3 करोड़ सैलरी भी है कम! पार्थिव पटेल ने क्यों नहीं किया चीफ सेलेक्टर के लिए आवेदन? जानें वजह

अजीत अगरकर के जाने के बाद से बीसीसीआई नए चीफ सेलेक्टर की तलाश जारी है। वहीं ऐसी खबरे थी की पूर्व भारतीय विकेटकीपर पार्थिव पटेल को इस पद का प्रमुख दावेदार माना जा रहा है। ऐसी चर्चाएं भी थीं कि अगर पटेल इस पद के लिए आवेदन करते हैं, तो उन्हें बोर्ड का पूरा समर्थन मिल सकता है। वहीं आवेदन करने की आखिरी तारीख बीत जाने के बावजूद पार्थिव पटेल ने इस पद के लिए अपना नाम नहीं दिया। वहीं रिपोर्ट में ऐसा दावा किया जा रहा है कि चीफ सेलेक्टर को मिलने वाली सैलरी की वजह से पार्थिव ने आवेदन नहीं किया है। आइए जानते हैं क्या है पूरा मामला

इस वजह से पार्थिव ने नहीं दिया नाम

द टेलीग्राफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने आर्थिक कारणों के चलते मुख्य चयनकर्ता बनने का फैसला छोड़ दिया। BCCI इस पद के लिए उन्हें हर साल 3 करोड़ रुपये देने को तैयार था, लेकिन यह जिम्मेदारी स्वीकार करने पर उन्हें गुजरात टाइटंस में अपनी कोचिंग की नौकरी और कमेंट्री से होने वाली कमाई छोड़नी पड़ सकती थी। ऐसे में उन्हें इस पद को चुनने से आर्थिक नुकसान होने की आशंका थी। फिलहाल, साउथ जोन के चयनकर्ता प्रज्ञान ओझा इस जिम्मेदारी को संभाल रहे हैं।

वहीं, वेस्ट जोन से एक नए चयनकर्ता को भी टीम में शामिल किया जाना है। इस पद के लिए पूर्व भारतीय क्रिकेटर वसीम जाफर और रमेश पोवार के नामों की चर्चा हो रही है। दोनों को मुख्य चयनकर्ता बनने की दौड़ में मजबूत दावेदार माना जा रहा है।

अश्विन ने सैलरी को लेकर उठाए सवाल

भारत के पूर्व स्पिनर रविचंद्रन अश्विन ने हाल ही में अपने यूट्यूब चैनल पर चयनकर्ताओं की सैलरी को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि, BCCI में चयनकर्ता के पद पर मिलने वाली रकम इतनी नहीं है कि बड़े और अनुभवी क्रिकेटर इस जिम्मेदारी को लेने के लिए आगे आएं। अश्विन ने कहा कि, ‘अगर सेलेक्टर्स की सैलरी बढ़ाई जाती है, तो इस पद के लिए बड़े और अनुभवी क्रिकेटर आगे आ सकते हैं। उन्होंने सौरव गांगुली, राहुल द्रविड़ और अनिल कुंबले जैसे दिग्गजों का उदाहरण देते हुए कहा कि अच्छे स्तर के चयनकर्ताओं को लाने के लिए इस पद को आर्थिक रूप से आकर्षक बनाना जरूरी है।”

हेड कोच जितनी मिले सैलरी

अश्विन ने आगे कहा, “चयनकर्ता बनने के बाद पूर्व क्रिकेटर मीडिया में काम नहीं कर सकते, खिलाड़ियों पर खुलकर चर्चा नहीं कर सकते और न ही कहीं कोचिंग दे सकते हैं, क्योंकि इससे हितों के टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है। इसके अलावा, उन्हें पूरे साल घरेलू क्रिकेट और IPL पर नजर रखनी पड़ती है। अश्विन का मानना है कि अगर मुख्य चयनकर्ता को भारतीय टीम के मुख्य कोच के बराबर वेतन मिले, तो इस पद के लिए बेहतर अनुभव और योग्यता वाले लोग सामने आएंगे।” उन्होंने यह पूछकर अपनी बात खत्म की कि क्या बोर्ड पहले उन पेडिग्री वाले सिलेक्टर्स को चाहता था।

संडे प्रोफाइल : जॉन टर्नस:टर्नस के सामने एपल को एआई में आगे ले जाने की चुनौती

एपल के नए सीईओ जॉन टर्नस डिजाइन की खूबसूरती के साथ हार्डवेयर पर यकीन करते हैं। वे मानते हैं टेक्नोलॉजी से अलग हटकर दूसरी चीजों का भी महत्व है। टर्नस को हाल ही में टाइम मैगजीन के बेस्ट इन्वेंशन ऑफ 2026 के संस्करण के कवर पर जगह मिली है। सितंबर में एपल के बहुप्रतीक्षित फोल्डेबल फोन की लॉन्चिंग के दौरान जॉन टर्नस के हाथ कांप रहे थे। कार्यक्रम का यूट्यूब पर सीधा प्रसारण हो रहा था और कई लोगों ने इस पर ध्यान दिया। बाद में टर्नस ने बताया कि वे इतने उत्साहित थे कि रातभर सो नहीं पाए। इससे अपने प्रोडक्ट के प्रति उनका लगाव जाहिर होता है। इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले टर्नस ने एपल में 25 साल से ज्यादा समय तक काम किया है। इस दौरान उन्होंने आईफोन, मैक, आईपैड और एयरपॉड्स जैसे प्रोडक्ट को बेहतर बनाने में अहम भूमिका निभाई। आईपैड की हर पीढ़ी और पहली पीढ़ी के एयरपॉड्स के हार्डवेयर विकास में वे शामिल रहे। मैक कंप्यूटर में इंटेल के प्रोसेसर की जगह एपल के अपने चिप लगाने के बदलाव में भी उन्होंने योगदान दिया। उनके काम में प्रोडक्ट को मजबूत और टिकाऊ बनाना और उनकी मरम्मत आसान करना भी शामिल रहा है। टर्नस से पहले एपल के सीईओ रहे टिम कुक और स्टीव जॉब्स की भूमिका अलग थी। कुक ने कंपनी के कारोबार को बढ़ाने, दुनिया भर में प्रोडक्ट पहुंचाने और सामान बनाने व सप्लाई करने की व्यवस्था को मजबूत करने पर काम किया। उनसे पहले स्टीव जॉब्स नए प्रोडक्ट की सोच, उनके डिजाइन और लोगों के इस्तेमाल के अनुभव पर ध्यान देते थे। आईफोन, आईपैड और आईपॉड जैसे प्रोडक्ट को दुनिया के सामने लाने में उनकी अहम भूमिका रही। टर्नस की खासियत यह है कि वे प्रोडक्ट के अंदरूनी हिस्सों, उसकी बनावट और काम करने के तरीके पर ध्यान देते हैं। वे यह सुनिश्चित करने में जुटे रहे कि प्रोडक्ट अच्छी तरह काम करें और लोगों के लिए उपयोगी हों। टर्नस का जन्म 1975 में हुआ था। आठ साल की उम्र में उनके पिता ने उन्हें एपल-2 कंप्यूटर दिया था। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने वर्चुअल रियलिटी से जुड़ी एक कंपनी में काम किया। 2001 में वे एपल की प्रोडक्ट डिजाइन टीम में इंजीनियर बने। 2013 में हार्डवेयर इंजीनियरिंग के वाइस प्रेसिडेंट और 2021 में सीनियर वाइस प्रेसिडेंट बने। इस दौरान कंपनी के कई बड़े प्रोजेक्ट्स में उनकी जिम्मेदारी बढ़ती गई। एपल के प्रोडक्ट डिजाइन वाइस प्रेसिडेंट रिचर्ड डिन्ह के अनुसार, कंपनी की अलग-अलग टीमों के बीच तालमेल बढ़ाने में टर्नस की अहम भूमिका रही है। अब उनके सामने एआई के क्षेत्र में एपल को आगे बढ़ाने की चुनौती है। दूसरी बड़ी टेक कंपनियां एआई पर तेजी से काम कर रही हैं, जबकि एपल की प्रगति पर सवाल उठे हैं। टर्नस का कहना है कि हम ऐसी एआई सुविधाओं पर काम कर रही है, जिनमें यूजर की निजी जानकारी सुरक्षित रहे। फिलहाल टर्नस डिजाइन स्टूडियो और यूजर्स से जुड़ी टीमों के साथ समय बिताते हैं।

‘मुझे ऐसा लगता है जैसे मैंने अपनी कंपनी से 4.7 करोड़ चुराए हैं’, टेक कर्मचारी ने 2 साल तक कुछ काम न करने पर कही बड़ी बात

एक टेक कर्मचारी ने यह दावा करके इंटरनेट यूजर्स को हैरान कर दिया है कि उसने लगभग दो साल तक काम पर लगभग कुछ भी न करते हुए 275,000 डॉलर (करीब 2.6 करोड़ रुपये) की सालाना सैलरी कमाई। कर्मचारी का अनुमान है कि इस दौरान उसे 500,000 डॉलर (लगभग 4.7 करोड़ रुपये) से ज्यादा का भुगतान किया गया, जबकि उसके पास लगभग कोई जिम्मेदारी नहीं थी।

रेडिट पोस्ट वायरल

रेडिट (Reddit) पर एक पोस्ट में उसने बताया कि दुनिया की सबसे बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों में से एक में एक बड़ा प्रमोशन कैसे एक अप्रत्याशित मोड़ पर आ गया। कंपनी में अचानक हुए पुनर्गठन (restructuring) के कारण उसके पास न तो कोई सार्थक काम बचा और न ही उसे मैनेजमेंट से कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश मिले।

रेडिट के ‘r/corporate’ सबरेडिट पर अपना अनुभव साझा करते हुए कर्मचारी ने कहा- “मुझे ऐसा लगता है जैसे मैंने अपनी कंपनी से 500,000 डॉलर से ज्यादा चुरा लिए हैं।” उसने बताया कि उसने कंपनी में लगभग एक दशक बिताया और इस दौरान पांच अलग-अलग भूमिकाएं निभाईं। हालांकि 2025 की शुरुआत में जो उसके करियर का एक अहम पड़ाव होना चाहिए था, वह अनिश्चितता के एक लंबे दौर में बदल गया।

रेडिट यूजर के अनुसार- उसे एक नई टीम में शामिल होने का ऑफर मिला, जो उसके करियर में एक बड़ा कदम था। लेकिन जिस दिन उसने नई टीम जॉइन की उसी दिन कंपनी में बड़े पैमाने पर पुनर्गठन हुआ, जिसके चलते वे मैनेजर और डायरेक्टर दोनों ही कंपनी छोड़कर चले गए, जिन्होंने उसे काम पर रखा था।

jobb

इस मौके के लिए अपने परिवार को वेस्ट कोस्ट से न्यूयॉर्क शहर ले जाने के बाद उन्होंने एक-दो सप्ताह इंतजार करने का फैसला किया कि नई लीडरशिप के तहत टीम कैसे काम करेगी। हालांकि हालात वैसे नहीं सुधरे जैसी उन्होंने उम्मीद की थी। उन्होंने लिखा- “तो वहां मैं था। साल के लगभग 275,000 डॉलर कमा रहा था एक ऐसी टीम में जहां कोई जिम्मेदारी या मैनेजमेंट का कोई दिशा-निर्देश नहीं था। बस कुछ नहीं कर रहा था।”

ऑफिस के कैफे में बैठकर यूट्यूब और नेटफ्लिक्स देखते थे

कर्मचारी ने बताया कि उनका अनुभव सिर्फ कम काम या कभी-कभार होने वाली मीटिंग्स से कहीं बढ़कर था। उन्होंने बताया कि वे अपने काम के घंटों में ऑफिस के कैफे में बैठकर यूट्यूब और नेटफ्लिक्स देखते थे। न्यूयॉर्क शहर के मशहूर रेस्तरां ढूंढ़ते थे और मैनहट्टन में घूमते-फिरते थे। भले ही यह सुनने में एक बहुत ही शानदार स्थिति लगे, लेकिन उन्होंने कहा कि किसी उद्देश्य का न होना धीरे-धीरे उनके लिए निराशा का कारण बन गया।

रेडिट यूजर ने यह भी बताया कि शुरुआत में उन्होंने सार्थक काम पाने और बिजनेस को बेहतर ढंग से समझने के लिए कई कोशिशें कीं। हालांकि उनका कहना है कि नए मैनेजर की तरफ से कोई खास दिशा-निर्देश नहीं मिले, जिसकी वजह से वे अपने काम से पूरी तरह अलग-थलग महसूस करने लगे।

आखिरकार उसने काम खोजने की नियमित कोशिशें बंद कर दीं और ज्यादातर दिन घर पर ही रहने लगा। उसने बताया कि वह अपने अपार्टमेंट के जिम में समय बिताता था, तरह-तरह के नाश्ते तैयार करता था, बालकनी में बैठकर शहर के नजारे देखते हुए कॉफी पीता था और कॉर्पोरेट जीवन की बेतुकी बातों के बारे में सोचता रहता था।

इस अनुभव ने टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री के प्रति उसके नजरिए को भी बदल दिया। उसने कहा कि उसे इस बात से काफी हैरानी हुई कि कोई कर्मचारी इतने लंबे समय तक बिना किसी काम (बिना किसी असाइनमेंट) के रह सकता है और फिर भी उसे अच्छी-खासी सैलरी मिलती रहती है।

टेक कर्मचारी का कहना है कि आखिरकार उसे एक बेहतर रोल मिल गया

इन अजीब हालात के बावजूद कर्मचारी ने तय किया कि वह इस अनचाहे ब्रेक का अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करेगा। कई महीनों तक इंटरव्यू देने के बाद उसे हाल ही में उसी कंपनी में एक और पद मिल गया, जिसे उसने अपने करियर में एक बड़ी तरक्की बताया। हालांकि वह इस नए मौके को लेकर उत्साहित था, लेकिन लगभग दो साल तक बिना किसी काम के रहने के बाद फिर से एक चुनौतीपूर्ण रोल में लौटना काफी मुश्किल साबित हुआ।

उन्होंने लिखा, “मुझे यहां आए अभी सिर्फ डेढ़ हफ्ता ही हुआ है और मुझे लगभग 2 साल तक कोई काम न करने का असर अभी से महसूस होने लगा है। मुझे लग रहा है कि मैं काफी पीछे छूट गया हूं और मेरी कार्यक्षमता भी काफी कम हो गई है।” फिर भी उन्होंने कहा कि वे खुश हैं कि उन्हें एक ऐसी भूमिका मिल गई है, जहां वे सार्थक योगदान दे सकते हैं और फिर से कुछ नया सीख सकते हैं।

जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें बिना ज्यादा काम किए सैलरी लेने पर कोई गिल्ट महसूस हुआ तो उन्होंने माना कि शुरुआत में उन्हें लगा जैसे वे कंपनी पर एक ‘बेवजह का खर्च’ बन गए हैं। ऐसा इसलिए था क्योंकि इससे पहले एक सेल्सपर्सन के तौर पर वे कंपनी के लिए काफी रेवेन्यू (कमाई) लाते थे।

हालांकि समय के साथ उनका यह अपराधबोध गुस्से में बदल गया और फिर उन्होंने स्थिति को स्वीकार कर लिया। आखिरकार उन्होंने इस समय का भरपूर फायदा उठाने का फैसला किया—अपनी पत्नी के साथ अच्छा समय बिताया, न्यूयॉर्क के अलग-अलग रेस्तरां में खाना चखा और खुद को एक बहुत जरूरी मानसिक ब्रेक दिया।

उन्होंने आगे कहा कि इस अनुभव ने उन्हें कॉर्पोरेट टेक्नोलॉजी नौकरियों के बारे में एक अलग नजरिया दिया है। यहां कर्मचारी कभी-कभी कंपनी की व्यवस्था की कमियों के बीच ऐसे छिप सकते हैं कि किसी को पता ही नहीं चलता कि उनकी जिम्मेदारियां क्या हैं।

पोस्ट के अंत में उन्होंने पाठकों को अपने सवाल पूछने के लिए इनवाइट किया। बाद में एक एडिट में उन्होंने अपने जैसे अनुभव साझा करने वाले लोगों को धन्यवाद दिया और कहा कि उनकी कहानियां सुनकर उन्हें अपनी स्थिति के बारे में बेहतर महसूस हुआ।

रेडिट यूजर्स ने अपने मिलते-जुलते अनुभव साझा किए

इस कर्मचारी की कहानी पढ़ने के बाद कई रेडिट यूजर्स ने अपने विचार साझा किए। कुछ लोगों को इस स्थिति से जलन हुई तो कुछ ने इस बात पर चिंता जताई कि कोई सार्थक काम न होने से मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ सकता है। एक यूजर ने कहा, “न्यूयॉर्क में इधर-उधर घूमना किसी सपने जैसा लगता है, लेकिन अगर मेरे हफ्ते में 2 दिन से ज्यादा समय खाली निकल जाए तो मैं पागल होने लगता हूं।”

एक दूसरे यूजर ने कहा, “मैं खुद टेक इंडस्ट्री में काम करता हूं और पूरे दिन व्यस्त रहता हूं, इसलिए आप मेरी ‘ड्रीम जॉब’ जी रहे हैं! बस फर्क इतना है कि अगर मैं आपकी जगह होता तो उस खाली समय का इस्तेमाल अपनी स्किल्स को बेहतर बनाने और नए सर्टिफिकेशन लेने में करता।”

एक तीसरे यूजर ने कहा, “मैं यहां कुछ पूछने नहीं आया हूं, बस इतना कहना चाहता हूं कि ‘मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ है!’ कुछ समय तक तो मजा आता है, लेकिन फिर यह निराशाजनक लगने लगता है। मुझे अभी एक प्रमोशन मिला है और मैं थोड़ा घबराया हुआ हूं क्योंकि अब मुझे सच में काम करना पड़ेगा, लेकिन साथ ही मुझे कुछ नया सीखने और असली काम करने का मौका भी मिलेगा! और हां, अब यह पूरी तरह से रिमोट (घर से काम) नहीं है, बल्कि हाइब्रिड है, जिसे लेकर मैं काफी उत्साहित हूं! और सबसे अच्छी बात यह है कि मैं यूरोप जा रहा हूं।”

छोटे कमरे से बड़े मंच की तैयारी करती गाँव की सोनाली | The Better India Hindi

छोटे कमरे से बड़े मंच की तैयारी करती गाँव की सोनाली | The Better India Hindi

#thebetterindia #goodnews #positivestories #indianews #thebetterindiahindi #hindi

पश्चिम बंगाल के एक छोटे से गाँव की सोनाली के पास न कोई बड़ी Dance Academy है, न महंगा कैमरा और न कोई शानदार सेटअप।

पिता एक मामूली पेंटर हैं, माँ ईंट-भट्ठे पर मजदूरी करती हैं।

घर में आर्थिक तंगी की वजह से सोनाली की पढ़ाई तक छूट गई, लेकिन उनके बचपन का सपना एक बेहतरीन डांसर बनने का आज भी ज़िंदा है।

पुराने फोन से विडियोज बनाकर और यूट्यूब से सीखकर सोनाली रोज़ अपने सपने के थोड़ा और करीब बढ़ रही है।

क्योंकि उन्हें खुद पर यकीन है कि उनकी। मेहनत एक दिन उन्हें उस बड़े मंच तक पहुँचा देगी।

Small Town Dreams, Rural India girl dance journey, Never Give Up, Learn Dance from Youtube, Inspiring Indian dancer Journey

Follow us for more:

Facebook: https://www.facebook.com/thebetterindia.hindi
Instagram: https://www.instagram.com/thebetterindia.hindi/
Twitter: https://twitter.com/TbiHindi
LinkedIn: https://www.linkedin.com/company/the-better-india-hindi/

Website: https://hindi.thebetterindia.com/

Salman Khan YouTube Debut: ‘शुरू से शुरू करते हैं…’, सलमान खान ने Alphabet थीम वाले टीजर के साथ यूट्यूब डेब्यू किया

Salman Khan YouTube Debut: सलमान खान ने आधिकारिक तौर पर YouTube जॉइन कर लिया है। एक्टर ने शुक्रवार 9 अक्टूबर को अपना चैनल लॉन्च किया, जिससे फैंस को फिल्मों, टीवी पर दिखने और सोशल मीडिया पोस्ट के अलावा उनके बारे में अपडेट पाने का एक नया प्लेटफॉर्म मिला।

सलमान ने इंस्टाग्राम स्टोरीज के जरिए चैनल की घोषणा की और एक छोटा वीडियो शेयर किया, जिसमें उन्होंने पेज के पीछे के आइडिया के बारे में बताने से पहले वर्णमाला (अल्फाबेट) सुनाई। उनके मैसेज से पता चला कि चैनल सिर्फ एक तरह के कंटेंट तक सीमित नहीं रहेगा।

सलमान ने शेयर करते हुए लिखा, “शुरू से शुरू करते हैं… मेरा ऑफिशियल YouTube चैनल। A से Z तक सब यहां मिलेगा।” लॉन्च के लगभग एक घंटे के भीतर ही चैनल के 14,000 से ज़्यादा सब्सक्राइबर हो गए थे। सलमान खान के YouTube चैनल पर पहले से ही 10 शॉर्ट्स मौजूद हैं।

सलमान का YouTube बायो बहुत सिंपल है- “फिल्म एक्टर। आर्टिस्ट। पेंटर। समाजसेवी। यह मेरा ऑफिशियल चैनल है।” ऐलान के समय पेज पर 10 शॉर्ट्स मौजूद थे। शुरुआती अपलोड्स में लंबे कंटेंट के बजाय छोटे और हल्के-फुल्के वीडियो ज्यादा हैं, जिससे फॉलोअर्स को यह अंदाजा हो जाता है कि सलमान इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं।

एक्टर ने अभी तक कंटेंट का कोई डिटेल्ड शेड्यूल शेयर नहीं किया है, लेकिन इस अनाउंसमेंट से ही फैंस के बीच उत्सुकता बढ़ गई है कि आगे क्या होगा। यह चैनल पर्सनल अपडेट्स, शूट की झलकियां, प्रमोशनल मटीरियल और ऐसे दूसरे कंटेंट के लिए एक जगह बन सकता है जो आमतौर पर उनकी फिल्मों की रिलीज या टीवी अपीयरेंस में नहीं दिखते।

यूट्यूब पर आने से सलमान को एक सीधा वीडियो प्लेटफॉर्म भी मिल गया है, ऐसे समय में जब कई एक्टर पारंपरिक प्रमोशनल कैंपेन से हटकर रेगुलर कंटेंट शेयर करने के लिए अपने चैनलों का इस्तेमाल कर रहे हैं।

सलमान यूट्यूब पर दूसरे बॉलीवुड स्टार्स के साथ शामिल हुए

यूट्यूब पर ऑफिशियल मौजूदगी बनाने वाले सलमान पहले फिल्म सेलिब्रिटी नहीं हैं। आलिया भट्ट, सोनाक्षी सिन्हा, नोरा फतेही, जैकलीन फर्नांडीज, वरुण धवन, शिल्पा शेट्टी कुंद्रा, अर्चना पूरन सिंह और फराह खान जैसे बॉलीवुड स्टार्स ने इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल व्लॉग, ट्रैवल वीडियो, फिटनेस कंटेंट, कुकिंग वीडियो, बिहाइंड-द-सीन्स फुटेज और अपनी रोजमर्रा की जिंदगी की झलकियां शेयर करने के लिए किया है। साउथ फिल्म इंडस्ट्री के कई एक्टर, जिनमें अल्लू अर्जुन और मोहनलाल शामिल हैं, भी अपने ऑफिशियल यूट्यूब चैनल चलाते हैं।

‘वेरिटी’: सच से ज़्यादा ख़तरनाक अफ़साना

कुछ कहानियां हमें डराती नहीं हैं। वे हमारे भीतर एक शक छोड़ जाती हैं। ऐसा शक, जो सिनेमा हॉल से बाहर निकलने के बाद भी हमारे साथ चलता है। क्या जो हमने देखा, वही सच था? क्या जिस आदमी पर हमें भरोसा हुआ, वह भरोसे के लायक था? क्या जिस औरत को हम पीड़ित समझ रहे थे, वह वास्तव में पीड़ित थी?

सिने-सोहबत

सबसे बड़ा सवाल कि अगर किसी लेखक ने अपनी ज़िंदगी के सबसे अंधेरे हिस्से को कहानी की शक्ल में लिख दिया हो, तो हम कैसे तय करेंगे कि उसमें कितना सच है और कितना कल्पना?

माइकल शोवाल्टर की हालिया हॉलीवुड फ़िल्म ‘वेरिटी’, कोलीन हूवर के लोकप्रिय मनोवैज्ञानिक रोमांचक उपन्यास पर आधारित है। फ़िल्म में ऐन हैथवे, डकोटा जॉनसन और जोश हार्टनेट मुख्य भूमिकाओं में हैं। और सच कहूं तो ‘वेरिटी’ को सिर्फ़ एक रोमांचक फ़िल्म कहना उसके साथ थोड़ी नाइंसाफी होगी। यह कहानी दरअसल है लेखन की, इच्छा की, विवाह की, अपराध की, महत्वाकांक्षा की और सबसे बढ़ कर सच को अपनी सुविधा के हिसाब से गढ़ लेने की इंसानी फ़ितरत की।

डकोटा जॉनसन की लोवेन ऐशली एक संघर्षरत लेखिका है। किताबें लिखती है, लेकिन सफलता उससे अभी दूर है। तभी उसे एक ऐसा प्रस्ताव मिलता है, जिसे वह शायद ठुकरा नहीं सकती। प्रसिद्ध लेखिका वेरिटी क्रॉफ़र्ड एक भयानक दुर्घटना के बाद लगभग निष्क्रिय अवस्था में है। वह बोल नहीं सकती, लिख नहीं सकती और अपने बेहद लोकप्रिय उपन्यासों की शृंखला पूरी नहीं कर सकती।

लोवेन को उसके घर बुलाया जाता है ताकि वह वेरिटी के अधूरे काम को पूरा कर सके और यहीं से खेल शुरू होता है। क्योंकि किसी लेखक के घर में रखी चीज़ें महज़  चीज़ें नहीं होतीं। कागज, नोटबुक, अधूरे पन्ने, किताबें, तस्वीरें सब कुछ किसी न किसी कहानी की तरफ इशारा करते हैं। लोवेन को एक पांडुलिपि मिलती है। और यह पांडुलिपि वेरिटी की ज़िंदगी के ऐसे हिस्सों को सामने लाती है, जिन्हें पढ़ने के बाद उसके लिए वेरिटी को उसी नज़र से देख पाना संभव नहीं रह जाता।

अब सवाल यह नहीं है कि वेरिटी ने क्या किया। सवाल यह है कि क्या वेरिटी ने सच में वह सब किया? कहानी लिखने वाले के पास सबसे ख़तरनाक ताकत क्या होती है? किसी किरदार को मार देने की? नहीं। उसे परिभाषित करने की। लेखक तय करता है कि उसका नायक कौन है, खलनायक कौन है, कौन निर्दोष है और कौन दोषी।

लेकिन ‘वेरिटी’ इस विचार को एक कदम आगे ले जाती है। अगर कोई लेखक अपनी ज़िंदगी को ही एक कहानी की तरह लिखने लगे तो? अगर वह अपने अपराध को साहित्य बना दे? अगर वह अपनी सच्चाई को कल्पना बताकर बच निकलने की कोशिश करे? और अगर कल्पना को सच बताकर किसी और को दोषी बना दे? यही वह जगह है जहां ‘वेरिटी’ दिलचस्प हो जाती है। क्योंकि फ़िल्म हमें लगातार याद दिलाती है कि हर कहानी का लेखक सिर्फ़ वही नहीं होता, जो कलम पकड़कर बैठा है। कभी-कभी पाठक भी कहानी लिखता है।

लोवेन वेरिटी की पांडुलिपि पढ़ती है और अपने मन में वेरिटी की एक तस्वीर बनाती है। लेकिन वह तस्वीर सच है या वेरिटी की बनाई हुई है, यह तय करना दर्शक का काम है।

ऐन हैथवे के लिए वेरिटी एक असाधारण भूमिका है। इसलिए नहीं कि वह बहुत कुछ करती हैं, बल्कि इसलिए कि लंबे समय तक उन्हें कुछ भी करने की ज़रूरत नहीं पड़ती। वेरिटी शारीरिक रूप से लगभग निष्क्रिय है। लेकिन स्क्रीन पर उसकी मौजूदगी लगातार सक्रिय रहती है। वह बोल नहीं रही। लेकिन दर्शक को लगता है कि वह सब कुछ सुन रही है। वह चल नहीं रही लेकिन लगता है कि वह पूरे घर को नियंत्रित कर रही है। वह अपनी सफ़ाई नहीं दे सकती। और शायद यही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। क्योंकि जब कोई व्यक्ति जवाब नहीं देता, तो हम उसके लिए अपने जवाब गढ़ने लगते हैं।

ऐन हैथवे इसी अस्पष्टता का खूबसूरती से इस्तेमाल करती हैं। उनके चेहरे पर मासूमियत और ख़तरे के बीच की दूरी इतनी कम है कि दर्शक लगातार अपना फ़ैसला बदलता रहता है। और यही एक अच्छी मनोवैज्ञानिक रोमांचक फ़िल्म की खूबी है। वह आपको बताती नहीं कि किससे डरना है। वह आपको डरने के लिए मजबूर करती है।

डकोटा जॉनसन की लोवेन इस फ़िल्म में सिर्फ़ मुख्य किरदार नहीं है। वह दर्शक की आंखें भी है। वह पहली बार उस घर में प्रवेश करती है, तो हमें भी उतना ही कम पता है जितना उसे। धीरे-धीरे उसे कुछ चीज़ें दिखाई देती हैं। फिर कुछ और। फिर कुछ ऐसा, जिसे देखने के बाद वह पहले देखी हुई चीज़ों पर भी शक करने लगती है। और दर्शक भी। यहीं डकोटा जॉनसन बहुत अच्छी लगती हैं।

लोवेन कोई परफेक्ट नायिका नहीं है। वह जिज्ञासु है, असुरक्षित है, भावनात्मक रूप से कमज़ोर पड़ती है और परिस्थितियों के साथ उसका नैतिक कम्पास भी कई बार हिलता है। यही उसकी खूबसूरती है। क्योंकि वह किसी सुपरहीरो की तरह इस घर में नहीं आती। वह एक लेखक की तरह आती है, कहानी खोजने। और धीरे-धीरे कहानी उसे खोजने लगती है।

जोश हार्टनेट का जेरेमी पहली नज़र में एक संवेदनशील और दुखी पति दिखाई देता है। लेकिन ‘वेरिटी’ जैसी फ़िल्म में अगर कोई व्यक्ति बहुत अच्छा दिखाई दे, तो दर्शक स्वाभाविक रूप से पूछता है कि लोवेन और जेरेमी के बीच आकर्षण कहानी को एक और परत देता है। यह सिर्फ़ प्रेम कहानी नहीं है। यह विश्वास की कहानी है। किसे देखकर आपको लगता है कि वह आपकी तरफ है? और अगर वह व्यक्ति आपको वही कहानी सुनाए, जो आप सुनना चाहते हैं, तो क्या आप उसकी बात पर विश्वास कर लेंगे? लोवेन, जेरेमी और वेरिटी के बीच यही दिलचस्प त्रिकोण बनता है। यहां तीन लोग हैं। तीन दृष्टिकोण हैं। और शायद तीन अलग-अलग सच भी।

‘वेरिटी’ की सबसे बड़ी उपलब्धि उसकी कहानी से ज्यादा उसका माहौल है। वेरिटी का घर सिर्फ़ घर नहीं है। वह फ़िल्म का एक किरदार बन जाता है। बाहर खूबसूरती है। अंदर बेचैनी। बाहर परिवार है। अंदर रहस्य। बाहर खामोशी है। और उस खामोशी के भीतर बहुत सारी आवाज़ें।

फ़िल्म की सिनेमैटोग्राफ़ी भी इसी विरोधाभास को पकड़ती है। सब कुछ चमकदार है, खूबसूरत है, सलीके से रखा हुआ है लेकिन उसी सुंदरता के नीचे कुछ ऐसा है जो लगातार असहज करता है। यह डर भूतों का डर नहीं है।

यह उस डर की फ़िल्म है जब आपको लगने लगे कि आप जिसे जानते हैं, शायद वह वह व्यक्ति है ही नहीं। और मेरे लिए यही ‘वेरिटी’ का सबसे दिलचस्प हिस्सा है। लेकिन फ़िल्म की कमज़ोरी भी यहीं से शुरू होती है। पहला हिस्सा जिस आत्मविश्वास से रहस्य बनाता है, फ़िल्म का आखिरी हिस्सा उतने ही आत्मविश्वास से उस रहस्य को संभाल नहीं पाता।

कहानी में इतने मोड़ आते हैं कि एक समय के बाद रहस्य और उलझन के बीच की सीमा थोड़ी धुंधली हो जाती है। कुछ घटनाएं चौंकाती हैं। कुछ पर आप मुस्कुराते हैं। और कुछ पर आप सोचते हैं क्या सचमुच?

यानी फिल्म कभी-कभी अपनी ही बनाई हुई दुनिया पर ज़रुरत से ज्यादा भरोसा करने लगती है। यही वजह है कि ‘वेरिटी’ एक बेहतरीन मनोवैज्ञानिक रोमांचक फ़िल्म बनने से थोड़ा पीछे रह जाती है। लेकिन यह उसकी विफलता नहीं है। क्योंकि लोकप्रिय सिनेमा का अपना एक आनंद होता है। हर फ़िल्म को शोध-पत्र होने की ज़रूरत नहीं। कभी-कभी हमें ऐसी कहानी भी चाहिए जो हमें पकड़कर बैठाए, हमें शक करवाए, हमें चौंकाए और बीच-बीच में हमें यह सोचने पर मजबूर करे कि भाई, आख़िर सच क्या है?

‘वेरिटी’ को कोलीन हूवर की लोकप्रियता से अलग करके देखना भी मुश्किल है। आज के समय में साहित्य और सिनेमा का रिश्ता बदल चुका है। अब किताब की लोकप्रियता सिर्फ़ किताबों की बिक्री तक सीमित नहीं रहती। वह एक तैयार दर्शक-वर्ग भी बनाती है। कोलीन हूवर इसी बदलाव की बड़ी प्रतिनिधि हैं। उनकी कहानियों में प्रेम है, लेकिन उसके साथ अपराध, जुनून, हिंसा, असुरक्षा और भावनात्मक उथल-पुथल भी है।

‘वेरिटी’ इस दुनिया का एक ज्यादा अंधेरा रूप है। और शायद इसलिए यह उन दर्शकों को भी आकर्षित कर सकती है जिन्हें पारंपरिक रोमांस से ज्यादा मनोवैज्ञानिक रोमांच पसंद है। शायद ‘वेरिटी’ का सबसे दिलचस्प सवाल यही है।

हम सच जानना क्यों चाहते हैं? क्या इसलिए कि सच ज़रूरी है? या इसलिए कि हमें किसी एक कहानी पर विश्वास करना ज़रूरी लगता है? हर रहस्य का जवाब मिल जाए, यह ज़रूरी नहीं। कभी-कभी सवाल का बचा रह जाना ही कहानी को हमारे साथ घर तक लेकर आता है।

‘वेरिटी’ पूरी तरह सफल फ़िल्म नहीं है। लेकिन यह एक ऐसी फ़िल्म ज़रूर है, जिसके बारे में आप फ़िल्म खत्म होने के बाद किसी के साथ बात करना चाहेंगे।

और मेरे लिए सिनेमा की असली परीक्षा यही है। क्या फ़िल्म खत्म होने के बाद बातचीत शुरू होती है? क्योंकि अंततः यह फ़िल्म हत्या, विवाह या रहस्य से ज्यादा कहानी की ताकत के बारे में है।

एक लेखक कहानी लिखता है। पाठक उस पर विश्वास करता है। फिर एक दिन पाठक को शक होता है कि कहानी शायद सच नहीं थी। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। क्योंकि उसने उस कहानी पर विश्वास कर लिया होता है। और शायद ‘वेरिटी’ की सबसे खतरनाक बात यही है कि सच हमेशा सबसे ताकतवर कहानी नहीं होता।
कई बार वह कहानी ज़्यादा ताकतवर होती है, जिस पर हम सच की तरह विश्वास कर लें। यही ‘वेरिटी’ का असली खेल है।

और सिनेमा हॉल से निकलते हुए मेरे मन में बस एक सवाल था कि अगर आपकी ज़िंदगी पर कोई कहानी लिख दे, तो क्या आप पहचान पाएंगे कि उसमें आपका सच कितना है?

अगर आपको रिश्तों के भीतर छिपे रहस्य, मनोवैज्ञानिक रोमांच, खूबसूरत लोकेशन और लगातार बदलते शक पसंद हैं तो ज़रूर देख लीजिएगा।(पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार और यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़’ के होस्ट हैं।)

Netflix Layoffs: OTT प्लेटफॉर्म में फिर होगी छंटनी! 5% कर्मचारियों की जा सकती है नौकरी

नेटफ्लिक्स (Netflix) में एक बार फिर छंटनी होने जा रही है। इस बार लगभग 5 प्रतिशत कर्मचारियों को नौकरी से निकाला जा सकता है। इसकी घोषणा अगले हफ्ते तक हो सकती है। यह बात पक न्यूज (Puck News) की एक रिपोर्ट में मामले की जानकारी रखने वाले लोगों के हवाले से कही गई है। पिछले साल के आखिर में नेटफ्लिक्स के पास लगभग 16,000 फुल-टाइम कर्मचारी थे। कंपनी एक ऑन डिमांड ओवर द टॉप स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म है। सब्सक्रिप्शन के जरिए इस प्लेटफॉर्म पर टीवी शो, फिल्म, डॉक्युमेंट्री, गेम्स, एनीमे, गेम्स आदि का मजा लिया जा सकता है।

स्ट्रीमिंग मार्केट में कॉम्पिटीशन तेजी से बढ़ रहा है। मीडिया कंपनियां कंसोलिडेटेड हो रही हैं और यूट्यूब (YouTube) व्यूअरशिप और विज्ञापन पर होने वाले खर्च का एक बड़ा हिस्सा हासिल कर रहा है। नेटफ्लिक्स अपने रेवेन्यू के सोर्स बढ़ाने के लिए सब्सक्रिप्शन बिजनेस से आगे बढ़कर विज्ञापन, लाइव प्रोग्रामिंग और गेमिंग में भी निवेश कर रही है।

2022 में निकाले थे सैकड़ों कर्मचारी

इससे पहले नेटफ्लिक्स ने साल 2022 में बड़े पैमाने पर छंटनी की थी। उस वक्त कंपनी ने धीमी ग्रोथ और सब्सक्राइबर घटने के कारण सैकड़ों नौकरियां खत्म कर दी थीं। एक दशक से ज्यादा समय में पहली बार नेटफ्लिक्स के ग्राहकों में भारी गिरावट देखी गई थी।

HSBC Layoffs: UK वेल्थ मैनेजमेंट बिजनेस में होगी छंटनी! AI के चलते बड़ी संख्या में जा सकती हैं नौकरियां

Amazon ने लगभग 1000 लोगों को निकाला

ई-कॉमर्स कंपनी एमेजॉन ने भी एक बार फिर छंटनी की है। हाल ही में रॉयटर्स की एक रिपोर्ट में कहा गया कि कंपनी ने कुछ नौकरियां कम की हैं, खासकर अपनी ‘स्टोर्स’ यूनिट में। यह यूनिट मुख्य ई-कॉमर्स वेबसाइट को देखती है। इंटरनल स्लैक चैनल से सामने आया है कि कस्टमर सर्विस और सेलिंग पार्टनर सर्विसेज समेत स्टोर्स के कई डिवीजन पर छंटनी का असर पड़ा है। हो सकता है कि एमेजॉन की दूसरी यूनिट्स के कर्मचारी भी इस जॉब कट से प्रभावित हुए हों।

नौकरी गंवाने वालों में अमेरिका, भारत और यूके के कर्मचारी शामिल हैं। इस बार एमेजॉन द्वारा निकाले गए व्हाइट-कॉलर कर्मचारियों की संख्या 1,000 से कम बताई जा रही है। पिछले साल कंपनी ने बड़े पैमाने पर छंटनी की थी और 30,000 नौकरियां कम की थीं। यह सिलसिला इस साल जनवरी तक चला था।

NMC Advertising Guidelines for Doctors: खुद को नं. 1 या ‘गारंटीड इलाज’ का दावा नहीं कर सकेंगे डॉक्टर, एनएमसी ने जारी की गाइडलाइन

NMC Advertising Guidelines for Doctors: एआई और सोशल मीडिया के दौर में यह समझना बहुत मुश्किल है कि कौन सच बोल रहा है और कौन झूठ? खासतौर से खुद को नंबर 1 बताने वाले डॉक्टर या ‘गारंटीड इलाज’ का दावा करने वाले अस्पतालों को देखते हुए यह और भी मुश्किल हो जाता है। इस समस्या की गंभीरता को समझते नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) ने अस्पतालों और डॉक्टरों के विज्ञापनों के संबंध में गाइडलाइन जारी की है। एनएमसी की इन सख्त दिशा-निर्देशों को तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया गया है।

एनएमसी के नए नियमों के दायरे में अखबार-होर्डिंग और इंस्टाग्राम-यूट्यूब जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म शामिल किए गए हैं। बहुत से डॉक्टर या अस्पताल अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए सेलिब्रिटी, इन्फ्लुएंसर्स या पेड रिव्यू का सहारा लेते हैं। एनएमसी की नई गाइडलाइन के बाद इन सभी तौर-तरीकों पर रोक लगा दी गई है।

एनएमसी की नई गाइडलाइन

एनएमसी के नए नियमों के अनुसार, इलाज से पहले और बाद की तस्वीरें (Before-After Photos) दिखाने या फर्जी लाइक्स और व्यूज के जरिए अपना विज्ञापन करने वालों पर कमीशन की नजर रहेगी। एनएमसी के नियमों का उल्लंघन करने पर डॉक्टरों का रजिस्ट्रेशन निलंबित होने के साथ-साथ भारी जुर्माने का भी प्रावधान किया गया है। सरकार के इस कदम से हेल्थ सर्विस के क्षेत्र में पारदर्शिता और भरोसे का माहौल तैयार होगा।

एनएमसी रखेगी ‘गारंटीड इलाज’ का दावा करने वालों पर नजर

नेशनल मेडिकल कमीशन की नई गाइडलाइंस के अनुसार, अब कोई भी डॉक्टर या हॉस्पिटल अपने प्रचार के लिए ‘100% सफलता’, ‘गारंटीड इलाज’, ‘चमत्कारी इलाज’, ‘दर्द रहित इलाज’ और ‘नंबर-1 स्पेशलिस्ट’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं कर पाएगा। इसके अलावा ‘सबसे अच्छा’ या ‘सबसे भरोसेमंद’ जैसे दावों पर भी रोक लगा दी गई है, जब तक कि उन्हें किसी ठोस और निष्पक्ष तरीके से साबित न किया जा सके।

मरीजों के रिव्यू और सेलिब्रिटी प्रचार पर पाबंदी

डॉक्टर अपने प्रचार के लिए मरीजों की सिफारिशों का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे। इतना ही नहीं, मरीजों से सोशल मीडिया पर रिव्यू मांगने की भी अनुमति नहीं होगी। अपनी सेवाओं का प्रचार करने के लिए किसी सेलिब्रिटी, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर या तीसरे व्यक्ति का सहारा लेने पर भी सख्त पाबंदी लगा दी गई है। ऐसा करने वाले डॉक्टरों या अस्पतालों के खिलाफ कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।

रेफरल फीस और डर पैदा करने वाले विज्ञापनों पर रोक

हॉस्पिटल और डॉक्टर अब फ्री इलाज, कैशबैक, डिस्काउंट, या कूपन का प्रचार नहीं कर सकेंगे। ऐसा करने पर रोक लगा दी गई है। कमीशनखोरी, रेफरल फीस और डर पैदा करके इलाज बेचने वाले विज्ञापनों को भी अवैध करार दिया गया है। हालांकि, डॉक्टर आम जनता को जागरूक करने के लिए स्वास्थ्य अभियानों और शैक्षणिक चर्चाओं में हिस्सा ले सकते हैं।

नियम टूटने पर होगी सख्त कार्रवाई

नेशनल मेडिकल कमीशन ने स्पष्ट किया है कि इन नियमों का उल्लंघन करने वाले डॉक्टरों और हॉस्पिटल के खिलाफ चेतावनी, सुधार के निर्देश, भारी जुर्माने और रजिस्ट्रेशन का निलंबन जैसी कार्रवाई की जा सकती है। हालांकि डॉक्टर इस कार्रवाई के खिलाफ 60 दिनों के अंदर NMC के एथिक्स एंड मेडिकल रजिस्ट्रेशन बोर्ड में अपील कर सकते हैं।

Shivraj Singh Chouhan के घर फिर गूंजी किलकारी, पोती इला के बाद पोते अहान के दादा बने केंद्रीय कृषि मंत्री

RBI MPC Meet: आपकी होम और कार लोन की EMI बढ़ेगी या घटेगी? कल 10 बजे RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा करेंगे बड़ा ऐलान

RBI MPC Meet October 2026: देश के करोड़ों आम नागरिकों, होम लोन ग्राहकों और शेयर बाजार की नजरें कल यानी 7 अक्टूबर को रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के फैसले पर टिकी होंगी। मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) कल सुबह 10 बजे अपनी नई मौद्रिक नीति का ऐलान करेगी, जिसके बाद दोपहर में गवर्नर संजय मल्होत्रा प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करेंगे।

पिछले 4 लगातार बैठकों से रिजर्व बैंक ने रेपो रेट को 5.25% पर स्थिर रखा है। हालांकि, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल व कमोडिटीज की कीमतों में तेजी के कारण इस बार ब्याज दरें बढ़ाए जाने की मजबूत संभावना जताई जा रही है।

क्रेडिट रेटिंग एजेंसी इकरा (ICRA) और ब्रोकरेज फर्म गोल्डमैन सैक्स समेत अधिकांश अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि इस बार रेपो रेट को 25 बेसिस पॉइंट बढ़ाकर 5.50% किया जा सकता है।

इस बार की पॉलिसी पर क्या है दिग्गजों की राय?

बॉम्बे चार्टर्ड अकाउंटेंट्स सोसाइटी की अध्यक्ष सीए किंजल शाह के मुताबिक, ‘खुदरा महंगाई बढ़ने, ऊर्जा की ऊंची लागत और वैश्विक स्तर पर मौद्रिक सख्ती के बीच रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी कर इसे 5.50% किए जाने की व्यापक उम्मीद है। हालांकि, केवल दरों का फैसला ही पर्याप्त नहीं होगा। महंगाई की उम्मीदों को नियंत्रित रखने और घरेलू आर्थिक वृद्धि को बनाए रखते हुए कर्ज की उपलब्धता जारी रखने के लिए तरलता और भविष्य में ब्याज दरों की दिशा पर आरबीआई की स्पष्ट स्थिति भी बेहद महत्वपूर्ण होगी।’

बॉम्बे चार्टर्ड अकाउंटेंट्स सोसाइटी के उपाध्यक्ष सीए मंदार तेलंग ने कहा कि, ‘अब समय आ गया है कि सरकार केवल प्रक्रियाओं में छोटे-मोटे बदलाव करने के बजाय GST प्रशासन से जुड़े कुछ बुनियादी और संरचनात्मक मुद्दों पर भी ध्यान दे। केवल इस वजह से इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) नहीं रोका जाना चाहिए कि सप्लायर या प्राप्तकर्ता ने रिटर्न दाखिल करते समय कोई वास्तविक क्लेरिकल, गणना संबंधी या प्रक्रियात्मक गलती कर दी हो, खासकर तब जब लेन-देन वास्तविक हो। सरकार को कई राज्यों में काम करने वाली कंपनियों के लिए वास्तविक केंद्रीकृत GST पंजीकरण और अनयूज्ड ITC को आपस में ट्रांसफर करने की सुविधा देनी चाहिए। 180 दिनों में भुगतान की शर्त और MSMEs के लिए पेमेंट बेसिस टैक्स जैसे व्यावहारिक सुधारों से अनावश्यक मुकदमेबाजी कम होगी और कारोबारियों की वर्किंग कैपिटल पर दबाव घटेगा।’

कब और कहां देखें लाइव प्रसारण?

तारीख और समय: 7 अक्टूबर 2026, सुबह 10:00 बजे (पॉलिसी ऐलान) एवं दोपहर में प्रेस कॉन्फ्रेंस।

कहां देखें: आरबीआई के आधिकारिक यूट्यूब चैनल (YouTube Channel) और hindi.moneycontrol.com पर लाइव अपडेट्स।

कम होगी EMI या बढ़ेगा FDs पर ब्याज? जानिए 7 अक्टूबर को RBI के फैसले से आपकी जेब पर क्या असर पड़ेगा

‘पूजा मेरी जान’: मर्दों को ‘ना’ सुनना कब आएगा?

‘पूजा मेरी जान’ का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है। और शायद इसी वजह से यह फ़िल्म अपने विषय के कारण आज के समय में और भी प्रासंगिक हो जाती है। यह एक मनोवैज्ञानिक थ्रिलर है। यह दोस्ती, प्रेम, अस्वीकृति और जुनून की कहानी भी है। लेकिन इन तमाम परतों के नीचे इसकी असली कहानी पुरुष अहंकार और अस्वीकृति के बीच की उस खतरनाक दूरी की है, जिसे हमारा समाज अक्सर प्रेम समझने की भूल करता रहा है।

सिने-सोहबत

प्रेम में असफल होना एक निजी त्रासदी हो सकती है। लेकिन अस्वीकृति को स्वीकार न कर पाना जब अधिकार, बदला, हिंसा और सामाजिक दबाव में बदल जाए, तब वह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं रह जाती। नवजोत गुलाटी और सह निर्देशक विपाशा अरविंद की ‘पूजा मेरी जान’ इसी असहज सच को अदालत के कटघरे में खड़ा करती है।

हमारे समाज में लड़कों को प्रेम करना सिखाया जाता है, लेकिन प्रेम में असफल होना नहीं। उन्हें लड़की को पसंद करना सिखाया जाता है, उसके लिए लड़ना सिखाया जाता है, उसे पाने की कोशिश करना सिखाया जाता है। फ़िल्मों ने तो कई दशकों तक यह भी सिखाया कि लड़की की ‘ना’ के पीछे कहीं न कहीं ‘हां’ छिपी होती है। लेकिन बहुत कम कहानियों ने यह पूछा कि जब लड़की सचमुच ‘ना’ कह दे, तब लड़का क्या करता है?

‘पूजा मेरी जान’ का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है। और शायद इसी वजह से यह फ़िल्म अपने विषय के कारण आज के समय में और भी प्रासंगिक हो जाती है।

यह एक अपराध-कथा है। यह एक मनोवैज्ञानिक थ्रिलर है। यह एक कोर्ट रूम ड्रामा है। यह दोस्ती, प्रेम, अस्वीकृति और जुनून की कहानी भी है। लेकिन इन तमाम परतों के नीचे इसकी असली कहानी पुरुष अहंकार और अस्वीकृति के बीच की उस खतरनाक दूरी की है, जिसे हमारा समाज अक्सर प्रेम समझने की भूल करता रहा है।

फ़िल्म की शुरुआत ‘रोमियो एंड जूलियट’ से होती है। मंच पर प्रेम का शेक्सपियरी आदर्श है और मंच के बाहर एक ऐसा प्रेम, जो अस्वीकृति के बाद त्रासदी में बदल जाता है। पूजा यानी मृणाल ठाकुर जब अनिकेत यानी विक्रम सिंह चौहान के प्रेम प्रस्ताव को ठुकराती है, तो कहानी अचानक उस जगह पहुंच जाती है जहां प्रेम, अधिकार और अपराध के बीच की सीमाएं धुंधली होने लगती हैं।

अनिकेत की आत्महत्या के बाद सवाल केवल यह नहीं रह जाता कि उसकी मौत के लिए कौन ज़िम्मेदार है। सवाल यह बन जाता है कि क्या किसी महिला का किसी पुरुष को अस्वीकार करना उसके जीवन की ज़िम्मेदारी भी उसके सिर डाल देता है? यहीं ‘पूजा मेरी जान’ अपनी सबसे मज़बूत  ज़मीन तलाशती है।

विषय की तीव्रता के स्तर पर यह फ़िल्म ‘पिंक’ की याद दिलाती है। दोनों फ़िल्मों की कहानी एक नहीं है, उनका उपचार भी एक जैसा नहीं है। लेकिन दोनों एक बेहद ज़रूरी सामाजिक मिथक से टकराती हैं: “महिला की इच्छा और उसकी ‘ना’ का सम्मान।”

‘पिंक’ ने पूछा था- क्या ‘ना’ का मतलब ‘ना’ है?

‘पूजा मेरी जान’ उससे एक कदम आगे जाकर पूछती है- जब पुरुष उस ‘ना’ को सुनता है, तब उसके भीतर क्या होता है? क्या वह उसे स्वीकार करता है? क्या वह खुद को संभालता है? या फिर वह अस्वीकृति को अपना अपमान मान लेता है?

आज जब लड़कियां और महिलाएं अलग-अलग मंचों पर अपने अनुभव साझा कर रही हैं, सीमाओं, सहमति, पीछा किए जाने, भावनात्मक दबाव और पुरुषवादी व्यवहार के खिलाफ आवाज़ उठा रही हैं, तब ‘पूजा मेरी जान’ का विषय महज सिनेमाई विषय नहीं रह जाता। यह उस सामाजिक बातचीत का हिस्सा बन जाता है जो हमारे घरों, कॉलेजों, दफ्तरों और डिजिटल दुनिया में लगातार चल रही है।

और फ़िल्म की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि वह पुरुष को केवल खलनायक बनाकर संतुष्ट नहीं होती। वह उस मानसिकता की पड़ताल करने की कोशिश करती है, जिसने पीढ़ियों से पुरुष को यह विश्वास दिलाया है कि प्रेम में उसका अधिकार है।

मृणाल ठाकुर ने पूजा को केवल ‘पीड़ित लड़की’ की तरह नहीं निभाया है। उनके अभिनय में डर है, उलझन है, गुस्सा है और सबसे महत्वपूर्ण अपनी कहानी खुद कहने की कोशिश है। पूजा की मुश्किल सिर्फ़ यह नहीं है कि उसके साथ कुछ गलत हुआ है। उसकी मुश्किल यह भी है कि उसे लगातार यह साबित करना पड़ रहा है कि उसने कुछ गलत नहीं किया।

यही वह बिंदु है जहां फ़िल्म का कोर्टरूम ड्रामा असर पैदा करता है। अदालत में सवाल कानून के होते हैं, लेकिन कटघरे में खड़ी महिला को अक्सर अपने चरित्र का हिसाब देना पड़ता है। समाज की अदालत उससे भी पहले अपना फैसला सुना चुकी होती है।

हुमा कुरैशी की सना इस पूरी कहानी में एक ज़रूरी संतुलन लेकर आती हैं। वह वकील हैं, लेकिन केवल कानूनी प्रतिनिधि नहीं। वह दोस्त भी हैं, गवाह भी, और इस कहानी की भावनात्मक धुरी भी। हुमा ने सना को जिस सहजता से निभाया है, वह फ़िल्म को भाषण बनने से बचाती है।

विक्रम सिंह चौहान के लिए अनिकेत एक मुश्किल किरदार है। उसे सिर्फ ‘ऑब्सेसिव लवर’ बनाना आसान होता। लेकिन उसके भीतर मौजूद प्रेम, चोट, अपेक्षा और अधिकार-बोध को साथ लेकर चलना ज्यादा चुनौतीपूर्ण है। फ़िल्म इसी विरोधाभास से अपना तनाव पैदा करती है।

विजय राज़ अपनी विशिष्ट उपस्थिति के साथ कहानी को एक अलग ऊर्जा देते हैं। राजेश जैस, चैतन्य व्यास और बाकी कलाकार भी उस दुनिया को विश्वसनीय बनाने में योगदान करते हैं। फ़िल्म के छोटे-बड़े किरदार मिलकर उस सामाजिक वातावरण का निर्माण करते हैं जिसमें यह त्रासदी संभव होती है।

नवजोत गुलाटी और कनिष्क के लेखन तथा निरेन भट्ट के अडिशनल स्क्रीनप्ले  और संवादों का श्रेय यहां खास तौर पर उल्लेखनीय है क्योंकि ऐसी कहानी लिखना आसान नहीं है।

एक तरफ दर्शक को थ्रिलर का रोमांच चाहिए। दूसरी तरफ विषय इतना संवेदनशील है कि मनोरंजन के नाम पर उसकी गंभीरता कम नहीं की जा सकती।

‘पूजा मेरी जान’ कई जगहों पर इस संतुलन साधती है और कहानी को आगे बढ़ाने के लिए रहस्य का इस्तेमाल करती है। इसके केंद्र में जो सवाल है, वह हर नए खुलासे के साथ थोड़ा और असहज होता जाता है।

फ़िल्म हमें यह भी याद दिलाती है कि पॉपुलर कल्चर ने प्रेम के नाम पर कितने खतरनाक व्यवहारों को सामान्य बनाया है। ‘एकतरफा प्यार’ को महान बना देना।

पीछा करने को रोमांस बना देना। ज़िद को समर्पण कहना। अस्वीकृति को चुनौती मान लेना। और अंततः पुरुष के दुख को इतना बड़ा बना देना कि महिला की स्वतंत्र इच्छा उसके सामने छोटी लगने लगे। यहीं ‘पूजा मेरी जान’ की आवाज़ सबसे ऊंची सुनाई देती है।

और फिर आती है अदालत। फ़िल्म का कोर्ट रूम वाला हिस्सा केवल कहानी को कानूनी दिशा देने के लिए नहीं है। अदालत यहां एक रूपक भी है। कानून के सामने एक मामला है। समाज के सामने एक महिला है। और दर्शक के सामने एक सवाल कि क्या हम वास्तव में ‘ना’ को स्वीकार करना सीख चुके हैं? या केवल यह दावा करना सीख गए हैं कि हम सीख चुके हैं? यह फ़र्क़ बहुत बड़ा है।

नवजोत गुलाटी ने एक कठिन विषय को मुख्यधारा के कथानक में पिरोने की कोशिश की है और विपाशा अरविंद के सह निर्देशन ने इस दृष्टि को पूरा करने में योगदान दिया है। फ़िल्म की मूल ताकत उसका विषय है, लेकिन उसे दर्शक तक पहुंचाने के लिए निर्देशन को रहस्य, भावना और सामाजिक टिप्पणी के बीच संतुलन बनाना पड़ा है।

निर्देशक का सबसे महत्वपूर्ण निर्णय यह है कि फ़िल्म सवाल को दर्शक के सामने छोड़ती है। वह आपको केवल यह नहीं बताती कि किसे सही मानना है। वह आपको उस मानसिकता के सामने बैठाती है, जिसने पूरी परिस्थिति को जन्म दिया। और शायद यही वजह है कि फ़िल्म खत्म होने के बाद भी इसका सबसे महत्वपूर्ण संवाद आपके भीतर चलता रहता है कि किसी को प्यार करने का अधिकार है।
लेकिन किसी पर अपना प्यार स्वीकार करने की ज़िम्मेदारी नहीं थोपी जा सकती।

‘पूजा मेरी जान’ की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यह प्रेम को अपराध नहीं बनाती। यह असफल प्रेम को भी अपराध नहीं बनाती। यह केवल उस क्षण पर सवाल उठाती है जब प्रेम अधिकार में बदल जाता है और अस्वीकृति अपमान में।

यहीं से हिंसा की शुरुआत हो सकती है। यहीं से पीछा करना शुरू हो सकता है। यहीं से भावनात्मक दबाव पैदा हो सकता है। और कभी-कभी यहीं से एक ऐसी त्रासदी जन्म ले सकती है जिसका बोझ किसी निर्दोष व्यक्ति पर डाल दिया जाता है। फ़िल्म का शीर्षक भले ही प्रेम की भाषा में हो, ‘पूजा मेरी जान’, लेकिन इसकी आत्मा दरअसल एक बहुत कठोर वाक्य में छिपी है: तुम मेरी जान हो सकते हो, लेकिन तुम मेरी मिल्कियत नहीं हो। और शायद आज के समय में इस वाक्य को सुनना, समझना और स्वीकार करना सबसे ज़रुरी है।

‘पूजा मेरी जान’ हर मायने में परिपूर्ण फ़िल्म होने का दावा नहीं करती। लेकिन एक ऐसे विषय को लोकप्रिय सिनेमा के भीतर लाने की कोशिश जरूर करती है जिस पर बात करना ज़रूरी है। क्योंकि लड़कियों को ‘ना’ कहना सीखने की जितनी ज़रुरत है, उससे कहीं ज्यादा ज़रुरत शायद लड़कों को ‘ना’ सुनना सीखने की है। और जब तक यह सीख हमारे समाज में सामान्य व्यवहार का हिस्सा नहीं बनती, तब तक ऐसी कहानियां ज़रूरी रहेंगी।

‘पिंक’ ने हमें बताया था कि ‘ना’ का अर्थ ‘ना’ है। ‘पूजा मेरी जान’ हमें याद दिलाती है कि उस ‘ना’ के बाद क्या करना है, यह सीखना भी उतना ही ज़रूरी है। ज़ी 5 पर है। देख लीजिएगा। (पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार और यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़” के होस्ट हैं।)