सोचा था ₹15000 में हो जाएगा लद्दाख में वर्ककेशन, 1 महीने में खर्च हो गए ₹96000, अब कपल ने बताया पूरा गणित

लद्दाख में पहाड़ों के बीच रहकर काम करना और साथ में घूमना बहुत ही यादगार पल होते है। अंजलि और नमन ने भी एक महीने तक लद्दाख में रहकर काम किया और वहां आसपास की कई जगहों को घूमकर देखा। दोनों ने अपने इस ट्रिप का पूरा खर्च भी शेयर किया है, जिससे पता चलता है कि ऐसी वर्ककेशन प्लान करने से पहले रहने, खाने और घूमने के खर्च का अंदाजा लगाना कितना जरूरी है।

लद्दाख घूमने में इतना हुआ खर्च

लद्दाख में रहने के दौरान कपल ने सिर्फ एक जगह रहकर काम नहीं किया, बल्कि आसपास की कई जगहों पर घूमने का भी प्लान बनाया। पूरी ट्रिप में उनके ट्रैवल पर करीब 30,000 रुपये खर्च हुए। इसमें मनाली से लेह जाने और लेह से दिल्ली लौटने की फ्लाइट का खर्च भी था। इस तरह उन्होंने काम के साथ लद्दाख घूमने का भी पूरा मजा लिया।

रहने की जगह का खर्च निकला उम्मीद से कही ज्यादा

अंजलि और नमन ने सोचा था कि लद्दाख में उन्हें 15,000 रुपये के आसपास कमरा मिल जाएगा। ज्यादा से ज्यादा 20,000 रुपये खर्च होने का अंदाजा था। लेकिन अच्छी जगह मिलने पर उन्हें महीने के कमरे के लिए करीब 30,000 रुपये देने पड़े। यानी रहने का खर्च उनकी उम्मीद से काफी ज्यादा रहा। रोज के हिसाब से देखें तो कमरे का खर्च करीब 1,000 रुपये लगा।

फूड और लोकल ट्रैवल का निकाला हिसाब

महीने भर की वर्ककेशन में खाने-पीने और घूमने-फिरने पर भी खर्च हुआ। कपल ने खाने के लिए करीब 9,000 रुपये खर्च किए। आसपास घूमने के लिए 2,100 रुपये में स्कूटर किराए पर लिया। साथ ही, होस्ट का स्कूटर फ्री में मिलने से कुछ पैसे बच गए। स्नैक्स और ग्रॉसरी पर 2,500 रुपये और बाहर खाने-पीने पर करीब 5,000 रुपये खर्च हुए।

सोशल मीडिया पर शेयर किया अपना एक्सपीरियंस

अंजलि और नमन डिजिटल कंटेंट क्रिएटर हैं और ट्रैवल से जुड़े अपने एक्सपीरियंस सोशल मीडिया पर शेयर करते हैं। उन्होंने लद्दाख में बिताए समय के दौरान भी अपने फॉलोअर्स को बताया कि वहां रहना, काम करना और घूमना उनके लिए कैसा रहा। उनके वीडियो को लोगों ने पसंद किया और कई यूजर्स ने कमेंट करके उनके काम की जानकारी देने के लिए उनकी तारीफ भी की।

लद्दाख में बिताया यह एक्सपीरियंस दिखाता है कि वर्ककेशन सिर्फ घूमने का नाम नहीं है। किसी पहाड़ी जगह पर लंबे समय तक रहने का प्लान हो तो बजट के साथ रहने की सुविधा, लोकल ट्रांसपोर्ट और रोज की जरूरतों को भी ध्यान में रखना पड़ता है। अंजलि और नमन ने अपना खर्च शेयर करके लोगों को अपने इस एक्सपीरियंस के बारे में बताया है।

राहुल ने उठाया हॉस्टल की कमी का मुद्दा

नई दिल्ली। इंदौर में अपने कार्यक्रम के एक दिन बाद रविवार को राहुल गांधी ने एक सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए छात्रों का मुद्दा उठाया। उन्होंने हॉस्टल की कमी का मुद्दा प्रमुखता से उठाया। गौरतलब है कि राजधानी दिल्ली के सत्य निकेतन में पिछले दिनों छात्रों के एक प्राइवेट हॉस्टल की बिल्डिंग गिर गई थी, जिसमें दब कर पांच छात्रों सहित सात लोगों की मौत हो गई थी। उसके बाद से हॉस्टल का मुद्दा लगातार चर्चा में है।

हॉस्टल की कमी बताते हुए राहुल गांधी ने इंदौर अपने कार्यक्रम के हवाले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, ‘कल इंदौर में एक छात्रा ने मुझसे पूछा कि सरकार के पास दिया जलाने के लिए पैसा है, हमारे हॉस्टल के लिए क्यों नहीं’? राहुल ने कहा कि गांव से शहर पढ़ने आने वाली छात्राओं को हॉस्टल नहीं मिलने पर पीजी में रहना पड़ता है। किराए और सुरक्षित रहने का खर्च इतना ज्यादा है कि कई लड़कियां पढ़ाई छोड़ देती हैं।

मुंबई में शख्स 1 लाख की सैलरी में से 50,000 का देता था किराया , चार्टर्ड अकाउंटेंट बोला मेरे लिए ये बेस्ट ‘इन्वेस्टमेंट’ है

चार्टर्ड अकाउंटेंट और कंटेंट क्रिएटर कुशल लोढ़ा ने बताया है कि कैसे मुंबई में रहते हुए उन्होंने एक बार अपनी महीने की सैलरी का आधा हिस्सा किराए पर खर्च कर दिया था। उन्होंने बताया कि वे महीने के ₹1 लाख कमाते थे और लोअर परेल में घर के लिए ₹50,000 किराया देते थे।

लोढ़ा के लिए ज्यादा किराया सिर्फ रहने का खर्च नहीं था। उनका मानना ​​था कि वे जिस इलाके में रहते थे, उसका उनकी सोच, लक्ष्यों और काम करने के तरीके पर सीधा असर पड़ता था। उन्होंने कहा कि यह फैसला सही था, भले ही उनके आस-पास के लोगों ने इस पर सवाल उठाए हों।

लोढ़ा 50,000 महीना किराया देते थे

लोढ़ा ने अपने X पोस्ट में कहा, “जब मैं महीने में ₹1 लाख कमाता था तो मैं लोअर परेल में रहने चला गया और ₹50,000 किराया देता था।” उन्होंने कहा कि लोगों को यह समझना मुश्किल लगता था कि वह अपनी कमाई का इतना बड़ा हिस्सा किराए पर क्यों खर्च करना चाहते थे।

कुछ लोगों ने तो इस फैसले के लिए उन्हें “पागल” भी कहा। हालांकि लोढ़ा के मुताबिक लोअर परेल में रहने से उन्हें ऐसा माहौल मिला, जिसने उनके करियर और काम को देखने का नजरिया बदल दिया। उन्हें लगा कि उनके आस-पास के लोग, जीवनशैली और मौकों ने उन्हें बड़े सपने देखने के लिए प्रेरित किया।

उन्होंने कहा- अपनी सैलरी का 50% किराए पर खर्च करने के लिए सबने मुझे पागल कहा। लेकिन उस माहौल ने मेरे सोचने और काम करने के तरीके को पूरी तरह बदल दिया।”

उन्होंने किराए को एक निवेश के तौर पर देखा

लोढ़ा ने कहा कि हर महीने जो रकम वह देते थे, उसे सिर्फ घर के किराए के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। उनके लिए आस-पास का माहौल भी जरूरी था क्योंकि वह उनकी महत्वाकांक्षाओं पर असर डाल सकता था। कभी-कभी किसी जगह की कीमत उसके किराए से नहीं मापी जाती। यह उस महत्वाकांक्षा से मापी जाती है, जो वह आपके अंदर पैदा करती है। उनकी बातों से इस बात पर भी चर्चा शुरू हो गई है कि क्या किसी खास इलाके में रहने के लिए ज्यादा खर्च करने से ऐसे फायदे हो सकते हैं, जिन्हें पैसों में मापना मुश्किल हो।

यूजर्स ने माहौल की अहमियत पर चर्चा की

कई यूजर्स लोढ़ा की बात से सहमत थे और उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति के आस-पास का माहौल उसकी तरक्की में भूमिका निभा सकता है। एक यूजर ने कहा कि महत्वाकांक्षी लोगों और नए मौकों के बीच रहने का ऐसा असर हो सकता है जिसे हमेशा आंकड़ों के जरिए नहीं दिखाया जा सकता।

यूजर्स ने माहौल की अहमियत पर चर्चा की

कई यूजर्स लोढ़ा की बात से सहमत थे और उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति के आस-पास का माहौल उसकी तरक्की में भूमिका निभा सकता है। एक यूजर ने कहा कि महत्वाकांक्षी लोगों और नए मौकों के बीच रहने का ऐसा असर हो सकता है जिसे हमेशा आंकड़ों के जरिए नहीं दिखाया जा सकता।

एक यूजर ने कमेंट सेक्शन में कहा, “यह आपको जीवन की जो गुणवत्ता देता है, उसे असल में पैसों के रूप में नहीं मापा जा सकता। यह हमें कई ऐसी चीज़ें देता है जिन्हें मापा नहीं जा सकता। और हर चीज़ का विश्लेषण नहीं किया जाना चाहिए। जीवन में भावनात्मक फ़ैसलों की भी जरूरत होती है।”

NCR के बाहर ‘रियल एस्टेट बूम’: मेरठ से नौगांव तक क्यों आसमान छू रही हैं जमीन-मकान की कीमतें? जानिए पूरी इनसाइड स्टोरी

NCR Satellite Towns Real Estate Boom: मेरठ के रहने वाले प्रदीप चौधरी जब करीब ढाई साल पहले अपने शहर की एक पॉश कॉलोनी में 150 वर्ग गज के घर की जानकारी लेने गए थे, तब उसकी कीमत लगभग ₹1.1 करोड़ थी। हाल ही में उन्होंने वही प्रॉपर्टी ₹2.5 करोड़ में खरीदी।

प्रदीप बताते हैं, ‘अगर मैं ऐसा ही घर नोएडा में खरीदता तो ₹4-5 करोड़ लगते, और गुरुग्राम में तो रेट इससे भी कहीं ज्यादा हैं। मैं दिल्ली में नौकरी करता हूं, लेकिन दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे और नमो भारत (RRTS) आने के बाद अब मेरठ से दिल्ली पहुंचने में सिर्फ 50 मिनट लगते हैं। यह सफर नोएडा या गुरुग्राम के कुछ इलाकों से भी ज्यादा आसान और तेज है। फिर मैं करोड़ों रुपये ज्यादा क्यों खर्च करूं?’

प्रदीप की यह कहानी अकेले उनकी नहीं है। यह दिल्ली-एनसीआर के रियल एस्टेट मार्केट में आ रहे एक ऐतिहासिक बदलाव की बानगी है। दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे, नमो भारत (RRTS), गंगा एक्सप्रेसवे और दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे जैसे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स ने दूरी और समय को इतना घटा दिया है कि लोग अब नोएडा, दिल्ली या गुरुग्राम जाने के बजाय मेरठ और नौगांव जैसे उभरते शहरों में घर और जमीन खरीदना ज्यादा पसंद कर रहे हैं।

मेरठ का रियल एस्टेट मार्केट: सिर्फ 2-3 साल में दोगुनी हुईं कीमतें

मेरठ इस इंफ्रास्ट्रक्चर बूम का सबसे बड़ा उदाहरण बनकर उभरा है। नमो भारत/RRTS और एक्सप्रेसवे कनेक्टिविटी ने मेरठ को दिल्ली-एनसीआर का एक प्रैक्टिकल ‘कम्यूटर हब’ बना दिया है।

रियल एस्टेट डेवलपर्स एसोसिएशन ऑफ मेरठ (REDAM) के अध्यक्ष अशोक गर्ग के मुताबिक, ‘पहले दिल्ली से दूरी और जाम मेरठ की सबसे बड़ी कमजोरी थी, लेकिन अब इंफ्रास्ट्रक्चर ने बाजी पलट दी है। पिछले 2 से 3 सालों में मेरठ में जमीन के रेट 100 फीसदी तक बढ़ चुके हैं। दिल्ली-नोएडा की तुलना में मेरठ में रहने का खर्च बहुत कम है, इसलिए लोग यहां रहकर दिल्ली में आराम से नौकरी कर रहे हैं।’

सरकार मोदीपुरम के पास एक विशेष विकास क्षेत्र विकसित कर रही है, जिससे यहां कमर्शियल और बिजनेस एक्टिविटीज को और बड़ा बूस्ट मिलेगा। मेरठ के पॉश इलाके साकेत में ढाई साल पहले जमीन ₹80,000 से ₹90,000 प्रति वर्ग गज थी, जो आज बढ़कर ₹2 लाख से ₹2.25 लाख प्रति वर्ग गज तक पहुंच गई है।

दिल्ली-NCR के मुकाबले क्यों लोगों की पसंद बन रहे हैं मेरठ जैसे शहर?

पहले जहां लोग नौकरी के सिलसिले में दिल्ली, नोएडा या गुरुग्राम में बसने का सपना देखते थे, वहीं अब महंगी प्रॉपर्टी और रोज के ट्रैफिक जाम के कारण वे अपने फैसले पर पुनर्विचार कर रहे हैं। दरअसल, मेरठ जैसे उभरते सैटेलाइट शहरों में ₹1.5 से ₹2.5 करोड़ में बड़ा विला या स्वतंत्र मकान मिल जाता है, जबकि नोएडा-गुरुग्राम में छोटे फ्लैट्स के लिए भी ₹4 से ₹6 करोड़ तक चुकाने पड़ते हैं।

इसके अलावा, एक्सप्रेसवे और नमो भारत (RRTS) की बदौलत अब मेरठ से दिल्ली का सफर ट्रैफिक जाम से बचकर महज 50 मिनट से 1 घंटे में पूरा हो जाता है, जो नोएडा या गुरुग्राम के कई इलाकों से भी तेज है। कम रहने का खर्च और बेहतर स्पेस मिलने की वजह से ही लोग अब इन नए शहरों का रुख कर रहे हैं।

नौगांव और बड़ौदा मेव: फार्महाउस और रिजॉर्ट्स का बूम

अगर मेरठ रोज की भागदौड़ और नौकरीपेशा लोगों की पहली पसंद बन रहा है, तो राजस्थान के अलवर क्षेत्र में स्थित नौगांव और बड़ौदा मेव वीकेंड होम्स और फार्महाउस के लिए हॉटस्पॉट बन चुके हैं।

दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे ने इन इलाकों को गुरुग्राम और दिल्ली के बेहद करीब ला खड़ा किया है। स्थानीय डीलरों के अनुसार, दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे बनने के बाद नौगांव और बड़ौदा मेव के अर्बन लोकल बॉडी इलाकों में जमीनों के दाम 30 से 40 फीसदी तक चढ़ चुके हैं।

राम रतन ग्रुप के चेयरमैन विजय राम रतन बताते हैं कि एक्सप्रेसवे ने दिल्ली-गुरुग्राम के लोगों के लिए वीकेंड ट्रैवल को बहुत आसान बना दिया है। नौगांव के आसपास होटल, फार्महाउस रिजॉर्ट्स और ग्लैंपिंग की बुकिंग्स में भारी उछाल आया है।

डेवलपर्स की नई रणनीति: हाइवे किनारे होर्डिंग्स की भरमार

दिल्ली-एनसीआर के बड़े बिल्डर्स अब पारंपरिक हब्स को छोड़कर इन नए रूटों का रुख कर रहे हैं। डेवलपर्स को इन नए इलाकों में बड़े भूखंड काफी सस्ते दामों पर मिल रहे हैं। दिल्ली-देहरादून कॉरिडोर के पास बागपत और दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे के पास नौगांव में बड़े बिल्डर्स प्लॉट्स, लग्जरी विला और गेटेड फार्म कम्युनिटीज ला रहे हैं।हाइवे किनारे लगे बड़े-बड़े बिलबोर्ड्स इस बात का सबूत हैं कि अब दूरी किलोमीटर से नहीं, बल्कि ‘मिनटों’ से नापी जा रही है।

कनेक्टिविटी ने पलट दिया पूरा गेम?

मेरठ और नौगांव भले ही दो अलग-अलग तरह के रियल एस्टेट मार्केट हों जहां मेरठ रोजाना दिल्ली आकर नौकरी करने वालों का नया ठिकाना बन रहा है, वहीं नौगांव वीकेंड गेटवे और लाइफस्टाइल फार्महाउस के रूप में उभर रहा है। लेकिन दोनों को जोड़ने वाली सबसे बड़ी कड़ी है एक्सप्रेसवे और हाई-स्पीड रेल कनेक्टिविटी। बेहतर कनेक्टिविटी ने यह साबित कर दिया है कि अगर सफर आसान हो, तो महंगे एनसीआर हब्स में करोड़ों रुपये फंसाने की बिल्कुल जरूरत नहीं है।

पहाड़ों में बसने का सपना 71 दिनों में ही टूटा! दिल्ली छोड़ मनाली रहने गए Gen Z कंटेंट क्रिएटर ने लौटकर क्या बताया?

भागदौड़ भरी जिंदगी, शहरों में पलूशन वाली जहरीली हवा और तेज रफ्तार लाइफ से ऊबकर पहाड़ों की शांत वादियों में जा बसना आज हर वर्किंग युवा का सपना लगता है। वर्क फ्रॉम होम और रील्स की दुनिया में हर कोई बस यही सोचता है कि काश! वो भी सब कुछ छोड़कर पहाड़ों में हमेशा के लिए बस जाए। दिल्ली के रहने वाले एक Gen Z कंटेंट क्रिएटर अजय शर्मा ने भी कुछ ऐसा ही किया। वो यह देखने मनाली पहुंचे कि क्या सचमुच पहाड़ों की जिंदगी वैसी ही हसीन होती है जैसी तब लगता है जब हम छुट्टियां मनाने पहाड़ पहुंचते हैं या फिर इसके पीछे कोई और ही सच्चाई छिपी है?

अजय ने 23 मई को दिल्ली से मनाली के पास बसे छोटे से गांव सियाल में शिफ्ट हुए थे। उनका इरादा था कि वो यहां टूरिस्ट बनकर नहीं बल्कि लोकल शख्स की तरह रहें। अजय ने पूरे 71 दिन पहाड़ों में बिताए, इस दौरान करीब 55 वीडियो बनाए और अपनी रोजमर्रा की जिंदगी का हर पल इंटरनेट पर लोगों के साथ शेयर किया। लेकिन 2 अगस्त आते-आते उनका यह सपना सिमट गया और वो वापस दिल्ली लौट आए।

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जब अनजाने रास्ते और अजनबी लोग धीरे-धीरे अपने से लगने लगेअजय जब मनाली पहुंचे थे तो वहां उनका कोई अपना नहीं था, कोई जान-पहचान नहीं थी। लेकिन देखते ही देखते वो वहां की गलियों, रास्तों, हसीन वादियों और लोकल लोगों के करीब आ गए, उनसे घुल-मिल गए। जो काम सिर्फ एक प्रयोग की तरह शुरू हुआ था, वो उनकी जिंदगी का एक अनमोल हिस्सा बन गया।

दिल्ली लौटने के बाद एक वीडियो में उन्होंने मनाली की अपनी यादों को साझा किया। उन्होंने बताया कि सिर्फ दो महीने से थोड़े ज्यादा वक्त में जिस जगह से उनका इतना दिल लग गया था, उसे छोड़कर आना दर्दनाक था। अजय के मुताबिक इस तजुर्बे ने उन्हें उम्मीद से कहीं ज्यादा गहराई और जिंदगी का नया नजरिया दिया। मनाली को अलविदा कहना उनके लिए बेहद मुश्किल था क्योंकि यह सिर्फ कोई ट्रिप खत्म नहीं हो रही थी बल्कि उनकी जिंदगी के एक नए दौर की शुरुआत थी।

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क्या वाकई पहाड़ों में बसना उतना ही हसीन है, जितना छुट्टियों में दिखता है?

अजय के मनाली शिफ्ट होने की सबसे बड़ी वजह एक सीधे से सवाल का जवाब तलाशना था। वो ये कि क्या पहाड़ों में बसकर रहना सचमुच उतना ही मजेदार है जितना वहां कुछ दिनों की छुट्टियां बिताना? मनाली जाने से पहले अजय के दिलो-दिमाग में भी एक आम शहर की तरह ही खूबसूरत ख्यालात थे, पहाड़ों के खूबसूरत दृश्यों के बीच काम करना, ढलते और उगते सूरज को देखना, आसपास की वादियों में घूमना, वहां का लोकल फूड ट्राई करना और रात में अलाव के गिर्द बैठकर लोगों से बातें करना।

इनमें से कई हसीन पल उन्होंने जिए भी। लेकिन वहां फुल टाइम रहने पर उन्हें उन मुश्किलों से रूबरू होना पड़ा जो अक्सर तब नहीं समझ में आतीं जब हम छुट्टियों में पहाड़ घूमने जाते हैं।

मनाली में रहने का खर्च: उम्मीद से कहीं ज्यादा किफायती!मनाली में रहने के दौरान अजय का सबसे हैरान कर देने वाला अनुभव वहां का खर्च रहा। ये उनकी उम्मीद से काफी कम निकला। अजय सियाल गांव में 14000 रुपये महीने के किराये पर अकेले एक वन-बैडरूम फ्लैट में रहते थे। इस किराये में वाई-फाई और बिजली का बिल दोनों शामिल थे। वो ज्यादातर वक्त घर पर ही खाना खुद बनाते थे। राशन और ग्रोसरी पर महीने का लगभग 3500 रुपये खर्च आता था। जब कभी खाना पकाने का मन न होता, तो वो हफ्ते में एक-दो बार बाहर खा लेते थे। इसमें करीब 500 रुपये हफ्ते का खर्च बैठता था।

फिटनेस के शौकीन अजय ने वहां का एक लोकल जिम भी जॉइन किया। वैसे तो जिम की फीस 1800 रुपये महीना थी, लेकिन उन्होंने बात करके इसे 1500 रुपये करवा लिया। अजय को गाड़ियों के बजाय पैदल चलना पसंद था, इसलिए लोकल ट्रैवल पर उनका न के बराबर पैसा खर्च होता था। अगर इन सारे खर्चों को जोड़ दिया जाए, तो मनाली में अजय का कुल मासिक खर्च करीब 21000 रुपये के आसपास आता था।

वो दिक्कतें जो आम पर्यटकों की नजरों से हमेशा छिपी रह जाती हैं

मनाली ने अजय को सुकून और नए अनुभव तो दिए, लेकिन जैसे-जैसे दिन बीते कुछ प्रैक्टिकल प्रॉब्लम भी सामने आईं। पहाड़ों में अक्सर नेटवर्क की समस्या रहती थी, जिससे ऑनलाइन काम करना या वर्क फ्रॉम होम संभालना बेहद मुश्किल हो जाता था। पहाड़ों का मौसम मजेदार होने के साथ टेंशन देने वाला भी मिला। बिना किसी पूर्व चेतावनी के अचानक तेज बारिश शुरू हो जाती थी। मानसून के आते ही सड़कें और रोजमर्रा की आवाजाही बेहाल हो गई।

यहां अकेले रहने का मतलब था कि खाना बनाने से लेकर साफ-सफाई और घर के बाकी सारे काम अजय को खुद ही करने पड़ते थे। मशहूर टूरिस्ट स्पॉट्स तक पहुंचने के लिए लंबी और सीधी चढ़ाई चढ़नी पड़ती थी। छुट्टियों में ऐसी ट्रैकिंग भले ही रोमांचक लगे लेकिन हर दिन ऐसा करना शरीर को तोड़कर रख देता है। सबसे बड़ी चुनौती थी उनका अकेलापन। जिस खामोशी और शांति की तलाश में वो दिल्ली से भागे थे, वही सन्नाटा धीरे-धीरे दीमक की तरह उन्हें काटने लगा और भारी अकेलेपन में बदल गया।

अजय ने 3 जुलाई को शेयर किए गए एक वीडियो में इन तमाम दुश्वारियों का जिक्र किया था और बताया था कि आखिर क्यों पहाड़ों में उनका स्टे समय से पहले खत्म होने जा रहा है।

मनाली से लौटकर अब एक नई राह पर हैं अजय

मनाली का अपना 71 दिनों का आशियाना छोड़कर अजय अब वापस दिल्ली लौट आए हैं, लेकिन पहाड़ों को लेकर उनका नजरिया अब पूरी तरह बदल चुका है। इस छोटे से स्टे ने उन्हें एक बड़े शहर से दूर रहने की खूबसूरती और उसकी कड़वी सच्चाइयों दोनों से रूबरू करा दिया। अजय आज भी मनाली में बिताए अपने इन दिनों को जिंदगी का सबसे हसीन और यादगार पल मानते हैं। दिल्ली लौटने के बाद अब वो जिंदगी को एक नए अंदाज में खंगाल रहे हैं। उनके हालिया वीडियो बता रहे हैं कि पहाड़ों की बर्फीली वादियों के बाद अब वो समुद्र के शांत किनारों पर अपना वक्त बिता रहे हैं।

अमेरिका में 43 लाख की सर्जरी भारत में सिर्फ 4.3 लाख में हुई! फिर भी अमेरिकी महिला ने बताईं ये 3 कमियां

अमेरिका की एक महिला की सोशल मीडिया पोस्ट इन दिनों तेजी से चर्चा में है। उन्होंने अपनी मां के इलाज से जुड़ा ऐसा अनुभव साझा किया, जिसने अलग-अलग देशों में मेडिकल खर्च को लेकर बहस छेड़ दी। मां की सर्जरी के लिए अमेरिका में मिले खर्च के अनुमान ने परिवार को दूसरे विकल्प तलाशने पर मजबूर किया। इसके बाद उन्होंने विदेश में इलाज कराने के बारे में सोचा और कई देशों पर विचार किया। इसी दौरान भारत का विकल्प भी उनके सामने आया। परिवार के लिए यह फैसला आसान नहीं था, क्योंकि इलाज के साथ नए देश में अस्पताल, सुविधाओं और पूरी प्रक्रिया को लेकर भी भरोसा जरूरी था।

लेकिन भारत पहुंचने के बाद सामने आया अनुभव उनके लिए उम्मीद से अलग रहा। महिला ने अपने अनुभव को सोशल मीडिया पर साझा किया, जिसके बाद भारत की मेडिकल सुविधाओं और इलाज की लागत को लेकर लोगों के बीच चर्चा शुरू हो गई।

डॉक्टर की सलाह पर भारत आए

इसी दौरान महिला के एक डॉक्टर दोस्त ने उन्हें भारत में इलाज कराने की सलाह दी। इसके बाद परिवार ने भारत आने का फैसला किया। महिला के अनुसार, भारत के एक बड़े अस्पताल में उनकी मां की सर्जरी हुई। अस्पताल में रहने का खर्च भी इसमें शामिल था।

सिर्फ ₹4.3 लाख में हुआ इलाज

महिला ने बताया कि भारत में सर्जरी और अस्पताल में रहने समेत कुल खर्च करीब 4,500 डॉलर यानी 4.3 लाख रुपये आया। अमेरिका में मिले अनुमान से तुलना करें तो यह रकम करीब दस गुना कम थी। हालांकि, इलाज का वास्तविक खर्च मरीज और बीमारी के हिसाब से अलग हो सकता है।

इलाज की गुणवत्ता ने किया प्रभावित

महिला ने केवल कम खर्च की तारीफ नहीं की। उन्होंने भारत में मिली मेडिकल सुविधाओं और देखभाल को भी अच्छा बताया। उनके मुताबिक, इलाज उनकी उम्मीद से बेहतर रहा। इसी वजह से उन्होंने भारत में मेडिकल टूरिज्म की संभावनाओं पर भी बात की।

भारत में मेडिकल टूरिज्म का बड़ा मौका

महिला का मानना है कि भारत अगर विदेशी मरीजों के लिए यात्रा, लॉजिस्टिक्स और सुरक्षा जैसी सुविधाओं को और बेहतर करे, तो मेडिकल टूरिज्म में देश और आगे बढ़ सकता है। उनके मुताबिक, भारत के पास इस क्षेत्र में काफी बड़ी संभावनाएं हैं।

सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस

पोस्ट वायरल होने के बाद लोगों ने अमेरिका और भारत में इलाज की लागत पर चर्चा शुरू कर दी। कई यूजर्स ने सवाल किया कि अमेरिका जैसे विकसित देश में मेडिकल ट्रीटमेंट इतना महंगा क्यों है कि लोग इलाज के लिए विदेश जाने पर मजबूर हो रहे हैं।

निजी अस्पतालों की भी हुई तारीफ

कुछ यूजर्स ने भारत के निजी अस्पतालों की तारीफ की। उनका कहना था कि कई अस्पताल कम लागत में अच्छी मेडिकल सुविधाएं उपलब्ध कराते हैं। हालांकि, कुछ लोगों ने यह भी कहा कि भारत की सरकारी और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में अभी सुधार की जरूरत है।

विदेशी मरीजों को मिलती है मदद

मेडिकल टूरिज्म से जुड़े लोगों के मुताबिक, कई भारतीय अस्पताल विदेशी मरीजों को इलाज के साथ दूसरी सुविधाओं में भी मदद करते हैं। इनमें एयरपोर्ट ट्रांसफर, रहने की व्यवस्था, अपॉइंटमेंट और इलाज का शेड्यूल शामिल हो सकता है।

 

जानें क्यों Gen Z की पहली पसंद बन रहे हैं दुनिया के ये 10 शहर! जहां लाइफ, करियर और मस्ती का मिलेगा पूरा पैकेज

आज की जेन जी जनरेशन अपने रहने के लिए ऐसी जगह पसंद करती है, जहां काम और पढ़ाई के साथ घूमने-फिरने, एंटरटेनमेंट और सोशल लाइफ का भी अच्छा बैलेंस हो। उनके लिए किसी शहर की पहचान सिर्फ बड़ी इमारतों या अच्छे जॉब ऑप्शन से नहीं होती, बल्कि वहां का कल्चर, नाइटलाइफ, खाने-पीने की जगहें और रोज की जिंदगी भी काफी मायने रखती है।

इसी वजह से दुनिया के कुछ शहर जेन जी के बीच तेजी से पॉपुलर हो रहे हैं। यहां किफायती लाइफस्टाइल, आसानी से घूमने की सुविधा और क्वालिटी ऑफ लाइफ जैसी कई चीजें युवाओं को अट्रैक्ट करती हैं। ‘टाइम आउट’ ने भी इन्हीं पहलुओं को ध्यान में रखते हुए जेन जी के लिए दुनिया के बेहतरीन शहरों की एक स्पेशल लिस्ट तैयार की है।

1. टोक्यो, जापान

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टोक्यो इस लिस्ट में पहले नंबर पर है। यहां सर्वे में शामिल सभी यूथ ने रोज खुश रहने की बात कही। शहर की तेज और आसान पब्लिक ट्रांसपोर्ट, देर रात तक चलने वाली नाइटलाइफ, म्यूजिक बार और कई जगहों पर मुफ्त म्यूजियम एंट्री जैसी फैसिलिटी यूथ को काफी पसंद आती हैं। यहां काम, मनोरंजन और घूमने के लिए बहुत सारे ऑप्शन मिलते हैं।

2. वेलेंसिया, स्पेन

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समुद्र के किनारे बसा वेलेंसिया अपने खूबसूरत मौसम और आरामदायक माहौल के लिए जाना जाता है। यहां रहने का खर्च कई बड़े यूरोपीय शहरों की तुलना में कम है। समुद्र तट, आउटडोर एक्टिविटीज और अच्छे लोगों की वजह से यहां की लाइफस्टाइल काफी सुकून भरी है। घर से काम करने वाले यूथ के लिए यह अच्छा शहर माना जाता है।

3. बैंकॉक, थाईलैंड

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बैंकॉक अपनी चहल-पहल, स्वादिष्ट स्ट्रीट फूड और शानदार नाइटलाइफ के लिए यूथ के बीच काफी पॉपुलर है। यहां कम बजट में खाने, घूमने और एंटरटेनमेंट के कई ऑप्शन मिल जाते हैं। शहर का माहौल काफी एनर्जेटिक है, इसलिए यहां रहने वाले युवा काम के साथ घूमने और दोस्तों के साथ समय बिताने का मजा भी ले सकते हैं।

4. कोपेनहेगन, डेनमार्क

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कोपेनहेगन को अच्छी लाइफ क्वालिटी और बेहतर वर्क-लाइफ बैलेंस के लिए पसंद किया जाता है। यहां साइकिल से घूमना काफी आसान है और शहर में हरियाली भी खूब देखने को मिलती है। साफ-सुथरा माहौल और पर्यावरण को लेकर जागरूक लाइफस्टाइल इसे उन युवाओं के लिए खास बनाती है, जो करियर के साथ अपनी सेहत और प्राइवेट लाइफ पर भी ध्यान देना चाहते हैं।

5. पोर्टो, पुर्तगाल

पोर्टो अपनी खूबसूरत पुरानी इमारतों, समुद्र तटों और मिलनसार लोगों के लिए जाना जाता है। यहां कम्युनिटी का माहौल काफी अच्छा है, जिससे नए लोगों के लिए घुलना-मिलना आसान हो जाता है। बाहर खाना-पीना भी कई दूसरे यूरोपीय शहरों की तुलना में कम खर्चीला है। शहर की संस्कृति और शांत माहौल युवाओं को काफी अट्रैक्ट करता है।

6. बर्लिन, जर्मनी

बर्लिन को युवा और क्रिएटिव लोगों का शहर कहा जा सकता है। यहां की नाइटलाइफ, आर्ट सीन, म्यूजिक और बड़े पार्क युवाओं को खूब पसंद आते हैं। शहर में मनोरंजन के कई बजट-फ्रेंडली ऑप्शन हैं। साथ ही स्टार्टअप और क्रिएटिव इंडस्ट्री में काम करने वालों के लिए भी यहां अच्छे मौके मिलते हैं।

7. न्यूयॉर्क, अमेरिका

न्यूयॉर्क अपनी तेज रफ्तार जिंदगी और हर समय एक्टिव रहने वाले माहौल के लिए मशहूर है। शहर में पैदल घूमना आसान है और यहां हर तरह के म्यूजियम, थिएटर, रेस्टोरेंट और कल्चरल इवेंट मिल जाते हैं। नौकरी और करियर के बहुत सारे मौके होने के कारण यह युवाओं को अट्रैक्ट करता है, लेकिन यहां रहना काफी महंगा हो सकता है।

8. शंघाई, चीन

शंघाई आधुनिक इमारतों, शानदार इंफ्रास्ट्रक्चर और सुरक्षित माहौल के लिए जाना जाता है। यहां टेक्नोलॉजी और बिजनेस से जुड़े करियर के कई मौके मिलते हैं। नए लोगों के लिए भी शहर में कई तरह की फैसिलिटीज हैं। यही वजह है कि करियर पर फोकस करने वाले युवा इसे एक अच्छा ऑप्शन मानते हैं।

9. एडिनबर्ग, स्कॉटलैंड

एडिनबर्ग अपनी पुरानी बिल्डिंग, इतिहास और खूबसूरत हरियाली के लिए खास है। यहां सुरक्षा अच्छी है और शहर में पैदल घूमना भी आसान है। इसके अलावा यहां की अनोखी नाइटलाइफ युवाओं को अट्रैक्ट करती है। काम और आराम के बीच अच्छा बैलेंस बनाने के लिए भी यह शहर पसंद किया जाता है।

10. मेलबर्न, ऑस्ट्रेलिया

मेलबर्न अपनी क्रिएटिविटी, कला और खाने-पीने के लिए मशहूर है। यहां अच्छे रेस्टोरेंट के साथ इंडी थिएटर, लाइव कॉमेडी और म्यूजिक जैसे एंटरटेनमेंट के कई ऑप्शन मिलते हैं। शहर के अलग-अलग इलाकों में कम बजट में खाने-पीने की जगहें भी मिल जाती हैं। यही वजह है कि करियर की शुरुआत करने वाले युवा प्रोफेशनल्स के लिए मेलबर्न अट्रैक्टिव सिटी है।

शहर की नौकरी छोड़ पहाड़ों में बसे पति-पत्नी! 4BHK मकान, फ्री पानी और ₹50 हजार के खर्च का ब्रेकडाउन वायरल

शहर की तेज रफ्तार जिंदगी से दूर पहाड़ों के बीच रहना सुनने में जितना खूबसूरत लगता है, उतना ही दिलचस्प है यह जानना कि वहां रोजमर्रा की जिंदगी कितने खर्च में चलती है। हिमाचल प्रदेश के मनाली के पास रहने वाले दिव्या भट्ट और सौरभ यादव ने अपनी पहाड़ी जिंदगी की झलक सोशल मीडिया पर साझा की है। दोनों ने गजान गांव में अपना ठिकाना बनाया है और साथ ही होमस्टे भी चलाते हैं। दिव्या ने अपने एक वीडियो में बताया कि पहाड़ों में रहते हुए उनका महीने का खर्च करीब ₹50 हजार आता है।

इस बजट में घर का राशन, बाहर खाना, ईंधन, बिजली और घूमने-फिरने जैसे खर्च शामिल हैं। खास बात यह है कि आसपास की प्राकृतिक खूबसूरती ही उनके लिए मनोरंजन का बड़ा जरिया है, इसलिए कई आउटिंग पर ज्यादा पैसा खर्च नहीं होता। अब उनका यह सादा लेकिन खूबसूरत लाइफस्टाइल इंटरनेट पर लोगों का ध्यान खींच रहा है।

मनाली के पास गांव में बसाया घर

दिव्या और सौरभ ने हिमाचल प्रदेश के गजान गांव को अपना ठिकाना बनाया है। यह गांव मनाली के पास हिमालयी इलाके में स्थित है। दोनों यहां रहते भी हैं और एक होमस्टे भी चलाते हैं। दिव्या ने इंस्टाग्राम पर ‘Living in the Mountains, Episode 1’ नाम से वीडियो शेयर किया, जिसमें उन्होंने पहाड़ों में अपनी जिंदगी और हर महीने होने वाले खर्च का हिसाब बताया।

1BHK का किराया करीब ₹15 हजार

कपल जिस 4BHK प्रॉपर्टी में रहता है, उसका इस्तेमाल उनके होमस्टे से भी जुड़ा है। इसलिए उनका रहने का खर्च सामान्य किरायेदार से अलग है। दिव्या के मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति सिर्फ रहने के लिए मनाली के पास घर किराए पर लेना चाहता है, तो 1BHK का किराया करीब ₹15,000 और 2BHK का करीब ₹25,000 तक हो सकता है।

घर का खाना, फिर भी ₹15 हजार का फूड बजट

पहाड़ों में रहने के बावजूद कपल खाने पर बहुत ज्यादा खर्च नहीं करता। दोनों ज्यादातर खाना घर पर ही बनाते हैं। दिव्या के मुताबिक, उनकी महीने की ग्रॉसरी करीब ₹10,000 आती है। इसके अलावा बाहर खाने-पीने पर करीब ₹5,000 खर्च हो जाते हैं।

छोटी दूरी के लिए गाड़ी नहीं, पैदल सफर

गांव में रहने का एक फायदा यह भी है कि रोजमर्रा के कई छोटे काम पैदल ही हो जाते हैं। दिव्या ने बताया कि दोनों स्थानीय स्तर पर ज्यादातर जगह पैदल जाते हैं। इसके बावजूद गाड़ी के ईंधन पर करीब ₹3,000 प्रति महीने खर्च हो जाता है।

पानी का बिल जीरो, बिजली करीब ₹1,000

यूटिलिटी खर्च की बात करें तो कपल के लिए पानी पर कोई मासिक खर्च नहीं है। दिव्या के अनुसार, पानी मुफ्त है। वहीं बिजली का बिल करीब ₹1,000 प्रति महीने आता है।

पहाड़ों में घूमना भी बजट में शामिल

पहाड़ों में रहने का सबसे बड़ा फायदा शायद यही है कि घूमने के लिए महंगी जगहों की जरूरत नहीं पड़ती। आसपास प्रकृति आसानी से उपलब्ध है, इसलिए कपल की ज्यादातर आउटिंग मुफ्त ही होती हैं। फिर भी अपने छोटे-मोटे माउंटेन एडवेंचर पर करीब ₹3,000 महीने का खर्च हो जाता है।

करीब ₹50 हजार में पूरा महीना

दिव्या के मुताबिक, ग्रॉसरी, बाहर का खाना, ईंधन, बिजली और घूमने-फिरने जैसे खर्च जोड़ने पर दोनों का कुल मासिक खर्च करीब ₹50,000 बैठता है। हालांकि, उनका रहने का इंतजाम होमस्टे बिजनेस से जुड़ा है, इसलिए यह खर्च ऐसे व्यक्ति से अलग होगा जो सिर्फ अपने रहने के लिए घर किराए पर लेता है।

लोगों को पसंद आई पहाड़ों वाली जिंदगी

वीडियो सामने आने के बाद लोगों का ध्यान सिर्फ ₹50 हजार के बजट पर नहीं गया, बल्कि कपल की शांत जिंदगी ने भी खूब आकर्षित किया। एक यूजर ने पहाड़ों के नजारे को जिंदगी का ‘प्रीमियम सब्सक्रिप्शन’ बताया। वहीं कई लोगों ने कहा कि असली लग्जरी पैसा नहीं, बल्कि ऐसी जगह मिलने वाला सुकून और शांति है।

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जंतर-मंतर प्रदर्शन के बाद CJP का पार्टी वीडियो वायरल, फंडिंग पर उठे सवाल; क्या बोले तवलीन सिंह और सौरव दास?

mahesh jethmalani, tavleen singh and saurabh dass on CJP party viral video

दिल्ली के जंतर-मंतर पर कई दिनों तक चले विरोध प्रदर्शन के बाद कॉकरोच जनता पार्टी का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इसमें सीजेपी से जुड़े कई लोग एक होटल में पार्टी करते दिखाई दे रहे हैं। इससे अलावा प्रदर्शनस्थल पर सीजेपी कार्यकर्ताओं के जश्न मनाते वीडियो भी जमकर वायरल हो रहे हैं। इन वीडियो पर मचे बवाल के बाद सीजेपी के मुख्य प्रवक्ता सौरव दास और प्रख्यात लेखिका तवलीन सिंह के जवाब भी चर्चा में है। ALSO READ: धर्मेंद्र प्रधान पर पोस्ट से BJP में बवाल! अपराजिता सारंगी की बेटी अर्चिता राहर घिरीं, पार्टी नेताओं ने जताई नाराजगी

 

महेश जेठमलानी ने उठाए फंडिंग पर सवाल?

इस वीडियो को सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट महेश जेठमलानी ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर शेयर किया है। वायरल वीडियो में CJP के कुछ लोग एक होटल में पार्टी करते हुए दिखाई दे रहे हैं। वहां जश्न का माहौल है और नाच-गाना भी चल रहा है।

महेश जेठमलानी ने अपनी पोस्ट में लिखा, 'क्या सच में ऐसा हो रहा है? CJP की लीडरशिप दिल्ली के एक होटल में पार्टी दे रही है। राजधानी दिल्ली में कई दिनों तक विरोध प्रदर्शन हुए। ऐसे में सवाल यह है कि इनके ट्रैवल, खाने और रहने का खर्च किसने उठाया? इनकी फंडिंग किसने की? ALSO READ: 'बेटी के बयान से दुखी हूं, लेकिन पिता को दोष नहीं दे सकते'— केशव महंता के बचाव में बोले हिमंत बिस्वा सरमा

तवलीन सिंह ने दिया जवाब

तवलीन सिंह ने एक्स पर अपनी पोस्ट में कहा, भाजपा अब कॉकरोच को एक 'फाइव-स्टार होटल' में पार्टी करते हुए दिखाकर उन्हें बदनाम करने की कोशिश कर रही है। क्या हम यह पूछ सकते हैं कि इतने सारे भाजपा मंत्रियों और उनकी संतानों के पास डिजाइनर कपड़े और कार्टियर के चश्मे खरीदने के लिए पैसे कहाँ से आते हैं? ALSO READ: प्रधान के बाद अब गडकरी निशाने पर! 100% शुद्ध पेट्रोल के लिए 'E20 जनता पार्टी' मैदान में

 

क्या बोले सौरव दास?

कॉकरोच जनता पार्टी के मुख्य प्रवक्ता सौरव दास ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के बाद सीजेपी के कार्यकर्ताओं साथ पार्टी और डांस करने के वायरल वीडियो पर की जा रही टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया दी है। सौरव दास ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, 'इससे एक बार फिर साफ़ हो जाता है कि सरकार और गोदी एंकर, जेन-ज़ी और नई पीढ़ी की सोच और भाषा को समझ ही नहीं पा रहे हैं।'

 

उन्होंने कहा कि हम जितने दिन जरूरत होगी, उतने दिन सड़क पर बैठ सकते हैं। हम नाचते-गाते हुए भी प्रदर्शन कर सकते हैं। हम हाथ में कोल्ड कॉफी लेकर भी आंदोलन को संगठित कर सकते हैं। बदलाव के लिए लड़ने के लिए हमारा वैसा दिखना जरूरी नहीं है, जैसा पिछली पीढ़ियां किसी आंदोलन से उम्मीद करती हैं।

सौरव दास ने कहा कि यही इस पीढ़ी की पहचान है-आत्मविश्वासी, रचनात्मक, जुझारू और ऐसी, जिसे किसी एक तयशुदा छवि में बांधा नहीं जा सकता। अंकल-आंटी चाहे जितनी शिकायत करते रहें, उन्हें हमारी इस पीढ़ी के साथ जीना और हमें स्वीकार करना ही होगा।

‘महीने में 10 लाख कमा कर 5 लाख दे रहा हूं टैक्स’, कनाडा में 18 महीने काम करने के बाद भारत लौटे व्यक्ति ने बयां किया दर्द

कई भारतीयों के लिए कनाडा एक ऐसी जगह है, जहां बेहतर मौके और आरामदायक जिंदगी का इंतजार होता है। लेकिन तब क्या होता है जब कोई ऐसा व्यक्ति, जिसने वह सपना जी लिया हो, कहे कि यह सब बेकार था? क्या सिर्फ ज्यादा कमाई से विदेश में बेहतर जिंदगी की गारंटी मिल सकती है?

ये सवाल एंटरप्रेन्योर हर्ष गुप्ता की एक वायरल सोशल मीडिया पोस्ट के केंद्र में हैं। वे परमानेंट रेजिडेंसी (PR) पर टोरंटो गए थे, लेकिन सिर्फ 18 महीने बाद ही लौट आए। अपने बिजनेस से महीने में लगभग 10 लाख रुपये कमाने के बावजूद, गुप्ता ने कहा कि ज्यादा टैक्स, रहने का बहुत ज्यादा खर्च, हेल्थकेयर में देरी और कॉम्पिटिटिव जॉब मार्केट ने उन्हें अपने फैसले पर दोबारा सोचने पर मजबूर कर दिया।

थ्रेड्स पर अपना अनुभव शेयर करते हुए गुप्ता ने लिखा, “अगर आप भारतीय हैं और कनाडा जाने के बारे में सोच रहे हैं, तो ये 10 बातें आपको पता होनी चाहिए।” उन्होंने विदेश जाने की योजना बना रहे किसी भी व्यक्ति की सबसे बड़ी चिंताओं में से एक – अच्छी नौकरी खोजने – से शुरुआत की। गुप्ता के अनुसार, कनाडा में अच्छी सैलरी वाली नौकरी मिलना बहुत से लोगों की उम्मीद से कहीं ज्यादा मुश्किल है। उन्होंने दावा किया कि कॉम्पिटिशन बहुत ज्यादा है, सैलरी भारत की तुलना में थोड़ी ही ज्यादा है और हर नौकरी के लिए हजारों लोग अप्लाई करते हैं।

गुप्ता ने लिखा, “अच्छी नौकरियां मिलना मुश्किल है। सैलरी भारत की तुलना में थोड़ी ही ज्यादा है। Shopify के अलावा कोई भी ग्लोबल लेवल की बड़ी कंपनी नहीं है। ज्यादा लोग CAD 15/घंटा (1,000 रुपये) पर काम कर रहे हैं। रहने का खर्च आपकी कमर तोड़ देगा। मैं डाउनटाउन टोरंटो में रहता था। एक साधारण 600 sq ft के अपार्टमेंट के लिए महीने का किराया 2 लाख रुपये था।”

फिर टैक्स का झटका लगा। गुप्ता ने कहा कि सबसे बड़े सरप्राइज में से एक वह टैक्स था, जो उन्हें अच्छी कमाई के बावजूद देना पड़ा। “टैक्स बहुत ज्यादा हैं। मैं अपने बिजनेस से महीने में 10 लाख रुपये कमाता था और 5 लाख रुपये टैक्स में देता था।”

एंटरप्रेन्योर ने कनाडा के हेल्थकेयर सिस्टम पर भी सवाल उठाए और कहा कि मेडिकल केयर मिलना उतना आसान नहीं था, जितना उन्होंने सोचा था। उन्होंने लिखा, “मुफ्त हेल्थकेयर एक मिथक है।” गुप्ता ने बताया कि उन्हें फैमिली डॉक्टर मिलने में छह महीने का इंतजार करना पड़ा। उन्होंने आगे कहा कि स्पेशलिस्ट से अपॉइंटमेंट लेने में दो महीने से ज्यादा का समय लगा। उन्होंने दवाओं की कीमत को भी एक और चिंता का विषय बताया।

मौसम भी एक चुनौती थी। गुप्ता के लिए, कनाडा की लंबी सर्दियां सिर्फ कम तापमान की बात नहीं थीं। उन्होंने रोज़मर्रा की जिंदगी पर भी असर डाला। उन्होंने लिखा, “यहां ठंड है और उदासी भी। अक्टूबर से अप्रैल तक, कोई बाहर नहीं निकलता। मैं टोरंटो की बात कर रहा हूं, किसी छोटे शहर की नहीं। हर दिन ढेरों कपड़े पहनने पड़ते हैं।”

गुप्ता का कहना था कि कनाडा में रहने का ज्यादा खर्च और तुलनात्मक रूप से कम सैलरी ने लोगों की जीवन की गुणवत्ता और नजरिए पर असर डाला है। उन्होंने यह भी कहा कि कई काबिल लोग बेहतर मौकों की तलाश में दूसरी जगहों पर चले जाते हैं। उनके अनुसार, परमानेंट रेजिडेंसी (PR) पाना मुश्किल होता जा रहा है, क्योंकि इसमें बहुत समय लगता है और एलिजिबिलिटी कट-ऑफ लगातार बढ़ रहे हैं।

गुप्ता ने अपनी बात यह कहते हुए खत्म की कि कनाडा शायद हर किसी के लिए सही जगह नहीं है। उन्होंने समझाया, “यह उन लोगों के लिए बना है, जिनके पास कोई बेहतर विकल्प नहीं है। अगर फ़ूड डिलीवरी, ट्रकिंग, खेती या ब्लू-कॉलर काम ही आपकी सीमा है, तो यह ठीक है। अगर आपमें महत्वाकांक्षा और पैसा कमाने की चाह है, तो यह जगह आपके लिए नहीं है। इंटरनेट पर दिखने वाले सुंदर नजारों, साफ हवा और ‘शांति’ के झांसे में न आएं। यह साल में 4-5 महीने तो बहुत अच्छा लगता है। बाकी समय सब कुछ उदास और फीका रहता है।”

एक यूजर ने कमेंट किया, “सैलरी ‘भारत से बस थोड़ी ज्यादा’ है – किस गलतफहमी वाली दुनिया में एक विकसित देश में औसत सैलरी भारत से ‘बस थोड़ी’ ज्यादा होती है??” दूसरों ने कहा कि उनका अनुभव बहुत अलग रहा है। एक यूजर ने लिखा, “एक ऐसे व्यक्ति के तौर पर जो सच में कनाडा जाकर बसा है, मेरा नजरिया बहुत अलग है। मैं भारत के एक बड़े शहर से आया हूं, और एक महिला और नए माता-पिता के तौर पर, मेरा सच में मानना ​​है कि परिवार पालने के लिए कनाडा सबसे अच्छे देशों में से एक है। हां, रहने का खर्च ज्यादा है। लेकिन अगर दोनों पार्टनर कड़ी मेहनत करने को तैयार हों, तो समय के साथ जिंदगी बेहतर होती जाती है। रातों-रात कुछ नहीं होता, लेकिन चीजें बेहतर जरूर होती हैं।”

एक और व्यक्ति ने कहा, “कृपया वहां वापस चले जाएं, जहां से आप आए थे। जो लोग सच में दिलचस्पी रखते हैं, उन्हें इस पोस्ट की जरूरत नहीं है क्योंकि यह गलत है। पहली बात, जो लोग CAD में कमाते हैं, वे चीजों को समझने के लिए INR में नहीं बदलते। क्या आप कभी मुंबई में किराए के घर में रहे हैं? उससे यह पता नहीं चलता कि पूरे भारत में किराया और रहने का खर्च ज्यादा है। अच्छी नौकरी मिलना मुश्किल है, तो तैयारी करें और इंटरव्यू पास करें!”

हालांकि, कुछ लोगों को लगा कि गुप्ता ने ऐसी चिंताएं उठाई हैं जिनका सामना हाल के सालों में कनाडा आए कई नए लोगों ने किया है। एक यूजर ने कहा, “मुझे उन सभी इंटरनेशनल स्टूडेंट्स के लिए बुरा लगता है, जो कोविड के बाद बड़े पैमाने पर हुए इमिग्रेशन के दौरान यहां आए थे। भारत में रिक्रूटरों ने उन्हें कनाडा की खूबसूरत तस्वीर और PR स्टेटस का वादा करके धोखा दिया। कनाडा का इमिग्रेंट्स के प्रति रवैया निश्चित रूप से बदला है। यह दुखद है।”