क्या घर खरीदने के लिए तैयार है Gen Z? जानिए नई पीढ़ी को होम लोन लेते वक्त किन बातों का रखना चाहिए ध्यान

भारत की Gen Z डिजिटल क्रेडिट के दौर में बड़ी हुई है। EMI और Buy Now, Pay Later उसके लिए नई चीज नहीं हैं। लेकिन फोन की कुछ महीनों की EMI और 20 साल का होम लोन एक जैसी जिम्मेदारी नहीं है।

भारत की Gen Z ऐसे समय में बड़ी हुई है, जब डिजिटल क्रेडिट और EMI रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। लेकिन कर्ज लेकर चीजें खरीदना और घर खरीदने के लिए कर्ज लेना अलग बात है। फोन की कुछ महीनों की EMI एक बात है। वहीं, घर के लिए 20 साल की EMI बिल्कुल अलग जिम्मेदारी है।

अब युवा भारतीय पहले के मुकाबले कम उम्र में घर खरीदने के लिए आगे आ रहे हैं। ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि वे क्रेडिट लेने में सहज हैं या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या वे लंबे समय की इस वित्तीय जिम्मेदारी के लिए तैयार हैं।

घर खरीदने वाला युवा हो रहा है

Knight Frank की रिपोर्ट ‘Beyond Bricks: The Pulse of Home Buying 2025’ के मुताबिक, 71% Gen Z किराये पर रहने के बजाय अपना घर खरीदना पसंद करती है। वहीं, 7,400 से ज्यादा मौजूदा और संभावित होमबायर्स पर आधारित 2026 की सर्वे रिपोर्ट ‘How Bharat Finances Its Housing Dreams’ भी इसी बदलाव की तरफ इशारा करती है। इसके मुताबिक, Millennials और Gen Z अब करीब 90-95% घरों की खरीदारी में शामिल हैं।

बेसिक होम लोन के को-फाउंडर अतुल मोंगा का कहना है कि होम लोन लेने वालों की औसत उम्र भी 35 साल से ज्यादा से घटकर करीब 25 साल हो गई है। मोंगा के मुताबिक, ‘युवा भारतीय घर खरीदने के लिए ज्यादा इंतजार नहीं कर रहे हैं। वे कम उम्र में ही हाउसिंग मार्केट में एंट्री कर रहे हैं।’

Home Loan बाकी कर्ज से अलग है

Gen Z क्रेडिट को समझती है। लेकिन लंबे समय के कर्ज की जिम्मेदारी अलग होती है। फोन की EMI कुछ महीनों में खत्म हो सकती है। Home Loan के साथ ऐसा नहीं है। 20 साल में जिंदगी कई बार बदल सकती है। करियर बदल सकता है। परिवार बढ़ सकता है। शहर बदलना पड़ सकता है। आर्थिक जरूरतें भी बदल सकती हैं।

इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि बैंक आपको कितना लोन दे सकता है। सवाल यह है कि आप कितनी EMI लंबे समय तक आराम से चुका सकते हैं।

अतुल का कहना है, ‘आज का फैसला अगले 20 साल की जिंदगी को प्रभावित कर सकता है। इसलिए सिर्फ यह देखना काफी नहीं है कि कितना लोन मिल सकता है। यह देखना भी जरूरी है कि कितना लोन टिकाऊ तरीके से चुकाया जा सकता है।’

युवा चाहते हैं डिजिटल Home Loan

युवा सिर्फ घर खरीदने का तरीका नहीं बदल रहे हैं। वे होम लोन लेने की प्रक्रिया भी बदल रहे हैं। स्टडी के मुताबिक, 40 साल से कम उम्र के 72% उधारकर्ता ऑनलाइन होम लोन के लिए आवेदन करना पसंद करते हैं। वहीं, लोन लेने की प्रक्रिया में DigiLocker का इस्तेमाल करने वाले करीब 80% लोग 35 साल या उससे कम उम्र के हैं।

यानी यह पीढ़ी चाहती है कि फाइनेंशियल सर्विस आसान, डिजिटल और पारदर्शी हो। लेकिन सिर्फ प्रक्रिया का डिजिटल होना काफी नहीं है। आवेदन जल्दी हो सकता है। लोन भी जल्दी मिल सकता है। फिर भी सही फैसला लेने के लिए लोन की शर्तों को समझना जरूरी है।

सिर्फ लोन मिलना काफी नहीं

मोंगा का कहना है कि पहली बार होम लोन लेने वाले युवा के लिए कई चीजें समझना जरूरी हैं। मसलन, लोन की अवधि कितनी है। कुल ब्याज कितना देना होगा। प्रीपेमेंट का क्या असर होगा। और सबसे जरूरी, कितनी रकम वास्तव में अफोर्ड की जा सकती है।

यहां एक फर्क समझना जरूरी है। बैंक जितना लोन देने को तैयार है, जरूरी नहीं कि उतना लोन लेना आपके लिए सही भी हो। होम लोन का बोझ अगले कई साल तक साथ रहता है। इसलिए आज की EMI के साथ कल की जरूरतों के लिए भी जगह बचनी चाहिए।

Buy Now, Pay Later से आगे की सोच

Gen Z ने Buy Now, Pay Later का दौर देखा है। लेकिन Home Loan में सोच अलग रखनी होगी। यह सिर्फ तुरंत कुछ खरीदने की बात नहीं है। यह लंबे समय की वित्तीय योजना है।

मोंगा के मुताबिक, ‘अच्छी बात यह है कि युवा घर खरीदने से पीछे नहीं हट रहे हैं। वे पहले घर खरीदना चाहते हैं। डिजिटल फाइनेंस को अपना रहे हैं। अब जरूरत यह है कि उन्हें सिर्फ क्रेडिट तक पहुंच न मिले। उन्हें यह भी साफ समझ आए कि उस क्रेडिट की असली जिम्मेदारी क्या है।’

उनका कहना है कि मकसद सिर्फ घर की चाबी हासिल करना नहीं होना चाहिए। घर खरीदने के बाद भी परिवार आर्थिक रूप से सुरक्षित रहे, यह ज्यादा जरूरी है। क्योंकि असली मौका सिर्फ किसी युवा को होम लोन मिलने में नहीं है। असली बात ये है कि वो ऐसा फैसला ले, जिसे अगले 20 साल तक आसानी से निभा सके।Z

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Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी निवेश, लोन, टैक्स, बीमा या दूसरे वित्तीय फैसले लेने से पहले संबंधित एक्सपर्ट्स से सलाह जरूर लें। मनीकंट्रोल किसी भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट या सर्विस की सिफारिश नहीं करता।

Video: नदी में जहरीले सांपों, टूटे कांच…फिर भी नहीं मानी हार, 21 साल के युवक की अकेले गंगा की सफाई करने की कहानी वायरल

प्रयागराज के एक कंटेंट क्रिएटर और व्लॉगर का वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहा है। इस वीडियो में युवक बिना किसी डर के गंगा नदी में उतरकर घंटों कचरा साफ करते हैं। इस दौरान उन्हें कई बार मुश्किल और खतरनाक हालात का सामना भी करना पड़ता है, लेकिन इसके बावजूद वह अपना काम जारी रखते हैं। ये कहानी है प्रयागराज के रहने वाले 21 वर्षीय शिवम कुमार की। शिवम कुमार अपने गंगा सफाई अभियान की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर लगातार शेयर करते हैं। उनके पोस्ट में वह नदी के पानी और किनारों से कचरा निकालते नजर आते हैं। शिवम के मुताबिक, उन्होंने पिछले साल से गंगा की सफाई का काम शुरू किया था और अब इसे अपने जीवन का एक जरूरी मिशन मानते हैं।

इसी दौरान उन्होंने एक महिला को नदी में कचरे से भरा बैग फेंकते हुए भी रिकॉर्ड किया, जिससे पता चलता है कि लोगों के लगातार कचरा डालने के कारण सफाई का

नदी में दिखा था सांप

शिवम कुमार गंगा को साफ रखने के लिए नदी में जमा अलग-अलग तरह का कचरा निकालते हैं। वह अब तक कांच की टूटी बोतलें, कपड़े, गत्ते, खाने-पीने का बचा सामान और कई दूसरी चीजें नदी से बाहर निकाल चुके हैं। एक वीडियो में वह बड़ी मात्रा में कचरा साफ करते नजर आए। गंगा की सफाई करते समय शिवम को कई बार मुश्किल और खतरनाक हालात का सामना करना पड़ा है। कई जगहों पर उन्हें टूटे कांच के बीच से गुजरकर कचरा निकालना पड़ा, जबकि उनके पैरों में सिर्फ चप्पल थी। एक बार सफाई के दौरान नदी के पास उन्हें जहरीले सांप भी दिखाई दिए। इसके बावजूद शिवम ने अपना सफाई अभियान नहीं रोका और लगातार नदी से कचरा निकालते रहे।

 

खोज रहे है काम

गंगा की सफाई के साथ शिवम को पैसों की परेशानी भी झेलनी पड़ रही है। अपनी जरूरतें पूरी करने और सफाई का काम जारी रखने के लिए वह नौकरी की तलाश कर रहे हैं। एक वीडियो में वह अलग-अलग दुकानों पर काम पूछते नजर आए। शिवम के लिए गंगा की सफाई सिर्फ सोशल मीडिया पर वीडियो बनाने का काम नहीं है, बल्कि वह इसे अपने दिल के करीब मानते हैं। मुश्किलों के बावजूद वह लगातार नदी की सफाई करते हैं और अपने काम के वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर करते हैं। उनकी मेहनत को देखकर कई लोग उनकी तारीफ कर रहे हैं और उनका हौसला बढ़ा रहे हैं।

लोगों ने की तारीफ

शिवम के काम को देखकर सोशल मीडिया पर कई लोगों ने उनकी तारीफ की। एक यूजर ने लिखा, “हमें स्वच्छ भारत अभियान को फिर से शुरू करने की जरूरत है। गड्ढों और बाकी चीजों को छोड़कर पहले अपने आसपास और अपने अंदर की गंदगी को साफ करना जरूरी है।” वहीं, दूसरे यूजर ने कहा, “Gen Z आगे आकर एक साफ, स्वस्थ और बेहतर पर्यावरण बनाने में योगदान दे रहा है।”

Video: 9 साल तक गुल्लक में पैसे जमा करती रही महिला, 29 की उम्र में बन गई अपने प्लॉट की मालकिन

उत्तर प्रदेश की 29 साल की दीक्षा जायसवाल ने यह साबित कर दिया कि बड़े सपनों को पूरा करने के लिए हमेशा बड़ी कमाई जरूरी नहीं होती। अगर इरादा मजबूत हो और बचत की आदत पक्की हो, तो छोटी-छोटी रकम भी समय के साथ बड़ी पूंजी बन सकती है। दीक्षा ने करीब नौ साल तक अपनी कमाई का हिस्सा बचाया और आखिरकार जुलाई 2026 में अपने नाम जमीन का एक टुकड़ा खरीद लिया।

बहन की जिंदगी देखकर आया खुद की जमीन का ख्याल

दीक्षा के मन में खुद की प्रॉपर्टी खरीदने का सपना 2017 में आया। शादी के बाद अपनी बड़ी बहन को कुछ असुरक्षाओं से गुजरते देख उन्हें महसूस हुआ कि एक महिला के नाम उसकी अपनी संपत्ति होना कितना जरूरी है। उन्होंने तय किया कि वह ऐसी जमीन खरीदेंगी, जिस पर सिर्फ उनका अधिकार हो। यही सोच आगे चलकर उनके लिए एक लक्ष्य बन गई।

पिता के हादसे के बाद पढ़ाई के साथ शुरू किया काम

दीक्षा का आत्मनिर्भर बनने का सफर भी आसान नहीं था। साल 2012 में उनके पिता का एक्सीडेंट हुआ, जिसके बाद उन्होंने अपनी पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए गांव के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। कम उम्र में कमाई शुरू करने के इस अनुभव ने उन्हें अपने पैरों पर खड़े होने का आत्मविश्वास दिया। आगे चलकर उन्होंने अपनी B.Com, M.Com और B.P.Ed की पढ़ाई का खर्च खुद उठाया। साथ ही हॉकी खेलीं और कराटे भी सिखाया।

शेयर बाजार नहीं आता था, बस बचत करना जानती थीं

दीक्षा ने बताया कि उन्हें जटिल निवेश या शेयर बाजार की ज्यादा जानकारी नहीं थी। उनका फॉर्मूला बेहद साधारण था जो भी कमाई हो, उसमें से कुछ हिस्सा हर हाल में बचाना।

स्पोर्ट्स टीचर के तौर पर मिलने वाली कमाई में से वह पैसे अलग रखती थीं। कभी मिट्टी की गुल्लक में सिक्के जमा किए, तो कभी पुराने कपड़े के थैलों में नकदी रखी। इसके अलावा उन्होंने धीरे-धीरे सोना भी जमा किया।

जिंदगी में कई मौके आए, लेकिन बचत को नहीं छुआ

नौ साल तक बचत करना उनके लिए आसान नहीं रहा होगा। रोजमर्रा की जरूरतों और जिंदगी के छोटे-बड़े खर्चों के बीच उन्होंने अपनी जमा पूंजी को हाथ नहीं लगाया। समय के साथ सिक्के, नकदी और सोने की छोटी-छोटी बचत एक बड़ी रकम में बदलती गई। दीक्षा का कहना है कि उन्होंने लंबे समय तक इस बचत को सिर्फ इसलिए नहीं छुआ, क्योंकि उनका लक्ष्य पहले से तय था।

जुलाई 2026 में पूरा हुआ सालों पुराना सपना

आखिरकार जुलाई 2026 में वो दिन आया, जिसका दीक्षा को सालों से इंतजार था। 29 साल की उम्र में उन्होंने अपनी बचत निकाली और अपने नाम जमीन का एक प्लॉट खरीद लिया। उनके लिए यह सिर्फ जमीन खरीदना नहीं था, बल्कि नौ साल की मेहनत, त्याग और आत्मनिर्भरता का नतीजा था। सिक्कों से भरी गुल्लक, हाथ से बांधे गए नकदी के बंडल और सोने की बचत को देखकर उन्हें महसूस हुआ कि उनका सालों पुराना सपना सच हो चुका है।

सोशल मीडिया पर लोगों के रिएक्शन

दीक्षा की कहानी सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद लोगों ने उनकी जमकर तारीफ की। कई यूजर्स ने उनकी मेहनत और आर्थिक आत्मनिर्भरता को प्रेरणादायक बताया। एक यूजर ने लिखा कि जमीन कितनी भी बड़ी या छोटी हो, उसे खुद की कमाई से खरीदना अपने आप में बेहद खास उपलब्धि है। वहीं एक अन्य यूजर ने कहा कि हर लड़की को आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने और अपने नाम संपत्ति बनाने की अहमियत समझनी चाहिए।

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SRCC में PM मोदी का Gen Z कनेक्ट, ‘OG’ और ‘धुरंधर’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर युवाओं को दिया संदेश

PM Modi SRCC Speech: शनिवार को श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (SRCC) के छात्रों को संबोधित करते हुए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘Gen Z’ (आज की युवा पीढ़ी) की भाषा में ‘OG’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। साथ ही, 2013 में दिए गए अपने भाषण के 13 साल बाद कॉलेज लौटने पर उन्होंने हाल ही में लोकप्रिय हुई फिल्म ‘धुरंधर’ का भी जिक्र किया।

पीएम मोदी ने अपनी बात की शुरुआत अपने पुराने भाषण का जिक्र करते हुए किया। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ दिनों में उनके 2013 के भाषण की काफी चर्चा हुई और लोगों ने उसे दोबारा देखा। उन्होंने छात्रों से कहा, “2013 में मैंने जो कहा था, वह मेरा पक्का विश्वास था।”

‘धुरंधर’ से ‘रीविजिट’ तक

हल्के-फुल्के अंदाज में बात करते हुए पीएम मोदी ने छात्रों से कहा, “हो सकता है कि आप ‘धुरंधर’ न हों, लेकिन अपनी मौजूदगी का एहसास जरूर कराएं।” अपनी छाप जरूर छोड़ें। उन्होंने ‘रीविजिट’ (फिर से देखना/याद करना) शब्द का इस्तेमाल करते हुए युवा पीढ़ी से कहा कि वे उस समय की स्थिति पर नजर डालें जब उन्होंने 2013 में आखिरी बार SRCC को संबोधित किया था।

पीएम मोदी ने छात्रों से कहा कि वे ऑनलाइन जाकर देखें कि उस समय अखबारों में क्या खबरें छप रही थीं, जब कांग्रेस के नेतृत्व वाली UPA सरकार सत्ता में थी और वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे।

SRCC के जाने-माने पूर्व छात्रों (एलुमनाई) को याद करते हुए पीएम मोदी ने कहा, “SRCC के पूर्व छात्र भी बहुत खास रहे हैं। अगर मैं आपकी भाषा में कहूं, तो यहां के पूर्व छात्र ‘OGs’ (असली दिग्गज) हैं।”

दोनों दौर की तुलना करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि 2013 में भारत कई चुनौतियों का सामना कर रहा था, जिनमें आतंकी हमले, महंगाई और भ्रष्टाचार शामिल थे।

उन्होंने कहा, “विकास दर बहुत नीचे थी और महंगाई चरम पर थी,” साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि घोटाले और भ्रष्टाचार भी अपने चरम पर थे।

उस समय के माहौल को याद करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा, “हर तरफ निराशा और मायूसी ही थी।”

इस दौरान पीएम मोदी ने सुरक्षा चुनौतियों और ‘लाइन ऑफ कंट्रोल’ (LoC) पर हालात का भी जिक्र किया और 2014 से पहले की स्थिति की तुलना अपनी सरकार के जवाब से की।

पीएम मोदी ने पाकिस्तान पर साधा निशाना

पाकिस्तान पर निशाना साधते हुए, पीएम मोदी ने सीमा पार से होने वाले हमलों पर उस समय और अब के रवैये की तुलना की।

उन्होंने कहा, “आज जब पाकिस्तान कोई हरकत करता है, तो हम उनके घर में घुसकर हमला करते हैं।” उन्होंने अपनी सरकार के दौरान पाकिस्तान के प्रति भारत के रुख का जिक्र करते हुए यह बात कही।

उन्होंने उस समय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि का भी जिक्र किया और बताया कि 2013 में देश को “फ्रैजाइल फाइव” (कमजोर पांच अर्थव्यवस्थाओं में से एक) कहा जाता था। उन्होंने 2013 में भारत की स्थिति और आज की स्थिति की तुलना करते हुए इस शब्द का इस्तेमाल किया।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि अब भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था के तौर पर पहचाना जा रहा है। उन्होंने हाल के GDP आंकड़ों का भी जिक्र किया, जिनके मुताबिक अप्रैल-जून तिमाही में अर्थव्यवस्था 7.8 प्रतिशत की दर से बढ़ी है।

क्या Gen Z तक पहुंचने की नई कोशिश है?

हाल ही में जंतर-मंतर पर Gen Z के नेतृत्व में हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद, BJP और उसके नेता युवा दर्शकों से जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं। इसी सिलसिले में PM मोदी ने SRCC में खास तरह की भाषा का इस्तेमाल किया। हाल ही में BJP सांसदों ने संसद में “MIA”, “FOMO” और “Delulu” जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया है, जबकि खुद प्रधानमंत्री भी इंस्टाग्राम-स्टाइल वीडियो और युवाओं को ध्यान में रखकर संदेश देने का तरीका अपना रहे हैं।

जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन मुख्य रूप से मीम्स, रील्स और इंटरनेट कल्चर से प्रेरित थे। इनसे पता चला कि Gen Z किस तरह सोशल मीडिया का इस्तेमाल करके लोगों को एकजुट कर सकता है और राजनीतिक चर्चा को दिशा दे सकता है। बता दें कि इस आंदोलन के कारण तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा था।

इसलिए, PM मोदी का SRCC का दौरा सिर्फ 2013 में दिए गए भाषण को दोहराना नहीं था। यह दौरा ऐसे समय में हुआ है जब राजनीतिक पार्टियां उस पीढ़ी की भाषा को समझने और बोलने की कोशिश कर रही हैं जो रील्स, मीम्स और इंटरनेट स्लैंग के जरिए बातचीत करती है।

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100 बच्चों को मुफ्त पढ़ा रहे 23 साल के कृष्णा | Aapka Krishna | Free Education | Rajasthan

100 बच्चों को मुफ्त पढ़ा रहे 23 साल के कृष्णा | Aapka Krishna | Free Education | Rajasthan

कृष्णा ने बचपन से ही एयरफोर्स में जाकर देश की सेवा का सपना देखा था, लेकिन एक्सीडेंट के बाद ऐसा हो ना सका। लेकिन 23 की उम्र में उन्होंने हार मानने के बजाय देश सेवा का एक नया रास्ता चुन लिया।

आज राजस्थान का ये लड़का अपने गाँव के 100 बच्चों को मुफ्त पढ़ा रहा है, ताकि जिन हाथों में कभी मजबूरी ने काम थमाया था, उनमें कल किताबें हों और अपने सपने चुनने की आज़ादी हो।

कृष्णा का सफर याद दिलाता है कि देश सेवा सिर्फ वर्दी पहनकर नहीं होती। कभी-कभी एक बच्चे को पढ़ने का मौका देना भी देश का भविष्य संवारना होता है। :heart:

आप भी कृष्णा से पढ़ने वाले एक बच्चे की मदद करें: ₹130 = 1 Stationery Kit & 1 Meal
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Bank Details:
Account Holder Name: Kanheya Lal
Account Number: 4331119000551
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GIDC प्लॉट धारकों के लिए बड़ी राहत: राज्य सरकार ने घोषित की ‘GIDC एम्नेस्टी स्कीम’

GIDC प्लॉट धारकों के लिए बड़ी राहत: राज्य सरकार ने घोषित की 'GIDC एम्नेस्टी स्कीम'

Bhupendra Patel

उद्योगपतियों को राहत देने, सरकारी प्रक्रियाओं को सरल बनाने और औद्योगिक विकास को गति देने के दृष्टिकोण के साथ राज्य सरकार उद्योग क्षेत्र के लिए पारदर्शी और विकासोन्मुख प्रशासन प्रदान करने के लिए लगातार कार्यरत है। GIDC के प्लॉट धारकों द्वारा औद्योगिक प्लॉट या शेड के हस्तांतरण (ट्रांसफर) के समय पंजीकृत लीज डीड करने के बजाय केवल अलॉटमेंट लेटर या सप्लीमेंट्री एग्रीमेंट दिए जाते थे। इसके कारण पूर्व प्लॉट धारकों द्वारा अधिकांश मामलों में स्टांप ड्यूटी का भुगतान नहीं किया गया था। ALSO READ: गुजरात विधानसभा का 3 दिवसीय मानसून सत्र 9 सितंबर से: पहले दिन दिवंगत नेताओं को श्रद्धांजलि के बाद शुरू होगी कार्यवाही

 

गुजरात स्टांप अधिनियम में संशोधन और जुर्माना के प्रावधान

राज्य सरकार ने दिनांक 02/04/2025 से गुजरात स्टांप अधिनियम, 1958 में समेकित संशोधन किए हैं। इसके तहत धारा-39(1)(ख) के अनुसार, यदि कोई पक्षकार स्वेच्छा से मूल दस्तावेज प्रस्तुत करता है, तो हस्ताक्षर की तिथि से प्रति माह 2% साधारण ब्याज के साथ बकाया स्टांप ड्यूटी के 4 गुना से अधिक न हो उतना जुर्माना वसूला जाएगा। यदि सरकारी तंत्र द्वारा जांच के दौरान दस्तावेज जब्त किया जाता है, तो प्रति माह 3% साधारण ब्याज के साथ 6 गुना से अधिक न हो उतना जुर्माना वसूलने का प्रावधान 10/04/2025 से लागू हुआ है। 

 

वर्तमान मालिकों पर वित्तीय बोझ

इन कानूनी प्रावधानों के परिणामस्वरूप जब वर्तमान मालिक को बैंक लोन या किसी अन्य सरकारी आवश्यकता के लिए पंजीकृत लीज डीड करानी होती है, तब पिछले सभी अनरजिस्टर्ड सौदों की बकाया स्टांप ड्यूटी, भारी जुर्माना और ब्याज के साथ भरने का अत्यधिक वित्तीय बोझ उन पर आ पड़ता है। ALSO READ: Gen Z के मुद्दों पर विपक्ष को जवाब देंगे पीएम मोदी: 11 साल बाद वडोदरा में युवाओं के बीच भरेंगे हुंकार

 

GIDC एम्नेस्टी स्कीम की घोषणा

इस संदर्भ में राज्य के उद्योगपतियों और GIDC एसोसिएशंस की ओर से मिले ज्ञापनों पर संवेदनशीलता से प्रतिक्रिया देते हुए मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने GIDC प्लॉटों के पिछले हस्तांतरण सौदों में बकाया स्टांप ड्यूटी और पेनल्टी के बोझ से पात्र MSME उद्योगों को राहत देने के लिए 'GIDC एम्नेस्टी स्कीम' लागू करने का निर्णय लिया है।
 

GIDC एम्नेस्टी स्कीम क्या है?

अतीत में प्लॉट या शेड के आवंटन के समय पंजीकृत दस्तावेज के बजाय केवल अलॉटमेंट लेटर या सप्लीमेंट्री एग्रीमेंट किए जाने के कारण स्टांप ड्यूटी का भुगतान नहीं हो सका था। वर्तमान मालिकों को नए दस्तावेज के पंजीकरण के समय खड़े होने वाले भारी जुर्माने के प्रश्न का व्यावहारिक समाधान प्रदान करने के लिए यह एम्नेस्टी योजना शुरू की गई है। 

 

MSME उद्योगपतियों को 80% तक स्टांप ड्यूटी में राहत

इस योजना के तहत पात्र मामलों में लागू स्टांप ड्यूटी में से 80% तक की राशि माफ करके केवल 20% स्टांप ड्यूटी और लागू पेनल्टी वसूल की जाएगी। हालांकि, जिन मामलों में 20% स्टांप ड्यूटी और पेनल्टी की कुल राशि मूल स्टांप ड्यूटी से कम होती है, वहां मूल स्टांप ड्यूटी के बराबर राशि वसूल कर राहत का लाभ दिया जाएगा। 

 

योजना के लिए पात्रता मानदंड (किसे मिलेगा लाभ?)

इस स्कीम का लाभ मुख्य रूप से वैध उद्यम प्रमाणपत्र (Udyam Certificate) रखने वाली MSME इकाइयों को मिलेगा। इस योजना के तहत दिनांक 30 जून, 2025 तक हुए पात्र अलॉटमेंट लेटर, शेयर ट्रांसफर, लीज/सब-लीज और संपत्ति हस्तांतरण से संबंधित सौदों को शामिल किया जाएगा। ALSO READ: किसानों के लिए बड़ी राहत, गुजरात सरकार ने बढ़ाई कृषि उपकरण खरीद की समय सीमा, अब 15 दिन का और मौका

 

दस्तावेज का पंजीकरण और अपील/कोर्ट मामलों में राहत

राहत का लाभ उठाने वाले वर्तमान आवंटी को निर्धारित 20% ड्यूटी और पेनल्टी का भुगतान करके संबंधित संपत्ति का कानूनी पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन) कराना अनिवार्य होगा। इसके अलावा, जहां सक्षम प्राधिकारी के समक्ष अपील की गई हो और 25% राशि जमा की गई हो या कोर्ट में याचिका लंबित हो, वहां याचिका वापस लेने की शर्त पर निर्धारित नियमों के अधीन योजना का लाभ मिलेगा। 

 

01 जनवरी, 2018 से पहले और बाद के सौदों के लिए राहत

दिनांक 01/01/2018 से पहले हुए हस्तांतरणों के मामलों में अंतिम हस्तांतरण के दस्तावेज के बाजार मूल्य के आधार पर निर्धारित स्टांप ड्यूटी में 80% की राहत देकर 20% ड्यूटी और लागू पेनल्टी वसूल की जाएगी। इसके अलावा, दिनांक 01/01/2018 को या उसके बाद हुए उन सभी हस्तांतरणों में जहां स्टांप ड्यूटी देय बनती है, वहां भी 80% राहत देकर 20% ड्यूटी और लागू पेनल्टी वसूलने का प्रस्ताव है।

Gen Z के मुद्दों पर विपक्ष को जवाब देंगे पीएम मोदी: 11 साल बाद वडोदरा में युवाओं के बीच भरेंगे हुंकार

Gen Z के मुद्दों पर विपक्ष को जवाब देंगे पीएम मोदी: 11 साल बाद वडोदरा में युवाओं के बीच भरेंगे हुंकार

PM Modi Gujarat Visit

विदेश दौरे से लौटने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात के दौरे पर रहेंगे। 2014 के लोकसभा चुनाव में अपना संसदीय क्षेत्र रहे वडोदरा से पीएम मोदी Gen Z और युवाओं के मुद्दों पर विपक्ष को कड़ा जवाब देंगे। दिल्ली में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की अध्यक्षता में हुई बैठक के बाद इस कार्यक्रम की तैयारियां शुरू कर दी गई थीं। NEET पेपर लीक और फिर CJP के नेतृत्व वाले Gen Z विरोध प्रदर्शनों के बाद, पीएम मोदी व्यक्तिगत रूप से किसी विश्वविद्यालय में पहुंचकर छात्रों और युवाओं से सीधा संवाद करेंगे। 

 

MS यूनिवर्सिटी पवेलियन में आयोजित होगा विशेष कार्यक्रम

पीएम मोदी के मुख्य कार्यक्रम के लिए महाराजा सयाजीराव (MS) यूनिवर्सिटी पवेलियन को अंतिम रूप दिया गया है। गुजरात के उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी और बीजेपी युवा मोर्चा के अध्यक्ष हेमांग जोशी ने कार्यक्रम स्थल का निरीक्षण किया। 8 सितंबर को होने वाले इस विशेष कार्यक्रम में 6,000 से अधिक युवाओं और छात्रों के शामिल होने की उम्मीद है। उल्लेखनीय है कि 'ऑपरेशन सिंदूर' के बाद भी पीएम मोदी ने अपना पहला रोड शो वडोदरा में ही आयोजित किया था। 

 

वडोदरा और पीएम मोदी का खास और अटूट रिश्ता

 

संसदीय करियर में पीएम मोदी को सबसे ज्यादा प्यार और वोट शेयर वडोदरा से ही मिला है। 2014 के चुनाव में उन्हें 8,45,464 वोट मिले थे, जो कुल मतदान का 72.75% था। 2024 के चुनाव में वडोदरा सीट से बीजेपी के नए प्रत्याशी हेमांग जोशी को कुल 8,73,189 वोट मिले, जो कुल वोट का 72.04% है। पीएम मोदी ने 2014 में प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने से पहले अपनी आखिरी विजय रैली भी वडोदरा में ही निकाली थी। RSS प्रचारक और बीजेपी संगठनकर्ता के रूप में वे यहां लंबा समय बिता चुके हैं। 

 

पीएम मोदी के इस दौरे का विशेष राजनीतिक महत्व

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने जन्मदिन से ठीक 10 दिन पहले वडोदरा का दौरा कर रहे हैं। 17 सितंबर को पीएम मोदी का जन्मदिन है, जब वे 76 वर्ष के हो जाएंगे। इसके अलावा, 7 अक्टूबर को वे संवैधानिक पद पर अपने 25 वर्ष पूरे करने जा रहे हैं। इन महत्वपूर्ण उपलब्धियों और आगामी राजनीतिक घटनाक्रमों से पहले युवाओं के बीच जाकर संवाद करना बीजेपी की विशेष रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
 

कड़ी सुरक्षा के बीच कार्यक्रम का होगा लाइव प्रसारण

पीएम मोदी के कार्यक्रम के लिए विश्वविद्यालय पवेलियन में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गई है। यद्यपि इस कार्यक्रम में सीमित संख्या में छात्र ही भाग लेंगे, लेकिन इस पूरे कार्यक्रम का देशभर में लाइव प्रसारण उपलब्ध रहेगा ताकि पीएम मोदी का संदेश अधिक से अधिक युवाओं तक पहुंच सके। 

8000 रुपये की शर्ट का ब्रांड बनाया और खुद ही बेचने निकला ये 16 साल का लड़का बना स्टार! लोग बोले-यही है भारत का असली Gen Z

बिना किसी फैमिली बैकग्राउंड, बिना किसी बड़े सपोर्ट और बिना किसी मार्केटिंग टीम के एक 16 साल के लड़के ने कुछ अपना अलग खड़ा करने का सपना देखा और उसे पूरा कर दिखाया। मध्य प्रदेश के जबलपुर के रहने वाले महेंद्र ने बेलवारो नाम से अपना एक यूनिक शर्ट ब्रांड लॉन्च किया है। सोशल मीडिया पर जब इस युवा एंटरप्रेन्योर का खुद अपनी शर्ट्स बेचने और कॉन्फिडेंस के साथ लोगों से कनेक्ट करने का वीडियो वायरल हुआ तो उसने लाखों लोगों का दिल जीत लिया।

डिजिटल क्रिएटर के पास पहुंचा 16 साल का महेंद्र

हमारी सहयोगी न्यूज 18 की रिपोर्ट के मुताबिक, महेंद्र की कहानी तब सामने आई जब वह एक कपड़े के ब्रांड के मालिक और डिजिटल क्रिएटर शुभम शिवहरे के स्टूडियो के बाहर पहुंचा। महेंद्र ने बेझिझक शुभम से संपर्क किया और सीधे अपनी बात रखी। उसने शुभम से कहा कि उसने अपना खुद का शर्ट ब्रांड बनाया है और वह अपनी शर्ट्स बेचना चाहता है। इसके बाद दोनों के बीच बातचीत शुरू हुई।

8000 रुपये की शर्ट और ब्रांडिंग का अनोखा गणित

बातचीत के दौरान महेंद्र ने शुभम को अपने ब्रांड बेलवारो का प्रमोशन वीडियो दिखाया। खास बात यह है कि इस 16 साल के लड़के ने अपने ब्रांड का लोगो, पैकेजिंग और सोशल मीडिया अकाउंट सब कुछ खुद ही तैयार किया है। जब शुभम ने उससे एक शर्ट की कीमत पूछी तो महेंद्र ने बताया कि वह एक शर्ट 8000 रुपये में बेच रहा है।

शर्ट की इतनी ज्यादा कीमत सुनकर शुभम हैरान रह गए और उन्होंने पूछा कि यह इतनी महंगी क्यों है? इस पर महेंद्र ने बहुत ही आत्मविश्वास से जवाब दिया कि एक शर्ट को बनाने की लागत लगभग 3000 रुपये आती है जबकि बाकी का खर्च ब्रांडिंग का है। महज 16 साल की उम्र में अपने प्रोडक्ट और बिजनेस को खड़ा करने के लिए महेंद्र की लगन और उसका आत्मविश्वास अब चर्चा का विषय बना हुआ है। पर असल कहानी सिर्फ इतनी नहीं है।

पिता का साया नहीं, मां भी नहीं करतीं काम

पहले वीडियो के वायरल होने के बाद शुभम ने दोबारा महेंद्र से मुलाकात की और उसकी निजी जिंदगी की कहानी लोगों के साथ शेयर की। महेंद्र ने बताया कि उसके सिर पर पिता का साया नहीं है। वह अपनी मां, दो छोटे भाइयों और एक बहन के साथ रहता है। उसकी मां फिलहाल कोई काम नहीं करती हैं। बिना किसी आर्थिक मदद और बिना किसी बिजनेस कनेक्शन के वह अकेले ही अपने ब्रांड को प्रमोट करने की कोशिश में जुटा है।

शुभम ने इंस्टाग्राम पर उसकी कहानी शेयर करते हुए लिखा कि 16 साल की उम्र में जब ज्यादातर बच्चे अपने भविष्य के बारे में सोचना शुरू ही करते हैं तब महेंद्र अपना भविष्य खुद बनाने की कोशिश कर रहा है। उसके पास संसाधन भले कम हैं लेकिन सपने बहुत बड़े हैं।

सोशल मीडिया पर मिली तारीफ और लोगों ने बढ़ाए मदद के हाथ

सोशल मीडिया पर महेंद्र के इस जज्बे और हिम्मत की जमकर सराहना हो रही है। इंटरनेट यूज़र्स उसकी कड़ी मेहनत और लगन देखकर काफी प्रभावित है। कई लोग उसके ब्रांड की मदद के लिए भी आगे आए हैं। एक यूजर ने कमेंट करते हुए लिखा कि यही असली Gen Z है जिसका भारत को इंतजार है। वहीं एक दूसरे यूजर ने कहा कि ऐसे ही बच्चे बड़े होकर बिड़ला और टाटा जैसे बड़े ब्रांड बनाते हैं।

शर्ट की क्वॉलिटी पर कमेंट करते हुए एक यूजर ने लिखा कि शर्ट देखने में काफी अच्छी लग रही है, इसकी लाइनिंग, मटीरियल और कॉलर काफी प्रीमियम दिख रहे हैं।

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पहाड़ों में बसने का सपना 71 दिनों में ही टूटा! दिल्ली छोड़ मनाली रहने गए Gen Z कंटेंट क्रिएटर ने लौटकर क्या बताया?

भागदौड़ भरी जिंदगी, शहरों में पलूशन वाली जहरीली हवा और तेज रफ्तार लाइफ से ऊबकर पहाड़ों की शांत वादियों में जा बसना आज हर वर्किंग युवा का सपना लगता है। वर्क फ्रॉम होम और रील्स की दुनिया में हर कोई बस यही सोचता है कि काश! वो भी सब कुछ छोड़कर पहाड़ों में हमेशा के लिए बस जाए। दिल्ली के रहने वाले एक Gen Z कंटेंट क्रिएटर अजय शर्मा ने भी कुछ ऐसा ही किया। वो यह देखने मनाली पहुंचे कि क्या सचमुच पहाड़ों की जिंदगी वैसी ही हसीन होती है जैसी तब लगता है जब हम छुट्टियां मनाने पहाड़ पहुंचते हैं या फिर इसके पीछे कोई और ही सच्चाई छिपी है?

अजय ने 23 मई को दिल्ली से मनाली के पास बसे छोटे से गांव सियाल में शिफ्ट हुए थे। उनका इरादा था कि वो यहां टूरिस्ट बनकर नहीं बल्कि लोकल शख्स की तरह रहें। अजय ने पूरे 71 दिन पहाड़ों में बिताए, इस दौरान करीब 55 वीडियो बनाए और अपनी रोजमर्रा की जिंदगी का हर पल इंटरनेट पर लोगों के साथ शेयर किया। लेकिन 2 अगस्त आते-आते उनका यह सपना सिमट गया और वो वापस दिल्ली लौट आए।

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जब अनजाने रास्ते और अजनबी लोग धीरे-धीरे अपने से लगने लगेअजय जब मनाली पहुंचे थे तो वहां उनका कोई अपना नहीं था, कोई जान-पहचान नहीं थी। लेकिन देखते ही देखते वो वहां की गलियों, रास्तों, हसीन वादियों और लोकल लोगों के करीब आ गए, उनसे घुल-मिल गए। जो काम सिर्फ एक प्रयोग की तरह शुरू हुआ था, वो उनकी जिंदगी का एक अनमोल हिस्सा बन गया।

दिल्ली लौटने के बाद एक वीडियो में उन्होंने मनाली की अपनी यादों को साझा किया। उन्होंने बताया कि सिर्फ दो महीने से थोड़े ज्यादा वक्त में जिस जगह से उनका इतना दिल लग गया था, उसे छोड़कर आना दर्दनाक था। अजय के मुताबिक इस तजुर्बे ने उन्हें उम्मीद से कहीं ज्यादा गहराई और जिंदगी का नया नजरिया दिया। मनाली को अलविदा कहना उनके लिए बेहद मुश्किल था क्योंकि यह सिर्फ कोई ट्रिप खत्म नहीं हो रही थी बल्कि उनकी जिंदगी के एक नए दौर की शुरुआत थी।

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क्या वाकई पहाड़ों में बसना उतना ही हसीन है, जितना छुट्टियों में दिखता है?

अजय के मनाली शिफ्ट होने की सबसे बड़ी वजह एक सीधे से सवाल का जवाब तलाशना था। वो ये कि क्या पहाड़ों में बसकर रहना सचमुच उतना ही मजेदार है जितना वहां कुछ दिनों की छुट्टियां बिताना? मनाली जाने से पहले अजय के दिलो-दिमाग में भी एक आम शहर की तरह ही खूबसूरत ख्यालात थे, पहाड़ों के खूबसूरत दृश्यों के बीच काम करना, ढलते और उगते सूरज को देखना, आसपास की वादियों में घूमना, वहां का लोकल फूड ट्राई करना और रात में अलाव के गिर्द बैठकर लोगों से बातें करना।

इनमें से कई हसीन पल उन्होंने जिए भी। लेकिन वहां फुल टाइम रहने पर उन्हें उन मुश्किलों से रूबरू होना पड़ा जो अक्सर तब नहीं समझ में आतीं जब हम छुट्टियों में पहाड़ घूमने जाते हैं।

मनाली में रहने का खर्च: उम्मीद से कहीं ज्यादा किफायती!मनाली में रहने के दौरान अजय का सबसे हैरान कर देने वाला अनुभव वहां का खर्च रहा। ये उनकी उम्मीद से काफी कम निकला। अजय सियाल गांव में 14000 रुपये महीने के किराये पर अकेले एक वन-बैडरूम फ्लैट में रहते थे। इस किराये में वाई-फाई और बिजली का बिल दोनों शामिल थे। वो ज्यादातर वक्त घर पर ही खाना खुद बनाते थे। राशन और ग्रोसरी पर महीने का लगभग 3500 रुपये खर्च आता था। जब कभी खाना पकाने का मन न होता, तो वो हफ्ते में एक-दो बार बाहर खा लेते थे। इसमें करीब 500 रुपये हफ्ते का खर्च बैठता था।

फिटनेस के शौकीन अजय ने वहां का एक लोकल जिम भी जॉइन किया। वैसे तो जिम की फीस 1800 रुपये महीना थी, लेकिन उन्होंने बात करके इसे 1500 रुपये करवा लिया। अजय को गाड़ियों के बजाय पैदल चलना पसंद था, इसलिए लोकल ट्रैवल पर उनका न के बराबर पैसा खर्च होता था। अगर इन सारे खर्चों को जोड़ दिया जाए, तो मनाली में अजय का कुल मासिक खर्च करीब 21000 रुपये के आसपास आता था।

वो दिक्कतें जो आम पर्यटकों की नजरों से हमेशा छिपी रह जाती हैं

मनाली ने अजय को सुकून और नए अनुभव तो दिए, लेकिन जैसे-जैसे दिन बीते कुछ प्रैक्टिकल प्रॉब्लम भी सामने आईं। पहाड़ों में अक्सर नेटवर्क की समस्या रहती थी, जिससे ऑनलाइन काम करना या वर्क फ्रॉम होम संभालना बेहद मुश्किल हो जाता था। पहाड़ों का मौसम मजेदार होने के साथ टेंशन देने वाला भी मिला। बिना किसी पूर्व चेतावनी के अचानक तेज बारिश शुरू हो जाती थी। मानसून के आते ही सड़कें और रोजमर्रा की आवाजाही बेहाल हो गई।

यहां अकेले रहने का मतलब था कि खाना बनाने से लेकर साफ-सफाई और घर के बाकी सारे काम अजय को खुद ही करने पड़ते थे। मशहूर टूरिस्ट स्पॉट्स तक पहुंचने के लिए लंबी और सीधी चढ़ाई चढ़नी पड़ती थी। छुट्टियों में ऐसी ट्रैकिंग भले ही रोमांचक लगे लेकिन हर दिन ऐसा करना शरीर को तोड़कर रख देता है। सबसे बड़ी चुनौती थी उनका अकेलापन। जिस खामोशी और शांति की तलाश में वो दिल्ली से भागे थे, वही सन्नाटा धीरे-धीरे दीमक की तरह उन्हें काटने लगा और भारी अकेलेपन में बदल गया।

अजय ने 3 जुलाई को शेयर किए गए एक वीडियो में इन तमाम दुश्वारियों का जिक्र किया था और बताया था कि आखिर क्यों पहाड़ों में उनका स्टे समय से पहले खत्म होने जा रहा है।

मनाली से लौटकर अब एक नई राह पर हैं अजय

मनाली का अपना 71 दिनों का आशियाना छोड़कर अजय अब वापस दिल्ली लौट आए हैं, लेकिन पहाड़ों को लेकर उनका नजरिया अब पूरी तरह बदल चुका है। इस छोटे से स्टे ने उन्हें एक बड़े शहर से दूर रहने की खूबसूरती और उसकी कड़वी सच्चाइयों दोनों से रूबरू करा दिया। अजय आज भी मनाली में बिताए अपने इन दिनों को जिंदगी का सबसे हसीन और यादगार पल मानते हैं। दिल्ली लौटने के बाद अब वो जिंदगी को एक नए अंदाज में खंगाल रहे हैं। उनके हालिया वीडियो बता रहे हैं कि पहाड़ों की बर्फीली वादियों के बाद अब वो समुद्र के शांत किनारों पर अपना वक्त बिता रहे हैं।

80th Independence Day: PM मोदी का मैरून बंधनी साफा क्यों है खास? जानें 13 साल की पगड़ी की पूरी कहानी

PM Modi Turban: पिछले 13 सालों से आजादी के दिन एक चीज हमेशा एक जैसी रही है: पीएम मोदी की शानदार पगड़ी। उन्होंने इस साल भी राजघाट से शुरुआत की और फिर लाल किले पर अपना 13वां भाषण देने पहुंचे। इस दौरान उन्होंने पीले, हरे और सफेद बंधनी पैटर्न वाली गहरे मैरून रंग की पगड़ी पहनी थी, जिसके साथ सफेद कुर्ता-पायजामा और भूरे रंग की नेहरू जैकेट थी।

2014 में पहली बार पहनने के बाद से उनकी पगड़ियों में राजस्थान की लहरिया से लेकर गुजरात की बंधनी तक की झलक दिखी है। उनकी हर पगड़ी उस साल के माहौल का एक खास संकेत मानी जाती है।

पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में पगड़ी या राजस्थान में जिसे ‘साफा’ कहा जाता है, सम्मान और क्षेत्रीय पहचान का प्रतीक मानी जाती है। इसके कपड़े, प्रिंट और पहनने के तरीके में भी खास मायने छिपे होते हैं। इससे पता चलता है कि यह किस समुदाय की परंपरा से जुड़ी है, किस राज्य से आई है और कभी-कभी इसके रंगों में राजनीतिक संदेश भी देखा जाता है।

पिछले एक दशक में जो चीज पहले सिर्फ पीएम मोदी की व्यक्तिगत पसंद और स्टाइल मानी जाती थी, वह अब स्वतंत्रता दिवस की तस्वीरों और कवरेज का एक खास हिस्सा बन गई है। हर साल फैशन लेखक, कपड़ा और कला के जानकार और राजनीतिक विश्लेषक उनकी पगड़ी के रंग और डिजाइन को अपने-अपने नजरिए से समझते हैं।

असल में पगड़ी का क्या मतलब है?

सिर्फ दिखावे से कहीं ज्यादा, भारत में पगड़ी का गहरा सांस्कृतिक महत्व है। ऐतिहासिक रूप से यह सिख समुदाय से जुड़ी रही है। उनके गुरुओं ने इसे इस बात के प्रतीक के तौर पर अपनाया कि सभी इंसान आजाद और बराबर हैं – साथ ही, इससे बालों की सुरक्षा भी होती है, जिनका इस धर्म में धार्मिक महत्व है।

कई हिंदू परंपराओं में पगड़ी ताकत और रुतबे की निशानी भी मानी जाती है, और शादियों जैसे खुशी के मौकों पर इसे पहनना आम बात है।

प्रधानमंत्री मोदी के मामले में, जानकारों का कहना है कि उनकी पसंद – जैसे राजस्थानी बंधनी, गुजराती लहरिया, और तिरंगे वाले डिजाइन – भारत की क्षेत्रीय बुनाई परंपराओं को सम्मान देने का भी काम करती हैं।

क्या उनके रंग चुनने के तरीके में कभी कोई राजनीतिक संदेश छिपा होता है?

उनके हाल के भाषणों की कवरेज के अनुसार, अक्सर ऐसा होता है। 2025 में, उनके पूरी तरह से केसरिया रंग के साफे को साहस, त्याग और “विकसित भारत” के संदेश से जोड़कर देखा गया। 2022 में, केसरिया और हरे रंग की धारियों वाली सफेद पगड़ी सीधे तौर पर तिरंगे की झलक देती थी, जिसे “हर घर तिरंगा” अभियान के समय पहना गया था।

अब तक की कहानी क्या है, साल-दर-साल?

पीएम मोदी की स्वतंत्रता दिवस वाली पगड़ी 2014 से ही समारोह का एक खास हिस्सा रही है। हर साल इसके रंग, डिजाइन और कपड़े में बदलाव देखने को मिला है। 2026 तक की तस्वीर कुछ ऐसी रही:

  • 2014: पहली बार लाल किले से संबोधन के दौरान पीएम मोदी ने लाल रंग की जोधपुरी बंधेज साफा पहना था, जिसमें हरे रंग का लंबा सिरा था।
  • 2015: पीले रंग की राजस्थानी पगड़ी पहनी, जिस पर लाल और हरे रंग का क्रॉस पैटर्न था।
  • 2016: गुलाबी और पीले रंग की बंधेज पगड़ी में नजर आए।
  • 2017: चटख पीले रंग की पगड़ी पहनी, जिसमें लाल और पीले रंग के पारंपरिक पैटर्न थे।
  • 2018: भगवा और लाल रंग की पगड़ी पहनी, जिसका लंबा सिरा काफी चर्चा में रहा।
  • 2019: राजस्थान की पारंपरिक लहरिया डिजाइन वाली बहुरंगी साफा पहनी।
  • 2020: कोरोना महामारी के दौरान भगवा-और-क्रीम रंग की साफा के साथ ऐसा स्टोल पहना, जिसे चेहरे को ढकने के लिए भी इस्तेमाल किया गया।
  • 2021: भगवा और लाल रंग की पगड़ी पहनी, जिसके पीछे गुलाबी रंग का लंबा सिरा था।
  • 2022: तिरंगे से प्रेरित सफेद पगड़ी, जिसमें भगवा और हरे रंग की धारियां थीं। यह ‘हर घर तिरंगा’ अभियान के दौरान खास तौर पर चर्चा में रही।
  • 2023: राजस्थान की बहुरंगी बंधनी पगड़ी में नजर आए, जिसमें पीला, हरा और लाल रंग प्रमुख था।
  • 2024: राजस्थानी लहरिया को चुना। पगड़ी में नारंगी, गहरे हरे और पीले रंग की लहरदार धारियां थीं।
  • 2025: पूरी तरह भगवा साफा पहना, जिसे साहस, त्याग और ‘विकसित भारत’ के संदेश से जोड़कर देखा गया।
  • 2026: 80वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल रंग की बंधनी प्रिंट वाली राजस्थानी साफा पहनी, जिसके पीछे लंबा सिरा था। इसे सफेद कुर्ता-पायजामा, भूरे रंग की नेहरू जैकेट और तिरंगे पॉकेट स्क्वायर के साथ पहना गया।

इस तरह 2014 से 2026 तक पीएम मोदी की पगड़ियां सिर्फ पहनावे का हिस्सा नहीं रहीं, बल्कि राजस्थान और गुजरात की कपड़ा परंपराओं, भारतीय कारीगरी और राष्ट्रीय प्रतीकों को सामने लाने का एक खास माध्यम भी बनी हैं।

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