₹89600 का भारी नुकसान! 30 की बजाय 45 की उम्र में SIP शुरू की तो लगेगा 546% का झटका, यूं डूबेगा ₹5 करोड़ का सपना

Investment Tips: जब बात वेल्थ क्रिएशन यानी अमीर बनने की आती है, तो पर्सनल फाइनेंस का एक सीधा और अचूक नियम काम करता है। आप हर महीने कितनी बड़ी रकम निवेश कर रहे हैं, उससे कहीं ज्यादा मायने यह रखता है कि आप कितने लंबे समय तक निवेशित रहते हैं।

अक्सर युवा यह सोचकर निवेश टालते रहते हैं कि जब हाथ में बड़ी सैलरी आएगी या जब वे फाइनेंशियली पूरी तरह सेटल हो जाएंगे, तब शुरुआत करेंगे। लेकिन एक्सपर्ट्स कड़े शब्दों में आगाह करते हैं कि शुरुआत में की गई यह छोटी सी देरी भी आपके लॉन्ग-टर्म गोल्स पर बहुत भारी पड़ सकती है। सीधे शब्दों में कहें तो कंपाउंडिंग की ताकत का पूरा फायदा उठाने के लिए आपका जल्द से जल्द शुरुआत करना बेहद जरूरी है।

अगर आपका लक्ष्य 60 साल की उम्र तक ₹5 करोड़ का बड़ा फंड तैयार करना है, तो 30 साल की उम्र और 45 साल की उम्र में निवेश शुरू करने के बीच का अंतर आपको चौंका देगा।

उम्र 30 बनाम 45: रिटर्न पर 546% का आ जाएगा अंतर

अगर आप 60 साल की उम्र में ₹5 करोड़ का फंड चाहते हैं, तो उम्र के हिसाब से आपका गणित कुछ ऐसा होगा:

30 साल की उम्र में शुरुआत: अगर आप 30 साल की उम्र से निवेश शुरू करते हैं, तो आपको हर महीने केवल ₹16400 रुपये की SIP करनी होगी।

45 साल की उम्र में शुरुआत: अगर आप यही फैसला टालते रहते हैं और 45 साल की उम्र में शुरुआत करते हैं, तो उसी ₹5 करोड़ के लक्ष्य के लिए आपको हर महीने ₹1.06 लाख की SIP करनी होगी।

यानी सिर्फ 15 साल की देरी करने की वजह से आपको हर महीने ₹89600 रुपये ज्यादा जेब से निकालने होंगे। यह आपके मंथली कमिटमेंट में सीधे 546 फीसदी यानी करीब 6.5 गुना का बड़ा उछाल है।

30 साल के युवाओं के लिए सही एसेट एलोकेशन स्ट्रेटेजी

एक्सपर्ट्स के अनुसार, 30 साल के निवेशक को रिटर्न के पीछे भागने से पहले अपनी फाइनेंशियल नींव मजबूत करनी चाहिए। इसके लिए तीन कदम जरूरी हैं:

इमरजेंसी फंड: सबसे पहले कम से कम 6 से 12 महीने के खर्च के बराबर इमरजेंसी फंड बनाएं।

इंश्योरेंस: पर्याप्त टर्म इंश्योरेंस और हेल्थ इंश्योरेंस जरूर लें।

लॉन्ग टर्म SIP: ये बेसिक्स पूरे होने के बाद ही रिटायरमेंट के लिए लंबी अवधि की SIP शुरू करें।

चूंकि रिटायरमेंट में 30 साल का लंबा वक्त है, इसलिए शुरुआती सालों में इक्विटी को मुख्य ग्रोथ एसेट बनाना चाहिए। वहीं स्थिरता के लिए डेट फंड, प्रोविडेंट फंड (EPF/PPF), एनपीएस और गोल्ड का सहारा लिया जा सकता है। जैसे-जैसे आप रिटायरमेंट के करीब पहुंचें, पोर्टफोलियो को वेल्थ क्रिएशन से शिफ्ट करके कैपिटल प्रोटेक्शन की तरफ ले जाना चाहिए।

रिटायरमेंट गोल्स के लिए इक्विटी क्यों है बेहद जरूरी?

लॉन्ग टर्म रिटायरमेंट गोल्स के लिए फिक्स्ड इनकम प्रोडक्ट्स अकेले टैक्स के बाद महंगाई को मात नहीं दे पाते। इसलिए इक्विटी का रोल बहुत अहम हो जाता है। हालांकि, इक्विटी को शॉर्ट-टर्म प्रोडक्ट नहीं समझना चाहिए। 30 साल के निवेशक को हर 6 महीने या 1 साल में इक्विटी के प्रदर्शन को जज नहीं करना चाहिए, बल्कि एक डायवर्सिफाइड पोर्टफोलियो बनाकर समय-समय पर उसका रिव्यू करना चाहिए।

युवा निवेशक भूलकर भी न करें ये 4 गलतियां

मार्केट करेक्शन में SIP रोकना: कई युवा मार्केट में गिरावट आते ही डरकर अपनी SIP रोक देते हैं। यह लॉन्ग-टर्म इन्वेस्टिंग के पूरे मकसद को खत्म कर देता है। मार्केट करेक्शन तो आपको सस्ते में ज्यादा म्यूचुअल फंड यूनिट्स बटोरने का मौका देता है।

लाइफस्टाइल इन्फ्लेशन: सैलरी बढ़ने के साथ अगर आप अपनी SIP नहीं बढ़ाते, तो आप एक बड़ा मौका खो रहे हैं। इसका आसान समाधान है 10% की एनुअल स्टेप-अप SIP अपनाएं, जिससे हर साल आपकी निवेश राशि अपने आप बढ़ती रहे।

शॉर्ट-टर्म खर्चों के लिए फंड निकालना: लोग गैजेट्स खरीदने, गाड़ी अपग्रेड करने या वेकेशन पर जाने के लिए अपने रिटायरमेंट फंड को बीच में ही निकाल लेते हैं। यह गलती कभी न करें।

‘बाय एंड फॉर्गेट’ की मानसिकता: निवेश करके भूल जाना सही रणनीति नहीं है। एसेट एलोकेशन, टैक्स एफिशिएंसी और परफॉर्मेंस कंसिस्टेंसी के लिए पोर्टफोलियो का पीरियोडिक रिव्यू बेहद जरूरी है।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Personal Loan: सैलरी वालों को आसानी से मिलता है पर्सनल लोन, लेकिन इन 5 बातों नजरअंदाज करना पड़ेगा महंगा

Personal Loan: भारत में डिजिटल पर्सनल लोन का चलन तेजी से बढ़ा है। खासकर, सैलरी को देखकर मिलने वाला पर्सनल लोन। पारंपरिक लोन के मुकाबले इसमें कम कागजी काम होती है। लोन देने वाली कंपनियां आपकी सैलरी, नौकरी की स्थिरता, क्रेडिट स्कोर, पुराने लोन चुकाने का रिकॉर्ड और बैंकिंग पैटर्न देखकर तय करती हैं कि आपको कितना लोन दिया जा सकता है।

इस वजह से लोन जल्दी मंजूर हो जाता है और कम समय में पैसा मिल सकता है। लोग इन लोन का इस्तेमाल मेडिकल इमरजेंसी, शादी-ब्याह, बच्चों की पढ़ाई, पुराने कर्ज चुकाने या कई महंगे लोन को एक जगह जोड़ने के लिए करते हैं।

हालांकि, आसान से मिलने का मतलब यह नहीं है कि बिना सोचे-समझे लोन ले लिया जाए। कुछ गलतियां आपको बाद में परेशानी में डाल सकती हैं।

सैलरी वाले पर्सनल लोन में क्या जोखिम हैं?

ऐसे लोन में कई बार सिर्फ ब्याज ही नहीं, बल्कि प्रोसेसिंग फीस और दूसरे चार्ज भी जुड़ जाते हैं। इससे लोन की कुल लागत बढ़ सकती है। आसान मंजूरी मिलने की वजह से कुछ लोग जरूरत से ज्यादा रकम उधार ले लेते हैं। इससे बाद में EMI का बोझ बढ़ जाता है।

इसके अलावा अगर आप लंबी अवधि का लोन चुनते हैं, तो मंथली EMI कम जरूर हो सकती है, लेकिन कुल ब्याज ज्यादा देना पड़ सकता है। समय पर EMI नहीं चुकाने पर क्रेडिट स्कोर खराब हो सकता है। इसका असर भविष्य में होम लोन, कार लोन या क्रेडिट कार्ड मिलने पर भी पड़ सकता है।

समझदारी से लोन लेने के 5 तरीके

1. सिर्फ जरूरत भर का लोन लें

कई बार लोग जितना लोन मिल सकता है, उतना ले लेते हैं। लेकिन सही तरीका यह है कि सिर्फ उतनी ही रकम लें, जिसकी वास्तव में जरूरत हो।

ज्यादा लोन का मतलब ज्यादा EMI और ज्यादा ब्याज है। इसलिए पहले जरूरत का सही आकलन करें और फिर लोन लें।

2. EMI चुकाने की क्षमता जरूर देखें

लोन लेना आसान है, लेकिन हर महीने EMI भरना उतना आसान नहीं होता।

नया लोन लेने से पहले यह जरूर देखें कि आपकी सैलरी का कितना हिस्सा EMI में जाएगा। अगर पहले से कोई लोन चल रहा है, तो उसका भी ध्यान रखें। ऐसी EMI चुनें जिसे आप आराम से चुका सकें।

3. अलग-अलग बैंकों की तुलना करें

लोन लेने से पहले सिर्फ ब्याज दर ही नहीं, बल्कि प्रोसेसिंग फीस, दूसरे चार्ज और लोन की शर्तों की भी तुलना करें।

कई बार कम ब्याज वाला लोन दूसरे चार्ज की वजह से महंगा पड़ सकता है। इसलिए पूरी लागत समझने के बाद ही फैसला लें।

4. अच्छा क्रेडिट स्कोर बनाए रखें

क्रेडिट स्कोर जितना अच्छा होगा, भविष्य में उतनी ही आसानी से लोन मिल सकता है। 750 या उससे ज्यादा का क्रेडिट स्कोर आमतौर पर अच्छा माना जाता है।

इसके लिए EMI और क्रेडिट कार्ड बिल हमेशा समय पर चुकाएं। लोन या कार्ड पेमेंट में देरी करने से क्रेडिट स्कोर पर नेगेटिव असर पड़ता है।

5. लोन का इस्तेमाल सही काम में करें

लोन की रकम का इस्तेमाल सोच-समझकर करें। महंगे गैजेट, लग्जरी शॉपिंग या गैर-जरूरी खर्चों के लिए बार-बार लोन लेना सही नहीं माना जाता।

कोशिश करें कि लोन का इस्तेमाल किसी जरूरी जरूरत, इमरजेंसी या ऐसे काम में हो जो आपकी वित्तीय स्थिति को बेहतर बनाने में मदद करे।

लोन लेते समय जल्दबाजी न करें

सैलरी पर मिलने वाला पर्सनल लोन जरूरत के समय काफी मददगार साबित हो सकता है। लेकिन लोन लेने से पहले उसकी लागत, EMI, ब्याज और अपनी चुकाने की क्षमता को अच्छी तरह समझ लेना जरूरी है।

अगर सही योजना और अनुशासन के साथ लोन लिया जाए, तो यह आपके वित्तीय लक्ष्यों को पूरा करने में मदद कर सकता है। वहीं बिना योजना के लिया गया लोन लंबे समय तक आर्थिक दबाव बढ़ा सकता है।

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