यूपीआई शुल्क पर रोक से इनकार

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने यूपीआई के जरिए होने वाले लेनदेन पर शुल्क लगाने के केंद्र सरकार के फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। हालांकि सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है और यह पूछा है कि शुल्क लगाने के नए नियम को लागू करने का क्या आधार है। गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने यूपीआई के जरिए होने वाले दो हजार रुपए से ऊपर के लेनदेन पर 0.40 फीसदी शुल्क लगा दिया है। यह 15 अक्टूबर से लागू होगा।

इसे लेकर एक जनहित याचिका दायर की गई है, जिस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की तीन जजों की बेंच ने सुनवाई की। वकील अंजन दत्ता ने यह जनहित याचिका दायर की है। इस पर सुनवाई करते हुए अदालत ने सरकार के फैसले पर रोक लगाने से इनकार किया और सरकार को नोटिस जारी किया।

याचिका में सवाल उठाया गया है कि दो हजार रुपए की सीमा किस आधार पर तय की गई है? इसके अलावा यह भी पूछा गया है कि यूपीआई और रूपे कार्ड के लिए नियम अलग क्यों हैं? याचिका में इसे रद्द करने की मांग की गई है। एडवोकेट अंजन दत्ता की याचिका में यह भी कहा गया कि सरकार ने जनता से चर्चा किए बिना और कोई ठोस नियम बनाए बिना ही यह फीस तय कर दी। इसके अलावा, ‘पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007’ के एक नियम को भी अदालत में चुनौती दी गई। आरोप है कि यह नियम सरकार को अपनी मर्जी से यह फैसला करने की छूट देता है कि कौन सा डिजिटल पेमेंट फ्री रहेगा और किस पर चार्ज लगेगा।

बहरहाल, सोमवार की सुनवाई में सरकार की तरफ से एडिशनल सॉलिसीटर जनरल एन वेंकटरमण ने कहा कि आम लोगों के आपस में पैसे भेजने पर चार्ज नहीं लगेगा। उन्होंने यह भी कहा कि देश के करीब 96 फीसदी छोटे भुगतानों पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। सरकार की ओर से यह भी कहा गया है कि 0.40 फीसदी का शुल्क भी ग्राहकों को नहीं देना होगा, बल्कि दुकानदार को देना होगा।

UPI Charges: ₹2000 से ज्यादा के UPI ट्रांजैक्शन पर चार्ज का रास्ता साफ! सुप्रीम कोर्ट ने स्टे देने से किया इनकार

UPI Merchant Transaction Charges: ₹2,000 से अधिक के मर्चेंट यूपीआई लेनदेन पर शुल्क लगाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट से बड़ा अपडेट आया है। केंद्र सरकार के फैसले पर कोर्ट ने फिलहाल रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया है। वैसे शीर्ष अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है और इस फैसले के कानूनी आधार व तकनीकी पहलुओं को स्पष्ट करने के लिए एक विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है।

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ती जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने वित्त मंत्रालय की ओर से 14 और 15 सितंबर को जारी गजट अधिसूचनाओं को रद्द करने की मांग वाली रिट याचिका पर यह सुनवाई की।

कोर्ट रूम दिखा जबरदस्त ड्रामा

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने यूपीआई लेनदेन पर लगाए जा रहे इस शुल्क के कानूनी स्वरूप और अधिकार क्षेत्र पर कई अहम सवाल उठाए। जस्टिस बागची ने सवाल किया कि, ‘यह फीस या टैक्स नहीं तो आखिर क्या है?’ न्यायमूर्ती जॉयमाल्य बागची ने सरकार की मंशा और अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाते हुए कहा, ‘अगर यह कोई फीस नहीं है, तो फिर इस शुल्क का वास्तविक चरित्र क्या है? 140 करोड़ भारतीयों के लेनदेन पर इस तरह का चार्ज वसूलने का एग्जीक्यूटिव स्कोप क्या है?”

‘सरकार की जेब में एक रुपया भी नहीं जाएगा’- ASG वेंकटरमण

केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल वेंकटरमण ने अदालत में स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा, ‘यह सरकारी टैक्स नहीं है। ASG ने कहा कि यह सरकार द्वारा वसूला जाने वाला कोई टैक्स या वैधानिक कलेक्शन नहीं है। सरकार इसमें से एक भी रुपया अपने पास नहीं रख रही है’।

जैसे क्रेडिट या डेबिट कार्ड स्वाइप करने पर बैंकों और गेटवे का इंफ्रास्ट्रक्चर कॉस्ट आता है, वैसे ही यूपीआई में भी दो प्रमुख ऑपरेटर (बैंक और पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर) शामिल हैं। यह उनके बीच का एक ‘इंटरबैंक सेटलमेंट फीस’ है, जिसे NPCI मैनेज करता है।

‘हमें ये सारे तथ्य हलफनामे पर चाहिए’- CJI सूर्यकांत

CJI सूर्यकांत ने मामले के तकनीकी स्वरूप को देखते हुए कहा कि अदालत को इन सभी दावों और आंकड़ों की लिखित पुष्टि चाहिए। इसलिए केंद्र सरकार को हलफनामा दाखिल कर इस नीतिगत फैसले का आधार समझाना होगा।

क्या आम जनता की जेब पर पड़ेगा असर?

इस सुनवाई के दौरान आम नागरिकों और छोटे व्यापारियों से जुड़े 3 सबसे बड़े आंकड़े सामने आए:

क्या 96% यूजर इससे बाहर हैं?- ASG के अनुसार, गेटवे का इस्तेमाल करने वाले 96% सामान्य ग्राहक और छोटे लेनदेन इससे पूरी तरह मुक्त रहेंगे।

क्या दुकानों पर सामान महंगा होगा?- यह नियम केवल 2,000 रुपये से अधिक के बड़े कमर्शियल लेनदेन (P2M) पर लागू है। आम लोगों के बीच ट्रांसफर (P2P – पर्सन टू पर्सन) पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा।

अत्यावश्यक सेवाओं पर कितना चार्ज?- जरूरी सेवाओं के लिए इस चार्ज की एक ऊपरी सीमा तय की गई है, जो अधिकतम ₹5 ही हो सकती है।

कब से प्रभावी होगा यह नया नियम?

अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को सूचित किया कि इस पूरी व्यवस्था का असर 15 अक्टूबर से धरातल पर दिखना शुरू होगा, जो इसका पहला माइलस्टोन है। सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार का हलफनामा दाखिल होने के बाद इस मामले पर अगली सुनवाई होगी।

(रिपोर्ट: शंकर आनंद)

यूपीआई के मामले पर आज सुनवाई

नई दिल्ली। डिजिटल लेन देने के लिए सरकार के बनाए इकोसिस्टम यूपीआई के जरिए भुगतान पर शुल्क लगाने के केंद्र सरकार के फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को सुनवाई होगी। गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने पिछले दिनों ऐलान किया कि दो हजार रुपए से ऊपर के लेनदेन पर 0.40 फीसदी शुल्क लगेगा। यह शुल्क 15 अक्टूबर से लगना चालू होगा। पूरे देश में इसका विरोध हो रहा है।

ध्यान रहे यूपीआई आने के बाद पिछले छह साल से इसके जरिए होने वाले लेनदेन पर कोई शुल्क नहीं लगाया जाता था। अब केंद्र सरकार ने 15 अक्टूबर से यूपीआई के जरिए दुकानदार को दो हजार रुपए से ज्यादा के भुगतान पर 0.40 प्रतिशत शुल्क लागू किया है, जिसे 75 हजार रुपए या उससे अधिक के भुगतान पर अधिकतम तीन सौ रुपए तक सीमित किया गया है। हालांकि, आम नागरिकों के बीच होने वाले पर्सन टू पर्सन लेनदेन पूरी तरह मुफ्त रखे गए हैं।

केंद्र सरकार के इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है, जिस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच सुनवाई करेगी। यह जनहित याचिका अधिवक्ता रंजन दत्ता ने  दायर की है, जिसमें 14 सितंबर की अधिसूचना और 15 अक्टूबर से शुल्क लागू होने को चुनौती दी गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि यह शुल्क बिना किसी पर्याप्त वैधानिक सुरक्षा, पारदर्शिता या सार्वजनिक परामर्श के जल्दबाजी में लागू किया गया है। याचिका में ‘पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007’ की संशोधित धारा 10ए की संवैधानिकता पर भी सवाल उठाए गए हैं।

IRDAI New Rules: पॉलिसीधारकों की बल्ले-बल्ले, डिस्ट्रीब्यूटर्स को झटका! जानिए IRDAI के नए प्रस्ताव से आपको कैसे होगा फायदा

IRDAI Commission & Expense Cap Impact: देश में बीमा सेक्टर तेजी से बढ़ा है, लेकिन जिस रफ्तार से लोगों की जेब से प्रीमियम का पैसा निकला है, उस रफ्तार से असली बीमा कवरेज का विस्तार नहीं हुआ है। दूसरी ओर, बीमा बेचने का खर्च और बिचौलियों का कमीशन इतनी तेजी से बढ़ा है कि यह सवाल उठने लगा था कि क्या ग्राहकों को उनके प्रीमियम का सही मूल्य मिल रहा है या नहीं?

इसी समस्या से निपटने के लिए भारतीय बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण (IRDAI) ने इंश्योरेंस डिस्ट्रीब्यूशन रिफॉर्म्स पर एक कंसल्टेशन पेपर जारी किया है। नियामक ने बीमा कंपनियों के मैनेजमेंट खर्च (EoM) को घटाने के लिए 5 साल का रोडमैप प्रस्तावित किया है, साथ ही एजेंटों और कॉर्पोरेट एजेंटों के भारी-भरकम कमीशन पर नकेल कसने की तैयारी की है।

आइए आसान भाषा में समझते हैं कि IRDAI के इन कड़े प्रस्तावों से इंश्योरेंस सेक्टर पर क्या असर पड़ेगा, क्यों पॉलिसीधारकों को इसका सीधा फायदा मिलेगा और कंपनियों-बिचौलियों के लिए यह कितना बड़ा झटका है।

क्यों पड़ी सुधारों की जरूरत?

IRDAI के आंकड़ों से साफ जाहिर होता है कि पिछले एक दशक में भारत में इंश्योरेंस की पैठ में कोई खास सुधार नहीं हुआ है:

पॉलिसी की संख्या जस की तस: वित्त वर्ष 2016 में देश में करीब 266 लाख नई इंडिविजुअल लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसियां बिकी थीं, जो वित्त वर्ष 2025 में मामूली बढ़कर केवल 270 लाख हो पाईं। कुल इन-फोर्स पॉलिसियां भी 3,270 लाख के आसपास ही स्थिर बनी हुई हैं।

जीडीपी के बराबर ही ग्रोथ: देश की जीडीपी ग्रोथ दर पिछले 10 सालों में औसतन 10% रही है। इसी अवधि में लाइफ इंश्योरेंस 10% और जनरल इंश्योरेंस बिजनेस 13% की दर से बढ़ा है। यानी बढ़ती आमदनी के बावजूद इंश्योरेंस सेक्टर अर्थव्यवस्था से आगे निकलने में नाकाम रहा है।

2047 तक ‘सबके लिए बीमा’ का लक्ष्य काफी दूर: जनरल इंश्योरेंस में पॉलिसियों की संख्या तो बढ़ी है, लेकिन ‘2047 तक सबके लिए बीमा’ के राष्ट्रीय लक्ष्य को हासिल करने के हिसाब से यह रफ्तार काफी धीमी है।

बिजनेस का खर्च और कमीशन में भारी उछाल

जहां एक तरफ ग्राहकों की संख्या नहीं बढ़ रही थी, वहीं दूसरी तरफ बीमा कंपनियों और उनके एजेंटों के खर्च आसमान छू रहे थे:

ऊंचा कॉस्ट ऑफ डूइंग बिजनेस: लाइफ इंश्योरेंस कंपनियों का कॉस्ट ऑफ डूइंग बिजनेस (CoDB) 18% से 39% तक पहुंच गया है (LIC और SBI Life को छोड़कर, जिनका CoDB 10-12% है)। जनरल इंश्योरेंस में यह 20% से 48% के बीच है।

कमीशन में 125% से 173% का उछाल: वित्त वर्ष 2023 से 2025 के बीच कॉर्पोरेट एजेंटों (जैसे- बैंक और ऑनलाइन एग्रीगेटर्स) के जरिए आने वाला नया प्रीमियम 28% बढ़ा, लेकिन उनका कुल कमीशन और पेआउट 125% बढ़ गया! जनरल इंश्योरेंस ब्रोकर्स का प्रीमियम 37% बढ़ा, जबकि उनका कमीशन 173% तक उछल गया।

30-60% एक्स्ट्रा रिवॉर्ड्स: बेस कमीशन के अलावा ब्रोकर्स और एजेंटों को 30% से 60% तक का अतिरिक्त इंसेंटिव/रिवॉर्ड दिया जा रहा था, जिसका पूरा बोझ सीधे ग्राहकों के प्रीमियम पर पड़ रहा था।

IRDAI का नया फॉर्मूला: कितना घटेगा कंपनियों का खर्च?

IRDAI ने कंपनियों के मैनेजमेंट खर्च की सीमा घटाने का 5 साल का रोडमैप तैयार किया है:

लाइफ इंश्योरेंस कंपनियां: मौजूदा 30% की सीमा को घटाकर 2 साल के अंदर 15% और 5 साल के अंदर 12.5% पर लाना होगा।

जनरल इंश्योरेंस कंपनियां: मौजूदा सीमा को घटाकर 2 साल में 25% और 5 साल में 20% तक सीमित करना होगा।

प्रीमियम पेइंग टर्म के हिसाब से तय होगा कमीशन

ग्राहकों के लिए राहत की बात यह है कि अब पॉलिसी की अवधि के हिसाब से पहले साल का कमीशन फिक्स करने का प्रस्ताव है:

5 साल से कम पीपीटी (PPT): एजेंसियों के लिए अधिकतम कमीशन 5% और एजेंटों के लिए 6.25%।

5 साल का पीपीटी: एजेंसियों के लिए 10% और एजेंटों के लिए 12.5%।

6 से 8 साल का पीपीटी: एजेंसियों के लिए 14% और एजेंटों के लिए 17.5%।

10 साल या उससे अधिक का पीपीटी: एजेंसियों के लिए अधिकतम 20% और एजेंटों के लिए 25% तय होगा।

कंपनियों और डिस्ट्रीब्यूटर्स पर असर: क्यों मची भगदड़?

कमीशन और ऑपरेटिंग खर्चों पर नकेल कसने के प्रस्तावों से इंश्योरेंस डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों की कमाई पर सीधा असर पड़ेगा।

शेयरों में भारी गिरावट: इस प्रस्ताव के सामने आते ही पीबी फिनटेक (पॉलिसीबाजार) और टर्टलमिंट जैसे फिनटेक प्लेटफॉर्म्स के शेयरों व वैल्यूएशन में 35% से ज्यादा का भारी क्रैश दर्ज किया गया।

एजेंटों का उत्साह घट सकता है: आईआईएफएल (IIFL) की रिपोर्ट के अनुसार, कमीशन घटने से डिस्ट्रीब्यूटर्स का रुझान कम हो सकता है, जिससे नए बिजनेस वॉल्यूम और फ्रेश कैपिटल इनफ्लो पर अल्पकालिक असर देखने को मिल सकता है।

पॉलिसीधारकों को कैसे मिलेगा सीधा फायदा?

भले ही यह प्रस्ताव कंपनियों और एजेंटों के मार्जिन के लिए झटका हो, लेकिन आम ग्राहकों के लिए यह एक बहुत बड़ा वरदान साबित हो सकता है:

कम प्रीमियम और बेहतर रिटर्न: जब डिस्ट्रीब्यूशन और मैनेजमेंट कॉस्ट घटेगा, तो सेविंग्स पॉलिसियों (जैसे- एंडोमेंट या यूलिप) में ग्राहकों के प्रीमियम का बड़ा हिस्सा सीधे इन्वेस्टमेंट में जाएगा। इससे मैच्योरिटी पर ज्यादा रिटर्न मिलेगा।

सस्ती हो सकती हैं पॉलिसियां: ऑपरेटिंग कॉस्ट कम होने से कंपनियां इंश्योरेंस प्रोडक्ट्स के दाम यानी प्रीमियम रेट्स घटा सकती हैं।

क्लेम और सर्विस पर फोकस बढ़ेगा: अभी तक एजेंटों का ध्यान केवल नई पॉलिसी बेचने पर रहता था। IRDAI का जोर अब पॉलिसी पर्सिस्टेंसी, बेहतर सलाह और सुचारू क्लेम सेटलमेंट पर है।

शिकायतों में कमी: जनरल इंश्योरेंस में ‘बीमा भरोसा’ पोर्टल पर दर्ज शिकायतें FY23 में 78,347 से बढ़कर FY25 में 1,37,361 हो गई थीं, जिनमें से 69% शिकायतें केवल क्लेम से जुड़ी थीं। खर्चों पर लगाम लगने से कंपनियां क्लेम सर्विसिंग पर ज्यादा ध्यान दे पाएंगी।

NSE IPO Listing: ₹1800 पर लिस्ट एनएसई का ₹1140 का शेयर, 1% से कम लिस्टिंग गेन

NSE IPO Listing: देश के सबसे बड़े एक्सचेंज एनएसई के शेयरों की आज BSE पर 1% से कम प्रीमियम पर एंट्री हुई। इसके आईपीओ को ओवरऑल 5 गुना से अधिक बोली मिली थी। आईपीओ के तहत ₹1140 के भाव पर शेयर जारी हुए हैं। आज BSE पर इसकी ₹1800.00 पर एंट्री हुई है यानी कि आईपीओ निवेशकों को महज 0.84% का लिस्टिंग गेन (Krystal Integrated Services Listing Gain) मिला। लिस्टिंग के बाद शेयर और ऊपर चढ़े। उछलकर यह ₹1827.95 (NSE Share Price) पर पहुंच गया यानी कि आईपीओ निवेशक अब 2.41% मुनाफे में हैं। एंप्लॉयीज अधिक फायदे में हैं क्योंकि उन्हें हर शेयर ₹108 के डिस्काउंट पर मिला है।

कैसा रिस्पांस मिला था NSE IPO को

एनएसई का ₹22,562 करोड़ का आईपीओ सब्सक्रिप्शन के लिए 17-21 सितंबर तक खुला था। यह आईपीओ ओवरऑल 5.71 गुना सब्सक्राइब हुआ था। इसमें क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल बायर्स (QIB) के लिए आरक्षित हिस्सा 12.68 गुना (एक्स-एंकर), नॉन-इंस्टीट्यूशनल इनवेस्टर्स (NII) का हिस्सा 6.55 गुना और खुदरा निवेशकों का हिस्सा 1.39 गुना और एंप्लॉयीज का हिस्सा 2.40 गुना भरा था।

इस आईपीओ के तहत कोई नया शेयर नहीं जारी हुआ है बल्कि ऑफर फॉर सेल विंडो के तहत ₹1 की फेस वैल्यू वाले 12,64,36,650 शेयर ऑफर फॉर सेल विंडो के तहत बिके हैं। चूंकि कोई नया शेयर नहीं जारी हुआ है तो कंपनी को आईपीओ का पैसा नहीं मिला है बल्कि शेयर बेचने वाले शेयरहोल्डर्स को मिला है।

NSE के बारे में

एनएसई देश का सबसे बड़ा स्टॉक एक्सचेंज है और दुनिया के सबसे बड़े मल्टी-एसेट एक्सचेंज प्लेटफॉर्म्स में शुमार है। इसकी शुरुआत साल 1992 में हुई थी। यह इक्विटी, डेरिवेटिव्स, करेंसी डेरिवेटिव्स, कमोडिटीज, डेट सिक्योरिटीज और म्यूचुअल फंड्स जैसे एसेट क्वास में ट्रेडिंग, क्लियरिंग, सेटलमेंट, लिस्टिंग, मार्केट डेटा, इंडेक्स सर्विसेज और रेगुलेटरी ओवरसाइट को लेकर एक इंटीग्रेटेड इकोसिस्टम मुहैया कराती है।

एनएसई ने देश में लगातार कैश मार्केट टर्नओवर, इक्विटी डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग और करेंसी डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग में अपनी बादशाहत बरकरार रखी है। जून 2026 तक के आंकड़ों के मुताबिक इस पर 26.13 करोड़ से अधिक निवेशक रजिस्टर्ड हैं तो 12.9 करोड़ यूनिक इंवेस्टर्स और 1328 ट्रे़डिंग मेंबर्स हैं। इसके अलावा एनएसई पर 3005 कंपनियां लिस्टेड हैं जिनका जून 2026 तक के आंकड़ों के मुताबिक मार्केट कैप करीब ₹474 लाख करोड़ है। इसके अलावा मार्च 2026 के आखिरी में कैश मार्केट में टर्नओवर के हिसाब से एनएसई की हिस्सेदारी 99.79%, इक्विटी फ्यूचर्स में 74.71%, इक्विटी ऑप्शंस में 99.48% और एक्सचेंज-ट्रेडेड करेंसी ऑप्शंस में 100% हिस्सेदारी है। इसके अलावा एनएसई क्लियरिंग लिमिटेड की भी वित्त वर्ष 2026 में कैश मार्केट में 88.42%, इक्विटी डेरिवेटिव्स में 91.04% और एक्सचेंज-ट्रेडेड डेरिवेटिव्स में 74.09% हिस्सेदारी है।

एक्सचेंज के वित्तीय सेहत की बात करें तो वित्त वर्ष 2024-26 में इसका शुद्ध मुनाफा सालाना 11% से अधिक की रफ्तार यानी CAGR से बढ़कर ₹10,302.06 करोड़ पर पहुंच गया। हालांकि इस दौरान टोटल इनकम में उठा-पटक दिखी और वित्त वर्ष 2024 में ₹16,352.06 करोड़ और वित्त वर्ष 2025 में ₹19,176.83 करोड़ से यह वित्त वर्ष 2026 में ₹18,713.37 करोड़ पर आ गया। चालू वित्त वर्ष 2027 की बात करें तो जून 2026 तिमाही में इसे ₹3,120.08 करोड़ का शुद्ध मुनाफा और ₹5,252.17 करोड़ का टोटल इनकम हासिल हुआ था। जून 2026 तिमाही के आखिरी में एक्सचेंज के रिजर्व और सरप्लस में ₹34,996.73 करोड़ पड़े थे।

डिस्क्लेमर: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Bank Strike: जानिए पीएनबी, यूनियन बैंक और बैंक ऑफ इंडिया ने तीन दिन की हड़ताल से पहले एंप्लॉयीज से क्या अपील की

Bank Strike: अगले हफ्ते सरकारी और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (आरआरबी) में तीन दिन की हड़ताल है। इन बैंकों की सभी शाखाओं में हड़ताल की वजह से 28 सितंबर से लेकर 30 सितंबर तक कामकाज नहीं होगा। 28 सितंबर को सोमवार है, जबकि 30 सितंबर को बुधवार है। इसका मतलब है कि अगले हफ्ते सरकारी बैंकों और आरआरबी में सिर्फ तीन दिन ही सामान्य कामकाज होंगे।

बैंकों ने एंप्लॉयीज को भेजे नए मैसेजेज

पंजाब नेशनल बैंक (PNB), यूनियन बैंक ऑफ इंडिया (UBI), बैंक ऑफ इंडिया (BOI) और इंडियन बैंक ने अपने ग्राहकों को हड़ताल की वजह से होने वाली दिक्कतों से बचाने के लिए कदम उठाए हैं। इन बैंकों ने तीन दिन की प्रस्तावित हड़ताल से पहले अपने एंप्लॉयीज को नए मैसेज भेजे हैं। UBI ने अपने सभी एंप्लॉयीज को भेजे कम्युनिकेशंस में एंप्लॉयीज वेल्फेयर के लिए किए गए उपायों के बारे में बताया है।

एंप्लॉयीज को उनके फायदों से जुड़े कदमों के बारे में बताया

UBI ने एंप्लॉयीज को वेज सेटलमेंट के बाद पे और अलाउन्स में हुई वृद्धि, वेल्फेयर से जुड़े ज्यादा फायदे, रिक्रूटमेंट, रिटायरमेंट बाद के बेनेफिट्स और एचआर रिफॉर्म्स के बारे में बताया है। बैंक ने एंप्लॉयीज से हड़ताल में शामिल नहीं होने को कहा है। उनसे यह सुनिश्चित करने को कहा गया है कि बैंकिंग सेवाओं में किसी तरह की बाधा नहीं आए। दूसरे सरकारी बैंकों ने भी अगले हफ्ते की तीन दिन की हड़ताल से पहले अपने एंप्लॉयीज को मैसेजेज भेजे हैं। इनमें उन्हें बैंकिंग ऑपरेशंस और ग्राहक सेवाएं बनाए रखने को कहा गया है।

वित्त मंत्रालय ने भी बैंकों के एंप्लॉयीज से अपील की

वित्त मंत्रालय ने भी 21 सितंबर को सरकारी बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के एंप्लॉयीज से प्रस्तावित हड़ताल में शामिल नहीं होने की अपील की है। मंत्रालय ने कहा है कि सरकार ने पहले ही परफॉर्मेंस लिंक्ड इनसेंटिव (PLI) को ठंडे बस्ते में डाल दिया है। हफ्ते में पांच दिन कामकाज के मसले पर भी विचार चल रहा है।

हफ्ते में पांच दिन कामकाज की मांग सबसे ऊपर

बैंकों के एंप्लॉयीज की सबसे बड़ी मांग हफ्ते में पांच दिन के कामकाज की है। उनका कहना है कि उनकी इस मांग पर काफी समय बीत जाने के बाद भी फैसला नहीं हुआ है। यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस (UFBU) का कहना है कि मार्च 2024 में जिस वेज रिवीजन सेटलमेंट पर हस्ताक्षर हुआ था उसमें बैंकों में हफ्ते में पांच दिन कामकाज का प्रस्ताव भी शामिल था। लेकिन, इसे अब तक लागू नहीं किया गया।

22 सितंबर को दोनों पक्षों के बीच हुई बातचीत

22 सितंबर को UFBU से हुई बातचीत में इंडियन बैंक एसोसिएशन (IBA) और डिपार्टमेंट ऑफ फाइनेंशियल सर्विसेज (DFS) के प्रतिनिधियों ने यूनियन फोरम को कहा था कि पांच दिन कामकाज के हफ्ते पर विचार चल रहा है। उनका कहना था कि यूनियन फोरम को यह हड़ताल टाल देनी चाहिए। लेकिन, UFBU ने कहा कि वह हड़ताल वापस लेने के प्रस्ताव पर तभी विचार करेगी, जब इस मसले पर ठोस प्रगति होती है।

Stocks to Watch: 23 सितंबर को फोकस में रहेंगे ये 7 शेयर, अदाणी और टाटा ग्रुप के स्टॉक्स पर भी रहेगी नजर

Stocks to Watch:  बुधवार 23 सितंबर को शेयर बाजार में कई कंपनियां अहम खबरों के चलते फोकस में रह सकती हैं। अदाणी और टाटा ग्रुप की कंपनियों से जुड़े अहम अपडेट आए हैं। साथ ही कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का असर भी कुछ शेयरों पर दिख सकता है। वहीं, हिस्सेदारी बढ़ाने, प्रमोटर सेल और नए स्टोर से जुड़े अपडेट भी हैं।

Adani Group Stocks

अडानी ग्रुप की कंपनियां फोकस में रहेंगी। SEBI ने Adani Enterprises, Adani Total Gas, AWL Agri Business, Adani Green Energy और Adani Energy Solutions से जुड़े मामलों को ₹1.51 करोड़ के सेटलमेंट के साथ निपटाया है। मामला हिंडनबर्ग रिपोर्ट में उठाए गए RPT और कॉरपोरेट गवर्नेंस से जुड़े सवालों से जुड़ा था।

OMCs Stocks

सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियां यानी OMCs फोकस में रहेंगी। कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट देखने को मिली है। Brent क्रूड 98 डॉलर प्रति बैरल के नीचे आ गया है। अमेरिका और ईरान के बीच संभावित बातचीत की खबरों से तेल बाजार पर असर पड़ा है।

Tata Group Stocks

टाटा ग्रुप की कंपनियों के शेयरों पर भी नजर रहेगी। Tata Sons के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को लेकर विवाद जारी है। NCP (SP) प्रमुख शरद पवार ने Tata Trusts की भूमिका और ग्रुप की मौजूदा ट्रस्ट-आधारित व्यवस्था को बनाए रखने की बात कही है।

Persistent Systems

आईटी सेक्टर की कंपनी Persistent Systems ने Nagarro में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई है। कंपनी ने 61.15% अतिरिक्त हिस्सेदारी हासिल की है। इसके साथ Nagarro में उसकी कुल हिस्सेदारी 83.25% हो गई है। अतिरिक्त शेयरों के लिए स्वीकृति अवधि 23 सितंबर से 6 अक्टूबर तक चलेगी।

HDFC Bank

प्राइवेट सेक्टर के बैंक HDFC Bank में नए MD और CEO के फैसले पर नजर रहेगी। बैंक के बोर्ड ने RBI को दो नाम भेजे हैं। दोनों नाम तीन साल के कार्यकाल के लिए मंजूरी के लिए भेजे गए हैं। बैंक ने अभी आधिकारिक तौर पर नामों का खुलासा नहीं किया है।

Allied Blenders & Distillers

शराब बनाने वाली कंपनी Allied Blenders & Distillers के प्रमोटर बीना किशोर छाबड़िया 55 लाख तक शेयर बेच सकती हैं। यह कंपनी की करीब 1.97% हिस्सेदारी है। बिक्री का मकसद न्यूनतम पब्लिक शेयरहोल्डिंग की जरूरत पूरी करना है।

Allcargo Terminals

लॉजिस्टिक्स सेक्टर की कंपनी Allcargo Terminals के अगस्त के कुल वॉल्यूम में बढ़ोतरी हुई है। कंपनी का कुल वॉल्यूम 65.6 हजार TEUs रहा। यह पिछले साल के मुकाबले 6% और जुलाई के मुकाबले 5% ज्यादा है।

360 ONE WAM

वेल्थ मैनेजमेंट सेक्टर की कंपनी 360 ONE WAM ने Aashish Agarwal को CEO नियुक्त किया है। उनकी नियुक्ति 15 फरवरी 2027 से प्रभावी होगी। इसी तारीख से MD Karan Bhagat को Vice Chairman की जिम्मेदारी भी दी जाएगी।

IRB Infrastructure Developers

इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर की कंपनी IRB Infrastructure Developers के बोर्ड ने कुछ संपत्तियों को बेचकर रकम जुटाने की मंजूरी दी है। बोर्ड ने इस प्रक्रिया के लिए कंपनी को अधिकृत भी किया है। अब कंपनी इन एसेट्स के मॉनेटाइजेशन की दिशा में आगे बढ़ सकती है।

Shoppers Stop

रिटेल सेक्टर की कंपनी Shoppers Stop ने अपनी मौजूदगी बढ़ाई है। कंपनी ने अहमदाबाद के Sindhu Bhavan और जबलपुर के Mall 11 में नए स्टोर खोले हैं। इसके साथ 31 अगस्त 2026 तक कंपनी के डिपार्टमेंट स्टोर्स की कुल संख्या 117 हो गई है।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

SEBI ने अदाणी ग्रुप की पांच कंपनियों का केस ₹1.51 करोड़ में निपटाया, हिंडनबर्ग रिपोर्ट से जुड़ा था मामला

कैपिटल मार्केट रेगुलेटर SEBI ने अदाणी ग्रुप की पांच कंपनियों के खिलाफ चल रहे मामले को सेटल कर दिया है। इन कंपनियों ने कुल ₹1.51 करोड़ का भुगतान किया है। यह मामला अमेरिकी शॉर्ट सेलर हिंडनबर्ग रिसर्च की रिपोर्ट के खुलासे से जुड़ा था। उसमें रिलेटेड पार्टी ट्रांजैक्शंस (RPT) और कॉरपोरेट गवर्नेंस से जुड़े सवाल उठाए गए थे।

SEBI ने हिंडनबर्ग रिपोर्ट के आरोपों की जांच के दौरान इन मामलों की पड़ताल की थी। इसमें SEBI के Listing Obligations and Disclosure Requirements (LODR) नियमों, पुराने Listing Agreement और दूसरे लागू नियमों के संभावित उल्लंघन को देखा गया था।

इन पांच कंपनियों ने कितनी रकम दी?

सेटलमेंट के तहत Adani Enterprises ने ₹76.05 लाख दिए हैं। Adani Green Energy ने ₹45.50 लाख का भुगतान किया है। वहीं, Adani Total Gas, AWL Agri Business और Adani Energy Solutions ने ₹9.75 लाख-₹9.75 लाख दिए हैं।

इन पांचों रकम को जोड़ें तो कुल भुगतान करीब ₹1.51 करोड़ बैठता है।

Adani Enterprises पर क्या मामला था?

SEBI की कार्यवाही में Adani Enterprises पर अपनी एनुअल रिपोर्ट में कुछ रिलेटेड पार्टी ट्रांजैक्शंस यानी ग्रुप कंपनियों के बीच लेनदेन की जानकारी नहीं देने का आरोप था। इसके अलावा कंपनी की ऑडिट और लिमिटेड रिव्यू रिपोर्ट्स ऐसी ऑडिट फर्मों ने साइन की थीं, जिनके पास वैध Peer Review Certificate नहीं था।

यह सर्टिफिकेट ऑडिट फर्म की क्वालिटी रिव्यू प्रक्रिया से जुड़ा प्रमाणपत्र है। SEBI ने इसी से जुड़े नियमों के संभावित उल्लंघन को भी कार्यवाही में शामिल किया था।

बाकी कंपनियों पर क्या आरोप थे?

Adani Total Gas, AWL Agri Business और Adani Green Energy के मामले में भी ऑडिट या लिमिटेड रिव्यू रिपोर्ट्स से जुड़ा मुद्दा था। इन रिपोर्ट्स पर ऐसी ऑडिट फर्म ने हस्ताक्षर किए थे, जिसके पास वैध सर्टिफिकेट नहीं था।

Adani Energy Solutions के मामले में जून 2015 की तिमाही की लिमिटेड रिव्यू रिपोर्ट को लेकर इसी तरह की आपत्ति थी।

कंपनियों ने आरोप स्वीकार नहीं किए

इन कंपनियों ने SEBI के साथ मामले को सेटल करने का रास्ता चुना। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि कंपनियों ने SEBI के जांच के नतीजों को स्वीकार कर लिया।

सेटलमेंट के तहत कंपनियों ने तथ्यों से जुड़े निष्कर्षों या कानूनी निष्कर्षों को न तो स्वीकार किया और न ही खारिज किया।

सितंबर में पूरा हुआ सेटलमेंट

SEBI की हाई पावर्ड एडवाइजरी कमेटी ने जून 2026 में संशोधित सेटलमेंट टर्म्स की सिफारिश की थी। इसके बाद अगस्त में SEBI के होलटाइम मेंबर्स के पैनल ने इन शर्तों को मंजूरी दी।

कंपनियों ने 5 सितंबर को SEBI को बताया कि सेटलमेंट की रकम जमा कर दी गई है। SEBI ने भी भुगतान मिलने की पुष्टि की। इसके बाद 22 सितंबर को SEBI ने इन मामलों को खत्म कर दिया।

क्या अब SEBI दोबारा कार्रवाई नहीं कर सकता?

ऐसा नहीं है। सेटलमेंट ऑर्डर में SEBI ने अपने अधिकार सुरक्षित रखे हैं। अगर सेटलमेंट के दौरान कंपनियों की ओर से दी गई कोई जानकारी बाद में गलत पाई जाती है, सेटलमेंट की शर्तों का उल्लंघन होता है या रकम तय करने में कोई गड़बड़ी सामने आती है, तो SEBI आगे कार्रवाई कर सकता है।

ऐसी स्थिति में SEBI पुरानी कार्यवाही को फिर से शुरू कर सकता है या नया एक्शन शुरू कर सकता है।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।