परिसीमन से अब जुड़ गई फेरबदल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में फेरबदल का मामला कई महीने से चर्चा में है। अब कहा जा रह है कि पहले परिसीमन का बिल पास होगा और उसके बाद ही फेरबदल होगी। परिसीमन बिल का अर्थ है कि एक साथ तीन बिल पास कराना है। उसमें सबसे अहम महिला आरक्षण कानून में संशोधन का बिल है, जिसके लिए दो तिहाई बहुमत की जरुरत है। सरकार और भाजपा के प्रबंधक संख्या जुटाने में लगे हैं। जानकार सूत्रों का कहना है कि संख्या जुटाने के अभियान में मंत्रिमंडल फेरबदल का इस्तेमाल होना है। नई पार्टियों और नए नेताओं को मंत्री बनाने का प्रलोभन दिया जा रहा है।

पार्टियों को सरकार में शामिल कराने के प्रयास चल रहे हैं। बताया जा रहा है कि एक साथ कई प्रयास हो रहे हैं। एमके स्टालिन की पार्टी को एनडीए में लाने का प्रयास हो रहा है तो ममता बनर्जी की पार्टी से अलग होकर 20 सांसद जिस एनसीपीआई में गए हैं उसके विलय की बात हो रही है। अगल विलय नहीं होता है तो 17 सांसद भाजपा में शामिल हो सकते हैं और बाकी तीन सरकार को बाहर से समर्थन देंगे।

भाजपा को सबसे ज्यादा उम्मीद डीएमके से है। उसको लग रहा है कि कांग्रेस और उसके साथ ही जितनी सेकुलर पार्टियां हैं, जिनमें लेफ्ट पार्टियां भी शामिल हैं उनका टीवीके से स्थायी तालमेल हो गया। दूसरी ओर अन्ना डीएमके नीचे जा रही है। पिछले चुनाव में जीती उसकी दो सीटों पर उपचुनाव हुए थे। उन दोनों सीटों पर अन्ना डीएमके तीसरे स्थान पर चली गई। ई पलानीस्वामी के असर वाले पश्चिमी तमिलनाडु के कोंगू क्षेत्र में अन्नाडीएमके तीसरे स्थान पर रही और डीएमके दूसरे स्थान पर आ गई। इससे लग रहा है कि अब अगले कुछ दिन डीएमके बनाम टीवीके मुकाबला होगा।

ऐसे में डीएमके को एनडीए में आने में समस्या नहीं है। अगर डीएमके एनडीए में आए तो 22 लोकसभा सांसदों के दम पर उसे कम से कम चार मंत्री पद देने होंगे। यह फैसला होने के बाद ही मंत्रिमंडल में फेरबदल का काम होगा। शरद पवार अपनी पार्टी के एनडीए में जाने की संभावना से इनकार कर रहे हैं। लेकिन भाजपा की ओर से प्रयास किया जा रहा है। अगर वे एनडीए में नहीं जाते हैं तो उनकी पार्टी भी टूट सकती है। उनमें से दो को मंत्री पद देने की बात है।

गौरतलब है कि उद्धव ठाकरे की शिव सेना के छह सांसद एकनाथ शिंदे गुट में शामिल हो गए हैं। इससे उसके सांसदों की संख्या 13 हो गई है। वह जनता दल यू से बड़ी पार्टी बन गई है। ऐसे में उसके नेता कम से कम दो मंत्री पद और मांग रहे हैं। एकनाथ शिंदे के बेटे श्रीकांत शिंदे के मंत्री बनने की चर्चा है। इसी तरह एनसीपीआई में गए ममता बनर्जी की पार्टी के कम से कम तीन सांसदों को मंत्री बनाए जाने की खबर है। इस तरह जो मंत्री पद खाली हैं और जो खाली होने वाले हैं उनके दावेदार भाजपा से बाहर ज्यादा हैं। जनता दल यू ने भी एक मंत्री पद की मांग रखी है। पहले जदयू के सांसद हरिवंश नारायण सिंह राज्यसभा के उप सभापति थे। लेकिन अब वे मनोनीत सांसद हैं। इस वजह से जदयू की ओर से संजय झा के लिए एक मंत्री पद की दावेदारी रखी गई है। सो, डीएमके, एनसीपीआई, शिव सेना, जदयू जैसी सहयोगी पार्टियों की ओर से कम से कम 10 मंत्री पद की मांग है। अगर परिसीमन से पहले मंत्रिमंडल फेरबदल होगी तो जितने लोग संतुष्ट होंगे उससे ज्यादा लोग नाराज होंगे। इस समय सरकार एक भी सांसद की नाराजगी अफोर्ड करने की स्थिति में नहीं है।

दीपके, नेहा पुलिस हिरासत में

नई दिल्ली। दिल्ली पुलिस ने कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके को हिरासत में लेकर उनका तिरंगा मार्च रोक दिया। दीपके अपने समर्थकों के साथ शाम पांच बजे के करीब कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में तिरंगा मार्च निकालने जा रहे थे। लेकिन पुलिस ने वहां पहुंचने से पहले ही उनको हिरासत में ले लिया गया। हालांकि उनके कुछ समर्थक तिरंगा लेकर सेंट्रल पार्क पहुंच गए थे और वहां तिरंगा फहराया। सीपीआई माले के छात्र संगठन आइसा की अध्यक्ष नेहा बोरा को भी पुलिस ने हिरासत में लिया है। सीजेपी ने देर शाम कहा कि दीपके को दिल्ली पुलिस किसी अज्ञात जगह ले गई है।

दिल्ली पुलिस ने डेढ़ सौ अन्य लोगों को भी हिरासत में लिया है। दीपके को छह दिन में दूसरी बार दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया। इससे पहले 10 अक्टूबर को जंतर मंतर पर प्रदर्शन करने के लिए आए दीपके को इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे पर ही हिरासत में ले लिया गया था। एक दिन बाद 11 अक्टूबर को दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका एक बॉन्ड भर कर रिहा हुए थे। पांच दिन बाद उनको फिर से हिरासत में लिया गया। दीपके को हिरासत में लिए जाने के बाद तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी ने इसे अघोषित आपातकाल बताया।

गौरतलब है कि सीजेपी का तिरंगा मार्च रोकने के लिए एनडीएमसी ने सेंट्रल पार्क को दिन के लिए बंद कर दिया था और पुलिस ने नई दिल्ली जिले में बीएनएसएस की धारा 163 लागू कर दी है। इसके तहत चार या उससे ज्यादा लोगों के इकट्ठा होने पर रोक है। बहरहाल, दीपके को हिरासत में लेने से पहले दिल्ली पुलिस झंडेवालान स्थित उस घर पर पहुंची थी, जहां वे ठहरे हुए थे। पुलिस ने उन्हें प्रदर्शन नहीं करने का नोटिस दिया था। यह घर शरद पवार की एनसीपी के एक नेता का है।

पुलिस जब उनको नोटिस देने गई तो इस दौरान दीपके की पुलिस से बहस हो गई थी। दीपके ने पुलिस से कहा कि यह कोई रैली या प्रोटेस्ट नहीं है। उन्होंने कहा, ‘हम सिर्फ सेंट्रल पार्क तक जाकर तिरंगा फहराना चाहते हैं’। गौरतलब है कि कॉकरोच जनता पार्टी ने शुक्रवार, 16 अक्टूबर को शाम पांच बजे ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च का ऐलान किया था। सीजेपी ने प्रदर्शनकारियों को शाम पांच बजे कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में आने के लिए कहा था।

दूसरी ओर इस मार्च को रोकने के लिए दिल्ली में 28 हजार से ज्यादा सुरक्षा बलों को तैनात किया गया था। अर्धसैनिक बलों के साथ साथ दिल्ली पुलिस के जवानों ने पूरे कनॉट प्लेस को घेर लिया था। सात लेयर की बैरिकेडिंग की गई थी। ऐसी की बैरिकेडिंग और सुरक्षा बंदोबस्त करके 10 अक्टूबर का जंतर मंतर का प्रदर्शन भी रोका गया था। उस दिन सात हजार के करीब लोग हिरासत में लिए गए थे।

ज्ञानेश का इस्तीफा लेकर रहेंगे

नई दिल्ली। राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं ने मंगलवार को यह लाइन दोहराई। उन्होंने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा लेकर रहेंगे, चाहे इसमें जितना समय लगे और जितना आंदोलन करना पड़े। लगातार कई दिन के प्रदर्शन के बाद मंगलवार को विपक्ष की एक दर्जन पार्टियों के नेता राहुल गांधी के घर पर इकट्ठा हुए। वहां ‘इंडिया’ ब्लॉक की बैठक हुई। करीब दो घंटे की इस बैठक के बाद सभी नेताओं ने बाहर आकर साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस की। सभी नेताओं ने अपनी बात रखी।

बैठक के बाद मीडिया से बात करते हुए राहुल गांधी ने कहा, ‘मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा लेना हमारा मिशन है। इसमें जितना भी समय लगे, एक दिन, एक साल या दो साल, हमारा आंदोलन जारी रहेगा’। राहुल ने आगे कहा, ‘विपक्ष लोकतांत्रिक प्रक्रिया बहाल करने के लिए अंत तक संघर्ष करेगा’। जंतर मंतर को प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थानों की सूची से हटाने के मुद्दे पर राहुल ने कहा, ‘सरकार ने तय कर लिया है कि जंतर मंतर का इस्तेमाल लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने के लिए नहीं किया जा सकता। हम सरकार की इस सोच को चुनौती देंगे’।

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष ने कहा, ‘नरेंद्र मोदी, अमित शाह, ज्ञानेश कुमार और अन्य लोगों को समझना होगा कि संविधान को नुकसान पहुंचा कर बच निकलना इतना आसान नहीं होगा। ऐसे लोगों को न्याय के कटघरे में लाया जाएगा देश में लोकतंत्र को नष्ट कर दिया गया है। चुनावी व्यवस्था को तहस-नहस कर दिया गया है और संविधान को फाड़कर फेंक दिया गया है’।

राहुल ने मीडिया से कहा, ‘यह लड़ाई हमारे लिए नहीं, भारत के लोगों और उनके भविष्य के लिए है। हम सभी मिलकर देश में लोकतांत्रिक प्रक्रिया बहाल करने के लिए अंत तक लड़ेंगे। कोई भी संस्था अपनी भूमिका निभाए या न निभाए, राजनीतिक विरोध जारी रहेगा, जनता का संघर्ष जारी रहेगा और अंत में उसकी जीत होगी’। उन्होंने आगे कहा, ‘विपक्ष का संघर्ष जारी रहेगा और वह अपने लक्ष्य तक पहुंचकर रहेगा। इसमें कल, परसों या दो साल भी लग जाएं, हमारी टीम रुकने वाली नहीं है’।

पिछले आठ दिन में विपक्षी नेताओं की यह छठी बैठक थी। इसमें राहुल के अलावा कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, शरद पवार की एनसीपी की नेता सुप्रिया सुले, सीबीआई महासचिव डी राजा, राजद के तेजस्वी यादव, उद्धव ठाकरे की शिव सेना के संजय राउत और अन्य नेता शामिल हुए। सीपीआई एमएल के छात्र संगठन आईसा की नेता नेहा बोरा भी बैठक में शामिल हुईं।  बाद में उन्होंने भी मीडिया के सामने अपनी बात रखी। गौरतलब है कि एक दिन पहले सोमवार को विपक्ष ने ‘चलो दिल्ली मार्च’ किया था और सुप्रीम कोर्ट जाकर मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने और एसआईआर रद्द करने की याचिका दी थी।

विपक्ष का सुप्रीम कोर्ट तक मार्च

नई दिल्ली। राहुल गांधी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरोध में नए नए तरीके आजमा रहे हैं। सोमवार को उन्होंने एक नई मिसाल कायम की। एक दर्जन विपक्षी पार्टियों के नेताओं के साथ राहुल ने सुप्रीम कोर्ट तक मार्च किया। विपक्षी नेताओं के मार्च को सुप्रीम कोर्ट से आधा किलोमीटर दूर रोक दिया गया। वहां से विपक्ष के चुनिंदा नेता सुप्रीम कोर्ट में पहुंचे और ज्ञानेश कुमार के खिलाफ याचिका दायर की। यह याचिका 10 विपक्षी राजनीतिक दलों के 11 नेताओं की ओर से दायर की गई है।

इससे पहले राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, प्रियंका गांधी वाड्रा और विपक्ष के अन्य नेताओं के साथ सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च किया। जब विपक्ष के नेता सुप्रीम कोर्ट के अंदर गए तो वहां राहुल गांधी की लीगल टीम पहले से मौजूद थी। लीगल टीम ने याचिका तैयार कर रखी थी, जिसमें मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में गड़बड़ी के आरोप लगाए गए हैं।

गौरतलब है कि कांग्रेस नेताओं ने रविवार को चिट्ठी लिख कर चीफ जस्टिस से मिलने का समय मांगा था। विपक्ष उनको ज्ञापन देना चाहता था। लेकिन चीफ जस्टिस ने मिलने का समय देने से इनकार कर दिया था। उन्होंने हितों के टकराव, शक्तियों के पृथक्करण और मामला न्यायालय के विचाराधीन होने के हवाले मिलने का समय देने से इनकार किया था। इसके बाद विपक्ष ने सुप्रीम कोर्ट तक मार्च करने का फैसला किया। राहुल ने इससे पहले एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की, जिसमें उन्होंने कहा कि उनका मार्च शिवजी की बारात की तरह है, जिसमें जो चाहे वह शामिल हो सकता है। इसके बाद राहुल कांस्टीट्यूशन क्लब पहुंचे, जहां से विपक्ष ने मार्च शुरू किया।

राहुल गांधी के मार्च में देरी होने पर उनकी कानूनी टीम ने दोपहर में सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री के शाम साढ़े चार बजे बंद होने की समय सीमा के बाद याचिका दाखिल करने के लिए समय बढ़ाने की मांग कर रही है। आम तौर पर ऐसे मामलों में पक्षकार सुप्रीम कोर्ट की ई फाइलिंग सेवा का इस्तेमाल कर सकते हैं, जो 24 घंटे उपलब्ध रहती है।

मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ याचिका दायर करने वालों में कांग्रेस से राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे शामिल हैं। उनके अलावा समाजवादी पार्टी से अखिलेश यादव, तृणमूल कांग्रेस से सौगत राय, राजद से तेजस्वी यादव, उद्धव ठाकरे की शिव सेना से संजय राउत, सीपीएम महासचिव एमए बेबी, सीपीआई महासचिव डी राजा, जेएमएम सांसद महुआ माझी, शरद पवार की एनसीपी से सुप्रिया सुले और मुस्लिम लीग से ईटी मोहम्मद बशीर शामिल हैं।

सुप्रीम कोर्ट तक मार्च में शामिल सपा के नेता अखिलेश यादव ने कहा, ‘आंदोलन और धरना जारी रहेगा। लोकतंत्र को बचाना हमारी जिम्मेदारी है। बीजेपी, चुनाव आयोग के साथ मिलकर संविधान और लोकतंत्र को खत्म करना चाहती है। वह हमेशा सत्ता में बने रहना चाहती है। वे फर्जी वोटर लिस्ट बनाते हैं, फर्जी वोट डालते हैं और चुनाव के नतीजे तैयार करते हैं’। राजद के नेता तेजस्वी यादव ने कहा, ‘देश की जनता उन्हें नहीं भूलेगी। हम सभी लोकतंत्र और संविधान को बचाने के लिए एकजुट हुए हैं। अब उन्हें सजा देने का समय आ गया है’।

ज्ञानेश को हटाओ, SIR वापस लो: इंडिया गठबंधन का SC मार्च

इंडिया गठबंधन के नेताओं और सांसदों ने वोट चोरी का आरोप लगाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई की मांग, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर रोक लगाने और ‘वोट चोरी’ के आरोपों की जांच की मांग को लेकर सोमवार को यहां बाराखंभा रोड से उच्चतम न्यायालय तक मार्च निकाला जिसमें बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी शामिल हुए।

विपक्षी गठबंधन एसआईआर की प्रक्रिया पर रोक लगाने, मतदाता सूची से कथित तौर पर गलत तरीके से हटाए गए नामों के मामले में हस्तक्षेप करने और चुनावी व्यवस्था में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की मांग कर रहा है। गठबंधन का कहना है कि मताधिकार की रक्षा और चुनावी प्रक्रिया में जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए इन मुद्दों पर न्यायिक हस्तक्षेप आवश्यक है।

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इंडिया गठबंधन के मार्च में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी, पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव, कर्नाटक के मुख्यमंत्री एवं कांग्रेस नेता डी. के. शिवकुमार, तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी, कांग्रेस नेता सचिन पायलट, हिमाचल प्रदेश सरकार में मंत्री विक्रमादित्य सिंह, राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी(शरद पवार) की सुप्रिया सुले कांग्रेस महासचिव के. सी. वेणुगोपाल, समाजवादी पार्टी के सांसद धर्मेंद्र यादव, शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के सांसद संजय राउत और अरविंद सावंत, झारखंड मुक्ति मोर्चा की नेता महुआ माझी तथा ममता तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा सहित विपक्षी दलों के कई अन्य नेता शामिल हुए।

मार्च के दौरान विपक्षी सांसदों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ नारे लगाए और उनको हटाने की मांग करते रहे। प्रदर्शनकारियों ने ‘वोट चोरों’ को सत्ता की गद्दी छोड़ने की मांग करते हुए आरोप लगाया है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया में अनियमितताओं से पात्र मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। श्री वेणुगोपाल ने कहा कि यह शक्ति प्रदर्शन नहीं बल्कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव व्यवस्था के खिलाफ सबसे बड़ा आंदोलन है।

उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तेमाल देश के लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाने के लिए कर रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि विपक्ष की लड़ाई भारत के मुख्य न्यायाधीश या उच्चतम न्यायालय के खिलाफ नहीं बल्कि मुख्य चुनाव आयुक्त, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के खिलाफ है। उन्होंने आरोप लगाया कि देश के लोकतांत्रिक मूल्यों और सिद्धांतों को कमजोर किया जा रहा है।

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हिरासत में लेकर राहुल को हटाया

नई दिल्ली। सुरक्षा बलों की भारी घेरेबंदी के बीच दिल्ली पुलिस ने रात आठ बजे राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा को हिरासत में लिया और उनका ‘सत्याग्रह’ खत्म कराया। हिरासत में लिए जाने से पहले राहुल और प्रियंका कांग्रेस के अन्य नेताओं के साथ संसद मार्ग पर स्थित आकाशवाणी भवन के परिसर में करीब आठ घंटे तक धरने पर बैठे रहे। राहुल ने ऐलान कर दिया था कि मुख्य चुनाव आयुक्त से मिले बगैर वे वहां से नहीं हटने वाले हैं। उन्होंने कहा कि विपक्ष के तीन सौ सांसदों से नहीं मिल कर मुख्य चुनाव आयुक्त लोकतंत्र का अपमान कर रहे हैं।

बहरहाल, रात आठ बजे के करीब भारी सुरक्षा बंदोबस्त के बीच दिल्ली पुलिस ने राहुल और प्रियंका को हिरासत में लिया। दोनों को बस में बैठा कर आकाशवाणी परिसर से हटाया गया। इससे पहले जब पुलिस की टीम राहुल और प्रियंका को हटाने पहुंची तो कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने घेरा बना लिया। कांग्रेस के कई कार्यकर्ताओं ने उस बरगद की जड़ पकड़ ली, जिसके नीचे राहुल धरने पर बैठे थे। लेकिन पुलिस ने बल प्रयोग करके सबको वहां से हटा दिया और धरने की जगह को खाली करा लिया।

गौरतलब है कि मंगलवार की सुबह कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों ने चुनाव आयोग के मुख्यालय निर्वाचन सदन की ओर मार्च किया। सैकड़ों सांसदों और पार्टियों के नेताओं ने संसद भवन से निर्वाचन सदन की ओर मार्च किया। लेकिन पुलिस ने उनको नीति आयोग के पहले रोक दिया। आंदोलन का नेतृत्व कर रहे राहुल गांधी रोके जाने पर बैरिकेड के ऊपर चढ़ गए। बाद में राहुल और दूसरे विपक्षी नेता आकाशवाणी भवन के परिसर में घुस गए और वहां धरने पर बैठ गए। उन्होंने कहा कि वे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से मिले बगैर नहीं जाएंगे। उन्होंने यह भी कहा कि संविधान उन्हें प्रदर्शन की इजाजत देता है।

राहुल गांधी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर 19 विपक्षी पार्टियों के ‘सेव डेमोक्रेसी मार्च’ का नेतृत्व कर रहे थे। कांग्रेस के अलावा समाजवादी पार्टी, शरद पवार की एनसीपी, लालू प्रसाद की राजद, हेमंत सोरेन की जेएमएम और ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस सहित ज्यादातर विपक्षी पार्टियों के नेता इस मार्च में शामिल हुए। गौरतलब है कि 30 सितंबर को हुई बैठक में विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ ब्लॉक ने एसआईआर में वोट चोरी का आरोप लगाते हुए निर्वाचन सदन के घेराव का ऐलान किया था।

मंगलवार को निर्वाचन सदन का घेराव करने जा रहे विपक्षी नेताओं को पुलिस ने रोक दिया। इसके बाद राहुल और प्रियंका को हिरासत में लेकर बस में बैठाया गया। लेकिन वे उतर कर आकाशवाणी परिसर में पेड़ के नीचे बैठ गए। राहुल ने आरोप लगाया कि ज्ञानेश कुमार ने वोट चोरी में भाजपा की मदद की। गौरतलब है कि आकाशवाणी से चुनाव आयोग का मुख्यालय सिर्फ ढाई सौ मीटर दूर है। राहुल वहां तक जाने देने की मांग कर रहे हैं। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की खोजी रिपोर्ट के बाद पिछले पांच दिन में चुनाव आयोग के खिलाफ दिल्ली और मुंबई में सात प्रदर्शन हुए हैं।

राहुल ‘जेन जी’ के मतदाताओं से कनेक्ट बनाने के लिए प्रदर्शन में ‘ज्ञानेश, इट्स डन ब्रो’ का पोस्टर लेकर पहुंचे थे। राहुल पुलिस के लगाए बैरिकेड पर भी चढ़ गए, जिसकी तस्वीरें सोशल मीडिया में खूब वायरल हुई। विपक्ष के इस प्रदर्शन की वजह से सेंट्रल दिल्ली में दिन भर जाम लगा रहा।

आज निर्वाचन सदन घेरेगा विपक्ष

नई दिल्ली। मंगलवार का दिन दिल्ली में एक बार फिर बड़े प्रदर्शन का दिन होगा। विपक्षी पार्टियों के सभी बड़े नेता चुनाव आयोग के मुख्यालय यानी निर्वाचन सदन की ओर मार्च करेंगे और उसका घेराव करेंगे। 30 सितंबर को हुई विपक्षी पार्टियों की बैठक में इसका फैसला किया गया था। विपक्षी गठबंधन यानी ‘इंडिया’ ब्लॉक के सांसद दिल्ली में ‘सेव डेमोक्रेसी मार्च’ निकालेंगे। वे संसद से चुनाव आयोग मुख्यालय तक करीब दो किलोमीटर पैदल जाएंगे।

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि कांग्रेस पार्टी की तीन मांगे ऐसी हैं, जिन पर कोई समझौता नहीं होगा यानी ये  नॉन नेगोशिएबल हैं। उन्होंने लिखा कि कांग्रेस की पहली मांग यह है कि ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा हो। दूसरी मांग है कि एसआईआर को रद्द किया जाए और तीसरी मांग है कि बैलट पेपर से चुनाव कराया जाए। खड़गे ने कहा कि देश भर में कांग्रेस कार्यकर्ता और ‘इंडिया’ ब्लॉक के साथी दल इन तीन मुद्दों को लेकर सड़कों पर हैं।

गौरतलब है कि इससे पहले 11 अगस्त 2025 को विपक्षी गठबंधन के सांसदों ने संसद भवन से चुनाव आयोग के ऑफिस तक मार्च निकाला था। इसमें राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे, शरद पवार सहित 25 विपक्षी दल शामिल हुए थे। इस बार मंगलवार, छह अक्टूबर को विपक्ष की 19 पार्टियां के नेता मार्च निकालेंगे। इनके लोकसभा में 178 और राज्यसभा में 62 सांसद हैं।

ज्ञानेश है भाजपा का हथियारः उद्धव

मुंबई। शिवसेना (उबाठा) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने रविवार को मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार पर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के ‘हथियार’ के रूप में काम करने का आरोप लगाया। वहीं महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना प्रमुख राज ठाकरे ने महाराष्ट्र में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को रद्द करने और भविष्य के चुनाव मतपत्र से कराने की मांग की।

सीईसी और एसआईआर के खिलाफ ठाकरे बंधुओं के नेतृत्व में मुंबई में निकाले गए ‘विराट गर्जना मोर्चा’ में हजारों लोग शामिल हुए। मार्च के बाद हुई रैली में कांग्रेस नेता बालासाहेब थोराट और विजय वडेट्टीवार तथा शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) के जयंत पाटिल, शशिकांत शिंदे, जितेंद्र आव्हाड और अनिल देशमुख भी शामिल हुए।

उद्धव ठाकरे ने सवाल किया कि अगर एसआईआर मतदाता सूची से बांग्लादेशियों को बाहर करने के लिए कराया गया था तो सरकार बताए कि देश में अवैध रूप से रह रहे कितने बांग्लादेशियों का पता लगाया गया है। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया, ‘ज्ञानेश कुमार भाजपा का हथियार हैं।’

निर्वाचन आयोग को निशाना बनाते हुए उद्धव ने दावा किया कि महाराष्ट्र में एसआईआर के दौरान दो करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। उन्होंने कहा कि इसी तरह की कवायद में पश्चिम बंगाल में 30 लाख और तमिलनाडु में 70 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं।

उद्धव ठाकरे ने नूर्नबर्ग मुकदमों की तर्ज पर भाजपा नेताओं के खिलाफ अभियोजन की चेतावनी भी दी। उन्होंने कहा, ‘भाजपा और इन अधिकारियों को समझ लेना चाहिए कि देश में भी ऐसा ही होगा।’

उन्होंने कहा कि विपक्षी दलों की लड़ाई किसी एक पार्टी या नेता, धर्म या जाति के लिए नहीं, बल्कि देश की स्वतंत्रता के लिए है। उद्धव ने दावा किया, ‘भाजपा को समझ लेना चाहिए कि लोग आज शांत हैं। अगर वे आक्रोशित हो गए तो वे उसका सिंहासन जला देंगे।’

उद्धव ने भाजपा पर न केवल वोट और विधायकों को ‘चुराने’ का आरोप लगाया, बल्कि अयोध्या में राम मंदिर के लिए मिले चढ़ावे को भी ‘चुराने’ का आरोप लगाया।

शिवसेना (उबाठा) प्रमुख ने इस सप्ताह की शुरुआत में पश्चिम बंगाल में एसआईआर से जुड़े मामले की तत्काल सुनवाई नहीं करने को लेकर उच्चतम न्यायालय की भी आलोचना की। यह मामला राज्य में उपचुनाव से एक दिन पहले तत्काल सुनवाई के लिए उठाया गया था। अदालत इस मामले पर पांच अक्टूबर को सुनवाई करेगी, जबकि राज्य की दो विधानसभा सीटों पर उपचुनाव छह अक्टूबर को होने हैं।

उद्धव ने दावा किया, ‘यह दिखाता है कि वे सभी संस्थानों को किस तरह नियंत्रित कर रहे हैं।’ राज ठाकरे ने महाराष्ट्र में एसआईआर की प्रक्रिया रद्द करने की मांग करते हुए कहा कि देश में भविष्य के चुनाव मतपत्र के जरिए कराए जाने चाहिए। उन्होंने कहा कि वे 2017-18 से ही राजनीतिक नेताओं को निर्वाचन निकाय में कथित ‘अनियमितताओं’ के बारे में बताते रहे हैं।

मनसे प्रमुख ने कहा कि उन्होंने ईवीएम और मतदाता सूची के मुद्दे पर तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मुलाकात की थी। उन्होंने दोनों नेताओं से इन मुद्दों के स्पष्ट होने तक चुनाव का बहिष्कार करने का आग्रह भी किया था।

दक्षिण मुंबई के मेट्रो सिनेमा से शुरू हुआ विरोध मार्च कुछ ही दूरी तय कर बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) मुख्यालय पहुंचा। एसआईआर प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं के विरोध में आयोजित इस मार्च में सीईसी ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने या उनके इस्तीफे की मांग की गई।

मार्च में राजनीतिक दलों के झंडे ले जाने की अनुमति नहीं थी। प्रतिभागियों से केवल राष्ट्रीय तिरंगा साथ रखने को कहा गया था। प्रदर्शनकारियों का समर्थन करते हुए कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने कहा कि शहर एक बार फिर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आया है। सभी भारतीयों से एकजुट होने का आह्वान करते हुए दीपके ने कहा, ‘अब या कभी नहीं।’

मतदाताओं का नहीं पार्टियों का प्रदर्शन है

असल में कुछ प्रक्रियागत मामलों में चुनाव आयुक्तों की असहमति थी, जिसे उन्होंने जाहिर किया और आयोग ने उसे ठीक किया। जब इसकी रिपोर्ट मीडिया में आई तो विपक्ष ने इसको अपने लिए अवसर मान कर प्रदर्शन शुरू कर दिया। यह विशुद्ध रूप से एक राजनीतिक आंदोलन है, जो राजनीतिक दलों द्वारा प्रायोजित है और विपक्षी राजनीतिक दलों के फायदे के लिए है। आम मतदाता भी इस बात को समझ रहा है।

महात्मा गांधी की जयंती यानी दो अक्टूबर पर देश के कई हिस्सों में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शन हुए। हाल के महीनों में दूसरी बार राजनीतिक दलों और गैर राजनीतिक संगठनों ने सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन किया। दिल्ली से मुंबई तक खूब शोरगुल हुआ। लेकिन जून और जुलाई में दिल्ली के जंतर मंतर पर चले 36 दिन के आंदोलन और गांधी जयंती पर हुए इस आंदोलन में एक बुनियादी अंतर है, जो अलग अलग जगहों पर प्रदर्शनों में दिख भी रहा है। 20 जून से शुरू होकर 25 जुलाई तक जंतर मंतर पर चला आंदोलन पेपर लीक से प्रभावित हुए छात्रों और उनके समर्थन में उतरे एक नए संगठन कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी का था। बाद में लेफ्ट पार्टियों और समाजवादी पार्टी के अलावा शरद पवार की एनसीपी और उद्धव ठाकरे की शिव सेना के नेता भी इसमें शामिल हुए थे। लेकिन बुनियादी रूप से वह आंदोलन प्रभावित छात्रों का था, जिनकी संख्या बहुत बड़ी थी।

गौरतलब है कि 2026 की नीट परीक्षा करीब 24 लाख छात्रों ने दी थी, जो पेपर लीक होने और दोबारा परीक्षा होने से प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हुए थे। उसी समय कई और परीक्षाओं में गड़बड़ी की खबरें आई थीं, जिनसे प्रभावितों की संख्या बहुत बड़ी हो गई थी। तभी उस आंदोलन का आयाम बहुत बड़ा हो गया था। हजारों लोग हर दिन प्रदर्शन में शामिल हो रहे थे और लाखों नहीं, बल्कि करोड़ों लोग हर दिन डिजिटल माध्यम से उस आंदोलन से जुड़ रहे थे। लोगों का एक भावनात्मक लगाव आंदोलन से दिख रहा था। आंदोलन की जगह पर मीडिया और सोशल मीडिया के लोग जब किसी से बात करते थे तो वह प्रभावित परिवार का हिस्सा निकलता था। प्रभावित छात्र या उसके परिजन आंदोलन में शामिल थे इसलिए उसकी तीव्रता बहुत ज्यादा थी। उसमें आक्रोश भी बहुत ज्यादा था।

तभी सरकार ने छात्रों व युवाओं की भावनाओं को समझा और उस हिसाब से कार्रवाई की। सरकार ने दो बड़े मंत्रियों को भेज कर बात कराई, सोनम वांगचुक का अनशन समाप्त कराया और छात्रों की सारी मांगें मान कर आंदोलन खत्म कराया।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए अभी जो आंदोलन हो रहा है वह बुनियादी रूप से छात्रों व युवाओं को आंदोलन से भिन्न है। यह प्रभावित पक्ष का आंदोलन नहीं है। इसमें ऐसे लोग नहीं दिख रहे हैं, जिनके वोट कट गए हैं। याद करें कैसे जंतर मंतर पर आंदोलन के दौरान उन छात्रों की तस्वीरें रखी गई थीं, जिन्होंने पेपर लीक के बाद सुसाइड किया था। उनके परिजनों को आंदोलन में आमंत्रित किया गया था। इस बार का आंदोलन चाहे दिल्ली का जंतर मंतर हो या मुंबई का शिवाजी पार्क कहीं भी प्रभावित लोग नहीं दिखे।

प्रदर्शनकारियों ने ऐसे लोगों को मंच पर नहीं प्रस्तुत किया, जिनका नाम कट गया है। अगर यह आंदोलन मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में नाम काटे जाने के खिलाफ है तो इसमें अनिवार्य रूप से उन लोगों को शामिल होना चाहिए, जिनके नाम कटे हैं। हालांकि यह जरूरी नहीं है कि हर बार प्रभावित पक्ष ही आंदोलन करे। कई बार प्रभावित पक्ष ऐसा करने में सक्षम नहीं होता है तो उसकी लड़ाई सिविल सोसायटी या राजनीतिक दल लड़ते हैं। लेकिन जब प्रभावितों की संख्या करोड़ों में हो और मुद्दा राजनीतिक अधिकार का हो तब निश्चित रूप से प्रभावित लोग इसमें शामिल होते हैं।

मिसाल के तौर पर राजधानी दिल्ली में 47 लाख लोगों के नाम कटे हैं। दिल्ली में एसआईआर से पहले 1.45 करोड़ मतदाता थे, जिनमें से अब 97 लाख ही मतदाता बचे हैं। अगर दिल्ली के साथ एनसीआर मिला लें यानी नोएडा, गाजियाबाद और गुरुग्राम को जोड़ दें तो नाम कटने वालों की संख्या एक करोड़ के करीब पहुंच जाएगी। अगर इनमें से एक फीसदी आदमी भी आंदोलन करने उतरे तो वह संख्या एक लाख होगी। लेकिन दो अक्टूबर को दिल्ली के आंदोलन में 10 हजार लोग नहीं जुटे, जबकि आम आदमी पार्टी और लेफ्ट की तीनों पार्टियों ने भीड़ जुटाने के लिए पूरा जोर लगाया था। लेफ्ट की तीन पार्टियों के छात्र संगठन लगे हुए थे और परदे के पीछे से कांग्रेस के छात्र संगठन के लोग भी जुटे थे। फिर भी भीड़ नहीं जुटी, जबकि जून और जुलाई में हुए आंदोलन में बिना किसी प्रयास के लोग जुट रहे थे।

जाहिर है वोट कटने वाले आंदोलन से आम आदमी का जुड़ाव नहीं बन रहा है। जबकि यह एक राजनीतिक मुद्दा है। यह महंगाई या बेरोजगारी की तरह कोई सार्वभौमिक मुद्दा नहीं है, बल्कि व्यक्ति के राजनीतिक अधिकार से जुड़ा मुद्दा है और व्यापक रूप से वैयक्तिक है। तभी इस मुद्दे को लेकर हो रहे आंदोलन में प्रभावितों को शामिल होना चाहिए था, जो नहीं हो रहे हैं। इसका अर्थ है कि यह कोई वास्तविक मुद्दा नहीं है, बल्कि राजनीतिक दलों द्वारा गढ़ा गया एक मुद्दा है, जिसका मकसद धारणा को प्रभावित करना है।

पहले दिन से यह स्पष्ट दिख रहा है कि एसआईआर के खिलाफ आंदोलन स्वंयस्फूर्त नहीं है, बल्कि राजनीतिक दलों द्वारा प्रायोजित है, जिसका उद्देश्य देश में एक झूठा नैरेटिव स्थापित करना है। राहुल गांधी ने पिछले साल जून में बिहार में एसआईआर शुरू होने के बाद इसके खिलाफ 16 दिन तक यात्रा की थी। उसी समय उनको लग गया था कि इससे जनता का कनेक्ट नहीं है। बाद में नतीजों से यह प्रमाणित भी हुआ। तभी उन्होंने यह मुद्दा छोड़ दिया था। कॉकरोच जनता पार्टी के दिल्ली के सफल आंदोलन के बाद राहुल गांधी को यह चिंता सताने लगी है कि राजनीति में नई शक्तियों का उदय हो रहा है।

जिस तरह से आम आदमी पार्टी ने दिल्ली और पंजाब में कांग्रेस को रिप्लेस किया और टीवीके ने तमिलनाडु में डीएमके व अन्ना डीएमके दोनों को रिप्लेस किया उस तरह किसी नई शक्ति के उभरने और किसी अन्य राज्य में कांग्रेस को रिप्लेस करने का खतरा भी कांग्रेस को दिख रहा है। इसलिए भी वह ऐसे गढ़े हुए मुद्दों पर आंदोलन कर रही है या उसमें शामिल हो रही है ताकि प्रासंगिकता बनी रहे।

वास्तविकता यह है कि एसआईआर का मुद्दा आम आदमी का मुद्दा है ही नहीं। यह राजनीतिक दलों का मुद्दा है, जो अपनी लगातार हो हार का ठीकरा चुनाव आयोग पर फोड़ना चाहती हैं। विपक्षी पार्टियों की हार राजनीतिक कारणों से है। उनकी संगठनात्मक क्षमता कमजोर होने और नेतृत्व की कमी से उनकी हार हो रही है। लेकिन अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखने और खुद को दिलासा देने के लिए वे चुनाव आयोग को निशाना बना रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि एसआईआर की प्रक्रिया में कानूनी और तकनीकी वजहों से कुछ ऐसे लोगों के नाम कटे होंगे, जो वास्तव में मतदाता हैं। लेकिन उनकी संख्या बहुत कम है और उनके पास नाम जुड़वाने के विकल्प हैं। जितनी संख्या में विपक्ष दावा कर रहा है अगर उतनी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के नाम कटे होते तो अब तक देश में क्रांति हो गई होती।

चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर एक अंग्रेजी अखबार की जिस रिपोर्ट के बाद से नए सिरे से आंदोलन शुरू हुए हैं वह रिपोर्ट भी तकनीकी और कानूनी असंगति को ज्यादा दिखाती है। उसमें भी यह कहीं नहीं कहा गया है कि दोनों चुनाव आयुक्त एसआईआऱ के फैसले से सहमत नहीं हैं। एसआईआर का फैसला पूर्ण चुनाव आयोग का संपूर्ण सहमति से किया गया फैसला है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट की भी मुहर है। चुनाव आय़ोग संविधान से मिले अधिकार के तहत ही यह काम कर रहा है। असल में कुछ प्रक्रियागत मामलों में चुनाव आयुक्तों की असहमति थी, जिसे उन्होंने जाहिर किया और आयोग ने उसे ठीक किया। जब इसकी रिपोर्ट मीडिया में आई तो विपक्ष ने इसको अपने लिए अवसर मान कर प्रदर्शन शुरू कर दिया। यह विशुद्ध रूप से एक राजनीतिक आंदोलन है, जो राजनीतिक दलों द्वारा प्रायोजित है और विपक्षी राजनीतिक दलों के फायदे के लिए है। आम मतदाता भी इस बात को समझ रहा है। इसलिए वह इन प्रदर्शनों में शामिल नहीं हो रहा है।  (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)

शरद पवार की सरकार से अलग लाइन

शरद पवार ने सारी अटकलों पर विराम लगा दिया है। कम से कम अभी कुछ दिन के लिए यह चर्चा थम गई है कि पवार अपनी पार्टी का विलय सुनेत्रा पवार की पार्टी में कर सकते हैं। उन्होंने कहा है कि वे अपनी पार्टी का विलय नहीं करेंगे और किसी को जरुरत है तो वह आकर उनकी पार्टी में विलय करे। यानी अगर सुनेत्रा पवार को परिवार की एकजुटता की चिंता है तो वे अपनी पार्टी का विलय शरद पवार की पार्टी में करें। हालांकि ऐसा होने की संभावना नहीं है क्योंकि सुनेत्रा पवार और उनके बेटे पार्थ पवार को अलग और स्वतंत्र राजनीति रास आ रही है। उनको अकेले मराठा राजनीति करनी है। लेकिन शरद पवार की इस घोषणा से यह तय हो गया कि अभी वे विलय नहीं कर रहे हैं और न एनडीए के साथ जा रहे हैं।

सवाल है कि ऐसा कैसे हो गया? कुछ दिन पहले तक लग रहा था कि अगर शरद पवार विलय नहीं करते हैं या एनडीए के साथ नहीं जाते हैं तो पार्टी टूट जाएगी। उनकी पार्टी के 10 में से सात या आठ विधायकों और आठ में से कम से कम छह सांसदों के टूटने की खबर थी। हालांकि तब भी यह खबर आई थी कि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से यह मैसेज किया गया है कि शरद पवार का ख्याल रखना है। पवार ने न सिर्फ विलय से इनकार किया है, बल्कि उससे पहले खुल कर टाटा ट्रस्ट के चेयरमैन नोएल टाटा का समर्थन किया। उन्होंने टाटा संस की लिस्टिंग के मामले में नोएल टाटा का साथ दिया। माना जा रहा है कि सरकार की शह पर टाटा संस की लिस्टिंग की तैयारी हो रही है। तभी ऐसा लग रहा है कि राजनीतिक और आर्थिक दोनों मोर्चों पर शरद पवार ने सरकार से अलग लाइन तय की है।