कम 25% हिस्सा खाते में बनाए रखना अनिवार्य होगा। बाकी का 75% तक पैसा संबंधित श्रेणी की शर्तों के आधार पर निकाला जा सकता है।

क्या है 25 प्रतिशत मिनिमम बैलेंस का गणित?

पीएफ खाते में 25% बैलेंस बनाए रखने का मतलब कोई तय रकम (जैसे- 25,000 या 50,000 रुपये) नहीं है, बल्कि यह आपके कुल इलिजिबल पीएफ बैलेंस पर निर्भर करता है।

जैसे अगर आपके पीएफ खाते में कुल पात्र बैलेंस ₹1 लाख है, तो ₹25,000 खाते में ही रहेंगे और आप अधिकतम ₹75,000 तक निकाल सकते हैं।

इलिजिबल बैलेंस में क्या शामिल है: इस बैलेंस में कर्मचारी का अंशदान, नियोक्ता का अंशदान और इस पर जमा हुआ ब्याज शामिल है।

नियम का उद्देश्य: EPFO ने यह 25% मिनिमम बैलेंस का प्रावधान इसलिए लागू किया है ताकि बार-बार पैसा निकालने से रिटायरमेंट के लिए जमा हो रहा कॉर्पस पूरी तरह खत्म न हो जाए।

कब निकाल सकते हैं पूरा पैसा: ध्यान दें कि यह नियम यह नहीं कहता कि बचा हुआ 25% पैसा कभी नहीं मिलेगा। नए प्रावधानों के तहत एक साल बाद विशेष परिस्थितियों में इसे भी निकाला जा सकता है। इसके अलावा, रिटायरमेंट, स्थायी विकलांगता, छंटनी, वीआरएस (VRS) या विदेश बसने जैसी स्थितियों में 100% पीएफ निकासी की अनुमति अलग से है।

आवश्यक सामाजिक जरूरतें

सेंट्रल बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज (CBT) द्वारा स्वीकृत कॉमन फ्रेमवर्क के तहत अब आंशिक निकासी के लिए न्यूनतम सेवा अवधि केवल 12 महीने कर दी गई है।

1. बीमारी

सेवा की शर्त: 12 महीने

कितनी बार निकाल सकते हैं: एक वित्तीय वर्ष में अधिकतम 3 बार

2. पढ़ाई

सेवा की शर्त: 12 महीने

कितनी बार निकाल सकते हैं: पूरी सर्विस के दौरान अधिकतम 10 बार

3. शादी

सेवा की शर्त: 12 महीने

कितनी बार निकाल सकते हैं: पूरी सर्विस के दौरान अधिकतम 5 बार

घर और होम लोन से जुड़ी जरूरतें

आवास से जुड़ी आवश्यकताओं के लिए भी पीएफ से पैसा निकालने की प्रक्रिया बेहद आसान कर दी गई है:

किन कामों के लिए मिलेगा पैसा: घर या प्लॉट/साइट खरीदने, घर का निर्माण कराने, होम लोन चुकाने और मौजूदा मकान की मरम्मत या रेनोवेशन कराने के लिए।

शर्त और सीमा: 12 महीने की कुल सदस्यता के बाद इसके लिए आवेदन किया जा सकता है। पूरी सर्विस अवधि के दौरान हाउसिंग कैटेगरी में अधिकतम 5 बार निकासी की अनुमति है।

चूंकि यह नियम घर की जरूरतों के लिए पीएफ के इस्तेमाल की छूट देता है, लेकिन रिटायरमेंट फंड का इस्तेमाल करने से भविष्य में मिलने वाले कंपाउंडिंग यानी ब्याज पर ब्याज का नुकसान भी होता है।

विशेष परिस्थितियां

तीसरी कैटेगरी ‘विशेष परिस्थितियों’ की है, जिसके दायरे को और बढ़ा दिया गया है। इसके तहत सदस्य को बिना कोई खास वजह बताए भी आंशिक निकासी के लिए आवेदन करने की छूट दी गई है। इसमें अनिवार्य मिनिमम बैलेंस (25%) और लागू फ्रीक्वेंसी को ध्यान में रखते हुए पात्र बैलेंस का इस्तेमाल किया जा सकता है।

रिटायरमेंट फंड का रखें ध्यान

नए नियम पीएफ का पैसा निकालना आसान बनाते हैं, लेकिन यह आपकी रिटायरमेंट की बचत है। यदि कोई कर्मचारी बार-बार अधिकतम सीमा तक पैसा निकालता है, तो भले ही उसकी तात्कालिक ज़रूरत पूरी हो जाए, लेकिन रिटायरमेंट के समय उसका फंड काफी छोटा रह जाएगा। इसलिए 25% का मिनिमम बैलेंस एक बेसिक बैकअप सुरक्षा कवच की तरह काम करता है।

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Gold Price Today: नवरात्र में सोना ₹1400 सस्ता हुआ, चांदी भी फिसली; जानिए आगे कैसी रहेगी चाल

Gold Price Today: सोने और चांदी की कीमतों में सोमवार को गिरावट आई। दिल्ली में सोना 1,400 रुपये सस्ता हो गया। अब 10 ग्राम सोने का भाव 1.53 लाख रुपये रह गया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कमजोरी और रुपये में मजबूती से सोने की कीमतों पर दबाव पड़ा।

ऑल इंडिया सराफा एसोसिएशन के मुताबिक, 24 कैरेट वाले सोने का भाव शुक्रवार को 1,54,400 रुपये प्रति 10 ग्राम था। सोमवार को यह घटकर 1,53,000 रुपये पर आ गया।

चांदी भी सस्ती हुई। इसकी कीमत 2,000 रुपये गिरकर 2,26,500 रुपये प्रति किलो रह गई। शुक्रवार को यह 2,28,500 रुपये प्रति किलो पर बंद हुई थी।

रुपये की मजबूती से सोने को झटका

HDFC Securities के सीनियर एनालिस्ट सौमिल गांधी ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार से कमजोर संकेत मिले। इसके अलावा, रुपये में मजबूती ने भी सोने और चांदी की कीमतों पर दबाव बढ़ाया।

सोमवार को रुपया डॉलर के मुकाबले 96 पैसे मजबूत होकर 95.75 पर बंद हुआ। छह महीने से ज्यादा समय में रुपये की यह एक दिन की सबसे बड़ी बढ़त थी। इससे पहले भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने रुपये को संभालने के लिए कई कदम उठाए थे।

गांधी के मुताबिक, घरेलू बाजार में सोने की मांग फिलहाल मिली-जुली है। कीमतें बढ़ने के बाद खरीदारी कमजोर पड़ी है। हालांकि, चीन में छुट्टियों के बाद सोने की मांग बढ़ने की उम्मीद है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी गिरा सोना

विदेशी बाजार में भी सोने की कीमत नीचे आई। हाजिर सोना 17.36 डॉलर यानी 0.41% गिरकर 4,176.88 डॉलर प्रति औंस पर आ गया। चांदी भी मामूली गिरावट के साथ 60.66 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार कर रही थी।

ब्रोकरेज प्लेटफॉर्म Lemonn के हेड ऑफ रिसर्च गौरव गर्ग ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना करीब 4,179 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार कर रहा था। कच्चे तेल की कीमतों में नरमी के बावजूद अमेरिकी डॉलर इंडेक्स 18 महीने के ऊंचे स्तर के करीब बना हुआ है। इससे सोने की कीमतों में तेजी पर दबाव पड़ रहा है।

उन्होंने बताया कि रूस से ऊर्जा की सप्लाई बढ़ने की उम्मीद से कच्चे तेल की सप्लाई को लेकर चिंता कुछ कम हुई है। हालांकि, पश्चिम एशिया में तनाव और समुद्री रास्तों पर जोखिम के कारण तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी है।

आगे कैसी रहेगी सोने की चाल?

निवेश प्लेटफॉर्म Giottus.com के CEO विक्रम सुब्बुराज के मुताबिक, फिलहाल सोने का आउटलुक चांदी के मुकाबले मजबूत दिख रहा है। वहीं, चांदी की धीमी बढ़त को देखते हुए निवेशकों को सतर्क रहने की जरूरत है।

आने वाले दिनों में बाजार की नजर अमेरिकी डॉलर, बॉन्ड यील्ड और रुपये की चाल पर रहेगी। अमेरिका के महंगाई के आंकड़े भी अहम होंगे। इनसे ब्याज दरों को लेकर संकेत मिल सकते हैं। इसके आधार पर सोने और चांदी की कीमतों में आगे की दिशा तय हो सकती है।

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2026 में त्योहारों के मौसम में घर खरीदना: खरीदार स्थिर होम लोन ब्याज दरों का बेहतर लाभ कैसे उठा सकते हैं?

Bajaj Finance Home Loan: स्थिर ब्याज दरें त्योहार के मौसम में खरीदारी की योजना बनाना आसान बना सकती हैं, लेकिन फैसला आपकी आर्थिक क्षमता के आधार पर ही होना चाहिए। बुकिंग करने से पहले अपनी ईएमआई, लोन की अवधि और कुल कर्ज लागत की जांच करें।

घर खरीदने का फैसला अक्सर एक योजना के रूप में शुरू होता है और सही समय आने पर यह एक ठोस निर्णय मेंबदल जाता है। कई परिवारों के लिए नवरात्रि ऐसा ही समय होता है, जब त्योहार की खुशी के साथ लंबे समय सेसोची जा रही घर खरीदने की योजना पर आगे बढ़ने का मन बनता है।

वित्तीय स्थिति भी फिलहाल अपेक्षाकृत स्थिर है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति ने अगस्त2026 में रेपो दर 5.25% पर बरकरार रखी, जिससे कर्ज लेने वालों को वित्तीय योजना बनाने के लिए एक स्थिर आधार मिला है। लेकिन शुभ तारीख फैसले का आधार नहीं, सिर्फ उसका एक हिस्सा होनी चाहिए। सबसे महत्वपूर्णयह है कि संपत्ति आपकी बजट सीमा में हो और उसकी मासिक किस्तें चुकाने के बाद आपके पास अन्य जरूरतों केलिए पर्याप्त पैसा बचा रहे।

स्थिर ब्याज दर का माहौल इस फैसले को आसान बना सकता है, क्योंकि इससे मासिक किस्त और कर्ज की लागतका अनुमान लगाना अधिक आसान हो जाता है। घर बुक करने से पहले यह जरूर देखें कि आपको कितना कर्ज लेनाहै, आपकी आर्थिक स्थिति के अनुसार कर्ज की कितनी अवधि सही रहेगी और कुल मिलाकर आप पर कितना वित्तीयबोझ पड़ेगा।

आपके घर की खरीदारी के लिए त्योहारी समय का क्या मतलब है?

नवरात्रि को परंपरागत रूप से बड़ी खरीदारी के लिए शुभ माना जाता है और इसका सांस्कृतिक महत्व भी है। डेवलपरऔर कर्ज देने वाली कंपनियां भी इस दौरान विशेष ऑफर ला सकती हैं। अगर आपको ऐसा कोई ऑफर मिलता है, तो सिर्फ बड़े दावे पर ध्यान देने के बजाय वास्तविक बचत देखें और अंतिम कीमत व शर्तों की तुलना सामान्य कीमतोंसे जरूर करें।

सीधी बात यह है: समय यह तय करने में मदद कर सकता है कि आप खरीदारी कब करें, लेकिन यह तय नहीं कर सकता कि आप इसे खरीदने का खर्च उठा सकते हैं या नहीं।

ब्याज दरें आपकी खरीदारी की क्षमता को कैसे प्रभावित करती हैं?

होम लोन की ब्याज दरें मासिक किस्त और लोन की पूरी अवधि में चुकाई जाने वाली कुल राशि को प्रभावित करतीहैं। ब्याज दर में मामूली अंतर, जैसे 0.25% कम दर, 20-25 वर्षों में आपकी कुल भुगतान राशि को काफी कम करसकता है।

आपकी खरीदारी के लिए वही ब्याज दर महत्वपूर्ण है, जो आपके लोन पर लागू होती है। बजाज फाइनेंस होम लोनकी ब्याज दरें 7.25%* प्रति वर्ष से शुरू होती हैं, जो आपकी प्रोफाइल और अन्य कारकों पर निर्भर करती हैं।

आपका मासिक बजट कितना खर्च संभाल सकता है?

हर महीने आप जितनी ईएमआई आसानी से चुका सकते हैं, उसके आधार पर आगे की गणना करें। ईएमआई कैलकुलेटर में तीन चीजें डालनी होती हैं: मूलधन, ब्याज दर और लोन की अवधि। इससे आपको मासिक किस्त, लोन की पूरी अवधि में चुकाई जाने वाली कुल राशि और भुगतान की पूरी योजना का अनुमान मिल सकता है।

अपनी अधिकतम पात्रता से शुरुआत करने के बजाय अलग-अलग विकल्पों को आजमाएं। कम राशि को कम अवधिमें लेने की तुलना अधिक राशि को लंबी अवधि में लेने से करें और देखें कि दोनों विकल्प आपके नकदी प्रवाह औरलोन की कुल लागत को कैसे प्रभावित करते हैं।

क्या ईएमआई को प्रबंधीय बनाए रखने के लिए आपको लंबी अवधि चुननी चाहिए?

यह फैसला आपकी मासिक किस्त और लोन की कुल लागत के बीच संतुलन पर निर्भर करता है। कम अवधि कामतलब आम तौर पर ज़्यादा किस्त होता है, लेकिन सालों-साल ब्याज कम देना पड़ता है; वहीं, लंबी अवधि सेमासिक भुगतान कम हो जाता है, लेकिन कुल ब्याज अधिक चुकाना पड़ता है।

सही अवधि आपके नकदी प्रवाह और इस बात पर निर्भर करती है कि आप अतिरिक्त कितना भुगतान कर सकते हैं।लोन की अवधि तय करने से पहले बजाज फाइनेंस की वेबसाइट पर होम लोन ईएमआई कैलकुलेटर का इस्तेमालकरके कई विकल्पों की तुलना करें।

ब्याज दर के अलावा आपको किन बातों की तुलना करनी चाहिए?

मुख्य बताई गई दर महत्वपूर्ण है, लेकिन शुल्क, लचीलापन और अन्य शर्तें कुल लागत को प्रभावित करती हैं। अगरब्याज दर फ्लोटिंग है, तो यह भी समझें कि वह किस बेंचमार्क से जुड़ी है और उसमें बदलाव होने पर आपके भुगतानपर क्या असर पड़ेगा।

क्या देखें क्या जांचें
प्रोसेसिंग शुल्कलागू शुल्क और GST की जांच करें और इसे शुरुआती लागत में शामिल करें
ब्याज दर की संरचनासमझें कि यह फ़िक्स्ड, फ़्लोटिंग या बेंचमार्क-लिंक्ड है या नहीं
दर में बदलाव की शर्तेंबेंचमार्क से जुड़े लोन के लिए, देखें कि ब्याज दर में बदलाव कब और कैसे आप परअसर डालेगा
समय से पहले भुगतान की शर्तेंलोन का कुछ हिस्सा पहले चुकाने और पूरा लोन समय से पहले चुकाने की शर्तों को जांचें
अन्य शुल्ककानूनी, तकनीकी, प्रशासनिक या अन्य संबंधित शुल्कों की जांच करें

बुकिंग करने से पहले फैसला लेने का आसान तरीका

एक बार जब आप किसी संपत्ति को चुन लेते हैं:

1. कुल खरीद लागत तय करें: कीमत, डाउन पेमेंट और उपलब्ध बचत में से सुरक्षित रूप से इस्तेमाल की जासकने वाली राशि की पुष्टि करें।

2. कर्ज की जरूरत तय करें: उपलब्ध धनराशि के बाद आपको कितने कर्ज की जरूरत है, इसका हिसाबलगाएं।

3. ईएमआई की जांच करें: ईएमआई कैलकुलेटर में अनुमानित कर्ज राशि, ब्याज दर और पसंदीदा अवधिडालें, फिर देखें कि क्या किस्त आपकी मौजूदा देनदारियों के हिसाब से ठीक है।

4. कुल लागत की तुलना करें: अलग-अलग समय-सीमा, चुकाए जाने वाले ब्याज, शुल्क और समय से पहलेभुगतान की शर्तों की तुलना करें।

जब ये सभी आंकड़े सही बैठें, तब आप तय कर सकते हैं कि त्योहार का यह समय घर खरीदने के लिए सही है यानहीं।

बजाज फाइनेंस होम लोन आपकी योजना में कैसे फिट हो सकता है?

बजाज फाइनेंस वेतनभोगी आवेदकों के लिए 15 करोड़ रुपये* तक का होम लोन उपलब्ध कराता है, जिसमें ब्याजदरें 7.25%* प्रति वर्ष से शुरू होती हैं और लोन की अवधि 32 साल* तक हो सकती है। पात्र आवेदकों को आवेदनके 48 घंटे* के भीतर मंजूरी मिल सकती है और वे तेजी से प्रोसेसिंग के लिए 5,000 से अधिक स्वीकृत प्रोजेक्ट में सेचुन सकते हैं।

क्या घर खरीदने के फ़ैसले पर त्योहारों के समय का असर पड़ना चाहिए?

यह प्रभावित कर सकता है, लेकिन वित्तीय स्थिति की जांच के बाद ही। अगर संपत्ति आपके बजट में है, डाउन पेमेंटदेने के बाद भी आपकी पर्याप्त बचत बचती है और ईएमआई आपकी मौजूदा आर्थिक जिम्मेदारियों के साथ आसानीसे संभाली जा सकती है, तो आप आगे बढ़ने के लिए तैयार हो सकते हैं। अगर ये बुनियादी बातें पूरी नहीं होती हैं, तोकोई शुभ तारीख घर खरीदना आपके लिए किफायती नहीं बना सकती।

त्योहार का मौसम शुरुआत करने का मौका हो सकता है, लेकिन फैसला लेने की वजह नहीं। प्रॉपर्टी आपके लिएसही है या नहीं, यह आपको बजट, लोन की रकम, लोन की अवधि और बचत से तय करना चाहिए।

*नियम और शर्तें लागू

Retiring at 45: जल्द रिटायरमेंट की तैयारी! नौकरी छोड़ने से पहले कर लें ये कैलकुलेशन

Retiring at 45: जल्दी रिटायर होना काफी आकर्षक लग सकता है लेकिन ऐसा फंड तैयार करना जो 30-40 वर्षों तक या उससे अधिक समय तक खर्चों को पूरा कर सके, इसके लिए सावधानीपूर्वक प्लानिंग की जरूरत होती है। मान लीजिए कि 34 साल की उम्र में आपकी हर महीने की सैलरी ₹1.5 लाख है और आप 45 साल की उम्र तक रिटायर होना चाहते हैं। ऐसे में आपके सामने पहली बड़ी चुनौती यह अनुमान लगाने की है कि भविष्य में आपके खर्च कितने होंगे, रिटायरमेंट के लिए कितने बड़े फंड की जरूरत पड़ेगी और इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए हर महीने कितना निवेश करना होगा।

Retiring at 45: ये है पूरा कैलकुलेशन

बजाज कैपिटल के ज्वाइंट चेयरमैन और एमडी संजीव बजाज का का कहना है कि 45 साल की उम्र में रिटायर होना एक बड़ा लक्ष्य है, लेकिन इसकी शुरुआत निवेश के विकल्प चुनने से नहीं, बल्कि यह समझने से होनी चाहिए कि 45 साल की उम्र में आपका खर्च कितना होगा। चूंकि आपकी उम्र 34 साल है तो आपके पास 11 साल हैं इस प्लानिंग के लिए और इन्हीं 11 साल में जिंदगी भर के लिए खर्चों का इंतजाम करना है। संजीव के मुताबिक इसमें दो चीजों का हल खोजना है- एक तो कम समय में पर्याप्त बड़ा रिटायरमेंट फंड तैयार करना और दूसरा यह सुनिश्चित करना कि वह फंड लंबे समय तक आपके खर्चों को पूरा कर सके।

एक आसान उदाहरण से समझिए इसे। मान लीजिए कि आपका हर महीने का खर्च अभी ₹60 हजार है और अगर महंगाई सालाना 6% की रफ्तार से बढ़े तो जब आप 45 साल के होंगे, तब यही खर्च बढ़कर लगभग ₹1.14 लाख प्रति माह हो सकता है। अब अगर आप रिटायरमेंट के दौरान हर साल अपने फंड का 3.5% निकालने का टारगेट रखते हैं, और महंगाई के हिसाब से निकाली जाने वाले पैसे को हर साल बढ़ाते हैं, तो 40 साल से अधिक के रिटायरमेंट के लिए आपको लगभग ₹3.9 करोड़ के फंड की जरूरत हो सकती है।

अब आता है असली गणित। 11 साल में इस ₹3.9 करोड़ के फंड को तैयार करने के लिए अगर मान लेते हैं कि निवेश की गई पूंजी पर सालाना 10% की रफ्तार से रिटर्न मिल रहा है तो आपको हर महीने लगभग ₹1.7 लाख निवेश करना होगा जोकि ₹1.5 लाख की मौजूदा इनकम से कम है। ऐसे में मौजूदा जीवनशैली और इनकम के हिसाब से 45 साल की उम्र में पूरी तरह रिटायर होना मुश्किल होगा। हालांकि इस कैलकुलेशन से आपको पता चल गया कि कहां क्या बदलाव करना है।

अगर अर्ली-रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाकर 45 साल से 50 वर्ष कर दी जाए तो हर महीने ₹1.15 लाख के निवेश में काम हो जाएगा। इसके अलावा कुछ और तरीके भी अपना सकते हैं जैसे कि रिटायरमेंट के बाद अनुमानित खर्चों को कम करना, सैलरी बढ़ने पर निवेश की रकम बढ़ाना और 45 साल की उम्र के बाद पूरी तरह काम छोड़ने के बजाय पार्ट-टाइम काम या कंसल्टिंग से कुछ कमाई जारी रखना।

कुछ सावधानी और रिस्क समझना भी जरूरी

जल्दी रिटायरमेंट की योजना बनाते समय स्वास्थ्य से जुड़े खर्चों पर खास ध्यान देना चाहिए क्योंकि आमतौर पर नौकरी छोड़ने के बाद कंपनी की तरफ से मिलने वाला हेल्थ इंश्योरेंस भी समाप्त हो जाता है। ऐसे में आपको अपनी हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी और भविष्य में मेडिकल खर्चों के लिए अलग से योजना बनानी होगी।

एक और अहम रिस्क मार्केट में बिकवाली का दबाव है। अगर रिटायरमेंट के तुरंत बाद शेयर बाजार में बड़ी गिरावट आ जाती है और आपको अपने खर्चों के लिए गिरते हुए निवेश से पैसा निकालना पड़ता है, तो आपके रिटायरमेंट फंड पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। ऐसी स्थिति से निपटने के लिए कुछ वर्षों के खर्च के बराबर पैसे कम रिस्क वाले एसेट्स में रखने चाहिए। इससे जब शेयर मार्केट में हाहाकार मचा हो, तब जल्दबाजी में पैसे निकालने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

तीन काम करें सबसे पहले

अर्ली-रिटायरमेंट के लिए तीन काम सबसे पहले करना चाहिए-

तीन महीने तक के अपने वास्तविक खर्चों का रिकॉर्ड रखें। इससे आपको पता चलेगा कि हर महीने आपकी जरूरतों पर वास्तव में कितना पैसा खर्च होता है।

म्यूचुअल फंड, शेयर, पीपीएफ और ईपीएफ समेत अपने सभी मौजूदा निवेशों की पूरी लिस्ट बनाएं।

अपने मौजूदा फंड और लक्ष्य के बीच का अंतर निकालें। इससे पता चलेगा कि आपको कितना अतिरिक्त निवेश करना होगा और अपने लक्ष्य के लिए क्या बदलाव जरूरी हैं।

एक लाख रुपये सैलरी तो दिल्ली-NCR में किराए पर रहें या होम लोन लेकर खरीदें घर? एक्सपर्ट से जानें फॉर्मूला और EMI का पूरा कैलकुलेशन

डिस्क्लेमर: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Gold Price Today: एक हफ्ते में ₹2240 ऊपर चढ़ा गोल्ड, दिल्ली से चेन्नई तक 10 शहरों में सबसे सस्ता बिक रहा यहां

Gold Rate Today in India: आज रविवार को सोने-चांदी के भाव में कोई बदलाव नहीं हुआ। इससे पहले सोने की चमक लगातार दो दिनों बढ़ी थी और इन दो दिनों में 24 कैरट की शुद्धता वाला 10 ग्राम गोल्ड ₹1850 और 22 कैरट वाला ₹1700 महंगा हआ था। एक हफ्ते में 24 कैरट गोल्ड के भाव ₹2240 और 22 कैरट के ₹2050 ऊपर चढ़े हैं। अब चांदी की बात करें तो एक दिन उछलने के बाद आज इसके भाव में कोई बदलाव नहीं हुआ है।

सिटीवाइज गोल्ड के भाव

देश के 10 बड़े शहरों में 18 कैरट, 22 कैरट और 24 कैरट शुद्धता वाले 10 ग्राम सोने की कीमत क्या है, आइए जानते हैं…

शहर  24 कैरट 10 ग्राम गोल्ड भाव  22 कैरट 10 ग्राम गोल्ड भाव 18 कैरट 10 ग्राम गोल्ड भाव 
दिल्ली ₹1,51,570 ₹1,38,950 ₹1,13,720
मुंबई  ₹1,51,420 ₹1,38,800 ₹1,13,570
कोलकाता  ₹1,51,420 ₹1,38,800 ₹1,13,570
चेन्नई ₹1,51,420 ₹1,38,800 ₹1,11,400
बेंगलुरू  ₹1,51,420 ₹1,38,800 ₹1,13,570
हैदराबाद₹1,51,420 ₹1,38,800 ₹1,13,570
लखनऊ ₹1,51,570 ₹1,38,950 ₹1,13,720
पटना₹1,51,470 ₹1,38,850 ₹1,13,620
जयपुर ₹1,51,570 ₹1,38,950 ₹1,13,720
अहमदाबाद  ₹1,51,470  ₹1,38,850 ₹1,13,620

एक दिन उछलने के बाद फिर ठहरी चांदी

चांदी की बात करें तो 1 अक्टूबर को एक किलो चांदी के भाव ₹5 हजार गिरने के बाद से लगातार आठ दिनों तक इसके भाव स्थिर रहे और फिर 10 अक्टूबर को यह ₹5 हजार चढ़ा। फिर उसके बाद आज 11 अक्टूबर को दिल्ली में एक किलो चांदी की चमक में कोई बदलाव नहीं हुआ और यह ₹2,40,000 के भाव में बिक रही है। बाकी अहम महानगरों की बात करें तो मुंबई और कोलकाता में भी यह इसी भाव पर बिक रही है। हालांकि चेन्नई में एक किलो चांदी का भाव ₹2,45,000 है यानी कि चारों बड़े महानगरों में सबसे महंगी चांदी चेन्नई में बिक रही है।

क्या कहना है एक्सपर्ट का

सोने और चांदी की देश के अंदर कीमतें डोमेस्टिक फैक्टर्स के साथ-साथ ग्लोबल फैक्टर्स से भी प्रभावित होती हैं। मिरे एसेट शेयरखान में कमोडिटी मामलों के प्रमुख प्रवीण सिंह का मानना है कि आने वाले समय में सोने की कीमत सीमित दायरे में रह सकती है और इनमें मामूली तेजी बनी रह सकती है। हालांकि उन्होंने सतर्क भी किया है कि तेल की कीमतों में अचानक तेजी आने से सोने की कीमतों पर दबाव पड़ सकता है।

एक लाख रुपये सैलरी तो दिल्ली-NCR में किराए पर रहें या होम लोन लेकर खरीदें घर?

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एक लाख रुपये सैलरी तो दिल्ली-NCR में किराए पर रहें या होम लोन लेकर खरीदें घर? एक्सपर्ट से जानें फॉर्मूला और EMI का पूरा कैलकुलेशन

दिल्ली जैसे महंगे शहर में घर खरीदना मिडिल क्लास परिवारों के लिए एक बड़ा फैसला होता है। किराया का दो रूम का घर 25,000 से 30,000 रुपये प्रति महीने के रेट से मिल जाता है। लेकिन, घर खरीदने के लिए लंबी अवधि का लोन लेना पड़ता है। सवाल है कि क्या किराए के बजाय घर खरीदना फायदेमंद है?

किराया देने से बेहतर है EMI भरना?

एक्सपर्ट आकाश जिंदल के मुताबिक, “अगर किसी व्यक्ति की इनकम स्टेबल है और वह हर महीने आसानी से होम लोन की EMI दे सकता है, तो उसे अपना घर खरीदने के बारे में सोचना चाहिए। हालांकि किराए पर रहने से EMI चुकाने का बोझ नहीं रहता है। लेकिन, घर खरीदने का फैसला सिर्फ किराए और EMI के आधार पर नहीं करना चाहिए। डाउन पेमेंट, इंटरेस्ट, प्रॉपर्टी की कीमत, मेंटेनेंस और दूसरे खर्चों को भी ध्यान में रखना ज़रूरी है।”

दिल्ली में प्रॉपर्टी खरीदने का क्या है फायदा?

जिंदल का कहना है कि दिल्ली में प्रॉपर्टी की कीमतों में काफी बढ़ोतरी हुई है। ऐसे में घर खरीदना लंबे समय में संपत्ति बनाने का एक तरीका हो सकता है। अगर कोई व्यक्ति ₹50 लाख में घर खरीदता है और भविष्य में उसकी कीमत बढ़ती है, तो उसे फायदा होता है। हालांकि, इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि प्रॉपर्टी की कीमत कितनी बढ़ेगी या कितने समय में बढ़ेगी। यह लोकेशन, हालत और मार्केट के ट्रेंड्स पर निर्भर करता है।

50 लाख का घर खरीदने के लिए कितनी होनी चाहिए सैलरी?

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, बैंक होम लोन देते समय कई बातों पर ध्यान देते हैं, जिसमें एप्लीकेंट की महीने की सैलरी, मौजूदा कर्ज़, क्रेडिट प्रोफ़ाइल और EMI चुकाने की क्षमता शामिल है। लोन एलिजिबिलिटी आम तौर पर महीने की इनकम के आधार पर तय की जाती है। अगर किसी व्यक्ति की सैलरी ₹1 लाख प्रति माह है, तो उसे ₹50 लाख तक का होम लोन मिल सकता है। लोन की रकम बैंक की शर्तों और एप्लीकेंट की फाइनेंशियल हालत के आधार पर अलग हो सकती है। डाउन पेमेंट के अलावा, घर खरीदने के लिए रजिस्ट्रेशन, स्टाम्प ड्यूटी और दूसरे खर्चों के लिए भी पैसे अलग रखने चाहिए।

घर खरीदने से पहले लीगल डॉक्युमेंट्स की जांच कितनी जरूरी?

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, होम लोन के लिए अप्लाई करते समय, बैंक प्रॉपर्टी के लीगल डॉक्यूमेंट्स को वेरिफाई करता है। इससे खरीदार को घर की लीगैलिटी और ओनरशिप के बारे में जानकारी मिल जाती है। हालांकि, बैंक के वेरिफिकेशन के बावजूद, खरीदार को प्रॉपर्टी के डॉक्यूमेंट्स का इंडिपेंडेंट लीगल वेरिफिकेशन भी करवाना चाहिए।

(दिल्ली से शुभांगी तिवारी की रिपोर्ट)