रात में सूरज की रोशनी बेचने की तैयारी:अंतरिक्ष में लगेंगे बड़े शीशे; भारत की स्काईरूट एयरोस्पेस और अमेरिकी स्टार्टअप का प्रोजेक्ट

अमेरिकी स्पेस टेक्नोलॉजी कंपनी रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल रात में धरती के चुनिंदा स्थानों पर सूरज की रोशनी बेचने की तैयारी कर रही है। इसके लिए पृथ्वी की कक्षा में बड़े शीशे लगाए जाएंगे। कैलिफोर्निया की यह स्टार्ट-अप भारत की स्काईरूट एयरोस्पेस की मदद से सैटेलाइट लॉन्च करेगी। दोनों कंपनियों के बीच दो लॉन्च का कॉन्ट्रैक्ट हुआ है। इन सैटेलाइट से आपदा प्रभावित इलाकों में खोज और बचाव अभियान के लिए रोशनी दी जा सकेगी। सोलर फार्म में बिजली बनाने का समय भी बढ़ाया जा सकेगा। दो लॉन्च के लिए हुआ कॉन्ट्रैक्ट रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल ने हैदराबाद में स्काईरूट एयरोस्पेस के साथ दो लॉन्च का समझौता किया है। दोनों लॉन्च विक्रम रॉकेट से किए जाएंगे। कंपनी ने बयान में कहा, “इन लॉन्च से हमें अमेरिका की अन्य तय लॉन्च सेवाओं के साथ पक्का शेड्यूल और क्षमता मिलेगी।” स्काईरूट एयरोस्पेस के CEO पवन चंदाना ने कहा, “रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल अंतरिक्ष तकनीक के सबसे नए इस्तेमालों में से एक पर काम कर रही है। हम स्काईरूट ए के साथ उनकी धरती पर मांग के मुताबिक सूरज की रोशनी देने की योजना को लॉन्च करने का इंतजार कर रहे हैं।” पांच किलोमीटर के दायरे में दी जा सकेगी रोशनी जुलाई में रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल को फेडरल कम्युनिकेशंस कमीशन FCC से एक प्रदर्शन सैटेलाइट बनाने, लॉन्च करने और चलाने की मंजूरी मिली थी। स्टार्ट-अप का लक्ष्य ऐसी रोशनी देना है, जिसे कभी भी बंद किया जा सके। इसकी चमक को बदला जा सकेगा और यह पांच किलोमीटर के क्षेत्र में फैलेगी। कंपनी के मुताबिक, मांग पर मिलने वाली यह रोशनी दूरदराज के औद्योगिक इलाकों में काम के घंटे बढ़ा सकती है। इससे रक्षा अभियानों में महत्वपूर्ण ढांचे को रोशन करने में मदद मिल सकती है। पहला लॉन्च विक्रम-1 रॉकेट से होगा रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल के को-फाउंडर और CEO बेन नोवैक ने कहा, “हम नए लॉन्च प्रोवाइडर स्काईरूट के साथ काम करने को लेकर उत्साहित हैं। इससे अंतरिक्ष तक पहुंच सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।” इस कॉन्ट्रैक्ट के तहत पहला लॉन्च विक्रम-1 रॉकेट से होगा। दूसरा लॉन्च स्काईरूट के विक्रम-1U लॉन्च व्हीकल से किया जाएगा। विक्रम-1U में पहले चरण के एक्स्ट्रा बूस्टर लगाए गए हैं। नोवैक ने कहा, “हमें हाल ही में अपने पहले अंतरिक्ष यान को चलाने के लिए फेडरल कम्युनिकेशंस कमीशन से लाइसेंस मिला है। हम खगोलविदों, स्थानीय समुदायों और रेगुलेटर्स के साथ काम जारी रखेंगे। इससे बड़े स्तर पर विस्तार की अनुमति हासिल करने में मदद मिलेगी।” 1993 में भी कक्षा से भेजी गई थी सूरज की रोशनी 1993 में रूसी वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने 65 फीट लंबा शीशा कक्षा में तैनात किया था। इससे धरती पर सूरज की रोशनी की एक घूमती हुई किरण भेजी गई थी। यह प्रयोग सफल रहा था। हालांकि, पैसों की कमी के कारण इसे बंद कर दिया गया। इस प्रयोग का नाम ज़नाम्या था। रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल की योजना को लेकर विवाद भी हुआ है। कई पर्यावरण संगठनों ने FCC से प्रदर्शन सैटेलाइट के लिए दी गई मंजूरी रद्द करने की मांग की है। इन संगठनों का कहना है कि रात में तेज रोशनी वन्यजीवों को परेशान कर सकती है। इससे खगोल विज्ञान से जुड़े अध्ययन प्रभावित हो सकते हैं और इंसानों की जैविक दिनचर्या पर असर पड़ सकता है। ——————- ये खबर भी पढ़ें… भारत का पहला प्राइवेट ऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च कामयाब:स्काईरूट एयरोस्पेस ने खुद बनाकर अंतरिक्ष में भेजा, 2 दोस्तों ने इसरो छोड़कर बनाई थी यह कंपनी हैदराबाद की स्काईरूट एयरोस्पेस ने शनिवार 18 जुलाई को भारत का पहला प्राइवेट ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 लॉन्च किया। यह टेस्ट पहले ही प्रयास में कामयाब रहा। विक्रम-1 को स्काईरूट एयरोस्पेस ने तैयार किया और लॉन्चिंग भी खुद ही की। सिर्फ लॉन्चपैड इसरो का था। पढ़ें पूरी खबर…

ISRO Roadmap: 2028 तक लॉन्च होगा भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन का पहला मॉड्यूल, इसरो का मून प्लान जानिए

ISRO Roadmap Bharatiya Antariksh Station:  चंद्रयान-3 की ऐतिहासिक सफलता के बाद भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) अब स्पेस टेक्नोलॉजी के एक नए और महत्वाकांक्षी युग में प्रवेश करने की तैयारी में है। भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम अब सिर्फ रॉकेट लॉन्चिंग और उपग्रह भेजने तक सीमित नहीं है बल्कि इसका मुख्य फोकस अब मानव अंतरिक्ष उड़ान (ह्यूमन स्पेसफ्लाइट), भारत का अपना स्पेस स्टेशन, चंद्रमा से मिट्टी व पत्थरों के सैंपल वापस लाना और साल 2040 तक चांद पर भारतीय अंतरिक्ष यात्री को भेजने पर है।

IIT दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान ISRO के चेयरमैन और अंतरिक्ष विभाग के सचिव डॉ वी नारायणन ने भारत के भावी अंतरिक्ष रोडमैप, आगामी बड़े मिशनों और इस क्षेत्र में हो रहे ऐतिहासिक बदलावों के बारे में विस्तृत जानकारी साझा की।

440 से ज्यादा स्पेस स्टार्टअप कर रहे हैं काम

भारत के स्पेस सेक्टर में सबसे बड़ा बदलाव सरकारी संस्थानों के साथ-साथ प्राइवेट कंपनियों और स्टार्टअप की बढ़ती भागीदारी है। डॉ नारायणन के कहा कि 2020 में स्पेस सेक्टर रिफॉर्म्स के बाद देश में करीब 440 स्पेस स्टार्टअप चल रहे हैं। कंपनियों को सैटेलाइट, लॉन्च व्हीकल, स्पेस एप्लीकेशन और दूसरी नई टेक्नोलॉजी से जुड़े एरिया में काम करने के मौके बढ़े हैं। नतीजतन भारत का प्राइवेट स्पेस इकोसिस्टम भी ISRO के बड़े मिशन के साथ-साथ डेवलप हो रहा है।

भारत ने खुद डेवलप किया क्रायोजेनिक टेक्नोलॉजी

स्पेस सेक्टर में भारत की आत्मनिर्भरता का एक उदाहरण देते हुए डॉ नारायणन ने क्रायोजेनिक टेक्नोलॉजी का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि 1990 के दशक में भारत को यह टेक्नोलॉजी नहीं दी गई थी। इसके बाद ISRO ने इस टेक्नोलॉजी को देश में ही डेवलप करने पर काम किया। भारत ने अब तीन क्रायोजेनिक प्रोपल्शन सिस्टम डेवलप कर लिए हैं। इसका मतलब है कि भारत ने अब एक ऐसी टेक्नोलॉजी में अपनी क्षमताएं डेवलप कर ली हैं जिसके लिए पहले दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ता था। यह क्षमता भविष्य के बड़े और भारी स्पेस मिशन के लिए भी बहुत जरूरी होगी।

अब चंद्रयान-4 की तैयारी

23 अगस्त 2023 भारत के स्पेस प्रोग्राम के लिए एक अहम दिन था। चंद्रयान-3 ने चांद के साउथ पोलर रीजन के पास सक्सेसफुली सॉफ्ट-लैंडिंग की। इसके बाद ISRO अब चांद के सैंपल धरती पर वापस लाने की दिशा में काम कर रहा है। डॉ नारायणन ने चंद्रयान-4 को इस बड़े लक्ष्य से जोड़ा और बताया कि इसका मकसद चांद के सैंपल निकालकर उन्हें धरती पर वापस लाना है। इसके अलावा भारत ने स्पेस में डॉकिंग टेक्नोलॉजी को सक्सेसफुली दिखाया। इस टेक्नोलॉजी को भविष्य के स्पेस स्टेशन और दूसरे मुश्किल मिशन के लिए बहुत जरूरी माना जाता है।

गगनयान के बाद भारतीय स्पेस स्टेशन

भारत का अगला बड़ा कदम इंसानों को स्पेस में भेजना है। ISRO गगनयान मिशन के तहत इंसानों को स्पेसफ्लाइट भेजने की तैयारी कर रहा है। अभी बिना पायलट वाली उड़ानों के जरिए मिशन की तैयारियों को आगे बढ़ा रहा है। भारत अपना भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन भी डेवलप कर रहा है। डॉ. नारायणन के मुताबिक, स्टेशन का पहला मॉड्यूल 2028 तक लॉन्च करने का प्लान है। आने वाले सालों में दूसरे मॉड्यूल भी जोड़े जाएंगे। इसका लक्ष्य 2035 तक इसे डेवलप करना है। यह भारत के लिए न सिर्प एक साइंटिफिक मिशन होगा बल्कि स्पेस में लंबे समय तक रिसर्च और टेक्नोलॉजी करने की क्षमता बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम होगा।

2040 तक चंद्रमा पर इंसान भेजने का प्लान

ISRO का रोडमैप सिर्फ लूनर मिशन तक ही खत्म नहीं होता है। भारत 2040 तक चांद पर ह्यूमन मिशन की दिशा में भी काम कर रहा है। इसके अलावा वीनस मिशन और नेक्स्ट-जेनरेशन लॉन्च व्हीकल पर भी काम चल रहा है। डॉ नारायणन ने कहा कि ISRO एक नेक्स्ट-जेनरेशन लॉन्च व्हीकल पर काम कर रहा है जो लो अर्थ ऑर्बिट में 30,000 किलोग्राम तक वजन ले जा सकता है। पार्शियली रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल सिस्टम पर भी काम चल रहा है।

स्पेस इकोनॉमी के लिए क्यों अहम है यह मिशन?

डॉ नारायणन ने कहा कि गगनयान, स्पेस स्टेशन, चंद्रयान-4, और भविष्य के बड़े लॉन्च व्हीकल सिर्फ साइंटिफिक उपलब्धियां नहीं हैं। वे प्राइवेट कंपनियों के लिए नई टेक्नोलॉजी, मैन्युफैक्चरिंग, रिसर्च और काम के नए एरिया भी शुरू कर सकते हैं।जैसे-जैसे स्पेस मि न की संख्या और कॉम्प्लेक्सिटी बढ़ेगी वैसे ही लॉन्च सिस्टम, सैटेलाइट टेक्नोलॉजी, स्पेस कम्युनिकेशन, डेटा और दूसरे स्पेस एप्लीकेशन से जुड़े एरिया में भी एक्टिविटी बढ़ेगी। यही वजह है कि स्पेस सेक्टर में सुधारों के बाद भारत में स्टार्टअप्स की बढ़ती संख्या को अहम माना जा रहा है। आने वाले सालों में ISRO के सरकारी मिशन के साथ-साथ प्राइवेट कंपनियों की भूमिका कैसे बढ़ती है, यह भारत की स्पेस इकॉनमी के विकास के लिए बहुत जरूरी होगा।

(दिल्ली से शुभांगी तिवारी की रिपोर्ट)

ये भी पढ़ें-वाराणसी में देश के पहले अर्बन रोपवे का काम कहां तक पहुंचा? इसके स्टेशन, किराया और 15 मिनट वाले नए रूट की पूरी डिटेल जानिए

दुनिया का सबसे बड़ा रॉकेट लॉन्च कॉम्प्लेक्स बनाएंगे मस्क:ये मैनहट्टन शहर से 8 गुना बड़ी जमीन पर बनेगा, हर साल हजारों स्टारशिप रॉकेट लॉन्च होंगे

इलॉन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स अमेरिका के दक्षिणी लुइसियाना में दुनिया का सबसे बड़ा रॉकेट लॉन्च कॉम्प्लेक्स बना रही है। इस प्रोजेक्ट पर कंपनी 100 बिलियन डॉलर यानी करीब ₹9.50 लाख करोड़ का निवेश करेगी। ‘स्टारबेस, लुइसियाना’ स्पेसएक्स का दूसरा ‘स्टारबेस’ कैंपस होगा। यह नया स्पेसपोर्ट लुइसियाना के पिकान आइलैंड पर 1.25 लाख एकड़ में फैला होगा, जो कि न्यूयॉर्क के मैनहट्टन शहर से भी आठ गुना बड़ा है। यहां से स्पेसएक्स के नेक्स्ट-जनरेशन रॉकेट ‘स्टारशिप’ और AI बेस्ड सैटेलाइट्स को अंतरिक्ष में भेजा जाएगा। कंस्ट्रक्शन साल 2029 से शुरू होने की उम्मीद है। 3,000 नई नौकरियां मिलेंगी, औसत सैलरी ₹88 लाख सालाना होगी लुइसियाना के गवर्नर जेफ लैंड्री ने इसे राज्य की इकोनॉमी के लिए बड़ा कदम बताया है। लैंड्री के मुताबिक, इस स्पेसपोर्ट से क्षेत्र में कम से कम 3 हजार से ज्यादा डायरेक्ट नौकरियां पैदा होंगी। यहां काम करने वाले कर्मचारियों की औसत सालाना सैलरी 92,600 डॉलर यानी करीब 88 लाख रुपए होगी, जो वर्मिलियन पैरिश की मौजूदा औसत इनकम से लगभग दोगुनी है। गवर्नर ने कहा, “यह प्रोजेक्ट रोजगार, समुदायों के लिए प्रगति और हमारे तटीय इलाकों के लिए सुरक्षा लेकर आएगा।” ‘सेल्फ-सस्टेनिंग’ होगा कैंपस, खुद बनाएगा ईंधन और बिजली स्पेसएक्स की प्रेसिडेंट ग्विन शॉटवेल ने बताया कि यह कैंपस पूरी तरह ‘सेल्फ-सस्टेनिंग’ होगा। खुद का ईंधन और बिजली: कॉम्प्लेक्स के भीतर ही रॉकेट प्रोपेलेंट के लिए मीथेन गैस का उत्पादन होगा और इलेक्ट्रिसिटी जनरेशन फैसिलिटी लगाई जाएगी। शिपिंग और ट्रांसपोर्ट: स्टारशिप रॉकेट्स को लाने-ले जाने के लिए डीप-वॉटर शिपिंग पोर्ट और व्हीकल प्रोसेसिंग यूनिट्स बनाई जाएंगी। एक डेडिकेटेड एयरपोर्ट भी बनाया जा सकता है। शॉटवेल ने कहा कि इस फैसिलिटी का लक्ष्य हर साल स्टारशिप के हजारों उड़ानों को सपोर्ट करना है, हालांकि यह इंजीनियरिंग और रेग्युलेटरी अप्रूवल पर निर्भर करेगा। रॉकेट मैन्युफैक्चरिंग नहीं सिर्फ लॉन्चिंग होगी यह लुइसियाना कैंपस स्पेसएक्स के टेक्सास स्थित ‘स्टारबेस’ से काफी अलग होगा। टेक्सास में रॉकेट्स का निर्माण और असेंबली की जाती है, जबकि लुइसियाना फैसिलिटी में रॉकेट की मैन्युफैक्चरिंग नहीं होगी। इसका मुख्य फोकस केवल हाई-फ्रीक्वेंसी यानी तेज गति से लॉन्चिंग पर रहेगा। पिकान आइलैंड की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यहां से रॉकेट्स को सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट में आसानी से भेजा जा सकता है। यह ऑर्बिट सोलर-पावर्ड सैटेलाइट्स के लिए सबसे मुफीद मानी जाती है। लुइसियाना स्पेसपोर्ट के जरिए मस्क दो बड़े लक्ष्य… नॉलेज पार्ट: क्या होता है ‘सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट’? यह पृथ्वी का एक ऐसा ऑर्बिटहै जिसमें सैटेलाइट हमेशा सूर्य के एक ही कोण के साथ यात्रा करती है। यानी सैटेलाइट जिस जगह से भी गुजरती है, वहां हमेशा धूप होती है। सोलर-पावर्ड सैटेलाइट्स और अर्थ-ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट्स के लिए यह ऑर्बिट सबसे बेस्ट मानी जाती है।

दुनिया का सबसे बड़ा रॉकेट लॉन्च कॉम्प्लेक्स बनाएंगे मस्क:ये मैनहट्टन से 8 गुना बड़ी जमीन पर बनेगा, हर साल हजारों स्टारशिप रॉकेट लॉन्च होंगे

इलॉन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स अमेरिका के दक्षिणी लुइसियाना में दुनिया का सबसे बड़ा रॉकेट लॉन्च कॉम्प्लेक्स बना रही है। इस प्रोजेक्ट पर कंपनी 100 बिलियन डॉलर यानी करीब ₹9.50 लाख करोड़ का निवेश करेगी। ‘स्टारबेस, लुइसियाना’ स्पेसएक्स का दूसरा ‘स्टारबेस’ कैंपस होगा। यह नया स्पेसपोर्ट लुइसियाना के पिकान आइलैंड पर 1.25 लाख एकड़ में फैला होगा, जो कि न्यूयॉर्क के मैनहट्टन शहर से भी आठ गुना बड़ा है। यहां से स्पेसएक्स के नेक्स्ट-जनरेशन रॉकेट ‘स्टारशिप’ और AI बेस्ड सैटेलाइट्स को अंतरिक्ष में भेजा जाएगा। कंस्ट्रक्शन साल 2029 से शुरू होने की उम्मीद है। 3,000 नई नौकरियां मिलेंगी, औसत सैलरी ₹88 लाख सालाना होगी लुइसियाना के गवर्नर जेफ लैंड्री ने इसे राज्य की इकोनॉमी के लिए बड़ा कदम बताया है। लैंड्री के मुताबिक, इस स्पेसपोर्ट से क्षेत्र में कम से कम 3 हजार से ज्यादा डायरेक्ट नौकरियां पैदा होंगी। यहां काम करने वाले कर्मचारियों की औसत सालाना सैलरी 92,600 डॉलर यानी करीब 88 लाख रुपए होगी, जो वर्मिलियन पैरिश की मौजूदा औसत इनकम से लगभग दोगुनी है। गवर्नर ने कहा, “यह प्रोजेक्ट रोजगार, समुदायों के लिए प्रगति और हमारे तटीय इलाकों के लिए सुरक्षा लेकर आएगा।” ‘सेल्फ-सस्टेनिंग’ होगा कैंपस, खुद बनाएगा ईंधन और बिजली स्पेसएक्स की प्रेसिडेंट ग्विन शॉटवेल ने बताया कि यह कैंपस पूरी तरह ‘सेल्फ-सस्टेनिंग’ होगा। खुद का ईंधन और बिजली: कॉम्प्लेक्स के भीतर ही रॉकेट प्रोपेलेंट के लिए मीथेन गैस का उत्पादन होगा और इलेक्ट्रिसिटी जनरेशन फैसिलिटी लगाई जाएगी। शिपिंग और ट्रांसपोर्ट: स्टारशिप रॉकेट्स को लाने-ले जाने के लिए डीप-वॉटर शिपिंग पोर्ट और व्हीकल प्रोसेसिंग यूनिट्स बनाई जाएंगी। एक डेडिकेटेड एयरपोर्ट भी बनाया जा सकता है। शॉटवेल ने कहा कि इस फैसिलिटी का लक्ष्य हर साल स्टारशिप के हजारों उड़ानों को सपोर्ट करना है, हालांकि यह इंजीनियरिंग और रेग्युलेटरी अप्रूवल पर निर्भर करेगा। रॉकेट मैन्युफैक्चरिंग नहीं सिर्फ लॉन्चिंग होगी यह लुइसियाना कैंपस स्पेसएक्स के टेक्सास स्थित ‘स्टारबेस’ से काफी अलग होगा। टेक्सास में रॉकेट्स का निर्माण और असेंबली की जाती है, जबकि लुइसियाना फैसिलिटी में रॉकेट की मैन्युफैक्चरिंग नहीं होगी। इसका मुख्य फोकस केवल हाई-फ्रीक्वेंसी यानी तेज गति से लॉन्चिंग पर रहेगा। पिकान आइलैंड की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यहां से रॉकेट्स को सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट में आसानी से भेजा जा सकता है। यह ऑर्बिट सोलर-पावर्ड सैटेलाइट्स के लिए सबसे मुफीद मानी जाती है। लुइसियाना स्पेसपोर्ट के जरिए मस्क दो बड़े लक्ष्य… नॉलेज पार्ट: क्या होता है ‘सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट’? यह पृथ्वी का एक ऐसा ऑर्बिटहै जिसमें सैटेलाइट हमेशा सूर्य के एक ही कोण के साथ यात्रा करती है। यानी सैटेलाइट जिस जगह से भी गुजरती है, वहां हमेशा धूप होती है। सोलर-पावर्ड सैटेलाइट्स और अर्थ-ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट्स के लिए यह ऑर्बिट सबसे बेस्ट मानी जाती है।

‘देश को आपकी जरूरत है…’, CJP प्रोटेस्ट के बाद PM मोदी का Gen Z को बड़ा संदेश

PM Modi: नई दिल्ली में हुए कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के विरोध-प्रदर्शन के बाद अपने पहले सार्वजनिक संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को देश के युवाओं की क्षमता और ताकत पर भरोसा जताया। उन्होंने कहा कि ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को हासिल करने के लिए देश को युवा पीढ़ी की जरूरत है। बता दें कि पीएम मोदी ने यह बात दिल्ली स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (IIT) के वार्षिक दीक्षांत समारोह में कही।

पीएम मोदी ने अपने संबोधन में छात्रों से कहा, “हमें आप पर भरोसा है, और देश को आपकी जरूरत है।”

उन्होंने कहा कि हर पीढ़ी की देश के प्रति जिम्मेदारी होती है और युवाओं के लक्ष्यों में देश का सर्वांगीण विकास शामिल होना चाहिए। उन्होंने कहा, “आप सभी जानते हैं कि हर पीढ़ी को अपने समय की खास चुनौतियों का सामना करना पड़ता है और देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी भी निभानी पड़ती है… अगले 30 से 35 सालों में आप जो कुछ भी करेंगे, उसका असर ‘विकसित भारत’ की ओर हमारे सफर पर पड़ेगा। इसलिए, आपके हर फैसले का आधार यह भी होना चाहिए कि इससे देश को क्या फायदा होगा? इससे देश की कौन-सी जरूरतें पूरी होंगी?”

पीएम मोदी ने आगे कहा कि आज की तेजी से बदलती दुनिया में टेक्नोलॉजी अहम भूमिका निभा रही है। उन्होंने कहा कि जो लोग इन बदलावों के हिसाब से खुद को ढाल लेंगे, वे “आखिरकार जीतेंगे”।

उन्होंने कहा, “…ग्लोबल स्ट्रैटेजिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। ग्लोबल पावर बैलेंस हर पल बदल रहा है, और इसकी मुख्य वजह टेक्नोलॉजी में हो रही तेजी से तरक्की है। कोई भी पक्के तौर पर नहीं कह सकता कि अगले 20 या 30 सालों में दुनिया कैसी दिखेगी… दुनिया, टेक्नोलॉजी, इंडस्ट्री और प्रोफेशन, सभी में बदलाव आएंगे। लेकिन इन सबके बीच एक बात याद रखें: जो लोग सीखते रहेंगे, वे ही सफल होंगे।”

प्रधानमंत्री के संबोधन में Gen Z की झलक

स्काईरूट के विक्रम-1 रॉकेट के सफल लॉन्च का जिक्र करते हुए, प्रधानमंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि सरकार ने युवाओं को अपना योगदान देने के लिए कई रास्ते खोले हैं।

उन्होंने कहा, “हमने ऐसे कई रास्ते खोले हैं जिनसे हमारे युवा योगदान दे सकते हैं। नए सेक्टर खुले हैं। मैंने पहले भी स्पेस सेक्टर के बारे में बात की थी। आज वही स्पेस सेक्टर हमारे युवाओं के लिए आसमान की ऊंचाइयों को छूने का जरिया बन गया है।”

अपने संबोधन में Gen Z वाली बात जोड़ते हुए पीएम मोदी ने कहा: “आज हमारे युवा कह रहे हैं, ‘अपने परिवार में रॉकेट बनाने वाला मैं पहला व्यक्ति हूं’। आज हमारे युवा रॉकेट लॉन्च कर रहे हैं।”

पीएम मोदी ने आगे कहा कि देश का ड्रोन सेक्टर भी तेजी से बढ़ रहा है। आज ड्रोन का इस्तेमाल सिर्फ तकनीक के तौर पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से लेकर दवाइयां पहुंचाने जैसे जरूरी कामों में भी किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि ड्रोन के बढ़ते इस्तेमाल से युवाओं के लिए नए अवसर भी पैदा हो रहे हैं और यह सेक्टर आने वाले समय में देश की तरक्की में अहम भूमिका निभा सकता है।

बता दें कि पीएम मोदी का यह संबोधन ऐसे समय में आया है, जब हाल ही में NEET-UG 2026 से जुड़े पेपर लीक विवाद को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर CJP ने विरोध-प्रदर्शन किया था। इस विवाद के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।

यह भी पढे़ं: भारत के उत्पादों पर 100 फीसदी अमेरिकी टैरिफ का खतरा, सीनेट में रूस सैंक्शन बिल पारित, जानिए क्या है पूरा मामला

₹12 करोड़ से बने ₹700 करोड़, जानिए Myntra के मुकेश बंसल ने 8 साल में कैसे 60 गुना रिटर्न कमाया

18 जुलाई 2026 को श्रीहरिकोटा से Vikram-1 रॉकेट ने उड़ान भरी। यह सिर्फ एक लॉन्च नहीं था, बल्कि भारत की पहली निजी कंपनी का सफल ऑर्बिटल लॉन्च था। इसके साथ ही Skyroot Aerospace ने इतिहास रच दिया। लेकिन इस सफलता की कहानी करोड़ों की लैब से नहीं, बल्कि हैदराबाद के एक छोटे से ऑफिस से शुरू हुई थी।

सरकारी नौकरी छोड़कर लगा दिया दांव

साल 2017 में पवन कुमार चंदाना और नागा भरत डाका ISRO में वैज्ञानिक थे। इसी दौरान उन्होंने Space Activities Bill का ड्राफ्ट पढ़ा। उन्हें लगा कि आने वाले समय में निजी कंपनियों को भी रॉकेट बनाने और लॉन्च करने का मौका मिल सकता है। दोनों ने जोखिम उठाया, सरकारी नौकरी छोड़ी और 2018 में Skyroot Aerospace की शुरुआत कर दी।

उस समय भारत का स्पेस सेक्टर लगभग पूरी तरह सरकार के हाथ में था। इसलिए निवेशकों को भी इस आइडिया पर भरोसा नहीं था। ज्यादातर लोगों को लगता था कि किसी भारतीय स्टार्टअप के लिए रॉकेट लॉन्च करना सिर्फ सपना है।

जब किसी ने भरोसा नहीं किया

ऐसे समय में Myntra और Cult.fit के फाउंडर मुकेश बंसल कंपनी के साथ खड़े हुए। उन्होंने 2018 में Skyroot में पहला निवेश किया। उस समय कोई बड़ा वेंचर कैपिटल फंड कंपनी में पैसा लगाने को तैयार नहीं था।

Tracxn के मुताबिक, मुकेश बंसल ने अलग-अलग फंडिंग राउंड में करीब 13 लाख डॉलर, यानी लगभग ₹12 करोड़ लगाए। लंबे समय तक वही कंपनी के इकलौते एंजेल निवेशक रहे। उन्होंने उस स्टार्टअप पर दांव लगाया, जिसके भविष्य को लेकर किसी के पास भरोसेमंद जवाब नहीं था।

2020 में बदल गई तस्वीर

साल 2020 में सरकार ने स्पेस सेक्टर निजी कंपनियों के लिए खोल दिया। इसके बाद Skyroot की रफ्तार बदल गई। बड़े निवेशक जुड़ने लगे और कंपनी को तेजी से फंडिंग मिलने लगी।

नवंबर 2022 में कंपनी ने Vikram-S लॉन्च किया। यह अंतरिक्ष तक पहुंचने वाला भारत का पहला निजी रॉकेट बना। इसके बाद मई 2026 में Skyroot ने करीब 570 करोड़ रुपये जुटाए और 1.1 अरब डॉलर के वैल्यूएशन के साथ भारत की पहली स्पेसटेक यूनिकॉर्न बन गई।

₹12 करोड़ से बन गए ₹700 करोड़

मुकेश बंसल का शुरुआती भरोसा अब बड़ी कमाई में बदल चुका है। Tracxn के मुताबिक, उनके पास अभी भी Skyroot में 5.7% हिस्सेदारी है, जिसकी मौजूदा कीमत 600 करोड़ रुपये से ज्यादा है। इसके अलावा वह अपनी कुछ हिस्सेदारी बेचकर 100 करोड़ रुपये से ज्यादा पहले ही निकाल चुके हैं।

यानी उनकी बची हिस्सेदारी और अब तक की कमाई को जोड़ दें तो उनकी कुल वैल्यू 700 करोड़ रुपये से ज्यादा हो चुकी है। दूसरे शब्दों में कहें तो करीब ₹12 करोड़ का निवेश लगभग 60 गुना बढ़ गया।

सिर्फ एक कंपनी नहीं, पूरे सेक्टर की कहानी

Skyroot की सफलता सिर्फ एक स्टार्टअप की सफलता नहीं है। यह भारत के स्पेस सेक्टर में आए बड़े बदलाव की भी कहानी है। सरकार के दरवाजे खोलने के बाद देश में स्पेस स्टार्टअप्स की संख्या 2014 में सिर्फ एक से बढ़कर 2026 में 400 से ज्यादा हो गई है।

सरकार का लक्ष्य 2033 तक भारत की स्पेस इकोनॉमी को 8.4 अरब डॉलर से बढ़ाकर 44 अरब डॉलर तक पहुंचाने का है। Skyroot की उड़ान इस बदलाव की सबसे बड़ी मिसाल बन चुकी है।

मुकेश बंसल का सबसे बड़ा दांव

मुकेश बंसल पहले Myntra के जरिए फैशन ई-कॉमर्स और फिर Cult.fit के जरिए फिटनेस सेक्टर में अपनी पहचान बना चुके थे। लेकिन Skyroot में किया गया निवेश अलग था।

यह सिर्फ किसी स्टार्टअप में पैसा लगाना नहीं था, बल्कि भारत के निजी अंतरिक्ष कार्यक्रम के भविष्य पर जताया गया भरोसा था। आज वही भरोसा भारतीय स्पेस सेक्टर की सबसे बड़ी सफलता की कहानियों में गिना जा रहा है।

नौकरी 10 साल से पहले छोड़ने पर आपके EPS का क्या होगा? जानिए ईपीएफओ का नियम क्या है

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Skyroot Vikram-1: भारत का पहला प्राइवेट ऑर्बिटल रॉकेट ऐतिहासिक उड़ान को तैयार, जानें कब और कहां से देखें इसकी लॉन्चिंग

Skyroot Vikram-1 Update: भारत के अंतरिक्ष इतिहास में आज 18 जुलाई का दिन एक स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज होने जा रहा है। देश की निजी स्पेस एजेंसी स्काईरूट एयरोस्पेस अपने पहले पूर्ण विकसित और स्वदेशी ऑर्बिटल-क्लास (कक्षीय श्रेणी) रॉकेट विक्रम-1 को लॉन्च करने के लिए पूरी तरह तैयार है। इस ऐतिहासिक मिशन को मिशन आगमन नाम दिया गया है। ये वैश्विक लॉन्चिंग कारोबार में भारत के प्राइवेट सेक्टर की धमाकेदार एंट्री का प्रतीक बनने जा रहा है। यह पहली बार होगा जब पूरी तरह से किसी निजी कंपनी द्वारा डिजाइन और विकसित किया गया ऑर्बिटल-श्रेणी का रॉकेट भारतीय धरती से अंतरिक्ष के लिए उड़ान भरेगा।

आइए जानते हैं इस ऐतिहासिक लॉन्चिंग से जुड़ी हर छोटी-बड़ी जानकारी और आप इसे घर बैठे लाइव कैसे देख सकते हैं।

कब और कहां से होगी लॉन्चिंग?

विक्रम-1 रॉकेट की यह पहली टेस्ट फ्लाइट आज यानी शनिवार को सुबह 11:30 बजे उड़ान भरेगी। यह 7 मंजिला ऊंचा रॉकेट आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा में स्थित भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (SDSC-SHAR) के ऐतिहासिक ‘प्रथम लॉन्च पैड’ से गरजना भरते हुए अंतरिक्ष की ओर रवाना होगा।

घर बैठे कहां और कैसे देखें लाइव लॉन्चिंग?

यदि आप भारत के इस ऐतिहासिक पल का गवाह बनना चाहते हैं, तो स्काईरूट एयरोस्पेस इस पूरे इवेंट की लाइव स्ट्रीमिंग करने जा रहा है। कंपनी ने अपने आधिकारिक X हैंडल पर जानकारी दी है कि भारत के इस पहले प्राइवेट ऑर्बिटल लॉन्च को आज YouTube पर लाइव देखा जा सकता है। आप नीचे दिए गए आधिकारिक लिंक पर जाकर अपना रिमाइंडर सेट कर सकते हैं और सीधे लाइव लॉन्चिंग देख सकते हैं-

स्काईरूट विक्रम-1 लॉन्च लाइव यूट्यूब लिंक (https://www।youtube।com/live/-lLd1cI7v0U)

अंतरिक्ष जाएगा पीएम मोदी का हाथ से लिखा संदेश

इस मिशन की सबसे खास और अनोखी बात यह है कि ‘विक्रम-1’ अपने साथ देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक बेहद खास संदेश लेकर अंतरिक्ष जा रहा है। स्काईरूट एयरोस्पेस के मुताबिक, इस टेस्ट फ्लाइट के विशेष पेलोड में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अपने हाथों से लिखा गया एक पोस्टकार्ड शामिल है। इस पोस्टकार्ड पर वंदे मातरम लिखा हुआ है जिस पर पीएम मोदी के हस्ताक्षर भी मौजूद हैं। इस हस्तलिखित पोस्टकार्ड पर 26 जून 2026 की तारीख दर्ज है।

कितना शक्तिशाली है ‘विक्रम-1’ और क्या है इसकी खासियत?

इस रॉकेट का नाम भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक माने जाने वाले महान वैज्ञानिक डॉ विक्रम साराभाई के नाम पर रखा गया है। नवंबर 2022 में स्काईरूट द्वारा लॉन्च किए गए विक्रम-एस सबऑर्बिटल रॉकेट की सफलता के बाद यह कंपनी का अगला सबसे बड़ा मील का पत्थर है। विक्रम-एस केवल सबऑर्बिटल फ्लाइट पर गया था (जो कुछ समय के लिए अंतरिक्ष में जाकर वापस आ गया था) लेकिन विक्रम-1 एक ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल है। इसका मतलब है कि यह सैटेलाइट्स को अंतरिक्ष की एक निश्चित और स्थिर कक्षा में स्थापित करने में सक्षम है।

इस मिशन के तहत रॉकेट का लक्ष्य 60° झुकाव पर 450 किलोमीटर की लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) तक पहुंचना है। यह रॉकेट 350 किलोग्राम तक के छोटे सैटेलाइट्स को अंतरिक्ष की निचली कक्षा (LEO) में ले जाने के लिए खास तौर पर डिजाइन किया गया है। 7 मंजिला ऊंचे इस बहु-चरणीय रॉकेट का निर्माण पूरी तरह से कार्बन-मिश्रित संरचना से किया गया है। इसे ताकत देने के लिए कंपनी का खुद का प्रोपल्शन सिस्टम लगा है जिसमें 3D-प्रिंटेड इंजन और हाई-थ्रस्ट सॉलिड-फ्यूल रॉकेट बूस्टर शामिल हैं।

इस टेस्ट फ्लाइट का मुख्य उद्देश्य क्या है?

स्काईरूट एयरोस्पेस के अनुसार, 18 जुलाई की यह उड़ान मुख्य रूप से एक टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेशन (तकनीकी प्रदर्शन) फ्लाइट है। इसका मुख्य मकसद यह जांचना है कि स्काईरूट की बनाई गई तकनीक और उसके ऑनबोर्ड सिस्टम असल उड़ान की परिस्थितियों में कैसा प्रदर्शन करते हैं। इस मिशन के दौरान जो भी डेटा मिलेगा, उसका इस्तेमाल कंपनी अपनी तकनीक को गहराई से सीखने, उसमें सुधार करने, भविष्य के वर्शन्स को और बेहतर बनाने और नियमित लॉन्च ऑपरेशन्स स्थापित करने की अपनी योजनाओं को सहारा देने के लिए करेगी।

इस ऐतिहासिक मिशन में भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष कंपनियों जैसे ग्रेहा स्पेस, डीक्यूब्ड और कॉस्मोसर्व के कई तकनीकी प्रदर्शन पेलोड भी शामिल हैं, जो देश के स्पेस इकोसिस्टम में प्राइवेट प्लेयर्स की बढ़ती ताकत को दर्शाते हैं।

20 दिन की भूख हड़ताल के बाद सोनम वांगचुक की बिगड़ी तबीयत, दिल्ली पुलिस ने अस्पताल में कराया भर्ती