IIT कानपुर की ग्रेजुएट ने बताया, आखिर क्यों दोस्त ने वर्क फ्रॉम होम की नौकरी छोड़ दी? 10 से 6 की शर्त बनी वजह

वर्क फ्रॉम होम को अक्सर आजादी और सुविधा से जोड़कर देखा जाता है। लोगों को लगता है कि घर से काम करने पर वे अपने समय के हिसाब से जिंदगी और नौकरी के बीच संतुलन बना सकते हैं। लेकिन क्या सच में ऐसा है? एक महिला ने इसी सवाल के बीच अपनी पूरी तरह रिमोट नौकरी छोड़ने का फैसला किया। वजह थी कंपनी की यह शर्त कि उन्हें सुबह 10 बजे से शाम 6 बजे तक लगातार ऑनलाइन और उपलब्ध रहना होगा। इस घटना ने काम के घंटों, कर्मचारियों की आजादी और कंपनियों के भरोसे को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

ऑफिस से बचने के लिए चुना वर्क फ्रॉम होम

इस मामले को IIT कानपुर की पूर्व छात्रा और McKinsey में काम कर चुकीं कनक अग्रवाल ने LinkedIn पर साझा किया। उन्होंने अपनी एक दोस्त का अनुभव बताते हुए सवाल उठाया कि अगर कर्मचारी को घर से काम करते हुए भी ऑफिस जैसी समय-सारणी का पालन करना पड़े, तो रिमोट वर्क का असली फायदा क्या है? कनक के मुताबिक, उनकी दोस्त ने इसी वजह से नौकरी छोड़ दी। वह घर से काम तो कर रही थीं, लेकिन कंपनी चाहती थी कि वह तय समय के दौरान लगातार ऑनलाइन रहें और अपनी उपलब्धता दिखाती रहें। कनक ने इस स्थिति को केवल ऑफिस बनाम घर से काम करने का मामला नहीं, बल्कि अपने समय पर नियंत्रण रखने की आजादी से जुड़ा मुद्दा बताया।

काम पूरा करना जरूरी या पूरे दिन ऑनलाइन दिखना?

कनक का कहना है कि रिमोट वर्क की असली ताकत सिर्फ काम करने की जगह बदलने में नहीं, बल्कि काम करने के समय पर कुछ हद तक नियंत्रण मिलने में है। कर्मचारी अपनी ऊर्जा, उत्पादकता और निजी जरूरतों के अनुसार दिन की योजना बना सकें, तो उनके लिए काम और जिंदगी के बीच संतुलन बनाना आसान हो सकता है।

उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि कई कंपनियां कर्मचारियों के काम के नतीजों के बजाय उनकी ऑनलाइन मौजूदगी को प्रतिबद्धता का पैमाना क्यों मानती हैं। उनके अनुसार, जब कर्मचारी अपने समय को खुद व्यवस्थित करने लगते हैं, तो कुछ संगठनों को नियंत्रण कम होने का डर सताने लगता है।

क्या हर नौकरी में मिल सकती है समय की पूरी आजादी?

LinkedIn पर इस पोस्ट के बाद लोगों की अलग-अलग राय सामने आई। कुछ यूजर्स ने माना कि अपने समय पर नियंत्रण मिलने के बाद उसे छोड़ना मुश्किल होता है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि रिमोट वर्क और फ्लेक्सिबल वर्किंग आवर्स दोनों अलग-अलग चीजें हैं। कुछ लोगों ने टीमवर्क की व्यावहारिक चुनौतियों की ओर ध्यान दिलाया। उनके मुताबिक, अगर हर कर्मचारी अपनी सुविधानुसार अलग-अलग समय पर काम करेगा, तो मीटिंग, बातचीत और जरूरी कामों में तालमेल बिठाना मुश्किल हो सकता है। एक यूजर ने तो यह भी कहा कि कंपनी की 10 में से 9 भूमिकाओं में पूरी तरह लचीले समय की व्यवस्था लागू करना संभव नहीं होगा।

आखिर कर्मचारी चाहते क्या हैं?

यह बहस बताती है कि आज कर्मचारियों के लिए केवल घर से काम करना ही पर्याप्त नहीं है। वे चाहते हैं कि उनके काम की गुणवत्ता और परिणामों को महत्व मिले, साथ ही उन्हें अपनी निजी जिंदगी के लिए भी समय मिल सके। हालांकि, हर नौकरी में एक जैसी आजादी संभव नहीं है। कंपनियों को टीम की जरूरतों और कर्मचारियों की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाना होगा। आखिरकार, सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कर्मचारी कहां से काम करते हैं, बल्कि यह भी है कि उन्हें अपने काम और समय को व्यवस्थित करने की कितनी आजादी मिलती है।

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Delhi Winter Pollution: 1 नवंबर से निर्माण पर पाबंदी, दफ्तरों के समय और WFH को लेकर दिल्ली में जारी हुआ नया एक्शन प्लान

Delhi Winter Pollution: सर्दियों का मौसम आने वाला है और इसके साथ ही दिल्ली में प्रदूषण बढ़ने की चिंता भी शुरू हो गई है। इसी को देखते हुए दिल्ली सरकार ने प्रदूषण कम करने और सड़कों पर वाहनों की संख्या घटाने के लिए कई कदम उठाने की तैयारी की है। हालांकि, ये उपाय उन महीनों में लागू किए जाएंगे, जब राजधानी में हवा की गुणवत्ता आमतौर पर काफी खराब हो जाती है।

बता दें कि सोमवार को ‘कमीशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट’ (CAQM) और ‘दिल्ली पॉल्यूशन कंट्रोल कमिटी’ (DPCC) के साथ हुई समीक्षा बैठक में इन उपायों पर चर्चा की गई। सरकार की इस योजना में निर्माण कार्यों पर नियंत्रण से लेकर पार्किंग शुल्क बढ़ाने, ऑफिस के समय में बदलाव और वर्क फ्रॉम होम जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं।

वहीं, इस प्लान के तहत 1 नवंबर 2026 से 31 जनवरी 2027 तक धूल उड़ाने वाले तोड़-फोड़ के काम और बाहर होने वाले सिविल कंस्ट्रक्शन के कामों पर रोक रहेगी। दिल्ली सरकार के अनुसार, इसके बाद और भी सख्त पाबंदी लागू होंगे, जिसमें 10 दिसंबर 2026 से 20 जनवरी 2027 तक कंस्ट्रक्शन और तोड़-फोड़ के सभी कामों पर पूरी तरह रोक रहेगी।

सरकार ने बिल्डिंग प्लान की मंजूरी के लिए ‘मलबे’ (Malba) ऐप पर रजिस्ट्रेशन भी जरूरी कर दिया है, जिससे कंस्ट्रक्शन की मंजूरी को कंस्ट्रक्शन और तोड़-फोड़ से निकलने वाले कचरे की निगरानी और मैनेजमेंट से जोड़ा जा सके।

पार्किंग महंगी, वर्क फ्रॉम होम पर भी जोर

दिल्ली में सड़कों पर निजी गाड़ियों के इस्तेमाल को कम करने के मकसद से, 1 नवंबर 2026 से 28 फरवरी 2027 तक अधिकृत पार्किंग जगहों पर पार्किंग के मौजूदा दाम दोगुने कर दिए जाएंगे। हालांकि, यह नियम दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (DMRC) की अपनी और उनके द्वारा मैनेज की जाने वाली पार्किंग जगहों पर लागू नहीं होगा।

इस दौरान सरकार ने ऑफिस के समय में भी बदलाव करने की योजना बनाई है। MCD के ऑफिस सुबह 8:30 बजे से शाम 5 बजे तक चलेंगे। वहीं, दिल्ली सरकार (GNCTD) के तहत आने वाले ऑफिस सुबह 10 बजे से शाम 6:30 बजे तक खुले रहेंगे। बता दें कि अलग-अलग समय पर ऑफिस शुरू होने से एक ही समय पर सड़कों पर ज्यादा ट्रैफिक जुटने से भी बचा जा सकेगा।

एक और अहम कदम के तहत, सरकारी और प्राइवेट ऑफिस को सलाह दी गई है कि वे 1 नवंबर से 28 फरवरी के बीच अपने 50% कर्मचारियों से घर से काम करवाएं और बाकी 50% कर्मचारी ऑफिस से काम करें।

दरअसल, ठंड के महीनों में दिल्ली-NCR की हवा अक्सर ज्यादा खराब हो जाती है क्योंकि प्रदूषण और खराब मौसम की स्थितियां आपस में मिल जाती हैं। CAQM का कहना है कि हवा की धीमी गति, कम ऊंचाई पर हवा का मिलना-जुलना, कोहरा और कम तापमान प्रदूषण फैलाने वाले कणों को दूर नहीं होने देते, जिससे ये कण जमीन के पास जमा होने लगते हैं।

CAQM के 2026 के आकलन में यह भी पाया गया कि दिल्ली में सर्दियों के दौरान PM2.5 प्रदूषण कई वजहों से होता है, जिनमें सेकेंडरी पार्टिकुलेट्स, ट्रांसपोर्ट, बायोमास जलाना, धूल और इंडस्ट्री शामिल हैं।

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वर्क फ्रॉम होम या हर वक्त निगरानी? कैमरा मॉनिटरिंग के बाद 23 कर्मचारियों ने दिया इस्तीफा

वर्क फ्रॉम होम ने कर्मचारियों को सुविधा और आजादी जरूर दी, लेकिन अब यही व्यवस्था निगरानी और प्राइवेसी को लेकर नई बहस खड़ी कर रही है। अमेरिकी अरबपति वकील जॉन मॉर्गन के एक बयान ने इस बहस को और गर्म कर दिया है। उनका दावा है कि कंपनी ने कर्मचारियों के लैपटॉप में कैमरा मॉनिटरिंग शुरू की तो महज सात दिनों में 23 कर्मचारियों ने नौकरी छोड़ दी।

मॉर्गन ने यह बात ‘The Iced Coffee Hour’ पॉडकास्ट में कही, जहां उन्होंने रिमोट वर्क, कर्मचारियों की जवाबदेही और ऑफिस लौटने को लेकर अपने अनुभव साझा किए।

ऑफिस आने से इनकार किया तो मिला दूसरा विकल्प

मॉर्गन के मुताबिक, कोरोना महामारी के बाद जब कर्मचारियों को वापस ऑफिस बुलाने की कोशिश की गई, तो कई लोगों ने इसका विरोध किया। ऐसे कर्मचारियों को घर से काम जारी रखने का विकल्प दिया गया। लेकिन इस सुविधा के साथ एक शर्त भी रखी गई कर्मचारियों के काम की कड़ी निगरानी की जाएगी। मॉर्गन ने दावा किया कि इसके लिए कर्मचारियों के वर्क लैपटॉप में कैमरे लगाए गए थे। उनका कहना था कि कंपनी कर्मचारियों को घर से काम करने की अनुमति दे रही थी, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित करना चाहती थी कि काम के दौरान कर्मचारी वास्तव में अपने काम पर ध्यान दे रहे हैं।

7 दिन में 23 इस्तीफे, मालिक ने निकाला अलग मतलब

मॉर्गन ने दावा किया कि निगरानी की व्यवस्था लागू होने के बाद पहले ही हफ्ते में 23 कर्मचारियों ने इस्तीफा दे दिया। उनके मुताबिक, इन इस्तीफों को सिर्फ वर्क फ्रॉम होम की इच्छा के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने इसे कर्मचारियों की निगरानी और जवाबदेही से बचने की इच्छा से जोड़ते हुए कहा कि कुछ लोग घर से काम नहीं, बल्कि बिना निगरानी के काम करना चाहते थे। यहीं से उनकी टिप्पणी पर विवाद शुरू हो गया।

क्या कर्मचारी को हर वक्त निगरानी में रखना सही है?

मॉर्गन के बयान ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है अगर कोई कर्मचारी घर से अपना काम समय पर और अच्छी तरह पूरा कर रहा है, तो क्या कंपनी को उसके लैपटॉप कैमरे के जरिए उस पर नजर रखने का अधिकार होना चाहिए?कर्मचारियों के लिए मामला सिर्फ काम का नहीं, बल्कि निजी जिंदगी और व्यक्तिगत स्पेस का भी है। घर में काम करने वाला व्यक्ति यह नहीं चाहेगा कि ऑफिस की निगरानी उसके निजी जीवन की सीमा तक पहुंच जाए।

सोशल मीडिया पर लोगों ने लगाई क्लास

मॉर्गन की बात सामने आने के बाद सोशल मीडिया यूजर्स ने जमकर प्रतिक्रिया दी। एक यूजर ने कहा कि अगर किसी को यह डर हो कि कंपनी काम के घंटों के बाद भी कैमरे के जरिए उसे देख सकती है, तो वह ऐसी नौकरी छोड़ना पसंद करेगा। एक अन्य यूजर ने कॉरपोरेट अधिकारियों पर तंज कसते हुए कहा कि वह बोर्ड और सी-सूट अधिकारियों के साथ काम करता है और उन्हें कई बार ‘ना’ कहना पड़ता है। वहीं एक यूजर ने सवाल किया कि अगर अरबपति को भी उसी तरह कैमरे के सामने रखा जाए और हर वक्त मॉनिटर किया जाए, तो उन्हें कैसा लगेगा?

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पहाड़ों में बसने का सपना 71 दिनों में ही टूटा! दिल्ली छोड़ मनाली रहने गए Gen Z कंटेंट क्रिएटर ने लौटकर क्या बताया?

भागदौड़ भरी जिंदगी, शहरों में पलूशन वाली जहरीली हवा और तेज रफ्तार लाइफ से ऊबकर पहाड़ों की शांत वादियों में जा बसना आज हर वर्किंग युवा का सपना लगता है। वर्क फ्रॉम होम और रील्स की दुनिया में हर कोई बस यही सोचता है कि काश! वो भी सब कुछ छोड़कर पहाड़ों में हमेशा के लिए बस जाए। दिल्ली के रहने वाले एक Gen Z कंटेंट क्रिएटर अजय शर्मा ने भी कुछ ऐसा ही किया। वो यह देखने मनाली पहुंचे कि क्या सचमुच पहाड़ों की जिंदगी वैसी ही हसीन होती है जैसी तब लगता है जब हम छुट्टियां मनाने पहाड़ पहुंचते हैं या फिर इसके पीछे कोई और ही सच्चाई छिपी है?

अजय ने 23 मई को दिल्ली से मनाली के पास बसे छोटे से गांव सियाल में शिफ्ट हुए थे। उनका इरादा था कि वो यहां टूरिस्ट बनकर नहीं बल्कि लोकल शख्स की तरह रहें। अजय ने पूरे 71 दिन पहाड़ों में बिताए, इस दौरान करीब 55 वीडियो बनाए और अपनी रोजमर्रा की जिंदगी का हर पल इंटरनेट पर लोगों के साथ शेयर किया। लेकिन 2 अगस्त आते-आते उनका यह सपना सिमट गया और वो वापस दिल्ली लौट आए।

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जब अनजाने रास्ते और अजनबी लोग धीरे-धीरे अपने से लगने लगेअजय जब मनाली पहुंचे थे तो वहां उनका कोई अपना नहीं था, कोई जान-पहचान नहीं थी। लेकिन देखते ही देखते वो वहां की गलियों, रास्तों, हसीन वादियों और लोकल लोगों के करीब आ गए, उनसे घुल-मिल गए। जो काम सिर्फ एक प्रयोग की तरह शुरू हुआ था, वो उनकी जिंदगी का एक अनमोल हिस्सा बन गया।

दिल्ली लौटने के बाद एक वीडियो में उन्होंने मनाली की अपनी यादों को साझा किया। उन्होंने बताया कि सिर्फ दो महीने से थोड़े ज्यादा वक्त में जिस जगह से उनका इतना दिल लग गया था, उसे छोड़कर आना दर्दनाक था। अजय के मुताबिक इस तजुर्बे ने उन्हें उम्मीद से कहीं ज्यादा गहराई और जिंदगी का नया नजरिया दिया। मनाली को अलविदा कहना उनके लिए बेहद मुश्किल था क्योंकि यह सिर्फ कोई ट्रिप खत्म नहीं हो रही थी बल्कि उनकी जिंदगी के एक नए दौर की शुरुआत थी।

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क्या वाकई पहाड़ों में बसना उतना ही हसीन है, जितना छुट्टियों में दिखता है?

अजय के मनाली शिफ्ट होने की सबसे बड़ी वजह एक सीधे से सवाल का जवाब तलाशना था। वो ये कि क्या पहाड़ों में बसकर रहना सचमुच उतना ही मजेदार है जितना वहां कुछ दिनों की छुट्टियां बिताना? मनाली जाने से पहले अजय के दिलो-दिमाग में भी एक आम शहर की तरह ही खूबसूरत ख्यालात थे, पहाड़ों के खूबसूरत दृश्यों के बीच काम करना, ढलते और उगते सूरज को देखना, आसपास की वादियों में घूमना, वहां का लोकल फूड ट्राई करना और रात में अलाव के गिर्द बैठकर लोगों से बातें करना।

इनमें से कई हसीन पल उन्होंने जिए भी। लेकिन वहां फुल टाइम रहने पर उन्हें उन मुश्किलों से रूबरू होना पड़ा जो अक्सर तब नहीं समझ में आतीं जब हम छुट्टियों में पहाड़ घूमने जाते हैं।

मनाली में रहने का खर्च: उम्मीद से कहीं ज्यादा किफायती!मनाली में रहने के दौरान अजय का सबसे हैरान कर देने वाला अनुभव वहां का खर्च रहा। ये उनकी उम्मीद से काफी कम निकला। अजय सियाल गांव में 14000 रुपये महीने के किराये पर अकेले एक वन-बैडरूम फ्लैट में रहते थे। इस किराये में वाई-फाई और बिजली का बिल दोनों शामिल थे। वो ज्यादातर वक्त घर पर ही खाना खुद बनाते थे। राशन और ग्रोसरी पर महीने का लगभग 3500 रुपये खर्च आता था। जब कभी खाना पकाने का मन न होता, तो वो हफ्ते में एक-दो बार बाहर खा लेते थे। इसमें करीब 500 रुपये हफ्ते का खर्च बैठता था।

फिटनेस के शौकीन अजय ने वहां का एक लोकल जिम भी जॉइन किया। वैसे तो जिम की फीस 1800 रुपये महीना थी, लेकिन उन्होंने बात करके इसे 1500 रुपये करवा लिया। अजय को गाड़ियों के बजाय पैदल चलना पसंद था, इसलिए लोकल ट्रैवल पर उनका न के बराबर पैसा खर्च होता था। अगर इन सारे खर्चों को जोड़ दिया जाए, तो मनाली में अजय का कुल मासिक खर्च करीब 21000 रुपये के आसपास आता था।

वो दिक्कतें जो आम पर्यटकों की नजरों से हमेशा छिपी रह जाती हैं

मनाली ने अजय को सुकून और नए अनुभव तो दिए, लेकिन जैसे-जैसे दिन बीते कुछ प्रैक्टिकल प्रॉब्लम भी सामने आईं। पहाड़ों में अक्सर नेटवर्क की समस्या रहती थी, जिससे ऑनलाइन काम करना या वर्क फ्रॉम होम संभालना बेहद मुश्किल हो जाता था। पहाड़ों का मौसम मजेदार होने के साथ टेंशन देने वाला भी मिला। बिना किसी पूर्व चेतावनी के अचानक तेज बारिश शुरू हो जाती थी। मानसून के आते ही सड़कें और रोजमर्रा की आवाजाही बेहाल हो गई।

यहां अकेले रहने का मतलब था कि खाना बनाने से लेकर साफ-सफाई और घर के बाकी सारे काम अजय को खुद ही करने पड़ते थे। मशहूर टूरिस्ट स्पॉट्स तक पहुंचने के लिए लंबी और सीधी चढ़ाई चढ़नी पड़ती थी। छुट्टियों में ऐसी ट्रैकिंग भले ही रोमांचक लगे लेकिन हर दिन ऐसा करना शरीर को तोड़कर रख देता है। सबसे बड़ी चुनौती थी उनका अकेलापन। जिस खामोशी और शांति की तलाश में वो दिल्ली से भागे थे, वही सन्नाटा धीरे-धीरे दीमक की तरह उन्हें काटने लगा और भारी अकेलेपन में बदल गया।

अजय ने 3 जुलाई को शेयर किए गए एक वीडियो में इन तमाम दुश्वारियों का जिक्र किया था और बताया था कि आखिर क्यों पहाड़ों में उनका स्टे समय से पहले खत्म होने जा रहा है।

मनाली से लौटकर अब एक नई राह पर हैं अजय

मनाली का अपना 71 दिनों का आशियाना छोड़कर अजय अब वापस दिल्ली लौट आए हैं, लेकिन पहाड़ों को लेकर उनका नजरिया अब पूरी तरह बदल चुका है। इस छोटे से स्टे ने उन्हें एक बड़े शहर से दूर रहने की खूबसूरती और उसकी कड़वी सच्चाइयों दोनों से रूबरू करा दिया। अजय आज भी मनाली में बिताए अपने इन दिनों को जिंदगी का सबसे हसीन और यादगार पल मानते हैं। दिल्ली लौटने के बाद अब वो जिंदगी को एक नए अंदाज में खंगाल रहे हैं। उनके हालिया वीडियो बता रहे हैं कि पहाड़ों की बर्फीली वादियों के बाद अब वो समुद्र के शांत किनारों पर अपना वक्त बिता रहे हैं।