How to Buy Home: ₹30000 की सैलरी में भी खरीद सकते हैं अपना घर, समझिए कैसे बनाएं पूरा प्लान

How to Buy Home: अपना घर खरीदने का सपना हर कोई देखता है। लेकिन महीने की सैलरी ₹30,000 के आसपास हो, तो लगता है कि आज के जमाने में घर खरीदना शायद मुमकिन नहीं है। किराया, राशन, बिजली का बिल और बच्चों की फीस देने के बाद बचता ही कितना है? ऐसे में होम लोन की EMI चुकाना बड़ी जिम्मेदारी लगती है।

हालांकि, कम सैलरी में भी घर खरीदा जा सकता है। इसके लिए जरूरी है कि आप अपनी कमाई के हिसाब से घर चुनें। बड़ा लोन लेने के बजाय ऐसी EMI रखें, जिसे हर महीने आसानी से चुका सकें। आइए, उदाहरण से समझते हैं कि ₹30,000 की सैलरी में घर खरीदने का प्लान कैसे बना सकते हैं।

₹30,000 की सैलरी पर कितना होम लोन लें?

BASIC Home Loan के CEO और को-फाउंडर अतुल मोंगा का कहना है कि अगर आप ₹10 लाख का होम लोन लेते हैं, तो ब्याज दर और लोन की अवधि के हिसाब से EMI करीब ₹10,000 हो सकती है। मोंगा के मुताबिक, अगर आपकी सैलरी ₹30,000 है, तो घर खरीदना सिर्फ कमाई पर निर्भर नहीं करता। ये भी जरूरी है कि आप घर खरीदने की कितनी अच्छी तैयारी करते हैं। घर

इसे एक उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए कि आपकी सैलरी ₹30,000 है। इसमें से ₹8,000 घर और किराने, ₹3,000 बिजली और दूसरे बिलों, ₹4,000 आने-जाने और ₹5,000 परिवार के अन्य खर्चों में जाते हैं। इस तरह कुल खर्च ₹20,000 हुआ। अब आपके पास ₹10,000 बचते हैं।

सैलरी के हिसाब से खर्च का पूरा हिसाब समझें

महीने का हिसाबरकम
कुल सैलरी₹30,000
राशन और घर का खर्च₹8,000
बिजली, मोबाइल और दूसरे बिल₹3,000
आने-जाने का खर्च₹4,000
परिवार के दूसरे खर्च₹5,000
कुल खर्च₹20,000
खर्च के बाद बची रकम₹10,000

ये सिर्फ उदाहरण है। आप अपने परिवार के खर्च के हिसाब से इसमें बदलाव कर सकते हैं। जैसे कि कुछ पैसे बचाकर इमरजेंसी के लिए रख सकते हैं।

डाउन पेमेंट के लिए पैसे कैसे जुटाएं?

बैंक आमतौर पर घर की पूरी कीमत का लोन नहीं देते। घर खरीदते समय आपको भी कुछ पैसा लगाना पड़ता है। इसी को डाउन पेमेंट कहते हैं। इसके अलावा रजिस्ट्री और स्टांप ड्यूटी जैसे खर्च भी हो सकते हैं।

मान लीजिए, आपको ₹15 लाख का घर पसंद आया। बैंक ₹12 लाख का लोन देने को तैयार है। ऐसे में बाकी ₹3 लाख आपको अपनी तरफ से लगाने होंगे। रजिस्ट्री और दूसरे खर्चों के लिए अलग से पैसा भी चाहिए हो सकता है।

इसलिए घर खरीदने से पहले बचत शुरू करें। हर महीने ₹5,000 बचाने पर एक साल में ₹60,000 जमा होंगे। इसी तरह, तीन साल में ब्याज को छोड़कर ₹1.80 लाख जमा हो सकते हैं। अगर परिवार से आर्थिक मदद मिले या बोनस की रकम बचा सकें, तो डाउन पेमेंट का लक्ष्य जल्दी पूरा हो सकता है।

होम लोन लेने से पहले इन बातों का रखें ध्यान

अतुल मोंगा के मुताबिक, होम लोन लेने से पहले सबसे पहले अलग-अलग बैंकों की ब्याज दरें और प्रोसेसिंग फीस देखें। सिर्फ कम ब्याज दर देखकर लोन लेने से बचना चाहिए। लोन की अवधि और दूसरी शर्तें भी समझना जरूरी है।

कमाई और बैंकिंग रिकॉर्ड व्यवस्थित रखने से आवेदन की प्रक्रिया आसान हो सकती है। अगर भविष्य में आपकी कमाई बढ़ती है और आपके पास अतिरिक्त पैसा आता है, तो लोन की कुछ रकम पहले चुकाने पर भी विचार कर सकते हैं। इसे पार्ट-प्रीपेमेंट कहते हैं। इससे बकाया लोन और कुल ब्याज घट सकता है।

मोंगा का कहना है कि आखिरकार मकसद सिर्फ होम लोन लेना नहीं होना चाहिए। जरूरी यह है कि लोन की रकम इतनी हो, जिसकी EMI परिवार लंबे समय तक आसानी से चुका सके। इसके लिए परिवार के दूसरे जरूरी खर्चों और भविष्य के वित्तीय लक्ष्यों से समझौता नहीं करना पड़े।

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Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी निवेश, लोन, टैक्स, बीमा या दूसरे वित्तीय फैसले लेने से पहले संबंधित एक्सपर्ट्स से सलाह जरूर लें। मनीकंट्रोल किसी भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट या सर्विस की सिफारिश नहीं करता।

₹12 लाख का सोलर पैनल और सिर्फ 2 घंटे का बैकअप ! नोएडा के इस कंज्यूमर को अब इंट्रेस्ट समेत वापस मिलेंगे पूरे पैसे

बिजली का बिल कम करने के लिए सोलर सिस्टम लगवाना नोएडा के कृष्ण यादव को काफी महंगा पड़ गया। करीब 12 लाख रुपये का सोलर सिस्टम लगवाने के बाद उन्हें उम्मीद थी कि इससे बिजली की जरूरत काफी हद तक पूरी हो जाएगी, लेकिन सिस्टम शुरू से ही ठीक से काम नहीं कर पाया। शुरुआत में करीब दो घंटे का बैकअप मिला और बाद में यह समय घटकर करीब एक घंटे रह गया। बार-बार शिकायत करने और इंजीनियर से जांच कराने के बाद भी समस्या दूर नहीं हुई। आखिरकार कृष्ण यादव ने जिला उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया, जहां सुनवाई के बाद आयोग ने कंपनी को पूरी रकम ब्याज समेत वापस करने का आदेश दिया।

करीब 12 लाख रुपये में खरीदा था सोलर सिस्टम

नोएडा के सेक्टर-91 स्थित ग्राम होशियारपुर निवासी कृष्ण यादव ने एआरएस इंटरप्राइजेज से स्मार्टन सोलर सिस्टम 15 केवीए खरीदने और लगवाने का अनुबंध किया था। कंपनी की ओर से दिए गए कोटेशन के आधार पर उन्होंने चॉइस फिनसर्व प्राइवेट लिमिटेड से 7 लाख 80 हजार रुपये का लोन कराया। इसके अलावा उन्होंने 4 लाख 20 हजार 600 रुपये नकद कंपनी को दिए। इस तरह सोलर सिस्टम के लिए कुल 12 लाख 600 रुपये का भुगतान किया गया। सिस्टम लगवाने के बाद जब इसका इस्तेमाल शुरू हुआ तो यह उम्मीद के मुताबिक काम नहीं कर पाया।

शुरू से ही नहीं मिला सही बैकअप

कृष्ण यादव के मुताबिक, घर पर सिस्टम लगने के बाद से ही इसमें परेशानी आने लगी थी। सिस्टम करीब दो घंटे का बैकअप देने के बाद बंद हो जाता था। उन्होंने इस समस्या की जानकारी कंपनी को दी, जिसके बाद कंपनी ने सर्विस इंजीनियर मनीष कुमार को जांच के लिए भेजा। इंजीनियर ने सिस्टम की गुणवत्ता में कमी की बात कही और उसे ठीक करने की कोशिश की। मरम्मत के बाद भी समस्या खत्म नहीं हुई और सिस्टम करीब एक घंटे का ही बैकअप दे पाया। इसके बाद वह फिर बंद हो गया। इससे साफ था कि केवल मरम्मत करने से भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो रहा था।

बार-बार शिकायत के बाद भी नहीं मिली मदद

मरम्मत के बाद दोबारा समस्या आने पर कृष्ण यादव ने डीलर से संपर्क किया, लेकिन उन्हें संतोषजनक समाधान नहीं मिला। इसके बाद उन्होंने स्मार्टन पावर सिस्टम्स की कस्टमर केयर सर्विस से भी शिकायत की। उनका कहना था कि कंपनी से संपर्क करने और समस्या बताने के बावजूद सोलर सिस्टम ठीक नहीं हुआ। जब लगातार शिकायतों के बाद भी कोई समाधान नहीं निकला तो उन्होंने 11 मई 2025 को जिला उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कराई। उनका आरोप था कि उन्हें खराब या घटिया गुणवत्ता वाला पावर यूनिट दिया गया, जो खरीदने के बाद से ही सही तरीके से काम नहीं कर रहा था।

कंपनी ने नहीं रखा अपना पक्ष 

मामले की सुनवाई के दौरान कंपनी की ओर से कोई जवाब या काउंटर-क्लेम पेश नहीं किया गया। इसके बाद आयोग ने 10 अप्रैल 2026 को मामले में एकतरफा यानी ex-parte कार्यवाही जारी रखने का फैसला किया। आयोग ने शिकायतकर्ता की ओर से पेश किए गए दस्तावेज और लिखित बयान देखे। दूसरी तरफ से आरोपों को गलत साबित करने के लिए कोई सबूत पेश नहीं किया गया। आयोग ने माना कि शिकायत के बावजूद सोलर सिस्टम की समस्या का सही समाधान नहीं किया गया, जो सेवा में कमी के दायरे में आता है। इसके बाद 15 सितंबर को आयोग ने कंपनी को 30 दिनों के भीतर सिस्टम के लिए दी गई पूरी रकम 6 प्रतिशत ब्याज के साथ लौटाने का आदेश दिया। इसके अलावा कानूनी खर्च के तौर पर 5 हजार रुपये देने को भी कहा गया। रकम वापस मिलने के बाद कंपनी अपना सोलर सिस्टम वापस ले सकती है।

इस मामले से पता चलता है कि कोई महंगा घरेलू उपकरण या सोलर सिस्टम खरीदने के बाद अगर वह उम्मीद के मुताबिक काम नहीं करता और कंपनी शिकायत के बाद भी समस्या दूर नहीं करती, तो उपभोक्ता कानूनी मदद ले सकता है। ऐसे मामलों में खरीद से जुड़े बिल, भुगतान के कागज, लोन की जानकारी, शिकायत और सर्विस से जुड़े दस्तावेज संभालकर रखना भी काफी जरूरी होता है।

सरकार सीधे टैक्स मंत्रालय ही बना ले!

अब समय आ गया है कि वित्त, वाणिज्य, उद्योग आदि से अलग सरकार एक टैक्स का मंत्रालय बनाए। यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस यानी यूपीआई के जरिए होने वाले भुगतान पर शुल्क लगाने की सरकार की घोषणा के बाद यह आवश्यकता ज्यादा अनिवार्य रूप से प्रकट हुई है। सरकार इसे शुल्क कह रही है लेकिन असल में यह टैक्स ही है, जिसका भुगतान किसी न किसी रूप में आम नागरिक को करना है। सोचें, कितना दूरदर्शी था वह व्यक्ति, जिसने कहा था कि दुनिया में दो ही चीजें सत्य हैः एक मृत्यु और दूसरा टैक्स। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने इस वाक्य को अमर कर दिया है। टैक्स ही अंतिम सत्य है। अब कोई चीज ऐसी नहीं बची है, जिस पर टैक्स नहीं है।

सरकार कहती है कि उसने एक देश, एक टैक्स का नियम यानी जीएसटी लागू कर दिया है लेकिन वास्तविकता यह है कि देश के हर नागरिक को अब भी दर्जनों टैक्स देने होते हैं। चाहे वह आयकर के रूप में हो, जीएसटी के रूप में हो, वैट के रूप में, सेस या सरचार्ज के रूप में हो या टोल के रूप में हो या किसी सेवा शुल्क के रूप में हो।

सोचें, सरकार ने यूपीआई को एक तकनीकी मार्बल के रूप में कितना प्रचारित किया था! इसे भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि के तौर पर रेखांकित किया गया और इसे शुल्क मुक्त रखने का ऐलान भी किया गया। लेकिन सरकार ने अब इस पर भी शुल्क लगा दिया है। इसके लिए आंकड़ों को जिस तरह से तोड़ा मरोड़ा गया है वह अभूतपूर्व है। कहा गया कि यूपीआई से होने वाला 96 फीसदी लेनदेन दो हजार रुपए से कम का होता है, जिस पर सरकार कोई शुल्क नहीं लगा रही है। सिर्फ चार फीसदी लेनदेन पर शुल्क लगेगा, वह भी सिर्फ 0.40 फीसदी होगा और उसकी भी अथिकतम सीमा तीन सौ रुपए होगी।

हालांकि वास्तविकता यह है कि चार फीसदी लेनदेन का मूल्य 66 फीसदी है। जो 96 फीसदी लेनदेन होता है उसका मूल्य केवल 34 फीसदी है। कुल 314 लाख करोड़ रुपए के ट्रांजेक्शन में 207 लाख करोड़ का लेनदेन चार फीसदी ट्रांजेक्शन से हुआ है। इस रकम के ऊपर शुल्क या टैक्स लगाया जाएगा।

सवाल है कि चार फीसदी ट्रांजेक्शन पर 0.40 फीसदी की दर से और तीन सौ रुपए की अधिकतम सीमा लगा कर भी शुल्क क्यों लगाना है? इसकी जरुरत बताते हुए सवाल उठाया जा रहा है कि कोई भी सेवा कितने समय तक मुफ्त में दी जा सकती है? कहा जा रहा है कि इसके रखरखाव पर और साइबर सुरक्षा सुनिश्चित करने पर खर्च होता है। इसलिए ज्यादा समय तक मुफ्त में सेवा नहीं दी जा सकती है। सवाल है कि क्या यूपीआई की सेवा मुफ्त है? ऐसा नहीं है। यूपीआई का संचालन करने वाली संस्था नेशनल पेमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया यीनी एनपीसीआई मुनाफा कमाने वाली संस्था है।

उसे यूपीआई के संचालन में घाटा नहीं होता है। उसे कई तरह की डिजिटल भुगतान सेवाओं के लिए बैंकों, एप्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से पैसा मिलता है। लेकिन चूंकि एनपीसीआई एक गैर लाभकारी संस्था यानी नॉन प्रॉफिट ऑर्गेनाइजेशन के तौर पर बनी है इसलिए उसकी कमाई को मुनाफा नहीं, बल्कि सरप्लस कहा जाता है। सिर्फ यूपीआई को लें तो एनपीसीआई का खर्च तीन हजार करोड़ रुपए से कुछ कम है और उसकी कमाई इससे ज्यादा है। पिछले साल तो उसने अपनी कमाई पर केंद्र सरकार को एक हजार करोड़ रुपए का टैक्स दिया है। अगर पूरी डिजिटल बैंकिंग को शामिल करें तो खर्च 20 हजार करोड़ रुपए के करीब होता है। लेकिन बैंकों को होने वाली कमाई के मुकाबले यह रकम कुछ भी नहीं है।

देश के सभी बैंकों की एक वित्तीय वर्ष की साझा कमाई लगभग 4.11 लाख करोड़ रुपए है। रिजर्व बैंक की कमाई का आंकड़ा कितना बड़ा है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि रिजर्व बैंक ने इस साल अपनी कमाई से केंद्र सरकार को जो लाभांश दिया है वह 2.87 लाख करोड़ रुपए का है। इस प्रत्यक्ष कमाई के अलावा इकोनॉमी के ऑर्गेनाइज्ड होने से ज्यादा लेनदेन आधिकारिक रूप से हो रहा है, जिस पर सरकार को टैक्स मिल रहा है। नकद लेनदेन में बहुत पैसा काले धन की अर्थव्यवस्था में चला जाता था। तभी सवाल है कि जब लाखों करोड़ रुपए की कमाई बैंकों को है और टैक्स की कमाई सरकार को है तो फिर डिजिटल बैंकिंग पर होने वाले खर्च के लिए अलग से नागरिकों से पैसा वसूलने की क्या तुक है?

सरकार कह रही है कि चार फीसदी ट्रांजेक्शन पर जो 0.40 फीसदी शुल्क है वह भी जनता को नहीं देना है, बल्कि व्यापारी देगा। सोचें, कभी ऐसा हुआ है कि सरकार किसी उत्पाद या सेवा पर शुल्क लगाए तो उसका भुगतान व्यापारी करे? व्यापारी हर शुल्क ग्राहक से ही वसूलता है। चाहे वह सरचार्ज लगा कर वसूले या वस्तु व सेवा की कीमत बढ़ा कर वसूले। अंततः भुगतान जनता को ही करना होता है। सो, यह जनता के ऊपर एक नया टैक्स है। असल में सरकार को हर उत्पाद और हर सेवा पर टैक्स वसूलना है। उसे लग रहा है कि हर देश में औसतन 24 हजार करोड़ ट्रांजेक्शन हो रहे हैं और भारत की पूरी जीडीपी से थोड़ा ही कम ट्रांजेक्शन यूपीआई के जरिए हो रहा है तो इसका मतलब है कि लोगों के पास पैसे हैं इसलिए लोगों से टैक्स वसूला जाए। ध्यान रहे भारत की जीडीपी 360 लाख करोड़ रुपए के करीब है और यूपीआई का सालाना ट्रांजेक्शन 314 लाख करोड़ है।

यूपीआई के ट्रांजेक्शन पर शुल्क लगाना व्यापक रूप से भारत सरकार के जन विरोधी रुख को दिखाता है और साथ ही यह भी दिखाता है कि उसके पास राजस्व बढ़ाने का टैक्स लगाने के सिवा और कोई रास्ता नहीं है। सरकार कोई और उपाय नहीं कर पा रही है। बाहर से निवेश नहीं आ रहा है। सारे प्रयास के बावजूद विनिर्माण सेक्टर मजबूत नहीं हो रहा है। निर्यात का इकोसिस्टम बहुत कमजोर है और दुनिया के ज्यादातर देशों के साथ भारत का व्यापार घाटा है। अकेले चीन और रूस को मिला कर करीब 15 लाख करोड़ रुपए का व्यापार घाटा है। तभी घूम फिर कर सरकार टैक्स लगा देती है। एक व्यक्ति को कई कई बार टैक्स देना पड़ता है। आय़कर चुकाने के बाद की आमदनी से कुछ भी खरीदने पर कई तरह के टैक्स देने होते हैं। किसी भी उत्पाद या सेवा को लें तो दिखाई देगा कि एक सेवा या एक उत्पाद पर कितने टैक्स देने होते हैं।

मिसाल के तौर पर कोई व्यक्ति गाड़ी खरीदता है तो उसे जीएसटी, रोड टैक्स, रजिस्ट्रेशन शुल्क, पेट्रोल या डीजल का शुल्क, रोड इंफ्रास्ट्रक्टर सेस और फिर टोल टैक्स देना होगा। ऐसे ही किसी व्यक्ति के बिजली का बिल देखें तो पता चलेगा कि जितना एनर्जी चार्ज है लगभग उतना ही टैक्स है। वह टैक्स कई तरह का होगा। एनर्जी चार्ज पर तो जीएसटी देना ही है उसके अलावा मीटर का फिक्स्ड चार्ज और पावर परचेज एग्रीमेंट का चार्ज और इन दोनों पर जीएसटी अलग है। किसी भी उत्पाद या सेवा के बिल में इस तरह टैक्स की मौजूदगी को देखा जा सकता है। तभी सरकार को गंभीरता से इस पर विचार करना चाहिए कि जब सब कुछ टैक्स ही है तो एक टैक्स मंत्रालय बना दिया जाए और वहां ऐसा मंत्री नियुक्त किया जाए, जो खुर्दबीन लेकर यह खोजे कि कहां कहां अभी तक टैक्स नहीं लगा है और वहां टैक्स लगाए।

सहारनपुर में मस्जिद ध्वस्तीकरण पर बवाल, इकरा हसन का बड़ा आरोप- ‘संविधान का गला घोंटा जा रहा’, अब कोर्ट जाएंगी

सहारनपुर में मस्जिद ध्वस्तीकरण पर बवाल, इकरा हसन का बड़ा आरोप- 'संविधान का गला घोंटा जा रहा', अब कोर्ट जाएंगी

सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर स्थित मस्जिद के ध्वस्तीकरण को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है। कैराना से समाजवादी पार्टी की सांसद इकरा हसन ने प्रशासन की कार्रवाई पर तीखा हमला बोलते हुए इसे संविधान और कानून के खिलाफ बताया है। सांसद ने कहा कि इस मामले को लेकर वह न्यायालय का दरवाजा खटखटाएंगी।

 

इकरा हसन ने आरोप लगाया कि मस्जिद के मामले में सभी संबंधित लोगों को दरकिनार करते हुए बुलडोजर की कार्रवाई की गई। उन्होंने कहा कि यह मस्जिद वर्ष 1947 से पहले से बनी हुई थी और इतने पुराने धार्मिक स्थल को बिना सभी पक्षों की बात सुने ढहा दिया गया।

 

सांसद ने कहा हमें तानाशाही के तहत हाउस अरेस्ट किया गया है। हमारे संविधान का गला घोंटा जा रहा है। इस मामले में कोई मोहलत नहीं दी गई, जबकि टेररिस्ट को मोहलत दी जा रही है। उन्होंने आगे कहा कि देश में नियम-कानून की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। इकरा हसन ने कहा, संविधान का गला घोंटा जा रहा है और नियम-कानून की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। इस मामले को लेकर हम लोग कोर्ट जाएंगे।

 

 

सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए दावा किया कि जिस जमीन पर मस्जिद बनी है, वह गाटा संख्या 539 है और यह जमीन वालिद खां तथा याकूब खां के नाम पर थी। उनके मुताबिक, इन लोगों ने यह जमीन कलेक्ट्रेट, कोषागार और तहसील के निर्माण के लिए दान की थी।

 

इमरान मसूद ने यह भी दावा किया कि जमीन से संबंधित वर्ष 1911 का बिजली का बिल अदालत में साक्ष्य के तौर पर पेश किया गया है, जिसे पोर्टल से प्राप्त किया गया था। उनका कहना है कि इसी जमीन पर एक मंदिर भी मौजूद है।

 

मस्जिद ध्वस्तीकरण पर Aimim के राष्ट्रीय प्रवक्ता शादाब चौहान ने मीडिया से कहा कि शामली विधायक इकरा हसन रील मास्टर है, यदि वह सही मायने में सहारनपुर जा रही थी और उन्हें हाउस अरेस्ट किया गया है तो अखिलेश यादव अपने विधायकों के साथ वहां आयें। 

 

कलेक्ट्रेट परिसर में चला बुलडोजर

 

सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित मस्जिद को लेकर प्रशासन और मस्जिद प्रबंधन के बीच लंबे समय से विवाद चल रहा था। प्रशासन ने मस्जिद के निर्माण को सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा बताते हुए इसे हटाने की कार्रवाई शुरू की थी। मामले में न्यायालय में भी कानूनी लड़ाई चली।

 

मिली जानकारी के मुताबिक जिला अदालत ने 4 सितंबर को मस्जिद प्रबंधन की अपील खारिज कर दी और इससे पहले जारी हटाने के आदेश को बरकरार रखा। इसके बाद प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े इंतजामों के बीच मस्जिद को ध्वस्त कर दिया। कार्रवाई के दौरान पुलिस बल तैनात रहा और इलाके में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गई।

 

प्रशासन का कहना है कि कार्रवाई न्यायालय के आदेश के अनुपालन में की गई है और विवादित निर्माण सरकारी भूमि पर था। वहीं, सांसद इकरा हसन सहित विरोध करने वाले पक्ष का आरोप है कि मामले में पर्याप्त मोहलत और सभी पक्षों को अपनी बात रखने का अवसर नहीं दिया गया।

 

कार्रवाई के बाद बढ़ा राजनीतिक तापमान

 

मस्जिद के ध्वस्तीकरण के बाद इस मुद्दे ने राजनीतिक रंग ले लिया है। इकरा हसन ने इसे महज एक निर्माण हटाने की कार्रवाई न मानते हुए संविधान और कानून-व्यवस्था से जुड़ा गंभीर सवाल बताया है। उन्होंने साफ किया है कि वह इस मामले को न्यायालय में उठाएंगी।

 

अब इस पूरे विवाद की अगली कड़ी अदालत में देखने को मिलेगी। एक तरफ प्रशासन न्यायालय के आदेश के अनुपालन की बात कर रहा है, तो दूसरी ओर सांसद इकरा हसन कार्रवाई को चुनौती देने की तैयारी में हैं। ऐसे में सहारनपुर का यह मस्जिद विवाद आने वाले दिनों में और तूल पकड़ सकता है।

PM Surya Ghar Muft Bijli Yojana: दिल्ली के 2.30 लाख परिवारों को तोहफा! घर की छत पर मुफ्त लगेगा 3 KW का सोलर पैनल, सरकार देगी ₹78,000 की सब्सिडी

PM Surya Ghar Muft Bijli Yojana: देश की राजधानी दिल्ली के लाखों बिजली उपभोक्ताओं के लिए बड़ी राहत वाली खबर है। दिल्ली सरकार ने राजधानी के 2.30 लाख घरों की छतों पर तीन किलोवाट क्षमता का रूफटॉप सोलर पैनल लगाने की योजना को मंजूरी दे दी है। खास बात यह है कि पात्र परिवारों को इसके लिए अपनी जेब से शुरुआती रकम खर्च नहीं करनी होगी। योजना के तहत केंद्र और दिल्ली सरकार की ओर से सब्सिडी का प्रावधान है। सोलर सिस्टम लगाने का काम भी सरकार की ओर से कराया जाएगा।

‘पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना’ के तहत केंद्र सरकार की ओर से 78,000 रुपये की सब्सिडी प्रदान की जाएगी। यह फैसला मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में लिया गया। सरकार का लक्ष्य मार्च 2027 तक सभी पात्र घरों की छतों पर सोलर सिस्टम लगाने का है। इसके लिए संबंधित विभागों को प्रक्रिया तेज करने के निर्देश दिए गए हैं।

400 यूनिट तक बिजली खपत वाले घरों को मिलेगा फायदा

इस योजना का सबसे बड़ा फायदा उन परिवारों को मिलने की उम्मीद है, जिनकी औसत मासिक बिजली खपत 400 यूनिट तक है। तीन किलोवाट का रूफटॉप सोलर सिस्टम घरेलू जरूरतों के एक बड़े हिस्से की बिजली पैदा करने में मदद करेगा। इससे ऐसे परिवारों के बिजली खर्च में कमी आने की संभावना है। सरकार का मकसद केवल बिजली का बिल कम करना नहीं है। बल्कि दिल्ली के घरों को बिजली उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाना भी है। यानी जिस घर की छत पर सोलर पैनल लगेगा, वह खुद बिजली पैदा कर सकेगा। इससे अपनी जरूरत के मुताबिक उसका इस्तेमाल कर सकेगा।

78 हजार रुपये तक की सब्सिडी का प्रावधान

PM Surya Ghar Muft Bijli Yojana के तहत सोलर सिस्टम लगाने पर केंद्र सरकार की ओर से 78,000 रुपये तक की सब्सिडी दी जाती है। इसके अलावा दिल्ली सरकार भी 78 हजार रुपये तक की पूंजीगत सब्सिडी देने की व्यवस्था करेगी। इस तरह पात्र उपभोक्ताओं को सोलर सिस्टम लगवाने के लिए बड़ी रकम का बोझ उठाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

‘पीएम सूर्य घर’ योजना के मुताबिक, इंस्टॉलेशन का काम भी सरकार की ओर से कराया जाएगा। सरकार ने इस महत्वाकांक्षी योजना को समयबद्ध तरीके से पूरा करने का खाका तैयार किया है। इसके तहत मार्च 2027 तक सभी पात्र 2.30 लाख घरों की छतों पर सोलर सिस्टम इंस्टॉल करने का लक्ष्य रखा गया है।

लाभ लेने के लिए पहले पैसे जमा कराने की जरूरत नहीं

इस योजना की एक अहम बात यह है कि उपभोक्ताओं को सोलर सिस्टम लगवाने के लिए कोई एडवांस राशि नहीं देनी होगी। सरकार की ओर से प्रक्रिया पूरी कराकर पात्र घरों पर सिस्टम लगाया जाएगा। हालांकि, यदि सोलर सिस्टम की कुल लागत और उपलब्ध सब्सिडी के बीच अंतर रहता है, तो राज्य सरकार द्वारा किए जाने की बात कही गई है। इससे आम परिवारों के लिए योजना का लाभ लेना आसान होगा।

घरों को बिजली उत्पादक बनाना लक्ष्य

दिल्ली सरकार का कहना है कि योजना का उद्देश्य केवल बिजली के बिल में कमी लाना नहीं है। इसके जरिए घरों को क्लीन एनर्जी का उत्पादक बनाना भी लक्ष्य है। रूफटॉप सोलर से पारंपरिक बिजली पर निर्भरता कम होगी और सौर ऊर्जा का इस्तेमाल बढ़ेगा। इससे लंबे समय में बिजली की मांग और पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों पर दबाव कम करने में भी मदद मिल सकती है। साथ ही दिल्ली में प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन कम करने की दिशा में भी यह कदम महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

मार्च 2027 तक पूरा करने की तैयारी

सरकार ने PM Surya Ghar Muft Bijli Yojana को तेजी से लागू करने की तैयारी शुरू कर दी है। लक्ष्य रखा गया है कि मार्च 2027 तक 2.30 लाख पात्र घरों की छतों पर सोलर सिस्टम लगाया जाए। इसके लिए विभागीय स्तर पर प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी। इससे दिल्ली के बड़ी संख्या में परिवारों को लंबे समय तक बिजली खर्च में राहत मिलने की उम्मीद है। खासकर मध्यम और कम बिजली खपत वाले परिवारों के लिए यह योजना घरेलू बजट पर पड़ने वाले खर्च को कम करने में मददगार साबित हो सकती है।

दिल्ली में बढ़ेगा रूफटॉप सोलर का इस्तेमाल

दिल्ली जैसे बड़े शहर में घरों की छतों का इस्तेमाल सौर ऊर्जा उत्पादन के लिए करना सरकार की ऊर्जा नीति में बड़ा बदलाव माना जा रहा है। यदि 2.30 लाख घरों पर सोलर सिस्टम लगाए जाते हैं, तो इससे राजधानी में स्वच्छ और रिन्यूएबल एनर्जी की हिस्सेदारी बढ़ेगी।

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सरकार का दावा है कि यह पहल दिल्ली को रिन्यूएबल एनर्जी के क्षेत्र में आगे बढ़ाने के साथ-साथ आम लोगों को बिजली के बढ़ते खर्च से राहत देने में भी अहम भूमिका निभाएगी। आने वाले महीनों में पात्र परिवारों को योजना से जोड़ने और सिस्टम लगाने की प्रक्रिया तेज होने की उम्मीद है। उपभोक्ताओं को सोलर पैनल लगवाने के लिए किसी भी तरह का एडवांस भुगतान नहीं करना होगा।

पाकिस्तान के कई शहरों में 12-12 घंटे बिजली कटौती:कराची में हालात बदतर, सड़कों पर उतरे लोग, घंटों जाम लगा

पाकिस्तान के इस्लामाबाद, रावलपिंडी और कराची जैसे बड़े शहर बिजली कटौती से परेशान हैं। सबसे खराब हालात कराची में हैं, जहां 12-12 घंटे बिजली कटौती हो रही है। कराची में बिजली कटौती के खिलाफ शनिवार को लोगों ने प्रदर्शन किया, कई घंटे सड़कें जाम रखीं। इस प्रदर्शन से शहर में ट्रैफिक ठप हो गया और हजारों लोग जाम में फंस गए। डॉन के मुताबिक, लोगों ने बताया कि उन्हें रोज 12 घंटे या उससे ज्यादा बिजली कटौती का सामना करना पड़ रहा है। उनका कहना है कि कई बार कटौती की जानकारी भी नहीं दी जाती। बिजली नहीं होने पर पंपिंग स्टेशन बंद रहते हैं। इससे पानी की सप्लाई भी रुक रही है। कराची में बिजली कंपनी-लोगों के बीच झड़प इस समस्या को लेकर कराची के व्यापारियों और बिजली कंपनी के-इलेक्ट्रिक (KE) के कर्मचारियों के बीच विवाद और झड़प हुई। प्रदर्शन में शामिल व्यापारियों ने कहा- बिजली की अनियमित सप्लाई से कारोबार को काफी नुकसान हो रहा है। प्रदर्शन और जाम का भी लोगों पर बुरा असर पड़ा। एक महिला ने बताया कि उनकी मां को बुखार था वो मां को जांच के लिए क्लिनिक ले जा रही थीं, लेकिन उनकी एंबुलेंस करीब 2 घंटे तक जाम में फंसी रही। गरीबाबाद के रहने वाले इमरान ने कहा- समय पर बिजली का बिल भरते हैं फिर भी 12 घंटे बिजली कटती है। आज तो हम घर तक नहीं पहुंच पाए। जुलूस और इन प्रदर्शनों की वजह से पूरा शहर जाम है। बिजली कंपनी के-इलेक्ट्रिक ने कहा- बार-बार बिजली चोरी रोकने के अभियान चलाने के बावजूद लोग बिजली चोरी कर रहे हैं और बिल भी नहीं भर रहे हैं। अरबों बिल बकाया है। इस्लामाबाद-रावलपिंडी में बारिश से बिजली गुल पाकिस्तान के इस्लामाबाद और रावलपिंडी में भी शनिवार रात तेज बारिश के कारण कई जगह बिजली सप्लाई प्रभावित हुई। कई सड़कें और अंडरपास पानी में डूब गए। रावलपिंडी में नुल्लाह लाई का जलस्तर 19 फीट तक बढ़ गया। सड़कों पर इतना पानी भर गया कि कई इलाकों में रास्ते तालाब जैसे नजर आए। कराची में बिजली क्यों कट रही है? 1. कराची में बिजली की सप्लाई मुख्य रूप से के-इलेक्ट्रिक के जिम्मे है। कंपनी को बिजली की कमी के साथ अपने ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम में फॉल्ट का भी सामना करना पड़ रहा है। किसी इलाके में लाइन या ट्रांसफॉर्मर में खराबी आने पर तय लोडशेडिंग के अलावा भी बिजली बंद हो सकती है। 2. पाकिस्तान के कई बिजली संयंत्र गैस और रीगैसिफाइड लिक्विफाइड नेचुरल गैस (RLNG) से चलते हैं। इन दिनों ईंधन की सप्लाई में दिक्कतों का असर बिजली उत्पादन पर पड़ा है। 3. पाकिस्तान में बिजली कंपनियां उतनी बिजली उपलब्ध नहीं करा पा रही हैं, ऐसे में मांग और सप्लाई के बीच का अंतर लोडशेडिंग के जरिए संभाला जाता है। 4. कराची में गर्मी के दौरान बिजली की खपत तेजी से बढ़ जाती है। बड़ी संख्या में लोग AC, पंखे और दूसरे कूलिंग उपकरण चलाते हैं। इससे खासकर पीक टाइम में ग्रिड पर काफी दबाव पड़ता है। जब सिस्टम ज्यादा लोड नहीं संभाल पाता, तो कुछ इलाकों में बिजली काटनी पड़ती है। 5. कराची के कुछ इलाकों में बिजली चोरी और बिलों की कम वसूली जैसी वजहों से पहले से ही ज्यादा लोडशेडिंग की जाती है। ऐसे इलाकों में अगर सामान्य कटौती के दौरान कोई तकनीकी खराबी भी आ जाए, तो बिजली कई घंटे और बंद रह सकती है। ————— पाकिस्तान से जुड़ी यह खबर भी पढ़ें… रक्षा-समझौते की आड़ में हथियारों का जखीरा भर रहा पाकिस्तान: तुर्किये से ड्रोन की सप्लाई, 60 घंटे में दर्जनों सैन्य विमान पहुंचे सऊदी अरब और तुर्किये से हुए रक्षा समझौते की आड़ में पाकिस्तान हथियारों का जखीरा बढ़ा रहा है। 19 से 21 अगस्त के बीच करीब 60 घंटे में तुर्किये के दर्जनों सैन्य विमानों ने पाकिस्तान के अलग-अलग एयरबेस पर लैंडिंग और टेकऑफ किया। इनमें सी-130 सैन्य परिवहन विमान और ए-400-एम जंबो मिलिट्री विमान शामिल थे। पूरी खबर पढ़ें…

पहाड़ों में बसने का सपना 71 दिनों में ही टूटा! दिल्ली छोड़ मनाली रहने गए Gen Z कंटेंट क्रिएटर ने लौटकर क्या बताया?

भागदौड़ भरी जिंदगी, शहरों में पलूशन वाली जहरीली हवा और तेज रफ्तार लाइफ से ऊबकर पहाड़ों की शांत वादियों में जा बसना आज हर वर्किंग युवा का सपना लगता है। वर्क फ्रॉम होम और रील्स की दुनिया में हर कोई बस यही सोचता है कि काश! वो भी सब कुछ छोड़कर पहाड़ों में हमेशा के लिए बस जाए। दिल्ली के रहने वाले एक Gen Z कंटेंट क्रिएटर अजय शर्मा ने भी कुछ ऐसा ही किया। वो यह देखने मनाली पहुंचे कि क्या सचमुच पहाड़ों की जिंदगी वैसी ही हसीन होती है जैसी तब लगता है जब हम छुट्टियां मनाने पहाड़ पहुंचते हैं या फिर इसके पीछे कोई और ही सच्चाई छिपी है?

अजय ने 23 मई को दिल्ली से मनाली के पास बसे छोटे से गांव सियाल में शिफ्ट हुए थे। उनका इरादा था कि वो यहां टूरिस्ट बनकर नहीं बल्कि लोकल शख्स की तरह रहें। अजय ने पूरे 71 दिन पहाड़ों में बिताए, इस दौरान करीब 55 वीडियो बनाए और अपनी रोजमर्रा की जिंदगी का हर पल इंटरनेट पर लोगों के साथ शेयर किया। लेकिन 2 अगस्त आते-आते उनका यह सपना सिमट गया और वो वापस दिल्ली लौट आए।

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जब अनजाने रास्ते और अजनबी लोग धीरे-धीरे अपने से लगने लगेअजय जब मनाली पहुंचे थे तो वहां उनका कोई अपना नहीं था, कोई जान-पहचान नहीं थी। लेकिन देखते ही देखते वो वहां की गलियों, रास्तों, हसीन वादियों और लोकल लोगों के करीब आ गए, उनसे घुल-मिल गए। जो काम सिर्फ एक प्रयोग की तरह शुरू हुआ था, वो उनकी जिंदगी का एक अनमोल हिस्सा बन गया।

दिल्ली लौटने के बाद एक वीडियो में उन्होंने मनाली की अपनी यादों को साझा किया। उन्होंने बताया कि सिर्फ दो महीने से थोड़े ज्यादा वक्त में जिस जगह से उनका इतना दिल लग गया था, उसे छोड़कर आना दर्दनाक था। अजय के मुताबिक इस तजुर्बे ने उन्हें उम्मीद से कहीं ज्यादा गहराई और जिंदगी का नया नजरिया दिया। मनाली को अलविदा कहना उनके लिए बेहद मुश्किल था क्योंकि यह सिर्फ कोई ट्रिप खत्म नहीं हो रही थी बल्कि उनकी जिंदगी के एक नए दौर की शुरुआत थी।

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क्या वाकई पहाड़ों में बसना उतना ही हसीन है, जितना छुट्टियों में दिखता है?

अजय के मनाली शिफ्ट होने की सबसे बड़ी वजह एक सीधे से सवाल का जवाब तलाशना था। वो ये कि क्या पहाड़ों में बसकर रहना सचमुच उतना ही मजेदार है जितना वहां कुछ दिनों की छुट्टियां बिताना? मनाली जाने से पहले अजय के दिलो-दिमाग में भी एक आम शहर की तरह ही खूबसूरत ख्यालात थे, पहाड़ों के खूबसूरत दृश्यों के बीच काम करना, ढलते और उगते सूरज को देखना, आसपास की वादियों में घूमना, वहां का लोकल फूड ट्राई करना और रात में अलाव के गिर्द बैठकर लोगों से बातें करना।

इनमें से कई हसीन पल उन्होंने जिए भी। लेकिन वहां फुल टाइम रहने पर उन्हें उन मुश्किलों से रूबरू होना पड़ा जो अक्सर तब नहीं समझ में आतीं जब हम छुट्टियों में पहाड़ घूमने जाते हैं।

मनाली में रहने का खर्च: उम्मीद से कहीं ज्यादा किफायती!मनाली में रहने के दौरान अजय का सबसे हैरान कर देने वाला अनुभव वहां का खर्च रहा। ये उनकी उम्मीद से काफी कम निकला। अजय सियाल गांव में 14000 रुपये महीने के किराये पर अकेले एक वन-बैडरूम फ्लैट में रहते थे। इस किराये में वाई-फाई और बिजली का बिल दोनों शामिल थे। वो ज्यादातर वक्त घर पर ही खाना खुद बनाते थे। राशन और ग्रोसरी पर महीने का लगभग 3500 रुपये खर्च आता था। जब कभी खाना पकाने का मन न होता, तो वो हफ्ते में एक-दो बार बाहर खा लेते थे। इसमें करीब 500 रुपये हफ्ते का खर्च बैठता था।

फिटनेस के शौकीन अजय ने वहां का एक लोकल जिम भी जॉइन किया। वैसे तो जिम की फीस 1800 रुपये महीना थी, लेकिन उन्होंने बात करके इसे 1500 रुपये करवा लिया। अजय को गाड़ियों के बजाय पैदल चलना पसंद था, इसलिए लोकल ट्रैवल पर उनका न के बराबर पैसा खर्च होता था। अगर इन सारे खर्चों को जोड़ दिया जाए, तो मनाली में अजय का कुल मासिक खर्च करीब 21000 रुपये के आसपास आता था।

वो दिक्कतें जो आम पर्यटकों की नजरों से हमेशा छिपी रह जाती हैं

मनाली ने अजय को सुकून और नए अनुभव तो दिए, लेकिन जैसे-जैसे दिन बीते कुछ प्रैक्टिकल प्रॉब्लम भी सामने आईं। पहाड़ों में अक्सर नेटवर्क की समस्या रहती थी, जिससे ऑनलाइन काम करना या वर्क फ्रॉम होम संभालना बेहद मुश्किल हो जाता था। पहाड़ों का मौसम मजेदार होने के साथ टेंशन देने वाला भी मिला। बिना किसी पूर्व चेतावनी के अचानक तेज बारिश शुरू हो जाती थी। मानसून के आते ही सड़कें और रोजमर्रा की आवाजाही बेहाल हो गई।

यहां अकेले रहने का मतलब था कि खाना बनाने से लेकर साफ-सफाई और घर के बाकी सारे काम अजय को खुद ही करने पड़ते थे। मशहूर टूरिस्ट स्पॉट्स तक पहुंचने के लिए लंबी और सीधी चढ़ाई चढ़नी पड़ती थी। छुट्टियों में ऐसी ट्रैकिंग भले ही रोमांचक लगे लेकिन हर दिन ऐसा करना शरीर को तोड़कर रख देता है। सबसे बड़ी चुनौती थी उनका अकेलापन। जिस खामोशी और शांति की तलाश में वो दिल्ली से भागे थे, वही सन्नाटा धीरे-धीरे दीमक की तरह उन्हें काटने लगा और भारी अकेलेपन में बदल गया।

अजय ने 3 जुलाई को शेयर किए गए एक वीडियो में इन तमाम दुश्वारियों का जिक्र किया था और बताया था कि आखिर क्यों पहाड़ों में उनका स्टे समय से पहले खत्म होने जा रहा है।

मनाली से लौटकर अब एक नई राह पर हैं अजय

मनाली का अपना 71 दिनों का आशियाना छोड़कर अजय अब वापस दिल्ली लौट आए हैं, लेकिन पहाड़ों को लेकर उनका नजरिया अब पूरी तरह बदल चुका है। इस छोटे से स्टे ने उन्हें एक बड़े शहर से दूर रहने की खूबसूरती और उसकी कड़वी सच्चाइयों दोनों से रूबरू करा दिया। अजय आज भी मनाली में बिताए अपने इन दिनों को जिंदगी का सबसे हसीन और यादगार पल मानते हैं। दिल्ली लौटने के बाद अब वो जिंदगी को एक नए अंदाज में खंगाल रहे हैं। उनके हालिया वीडियो बता रहे हैं कि पहाड़ों की बर्फीली वादियों के बाद अब वो समुद्र के शांत किनारों पर अपना वक्त बिता रहे हैं।

शहर की नौकरी छोड़ पहाड़ों में बसे पति-पत्नी! 4BHK मकान, फ्री पानी और ₹50 हजार के खर्च का ब्रेकडाउन वायरल

शहर की तेज रफ्तार जिंदगी से दूर पहाड़ों के बीच रहना सुनने में जितना खूबसूरत लगता है, उतना ही दिलचस्प है यह जानना कि वहां रोजमर्रा की जिंदगी कितने खर्च में चलती है। हिमाचल प्रदेश के मनाली के पास रहने वाले दिव्या भट्ट और सौरभ यादव ने अपनी पहाड़ी जिंदगी की झलक सोशल मीडिया पर साझा की है। दोनों ने गजान गांव में अपना ठिकाना बनाया है और साथ ही होमस्टे भी चलाते हैं। दिव्या ने अपने एक वीडियो में बताया कि पहाड़ों में रहते हुए उनका महीने का खर्च करीब ₹50 हजार आता है।

इस बजट में घर का राशन, बाहर खाना, ईंधन, बिजली और घूमने-फिरने जैसे खर्च शामिल हैं। खास बात यह है कि आसपास की प्राकृतिक खूबसूरती ही उनके लिए मनोरंजन का बड़ा जरिया है, इसलिए कई आउटिंग पर ज्यादा पैसा खर्च नहीं होता। अब उनका यह सादा लेकिन खूबसूरत लाइफस्टाइल इंटरनेट पर लोगों का ध्यान खींच रहा है।

मनाली के पास गांव में बसाया घर

दिव्या और सौरभ ने हिमाचल प्रदेश के गजान गांव को अपना ठिकाना बनाया है। यह गांव मनाली के पास हिमालयी इलाके में स्थित है। दोनों यहां रहते भी हैं और एक होमस्टे भी चलाते हैं। दिव्या ने इंस्टाग्राम पर ‘Living in the Mountains, Episode 1’ नाम से वीडियो शेयर किया, जिसमें उन्होंने पहाड़ों में अपनी जिंदगी और हर महीने होने वाले खर्च का हिसाब बताया।

1BHK का किराया करीब ₹15 हजार

कपल जिस 4BHK प्रॉपर्टी में रहता है, उसका इस्तेमाल उनके होमस्टे से भी जुड़ा है। इसलिए उनका रहने का खर्च सामान्य किरायेदार से अलग है। दिव्या के मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति सिर्फ रहने के लिए मनाली के पास घर किराए पर लेना चाहता है, तो 1BHK का किराया करीब ₹15,000 और 2BHK का करीब ₹25,000 तक हो सकता है।

घर का खाना, फिर भी ₹15 हजार का फूड बजट

पहाड़ों में रहने के बावजूद कपल खाने पर बहुत ज्यादा खर्च नहीं करता। दोनों ज्यादातर खाना घर पर ही बनाते हैं। दिव्या के मुताबिक, उनकी महीने की ग्रॉसरी करीब ₹10,000 आती है। इसके अलावा बाहर खाने-पीने पर करीब ₹5,000 खर्च हो जाते हैं।

छोटी दूरी के लिए गाड़ी नहीं, पैदल सफर

गांव में रहने का एक फायदा यह भी है कि रोजमर्रा के कई छोटे काम पैदल ही हो जाते हैं। दिव्या ने बताया कि दोनों स्थानीय स्तर पर ज्यादातर जगह पैदल जाते हैं। इसके बावजूद गाड़ी के ईंधन पर करीब ₹3,000 प्रति महीने खर्च हो जाता है।

पानी का बिल जीरो, बिजली करीब ₹1,000

यूटिलिटी खर्च की बात करें तो कपल के लिए पानी पर कोई मासिक खर्च नहीं है। दिव्या के अनुसार, पानी मुफ्त है। वहीं बिजली का बिल करीब ₹1,000 प्रति महीने आता है।

पहाड़ों में घूमना भी बजट में शामिल

पहाड़ों में रहने का सबसे बड़ा फायदा शायद यही है कि घूमने के लिए महंगी जगहों की जरूरत नहीं पड़ती। आसपास प्रकृति आसानी से उपलब्ध है, इसलिए कपल की ज्यादातर आउटिंग मुफ्त ही होती हैं। फिर भी अपने छोटे-मोटे माउंटेन एडवेंचर पर करीब ₹3,000 महीने का खर्च हो जाता है।

करीब ₹50 हजार में पूरा महीना

दिव्या के मुताबिक, ग्रॉसरी, बाहर का खाना, ईंधन, बिजली और घूमने-फिरने जैसे खर्च जोड़ने पर दोनों का कुल मासिक खर्च करीब ₹50,000 बैठता है। हालांकि, उनका रहने का इंतजाम होमस्टे बिजनेस से जुड़ा है, इसलिए यह खर्च ऐसे व्यक्ति से अलग होगा जो सिर्फ अपने रहने के लिए घर किराए पर लेता है।

लोगों को पसंद आई पहाड़ों वाली जिंदगी

वीडियो सामने आने के बाद लोगों का ध्यान सिर्फ ₹50 हजार के बजट पर नहीं गया, बल्कि कपल की शांत जिंदगी ने भी खूब आकर्षित किया। एक यूजर ने पहाड़ों के नजारे को जिंदगी का ‘प्रीमियम सब्सक्रिप्शन’ बताया। वहीं कई लोगों ने कहा कि असली लग्जरी पैसा नहीं, बल्कि ऐसी जगह मिलने वाला सुकून और शांति है।

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Kisan Credit Card: किसानों को सस्ता लोन पाना हुआ आसान! जानें KCC के लिए कौन कर सकता है अप्लाई और क्या लगेंगे कागजात

Kisan Credit Card Scheme: भारतीय किसानों को खेती और उससे जुड़ी जरूरतों के लिए समय पर और किफायती ब्याज दर पर कर्ज उपलब्ध कराने के उद्देश्य से केंद्र सरकार की किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) योजना बेहद कारगर साबित हो रही है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य किसानों को महाजनों या साहूकारों के भारी-भरकम ब्याज के जाल से बचाना और उन्हें बैंकिंग सिस्टम से जोड़ना है।

शुरुआत में केसीसी का फोकस मुख्य रूप से फसल उगाने के मौसमी खर्चों तक सीमित था, लेकिन अब इसका विस्तार पशुपालन, डेयरी फॉर्मिंग, मत्स्य पालन, पोल्ट्री और मधुमक्खी पालन जैसी संबद्ध गतिविधियों तक कर दिया गया है। आइए जानते हैं कि इस कार्ड को पाने के लिए कौन-कौन पात्र है, क्या-क्या दस्तावेज चाहिए और इसका आवेदन कैसे होता है।

कौन-कौन ले सकता है किसान क्रेडिट कार्ड?

केसीसी योजना का फायदा उठाने के लिए पात्रता के नियम काफी आसान बनाए गए हैं:

खुद की जमीन वाले किसान: व्यक्तिगत या संयुक्त रूप से खेती करने वाले जमीन के मालिक किसान।

बटाईदार व किरायेदार किसान: पट्टेदार, बटाईदार और किराये पर जमीन लेकर खेती करने वाले किसान।

किसान समूह: स्वयं सहायता समूह (SHGs) या संयुक्त देयता समूह (JLGs)।

संबद्ध क्षेत्रों के किसान: पशुपालन, डेयरी, मुर्गी पालन, झींगा और मत्स्य पालन से जुड़े किसान।

केसीसी के मुख्य लाभ और ब्याज दर

सस्ता ब्याज दर: केसीसी पर सामान्य ब्याज दर 7% होती है। लेकिन समय पर लोन चुकाने वाले किसानों को सरकार 3% की अतिरिक्त छूट देती है, जिससे प्रभावी ब्याज दर केवल 4% प्रति वर्ष रह जाती है।

बिना गारंटी लोन: बिना किसी जमीन या संपत्ति को गिरवी रखे ₹2 लाख तक का लोन आसानी से मिल जाता है।

रिवाल्विंग क्रेडिट लिमिट: केसीसी एक क्रेडिट कार्ड की तरह काम करता है, जिसमें एक तय क्रेडिट लिमिट मिलती है और किसान जरूरत के हिसाब से पैसे निकाल और जमा कर सकते हैं।

इन दस्तावेजों की पड़ेगी जरूरत

केसीसी के लिए आवेदन करते समय आपको निम्नलिखित मूलभूत दस्तावेजों की आवश्यकता होगी:

  • पहचान पत्र: आधार कार्ड, वोटर आईडी, पैन कार्ड, या ड्राइविंग लाइसेंस।
  • पते का प्रमाण: आधार कार्ड, राशन कार्ड या बिजली का बिल।
  • जमीन के दस्तावेज: जमीन की खतौनी/खसरा/7/12 एक्सट्रैक्ट या पट्टेदारी/किरायेदारी का प्रमाण पत्र।
  • फसल की जानकारी: खेत में बोई जाने वाली फसल और रकबे की स्व-घोषणा।
  • पासपोर्ट साइज फोटो: आवेदक के 2 पासपोर्ट साइज फोटोग्राफ।

किसान क्रेडिट कार्ड के लिए कैसे करें अप्लाई?

किसान क्रेडिट कार्ड आप वाणिज्यिक बैंकों, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों या सहकारी बैंकों के जरिए बनवा सकते हैं:

1. बैंक शाखा के जरिए

अपने नजदीकी बैंक शाखा या कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) पर जाएं।

वहां से KCC का आवेदन फॉर्म प्राप्त कर भरें।

फॉर्म के साथ सभी जरूरी आईडी प्रूफ, एड्रेस प्रूफ और जमीन के कागजात संलग्न कर जमा करें।

बैंक द्वारा आपके दस्तावेजों के सत्यापन और लोन अप्रूवल के बाद आपको केसीसी जारी कर दिया जाएगा।

2. ऑनलाइन प्रक्रिया

स्टेप 1- जिस बैंक में आपका खाता है, उसकी आधिकारिक वेबसाइट या मोबाइल बैंकिंग ऐप पर जाएं।

स्टेप 2- ‘Kisan Credit Card’ सेक्शन में जाकर एप्लीकेशन फॉर्म भरें।

स्टेप 3- मांगे गए दस्तावेजों की डिजिटल कॉपी अपलोड करें और फॉर्म सबमिट करें।

स्टेप 4- अगर आप PM-Kisan योजना के लाभार्थी हैं, तो आपकी ई-केवाईसी और लैंड डिटेल्स पहले से वेरीफाइड होने के कारण एक पन्ने के आसान फॉर्म के जरिए तुरंत मंजूरी मिल जाती है।

Delhi Lakshmi Yojana: हर महीने खाते में आएंगे ₹2,500! 2 मिनट में समझें अप्लाई करने का पूरा प्रोसेस

Delhi Laxmi Yojna Registration Process: दिल्ली सरकार ने राष्ट्रीय राजधानी की महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त और आत्मनिर्भर बनाने के लिए ‘दिल्ली लक्ष्मी योजना’ की शुरुआत की है। योजना के तहत परिवार की सबसे वरिष्ठ महिला सदस्य को ₹2,500 प्रति माह की वित्तीय सहायता दी जाएगी।

दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने लक्ष्मी योजना का आधिकारिक पोर्टल लॉन्च कर दिया है, जिस पर आवेदन मिलने भी शुरू हो चुके हैं। योजना शुरू होने के महज दो दिनों के भीतर ही 1.47 लाख से अधिक पंजीकरण हो चुके हैं। सरकार ने इसके लिए ₹5,100 करोड़ का बजट आवंटित किया है। आइए आपको बताते हैं इस योजना का लाभ उठाने के लिए कौन पात्र है, किन दस्तावेजों की आवश्यकता होगी और ऑनलाइन आवेदन कैसे करना है।

एक साथ खाते में नहीं आएंगे ₹2,500

दिल्ली लक्ष्मी योजना एक अनोखी हाइब्रिड कैश-ट्रांसफर और सेविंग्स स्कीम है, जिसमें महिलाओं के लिए दो विकल्प दिए गए हैं:

विकल्प 1 (कैश + एफडी): ₹1,000 की राशि सीधे लाभार्थी महिला के बैंक खाते में भेजी जाएगी, जबकि शेष ₹1,500 की राशि को सरकार द्वारा ‘फिक्स्ड डिपॉजिट’ (FD) में निवेश किया जाएगा।

विकल्प 2 (पूरी एफडी): लाभार्थी चाहें तो पूरे ₹2,500 को फिक्स्ड डिपॉजिट में निवेश करने का विकल्प चुन सकती हैं।

इस FD पर 3 साल का लॉक-इन पीरियड लागू होगा, जिस पर राज्य सरकार सॉवरेन गारंटी प्रदान करेगी।

कौन कर सकता है आवेदन?

योजना का लाभ लेने के लिए महिला आवेदकों को ये शर्तें पूरी करनी होंगी:

  • परिवार की प्रमुख: आवेदक महिला परिवार की सबसे वरिष्ठ सदस्य होनी चाहिए।
  • आयु सीमा: महिला की उम्र 21 से 60 वर्ष के बीच होनी चाहिए।
  • पारिवारिक आय: परिवार की कुल वार्षिक आय ₹2.5 लाख से अधिक नहीं होनी चाहिए।
  • दिल्ली का निवासी होना: आवेदक, उसका पति या उसके माता-पिता कम से कम 10 वर्षों से दिल्ली के निवासी हों।
  • वोटर आईडी: आवेदक दिल्ली की पंजीकृत मतदाता होनी चाहिए।
  • बिजली खपत: पिछले 1 वर्ष के दौरान परिवार की वार्षिक बिजली खपत 2,400 यूनिट से अधिक नहीं होनी चाहिए।

किन्हें नहीं मिलेगा लाभ?

  1. जो परिवार इनकम टैक्स पेयर हैं या जीएसटी (GST) फाइल करते हैं।
  2. परिवार में कोई सदस्य सरकारी नौकरी, सार्वजनिक उपक्रम (PSU) या लोकल बॉडी में स्थायी/संविदा कर्मचारी है।
  3. जिनके पास चार पहिया वाहन है।
  4. आवेदक महिला के 3 से अधिक बच्चे नहीं होने चाहिए।
  5. आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोग योजना के लिए पात्र नहीं होंगे।

आवेदन के लिए आवश्यक दस्तावेज

पहचान व पते का प्रमाण: वोटर आईडी कार्ड (दिल्ली) और आधार कार्ड।

पासपोर्ट साइज फोटो और हस्ताक्षर: आवेदक की स्पष्ट फोटो और सिग्नेचर।

सांसद या विधायक का सिफारिश पत्र: क्षेत्र के सांसद (MP) या विधायक (MLA) का हस्ताक्षरित सिफारिश/समर्थन पत्र।

पते/बिजली खपत का प्रमाण: बिजली का बिल या गैस कनेक्शन का बिल।

उम्र का प्रमाण (कोई भी एक): जन्म प्रमाण पत्र, 10वीं की मार्कशीट, ड्राइविंग लाइसेंस, पैन कार्ड, वोटर आईडी या आधार कार्ड।

बैंक खाता विवरण: डीबीटी के माध्यम से राशि प्राप्त करने के लिए बैंक पासबुक की कॉपी।

ऑनलाइन आवेदन का स्टेप-बाय-स्टेप प्रोसेस

पात्र महिलाएं घर बैठे नीचे दिए गए आसान स्टेप्स को फॉलो करके रजिस्ट्रेशन कर सकती हैं:

स्टेप 1: आधिकारिक वेबसाइट https://dly.delhi.gov.in पर जाएं और ‘Apply for Scheme’ के बाद ‘Register Now’ पर क्लिक करें।

स्टेप 2: अपनी व्यक्तिगत जानकारी और बेसिक विवरण दर्ज करें।

स्टेप 3: परिवार के सभी सदस्यों का ब्योरा सही-सही भरें।

स्टेप 4: पैसे ट्रांसफर के लिए अपना चालू बैंक खाता दर्ज करें।

स्टेप 5: मांगे गए सभी आवश्यक दस्तावेजों को निर्धारित फॉर्मेट में अपलोड करें।

स्टेप 6: फॉर्म का प्रीव्यू ध्यान से जांचें और फाइनल सबमिट करें।

स्टेप 7: क्षेत्रीय MP या MLA द्वारा हस्ताक्षरित अनुशंसा की प्रति अपलोड करें।

स्टेप 8: आवेदन पूरा होने के बाद पावती रसीद डाउनलोड करके भविष्य के लिए सुरक्षित रख लें।