डेंटिस्ट बनने दुबई गईं भारतीय महिला, डांस फिटनेस से बदली किस्मत, अब हर महीने कमाती हैं 11 लाख रुपये

कभी-कभी जिंदगी में एक छोटा-सा शौक करियर की ऐसी राह खोल देता है, जिसके बारे में इंसान ने कभी सोचा भी नहीं होता। भारतीय महिला मोनिका सिंह के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। वह डेंटिस्ट बनने का सपना लेकर दुबई पहुंची थीं, लेकिन डांस फिटनेस में उनकी दिलचस्पी ने उन्हें एक अलग पहचान दिला दी। आज वह दुबई में महिलाओं की फिटनेस और हेल्थ से जुड़ा अपना बिजनेस चला रही हैं और हर महीने करीब 10.9 लाख से 11.6 लाख रुपये तक कमाती हैं।

भारत से दुबई पहुंचीं, डेंटिस्ट के तौर पर काम करने की थी तैयारी

द नेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक, मोनिका सिंह करीब 12 साल पहले दुबई गई थीं। उनका इरादा वहां डेंटिस्ट के रूप में अपना करियर बनाने का था। इसके लिए उन्हें दुबई हेल्थ अथॉरिटी (DHA) की लाइसेंसिंग परीक्षा पास करनी थी। इसी तैयारी के दौरान वह ग्रुप वर्कआउट क्लास में जाने लगीं। यहां उन्हें डांस फिटनेस पसंद आने लगी। शुरुआत में यह सिर्फ एक्सरसाइज और खुद को फिट रखने का तरीका था, लेकिन धीरे-धीरे यही उनका जुनून बन गया। मोनिका ने बताया कि वह पहले फिटनेस को लेकर ज्यादा दिलचस्पी नहीं रखती थीं। डांस फिटनेस क्लास में जाने के बाद उन्हें एहसास हुआ कि वह इस क्षेत्र में काम करना चाहती हैं। उन्होंने अपने पति से इस बारे में बात की और पति ने भी उनके फैसले का समर्थन किया।

फिटनेस क्लास से शुरू हुआ सफर

मोनिका ने दुबई के अलग-अलग स्टूडियो में ग्रुप एक्सरसाइज क्लास लेना शुरू किया। इससे उन्हें फिटनेस इंडस्ट्री में अनुभव मिला और आगे चलकर अपना बिजनेस शुरू करने का रास्ता खुला। डेंटिस्ट्री की पढ़ाई ने भी उनके काम में मदद की। मानव शरीर की बनावट और उसके काम करने के तरीके की उनकी समझ ने उन्हें फिटनेस और महिलाओं की सेहत को बेहतर तरीके से समझने में मदद की। इसके बाद उन्होंने महिलाओं की वेलनेस, खासकर मिडलाइफ के दौरान होने वाले बदलावों पर ध्यान दिया और इससे जुड़ी ट्रेनिंग भी ली।

23 महिलाओं को देती हैं कोचिंग

आज मोनिका दुबई में महिलाओं को फिटनेस और वेलनेस कोचिंग देती हैं। रिपोर्ट के अनुसार, फिलहाल उनके पास 23 क्लाइंट हैं। उनकी मासिक कमाई 42,000 से 45,000 दिरहम के बीच बताई गई है, जो भारतीय रुपये में करीब 10.9 लाख से 11.6 लाख रुपये होती है। उनका तरीका महिलाओं को जरूरत से ज्यादा कठिन एक्सरसाइज या शारीरिक दबाव में डालने के बजाय उनकी जरूरतों के हिसाब से फिटनेस लक्ष्य हासिल करने में मदद करना है।

लाखों की कमाई के बावजूद निवेश नहीं

अच्छी कमाई होने के बावजूद मोनिका ने अभी निवेश करना शुरू नहीं किया है। वह फिलहाल अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा बचाकर रखती हैं। उनके सात साल के बेटे की स्कूल फीस, कार लोन और घर के रोजमर्रा के खर्च भी उनकी जिम्मेदारियों में शामिल हैं। मोनिका के मुताबिक, वह घरेलू खर्चों के लिए हर महीने करीब 3,000 से 4,000 दिरहम अलग रखती हैं और बाकी रकम बचाती हैं। घर के अन्य खर्चों की जिम्मेदारी उनके पति संभालते हैं।

अब ऑनलाइन बिजनेस और बड़े घर का सपना

मोनिका का अगला लक्ष्य अपने वेलनेस बिजनेस के लिए एक ऑनलाइन पोर्टल और ऐप लॉन्च करना है। इसके लिए वह पैसे जोड़ रही हैं, क्योंकि इसे तैयार करने में काफी खर्च आएगा।

लंबे समय में वह अपने परिवार के साथ बड़ा घर खरीदना चाहती हैं। उनकी कहानी बताती है कि करियर का रास्ता हमेशा पहले से तय नहीं होता। कभी-कभी किसी नए अनुभव को मौका देना जिंदगी की दिशा बदल सकता है। हालांकि, उनकी कमाई और सफलता का यह सफर उनकी अपनी परिस्थितियों और बिजनेस पर आधारित है।

एक दिन लेट किराया देने पर लगा जुर्माना, Gen Z किराएदार ने ऐसा पलटवार किया कि मकान मालिक की बोलती बंद!

एक दिन लेट किराया देने पर लगा जुर्माना, Gen Z किराएदार ने ऐसा पलटवार किया कि मकान मालिक की बोलती बंद!

किराए के घर में रहने वाले लोगों और मकान मालिकों के बीच छोटी-छोटी बातों पर विवाद होना आम है, लेकिन एक Gen Z किराएदार ने इस समस्या से निपटने का ऐसा तरीका अपनाया, जिसकी सोशल मीडिया पर खूब चर्चा हो रही है। मामला किराया देर से जमा करने पर लगे जुर्माने से शुरू हुआ, लेकिन जल्द ही इसमें घर की मरम्मत से जुड़ी पुरानी शिकायतें भी सामने आ गईं। किराएदार ने बहस करने या मकान मालिक से उलझने के बजाय सभी शिकायतों का रिकॉर्ड तैयार किया और दूसरे किराएदारों को भी इसमें शामिल कर लिया।

इसके बाद जब मकान मालिक ने किराया जमा करने की याद दिलाई, तो उसे अपनी ही शर्तों के बीच एक असहज सवाल का सामना करना पड़ा। इस पूरे मामले ने किराएदारों के अधिकारों और मकान मालिकों की जिम्मेदारियों को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

6 तारीख को दिया किराया, तो लगा जुर्माना

X पर Dekim_Kalvino नाम के यूजर ने यह किस्सा साझा किया। पोस्ट के मुताबिक, मकान मालिक का नियम था कि हर महीने की 5 तारीख के बाद किराया देने वालों पर जुर्माना लगाया जाएगा। एक Gen Z किराएदार ने 6 तारीख को किराया दिया, जिसके बाद उस पर भी जुर्माना लगा दिया गया। उसने बहस करने के बजाय मकान मालिक की अनदेखी की गई मरम्मत संबंधी शिकायतों का रिकॉर्ड बनाना शुरू कर दिया।

स्प्रेडशीट में जुटाए सबूत

किराएदार ने एक स्प्रेडशीट तैयार की, जिसमें लंबित मरम्मत की शिकायतों की तारीखें और स्क्रीनशॉट दर्ज किए। फिर उसने यह रिकॉर्ड दूसरे किराएदारों के साथ साझा किया। इसके बाद अन्य लोगों ने भी अपनी शिकायतों के सबूत उसमें जोड़ने शुरू कर दिए। इस तरह एक व्यक्ति की शिकायत कई किराएदारों की समस्याओं का दस्तावेज बन गई। अब मकान मालिक के सामने केवल जुर्माने का मामला नहीं, बल्कि लंबित शिकायतों का पूरा रिकॉर्ड था।

किराएदार ने याद दिलाया नियम

अगले महीने जब मकान मालिक ने किराया जमा करने का रिमाइंडर भेजा, तो किराएदार ने जवाब में कहा कि किराया 5 तारीख तक देना जरूरी है, लेकिन मरम्मत की शिकायतें 63 दिनों से लंबित हैं। पोस्ट के अनुसार, मकान मालिक ने बाद में उसे निजी तौर पर फोन किया और स्प्रेडशीट हटाने को कहा। किराएदार ने इनकार करते हुए तर्क दिया कि अगर देर से किराया देने पर जुर्माना लगाया जा सकता है, तो मरम्मत में देरी की जवाबदेही भी होनी चाहिए। इसके बाद मकान मालिक ने कथित तौर पर फोन काट दिया।

यूरोप में युवाओं पर बुजुर्ग भारी पड़ रहे:पेंशन पर सरकारी खजाना खर्च; Gen Z नौकरी-घर और अच्छी शिक्षा मांग रहे

पिछले कुछ सालों में Gen Z यानी युवा पीढ़ी एक बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर उभरी है। बांग्लादेश, नेपाल, पेरू और मेडागास्कर में युवाओं के प्रदर्शनों ने सरकारें गिरा दीं। भारत में भी कई प्रदर्शनों में युवाओं की अहम भूमिका रही है। अब यूरोप में भी युवा अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतर रहे हैं। फ्रांस में स्कूलों की बदहाली, स्पेन में बेरोजगारी और ब्रिटेन में पेंशन नीतियों को लेकर नाराजगी है। युवाओं के लिए नौकरी पाना, अच्छी शिक्षा हासिल करना और सस्ता घर खरीदना मुश्किल होता जा रहा है। यूरोप में इस मुश्किल ने युवाओं और बुजुर्गों के बीच आर्थिक और राजनीतिक टकराव बढ़ा दिया है। बुजुर्गों की आबादी बढ़ने के साथ राजनीति में उनका प्रभाव भी मजबूत हुआ है। वहीं, युवाओं की संख्या घट रही है। ऐसे में उनके लिए अपनी मांगों को लेकर सरकार पर दबाव बनाना और मुश्किल हो रहा है। फ्रांस: युवाओं को स्कूलों के लिए पैसा चाहिए, बुजुर्गों को पेंशन फ्रांस में युवाओं के सामने नौकरी की कमी है। बेरोजगारी 20% पहुंच चुकी है। इस साल दूसरी तिमाही में अर्थव्यवस्था की ग्रोथ शून्य रही। दूसरी तरफ, सरकार के कुल खर्च का करीब 25% पेंशन पर जाता है। यानी बजट का बड़ा हिस्सा बुजुर्गों की पेंशन में खर्च हो रहा है। कुछ साल पहले राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने रिटायरमेंट की उम्र 62 से बढ़ाकर 64 साल करने का फैसला किया था। इसके खिलाफ देशभर में प्रदर्शन हुए और सरकार को फैसला निलंबित करना पड़ा। अब पक्ष हो या विपक्ष कोई भी पेंशन में कटौती को लेकर चर्चा भी नहीं करता। युवा चाहते हैं कि स्कूलों की हालत सुधरे और शिक्षा पर ज्यादा पैसा खर्च हो। वामपंथी नेताओं का तर्क है कि पेंशन बचाते हुए शिक्षा का बजट भी बढ़ाया जा सकता है। लेकिन सवाल है कि पैसा आएगा कहां से? फ्रांस पर पहले से भारी कर्ज है, और अमीरों पर ज्यादा टैक्स लगाने से भी सरकार को खास कमाई नहीं हुई है। ऐसे में दोनों वर्गों की मांगें पूरी करना सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। स्पेन: युवाओं के लिए घर खरीदना मुश्किल स्पेन में भी यही समस्या दिख रही है। वहां घरों की कमी और बढ़ते किराए को लेकर हाल में प्रदर्शन हुए। स्पेन में युवाओं की बेरोजगारी 22% से ज्यादा है और घरों की कीमतें वेतन के मुकाबले कहीं तेजी से बढ़ी हैं। नतीजा यह है कि कई युवा 30 साल की उम्र पार करने के बाद भी माता-पिता के साथ रहने को मजबूर हैं। जो अलग रहते हैं, उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा किराए में चला जाता है। ऐसे में बचत करना और अपना घर खरीदना मुश्किल है। दूसरी ओर, जिन बुजुर्गों के पास पहले से घर हैं, उन्हें बढ़ती कीमतों का फायदा मिल सकता है। उनकी संपत्ति की कीमत बढ़ रही है, जबकि युवाओं के लिए घर खरीदना और मुश्किल होता जा रहा है। यही अंतर दोनों पीढ़ियों के बीच तनाव बढ़ा रहा है। ब्रिटेन में पेंशन पर खर्च को लेकर बहस ब्रिटेन में भी युवा बेरोजगारी और महंगे मकानों से परेशान हैं। युवाओं में बेरोजगारी करीब 16% है। खासकर लंदन और उसके आसपास घरों का किराया बहुत ज्यादा है। मुश्किल यह है कि रोजगार के नए मौके भी ज्यादातर इन्हीं इलाकों में पैदा होते हैं। ऐसे में युवाओं के लिए नौकरी मिलने के बाद भी घर का खर्च उठाना आसान नहीं है। ब्रिटेन में बुजुर्गों की पेंशन बढ़ाने के लिए ‘ट्रिपल लॉक’ नाम की व्यवस्था है। इसके तहत पेंशन हर साल महंगाई, औसत वेतन में बढ़ोतरी या 2.5% में से जो भी ज्यादा हो, उतनी बढ़ाई जाती है। इससे बुजुर्गों की पेंशन घटने के बजाय बढ़ती रहती है। सरकार अगर पेंशन पर खर्च कम करने की कोशिश करती है, तो उसे राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ सकता है।प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ने एक लोकल चुनाव से पहले इस व्यवस्था में बदलाव करने की बात कही थी। हालांकि विरोधी नेताओं ने इसे महज चुनावी जुमला बताया। उनका कहना है कि अगर वे ऐसा करते हैं तो ये उनके लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। युवाओं पर बुजुर्गों का पलड़ा भारी क्यों? राजनीतिक पकड़ मजबूत होना: बुजुर्गों की राजनीतिक दलों और ट्रेड यूनियनों में अच्छी पकड़ है। वे चुनाव में भी अहम भूमिका निभाते हैं। इसलिए नेताओं के लिए उनकी मांगों को नजरअंदाज करना मुश्किल होता है। पेंशन का फायदा पूरे परिवार को मिलना: कई युवा नौकरी या कमाई के बावजूद अपने माता-पिता के साथ रहते हैं। ऐसे परिवारों में बुजुर्गों की पेंशन घर का खर्च चलाने में मदद करती है। अगर सरकार पेंशन घटाती है, तो इसका असर पूरे परिवार पर पड़ सकता है। कामकाजी लोगों को यह चिंता भी रहती है कि पेंशन कम होने पर माता-पिता के खर्च की जिम्मेदारी उन पर बढ़ जाएगी। पेंशन को अपने भविष्य से जोड़कर देखना: युवाओं को लगता है कि आज बुजुर्गों को पेंशन मिलेगी, तो भविष्य में उन्हें भी इसका फायदा मिल सकता है। इसलिए वे पेंशन व्यवस्था के खिलाफ खुलकर नहीं बोलते हैं। इसके उलट, बुजुर्गों को शिक्षा पर ज्यादा सरकारी पैसा खर्च करने के लिए मनाना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि इसका सीधा फायदा उन्हें नहीं मिलता। यही वजह है कि पेंशन पर खर्च घटाने और शिक्षा जैसी सेवाओं पर खर्च बढ़ाने के बीच सहमति बनाना आसान नहीं है। ——————————— ये खबर भी पढ़ें…. इजराइल हूती विद्रोहियों के खिलाफ क्यों लड़ना चाहता है:अमेरिका के जरिए नेतन्याहू ने मदद का मैसेज भेजा, सऊदी ने इनकार किया इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सऊदी अरब से हूतियों के खिलाफ लड़ाई में इजराइल को शामिल करने की इजाजत मांगी है। इजराइली अखबार हारेत्ज की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नेतन्याहू ने यह प्रस्ताव अमेरिका के जरिए सऊदी अरब को भेजा है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

यूरोप में युवाओं पर बुजुर्ग भारी पड़ रहे:पेंशन पर सरकारी खजाना खर्च; Gen Z नौकरी-घर और अच्छी शिक्षा मांग रहे

पिछले कुछ सालों में Gen Z यानी युवा पीढ़ी एक बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर उभरी है। बांग्लादेश, नेपाल, पेरू और मेडागास्कर में युवाओं के प्रदर्शनों ने सरकारें गिरा दीं। भारत में भी कई प्रदर्शनों में युवाओं की अहम भूमिका रही है। अब यूरोप में भी युवा अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतर रहे हैं। फ्रांस में स्कूलों की बदहाली, स्पेन में बेरोजगारी और ब्रिटेन में पेंशन नीतियों को लेकर नाराजगी है। युवाओं के लिए नौकरी पाना, अच्छी शिक्षा हासिल करना और सस्ता घर खरीदना मुश्किल होता जा रहा है। यूरोप में इस मुश्किल ने युवाओं और बुजुर्गों के बीच आर्थिक और राजनीतिक टकराव बढ़ा दिया है। बुजुर्गों की आबादी बढ़ने के साथ राजनीति में उनका प्रभाव भी मजबूत हुआ है। वहीं, युवाओं की संख्या घट रही है। ऐसे में उनके लिए अपनी मांगों को लेकर सरकार पर दबाव बनाना और मुश्किल हो रहा है। फ्रांस: युवाओं को स्कूलों के लिए पैसा चाहिए, बुजुर्गों को पेंशन फ्रांस में युवाओं के सामने नौकरी की कमी है। बेरोजगारी 20% पहुंच चुकी है। इस साल दूसरी तिमाही में अर्थव्यवस्था की ग्रोथ शून्य रही। दूसरी तरफ, सरकार के कुल खर्च का करीब 25% पेंशन पर जाता है। यानी बजट का बड़ा हिस्सा बुजुर्गों की पेंशन में खर्च हो रहा है। कुछ साल पहले राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने रिटायरमेंट की उम्र 62 से बढ़ाकर 64 साल करने का फैसला किया था। इसके खिलाफ देशभर में प्रदर्शन हुए और सरकार को फैसला निलंबित करना पड़ा। अब पक्ष हो या विपक्ष कोई भी पेंशन में कटौती को लेकर चर्चा भी नहीं करता। युवा चाहते हैं कि स्कूलों की हालत सुधरे और शिक्षा पर ज्यादा पैसा खर्च हो। वामपंथी नेताओं का तर्क है कि पेंशन बचाते हुए शिक्षा का बजट भी बढ़ाया जा सकता है। लेकिन सवाल है कि पैसा आएगा कहां से? फ्रांस पर पहले से भारी कर्ज है, और अमीरों पर ज्यादा टैक्स लगाने से भी सरकार को खास कमाई नहीं हुई है। ऐसे में दोनों वर्गों की मांगें पूरी करना सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। स्पेन: युवाओं के लिए घर खरीदना मुश्किल स्पेन में भी यही समस्या दिख रही है। वहां घरों की कमी और बढ़ते किराए को लेकर हाल में प्रदर्शन हुए। स्पेन में युवाओं की बेरोजगारी 22% से ज्यादा है और घरों की कीमतें वेतन के मुकाबले कहीं तेजी से बढ़ी हैं। नतीजा यह है कि कई युवा 30 साल की उम्र पार करने के बाद भी माता-पिता के साथ रहने को मजबूर हैं। जो अलग रहते हैं, उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा किराए में चला जाता है। ऐसे में बचत करना और अपना घर खरीदना मुश्किल है। दूसरी ओर, जिन बुजुर्गों के पास पहले से घर हैं, उन्हें बढ़ती कीमतों का फायदा मिल सकता है। उनकी संपत्ति की कीमत बढ़ रही है, जबकि युवाओं के लिए घर खरीदना और मुश्किल होता जा रहा है। यही अंतर दोनों पीढ़ियों के बीच तनाव बढ़ा रहा है। ब्रिटेन में पेंशन पर खर्च को लेकर बहस ब्रिटेन में भी युवा बेरोजगारी और महंगे मकानों से परेशान हैं। युवाओं में बेरोजगारी करीब 16% है। खासकर लंदन और उसके आसपास घरों का किराया बहुत ज्यादा है। मुश्किल यह है कि रोजगार के नए मौके भी ज्यादातर इन्हीं इलाकों में पैदा होते हैं। ऐसे में युवाओं के लिए नौकरी मिलने के बाद भी घर का खर्च उठाना आसान नहीं है। ब्रिटेन में बुजुर्गों की पेंशन बढ़ाने के लिए ‘ट्रिपल लॉक’ नाम की व्यवस्था है। इसके तहत पेंशन हर साल महंगाई, औसत वेतन में बढ़ोतरी या 2.5% में से जो भी ज्यादा हो, उतनी बढ़ाई जाती है। इससे बुजुर्गों की पेंशन घटने के बजाय बढ़ती रहती है। सरकार अगर पेंशन पर खर्च कम करने की कोशिश करती है, तो उसे राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ सकता है।प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ने एक लोकल चुनाव से पहले इस व्यवस्था में बदलाव करने की बात कही थी। हालांकि विरोधी नेताओं ने इसे महज चुनावी जुमला बताया। उनका कहना है कि अगर वे ऐसा करते हैं तो ये उनके लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। युवाओं पर बुजुर्गों का पलड़ा भारी क्यों? राजनीतिक पकड़ मजबूत होना: बुजुर्गों की राजनीतिक दलों और ट्रेड यूनियनों में अच्छी पकड़ है। वे चुनाव में भी अहम भूमिका निभाते हैं। इसलिए नेताओं के लिए उनकी मांगों को नजरअंदाज करना मुश्किल होता है। पेंशन का फायदा पूरे परिवार को मिलना: कई युवा नौकरी या कमाई के बावजूद अपने माता-पिता के साथ रहते हैं। ऐसे परिवारों में बुजुर्गों की पेंशन घर का खर्च चलाने में मदद करती है। अगर सरकार पेंशन घटाती है, तो इसका असर पूरे परिवार पर पड़ सकता है। कामकाजी लोगों को यह चिंता भी रहती है कि पेंशन कम होने पर माता-पिता के खर्च की जिम्मेदारी उन पर बढ़ जाएगी। पेंशन को अपने भविष्य से जोड़कर देखना: युवाओं को लगता है कि आज बुजुर्गों को पेंशन मिलेगी, तो भविष्य में उन्हें भी इसका फायदा मिल सकता है। इसलिए वे पेंशन व्यवस्था के खिलाफ खुलकर नहीं बोलते हैं। इसके उलट, बुजुर्गों को शिक्षा पर ज्यादा सरकारी पैसा खर्च करने के लिए मनाना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि इसका सीधा फायदा उन्हें नहीं मिलता। यही वजह है कि पेंशन पर खर्च घटाने और शिक्षा जैसी सेवाओं पर खर्च बढ़ाने के बीच सहमति बनाना आसान नहीं है। ——————————— ये खबर भी पढ़ें…. इजराइल हूती विद्रोहियों के खिलाफ क्यों लड़ना चाहता है:अमेरिका के जरिए नेतन्याहू ने मदद का मैसेज भेजा, सऊदी ने इनकार किया इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सऊदी अरब से हूतियों के खिलाफ लड़ाई में इजराइल को शामिल करने की इजाजत मांगी है। इजराइली अखबार हारेत्ज की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नेतन्याहू ने यह प्रस्ताव अमेरिका के जरिए सऊदी अरब को भेजा है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

अनगिनत विद्रोह और वो बुनियादी सवाल!

शुरुआत के तीन दिन के अंदर ‘सत्याग्रह’ वेबसाइट पर संघर्ष (या समस्याओं) की 30 हजार से अधिक कहानियां दर्ज कराई गईं। उनमें सबसे ज्यादा संख्या शिक्षा, भ्रष्टाचार, जातीय भेदभाव, स्वास्थ्य सेवाओं, श्रम अधिकारों, और किसान से जुड़े मुद्दों की रहीं। इनसे संबंधित प्रवृष्टियां हजारों की संख्या में आईं।… वोट चोरी बड़ा मुद्दा है, जिसने भारत के राजनीतिक रूप से जागरूक तबकों को उद्वेलित किया है। इनके साथ जमीनी संघर्षों  को भी जोड़ कर देखें, तो बेशक इस समय देश में मौजूद बेचैनी के आलम का अंदाजा लगता है।

सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने हाल में अपने एक सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा- “जून में हुए CJP प्रदर्शनों ने देश में असंख्य छोटे‑बड़े विद्रोहों को जन्म दिया है। (मुख्य निर्वाचन आयुक्त) ज्ञानेश कुमार द्वारा की गई ‘वोट चोरी’ अब स्वतंत्रता के बाद भारत का सबसे बड़ा मुद्दा बन गई है। यह हमारे लोकतंत्र की जड़ पर चोट करती है। सरकार की अपने ‘तोते’ ज्ञानेश को बचाने के लिए प्रदर्शनों को दबाने की कोशिशें उलटी पड़ रही हैं। इससे जनता का गुस्सा और बढ़ रहा है, जो अब उबाल पर है।”

दरअसल, भूषण ने अंग्रेजी में लिखे इस पोस्ट में ‘million mutinies in the country’ लिखा, जिसका अनुवाद हमने ‘असंख्य छोटे-बड़े विद्रोहों’ के रूप में किया है। यह उपमा संभवतः उन्होंने मशहूर लेखक वी.एस. नॉयपॉल की पुस्तक A Million Mutinies Now से ली है। यह किताब नॉयपॉल की भारत संबंधी त्रि-कथा (Trilogy) की आखिरी रचना है, जो 1990 में प्रकाशित हुई थी।

नॉयपॉल की A Million Mutinies Now का सार है कि भारत की सतह पर दिखने वाली हलचल और उथल-पुथल किसी आने वाले विनाश का संकेत नहीं, बल्कि एक “बौद्धिक और सामाजिक जागरण” का परिणाम है। यह छोटे-छोटे विद्रोहों का ऐसा महा-समुद्र है, जो अंततः भारत को अपनी वास्तविक पहचान और स्वतंत्रता की ओर ले जा रहा है।

नायपॉल ने यह किताब 1980 के दशक में भारत यात्रा पर आने के बाद लिखी थी। यहां घूमते हुए उन्हें अहसास हुआ कि स्वतंत्रता के बाद का भारत अब ऐसे दौर में पहुंच गया है, जहां समाज के हर हिस्से में छोटे‑छोटे विद्रोह और असंतोष दिखाई देते हैं। लेकिन ये विद्रोह किसी बड़े क्रांतिकारी आंदोलन की तरह नहीं हैं, बल्कि जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र, राजनीति और व्यक्तिगत आकांक्षाओं से जुड़े संघर्ष हैं। नायपॉल ने इसे भारत के बदलते समाज का प्रतीक माना- जहां लोग अब चुप नहीं रहते, बल्कि अपनी पहचान और अधिकारों के लिए आवाज़ उठाते हैं।

संदर्भ के लिए यह उल्लेख कर लेना उचित होगा कि नॉयपॉल दरअसल संप्रदाय, जाति, क्षेत्र एवं भाषा की पहचान जता रही गतिविधियों से प्रभावित थे, जिन्हें भारतीय नवजागरण के दौर में संकीर्ण एवं भारत की राष्ट्रीय एकता के लिए चुनौती समझा जाता था। नेहरूवादी नीतियों एवं भारतीय धर्मनिरपेक्षता के वे कड़े आलोचक थे। उनका मानना था कि भारत में धर्मनिरपेक्षता का उपयोग अक्सर ऐतिहासिक सच्चाइयों और मध्यकालीन (यानी मुस्लिम) आक्रमणों के घावों को छिपाने के राजनीतिक हथकंडे के रूप में किया गया। अपनी इसी सोच के आधार पर नॉयपॉल ने बाबरी मस्जिद को तोड़ने के लिए हुए राम जन्मभूमि आंदोलन को भारत में एक ऐतिहासिक सांस्कृतिक जागरण के रूप में देखा।

इस रूप में समझा जाएगा कि नरेंद्र मोदी का शासन उस कथित “ऐतिहासिक सांस्कृतिक जागरण” का ठोस परिणाम है। यानी आज देश जहां है, वह 1980-90 के दशकों की ‘Million Mutinies’ का परिणाम है। मगर अब बात जिन ‘Million Mutinies’ की हो रही है, वो दरअसल, उन परिणामों से बनी जकड़न से निकलने की जद्दोजहद की मिसाल हैं।

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने हाल में इन ‘छोटे-मोटे विद्रोहों’ को साझा मंच प्रदान करने की एक सराहनीय पहल की। सत्याग्रह (http://rahulgandhi।in/satyagraha वेबसाइट की शुरुआत करते हुए उन्होंने लिखाः “देशभर में लोग अपने हक़ के लिए लड़ रहे हैं- और अक्सर अकेले लड़ रहे हैं। Gen Z, छात्र, किसान, आदिवासी, दलित, महिलाएं- हर संघर्ष की अपनी कहानी है। पर जो आवाज़ अकेली उठती है, वो अक्सर दब जाती है। ‘सत्याग्रह’ इन्हीं आवाज़ों को एक नक्शे पर साथ लाने की पहल है। बापू ने यही सिखाया था- सच सबसे बड़ा हथियार है। पर उससे भी बड़ा हथियार है, एकता में सच के साथ खड़े होना। अगर आप भी किसी अन्याय से लड़ रहे हैं- अपनी कहानी भेजिए। दो मिनट लगेंगे। आपकी कहानी नक्शे पर आएगी। आप देखेंगे कि आपकी तरह और कौन-कौन लड़ रहा है। और मैं जो कर सकता हूं, करुंगा- संसद में, सड़क पर, खत लिखकर, जहां भी मेरी ज़रूरत हो वहां आपके साथ खड़े होकर- नेता विपक्ष के रूप में ये मेरी ज़िम्मेदारी है। अपने सत्याग्रह की कहानी मुझे यहां बताएं।”

इस पहल की शुरुआत के तीन के अंदर ‘सत्याग्रह’ वेबसाइट पर संघर्ष (या समस्याओं) की 30 हजार से अधिक कहानियां दर्ज कराई गईं। उनमें सबसे ज्यादा संख्या शिक्षा, भ्रष्टाचार, जातीय भेदभाव, स्वास्थ्य सेवाओं, श्रम अधिकारों, और किसान से जुड़े मुद्दों की रहीं। इनसे संबंधित प्रवृष्टियां हजारों की संख्या में आईं। जबकि “वोट चोरी” से संबंधित जिस संघर्ष को प्रशांत भूषण ने “स्वतंत्रता के बाद भारत का सबसे बड़ा मुद्दा” बताया है, उससे संबंधित सिर्फ 559 (सात अक्टूबर को दिन में एक बजे तक) शिकायतें दर्ज हुईं।

फिर भी यह निर्विवाद है कि वोट चोरी बड़ा मुद्दा है, जिसने भारत के राजनीतिक रूप से जागरूक तबकों को उद्वेलित किया है। कॉकरोच जनता पार्टी के इस आंदोलन में उतरने और उसे मिले भारी समर्थन से जाहिर है कि अभिजात्य वर्ग के एक बड़े हिस्से में भी “चुनावों को नियंत्रित” कर लिए जाने के आरोप को गंभीरता से लिया गया है। इस कारण मीडिया, सोशल मीडिया, और आम चर्चाओं में यह सवाल सर्वोपरि बना हुआ है।

इनके साथ जमीनी संघर्षों (जिनमें से कई ने राहुल गांधी की वेबसाइट पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है) को भी जोड़ कर देखें, तो बेशक इस समय देश में मौजूद बेचैनी के आलम का अंदाजा लगता है। इनके परिणामस्वरूप कई क्षेत्रों में सामाजिक अस्थिरता की स्थिति है। आर्थिक दबाव और उस कारण जन्में संघर्षों की कहानी तो लगभग पूरे देश में साकार होती दिखती है। लेकिन उनका कोई सकल एवं राष्ट्र-व्यापी प्रभाव उभरता अभी तक नजर नहीं आया है।

इस सिलसिले में व्लादीमीर इलिच लेनिन का वो कथन अक्सर याद आता है, जिसमें उन्होंने कहा था- There are no people– yet there is a mass of people। इस पूरे कथन का सार था- “जनता बहुत है, असंतोष भी बहुत है, लेकिन नेतृत्व नहीं है। कामगार वर्ग और समाज के अलग‑अलग हिस्सों से हर साल असंतुष्ट लोग सामने आते हैं, जो विरोध करना चाहते हैं और निरंकुश शासन के खिलाफ संघर्ष में मदद देने को तैयार हैं। पर समस्या यह है कि उन्हें दिशा देने वाले नेता और संगठनकर्ता नहीं हैं, जो सबकी ताकत को एकजुट करके संगठित और सामंजस्यपूर्ण आंदोलन बना सकें।” (On Organization)

इस कथन का आशय यह भी था कि संगठित करने वाले सक्षम नेतृत्व और रणनीतिकारों के अभाव के कारण क्रांतिकारी आंदोलन की ऊर्जा बिखर जाती है और उसका प्रभाव सीमित हो जाता है। इस बात की पुष्टि वैसे तो आधुनिक इतिहास के हर दौर में हुई है, लेकिन खासकर 21वीं सदी में इसके उदाहरण भरे-पड़े हैं। 2010 का दशक दुनिया भर में विशाल जन आंदोलनों के उभार का रहा। 2011 तो ऐसा वर्ष था, जब अमेरिकी पत्रिका टाइम ने अपनी सालाना रवायत के तहत “The Protester” को Person of the Year घोषित किया। उसका संदर्भ अरब स्प्रिंग (ट्यूनिशिया, मिस्र, लीबिया, सीरिया, बहरीन आदि में जन विद्रोह, अमेरिका में Occupy Wall Street आंदोलन, यूरोप (खास कर ग्रीस और स्पेन) में आर्थिक संकट के खिलाफ प्रदर्शनों, भारत में अन्ना आंदोलन, और मेक्सिको तथा अन्य कई देशों में अलग-अलग मुद्दों पर जन आंदोलनों से बना था।

मशहूर लेखक और पत्रकार विन्सेंट बोविन ने उन आंदोलन का लगभग एक दशक तक अध्ययन करने के बाद “If We Burn: The Mass Protest Decade and the Missing Revolution” नाम की किताब लिखी, जिसका प्रकाशन 2023 में हुआ। उसमें उन्होंने यही समझने की कोशिश की है कि 2010–20 के वैश्विक जन आंदोलन संरचनात्मक बदलाव में क्यों नहीं बदल पाए? उन्होंने लिखा कि ऐसे संघर्षों से अधिक से अधिक संबंधित देश में राजनीतिक शून्यता पैदा होती है, लेकिन यह क्षणिक या अस्थायी घटना बन कर रह जाती है। बेविन्स ने लिखा है:

“जन आंदोलन के दशक में, सड़कों पर (जन आक्रोश के) हुए अचानक विस्फोटों ने कई बार क्रांतिकारी हालात पैदा किए। लेकिन साधारण विरोध प्रदर्शन ऐसे हालात का लाभ उठाने के लिए बहुत कमजोर साबित होते हैं, और इस तरह के विरोध प्रदर्शन इस मोर्चे पर नाकाम रह जाते हैं। अगर आप मानते हैं कि आप एक बेहतर समाज बना सकते हैं… तो आपको खुद उस राजनीतिक खालीपन में प्रवेश करना चाहिए। लेकिन अलग‑अलग कारणों से सड़क पर उतरे बिखरे हुए व्यक्तियों के समूह सीधे सत्ता अपने हाथ में नहीं ले सकते, कम-से-कम पूरे समूह के रूप में तो नहीं ही। अगर कोई व्यक्ति समूह उस राजनीतिक खालीपन में जाकर जनता के नाम पर सत्ता लेता है, तो वह एक प्रकार के अग्रिम दस्ते (vanguard) की भूमिका निभाता है, जो एक विशेष वैचारिक परियोजना से प्रेरित होता है। कुछ आदर्शवादी, सत्ता‑विरोधी विचारधाराओं में मान लिया गया कि उथल-पुथल से ही नया समाज बन जाएगा, लेकिन अब तक ऐसा नहीं हो पाया है।”

अर्थ यह कि सिर्फ सड़क पर हुआ विरोध क्रांति को दिशा नहीं दे सकता। सत्ता हाथ में लेने के लिए संगठित नेतृत्व और वैचारिक परियोजना की ज़रूरत होती है। मार्क्सवादी क्रांति के संदर्भ में ऐसी एक चर्चित टिप्पणी लेनिन की भी है। उन्होंने कहा था- “अक्सर कहा जाता है कि श्रमिक वर्ग स्वाभाविक रूप से समाजवाद की ओर आकर्षित होता है। यह बिल्कुल सही है, क्योंकि समाजवादी सिद्धांत श्रमिक वर्ग की दुर्दशा के कारणों को अन्य किसी भी अन्य सिद्धांत से अधिक गहराई से और सही ढंग से उजागर करता है। इसी वजह से मजदूर इसे आसानी से अपना लेते हैं- बशर्ते कि यह सिद्धांत खुद ‘स्वतःस्फूर्तता’ के आगे न झुक जाए और उस ‘स्वतःस्फूर्त’ बनी स्थिति को अपने अधीन कर ले। कामगार वर्ग स्वाभाविक रूप से समाजवाद की ओर बढ़ता है; फिर भी, सबसे व्यापक और लगातार नए रूपों में उभरती हुई पूंजीवादी विचारधारा भी स्वाभाविक रूप से कामगार वर्ग पर हावी रहती है।”

फिलहाल, भारत में बात मजदूर तबकों की लड़ाई की नहीं हो रही है। अभी संदर्भ पूंजीवादी ढांचे के तहत मिली सीमित आजादियों और अधिकारों की रक्षा का है। यह गौरतलब है कि इन आजादियों और अधिकारों को अधिक बड़े जन समूहों के साथ साझा करने पर एक दौर में राजी हुए शासक वर्ग इस युग में आकर ऐसी “रियायत” को माकूल और मुनासिब नहीं मान रहे हैं। यह एक वैश्विक परिघटना है। दुनिया भर में आम जन से ऐसी “रियायतों” को छीन लेने की परियोजना इस दौर की हकीकत है। इसके लिए लगभग हर जगह (जहां चुनावी लोकतंत्र है) धुर दक्षिणपंथी ताकतों को शासक समूहों ने अपना औजार बनाया है, जिन्होंने नफरत और विभेद की रणनीति से आम जन को भटकाने की अपनी क्षमता साबित की है।

लाजिम है कि ऐसी कोशिशों के खिलाफ प्रभावित जन समूहों ने प्रतिरोध का रास्ता अख्तियार किया है। जिस समय भारत में ‘Million Mutinies’ की बात हो रही है, उसी समय फ्रांस, स्पेन, जर्मनी और यहां तक कि पाकिस्तान में भी हो रहे बड़े जन प्रदर्शनों ने दुनिया का ध्यान खींच रखा है। कहा जा सकता है कि एक बार फिर “The Protester” अग्रिम कतार में आ खड़ा हुआ है। इससे संभव है कि कुछ जगह राजनीतिक शून्य पैदा हो। लेकिन उससे वो पृष्ठभूमि कितनी बदलेगी, जिसकी वजह से आवाम के हासिल अधिकारों पर तलवारें चली हैं और जिनसे आहत होकर लोग प्रतिरोध जताने के लिए प्रेरित हुए हैं?

जैसाकि ऊपर चर्चा हुई, भारत में ‘वोट चोरी’ एक बड़ा मसला है, लेकिन मुद्दे और भी हैं, जैसी झलक राहुल गांधी की पहल ‘सत्याग्रह’ पर देखने को मिली है। बल्कि एक तर्क यह हो सकता है कि उन समस्याओं (शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, रोजगार, रोजमर्रा की जिंदगी से संबंधित अन्य मसलों) से परेशान लोग अपनी वोट की ताकत से मौजूदा शासन तंत्र में कोई अस्थिरता पैदा ना करें, इसलिए उनके वोट के प्रभाव को कमजोर करना शासक वर्गों की फिलहाल सर्वोच्च प्राथमिकता बन गई है। इसलिए- एक व्यक्ति एक वोट, समान मूल्य- के सिद्धांत को व्यवहार में बचाना इस समय की भले सबसे बड़ी जरूरत हो, लेकिन इस सवाल को सिर्फ इससे ही बांध कर नहीं रखा जा सकता। यह कहना और बार-बार दोहराना जरूरी है कि वोट का अधिकार अपने-आप में अंतिम लक्ष्य नहीं है, बल्कि यह आम जिंदगी को बेहतर बनाने का एक माध्यम भर है और इसीलिए महत्त्वपूर्ण है।

इस लिहाज से अधिक दूरगामी महत्त्व का प्रश्न यह है कि दशकों तक वोट का अधिकार मिले रहने के बावजूद बहुसंख्यक जनता की जिंदगी में उसका असर सीमित क्यों बना रहा और क्या गारंटी है कि आगे ऐसा नहीं होगा? इस नजरिए से वह बदलाव जरूरी हो जाता है, जैसा 2010-20 के दशक में ना हो पाने का जिक्र और उसके कारणों की पड़ताल विन्सेंट बोविन ने अपनी पुस्तक If We Burn में की है। इसलिए मौजूदा ‘Million Mutinies’ को mass of people के बीच no people की हकीकत से अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए। बोविन ने दशक भर पुराने आंदोलनों से टिकाऊ बदलाव ना होने के लिए जिस vanguard की कमी को जिम्मेदार माना, आज असल सवाल वही है कि भारत में उस शर्त को पूरा करने बारे में क्या चर्चा हो रही है? इसकी जरूरत पर कितना जोर दिया जा रहा है, और इस विकल्प की तैयारी के लिए क्या प्रयास हो रहे हैं?

Gen Z के अकेलेपन का इलाज! 32 साल की कृष्णा ने बनाया ऐसा ऐप, जुटाई ₹33.5 करोड़ की फंडिंग

आज के दौर में सोशल मीडिया पर लोगों से जुड़ना बेहद आसान है, लेकिन आमने-सामने दोस्त बनाना और प्रोफेशनल नेटवर्क तैयार करना कई युवाओं के लिए मुश्किल होता जा रहा है। इसी समस्या को 32 वर्षीय उद्यमी कृष्णा दोसापति एक नए तरीके से हल करने की कोशिश कर रही हैं। उनका मानना है कि Gen Z के अकेलेपन का जवाब शायद ज्यादा सोशल मीडिया नहीं, बल्कि लोगों को असल जिंदगी में मिलवाना हो सकता है।

उन्होंने ऐसा प्लेटफॉर्म तैयार किया है, जिसका मकसद युवाओं को उनके आसपास रहने वाले समान रुचियों और प्रोफेशन वाले लोगों से जोड़ना है।

₹33 करोड़ से ज्यादा की फंडिंग, बढ़ी उम्मीदें

कृष्णा दोसापति Clockout की फाउंडर और CEO हैं। उनकी कंपनी ने हाल ही में $3.5 मिलियन यानी करीब ₹33.5 करोड़ की फंडिंग जुटाई है। इस फंडिंग राउंड की अगुवाई 114 Ventures ने की, जबकि Evite Ventures, Allied Ventures, Sher Ventures, Gaingels और BMPB VC ने भी इसमें हिस्सा लिया। अक्टूबर 2024 में लॉन्च हुआ Clockout खुद को LinkedIn और Meetup के बीच का मिश्रण बताता है। इसका मकसद सिर्फ ऑनलाइन कनेक्शन बनाना नहीं, बल्कि उन कनेक्शनों को वास्तविक मुलाकातों और कम्युनिटी में बदलना है।

आइडिया की शुरुआत खुद कृष्णा की परेशानी से हुई

इस स्टार्टअप के पीछे कोई काल्पनिक समस्या नहीं, बल्कि कृष्णा का अपना अनुभव है। न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी से पढ़ाई पूरी करने के बाद जब उन्होंने न्यूयॉर्क में काम शुरू किया, तो उन्हें महसूस हुआ कि इतने बड़े शहर में रहने के बावजूद नए प्रोफेशनल लोगों से मिलना आसान नहीं था। यहीं से उनके मन में सवाल आया कि अगर उन्हें नई कम्युनिटी बनाने में परेशानी हो रही है, तो युवा प्रोफेशनल्स के लिए यह समस्या कितनी बड़ी होगी? इसी सोच ने Clockout का रास्ता तैयार किया।

ऐप सिर्फ प्रोफाइल नहीं, असली मुलाकात पर देता है जोर

Clockout पर यूजर्स अपनी रुचियों, इंडस्ट्री और साझा कनेक्शन के आधार पर दूसरे प्रोफेशनल्स को खोज सकते हैं। इसके बाद प्लेटफॉर्म का लक्ष्य उन्हें डिजिटल बातचीत से निकालकर क्लब, इवेंट और आमने-सामने मुलाकातों तक पहुंचाना है। यानी यहां सिर्फ किसी को ‘कनेक्ट’ करना ही मंजिल नहीं है, बल्कि उस कनेक्शन को असल जिंदगी की दोस्ती या प्रोफेशनल कम्युनिटी में बदलना अहम है।

10 महीने में 6 लाख से ज्यादा डाउनलोड

Clockout के मुताबिक, लॉन्च के बाद प्लेटफॉर्म को 6 लाख से ज्यादा डाउनलोड मिल चुके हैं। कंपनी का दावा है कि पेड फीचर्स शुरू करने के सिर्फ 10 महीनों में उसका वार्षिक आवर्ती राजस्व (ARR) $1.1 मिलियन तक पहुंच गया। 2025 में यूजर्स ने करीब 4 लाख इनवाइट्स भी भेजे।

क्या डिजिटल दौर में असली लोगों की जरूरत बढ़ रही है?

Clockout का मॉडल इस बड़े सवाल के बीच आया है कि ऑनलाइन कनेक्शन बढ़ने के बावजूद युवा पेशेवर अकेलापन क्यों महसूस कर रहे हैं। रिपोर्ट्स में Gallup के आंकड़ों के हवाले से बताया गया है कि 2025 में 35 साल से कम उम्र के करीब 22% कर्मचारियों ने अकेलापन महसूस किया। फिलहाल Clockout फ्रीमियम मॉडल पर काम करता है। अतिरिक्त फीचर्स और क्लबों व इवेंट्स तक अनलिमिटेड पहुंच के लिए सालाना $99 की सदस्यता उपलब्ध है।

Video: पहाड़ी मोड़ पर अचानक बेकाबू हुई कार, खंभे से टकराकर खाई में गिरी; डैशकैम में कैद हुआ खौफनाक मंजर

Chawl से 2.2M Followers तक | Sanjay Appan की कहानी | Influencer Teachers | The Better India Hindi

Chawl से 2.2M Followers तक | Sanjay Appan की कहानी | Influencer Teachers | The Better India Hindi

कभी पहले ही Demo Lecture में कह दिया गया था “आप Teacher नहीं बन सकते।”
आज वही Sanjay Appan लाखों Students के Favourite Professor हैं।
Mumbai की Chawl से शुरू हुआ सफर,
Call Centre और Bank की Jobs से होते हुए Classroom और फिर Instagram तक पहुँचा। आज 2.2 Million Followers हैं,
हजारों Students हैं और Sanjay Appan Academy के जरिए उन बच्चों तक भी Education पहुँचाने की कोशिश है
जो सिर्फ पैसों की वजह से आगे नहीं पढ़ पाते।

संजय ने अपने सफर से एक बात साबित की –
आप कहाँ से आते हैं, ये मायने नहीं रखता।
आप क्या कर सकते हैं, ये मायने रखता है।
@sanjay_appan

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PM Modi Join Bhajan Clubbing: ‘हनुमान अंश’ का ‘पार्वती’ गाना सुन मंत्रमुग्ध हुए पीएम मोदी, GEN Z के साथ भजन क्लबिंग का उठाया लुफ्त

PM Modi Join Bhajan Clubbing: शुक्रवार को दिल्ली में पंडित दीनदयाल उपाध्याय की 110वीं जयंती के मौके पर ‘भजन क्लबिंग’ इवेंट हुआ। इस शाम भक्ति और आज के दौर के संगीत का संगम देखने को मिला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस इवेंट में शामिल हुए। यहां ‘हनुमान अंश’ के लिए मशहूर गायक साधु तिवारी ने फिल्म का लोकप्रिय भक्ति गीत ‘पार्वती’ गाया। जब भजन बज रहा था तो प्रधानमंत्री को ‘जेन-जी’ (Gen Z) दर्शकों के साथ गाने का आनंद लेते हुए देखा गया।

इंस्टाग्राम पर शेयर किए गए एक वीडियो में पीएम मोदी को भीड़ के साथ पूरी तरह घुलते-मिलते, तालियां बजाते और दिल को छू लेने वाली भक्ति परफॉमेंस के दौरान ‘खंजरी’ बजाते हुए देखा गया। बाद में पीएम मोदी ने सोशल मीडिया पर इवेंट का एक वीडियो शेयर किया। उन्होंने लिखा, “दिल्ली में भजन क्लबिंग। शानदार!”

‘हनुमान अंश’ के एक्टर शोभिनव सत्य भी इवेंट में मौजूद थे और उन्होंने फिल्म के भक्ति गीत पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आनंद लेने पर अपनी प्रतिक्रिया दी। NDTV से बातचीत में शोभिनव ने अफसोस जताया कि वह प्रधानमंत्री से मिल नहीं पाए। उन्होंने कहा, “उन्होंने जो कदम उठाए, जिस तरह से वह यहां आए और कुर्सी पर बैठे, ताली बजा रहे थे, पूरा आनंद ले रहे थे, ऐसा लगा जैसे वह बच्चों के बीच एक बच्चे बन गए हों। मुझे लगता है कि ऐसा केवल एक सच्चा संत ही कर सकता है। मेरे लिए वह एक सच्चे संत की तरह हैं।”

क्या है भजन क्लबिंग?

भजन क्लबिंग उभरता हुआ मूवमेंट पूरे भारत में ‘जेन-जी’ (Gen Z) का एक प्रमुख ट्रेंड है, जो भजन को नए अंदाज में पेश करता है। यह इवेंट आध्यात्मिक भजनों को आधुनिक कॉन्सर्ट-स्टाइल स्टेजिंग, शानदार लाइटों, लाइव बैंड और हाई-एनर्जी प्रोडक्शन के साथ पेश करता है। इसे खास तौर पर युवा पीढ़ी के लिए आध्यात्मिक सभाओं को दिलचस्प बनाने के लिए डिजाइन किया गया है। यह लोगों को शराब-मुक्त कॉन्सर्ट के माहौल में नाचने, भजन गाने और एक-दूसरे से घुलने-मिलने का मौका देता है।

‘हनुमान अंश’

विशाल चतुर्वेदी द्वारा निर्देशित ‘हनुमान अंश’ फिल्म लक्ष्मी नारायण नाम के एक दुखी लड़के के शुरुआती जीवन की कहानी है, जो भगवान की तलाश में घर छोड़ देता है। दशकों तक भटकने, ध्यान करने और सेवा करने के बाद वह सम्मानित संत नीम करौली बाबा बन जाते हैं, जिन्हें भक्त भगवान हनुमान का अवतार मानते हैं। सिर्फ 2 करोड़ रुपये के बजट में बनी इस फिल्म ने दुनिया भर में 375 करोड़ रुपये से ज्यादा की कमाई की और बड़े मेनस्ट्रीम स्टूडियो की फिल्मों पर पूरी तरह छा गई।

UPI पर 0.4% एमडीआर चार्ज का फैसला वापस नहीं होगा, सीनियर सरकारी अधिकारी ने कहा

यूपीआई ट्रांजेक्शंस पर 0.4 फीसदी एमडीआर चार्ज का फैसला वापस नहीं होगा। सरकार के सूत्रों ने 16 सितंबर को यह बताया। एनपीसीआई ने 15 सितंबर को 2000 रुपये से ज्यादा वैल्यू के ट्रांजेक्शंस पर 0.4 फीसदी एमडीआर चार्ज लगाने का ऐलान किया।

एमडीआर चार्ज का फैसला वापस नहीं लेगी सरकार

सरकार क्या 2000 रुपये से ज्यादा के ट्रांजेक्शंस पर 0.4 फीसदी एमडीआर लगाने का फैसला वापस लेगी? इस सवाल के जवाब में एक सीनियर अधिकारी ने कहा कि इस बारे में फैसला लिया जा चुका है और इसे वापस लेने का सवाल ही नहीं पैदा होता।

एमडीआर चार्ज से यूपीआई सिस्टम को फायदा

सूत्रों ने बताया कि एमडीआर चार्ज लगाने का फैसला यूपीआई ईकोसिस्टम के हित में लिया गया है। इसका मकसद यूपीआई की सेफ्टी और सिक्योरिटी को मजबूत बनाना है। सूत्रों ने यह भी कहा कि 2020 में यूपीआई शुरू होने पर दूसरे देशों की तरह लेवी लगाने का फैसला लिया गया था। नए एमडीआर फ्रेमवर्क से यूपीआई को बनाए रखने में मदद मिलेगी।

कई पक्षों ने एमडीआर चार्ज का किया विरोध

यूपीआई पेमेंट पर एमडीआर चार्ज लगाने का कई पक्षों ने विरोध किया है। इनमें ट्रेडर्स, दुकानदार और राजनीतिक दल शामिल हैं। राजनीतिक दलों ने इसे ‘मोदी टैक्स’ बताया है। कांग्रेस सहित कुछ विपक्षी दलों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अमेरिकी दबाव के आगे झुकने का आरोप लगाया है।

एमडीआर चार्ज से यूपीआई के विस्तार में मदद मिलेगी

सरकार ने एमडीआर चार्ज लगाने के फैसले का बचाव करते हुए 15 सितंबर को कहा कि इससे रूरल और सेमी अर्बन एरिया में यूपीआई के विस्तार में मदद मिलेगी। सरकार का कहना है कि यूपीआई से होने वाले ज्यादातर पेमेंट्स को फ्री बनाए रखा गया है।

संसद की समिति ने यूपीआई को फ्री रखने का समर्थन नहीं किया था 

फाइनेंस पर संसद की स्थायी समिति ने अपनी 32वीं रिपोर्ट में कहा था कि ‘जीरो यूपीआई रीजीम’ से सरकार पर वित्तीय दबाव पड़ता है। इससे लॉन्ग टर्म इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश करने की यूपीआई ईकोसिस्टम की क्षमता भी सीमित बनी रहती है। उसने यूपीआई को वित्तीय रूप से सस्टेनेबल बनाए रखने के लिए व्यावहारिक रेवेन्यू की व्यवस्था शुरू करने की सलाह दी थी।

यह भी पढ़ें: Gen Z रिटायरमेंट प्लानिंग में दूसरों से काफी आगे, एक्सिस मैक्स लाइफ सर्वे के दिलचस्प नतीजे

यूपीआई सिस्टम पर सरकार को सालाना 2000 करोड़ खर्च करना पड़ता है

समिति ने यह भी कहा था कि यूपीआई पेमेंट ईकोसिस्टम की मदद के लिए सरकार सालाना 2000 करोड़ रुपये खर्च करती है। करीब 6 सालों तक पूरी तरह से फ्री रहने के बाद यूपीआई अब चार्जेबल हो जाएगा। एमडीआर चार्ज 15 अक्तूबर से लागू हो जाएगा। हालांकि, चार्ज के दायरे में 2000 रुपये से ऊपर के ट्रांजेक्शन आएंगे। कस्टमर्स को यह चार्ज नहीं चुकाना होगा।

Gen Z रिटायरमेंट प्लानिंग में दूसरों से काफी आगे, एक्सिस मैक्स लाइफ सर्वे के दिलचस्प नतीजे

एक्सिस मैक्स लाइफ इंश्योरेंस लिमिटेड ने 16 सितंबर को कांतार के साथ मिलकर किए गए अपने सालाना ‘भरोसा टॉक्स इंडिया रिटायरमेंट इंडेक्स स्टडी’ के छठे एडिशन (आइरिस 6.0) के नतीजे जारी किए। यह स्टडी शहरी भारत में रिटायरमेंट के बारे में सोच में आए एक बड़े बदलाव को दिखाती है।

लोग रिटायरमेंट के बारे में जल्द सोचने लगे हैं

सर्वे के नतीजे बताते हैं कि अब पहले से कहीं ज्यादा भारतीय जल्दी रिटायर होना चाहते हैं और रिटायरमेंट के बारे में जल्दी सोचना भी शुरू कर रहे हैं। हालांकि स्टडी में यह भी सामने आया कि इच्छा से लेकर तैयारी तक का फाइनेंशियल सफर अभी भी काफी लंबा है।

जल्द रिटायर करने की बढ़ रही है चाहत

‘भरोसा टॉक्स आइरिस’ के छठे एडिशन से यह बात सामने आई है कि अगर आर्थिक जरूरतें पूरी हो जाएं, तो 10 में से 7 शहरी भारतीय 58-60 साल की उम्र से पहले ही रिटायर होना चाहेंगे। रिटायर होने की चाहत रखने वालों में से आधे लोग 50 साल की उम्र से पहले ही ‘फाइनेंशियल इंडिपेंडेंस एंड रिटायर एर्ली’ (एफआईआरई) का लक्ष्य हासिल करना चाहते हैं। हालांकि, सर्वे में शामिल लोगों ने अपने रिटायरमेंट के लिए तय किए गए अपने फंड का औसतन सिर्फ 28 प्रतिशत ही अब तक जमा किया है।

रिटायरमेंट के लिए पैसे जुटाना एक चुनौती

एक्सिस मैक्स लाइफ इंश्योरेंस के एमडी एवं सीईओ सुमित मदान ने कहा, “भरोसा टॉक्स आइरिस 6.0 से यह संदेश स्पष्ट रूप से सामने आया है कि कई भारतीयों के लिए रिटायरमेंट अभी भी एक फाइनेंशियल चुनौती है। स्टडी में सामने आया है कि जेन एक्स+ के 82 प्रतिशत लोगों को लगता है कि लगातार इनकम के लिए उन्हें काम करते रहना पड़ेगा। इस डर से एक अहम सच्चाई सामने आई है: ‘रिटायरमेंट का मतलब सिर्फ एक खास उम्र तक पहुंचना नहीं होता है, बल्कि आगे क्या करना है, यह चुनने की फाइनेंशियल आजादी भी होनी चाहिए।’

मन की शांति सुरक्षित रिटायरमेंट का असल मतलब

अब युवा अपनी रिटायरमेंट की तैयारी बहुत पहले से शुरू कर रहे हैं। यह रिएक्टिव प्लानिंग से प्रोएक्टिव तैयारी की ओर बदलाव का संकेत है। असली चुनौती लोगों के इरादे को फाइनेंस, हेल्थ और इमोशनल वेलबीइंग के मामले में लगातार एक्शन में बदलने की है, क्योंकि असल में आजादी, पसंद और मन की शांति ही सुरक्षित रिटायरमेंट का असली मतलब है।

अलग-अलग पीढ़ियों में बदल रही रिटायरमेंट प्लानिंग

कांतार की साउथ एशिया की मैनेजिंग डायरेक्टर और चीफ क्लाइंट ऑफिसर सौम्या मोहंती ने कहा, “भरोसा टॉक्स आइरिस 6.0 से पता चलता है कि अलग-अलग पीढ़ियों और इलाकों में रिटायरमेंट प्लानिंग का तरीका बदल रहा है। युवा भारतीय अब रिटायरमेंट प्लानिंग जल्दी शुरू कर रहे हैं। रिटायरमेंट की तैयारी में सेहत का ध्यान रखना भी अहम हो गया है।

टियर-2 शहरों में भी बेहतर हुई रिटायरमेंट प्लानिंग

उन्होंने कहा कि 59 प्रतिशत लोगों का कहना है कि वे नियमित रूप से या कभी-कभी हेल्थ चेक-अप करवाते हैं। इसके अलावा, जो लोग नियमित रूप से शारीरिक गतिविधियों में हिस्सा लेते हैं, उनमें से 44 प्रतिशत लोग रोजाना ऐसा करते हैं। टियर-2 शहरों में भी रिटायरमेंट की तैयारी बेहतर हुई है, जो शहरी भारत में रिटायरमेंट को लेकर लोगों के बीच व्यापक बातचीत का संकेत है।”

 62 फीसदी जेन जी ने शुरू की रिटायरमेंट प्लानिंग

जेन जी के 62 प्रतिशत लोगों ने रिटायरमेंट के लिए निवेश करना शुरू कर दिया है, जबकि मिलेनियल्स में यह आंकड़ा 70 प्रतिशत और जेन एक्स+ में 75 प्रतिशत है। 61 प्रतिशत लोग जानते हैं कि रिटायरमेंट के बाद के वर्षों में अपनी मौजूदा जीवनशैली बनाए रखने के लिए उन्हें कितनी रकम की जरूरत होगी, लेकिन उन्हें इस बात का पूरा भरोसा नहीं है कि यह रकम काफी होगी। सिर्फ 11 प्रतिशत लोगों को लगता है कि उनकी रिटायरमेंट की बचत जिंदगी भर चलेगी। 39 प्रतिशत लोगों को लगता है कि उनकी बचत पांच साल भी नहीं चल पाएगी।

रिटायरमेंट फंड को लेकर भी बदल रही सोच

रिटायरमेंट के लिए कितनी रकम (कॉर्पस) काफी है, इसे लेकर भी लोगों की सोच बदल रही है। आरामदायक रिटायरमेंट के लिए 1 करोड़ रुपये या उससे कुछ कम की रकम को ही काफी मानने वालों की संख्या 7 प्रतिशत कम हुई है। 2025 में ऐसा मानने वाले 77 प्रतिशत थे, जो 2026 में 70 प्रतिशत हो गए। यह सोच उन लोगों में खास तौर पर कम है जिनकी सालाना घरेलू आय 15 लाख रुपये से ज्यादा है। इस आय स्तर पर ऐसा मानने वाले 51 प्रतिशत हैं, जबकि मेट्रो शहरों में रहने वालों में ऐसा मानने वाले 63 प्रतिशत हैं।

52 फीसदी लोगों ने लिया हेल्थ इंश्योरेंस

75 प्रतिशत लोगों को उम्मीद है कि वे रिटायरमेंट के बाद के वर्षों में सेहतमंद और फिट रहेंगे। वर्तमान समय में 52 प्रतिशत लोगों का कहना है कि उन्होंने हेल्थ इंश्योरेंस लिया है और जो लोग नियमित तौर पर शारीरिक गतिविधियों में हिस्सा लेते हैं, उनमें से 44 प्रतिशत लोग रोजाना ऐसा करते हैं। इसके अलावा, 21 प्रतिशत लोग अपनी सेहत पर नजर रखने के लिए वियरेबल डिवाइस का इस्तेमाल करते हैं।