Komal Rani-Govinda: ‘जिनकी खुदकी शादियां नहीं बच पा रही वो सिंदूर शादी पर ज्ञान न दें…’, कोमल रानी ने दिव्या खोसला पर किया पलटवार

Komal Rani-Govinda: गोविंदा के साथ लालबागचा राजा जाने पर सिंदूर लगाने को लेकर दिव्या खोसला ने गोविंदा की रूमर्ड गर्लफ्रेंड कोमल रानी स्वर्णकार पर सवाल उठाए थे, जिसका कोमल ने कड़ा जवाब दिया है। इंस्टाग्राम पर एक लंबे नोट में कोमल ने दिव्या का नाम लिए बिना उन कमेंट्स पर नाराजगी जताई। वहीं सुनीता आहूजा पर भी तीखा तंज कसा।

‘अपने हीरो के साथ बाहर जाना कब से शर्म की बात हो गई?’

कोमल ने अपने नोट में उन सेलेब्रिटीज की आलोचना की जो उनके और गोविंदा के नाम को बदनाम कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर उनके बारे में खुलकर बात करते हैं, जबकि अहम राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर चुप रहते हैं। उन्होंने गोविंदा के साथ लालबागचा राजा जाने का बचाव करते हुए कहा कि यह उनकी आने वाली फिल्म ‘रूपा’ के लिए आशीर्वाद लेने के मकसद से था।

उन्होंने लिखा, “अपने हीरो के साथ गणपति बप्पा के दर्शन करने और अपनी आने वाली फिल्म ‘रूपा’ की सफलता के लिए प्रार्थना करने को शर्म की बात, राष्ट्रीय मुद्दा या दूसरों के लिए ‘दिखावा’ कब से माना जाने लगा? और जब यही तथाकथित सेलेब्रिटीज अपनी फिल्मों के प्रमोशन के लिए अपने मेल को-स्टार्स के साथ अलग-अलग सार्वजनिक जगहों पर जाते हैं, तो क्या उन्हें खुद ऐसा करते हुए शर्म नहीं आती?”

‘सिंदूर पर सीख लेने में कोई दिलचस्पी नहीं’

कोमल ने उनके और गोविंदा के रिश्ते पर कमेंट करने वालों पर निशाना साधा और उन पर विवाद का इस्तेमाल करके चर्चा में बने रहने का आरोप लगाया। उन्होंने लिखा, “फिल्म इंडस्ट्री की कुछ अभिनेत्रियां, जिनका करियर ठंडा पड़ चुका है, जिनकी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर नहीं चल रही हैं, उनके पास अपने फीके पड़ चुके ब्रांड टैग के अलावा कुछ नहीं बचा है। वे दूसरों के चल रहे विवादों में दखल देकर और खुद को लाइमलाइट में बनाए रखने की पुरजोर कोशिश करके चर्चा में बने रहने की कोशिश कर रही हैं।”

सिंदूर वाले कमेंट पर कोमल ने लिखा, “मुझे उन महिलाओं से सिंदूर, शादी या हमारी भारतीय संस्कृति और परंपराओं के बारे में सीख लेने में कोई दिलचस्पी नहीं है जो खुद सिंदूर का मजाक उड़ाती हैं, जिनकी अपनी शादियां टूट रही हैं और जो अपने शादीशुदा रिश्तों की पवित्रता भी बनाए नहीं रख सकतीं।”

कोमल ने ‘मैन-ईटर्स’ पर निशाना साधा

कोमल ने अपने इंस्टाग्राम पोस्ट में बिना किसी का नाम लिए, शराब की लत और बेवफाई का जिक्र करते हुए अपने आलोचकों पर भी इशारों-इशारों में निशाना साधा। उन्होंने लिखा, “मैं ऐसी महिलाओं को खुद को जज करने के लायक नहीं मानती – खासकर उन को जो ऐसे लोगों को आदर्श मानती हैं और उनका समर्थन करती हैं जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी रात-रात भर शराब पीने, दूसरे पुरुषों के साथ कई अफेयर चलाने और बुढ़ापे में भी तीन-तीन पुरुषों के साथ ‘वन-नाइट स्टैंड’ के सपने देखने में बिता दी हो और साथ ही शोहरत पाने के लिए उन पतियों को सबके सामने जलील किया। जिनके साथ वे रहीं और जिनसे उन्हें जिंदगी भर फायदा मिला। सच कहूं तो मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि ये लोग मुझे अच्छा इंसान समझते हैं या बुरा।”

कोमल ने अपना नोट इस बात के साथ खत्म किया कि महिलाएं उनके नाम का इस्तेमाल करके चर्चा में बने रहने की कोशिश न करें। उन्होंने लिखा, “मुझे लगता है कि वे सभी एक ही ग्रुप का हिस्सा हैं और अपनी नाकाम शादियों की निराशा किसी और पर निकाल रही हैं। वे ‘मैन-ईटर्स’ की तरह व्यवहार करती हैं – ऐसी महिलाएं जो अपने पतियों की इज्जत और प्रतिष्ठा को बर्बाद कर देती हैं। लगातार मेरे नाम से जुड़कर चर्चा में बने रहने की कोशिश करना बंद करें। शायद यह कहावत सच है- आपकी इज्जत आपके अपने हाथों में है। ऐसे लोगों को अपनी हद पता होनी चाहिए और दूसरों को इतना नहीं उकसाना चाहिए कि उनका अपना अतीत भी सबके सामने आ जाए।”

दिव्या खोसला ने क्या कहा?

गोविंदा और कोमल उसी दिन लालबागचा राजा के दर्शन करने गए थे, जिस दिन सुनीता आहूजा अकेले पंडाल गई थीं। गोविंदा और कोमल के अफेयर की खबरों के बीच इस बात ने लोगों का ध्यान खींचा। हालांकि गोविंदा ने इन आरोपों को बार-बार नकारा है और कहा है कि कोमल के साथ उनका दिखना उनके प्रोफेशनल रिश्ते और उनकी आने वाली फिल्म ‘रूपा’ से जुड़ा है।

इस बीच दिव्या गोविंदा और सुनीता की मुश्किल भरी शादी पर खुलकर कमेंट कर रही हैं। हाल ही में उन्होंने गोविंदा के साथ लालबागचा राजा जाते समय कोमल के सिंदूर लगाने पर सवाल उठाए और उन पर अपने एजेंडे के लिए धर्म का इस्तेमाल करने का आरोप भी लगाया।

El Nino effect: अल नीनो बढ़ा सकता है भारत का फूड बिल! चावल, अरहर दाल और खाद्य तेलों ने दिए महंगाई के संकेत

El Nino effect: भारत में खाद्य कीमतों को लेकर आने वाले महीनों में दबाव बढ़ने की आशंका है। देश की रोजमर्रा की खपत वाली प्रमुख खाद्य वस्तुओं में चावल, अरहर दाल और खाद्य तेलों की कीमतों में अलग-अलग रफ्तार से बदलाव देखने को मिल रहा है। ऐसे समय में भारत El Nino की बढ़ती निगरानी के दौर में प्रवेश कर रहा है, जिससे अगर मौसम प्रतिकूल रहता है तो फसल उत्पादन और कमोडिटी सप्लाई पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, अभी ऐसा कोई सबूत नहीं है कि हाल में खाद्य कीमतों में आई तेजी सीधे El Nino की वजह से है। फिलहाल कीमतों की दिशा घरेलू उत्पादन, सरकारी नीतियों, भंडार और वैश्विक कमोडिटी बाजार जैसे कई कारकों पर निर्भर है।

सरकार ने El Nino को बताया जोखिम का कारण

केंद्र सरकार ने अपनी अगस्त 2026 की मासिक आर्थिक रिपोर्ट में El Nino को निगरानी योग्य कारक बताया था। रिपोर्ट में कहा गया था कि लंबे समय तक El Nino की स्थिति रहने पर मानसून कमजोर या असमान हो सकता है। इसका असर फसल उत्पादन और खाद्य कीमतों पर पड़ सकता है। हालांकि, वित्त मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि El Nino और कृषि उत्पादन के बीच सीधा और एक-से-एक संबंध नहीं माना जा सकता।

सिंचाई, सरकारी खरीद, खाद्यान्न भंडार और जरूरत पड़ने पर आयात जैसे उपाय मौसम के झटकों का असर कम कर सकते हैं। भारत में किसी मौसम संबंधी घटना का असर केवल बारिश पर निर्भर नहीं करता। फसल की स्थिति, जलाशयों में पानी, सरकारी स्टॉक, खरीद व्यवस्था और आयात की क्षमता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

चावल और दालों की कीमतों में भारी तेजी

सरकार के मूल्य निगरानी आंकड़ों के मुताबिक, चावल की कीमत पिछले साल की तुलना में बढ़ी है। 29 सितंबर को थोक चावल की कीमत करीब ₹4,185 प्रति क्विंटल थी, जो एक साल पहले के मुकाबले लगभग 8.5 फीसदी अधिक है। खुदरा बाजार में भी चावल की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। दालों में भी अलग-अलग किस्मों की कीमतों में अंतर देखने को मिल रहा है।

अरहर या तूर दाल सितंबर के अंत में ₹125 प्रति किलो से अधिक पर बिक रही थी। अब इसकी कीमत करीब 8 फीसदी सालाना बढ़ी थी। उड़द की कीमत भी ऊपर रही। जबकि मूंग, मसूर और चना में साल-दर-साल अपेक्षाकृत कम बढ़ोतरी दर्ज की गई। हालांकि, इन मौजूदा कीमतों को सीधे El Nino का असर मानना सही नहीं होगा। असली जोखिम आने वाले महीनों में सामने आ सकता है, खासकर अगर बारिश का पैटर्न या फसल उत्पादन प्रभावित होता है।

खाद्य तेलों की कीमतें बनीं चुनौती

खाद्य तेल भारत के लिए अलग तरह की चुनौती हैं, क्योंकि देश कच्चे पाम, सोयाबीन और सूरजमुखी तेल के आयात पर काफी निर्भर है। वैश्विक कीमतों के असर को कम करने के लिए सरकार ने हाल में आयात शुल्क में कटौती की है। 24 सितंबर से कच्चे सोयाबीन और कच्चे पाम ऑयल पर बेसिक कस्टम ड्यूटी 10% से घटाकर 5% की गई।

  • कच्चे सूरजमुखी तेल पर ड्यूटी शून्य कर दी गई।
  • रिफाइंड सोयाबीन और पाम ऑयल पर ड्यूटी 32.5% से घटाकर 27.5% की गई।
  • रिफाइंड सूरजमुखी तेल पर ड्यूटी 22.5% कर दी गई।
  • सरकार के मुताबिक, कम आयात शुल्क से खाद्य तेलों की लैंडेड कॉस्ट घट सकती है, जिससे खुदरा कीमतों को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी। साथ ही घरेलू रिफाइनिंग को भी समर्थन मिल सकता है।
  • वित्त मंत्रालय की अगस्त रिपोर्ट में वैश्विक वेजिटेबल ऑयल कीमतों को महंगाई के संभावित जोखिमों में शामिल किया गया था। इसका एक कारण यह भी है कि पाम, सोयाबीन और रेपसीड जैसे तेलों का इस्तेमाल तेजी से बायोफ्यूल उत्पादन में हो रहा है।

El Nino से क्या बदलेगा?

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 के अंत तक El Nino के बहुत मजबूत स्थिति में पहुंचने का अनुमान जताया गया है। El Nino प्रशांत क्षेत्र से काफी दूर तक बारिश और तापमान के पैटर्न को प्रभावित कर सकता है। हालांकि इसका असर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग होता है।

भारत के लिए सबसे अहम सवाल यह नहीं है कि El Nino कितना मजबूत होगा। बल्कि यह है कि यह भारतीय मानसून, फसल चक्र और मौजूदा खाद्य-सप्लाई व्यवस्था के साथ किस तरह इंटरेक्ट करता है। WMO ने जलवायु जोखिमों से निपटने के लिए पहले से मिलने वाले मौसम पूर्वानुमानों के महत्व पर भी जोर दिया है। संगठन की ताजा चेतावनी में गर्मी, बाढ़ और सूखे के साथ खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले व्यापक असर का उल्लेख किया गया है।

सरकार के पास कई विकल्प मौजूद

भारत के पास खाद्य आपूर्ति को संभालने के लिए कई नीतिगत विकल्प मौजूद हैं। सरकारी खरीद और खाद्यान्न भंडार प्रमुख वस्तुओं की कमी के दौरान कीमतों को कंट्रोल करने में मदद कर सकते हैं। जरूरत पड़ने पर आयात के जरिए घरेलू बाजार में सप्लाई बढ़ाई जा सकती है। खाद्य तेलों पर हालिया आयात शुल्क कटौती इसका एक उदाहरण है कि सरकार व्यापार नीति के जरिए घरेलू कीमतों को प्रभावित कर सकती है।

RBI की भी रहेगी नजर

खाद्य कीमतों का असर देश की व्यापक महंगाई पर भी पड़ सकता है। Reuters की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत की खपत वाली वस्तुओं की टोकरी में महंगाई का दबाव व्यापक हुआ है और करीब आधी वस्तुओं की कीमतें सालाना आधार पर 4% या उससे अधिक बढ़ रही हैं, जबकि मार्च में यह हिस्सा करीब एक-तिहाई था। इसी अवधि में अप्रैल-जून तिमाही में भारत की अर्थव्यवस्था में करीब 8% की वृद्धि दर्ज की गई। ऐसे में RBI के लिए अहम सवाल यह होगा कि क्या मौसम से जुड़े बदलाव केवल कुछ खाद्य वस्तुओं तक सीमित रहते हैं या वे लगातार खाद्य महंगाई में बदलकर व्यापक कीमतों तक पहुंचते हैं।

अभी की तस्वीर क्या है?

फिलहाल भारत में खाद्य कीमतों की तस्वीर एकसमान तेजी वाली नहीं है। चावल और कुछ दालों की कीमतें पिछले साल की तुलना में ज्यादा हैं। जबकि खाद्य तेल वैश्विक सप्लाई और कीमतों से प्रभावित हो सकते हैं। दूसरी ओर, सरकार ने खाद्य तेलों के आयात शुल्क में कटौती जैसे कदम उठाए हैं। अब आने वाले कुछ महीने यह तय करने में अहम होंगे कि El Nino सिर्फ मौसम से जुड़ा जोखिम बना रहता है या भारत के खाद्य बिल और महंगाई पर इसका स्पष्ट असर दिखाई देने लगता है।

ये भी पढ़ें- Bengal SIR Row: ‘आधार से लॉग-इन नहीं करेंगे…’; पश्चिम बंगाल में जजों के इनकार के बाद अटके SIR के हजारों मामले

ज्ञानेश और एसआईआर पर सुनवाई करेगा सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के मनमाने कामकाज और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को अवैध घोषित करने के लिए दायर की गई याचिका पर सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट तैयार हो गया है। सर्वोच्च अदालत ने अगले हफ्ते इस पर सुनवाई का फैसला किया है। इससे पहले मंगलवार को यह याचिका पेश की गई। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने इस मामले में जल्दी सुनवाई की अपील की और कहा कि चुनाव आयोग में मनमाने फैसले से संवैधानिक सवाल खड़े हो रहे है। इस याचिका में देश भर में हुए एसआईआर को अवैध घोषित करने की मांग भी की गई है।

गौरतलब है कि ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने पिछले दिनों एक खोजी रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें बताया गया था कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार मनमाने तरीके से फैसले कर रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक बाकी दोनों चुनाव आयुक्तों एसएस संधू और विवेक जोशी ने 10 महीने में 14 बार आयोग के फैसले पर लिखित आपत्ति दर्ज कराई लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। इस रिपोर्ट के बाद पूर्ण आयोग की एक बैठक हुई, जिसमें कई चीजों को ठीक करने का फैसला हुआ।

अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह की ओर से वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने मंगलवार को चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच के सामने इस मामले का जिक्र किया और जल्दी सुनवाई की मांग की। विकास सिंह ने कहा कि बहुसदस्यीय आयोग का अर्थ ही है कि आयोग में फैसला या तो आम सहमति से हो या बहुमत से हो।

विकास सिंह ने कहा कि अगर एसआईआर का फैसला बहुमत से या एकमत से नहीं हुआ है तो फिर यह आयोग का फैसला कैसे माना जाएगा। इसे गंभीर संवैधानिक संकट बताते हुए उन्होंने जल्दी सुनवाई की अपील की, जिस पर चीफ जस्टिस ने इसे अगले हफ्ते के लिए सूचीबद्ध करने को कहा।

Sambhal Violence: संभल हिंसा मामले में आरोपी को बड़ी राहत! सुप्रीम कोर्ट ने NSA के तहत मुल्ला अफरोज की हिरासत रद्द की, UP सरकार पर लगाया ₹10 लाख का जुर्माना

Sambhal Violence Case: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (29 सितंबर) को 2024 की संभल हिंसा मामले के कथित मास्टरमाइंड मुल्ला अफरोज की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA), 1980 के तहत लिए गए हिरासत को रद्द कर दिया। कोर्ट ने इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को भी खारिज कर दिया, जिसमें हिरासत के आदेश को बरकरार रखा गया था। इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने हिरासत के आदेश को अवैध बताते हुए उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि किसी आरोपी के इकबालिया बयान को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत उसे हिरासत में रखने का आधार नहीं बनाया जा सकता।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए मुल्ला अफरोज की NSA हिरासत को रद्द कर दिया। उत्तर प्रदेश पुलिस ने 2024 में संभल में हुई सांप्रदायिक हिंसा में मुल्ला अफरोज की कथित भूमिका को लेकर अक्टूबर 2025 में उसके खिलाफ कड़े राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत कार्रवाई की थी। शीर्ष अदालत ने अवैध हिरासत का आदेश पारित करने के लिए सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया।

क्या है NSA?

आपको बता दें कि रासुका यानी NSA केंद्र और राज्य सरकारों को व्यक्तियों को हिरासत में लेने का अधिकार देता है, ताकि उन्हें भारत की रक्षा के लिए प्रतिकूल तरीके से कार्य करने से रोका जा सके। हिरासत की अधिकतम अवधि 12 महीने है। हालांकि इसे इससे पहले भी रद्द किया जा सकता है। रासुका के तहत स्थानीय प्रशासन हिरासत का आदेश जारी कर सकता है, जिसे हाई कोर्ट के पूर्व जज की अध्यक्षता वाले एक बोर्ड से अनुमोदित कराना होता है। चूंकि यह गिरफ्तारी नहीं बल्कि हिरासत होती है। इसलिए हिरासत में लिए गए व्यक्ति को अदालत के समक्ष पेश करने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं होती।

संभल हिंसा क्या है?

नवंबर 2024 में संभल में तनाव उस समय बढ़ गया था, जब वहां स्थित शाही जामा मस्जिद का अदालत के आदेश पर सर्वे किया जा रहा था। यह सर्वे उन दावों के बाद कराया गया था कि इस स्थान पर पहले हरिहर मंदिर मौजूद था। सर्वेक्षण के दूसरे दौर के दौरान 24 नवंबर को प्रदर्शन कर रहे स्थानीय लोगों की सुरक्षा कर्मियों से झड़प हो गई थी। इस घटना में चार लोगों की मौत हो गई थी और कई लोग घायल हुए थे।

घटना के करीब 54 दिन बाद अफरोज को गिरफ्तार किया गया था। आरोप है कि उसकी गिरफ्तारी पुलिस हिरासत में दिए गए एक कथित कबूलनामे के आधार पर हुई थी। बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उसे जमानत दे दी थी। हालांकि, 13 अक्टूबर 2025 को उसके खिलाफ NSA के तहत हिरासत का आदेश जारी किया गया। इस आदेश को बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा। इसके बाद अफरोज ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

पुलिस हिरासत में कथित कबूलनामे पर उठे सवाल

‘लाइव लॉ’ के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हिरासत के लिए जरूरी ‘subjective satisfaction’ (व्यक्तिपरक संतुष्टि) केवल ऐसे कथित कबूलनामे के आधार पर कायम नहीं की जा सकती, जो पुलिस हिरासत के दौरान लिया गया हो। 8 सितंबर को सुनवाई के दौरान आदेश सुरक्षित रखते समय भी पीठ ने पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे की प्रासंगिकता और कानूनी महत्व पर सवाल उठाए थे। कोर्ट ने पूछा था कि क्या ऐसा बयान निवारक हिरासत का आदेश जारी करने के लिए आवश्यक ‘subjective satisfaction’ का आधार बन सकता है।

आरोपी ने पुलिस फायरिंग की जांच पर भी उठाए सवाल

शीर्ष अदालत में अफरोज की ओर से दलील दी गई कि हिंसा के दौरान पुलिस ने भी कथित तौर पर गोलीबारी की थी। इस पहलू की निष्पक्ष तरीके से जांच नहीं की गई। उसने इस संबंध में प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल करने की अनुमति मांगी। उसकी ओर से यह भी तर्क दिया गया कि पुलिस हिरासत में दिया गया कथित कबूलनामा कानूनन स्वीकार्य नहीं है। साथ ही कहा गया कि किसी व्यक्ति के खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज होना अपने आप में कस्टडी का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता।

यूपीआई शुल्क पर रोक से इनकार

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने यूपीआई के जरिए होने वाले लेनदेन पर शुल्क लगाने के केंद्र सरकार के फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। हालांकि सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है और यह पूछा है कि शुल्क लगाने के नए नियम को लागू करने का क्या आधार है। गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने यूपीआई के जरिए होने वाले दो हजार रुपए से ऊपर के लेनदेन पर 0.40 फीसदी शुल्क लगा दिया है। यह 15 अक्टूबर से लागू होगा।

इसे लेकर एक जनहित याचिका दायर की गई है, जिस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की तीन जजों की बेंच ने सुनवाई की। वकील अंजन दत्ता ने यह जनहित याचिका दायर की है। इस पर सुनवाई करते हुए अदालत ने सरकार के फैसले पर रोक लगाने से इनकार किया और सरकार को नोटिस जारी किया।

याचिका में सवाल उठाया गया है कि दो हजार रुपए की सीमा किस आधार पर तय की गई है? इसके अलावा यह भी पूछा गया है कि यूपीआई और रूपे कार्ड के लिए नियम अलग क्यों हैं? याचिका में इसे रद्द करने की मांग की गई है। एडवोकेट अंजन दत्ता की याचिका में यह भी कहा गया कि सरकार ने जनता से चर्चा किए बिना और कोई ठोस नियम बनाए बिना ही यह फीस तय कर दी। इसके अलावा, ‘पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007’ के एक नियम को भी अदालत में चुनौती दी गई। आरोप है कि यह नियम सरकार को अपनी मर्जी से यह फैसला करने की छूट देता है कि कौन सा डिजिटल पेमेंट फ्री रहेगा और किस पर चार्ज लगेगा।

बहरहाल, सोमवार की सुनवाई में सरकार की तरफ से एडिशनल सॉलिसीटर जनरल एन वेंकटरमण ने कहा कि आम लोगों के आपस में पैसे भेजने पर चार्ज नहीं लगेगा। उन्होंने यह भी कहा कि देश के करीब 96 फीसदी छोटे भुगतानों पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। सरकार की ओर से यह भी कहा गया है कि 0.40 फीसदी का शुल्क भी ग्राहकों को नहीं देना होगा, बल्कि दुकानदार को देना होगा।

Fat Dogs of Delhi: कौन बनेगा दिल्ली का सबसे गोल-मटोल डॉग? 64 कंटेस्टेंट्स के बीच होगा मुकाबला

दिल्ली में इस बार मुकाबला थोड़ा हटके होने वाला है। शहर के गोल-मटोल, प्यारे और चंकी डॉग्स एक मजेदार ऑनलाइन कॉन्टेस्ट में आमने-सामने होंगे। इस अनोखी प्रतियोगिता में कुल 64 कुत्ते हिस्सा ले रहे हैं, जिनकी तस्वीरें Instagram पर मुकाबले के लिए उतारी जाएंगी। खास बात यह है कि किस डॉग को विजेता का ताज मिलेगा, इसका फैसला कोई जज नहीं करेगा, बल्कि जनता अपनी पसंद के आधार पर वोट देगी। इस कॉन्टेस्ट का आयोजन Fat Dogs of Delhi नाम का Instagram पेज कर रहा है।

प्रतियोगिता का आइडिया अमेरिका की मशहूर Fat Bear Week से लिया गया है, लेकिन दिल्ली के इस मुकाबले में भालुओं की जगह प्यारे डॉग्स हैं। अब देखना दिलचस्प होगा कि अलग-अलग इलाकों से आए इन चंकी कंटेस्टेंट्स में कौन लोगों का सबसे ज्यादा प्यार हासिल कर पाता है और आखिर में ‘सबसे गोल-मटोल डॉग’ का खिताब अपने नाम करता है।

64 डॉग्स से शुरू होगा मुकाबला

कॉन्टेस्ट में दिल्ली के अलग-अलग इलाकों से 64 डॉग्स हिस्सा लेंगे। उनके मालिक अपने पेट की फोटो, नाम और इलाके की जानकारी भेजकर एंट्री करा सकते हैं। इसके बाद हर राउंड में डॉग्स की तस्वीरें आमने-सामने होंगी और लोग अपने पसंदीदा कंटेस्टेंट के लिए वोट करेंगे।

Fat Bear Week से आया आइडिया

दिल्ली का यह मजेदार मुकाबला अमेरिका के मशहूर Fat Bear Week से प्रेरित है। Alaska के Katmai National Park में हर साल लोग उन भूरे भालुओं के लिए वोट करते हैं, जिन्होंने गर्मियों में खूब खाना खाकर सर्दियों की तैयारी की होती है। यह आयोजन 2014 में शुरू हुआ था और अब हर साल लोगों का ध्यान खींचता है।

दिल्ली के डॉग्स के लिए तय हुआ पूरा शेड्यूल

यह मुकाबला 24 सितंबर से 64 डॉग्स के साथ शुरू हो चुका है। इसके बाद 25 सितंबर को टॉप 32, 26 सितंबर को टॉप 16, 27 सितंबर को क्वार्टर फाइनल, 28 सितंबर को सेमीफाइनल और 29 सितंबर को फाइनल होगा। हर चरण में Instagram वोटिंग के जरिए अगले विजेता का फैसला किया जाएगा।

दोपहर 2 से 3 बजे होगी वोटिंग

वोटिंग Instagram Stories के जरिए होगी। हर पोल 24 घंटे तक खुला रहेगा। हालांकि, फिलहाल विजेता के लिए कोई तय इनाम नहीं रखा गया है। आयोजकों का कहना है कि अगर कोई स्पॉन्सर सामने आता है तो विजेता डॉग्स के लिए ट्रीट्स की व्यवस्था की जा सकती है।

View this post on Instagram

A post shared by anushka (@anushcache)

आपका डॉग भी बन सकता है ‘चंकी चैंपियन’

अगर आपके पास दिल्ली में रहने वाला कोई गोल-मटोल Labrador, Indie या Pug है, तो उसके पास भी इस मजेदार मुकाबले में शामिल होने का मौका है। मालिकों को सिर्फ अपने डॉग की फोटो, नाम और दिल्ली का इलाका Instagram पर भेजना होगा। वे अपने पसंदीदा डॉग के लिए कैंपेन मैटेरियल भी भेज सकते हैं, जिसे पेज शेयर कर सकता है।

लंच ब्रेक में चमकी किस्मत! सिर्फ 1,916 रुपये खर्च कर महिला ने जीते 19 करोड़, जानें क्या है पूरी कहानी

ईरान बोला-हमारे विमान रोके तो किसी के उड़ने नहीं देंगे:ईरान से हर दिन 100 इंटरनेशनल फ्लाइट्स; UAE-ओमान समेत कई देशों ने उड़ानें रोकीं

ईरान ने धमकी दी है कि अगर उसके विमानों के उड़ानों पर रोक लगाई गई तो वे भी इलाके में किसी भी प्लेन को उड़ने नहीं देंगे। दरअसल, अमेरिका ने ईरान की सभी एयरलाइंस को बंद कराने की धमकी दी है। इसके बाद से UAE, ओमान समेत कई देशों में ईरानी उड़ानें रोकी गई हैं। ईरान से हर दिन औसतन 100 इंटरनेशनल फ्लाइट्स उड़ते हैं। ईरान बोला- US का साथ दे रहे देशों के एयरपोर्ट बंद होंगे ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के चीफ मोहसेन रेजाई ने भी पड़ोसी देशों से अमेरिका की पाबंदियों में शामिल नहीं होने की अपील की। रेजाई ने कहा कि जो देश अमेरिका के साथ मिलकर ईरानी उड़ानों पर रोक लगाएंगे, उनके एयरपोर्ट ईरान के लिए उड़ानें संचालित नहीं कर पाएंगे। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान यह सुनिश्चित करेगा कि ऐसे देशों के एयरपोर्ट काम न कर पाएं। हालांकि, उन्होंने यह नहीं बताया कि ईरान इसके लिए कूटनीतिक, आर्थिक या सैन्य किस तरह की कार्रवाई करेगा। ईरान दूसरे देशों की उड़ानें कैसे रोक सकता है? किसी दूसरे देश के एयरपोर्ट को सीधे बंद करने का अधिकार ईरान के पास नहीं है। अल जजीरा के मुताबिक, ईरान ने अभी इसका कोई स्पष्ट तरीका नहीं बताया है। हालांकि, वह पहले भी सैन्य कार्रवाई के जरिए क्षेत्रीय एयर ट्रैवल को प्रभावित कर चुका है। 28 फरवरी से शुरू हुए अमेरिका-इजराइल और ईरान के संघर्ष के शुरुआती दौर में ईरान ने कतर, सऊदी अरब, UAE, कुवैत, बहरीन, ओमान और जॉर्डन पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए थे। इसके बाद इन देशों ने कुछ समय के लिए अपना एयरस्पेस पूरी तरह या आंशिक रूप से बंद कर दिया था। इससे पता चलता है कि ईरान को किसी दूसरे देश का एयरस्पेस औपचारिक रूप से बंद करने की जरूरत नहीं है। अगर क्षेत्र में सैन्य तनाव बढ़ता है, तो एयरस्पेस की सुरक्षा और उड़ानों की सुरक्षा को लेकर दूसरे देश खुद ऑपरेशन सीमित कर सकते हैं। —————–

विपक्ष फिर लाएगा महाभियोग

नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष एक बार फिर महाभियोग लाने की तैयारी कर रहा है। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ अखबार में चुनाव आयोग के कामकाज में ज्ञानेश कुमार की मनमानी की रिपोर्ट छपने के बाद विपक्षी पार्टियों ने उनके ऊपर हमला किया है। जानकार सूत्रों के हवाले से खबर है कि अगले दो हफ्ते के भीतर विपक्ष की ओर से ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग लाने का नोटिस दिया जा सकता है।

गौरतलब है कि इससे पहले अप्रैल में बजट सत्र के दौरान विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग नोटिस दिया था लेकिन लोकसभा में वह प्रस्ताव खारिज हो गया था। हालांकि राज्यसभा प्रस्ताव अब भी लंबित है। विपक्ष के जानकार सूत्रों के मुताबिक, इस बार भी महाभियोग प्रस्ताव कांग्रेस की ओर से ही दिया जाएगा। कांग्रेस ने इस मुद्दे पर विपक्षी दलों से बात की है। संभावना जताई गई है कि इसे अगले दो हफ्ते में पेश किया जाएगा।

इस बीच ज्ञानेश कुमार का मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा है, जहां एक वकील ने भारत के अटॉर्नी जनरल को पत्र लिखकर ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अवमानना कार्रवाई चलाने की मांग की है। हालांकि अवमानना कार्रवाई करने की मंजूरी मिलने की संभावना नहीं है। लेकिन किसी न किसी रूप में यह मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने उठेगा। गौरतलब है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़ी याचिका को दो जजों की बेंच ने चीफ जस्टिस को भेज दिया है।

Tata Sons ने नोएल टाटा की आपत्ति खारिज की, चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को वैध बताया

टाटा ग्रुप की फ्लैगशिप कंपनी Tata Sons ने चेयरमैन पद पर एन चंद्रशेखरन की तीसरी बार नियुक्ति का विरोध करने वाले नोएल टाटा की आपत्ति खारिज कर दी है। कंपनी ने कहा है कि 17 सितंबर को बोर्ड ने चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति का जो फैसला लिया था, वह वैध है।

Tata Sons ने इसके लिए दो नई कानूनी राय का हवाला दिया है। ये राय पूर्व चीफ जस्टिस उदय यू ललित और रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट जज बीएन श्रीकृष्ण ने दी हैं।

24 सितंबर को भेजा जवाब

Tata Sons ने 24 सितंबर को नोएल टाटा और Tata Trusts को जवाब भेजा। यह जवाब 20 सितंबर को भेजी गई उनकी चिट्ठी के बाद आया है। उस चिट्ठी में नोएल टाटा और Tata Trusts ने चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को कानूनी तौर पर गलत बताया था।

Tata Sons के कंपनी सेक्रेटरी सुप्रकाश मुखोपाध्याय ने यह पत्र जारी किया। इसके साथ दोनों कानूनी राय भी भेजी गईं। इसकी कॉपी Tata Sons के सभी डायरेक्टर्स को भी दी गई।

पूरा विवाद किस बात पर है?

विवाद Tata Sons के Article 121 को लेकर है। इसमें बोर्ड के फैसले के लिए डायरेक्टर्स के बहुमत की जरूरत बताई गई है। साथ ही Tata Trusts की ओर से नियुक्त डायरेक्टर्स के बहुमत का समर्थन भी जरूरी है।

इस आर्टिकल में चेयरमैन को कास्टिंग वोट देने का अधिकार भी है। कास्टिंग वोट का मतलब है… जब किसी फैसले पर वोट बराबर-बराबर बंट जाएं, तब मीटिंग की अध्यक्षता कर रहे व्यक्ति को एक अतिरिक्त निर्णायक वोट देने का अधिकार।

अब विवाद यह है कि अगर Tata Trusts के दोनों नॉमिनी डायरेक्टर्स के वोट अलग-अलग हो जाएं, तो क्या चेयरमैन कास्टिंग वोट दे सकता है? पूरे बोर्ड के वोट बराबर नहीं होने पर भी इस अधिकार का इस्तेमाल किया जा सकता है या नहीं, यही मुख्य सवाल है।

चंद्रशेखरन ने खुद वोट नहीं दिया

चंद्रशेखरन ने अपनी दोबारा नियुक्ति के प्रस्ताव पर खुद वोट नहीं किया। कुल पांच डायरेक्टर्स ने वोट किया था। इनमें से चार ने प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिया। इनमें Tata Trusts के नॉमिनी डायरेक्टर वेणु श्रीनिवासन भी शामिल थे। वहीं, दूसरे Trust नॉमिनी डायरेक्टर नोएल टाटा ने प्रस्ताव के खिलाफ वोट किया।

बैठक की अध्यक्षता कर रहे हरीश मनवानी ने इसके बाद कास्टिंग वोट का इस्तेमाल किया। यह वोट दोनों Trust नॉमिनी डायरेक्टर्स के बीच 1-1 की स्थिति बनने के बाद दिया गया।

उदय ललित ने क्या कहा?

पूर्व चीफ जस्टिस उदय यू ललित ने Tata Sons के पक्ष में राय दी है। उनका कहना है कि Article 104B के तहत नियुक्त डायरेक्टर्स के बीच वोट बराबर होने पर चेयरमैन कास्टिंग वोट दे सकता था।

उनके मुताबिक, इस स्थिति में चेयरमैन के पास कास्टिंग वोट इस्तेमाल करने का आधार था। उन्होंने कहा कि 17 सितंबर को चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति का प्रस्ताव वैध तरीके से पास हुआ।

बीएन श्रीकृष्ण की राय क्या है?

रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट जज बीएन श्रीकृष्ण ने भी बैठक में अपनाई गई प्रक्रिया को सही माना। उनका कहना है कि Article 121 को जिस तरह लागू किया गया, वह उसके नियमों और भावना के मुताबिक है।

उन्होंने कहा कि Trust के नॉमिनी डायरेक्टर्स के बीच मतभेद होने पर बोर्ड का काम रुकना नहीं चाहिए। नियम की ऐसी व्याख्या होनी चाहिए, जिससे बोर्ड अपना काम पूरा कर सके।

वेणु श्रीनिवासन के वोट पर भी सवाल

नोएल टाटा के विरोध के बावजूद वेणु श्रीनिवासन ने चंद्रशेखरन के पक्ष में वोट किया। इस पर भी सवाल उठाए गए।

बीएन श्रीकृष्ण ने कहा कि किसी डायरेक्टर की कंपनी के प्रति कानूनी जिम्मेदारी उस संस्था के प्रति जिम्मेदारी से ऊपर होती है, जिसने उसे नॉमिनेट किया है। अगर दोनों के बीच टकराव हो, तो कंपनी के प्रति कानूनी जिम्मेदारी को प्राथमिकता मिलेगी। उनके मुताबिक, इस मामले में वेणु श्रीनिवासन ने अपनी कानूनी जिम्मेदारी के तहत सही तरीके से काम किया।

पहले भी आ चुकी है कानूनी राय

Tata Sons के पास वरिष्ठ वकील सुदीप्तो सरकार की कानूनी राय भी पहले से थी। यह राय 17 सितंबर की बोर्ड बैठक वाले दिन ही बोर्ड के साथ साझा की गई थी।

सुदीप्तो सरकार की राय में Article 121 की ऐसी व्याख्या की गई थी, जिसके तहत दो स्थितियों में कास्टिंग इस्तेमाल किया जा सकता है। पहली स्थिति तब, जब Trust के नॉमिनी डायरेक्टर्स के वोट बराबर हो जाएं। दूसरी स्थिति तब, जब पूरे बोर्ड के वोट बराबर हों। उन्होंने Article 118 पर भी राय दी थी। यह प्रावधान नए चेयरमैन के चयन के लिए सेलेक्शन कमेटी की बात करता है।

सरकार के मुताबिक, Article 118 चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति पर लागू नहीं होगा। चंद्रशेखरन का मौजूदा कार्यकाल फरवरी 2027 में खत्म होगा। हालांकि, इससे पहले उन्होंने एक और कार्यकाल लेने की इच्छा नहीं जताई थी।

Tata Trusts की राय अलग

दूसरी तरफ, Tata Trusts इस मामले में अलग राय रखता है। 20 सितंबर को Trusts ने कहा था कि दो Trust नॉमिनी डायरेक्टर्स का बहुमत तभी माना जाएगा, जब दोनों चंद्रशेखरन के पक्ष में वोट करें।

Trusts का कहना है कि Article 121 में कास्टिंग वोट का इस्तेमाल तभी किया जा सकता है, जब पूरे बोर्ड के वोट बराबर हों। नोएल टाटा ने प्रस्ताव के खिलाफ वोट किया था। इसलिए Trusts के मुताबिक, यह प्रस्ताव शुरुआत से ही अमान्य था।

Tata Trusts ने अपने पक्ष में पूर्व चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की कानूनी राय का भी हवाला दिया है। इस तरह चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को लेकर Tata Sons और Tata Trusts की कानूनी व्याख्या अलग-अलग है।

Stock in Focus: 1 साल में 568% का मल्टीबैगर रिटर्न, अब डेटा सेंटर के लिए पेश की केबल की नई रेंज

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

गाजा में 2 बोरी आटे के बदले बेटी की शादी:UN रिपोर्ट- रेप पीड़िताओं की आरोपियों से शादी, बाल विवाह 123% बढ़े

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) ने गाजा में महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ बढ़ती हिंसा को लेकर एक रिपोर्ट जारी की है। इसमें बताया गया है कि एक पिता ने अपनी 14 साल की बेटी की शादी 2 बोरी आटे के बदले कर दी। गाजा में रेप पीड़िताओं की शादी आरोपियों से कराए जाने के मामले भी सामने आए हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि परिवार और समाज में बदनामी से बचने और ‘इज्जत’ बनाए रखने के नाम पर पीड़िताओं की शादी आरोपियों से कराई जा रही है। गाजा में बाल और जबरन शादियों के दर्ज मामलों में 123% की बढ़ोतरी हुई है। UNFPA ने यह आंकड़े गाजा में काम कर रही 10 संस्थाओं से जुटाए हैं। इसके अलावा, गाजा सिटी और खान यूनिस के विस्थापन शिविरों में रहने वाली 230 महिलाओं से बातचीत की गई। स्कूल में रेप के बाद उसी जगह शादी और जश्न रिपोर्ट में गाजा सिटी और खान यूनिस के विस्थापन शिविरों में महिलाओं ने रेप के कई मामलों के बारे में बताया। उनके मुताबिक, ऐसी घटनाएं टेंट, शरणस्थल के तौर पर इस्तेमाल हो रहे स्कूलों, गलियों और समुद्र किनारे तक में हुईं। जहां आरोपी पीड़िता को जानता था, वहां कई मामलों को छिपाने की कोशिश की गई। कुछ मामलों में पीड़िता की शादी आरोपी या किसी दूसरे व्यक्ति से करा दी गई। एक महिला ने बताया: जब स्कूल में रेप का मामला सामने आता है, तो अगले दिन उसी स्कूल में शादी और जश्न होते हैं। अपाहिज लड़कियों पर ज्यादा खतरा गाजा में अपाहिज महिलाएं और लड़कियां सबसे ज्यादा खतरे में हैं। कुछ मामलों में आरोपी उनकी यह कमजोरी जानते थे। गाजा सिटी की एक महिला ने बताया कि एक मूक-बधिर लड़की सात घंटे तक गायब रही। वापस आने के बाद वह रो रही थी, लेकिन परिवार को लगा कि वह डर गई है। करीब दो महीने बाद पता चला कि वह गर्भवती थी और उसके साथ रेप हुआ था। आरोपी का पता नहीं चल सका। एक और मामले में 20 साल की एक महिला का जिक्र है, जिसे बातें समझने में दिक्कत होती थी। कई युवकों ने उसका शोषण किया। महिला के मुताबिक उसे ठीक से समझ भी नहीं आया कि उसके साथ क्या हो रहा है। माता-पिता की मौत के बाद बच्चियों की शादी युद्ध में माता-पिता खो चुकी लड़कियां भी कम उम्र में शादी के खतरे में हैं। गाजा सिटी की एक महिला ने बताया कि उसके परिवार की 14 और 15 साल की दो लड़कियों के माता-पिता युद्ध में मारे गए थे। इसके बाद उनके चाचाओं ने दोनों की शादी कर दी। महिला ने बताया, चाचा उनकी जिम्मेदारी और खर्च नहीं उठाना चाहते थे। लड़कियों की शादी उस उम्र में कर दी गई, जब वे यह भी नहीं समझती थीं कि शादी या जिंदगी क्या होती है। UNFPA ने अपनी रिपोर्ट में 12 से 17 साल की लड़कियों की शादी को बाल विवाह माना है। गाजा में युद्ध से पहले भी बाल विवाह की समस्या थी, लेकिन इसके मामलों में कमी आ रही थी। परिवार के सदस्य पर भी रेप का आरोप रिपोर्ट में परिवार के अंदर रेप का एक मामला भी बताया गया है। एक विधवा के साथ उसके पति के भाई ने रेप किया। महिला उस समय सो रही थी। बाद में वह गर्भवती हो गई। परिवार को पता चलने पर आरोपी के परिवार ने दोनों की शादी कराने की कोशिश की। मामला जज के पास ले जाया गया, लेकिन जज ने शादी कराने से इनकार कर दिया। उस समय महिला पति की मौत के बाद धार्मिक नियमों के तहत तय इंतजार की अवधि में थी। जज ने इस मामले को व्यभिचार माना। भीड़भाड़ वाले शिविरों में वैवाहिक रेप का खतरा रिपोर्ट में वैवाहिक रेप के मामलों का भी जिक्र है। महिलाओं ने बताया कि टेंट और दूसरे अस्थायी ठिकानों में बहुत ज्यादा भीड़ है। ऐसे में पति-पत्नी के बीच निजी जगह लगभग खत्म हो गई है। कुछ महिलाओं ने बताया कि वे बच्चों के सामने संबंध बनाने से इनकार करती हैं। इसके बाद उन्हें पीटा गया या जबरन संबंध बनाने के लिए मजबूर किया गया। एक महिला ने बताया कि संबंध बनाने से इनकार करने पर उसके पति ने उसे पीटा। उसका हाथ तोड़ दिया और आंखों पर भी चोट पहुंचाई। उनके टेंट में बच्चों समेत करीब 12 लोग रहते थे। बाद में पति ने स्कूल के बाथरूम में भी उसके साथ जबरन संबंध बनाए।