‘पूजा मेरी जान’: मर्दों को ‘ना’ सुनना कब आएगा?

‘पूजा मेरी जान’ का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है। और शायद इसी वजह से यह फ़िल्म अपने विषय के कारण आज के समय में और भी प्रासंगिक हो जाती है। यह एक मनोवैज्ञानिक थ्रिलर है। यह दोस्ती, प्रेम, अस्वीकृति और जुनून की कहानी भी है। लेकिन इन तमाम परतों के नीचे इसकी असली कहानी पुरुष अहंकार और अस्वीकृति के बीच की उस खतरनाक दूरी की है, जिसे हमारा समाज अक्सर प्रेम समझने की भूल करता रहा है।

सिने-सोहबत

प्रेम में असफल होना एक निजी त्रासदी हो सकती है। लेकिन अस्वीकृति को स्वीकार न कर पाना जब अधिकार, बदला, हिंसा और सामाजिक दबाव में बदल जाए, तब वह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं रह जाती। नवजोत गुलाटी और सह निर्देशक विपाशा अरविंद की ‘पूजा मेरी जान’ इसी असहज सच को अदालत के कटघरे में खड़ा करती है।

हमारे समाज में लड़कों को प्रेम करना सिखाया जाता है, लेकिन प्रेम में असफल होना नहीं। उन्हें लड़की को पसंद करना सिखाया जाता है, उसके लिए लड़ना सिखाया जाता है, उसे पाने की कोशिश करना सिखाया जाता है। फ़िल्मों ने तो कई दशकों तक यह भी सिखाया कि लड़की की ‘ना’ के पीछे कहीं न कहीं ‘हां’ छिपी होती है। लेकिन बहुत कम कहानियों ने यह पूछा कि जब लड़की सचमुच ‘ना’ कह दे, तब लड़का क्या करता है?

‘पूजा मेरी जान’ का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है। और शायद इसी वजह से यह फ़िल्म अपने विषय के कारण आज के समय में और भी प्रासंगिक हो जाती है।

यह एक अपराध-कथा है। यह एक मनोवैज्ञानिक थ्रिलर है। यह एक कोर्ट रूम ड्रामा है। यह दोस्ती, प्रेम, अस्वीकृति और जुनून की कहानी भी है। लेकिन इन तमाम परतों के नीचे इसकी असली कहानी पुरुष अहंकार और अस्वीकृति के बीच की उस खतरनाक दूरी की है, जिसे हमारा समाज अक्सर प्रेम समझने की भूल करता रहा है।

फ़िल्म की शुरुआत ‘रोमियो एंड जूलियट’ से होती है। मंच पर प्रेम का शेक्सपियरी आदर्श है और मंच के बाहर एक ऐसा प्रेम, जो अस्वीकृति के बाद त्रासदी में बदल जाता है। पूजा यानी मृणाल ठाकुर जब अनिकेत यानी विक्रम सिंह चौहान के प्रेम प्रस्ताव को ठुकराती है, तो कहानी अचानक उस जगह पहुंच जाती है जहां प्रेम, अधिकार और अपराध के बीच की सीमाएं धुंधली होने लगती हैं।

अनिकेत की आत्महत्या के बाद सवाल केवल यह नहीं रह जाता कि उसकी मौत के लिए कौन ज़िम्मेदार है। सवाल यह बन जाता है कि क्या किसी महिला का किसी पुरुष को अस्वीकार करना उसके जीवन की ज़िम्मेदारी भी उसके सिर डाल देता है? यहीं ‘पूजा मेरी जान’ अपनी सबसे मज़बूत  ज़मीन तलाशती है।

विषय की तीव्रता के स्तर पर यह फ़िल्म ‘पिंक’ की याद दिलाती है। दोनों फ़िल्मों की कहानी एक नहीं है, उनका उपचार भी एक जैसा नहीं है। लेकिन दोनों एक बेहद ज़रूरी सामाजिक मिथक से टकराती हैं: “महिला की इच्छा और उसकी ‘ना’ का सम्मान।”

‘पिंक’ ने पूछा था- क्या ‘ना’ का मतलब ‘ना’ है?

‘पूजा मेरी जान’ उससे एक कदम आगे जाकर पूछती है- जब पुरुष उस ‘ना’ को सुनता है, तब उसके भीतर क्या होता है? क्या वह उसे स्वीकार करता है? क्या वह खुद को संभालता है? या फिर वह अस्वीकृति को अपना अपमान मान लेता है?

आज जब लड़कियां और महिलाएं अलग-अलग मंचों पर अपने अनुभव साझा कर रही हैं, सीमाओं, सहमति, पीछा किए जाने, भावनात्मक दबाव और पुरुषवादी व्यवहार के खिलाफ आवाज़ उठा रही हैं, तब ‘पूजा मेरी जान’ का विषय महज सिनेमाई विषय नहीं रह जाता। यह उस सामाजिक बातचीत का हिस्सा बन जाता है जो हमारे घरों, कॉलेजों, दफ्तरों और डिजिटल दुनिया में लगातार चल रही है।

और फ़िल्म की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि वह पुरुष को केवल खलनायक बनाकर संतुष्ट नहीं होती। वह उस मानसिकता की पड़ताल करने की कोशिश करती है, जिसने पीढ़ियों से पुरुष को यह विश्वास दिलाया है कि प्रेम में उसका अधिकार है।

मृणाल ठाकुर ने पूजा को केवल ‘पीड़ित लड़की’ की तरह नहीं निभाया है। उनके अभिनय में डर है, उलझन है, गुस्सा है और सबसे महत्वपूर्ण अपनी कहानी खुद कहने की कोशिश है। पूजा की मुश्किल सिर्फ़ यह नहीं है कि उसके साथ कुछ गलत हुआ है। उसकी मुश्किल यह भी है कि उसे लगातार यह साबित करना पड़ रहा है कि उसने कुछ गलत नहीं किया।

यही वह बिंदु है जहां फ़िल्म का कोर्टरूम ड्रामा असर पैदा करता है। अदालत में सवाल कानून के होते हैं, लेकिन कटघरे में खड़ी महिला को अक्सर अपने चरित्र का हिसाब देना पड़ता है। समाज की अदालत उससे भी पहले अपना फैसला सुना चुकी होती है।

हुमा कुरैशी की सना इस पूरी कहानी में एक ज़रूरी संतुलन लेकर आती हैं। वह वकील हैं, लेकिन केवल कानूनी प्रतिनिधि नहीं। वह दोस्त भी हैं, गवाह भी, और इस कहानी की भावनात्मक धुरी भी। हुमा ने सना को जिस सहजता से निभाया है, वह फ़िल्म को भाषण बनने से बचाती है।

विक्रम सिंह चौहान के लिए अनिकेत एक मुश्किल किरदार है। उसे सिर्फ ‘ऑब्सेसिव लवर’ बनाना आसान होता। लेकिन उसके भीतर मौजूद प्रेम, चोट, अपेक्षा और अधिकार-बोध को साथ लेकर चलना ज्यादा चुनौतीपूर्ण है। फ़िल्म इसी विरोधाभास से अपना तनाव पैदा करती है।

विजय राज़ अपनी विशिष्ट उपस्थिति के साथ कहानी को एक अलग ऊर्जा देते हैं। राजेश जैस, चैतन्य व्यास और बाकी कलाकार भी उस दुनिया को विश्वसनीय बनाने में योगदान करते हैं। फ़िल्म के छोटे-बड़े किरदार मिलकर उस सामाजिक वातावरण का निर्माण करते हैं जिसमें यह त्रासदी संभव होती है।

नवजोत गुलाटी और कनिष्क के लेखन तथा निरेन भट्ट के अडिशनल स्क्रीनप्ले  और संवादों का श्रेय यहां खास तौर पर उल्लेखनीय है क्योंकि ऐसी कहानी लिखना आसान नहीं है।

एक तरफ दर्शक को थ्रिलर का रोमांच चाहिए। दूसरी तरफ विषय इतना संवेदनशील है कि मनोरंजन के नाम पर उसकी गंभीरता कम नहीं की जा सकती।

‘पूजा मेरी जान’ कई जगहों पर इस संतुलन साधती है और कहानी को आगे बढ़ाने के लिए रहस्य का इस्तेमाल करती है। इसके केंद्र में जो सवाल है, वह हर नए खुलासे के साथ थोड़ा और असहज होता जाता है।

फ़िल्म हमें यह भी याद दिलाती है कि पॉपुलर कल्चर ने प्रेम के नाम पर कितने खतरनाक व्यवहारों को सामान्य बनाया है। ‘एकतरफा प्यार’ को महान बना देना।

पीछा करने को रोमांस बना देना। ज़िद को समर्पण कहना। अस्वीकृति को चुनौती मान लेना। और अंततः पुरुष के दुख को इतना बड़ा बना देना कि महिला की स्वतंत्र इच्छा उसके सामने छोटी लगने लगे। यहीं ‘पूजा मेरी जान’ की आवाज़ सबसे ऊंची सुनाई देती है।

और फिर आती है अदालत। फ़िल्म का कोर्ट रूम वाला हिस्सा केवल कहानी को कानूनी दिशा देने के लिए नहीं है। अदालत यहां एक रूपक भी है। कानून के सामने एक मामला है। समाज के सामने एक महिला है। और दर्शक के सामने एक सवाल कि क्या हम वास्तव में ‘ना’ को स्वीकार करना सीख चुके हैं? या केवल यह दावा करना सीख गए हैं कि हम सीख चुके हैं? यह फ़र्क़ बहुत बड़ा है।

नवजोत गुलाटी ने एक कठिन विषय को मुख्यधारा के कथानक में पिरोने की कोशिश की है और विपाशा अरविंद के सह निर्देशन ने इस दृष्टि को पूरा करने में योगदान दिया है। फ़िल्म की मूल ताकत उसका विषय है, लेकिन उसे दर्शक तक पहुंचाने के लिए निर्देशन को रहस्य, भावना और सामाजिक टिप्पणी के बीच संतुलन बनाना पड़ा है।

निर्देशक का सबसे महत्वपूर्ण निर्णय यह है कि फ़िल्म सवाल को दर्शक के सामने छोड़ती है। वह आपको केवल यह नहीं बताती कि किसे सही मानना है। वह आपको उस मानसिकता के सामने बैठाती है, जिसने पूरी परिस्थिति को जन्म दिया। और शायद यही वजह है कि फ़िल्म खत्म होने के बाद भी इसका सबसे महत्वपूर्ण संवाद आपके भीतर चलता रहता है कि किसी को प्यार करने का अधिकार है।
लेकिन किसी पर अपना प्यार स्वीकार करने की ज़िम्मेदारी नहीं थोपी जा सकती।

‘पूजा मेरी जान’ की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यह प्रेम को अपराध नहीं बनाती। यह असफल प्रेम को भी अपराध नहीं बनाती। यह केवल उस क्षण पर सवाल उठाती है जब प्रेम अधिकार में बदल जाता है और अस्वीकृति अपमान में।

यहीं से हिंसा की शुरुआत हो सकती है। यहीं से पीछा करना शुरू हो सकता है। यहीं से भावनात्मक दबाव पैदा हो सकता है। और कभी-कभी यहीं से एक ऐसी त्रासदी जन्म ले सकती है जिसका बोझ किसी निर्दोष व्यक्ति पर डाल दिया जाता है। फ़िल्म का शीर्षक भले ही प्रेम की भाषा में हो, ‘पूजा मेरी जान’, लेकिन इसकी आत्मा दरअसल एक बहुत कठोर वाक्य में छिपी है: तुम मेरी जान हो सकते हो, लेकिन तुम मेरी मिल्कियत नहीं हो। और शायद आज के समय में इस वाक्य को सुनना, समझना और स्वीकार करना सबसे ज़रुरी है।

‘पूजा मेरी जान’ हर मायने में परिपूर्ण फ़िल्म होने का दावा नहीं करती। लेकिन एक ऐसे विषय को लोकप्रिय सिनेमा के भीतर लाने की कोशिश जरूर करती है जिस पर बात करना ज़रूरी है। क्योंकि लड़कियों को ‘ना’ कहना सीखने की जितनी ज़रुरत है, उससे कहीं ज्यादा ज़रुरत शायद लड़कों को ‘ना’ सुनना सीखने की है। और जब तक यह सीख हमारे समाज में सामान्य व्यवहार का हिस्सा नहीं बनती, तब तक ऐसी कहानियां ज़रूरी रहेंगी।

‘पिंक’ ने हमें बताया था कि ‘ना’ का अर्थ ‘ना’ है। ‘पूजा मेरी जान’ हमें याद दिलाती है कि उस ‘ना’ के बाद क्या करना है, यह सीखना भी उतना ही ज़रूरी है। ज़ी 5 पर है। देख लीजिएगा। (पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार और यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़” के होस्ट हैं।)

इजराइली PM बोले- भारतीय पायलट की बहादुरी को सलाम:वह असली हीरो, 174 लोगों की जान बचाई; चाकू हमले के बावजूद विमान क्रैश रोका

इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने विमान क्रैश रोकने वाले भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मच्छार की बहादुरी की तारीफ की है। नेतन्याहू ने X पर पोस्ट में लिखा कि गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद मच्छार ने हमलावर का सामना किया। वह सच्चे हीरो हैं। इजरायली PM ने कहा- कैप्टन स्मित ने कॉकपिट का दरवाजा खोलने में मदद की, जिससे यात्रियों और क्रू ने हमलावर को काबू कर लिया। कैप्टन की वजह से 174 लोगों की जान बची। इनमें इजरायली नागरिकों के साथ दूसरे देशों के लोग भी शामिल थे। दरअसल, बुधवार को दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लायदुबई की फ्लाइट FZ1073 में उड़ान के दौरान भारतीय पायलट स्मित पर उनके को-पायलट ने चाकू से हमला कर दिया। फिर विमान का कंट्रोल हाथ में लेकर इसे क्रैश कराने की कोशिश की। लेकिन, पायलट स्मित ने हार नहीं मानी और संघर्ष करते हुए साजिश को नाकाम कर दिया। ट्रम्प बोले- प्लंबर ने भी बचाई लोगों की जान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी भारतीय पायलट स्मित मच्छार की तारीफ की। उन्होंने कहा- घायल होने के बावजूद कैप्टन ने कॉकपिट का दरवाजा खोला और मदद के लिए आवाज लगाई। इके बाद एक यात्री भी कॉकपिट में पहुंचा। ट्रम्प के मुताबिक, वह पेशे से प्लंबर था और उसने कभी विमान नहीं उड़ाया था। यात्री ने को-पायलट को सीट से खींचकर पीछे किया। इसके बाद दूसरे यात्रियों ने मिलकर उसे काबू किया। ट्रम्प ने बताया कि इस यात्री ने टीवी शो ‘एयर डिजास्टर्स’ देखकर विमान उड़ाने की कुछ बातें सीखी थीं। हालांकि, ट्रम्प ने कहा कि उन्हें यह जानकारी नेतन्याहू और कुछ अन्य सूत्रों से मिली है। उन्होंने कहा कि वह इन बातों की खुद पुष्टि नहीं कर सकते। चाकूबाजी से पहले दोनों पायलटों में हाथापाई हुई थी फ्लाईदुबई की फ्लाइट में यह घटना बुधवार सुबह करीब 9 बजे हुई। विमान में 174 यात्री सवार थे, जिनमें 27 बच्चे शामिल थे। ज्यादातर इजराइली पैसेंजर्स थे। रिपोर्टों के मुताबिक, हमले से पहले दोनों पायलटों के बीच हाथापाई हुई थी। इसके बाद को-पायलट ने कैप्टन स्मित पर चाकू से हमला किया। इस दौरान विमान करीब 34 हजार फीट की ऊंचाई से अचानक 17 हजार फीट नीचे आ गया। एक यात्री और क्रू मेंबर किसी तरह कॉकपिट तक पहुंचने में कामयाब हुए। इसके बाद दूसरे क्रू मेंबर भी कॉकपिट में पहुंचे और विमान की सुरक्षित सऊदी अरब के तबुक एयरपोर्ट पर इमरजेंसी लैंडिंग कराई। हालांकि, यह अभी साफ नहीं है कि यात्री और क्रू मेंबर फ्लायदुबई के कॉकपिट में कैसे घुसे, क्योंकि कॉकपिट के दरवाजे जबरन खोलने की कोशिशों को रोकने के लिए मजबूत बनाए जाते हैं। आमतौर पर उड़ान के दौरान कॉकपिट का दरवाजा सुरक्षा कारणों से लॉक रहता है। 11 सितंबर 2001 के आतंकी हमलों के बाद यह विमान सुरक्षा का नियम बन गया। दोनों पायलट घायल, कैप्टन स्मित की हालत स्थिर एयरपोर्ट अधिकारियों के मुताबिक, दोनों पायलट घायल हुए और उन्हें अस्पताल ले जाया गया। कैप्टन स्मित की हालत स्थिर बताई जा रही है। घटना के कई वीडियो भी सामने आए हैं। एक वीडियो में विमान तेजी से हिलता दिखा। वहीं दूसरे वीडियो में हमलावर पर काबू पाने के बाद विमान में बैठे पैसेंजर्स ताली बजाकर खुशी मनाते दिखे। इजराइली अधिकारियों ने बताया कि जिस साथी पायलट ने स्मित पर हमला किया, वह ओमान का नागरिक था। इजराइल के एक सीनियर अधिकारी ने कहा कि पायलट की हिम्मत ने बड़ी घटना टाल दी। वरना 2001 में हुए अमेरिका के 9/11 जैसी घटना हो सकती थी। इजराइली डेंटिस्ट ने कैप्टन स्मित की मदद की विमान में सवार यात्रियों को कुछ देर के लिए लगा कि वे जिंदा नहीं बचेंगे। एक यात्री ने AFP को बताया कि, “सभी को लगा कि अब हम मरने वाले हैं।” विमान में मौजूद कुछ लोगों ने भी सूझबूझ दिखाई, जिससे बड़ा हादसा टल गया। विमान में सिविल ड्रेस में 2 रिलीफ पायलट मौजूद थे जिन्होंने बाद में प्लेन को संभाला। जबकि यात्रियों ने हमलावर को कॉकपिट से दूर करने में मदद की। वहीं कैप्टन स्मित की मदद विमान में मौजूद एक डेंटिस्ट ने की। उन्होंने घायल पायलट का विमान में ही इलाज किया और उनकी जान बचाई। स्पाइसजेट में 11 साल पायलट रह चुके हैं कैप्टन स्मित फ्लाईदुबई से पहले स्मित ने 11 साल से ज्यादा समय तक स्पाइसजेट में काम कर चुके हैं। यहां उन्होंने 9500 घंटे से ज्यादा उड़ान भरी। इनमें 6400 घंटे से ज्यादा समय विमान के मुख्य पायलट यानी पायलट-इन-कमांड के तौर पर था। जून 2022 में उन्होंने फ्लाईदुबई जॉइन की थी। उनके लिंक्डइन प्रोफाइल के मुताबिक, उन्हें कमर्शियल विमान उड़ाने का 13 साल से ज्यादा का अनुभव है। उन्होंने बोइंग 737 विमानों पर करीब 9750 घंटे उड़ान भरी है। इसके अलावा वे पायलटों की ट्रेनिंग, उनकी जांच और उन्हें काम के दौरान गाइड करने का काम भी करते थे। पॉडकास्ट बताया- पढ़ाई के दौरान पायलट बनने का ख्याल आया पिछले साल अक्टूबर में कैप्टन स्मित ने CS जलक मेहता नाम के यूट्यूब चैनल के साथ पॉडकास्ट किया था। इस दौरान उन्होंने कहा, स्कूलिंग के बाद फैमिली बिजनेस संभालने के लिए मैंने मैनेजमेंट की पढ़ाई की। लेकिन इसी दौरान मैं एविएशन से जुड़े एक सेमिनार में गया, वहीं मैंने पहली बार पायलट बनने का सोचा। आगे उन्होंने बताया, ‘मेरी पहली कमर्शियल फ्लाइट बेंगलुरु से दिल्ली के लिए थी।’ 10 पॉइंट्स में जानिए विमान में क्या-क्या हुआ ———————- यह खबर भी पढ़ें… इजराइल जा रही फ्लाइट क्रैश कराने की कोशिश: पायलट को चाकू मारा, 17 हजार फीट नीचे आया विमान; फाइटर जेट की निगरानी में इमरजेंसी लैंडिंग दुबई से तेल अवीव जा रही एक फ्लाइट को हाईजैक कर क्रैश कराने की कोशिश हुई। पूरी खबर पढ़ें…

भारतीय पायलट ने विमान क्रैश होने से बचाया:चाकू मार रहे हमलावर से लड़े, 180 पैसेंजर्स सवार थे; इजराइल बोला- 9/11 जैसे हमले की साजिश थी

दुबई से इजराइल जा रही फ्लाइट को हाईजैक कर क्रैश कराने की कोशिश हुई। इस दौरान जिस पायलट ने अपने को-पायलेट से लड़कर ऐसा होने से रोका वह भारतीय मूल का है। कैप्टन स्मित मच्छर कॉकपिट में हुई झड़प के दौरान घायल हो गए। ओमानी मूल के को-पायलट ने उन्हें चाकू मारा और प्लेन को क्रैश कराने में लग गए। लेकिन कैप्टन स्मित और यात्रियों ने उन्हें रोक लिया। इसके बाद प्लेन की सफल इमरजैंसी लैंडिग हुई। इस दौरान फ्लाइट में 180 यात्री सवार थे। इजराइल के एक सीनियर अधिकारी ने कहा कि बहुत बड़ी अनहोनी होने से बच गई। अगर पायलट पर समय रहते काबू नहीं पाया होता तो यह 2001 में हुए अमेरिका के 9/11 जैसी घटना हो सकती थी। स्पाइसजेट में 11 साल पायलट रह चूके है कैप्टन स्मित स्मित पहले स्पाइसजेट में पायलट थे। जून 2022 में उन्होंने फ्लाईदुबई जॉइन की थी। वे यहां डायरेक्ट-एंट्री कैप्टन के तौर पर शामिल हुए थे। उनके लिंक्डइन प्रोफाइल के मुताबिक, उन्हें कमर्शियल विमान उड़ाने का 13 साल से ज्यादा का अनुभव है। उन्होंने बोइंग 737 विमानों पर करीब 9750 घंटे उड़ान भरी है। फ्लाईदुबई से पहले स्मित ने 11 साल से ज्यादा समय तक स्पाइसजेट में काम किया। वहां वे सीनियर कमांडर और बाद में लाइन ट्रेनिंग कैप्टन रहे। स्पाइसजेट में उन्होंने 9500 घंटे से ज्यादा उड़ान भरी। इनमें 6400 घंटे से ज्यादा समय विमान के मुख्य पायलट यानी पायलट-इन-कमांड के तौर पर था। वे पायलटों की ट्रेनिंग, उनकी जांच और उन्हें काम के दौरान गाइड करने का काम भी करते थे। उनके प्रोफाइल में क्रू रिसोर्स मैनेजमेंट, फ्लाइट स्टैंडर्ड, नियमों का पालन और बोइंग 737 ऑपरेशन में उनकी विशेषज्ञता का भी जिक्र है। पॉडकास्ट में कैप्टन बोले- मैनेजमेंट की पढ़ाई के दौरान पायलट बनने का ख्याल आया पिछले साल अक्टूबर में कैप्टन स्मित ने CS जलक मेहता नाम के यूट्यूब चैनल के साथ पॉडकास्ट किया था। इस दौरान उन्होंने कहा, स्कूलिंग के बाद टेक्सटाइल इंजीनियरिंग कोर्स किया था फैमिली बिजनेस को संभालने के लिए, उसके बाद मैंने मैनेजमेंट की पढ़ाई की। लेकिन इसी दौरान मैं एविएशन से जुड़े एक सेमिनार में गया, वहीं मैंने पहली बार पायलट बनने का सोचा। आगे उन्होंने बताया, ‘मेरी पहली कमर्शियल फ्लाइट बेंगलुरु से दिल्ली के लिए थी। उस वक्त बोइंग मार्केट में सबसे बड़ा विमान था, मेरा सपना बोइंग विमान उड़ाना था।’ 10 पॉइंट्स में जानिए विमान में क्या-क्या हुआ ———————-

‘लस्ट स्टोरीज़ 3’: कामना के उस पार

सभी कहानियों को साथ रखिए तो एक दिलचस्प बात सामने आती है कि सेक्स इच्छा की शुरुआत नहीं है। इच्छा उससे बहुत पहले शुरू हो चुकी होती है। शायद यही वह बिंदु है, जहां ओशो की सोच प्रासंगिक हो जाती है। ओशो ने सेक्स को केवल दबाने या भोगने की वस्तु के रूप में देखने के बजाय उसके प्रति जागरूक होने की बात की। उनके लिए समस्या इच्छा का होना नहीं थी; समस्या यह थी कि मनुष्य या तो उससे लड़ता है या उसके पीछे बिना समझे भागता है।

पंकज दुबे

सेक्स के बारे में हमारी सबसे बड़ी दिक्कत शायद यह नहीं कि हम उसके बारे में कम जानते हैं। दिक्कत यह है कि हम उसके बारे में खुलकर सोचते भी कम हैं।

हमारे समाज में सेक्स या तो नैतिकता का विषय रहा है, या अपराध बोध का, या फिर चुपचाप उपभोग की जाने वाली चीज़। प्रेम पर कविता लिखी जा सकती है, विरह पर गीत बनाया जा सकता है, लेकिन इच्छा पर बात आते ही भाषा धीमी पड़ जाती है। इसलिए ‘लस्ट स्टोरीज़ 3’ को सिर्फ चार कामुक कहानियों की तरह देखना उसके साथ नाइंसाफी होगी।

विक्रमादित्य मोटवानी, किरण राव, शकुन बत्रा और विशाल भारद्वाज की चार कहानियां दरअसल एक ही मानवीय इलाके में घूमती हैं कि ‘हम आखिर चाहते क्या हैं’? और उससे भी बड़ा सवाल कि हम जो चाहते हैं, क्या उसके बारे में अपने साथी से बात कर पाते हैं? यही वह जगह है जहां सेक्स धीरे-धीरे रिश्ते का विषय बन जाता है।

मोटवानी की कहानी में दो विवाहित स्त्रियां अपने वैवाहिक जीवन में आई ऊब को तोड़ने के लिए एक असामान्य रास्ता सोचती हैं। कहानी में हास्य है, लेकिन उसके पीछे एक गंभीर प्रश्न है, “क्या विवाह में साथ रहना अपने आप अंतरंग बने रहना भी है?”

विवाह की शुरुआत में दूसरा व्यक्ति रहस्य होता है। फिर वह परिचित होता है। फिर बहुत परिचित। और कभी-कभी इतना परिचित कि जिज्ञासा ही खत्म हो जाती है। शायद इच्छा का एक हिस्सा नवीनता नहीं, दूसरे को फिर से देखने की क्षमता है। मोटवानी की कहानी इसी खोई हुई दृष्टि को हल्के-फुल्के ढंग से पकड़ती है। खास बात यह है कि यहां स्त्री की कामना किसी पुरुष की इच्छा के जवाब में नहीं, अपने आप में मौजूद मानवीय इच्छा है। यह फ़र्क़ छोटा नहीं है।

किरण राव इस इच्छा को और भीतर ले जाती हैं। उनकी कहानी में आकर्षण सिर्फ़ उस व्यक्ति का नहीं है जो सामने मौजूद है; उसमें उस व्यक्ति की हमारी बनाई हुई कल्पना भी शामिल है। हम किसी को देखते हैं और फिर अपने मन में उसका एक संस्करण बना लेते हैं। कभी-कभी हम इंसान से नहीं, उसके बारे में अपनी कल्पना से आकर्षित होते हैं। यानी कामना की पहली मंज़िल शरीर नहीं बल्कि कल्पना है।

शकुन बत्रा के यहां यह कल्पना विवाह के टूटने के बाद भी शरीर में बनी रहती है। रिश्ता खत्म करने का फैसला हो चुका है, लेकिन आकर्षण पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।यह असुविधाजनक स्थिति इसलिए दिलचस्प है क्योंकि जीवन में भावनाएं अनुबंधों की तरह समाप्त नहीं होतीं। तलाक का कागज़ कह सकता है कि रिश्ता ख़त्म। शरीर शायद कहे, अभी नहीं। यहीं फ़िल्म सेक्स को एक ऐसी भाषा की तरह देखती है जो उस समय भी बोल सकती है जब शब्दों ने जवाब देना बंद कर दिया हो।

और विशाल भारद्वाज कामना को लगभग पूरी तरह मन के हवाले कर देते हैं। साहित्य, कल्पना, आवाज़ और स्मृति मिलकर एक ऐसा संसार बनाते हैं जहां इच्छा को किसी शारीरिक घटना की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।

सभी कहानियों को साथ रखिए तो एक दिलचस्प बात सामने आती है कि सेक्स इच्छा की शुरुआत नहीं है। इच्छा उससे बहुत पहले शुरू हो चुकी होती है। शायद यही वह बिंदु है, जहां ओशो की सोच प्रासंगिक हो जाती है। ओशो ने सेक्स को केवल दबाने या भोगने की वस्तु के रूप में देखने के बजाय उसके प्रति जागरूक होने की बात की। उनके लिए समस्या इच्छा का होना नहीं थी; समस्या यह थी कि मनुष्य या तो उससे लड़ता है या उसके पीछे बिना समझे भागता है। इस विचार को ‘लस्ट स्टोरीज़ 3’ पर रखें तो चारों कहानियां एक दिलचस्प नक्शा बनाती हैं।

कहीं इच्छा को विवाह की ऊब से मुक्ति चाहिए। कहीं वह कल्पना में अपना संसार बना रही है। कहीं रिश्ता खत्म हो चुका है, लेकिन शरीर पीछे छूट गया है।

कहीं साहित्य और कल्पना देह से पहले इच्छा को जगा रहे हैं। तो फिर सेक्स आखिर है क्या? शायद इसका उत्तर इतना सरल नहीं है। कभी वह सुख है। कभी रोमांच। कभी ये पुष्टि कि मैं अभी भी आकर्षक हूं। और कभी पलायन कि कुछ देर के लिए अपनी ज़िंदगी की दूसरी सारी परेशानियां भूल सकूं। और कभी-कभी वह उस अकेलेपन के खिलाफ मनुष्य का सबसे पुराना प्रतिरोध है, जिसे शब्दों में स्वीकार करना मुश्किल होता है। यहीं ओशो का ‘ध्यान’ वाला विचार महत्वपूर्ण हो जाता है।

यदि ध्यान का अर्थ पूरी तरह वर्तमान क्षण में होना है, तो अंतरंगता में भी ऐसी ही उपस्थिति की संभावना है। जब दो लोग सचमुच एक-दूसरे के साथ होते हैं, तब कुछ समय के लिए सामाजिक भूमिकाएं, चिंता, प्रदर्शन और आत्म-संदेह पीछे हट सकते हैं। लेकिन इसमें एक बड़ा फ़र्क़ है। सेक्स अपने आप ध्यान नहीं है। जागरूकता उसे एक अलग अनुभव बना सकती है। और जागरूकता का अर्थ है कि मैं सिर्फ़ अपनी इच्छा को नहीं देख रहा; मैं सामने वाले मनुष्य को भी देख रहा हूं।

यहीं से कामना और अंतरंगता अलग हो जाती हैं। कामना पूछती है, ‘मुझे क्या चाहिए?’ अंतरंगता पूछती है, ‘हम दोनों के बीच अभी क्या हो रहा है?’ यह फ़र्क़ विवाह के लिए शायद सबसे महत्वपूर्ण है। क्योंकि विवाह में सबसे बड़ा संकट हमेशा सेक्स की कमी नहीं होता। कभी-कभी संकट यह होता है कि हम अपने साथी के बारे में नई चीज़ें जानना बंद कर देते हैं। उसे देखकर हमें कुछ नया महसूस नहीं होता। उसकी चुप्पी पढ़ने की कोशिश नहीं करते। उसके बदलते शरीर को नहीं देखते। उसकी बदलती इच्छाओं के बारे में नहीं पूछते। हम व्यक्ति को उसकी भूमिका में बदल देते हैं मसलन पति, पत्नी, मां, पिता, कमाने वाला, घर संभालने वाला। और जिस दिन व्यक्ति की जगह भूमिका ले लेती है, उस दिन अंतरंगता धीरे-धीरे कम होने लगती है।

यहीं ‘लस्ट स्टोरीज़ 3’ अपने शीर्षक से कहीं बड़ा हो जाता है। यह सिर्फ ‘लस्ट’ की कहानी नहीं है। यह उस मनुष्य की कहानी है जो चाहा जाना चाहता है, देखा जाना चाहता है और अपने भीतर अभी भी जीवित किसी हिस्से को महसूस करना चाहता है। चारों फ़िल्मों में कामना के रूप अलग हैं, लेकिन उनकी जड़ में पहचान का प्रश्न है। क्या मैं अभी भी आकर्षक हूं? क्या कोई मुझे देखता है? क्या मेरे भीतर अभी भी कुछ ऐसा है जिसे कोई पाना चाहता है? क्या मैं अपने साथी को अब भी वैसे देख सकता हूं? और शायद सबसे कठिन सवाल कि ‘क्या मैं खुद को अब भी वैसे देख सकता हूं’?

यही वजह है कि फ़िल्म में सेक्स जितना दिखाई देता है, उससे कहीं ज्यादा अनुपस्थित चीज़ें महत्वपूर्ण हैं जैसे बातचीत, जिज्ञासा, असुरक्षा, कल्पना, स्मृति और वह भावनात्मक दूरी जिसे कोई शारीरिक निकटता हमेशा भर नहीं सकती।

 

सभी निर्देशक इन चीज़ों को अलग-अलग सुरों में छूते हैं। मोटवानी के यहां हास्य है, किरण राव के यहां भ्रम, शकुन बत्रा के यहां रिश्ते के टूटने की बेचैनी और विशाल भारद्वाज के यहां कल्पना का सम्मोहन।

इनमें कोई एक कहानी दूसरी पर निर्णायक रूप से भारी नहीं पड़ती; असली दिलचस्पी इन चार दृष्टियों को साथ देखने में है। क्योंकि तब ‘लस्ट’ एक शारीरिक शब्द नहीं रह जाता। वह एक मनोवैज्ञानिक शब्द बन जाता है। हम किस चीज़ के लिए तरस रहे हैं? और शायद इस सवाल का जवाब सेक्स से बहुत बड़ा है।

कभी हम स्पर्श के लिए तरसते हैं। कभी ध्यान के लिए। कभी स्वीकार किए जाने के लिए। कभी पुराने प्रेम में नई रोशनी के लिए। और कभी सिर्फ़ इस आश्वासन के लिए कि हमारी ज़िंदगी अभी पूरी तरह आदत नहीं बनी है।

इसलिए सेक्स की सबसे बड़ी ताकत शायद उसका चरम सुख नहीं, बल्कि उसकी क्षमता है कि कुछ देर के लिए वह हमें अपनी बनाई हुई दुनिया से बाहर निकाल सके। लेकिन विडंबना देखिए कि हम सेक्स का इस्तेमाल कभी-कभी अकेलेपन से बचने के लिए करते हैं, जबकि सच्ची अंतरंगता हमें अकेलेपन के कारण से सामना कराती है।

मेरे भीतर ऐसा क्या खाली है, जिसे मैं दूसरे की देह से भरना चाहता हूं? यह सवाल आसान नहीं है। शायद इसी कारण हम इसे पूछना भी नहीं चाहते।

‘लस्ट स्टोरीज़ 3’ की असली दिलचस्पी इसी असुविधा में है। यह हमें सेक्स के बारे में सोचने के बहाने रिश्तों के बारे में सोचने पर मजबूर करती है। और ओशो को संदर्भ में रखें तो शायद यात्रा कुछ ऐसी बनती है- दमन से मुक्ति तक। कामना से जागरूकता तक। शरीर से उपस्थिति तक। और उपस्थिति से अंतरंगता तक।

क्योंकि अंततः किसी रिश्ते का सबसे कामुक हिस्सा शायद शरीर नहीं होता। वह क्षण होता है जब सामने वाला मनुष्य आपको महसूस कराता है कि मैं तुम्हें देख रहा हूं।
तुम मेरे लिए अभी भी एक रहस्य हो।शायद प्रेम का भविष्य इसी छोटे-से रहस्य में छिपा है। और शायद कामना का भी। कामना के उस पार सेक्स नहीं, एक-दूसरे को फिर से खोज लेने की संभावना है।

देख लीजिएगा। (पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार और यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़” के होस्ट हैं।)

₹1 करोड़ सालाना की नौकरी छोड़कर खेती की राह चुनी, Uber India की पूर्व CMO ने बताया सफल होने का तरीका

कभी करोड़ों रुपये की कॉर्पोरेट दुनिया का हिस्सा रहीं अवनी गुप्ता ने आज अपनी जिंदगी का रास्ता पूरी तरह बदल लिया है। बड़े ब्रांड्स में ऊंचे पदों पर काम करने के बाद अब वह पंचकूला के पास एक पर्माकल्चर फार्म में प्रकृति के बीच रह रही हैं। यहां न चमकदार ऑफिस है, न मीटिंग्स का दबाव और न ही शहर जैसी भागदौड़। चारों तरफ हजारों पेड़, अलग-अलग तरह की फसलें और मिट्टी से बना उनका साधारण घर है। खास बात यह है कि उन्होंने यह बदलाव अचानक नौकरी छोड़कर नहीं किया। इस नई जिंदगी की तैयारी करीब 12 साल पहले शुरू हो गई थी।

कॉर्पोरेट करियर के दौरान ही उन्होंने और उनके पति ने जमीन खरीदी और धीरे-धीरे फार्म लाइफ को समझना शुरू किया। मुंबई से गुरुग्राम और फिर पंचकूला तक का सफर तय करने के बाद उन्होंने आखिरकार शहर की नौकरी वाली जिंदगी को पीछे छोड़कर फार्म को अपना स्थायी ठिकाना बना लिया।

20 हजार रुपये से शुरू हुआ सफर

गुप्ता ने 1997 में यूनिलीवर से अपने करियर की शुरुआत की थी। उस समय उनकी मासिक कमाई करीब 20 हजार रुपये थी। आगे चलकर उन्होंने Colgate-Palmolive, Axis Bank, Clix Capital और Uber जैसी कंपनियों में बड़े पद संभाले। Uber छोड़ने तक उनकी सालाना कमाई करीब 1 करोड़ रुपये पहुंच चुकी थी।

इसके बावजूद उन्होंने कॉर्पोरेट दुनिया से दूरी बनाने का फैसला किया। उनका कहना है कि नौकरी छोड़ते समय उन्हें ऐसा नहीं लगा कि वह पैसा छोड़ रही हैं, क्योंकि मानसिक रूप से वह पहले ही उस जीवन से आगे बढ़ चुकी थीं।

नौकरी छोड़ने से पहले जमीन पर शुरू कर दी थी तैयारी

गुप्ता और उनके पति ने 2010 में हरियाणा में जमीन खरीदी। उस वक्त दोनों अपने करियर के अच्छे दौर में थे। उन्होंने तुरंत शहर छोड़ने के बजाय धीरे-धीरे फार्म पर समय बिताना शुरू किया। पहले मुंबई से गुरुग्राम आए, फिर पंचकूला में दो साल रहे और आखिरकार फार्म को अपना स्थायी घर बना लिया। इस दौरान उन्हें यह समझने का मौका मिला कि ग्रामीण जीवन वास्तव में उनके लिए सही है या नहीं।

खेती को सिर्फ कमाई का जरिया समझना बड़ी भूल

गुप्ता का कहना है कि सिर्फ खेती करके कॉर्पोरेट सैलरी जैसी कमाई की उम्मीद करना सही नहीं है। उदाहरण के तौर पर, ऑर्गेनिक पालक का एक बंडल सीधे ग्राहक को करीब 40 रुपये में बिक सकता है, लेकिन थोक बाजार में इसकी कीमत काफी कम हो सकती है। इसीलिए उन्होंने फार्म की कमाई को एक ही स्रोत पर निर्भर नहीं रखा। बीजों की ऑनलाइन बिक्री, फार्म स्टे, टूर, ट्रेनिंग, कंसल्टेंसी, यूट्यूब और अतिरिक्त उपज बेचने समेत कई माध्यमों से आमदनी होती है।

यहां Blinkit-Zomato नहीं, मौसम तय करता है तनाव

फार्म लाइफ बाहर से जितनी खूबसूरत दिखती है, उतनी आसान नहीं है। यहां तुरंत डिलीवरी, आसान कचरा प्रबंधन और शहर जैसी सुविधाएं नहीं हैं। सामाजिक मेल-जोल भी कम हो सकता है। गुप्ता के मुताबिक, कॉर्पोरेट जीवन का तनाव अब मौसम और फसलों से जुड़ गया है। तेज बारिश से बाढ़ की चिंता होती है और बारिश कम हो तो खेती प्रभावित होने का डर रहता है।

उनका मंत्र- पहले आजमाएं, फिर नौकरी छोड़ें

गुप्ता का सबसे अहम संदेश उन लोगों के लिए है जो कॉर्पोरेट जिंदगी छोड़कर गांव या फार्म पर बसने का सपना देखते हैं। उनका कहना है कि इसे अचानक फैसला बनाने के बजाय नौकरी के साथ-साथ धीरे-धीरे तैयार करना चाहिए। उनके मुताबिक, ग्रामीण जीवन को सोशल मीडिया की खूबसूरत तस्वीरों से नहीं, उसकी वास्तविक चुनौतियों के साथ समझना जरूरी है। तभी यह बदलाव किसी पलायन के बजाय सोच-समझकर चुनी गई नई जिंदगी बन सकता है।

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छोटे कमरे से बड़े मंच की तैयारी करती गाँव की सोनाली | Painter की बेटी Sonali का Dancer बनने का सपना

छोटे कमरे से बड़े मंच की तैयारी करती गाँव की सोनाली | Painter की बेटी Sonali का Dancer बनने का सपना

पश्चिम बंगाल के एक छोटे से गाँव की सोनाली के पास न कोई बड़ी Dance Academy है, न महंगा कैमरा और न कोई शानदार सेटअप।
पिता एक मामूली पेंटर हैं, माँ ईंट-भट्ठे पर मजदूरी करती हैं।
घर में आर्थिक तंगी की वजह से सोनाली की पढ़ाई तक छूट गई, लेकिन उनके बचपन का सपना एक बेहतरीन डांसर बनने का आज भी ज़िंदा है।
पुराने फोन से विडियोज बनाकर और यूट्यूब से सीखकर सोनाली रोज़ अपने सपने के थोड़ा और करीब बढ़ रही है।
क्योंकि उन्हें खुद पर यकीन है कि उनकी। मेहनत एक दिन उन्हें उस बड़े मंच तक पहुँचा देगी।

@sonalikt92

छोटे कमरे से बड़े मंच की तैयारी करती गाँव की सोनाली | Painter की बेटी Sonali का Dancer बनने का सपना | West Bengal |

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India’s Got Latent: भुवन बाम से YouTube को लेकर सवाल पूछना पड़ा भारी? समय रैना को मिला ऐसा जवाब, VIDEO हुआ वायरल

‘इंडियाज गॉट लैटेंट’ के सीजन 2 के सातवें एपिसोड में भुवन बाम की एंट्री ने शो में अलग ही रंग भर दिया। समय रैना के साथ मंच साझा करते हुए भुवन ने अपनी मौजूदगी से दर्शकों का ध्यान खींचा। एपिसोड के दौरान समय ने भुवन से उनके यूट्यूब से दूर रहने को लेकर सवाल किया। सवाल सीधा था, लेकिन भुवन का जवाब बेहद संक्षिप्त और आत्मविश्वास से भरा था। उन्होंने कहा, “भाई, मैं चला था ताकि तुम दौड़ सको।” भुवन की इस एक लाइन ने स्टूडियो में हंसी का माहौल बना दिया। इसके बाद समय रैना ने भी अपने अंदाज में जवाब देते हुए कहा, “मैं दौड़ रहा हूं ताकि कौस्तुभ चल सके।”

दोनों की यह मजेदार बातचीत अब सोशल मीडिया पर भी चर्चा का विषय बन गई है। इस एपिसोड में नवाजुद्दीन सिद्दीकी, मुकेश छाबड़ा और कौस्तुभ अग्रवाल भी नजर आए, जिससे शो में मनोरंजन का रंग और गहरा हो गया।

समय ने पूछा- यूट्यूब से क्यों हुए दूर?

समय रैना ने भुवन का स्वागत करते हुए पूछा कि आखिर उन्होंने यूट्यूब से दूरी क्यों बना ली। इस पर भुवन ने बेहद आत्मविश्वास भरे अंदाज में कहा, “भाई, मैं चला था ताकि तुम दौड़ सको।” उनका यह जवाब सुनते ही स्टूडियो में हंसी गूंज उठी और पैनल में बैठे लोगों ने भी प्रतिक्रिया दी।

भुवन के जवाब पर समय ने किया पलटवार

भुवन के जवाब के बाद समय रैना भी कहां पीछे रहने वाले थे। उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा, “मैं दौड़ रहा हूं ताकि कौस्तुभ चल सके।” समय की इस बात पर भी दर्शक खूब हंसे। दोनों के बीच हुई यह छोटी-सी मजेदार बातचीत एपिसोड के चर्चित पलों में शामिल हो गई।

एक मंच पर जुटे मनोरंजन जगत के बड़े चेहरे

इस एपिसोड में भुवन बाम के अलावा अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दीकी, कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा और कॉमेडियन कौस्तुभ अग्रवाल भी मौजूद थे। अभिनय, कॉमेडी और डिजिटल दुनिया से जुड़े इन कलाकारों ने एपिसोड को खास बना दिया।

सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस

भुवन और समय की बातचीत का वीडियो सामने आते ही सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। कुछ दर्शकों ने भुवन को यूट्यूब के शुरुआती दौर का बड़ा नाम बताते हुए उनकी बात को सही ठहराया। वहीं, कुछ लोगों को यह बातचीत पसंद नहीं आई और उन्होंने इसे असहज बताया।

किसी ने खूब सराहा, तो किसी ने किया ट्रोल

एक तरफ कई दर्शकों ने एपिसोड को पसंद किया और इसे सीजन के बेहतरीन एपिसोड में बताया, तो दूसरी तरफ कुछ यूजर्स ने भुवन पर तंज भी कसा। कुछ ही सेकंड की इस बातचीत ने सोशल मीडिया पर अच्छी-खासी चर्चा छेड़ दी।

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आस्था का कारोबार, सिनेमा की जीत: ‘हनुमान अंश’

कभी-कभी कोई फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर नहीं चलती, वह समाज के भीतर चलती है। ‘हनुमान अंश’ के साथ कुछ ऐसा ही होता हुआ दिखाई देता है। लगभग दो करोड़ की लागत से बनी यह फ़िल्म तीन सौ करोड़ से ज़्यादा का वैश्विक कारोबार कर चुकी है। लेकिन इस वाक्य में सबसे महत्वपूर्ण शब्द दो करोड़ या तीन सौ करोड़ नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण शब्द है, दर्शक।

‘हनुमान अंश’ की तीन सौ करोड़ से ज़्यादा की यात्रा को सिर्फ़ एक फ़िल्म की सफलता की तरह देखना शायद उसके साथ नाइंसाफ़ी होगी। यह उस दर्शक की कहानी भी है जो तेज़ी से बदलती दुनिया में किसी स्थिर, भरोसेमंद और आत्मीय चीज़ की तलाश में है। लेकिन क्या सिनेमा उसे सिर्फ़ विश्वास दे या विश्वास के भीतर सवाल करने की जगह भी?

कभी-कभी कोई फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर नहीं चलती, वह समाज के भीतर चलती है। ‘हनुमान अंश’ के साथ कुछ ऐसा ही होता हुआ दिखाई देता है। लगभग दो करोड़ की लागत से बनी यह फ़िल्म तीन सौ करोड़ से ज़्यादा का वैश्विक कारोबार कर चुकी है। लेकिन इस वाक्य में सबसे महत्वपूर्ण शब्द दो करोड़ या तीन सौ करोड़ नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण शब्द है, दर्शक। वह दर्शक, जिसने शुरुआत में इस फ़िल्म को शायद कोई बड़ी सिनेमाई घटना नहीं माना। जिसने फिर किसी दोस्त से इसके बारे में सुना। किसी परिवार के सदस्य ने कहा, “एक बार देखना”। किसी सोशल मीडिया पोस्ट ने उत्सुकता जगाई। किसी ने फ़िल्म देख कर अपनी अनुभूति साझा की। और धीरे-धीरे एक फ़िल्म, फ़िल्म से बढ़ कर एक अनुभव बन गई।

यही सिनेमा की सबसे पुरानी और सबसे ताक़तवर मार्केटिंग है, किसी दूसरे इंसान का विश्वास। और इसलिए ‘हनुमान अंश’ को समझने के लिए हमें आज से नहीं, 1975 से शुरुआत करनी चाहिए। ‘जय संतोषी मां’। एक ऐसी फ़िल्म, जिसने उस दौर में धार्मिक सिनेमा को सिर्फ़ एक जॉनर नहीं रहने दिया, बल्कि उसे सामूहिक आस्था के अनुभव में बदल दिया। कई जगह दर्शक सिनेमाघर में फ़िल्म देखने नहीं, मानो दर्शन करने जाते थे। फूल चढ़ते थे, आरती होती थी, और फ़िल्म का पर्दा कुछ समय के लिए पूजा और सिनेमा के बीच की सीमा को धुंधला कर देता था।

सोचिए, 1975 का भारत। न सोशल मीडिया था, न इंस्टाग्राम, न यूट्यूब, न डिजिटल मार्केटिंग। लेकिन वर्ड ऑफ़ माउथ था। मोहल्ला था। परिवार था। भरोसा था। आज 51 साल बाद तकनीक बदल गई है। दर्शक की जेब में पूरा मीडिया संसार आ गया है। लेकिन मनुष्य की कुछ ज़रूरतें शायद उतनी नहीं बदलीं। उसे अभी भी उम्मीद चाहिए। उसे अभी भी किसी ऐसी कहानी की ज़रूरत है जो कहे कि अंधेरे के बाद उजाला होता है। उसे अभी भी किसी ऐसे पात्र की तलाश होती है जिसके सामने वह अपने निजी दुःख, अपनी असुरक्षा और अपनी असमर्थता रख सके। और शायद यही वह जगह है जहां आस्था सिनेमा से मिलती है।

हम अक्सर पूछते हैं कि लोग धार्मिक फ़िल्में क्यों देख रहे हैं? मुझे लगता है, हमें इसके उलट सवाल पूछना चाहिए। आज के समय में लोगों को ऐसी फ़िल्मों की ज़रूरत क्यों महसूस हो रही है? हम एक ऐसे समय में हैं जहां जानकारी की कोई कमी नहीं है, लेकिन निश्चितता की बहुत कमी है। हमारे पास हर सवाल का उत्तर खोजने के लिए गूगल है, लेकिन हर बेचैनी का उत्तर नहीं है। हमारे पास दुनिया से जुड़े रहने के लिए सोशल मीडिया है, लेकिन अपने भीतर टिके रहने का हुनर कम होता जा रहा है। हमारे पास विकल्प बहुत हैं, लेकिन शांति कम है। ऐसे समय में आस्था एक भावनात्मक आश्रय बन सकती है। इसमें कुछ भी असामान्य नहीं है।

मनुष्य जब अनिश्चितता से घिरता है, तो वह अर्थ खोजता है। कभी दर्शन में। कभी प्रेम में। कभी कला में। कभी राजनीति में। और कभी ईश्वर में। इसलिए किसी धार्मिक फ़िल्म के दर्शक को पिछड़ा हुआ, अंधविश्वासी या अविवेकी मान लेना शायद सबसे आसान और सबसे ग़लत रास्ता होगा। वह दर्शक भी हमारी तरह ही जटिल है। वह मंदिर भी जाता है और अस्पताल भी। वह भगवान से प्रार्थना भी करता है और डॉक्टर की रिपोर्ट भी देखता है। वह अपने बच्चे को विज्ञान पढ़ाता है और घर में पूजा भी करता है। भारत की असली कहानी शायद इसी सह अस्तित्व में है। और इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि आस्था हो या तर्क। सवाल यह है कि क्या आस्था और तर्क साथ रह सकते हैं? मेरे लिए जवाब होना चाहिए, हां।

भारतीय परंपरा की एक बड़ी खूबी यही रही है कि यहां प्रश्न पूछने की परंपरा भी उतनी ही पुरानी है जितनी प्रार्थना की। उपनिषदों में संवाद हैं। बुद्ध के सामने प्रश्न हैं। कबीर के यहां सवाल हैं। नानक की वाणी में जिज्ञासा है। हमारी आध्यात्मिक परंपरा ने हमेशा मनुष्य को सिर्फ़ सिर झुकाना नहीं सिखाया; कई बार उसने सिर उठाकर देखने को भी कहा है। फिर सिनेमा क्यों न पूछे? यहीं ‘हनुमान अंश’ मेरे लिए एक दिलचस्प फ़िल्म बन जाती है। एक संत की कहानी को पर्दे पर उतारना अपने आप में मुश्किल काम है। क्योंकि संत के जीवन में चमत्कार दिखाना आसान है, लेकिन उनकी मनुष्यता दिखाना मुश्किल। चमत्कार आंखों को आकर्षित करता है। मनुष्यता दिल में ठहरती है।

अगर किसी संत की पूरी सिनेमाई यात्रा सिर्फ़ इस बात पर टिकी हो कि उन्होंने कितने चमत्कार किए, तो हम शायद उनके सबसे बड़े चमत्कार को ही भूल जाएंगे कि उन्होंने लोगों के जीवन को कैसे छुआ? किसी डरे हुए आदमी को साहस देना क्या चमत्कार नहीं है? किसी टूटे हुए इंसान को अपने पैरों पर खड़ा कर देना क्या चमत्कार नहीं है? किसी भूखे को खाना देना? किसी अकेले के पास बैठना?

किसी के दुःख को बिना जज किए सुन लेना?

शायद सिनेमा का सबसे सुंदर आध्यात्मिक क्षण वह नहीं होता जब आसमान से कोई चमत्कार उतरता है। वह होता है जब एक इंसान दूसरे इंसान के लिए खड़ा होता है। और यहीं से धार्मिक सिनेमा की अगली यात्रा शुरू हो सकती है। हमें संतों की कहानियां चाहिए। लेकिन हमें उनके भीतर के इंसान की कहानियां भी चाहिए। हमें आस्था चाहिए। लेकिन उसके साथ सवाल भी चाहिए। हमें चमत्कार चाहिए। लेकिन उसके साथ चरित्र भी चाहिए। हमें भगवान चाहिए। लेकिन उसके साथ इंसान भी चाहिए। क्योंकि अगर भगवान को बड़ा करने के लिए इंसान को छोटा करना पड़े, तो शायद हमने भगवान को समझा ही नहीं।

‘हनुमान अंश’ जैसी फ़िल्मों के बहाने एक और सामाजिक सवाल उठता है, जिस पर हमारी फ़िल्में बहुत कम बात करती हैं। जब कोई व्यक्ति भौतिक संसार छोड़कर आध्यात्मिक यात्रा पर निकलता है, तो पीछे कौन रह जाता है? उसकी पत्नी? उसके बच्चे? उसके माता-पिता? उसकी रोज़मर्रा की ज़िम्मेदारियां? हम अक्सर त्याग की कहानी सिर्फ़ उस व्यक्ति की नज़र से देखते हैं, जिसने घर छोड़ा। लेकिन जिसने घर में रहकर जीवन सम्भाला, उसका त्याग किस कहानी में है? यह सवाल किसी संत की महानता को कम नहीं करता, बल्कि त्याग की परिभाषा को और मानवीय बनाता है। और शायद यही वह जगह है, जहां भविष्य का आध्यात्मिक सिनेमा हमारे समय से संवाद कर सकता है।

आज की महिला अपने पति की आध्यात्मिक यात्रा की सिर्फ़ दर्शक नहीं है। वह उस यात्रा की सामाजिक कीमत को भी समझती है। आज का परिवार भी बदल चुका है। आज का दर्शक भी। इसलिए आने वाली धार्मिक फ़िल्में अगर सिर्फ़ पुराने सांचे दोहराएंगी, तो वे शायद उस दर्शक से आधा ही संवाद कर पाएंगी, जिसके लिए वे बनाई जा रही हैं। ‘जय संतोषी मां’ के समय आस्था का सिनेमाई अनुभव सामूहिक था। ‘हनुमान अंश’ के समय वह सामूहिक होने के साथ-साथ डिजिटल भी है। लेकिन दोनों के बीच एक अदृश्य धागा वही है- कहानी पर विश्वास।

और शायद सिनेमा का भविष्य भी यहीं छिपा है। अगर निर्माता इस सफलता से सिर्फ़ यह सीखेंगे कि “धार्मिक फ़िल्म बनाओ, कम बजट रखो और तीन सौ करोड़ कमाओ”, तो वे सबसे ज़रूरी बात नहीं समझेंगे। दर्शक फ़ॉर्मूला नहीं खरीदता। दर्शक विश्वास खरीदता है। और विश्वास की नकल नहीं की जा सकती।

एक और संत की कहानी बना देने से वही परिणाम नहीं आएगा। एक और चमत्कार दिखा देने से वही भाव पैदा नहीं होगा। एक और भक्ति गीत डाल देने से वही सामूहिक अनुभव नहीं बनेगा। क्योंकि दर्शक को कहानी में कुछ अपना मिलना चाहिए। यही वजह है कि ‘हनुमान अंश’ की सफलता को केवल धार्मिक फ़िल्मों की सफलता कह देना भी अधूरा होगा। यह उस भारतीय दर्शक की वापसी है जो शायद बहुत समय से अपने सिनेमा में अपने सांस्कृतिक अनुभव की कोई सच्ची प्रतिध्वनि खोज रहा था।

लेकिन यहां सिनेमा की ज़िम्मेदारी भी शुरू होती है। आस्था को बेचने और आस्था को समझने में फ़र्क़ है। पहले रास्ते में फ़ॉर्मूला बनता है। दूसरे में सिनेमा। और मुझे उम्मीद है कि इस नई लहर में दूसरा रास्ता चुना जाएगा। ऐसी फ़िल्में बनेंगी जो धार्मिक हों, लेकिन प्रचारात्मक नहीं। जो आध्यात्मिक हों, लेकिन उपदेशात्मक नहीं। जो चमत्कार दिखाएं, लेकिन सवाल से न डरें। जो परंपरा का सम्मान करें, लेकिन इंसान की स्वतंत्र सोच का भी। क्योंकि हमारा संविधान भी नागरिकों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद और जिज्ञासा की भावना विकसित करने की बात करता है।

इसका मतलब यह नहीं कि भारत को अपनी आस्था छोड़ देनी चाहिए। इसका मतलब शायद यह है कि भारत अपनी आस्था को इतना मज़बूत बनाए कि वह सवाल सह सके। मुझे लगता है, यही हमारे समय की सबसे सुंदर सिनेमाई संभावना है। एक ऐसी फ़िल्म जहां कोई बच्चा मंदिर में हाथ जोड़कर खड़ा हो और उसी शाम अपने पिता से पूछे- “भगवान होते कहां हैं”? और पिता उसके सवाल से डरने के बजाय मुस्कुराकर कहे- “शायद यह सवाल पूछना भी भगवान को खोजने का एक रास्ता है”। अगर हमारा सिनेमा वहां तक पहुंच गया, तो उसने सिर्फ़ फ़िल्म नहीं बनाई। उसने समाज के भीतर एक संवाद शुरू किया। और शायद ‘हनुमान अंश’ की असली उपलब्धि यही है कि उसने यह संवाद फिर से शुरू कर दिया है।

तीन सौ करोड़ की संख्या कल किसी और फ़िल्म की हो सकती है। लेकिन जिस समय का कोई सवाल सिनेमा के ज़रिए हमारे भीतर उतर जाता है, वह संख्या से कहीं ज़्यादा देर तक रहता है। आस्था रहे। ज़रूर रहे। क्योंकि आस्था मनुष्य को संभाल सकती है। लेकिन उसके साथ विवेक भी रहे। क्योंकि विवेक मनुष्य को गिरने से बचा सकता है। और सवाल? सवाल तो रहने ही चाहिए। क्योंकि जिस आस्था को एक सवाल से डर लगने लगे, वह शायद आस्था से ज़्यादा भय बन जाती है। और जिस आस्था के भीतर सवाल के लिए जगह हो, वह शायद इंसान को ईश्वर के थोड़ा और क़रीब ले जाती है। सिनेमा का काम हमारी आस्था छीनना नहीं है। उसका काम शायद इतना भर है कि वह हमें अपनी आस्था को थोड़ा और गहराई से देखने का मौक़ा दे। फ़िल्म ख़त्म होती है। लेकिन सवाल वहीं से शुरू होता है।

‘हनुमान अंश’ के तीन सौ करोड़ सिर्फ़ एक फ़िल्म की कमाई नहीं, उस दर्शक की तलाश भी हैं जो बदलती दुनिया में भरोसा, अर्थ और शायद अपने भीतर का कोई जवाब खोज रहा है।

बहरहाल, आपके नज़दीकी सिनेमाघरों में है। देख लीजिएगा। (पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार और यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़”के होस्ट हैं।)

वैभव सूर्यवंशी की प्लेइंग 11 में एंट्री पर इस दिग्गज के बयान से टूट जाएगा फैंस का दिल!

Sanju Samson vs Vaibhav Sooryavanshi: भारतीय क्रिकेट टीम में टी20 ओपनिंग स्लॉट को लेकर बहस तेज छिड़ी हुई है। एक तरफ वर्ल्ड कप जिताने वाले संजू सैमसन है तो दूसरी तरफ वैभव सूर्यवंशी। इसी बीच पूर्व भारतीय बल्लेबाज एस बद्रीनाथ ने टीम मैनेजमेंट को बड़ी सलाह दी है। बद्रीनाथ का मानना है कि 15 साल के उभरते सितारे वैभव सूर्यवंशी को अभी थोड़ा इंतजार कराना चाहिए और संजू सैमसन को लगातार कम से कम 10 मैचों तक ओपनिंग का मौका मिलना चाहिए।

अफगानिस्तान के खिलाफ जारी टी20 सीरीज में भारत 2-0 की अजेय बढ़त बना चुका है। दूसरे टी20 में संजू सैमसन ने महज 22 गेंदों में 57 रनों की आतिशी पारी खेलकर फॉर्म में वापसी का ऐलान किया। इसके बावजूद 15 वर्षीय युवा सनसनी वैभव सूर्यवंशी को बेंच पर बैठाए जाने को लेकर चर्चाएं गर्म हैं। जानिए बद्रीनाथ ने संजू सैमसन और अभिषेक शर्मा की ओपनिंग जोड़ी को लेकर क्या-क्या कहा।

‘अदला-बदली बंद करो, सैमसन के साथ अन्याय मत करो’

पूर्व भारतीय क्रिकेटर बद्रीनाथ ने अपने यूट्यूब चैनल ‘Cric it with Badri’ पर टीम मैनेजमेंट के खिलाड़ियों को बार-बार बदलने के रवैये पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा, ‘अभिषेक शर्मा और संजू सैमसन को अगली सीरीज के बाद भी कम से कम 10 टी20 मैचों में लगातार ओपनिंग करानी चाहिए। इसके बाद अगर संजू सैमसन लगातार फ्लॉप होते हैं, तब उन्हें ड्रॉप करके वैभव सूर्यवंशी को मौका दीजिए। हर सीरीज में खिलाड़ियों को आपस में बदलने के बजाय एक तय प्रक्रिया अपनानी चाहिए। संजू सैमसन के साथ बार-बार ऐसा करना नाइंसाफी है।’

बद्रीनाथ के मुताबिक, संजू सैमसन पहले से ही रेस में आगे थे और उन्होंने भारत को 2026 टी20 वर्ल्ड कप जिताने में अहम भूमिका निभाई है। ऐसे में एक युवा खिलाड़ी को लाने के लिए किसी फॉर्म में चल रहे सीनियर को अचानक ड्रॉप करना सही नहीं है।

अभिषेक शर्मा और संजू सैमसन का धमाकेदार फॉर्म

अफगानिस्तान के खिलाफ मौजूदा टी20 सीरीज में भारत की ओपनिंग जोड़ी ने विरोधी गेंदबाजों की जमकर धज्जियां उड़ाई हैं। अभिषेक शर्मा ने पहले T20 में महज 32 गेंदों में 82 रन (7 चौके, 7 छक्के) बनाए। भारत ने 157 रनों का लक्ष्य 38 गेंदें बाकी रहते ही हासिल कर लिया। नई दिल्ली में खेले गए दूसरे मैच में संजू ने 22 गेंदों पर 57 रन ठोक डाले। टी20 वर्ल्ड कप 2026 के बाद यह उनका पहला टी20 अंतरराष्ट्रीय अर्धशतक है।

दिल्ली में क्लीन स्वीप पर भारत की नजरें

अफगानिस्तान को पहले दो मैचों में करारी शिकस्त देने के बाद भारतीय टीम गुरुवार को नई दिल्ली के अरुण जेटली स्टेडियम में तीसरा और अंतिम टी20 मुकाबला खेलेगी। सीरीज पहले ही 2-0 से जेब में होने के बावजूद कप्तान और कोचिंग स्टाफ संजू-अभिषेक की जोड़ी के साथ ही मैदान पर उतर सकते हैं, जिससे वैभव सूर्यवंशी को फिलहाल डगआउट में ही इंतजार करना पड़ सकता है।

जिम्बाब्वे दौरे पर चमकने के बावजूद क्यों बाहर हैं वैभव सूर्यवंशी?

15 वर्षीय युवा सनसनी वैभव सूर्यवंशी ने जिम्बाब्वे दौरे पर अपनी तूफानी बल्लेबाजी से सभी का दिल जीत लिया था। वैभव ने जिम्बाब्वे दौरे पर 196.10 के आक्रामक स्ट्राइक रेट से 151 रन बनाए थे और उन्हें ‘प्लेयर ऑफ द सीरीज’ चुना गया था। अब वैभव के फैंस उनके जबरदस्त प्रदर्शन के बावजूद टीम से बाहर रहने पर सवाल खड़े कर रहे हैं।

मुजफ्फरनगर से ई-रिक्शा लेकर स्पीति वैली पहुंचा लड़का, 12,500 फीट पर पहुंचते ही वायरल हुआ वीडियो

मुजफ्फरनगर के रहने वाले सुमित कुमार प्रजापति इन दिनों अपने अनोखे सफर की वजह से सोशल मीडिया पर चर्चा में हैं। जहां लोग स्पीति वैली जाने के लिए कार, बाइक या एसयूवी का सहारा लेते हैं, वहीं सुमित अपनी ई-रिक्शा लेकर पहाड़ों की ओर निकल पड़े। उनका यह सफर सिर्फ घूमने-फिरने तक सीमित नहीं है, बल्कि हर मोड़ पर एक नई चुनौती और नया अनुभव सामने आ रहा है। सुमित ने इस यात्रा की शुरुआत 15 अगस्त को की थी। सफर शुरू करते समय उन्होंने इंस्टाग्राम पर बताया था कि वह रोजाना वीडियो के जरिए लोगों को अपनी यात्रा की जानकारी देंगे।

रास्ते में उन्हें किन परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है, लोग उनकी ई-रिक्शा को देखकर कैसी प्रतिक्रिया दे रहे हैं और यात्रा किस तरह आगे बढ़ रही है इन सभी चीजों को वह कैमरे में कैद करते रहे। अब तक उन्होंने कुल 27 वीडियो के जरिए अपनी यात्रा की कहानी साझा की है।

मनाली तक पहुंचने का तरीका भी था खास

सुमित के इंस्टाग्राम पेज के मुताबिक, वह अपने दोस्तों के साथ गाड़ी से मनाली पहुंचे। उनकी ई-रिक्शा को ट्रक में लादकर मनाली तक पहुंचाया गया। इसके बाद यात्रा का सबसे दिलचस्प हिस्सा शुरू हुआ। 19 अगस्त को सुमित मनाली से ई-रिक्शा पर सवार होकर अकेले स्पीति वैली की ओर निकल पड़े। पहाड़ों के मुश्किल रास्तों पर तीन पहियों वाली इलेक्ट्रिक सवारी को आगे बढ़ते देखकर लोग भी हैरान रह गए। उनके एक वीडियो पर यूट्यूब इंडिया ने भी प्रतिक्रिया दी और मजेदार अंदाज में लिखा, “मॉडर्न प्रॉब्लम्स को देसी सॉल्यूशन चाहिए।”

‘बैटरी कहां चार्ज होगी?’ लोगों ने पूछा सवाल

जैसे ही सुमित के वीडियो सोशल मीडिया पर आने लगे, लोगों के मन में सबसे पहला सवाल ई-रिक्शा की बैटरी को लेकर उठा। यूजर्स पूछने लगे कि पहाड़ों के बीच आखिर ई-रिक्शा को चार्ज कहां किया जाएगा। सुमित ने बताया कि वह जिस जगह रुकते हैं, वहीं अपनी ई-रिक्शा को चार्ज करते हैं। इतना ही नहीं, किसी आपात स्थिति में काम आने के लिए उन्होंने जेनरेटर भी अपने साथ रखा है।

फैंस की एक बात मानकर बदल दिया सफर का अंदाज

सुमित की पहली वीडियो देखने के बाद एक सोशल मीडिया यूजर ने उनसे कहा कि अगर ई-रिक्शा इतनी दूर जा रही है तो इसमें सवारियां क्यों नहीं बैठाते। सुमित ने इस सुझाव को मान लिया। इसके बाद उन्होंने ई-रिक्शा में सवारियां बैठाकर स्पीति की ओर सफर जारी रखा। इससे उनकी यात्रा का अनुभव और भी अलग हो गया। अब वह सिर्फ अपनी मंजिल की ओर बढ़ने वाले यात्री नहीं थे, बल्कि रास्ते में मिलने वाले लोगों के साथ भी इस अनोखे सफर को साझा कर रहे थे।

12,500 फीट की ऊंचाई पर ई-रिक्शा ने सबको रोका

जैसे-जैसे सुमित ऊंचाई की ओर बढ़े, उनकी ई-रिक्शा लोगों के लिए कौतूहल का विषय बन गई। करीब 12,500 फीट की ऊंचाई वाले पथरीले रास्तों पर तीन पहियों वाली इस सवारी को चलते देखकर कई लोग रुक गए। कुछ लोगों ने सुमित के वीडियो बनाए, कुछ ने उनकी हिम्मत की तारीफ की और कई लोग तालियां बजाते नजर आए। वहीं, कुछ लोगों के लिए यह समझना ही मुश्किल था कि आखिर ई-रिक्शा इतनी खड़ी चढ़ाई और खराब रास्तों को पार कैसे कर रही है।

कुंजुम पहुंचकर बनाया रिकॉर्ड

26 अगस्त को सुमित अपनी ई-रिक्शा लेकर कुंजुम पहुंचे। उन्होंने इसे अपनी यात्रा की बड़ी उपलब्धि बताया और दावा किया कि ई-रिक्शा से वहां तक पहुंचने वाला यह पहला ऐसा सफर है। इस उपलब्धि ने उनकी यात्रा को और खास बना दिया। सोशल मीडिया पर पहले जहां लोग उनकी ई-रिक्शा को लेकर सवाल पूछ रहे थे, वहीं अब उनके सफर की चर्चा उपलब्धि के तौर पर होने लगी।

‘कार नहीं थी, लेकिन सपना तो था’

1 सितंबर को शेयर किए गए वीडियो में सुमित ने अपने सफर के पीछे की कहानी बताई। उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति का सपना होता है कि वह कभी शहर से दूर पहाड़ों के किसी गांव में जाकर सुकून के कुछ पल बिताए। उनका भी ऐसा ही सपना था, लेकिन उनके पास कार नहीं थी। इसके बावजूद उन्होंने रुकने के बजाय अपनी ई-रिक्शा को ही सफर का साथी बना लिया। सुमित का कहना है कि जहां लोग मुश्किल पहाड़ी रास्तों पर 4×4 गाड़ियों का इस्तेमाल करते हैं, वहीं वह बैटरी से चलने वाले तीन पहियों के वाहन के साथ आगे बढ़ रहे हैं। उनकी कहानी अब सोशल मीडिया पर सिर्फ एक अनोखी यात्रा नहीं, बल्कि इस बात की मिसाल बन गई है कि सपने देखने के साथ उन्हें पूरा करने का हौसला भी जरूरी है।

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