विपक्ष की बैठक आज

नई दिल्ली। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में हुई गड़बड़ियों और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की मनमानियों को लेकर हुए खुलासे के बाद विपक्षी पार्टियों की एक अहम बैठक बुधवार को होगी। विपक्षी गठबंधन यानी ‘इंडिया’ ब्लॉक की पार्टियों के नेताओं की यह बैठक दिल्ली में होगी। हालांकि बैठक से पहले विपक्ष का बिखराव भी साफ दिख गया है। कई पार्टियों के नेता इसमें नहीं शामिल हो रहे हैं।

पिछली बैठक की ही तरह इस बार भी डीएमके और आम आदमी पार्टी इस बैठक में नहीं शामिल होंगे। गौरतलब है कि इस बैठक के समन्वय का काम कांग्रेस पार्टी देख रही है और बताया जा रहा है कि उसने आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल को न्योता नहीं दिया। बहरहाल, समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव भी बैठक में नहीं शामिल होंगे। यह भी कहा जा रहा है कि उनके चाचा रामगोपाल यादव भी बैठक से दूर रहेंगे और पार्टी की ओर से कोई अन्य नेता शामिल होगा। उद्धव ठाकरे भी बैठक के लिए दिल्ली नहीं आ रहे हैं। वे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बैठक में शामिल होंगे।

विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ ब्लॉक की पिछले तीन साल में यह आठवीं बैठक है। जून 2024 में लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद यह तीसरी बैठक है। लोकसभा के चुनाव नतीजों के तुरंत बाद एक बैठक हुई थी। उसके दो साल बाद आठ जून 2026 को बैठक हुई थी। उसमें एसआईआर और चुनाव आयोग को लेकर चर्चा हुई। उसमें तय हुआ था कि दो महीन बाद अगस्त में हैदराबाद में बैठक होगी। लेकिन वह बैठक नहीं हुई। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की खोजी रिपोर्ट के बाद ममता बनर्जी ने विपक्ष की बैठक बुलाने की पहल की।

बहरहाल, बैठक से एक दिन पहले मंगलवार को बताया गया कि अखिलेश यादव 30 सितंबर को लखनऊ में किसानों के सम्मेलन में शामिल होंगे। कहा जा रहा है कि उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से इस बारे में बात भी की है। हालांकि कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने कहा कि अखिलेश राज्यसभा चुनाव के नामांकन से जुड़ी व्यस्तता के कारण नहीं आएंगे।

बैठक में कांग्रेस की ओर से मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी शामिल होंगे। तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी भी इसमें शामिल होंगे। राजद के तेजस्वी यादव, जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और सीपीएम के महासचिव एमए बेबी बैठक में शामिल होंगे। शरद पवार की पार्टी के भी बैठक में शामिल होने की खबर है। गौरतलब है कि पिछले दिनों एमए बेबी ने दिल्ली में अरविंद केजरीवाल से मुलाकात की थी। लेकिन उन्होंने केजरीवाल को बैठक का न्योता नहीं दिया क्योंकि यह काम कांग्रेस को करना है।

रवैया जब टच एंड गो का है तब साथ आ कर भी विपक्ष कैसे आंदोलन ख़ड़ा करेगा?

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की गड़बड़ियों और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की मनमानियों के खिलाफ विपक्षी पार्टियों की बैठक 30 सितंबर को दिल्ली में हो रही है। मई में भी विपक्षी गठबंधन यानी ‘इंडिया’ ब्लॉक की एक बैठक दिल्ली में हुई थी। तब जिन पार्टियों ने उससे दूरी बनाई थी वे भी इस बार की बैठक में शामिल हो रही हैं। इससे पार्टियों की गंभीरता का अहसास हो रहा है। लेकिन क्या सिर्फ एक साथ आकर बैठक कर लेना पर्याप्त होगा? देश के सामने जो अभूतपूर्व संकट दिख रहें हैं उससे निपटने के लिए पार्टियों की साझा बैठक या नेताओं के बेहद आक्रामक बयान या सोशल मीडिया का अभियान पर्याप्त नहीं है।

पार्टियों को संकट की व्यापकता को समझना होगा और मुकाबले के लिए गंभीर प्रयास करने होंगे। सबसे पहले तो ‘इंडिया’ ब्लॉक को ही औपचारिक रूप देना होगा। 2023 में शरद पवार के घर पर हुई बैठक के बाद से ही इसका इंतजार हो रहा है कि इसका एक संयोजक होगा और एक सचिवालय बनेगा। लेकिन अभी तक ये दोनों काम नहीं हुए। जून 2024 में चुनाव हारने के बाद तो दो साल तक इसकी बैठक भी नहीं हुई।

ऐसा नहीं है कि विपक्षी पार्टियों को कोई चैरिटी का काम करना है। संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के अभियान ने ही 2024 के चुनाव में कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियों को राजनीतिक सफलता दिलाई थी। इसलिए अगर पार्टियां गंभीरता से एसआईआर की गड़बड़ियों को पकड़ती हैं, उन्हें जनता के बीच ले जाती हैं, चुनाव आय़ोग और सरकार को कठघरे में खड़ा करती हैं तो उनको इसका राजनीतिक लाभ भी मिलेगा। एक समय था जब विपक्ष मुद्दों की तलाश करता था और उन पर आंदोलन करके सरकार को जवाबदेह बनाता था। लेकिन अब ऐसा नहीं हो रहा है।

यह बहुत दिलचस्प है कि इन दिनों आम लोग सरकार की कमियां खोज रहे हैं। नीट पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ी का खुलासा छात्रों ने किया। उन्होंने न सिर्फ पेपर लीक का पता लगाया, बल्कि परीक्षा कराने का ठेका ब्लैकलिस्टेड कंपनी को दिए जाने का खुलासा भी छात्रों ने किया। पहली बार अगर नरेंद्र मोदी सरकार के किसी मंत्री का इस्तीफा हुआ तो वह छात्रों के आंदोलन और उनके दबाव में हुआ। नीट पेपर लीक का खुलासा करने से लेकर ब्लैकलिस्टेड कंपनी को परीक्षा का ठेका देने के लिए बार बार टेंडर बदलने का खुलासा सार्थक सिद्धांत और निसर्ग अधिकारी जैसे युवा छात्रों ने किया।

इसी तरह इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से गाड़ियों के इंजन खराब होने का मुद्दा कुछ यूट्यूबर्स और इन्फ्लूएंसर्स ने उठाया। मनीष कश्यप ने इसे राष्ट्रीय मुद्दा बनाया। आम लोगों से जुड़े इस मुद्दे पर भी सरकार बैकफुट पर आई। इसी तरह यूपीआई पर शुल्क लगाने के सरकार के फैसले के खिलाफ व्यापारी लड़ रहे हैं और आम लोग सोशल मीडिया में माहौल बना रहे हैं। ऐसे ही राम मंदिर में चढ़ावा चोरी का खुलासा मंदिर के ही एक कर्मचारी ने किया। इन सारे मुद्दों पर गहराई से काम करने की जरुरत थी। लेकिन विपक्ष ने सिर्फ संसद सत्र में इन मुद्दों को उठाया।

असल में विपक्ष का रवैया टच एंड गो का है। वह हर मुद्दे को छूकर आगे बढ़ जा रहा है। जबकि इतिहास गवाह है कि किसी भी मुद्दे पर सरकार को जिम्मेदार ठहराने और सत्ता विरोधी माहौल बनाने के लिए सतत चलने वाले प्रयास की जरुरत होती है। उस पर गंभीरता से शोध करना होता है, उसके हर आयाम को समझना और जनता को समझाना होता है। बोफोर्स का मामला निरंतर दो साल से ज्यादा चला था तब जाकर राजीव गांधी की सरकार के खिलाफ माहौल बना। भ्रष्टाचार का आंदोलन लगातार तीन साल चला तब लोगों की दिलदिमाग में मनमोहन सिंह की सरकार को पलट देने और कांग्रेस को सजा देने की भावना बनी। यहां कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियां समझ रही हैं कि वे संसद में मुद्दा उठा देंगी, संसद परिसर में हंगामा कर देंगी या एक साझा बैठक कर लेंगी या कोई प्रेजेंटेशन हो जाएगा तो उससे सरकार के खिलाफ माहौल बन जाएगा तो ऐसा नहीं होने वाला है। यह सरकार पहले की सरकारों की तरह हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने वाली नहीं है। वह लगातार आरोपों को काउंटर करती है और नए नैरेटिव पैदा करती है।

इसलिए विपक्ष अगर चाहता है कि एसआईआर की गड़बड़ियों या चुनाव आयोग की मनमानियों पर देश में एक राजनीतिक माहौल बने तो उसके प्रयासों में निरंतरता दिखनी चाहिए। बारीकी से इस पर काम करके लोगों के सामने एक एक तथ्य रखना चाहिए। सिर्फ मोटामोटी यह कह देना पर्याप्त नहीं है कि ज्ञानेश कुमार ने मनमानी की, 13 करोड़ लोगों के नाम काट दिए या जिला व प्रदेश के चुनाव अधिकारियों को सेंट्रल डेटाबेस का एक्सेस नहीं दिया। विपक्ष को इसकी तह में जाना होगा।

अभी ऐसा लग रहा है कि पार्टियां ऊपर ऊपर मामले को देख रही हैं। उनके प्रयास में निरंतरता भी नहीं है। राहुल गांधी ने पिछले साल सितंबर में कर्नाटक की आलंद विधानसभा सीट को लेकर खुलासा किया था। उन्होंने 6,018 वोट काटे जाने का दावा किया था और कहा था कि कर्नाटक के बाहर से मोबाइल नंबर से नाम कटवाने के आवेदन भेजे गए और नाम कटे। उन्होंने सूर्यकांत नाम के एक व्यक्ति को मंच पर पेश किया। सूर्यकांत ने बताया कि उन्होंने किसी का नाम काटने का आवेदन नहीं दिया लेकिन उनके नाम से आवेदन करके 14 मिनट में 12 नाम कटवाए गए। राहुल गांधी ने महाराष्ट्र को लेकर भी इस तरह के दावे किए। लेकिन उसके बाद सन्नाटा हो गया।

यह बहुत बड़ी बात है कि किसी भी व्यक्ति के नाम या फोन नंबर का इस्तेमाल करके दूसरे व्यक्ति या व्यक्तियों के नाम काटे जा रहे हैं या काटे जा सकते हैं। अभी चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि पश्चिम बंगाल में न्यायाधिकरणों के सामने 38 लाख आवेदन लंबित हैं, जिनमें से 22 लाख आवेदन नाम जोड़ने के हैं और 16 लाख आवेदन नाम काटने के हैं। क्या यह विपक्ष की जिम्मेदारी नहीं है कि वह पता लगाए कि ये 16 लाख लोग कौन हैं, जो अपना नाम कटवाना चाहते हैं? पिछले दिनों बंगाल के माल्दा और मुर्शिदाबाद दोनों जगह से खबर आई थी कि थोक में फॉर्म सात भर कर लोगों के नाम कटवाने की कोशिश की गई।

कई जगह जागरूक बीएलओ ने इसे रोका भी। दिल्ली में 47 लाख यानी एक तिहाई मतदाताओं के नाम कट गए। इनमें 43 लाख लोगों के नाम इस आधार पर कटे हैं कि वे स्थायी रूप से शिफ्ट हो गए हैं। सोचें, इतनी बड़ी संख्या में दिल्ली से शिफ्ट होकर लोग कहां जा रहे हैं? अब ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि धीरे धीरे सेंट्रल डेटाबेस के एक्सेस को सेंट्रलाइज किया जा रहा है और ईआरओ, डीईओ और सीईओ को संपूर्ण व बिना शर्त एक्सेस नहीं मिल रही है। अगर इस खुलासे को कर्नाटक, बंगाल या दिल्ली की खबरों से मिला कर देखें तो यह संभव है कि योजनाबद्ध तरीके से मतदाताओं की प्रोफाइलिंग करके उनके नाम काटे जाने का बड़ा खुलासा हो।

साझा बैठक करने या आंदोलन करके ऑप्टिक्स बनाने से पहले कांग्रेस और दूसरी पार्टियों को बारीकी से तमाम गड़बड़ियों पर काम करने की जरुरत है। यह समय लेने और थका देने वाला काम है। लेकिन कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों के पास संसाधन की कमी नहीं है। अगर उनको लग रहा है कि एसआईआर के जरिए बहुत बड़ी कोई गड़बड़ी हो रही है तो उन्हें इसका खुलासा करने के लिए बड़े पैमाने पर ही काम करना होगा। अमेरिका के वाटरगेट स्कैंडल से लेकर भारत के बोफोर्स घोटाले तक जितने बड़े मामले खुले हैं उनमें लोगों को खपना पड़ा है। ऊपर ऊपर मुद्दे को छू देने और उस पर बयान देने से सरकार न तो जवाबदेह बनेगी और न आम जनता इसे गंभीरता से लेगी। जनता को यह दिखाना होगा कि विपक्ष या योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण जैसे सिविल सोसायटी के लोग क्या लेकर सरकार से लड़ रहे हैं। इस पर कल विचार करेंग। (जारी)

विपक्ष क्या साझा आंदोलन करेगा?

विपक्षी पार्टियों को एक के बाद एक ऐसे मुद्दे मिल रहे हैं, जिन पर वह साझा आंदोलन करे तो सरकार के खिलाफ नाराजगी को दिशा दे सकता है। ताजा मामला चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर हुए खुलासे का है। अंग्रेजी के अखबार ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने एक खोजी रिपोर्ट में बताया है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर आयोग में एक राय नहीं है और इसे लेकर 10 महीने के अंदर दो चुनाव आयुक्तों ने मुख्य चुनाव आयुक्त से 14 बार अपनी आपत्ति दर्ज कराई। नाम जोड़ने वाले फॉर्म छह में किए गए बदलाव को तो दो आयुक्तों ने अवैध और अनधिकृत तक बताया। ऐसे ही ईआरओ को चुनाव आयोग का सेंट्रल डाटा बेस इस्तेमाल करने से रोकने और नाम काटने व जोड़ने के उनके मूल अधिकार को ही कमतर करने का आरोप लगाया। यह बहुत बड़ा मुद्दा है और अभी तक विपक्षी पार्टियां चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर जो आरोप लगाती थीं, इस रिपोर्ट से एक तरह से उनकी पुष्टि हुई है।

फिर भी ऐसा नहीं लग रहा है कि विपक्षी पार्टियां एकजुट होकर इसके खिलाफ आंदोलन करेंगी। जंतर मंतर का प्रदर्शन हो या राम मंदिर में चढ़ावा चोरी का मामला हो सभी पार्टियां अपनी राजनीति अलग कर रही हैं। राहुल गांधी छात्रों की गूंज कार्यक्रम कर रहे हैं तो अखिलेश यादव अपने राज्य के चुनाव में लगे हैं। ममता बनर्जी अपने राज्य में फंसी हैं तो तेजस्वी यादव को किसी बात से मतलब नहीं है। झारखंड में हेमंत सोरेन सत्ता में हैं तो उनकी चिंताएं अलग हैं। एमके स्टालिन गठबंधन से अलग हो गए हैं तो शरद पवार की पोजिशन स्पष्ट नहीं है कि वे इंडिया ब्लॉक में हैं या तटस्थ हैं और एनडीए में जाने की तैयारी कर रहे हैं। रही बात उद्धव ठाकरे की तो उनके पास बहुत ताकत नहीं बची है। आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल के पास ताकत है और नैरेटिव बनाने की क्षमता भी है लेकिन उनको पंजाब में कांग्रेस से चुनाव लड़ना है और गोवा में कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने की राजनीति करनी है।

जानकार सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस के कुछ नेता चाहते हैं कि विपक्षी पार्टियों के साथ बात हो और मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर आई रिपोर्ट के आधार पर राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन छेड़ा जाए। मुश्किल यह है कि साझा आंदोलन का चेहरा कौन होगा? पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ी के मामले में जैसे राहुल गांधी अभियान चला रहे हैं उसी आधार पर कांग्रेस चाहेगी कि इस आंदोलन का चेहरा भी राहुल हों। दूसरी ओर आम आदमी पार्टी के नेता चाहते हैं कि केजरीवाल आंदोलन का नेतृत्व करें। आप और ममता बनर्जी की पार्टी ने इस मामले में सबसे दो टूक स्टैंड लिया है। दोनों ने हाल के सभी चुनावों को रद्द करने और एसआईआऱ को भी रद्द करने की मांग की है। अगर कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियां इन दो मांगों को लेकर एकजुट होती हैं और देशव्यापी आंदोलन शुरू होता है तो उसका बड़ा असर होगा। एसआईआर के बाद मसौदा सूची में 13 करोड़ लोगों के नाम कटे हैं। हालांकि बाद में कुछ लोगों के नाम जुड़े लेकिन फिर भी करोड़ों लोगों के नाम कटे हैं। सो, एसआईआर को रद्द करना एक बड़े आंदोलन का मुद्दा हो सकता है। लेकिन मुश्किल यह है कि जून में बैठक के बाद ‘इंडिया’ ब्लॉक की फिर दोबारा बैठक नहीं हुई है। कौन बैठक की पहल करे, कौन एजेंडा तय करे, खर्च कौन जुटाए और कौन नेतृत्व करे ये ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब ‘इंडिया’ ब्लॉक के नेताओं के पास नहीं है। इसलिए ऐसा लग रहा है कि सब अपनी अपनी लड़ाई लड़ेंगे और संसद सत्र का इंतजार करेंगे कि उसमें इस मुद्दे को उठा कर जवाब मांगेंगे। सिर्फ संसद में विरोध प्रदर्शन करने की राजनीति से विपक्ष को कोई लाभ नहीं हो रहा है।

Stocks to Watch: 23 सितंबर को फोकस में रहेंगे ये 7 शेयर, अदाणी और टाटा ग्रुप के स्टॉक्स पर भी रहेगी नजर

Stocks to Watch:  बुधवार 23 सितंबर को शेयर बाजार में कई कंपनियां अहम खबरों के चलते फोकस में रह सकती हैं। अदाणी और टाटा ग्रुप की कंपनियों से जुड़े अहम अपडेट आए हैं। साथ ही कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का असर भी कुछ शेयरों पर दिख सकता है। वहीं, हिस्सेदारी बढ़ाने, प्रमोटर सेल और नए स्टोर से जुड़े अपडेट भी हैं।

Adani Group Stocks

अडानी ग्रुप की कंपनियां फोकस में रहेंगी। SEBI ने Adani Enterprises, Adani Total Gas, AWL Agri Business, Adani Green Energy और Adani Energy Solutions से जुड़े मामलों को ₹1.51 करोड़ के सेटलमेंट के साथ निपटाया है। मामला हिंडनबर्ग रिपोर्ट में उठाए गए RPT और कॉरपोरेट गवर्नेंस से जुड़े सवालों से जुड़ा था।

OMCs Stocks

सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियां यानी OMCs फोकस में रहेंगी। कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट देखने को मिली है। Brent क्रूड 98 डॉलर प्रति बैरल के नीचे आ गया है। अमेरिका और ईरान के बीच संभावित बातचीत की खबरों से तेल बाजार पर असर पड़ा है।

Tata Group Stocks

टाटा ग्रुप की कंपनियों के शेयरों पर भी नजर रहेगी। Tata Sons के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को लेकर विवाद जारी है। NCP (SP) प्रमुख शरद पवार ने Tata Trusts की भूमिका और ग्रुप की मौजूदा ट्रस्ट-आधारित व्यवस्था को बनाए रखने की बात कही है।

Persistent Systems

आईटी सेक्टर की कंपनी Persistent Systems ने Nagarro में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई है। कंपनी ने 61.15% अतिरिक्त हिस्सेदारी हासिल की है। इसके साथ Nagarro में उसकी कुल हिस्सेदारी 83.25% हो गई है। अतिरिक्त शेयरों के लिए स्वीकृति अवधि 23 सितंबर से 6 अक्टूबर तक चलेगी।

HDFC Bank

प्राइवेट सेक्टर के बैंक HDFC Bank में नए MD और CEO के फैसले पर नजर रहेगी। बैंक के बोर्ड ने RBI को दो नाम भेजे हैं। दोनों नाम तीन साल के कार्यकाल के लिए मंजूरी के लिए भेजे गए हैं। बैंक ने अभी आधिकारिक तौर पर नामों का खुलासा नहीं किया है।

Allied Blenders & Distillers

शराब बनाने वाली कंपनी Allied Blenders & Distillers के प्रमोटर बीना किशोर छाबड़िया 55 लाख तक शेयर बेच सकती हैं। यह कंपनी की करीब 1.97% हिस्सेदारी है। बिक्री का मकसद न्यूनतम पब्लिक शेयरहोल्डिंग की जरूरत पूरी करना है।

Allcargo Terminals

लॉजिस्टिक्स सेक्टर की कंपनी Allcargo Terminals के अगस्त के कुल वॉल्यूम में बढ़ोतरी हुई है। कंपनी का कुल वॉल्यूम 65.6 हजार TEUs रहा। यह पिछले साल के मुकाबले 6% और जुलाई के मुकाबले 5% ज्यादा है।

360 ONE WAM

वेल्थ मैनेजमेंट सेक्टर की कंपनी 360 ONE WAM ने Aashish Agarwal को CEO नियुक्त किया है। उनकी नियुक्ति 15 फरवरी 2027 से प्रभावी होगी। इसी तारीख से MD Karan Bhagat को Vice Chairman की जिम्मेदारी भी दी जाएगी।

IRB Infrastructure Developers

इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर की कंपनी IRB Infrastructure Developers के बोर्ड ने कुछ संपत्तियों को बेचकर रकम जुटाने की मंजूरी दी है। बोर्ड ने इस प्रक्रिया के लिए कंपनी को अधिकृत भी किया है। अब कंपनी इन एसेट्स के मॉनेटाइजेशन की दिशा में आगे बढ़ सकती है।

Shoppers Stop

रिटेल सेक्टर की कंपनी Shoppers Stop ने अपनी मौजूदगी बढ़ाई है। कंपनी ने अहमदाबाद के Sindhu Bhavan और जबलपुर के Mall 11 में नए स्टोर खोले हैं। इसके साथ 31 अगस्त 2026 तक कंपनी के डिपार्टमेंट स्टोर्स की कुल संख्या 117 हो गई है।

अदाणी और GMR के लिए खुल सकता है एयरलाइन कारोबार का रास्ता, सरकार नियम बदलने पर कर रही विचार

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

नोएल टाटा के पक्ष में उतरे शरद पवार, टाटा ग्रुप की विरासत को प्रोटेक्ट करने को लेकर कही बड़ी बात

टाटा संस के चेयरमैन एन.चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति से टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स के बीच मतभेद पैदा हो गए हैं। इसी पृष्ठभूमि में नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (शरद चंद्र पवार) के प्रेसिडेंट शरद पवार ने सोशल मीडिया मीडियम X पर एक पोस्ट किया है। इस पोस्ट में टाटा ग्रुप के संगठनात्मक ढ़ाचे पर टिप्पणी करते हुए शरद पवार ने कहा कि टाटा ग्रुप की परंपरा और टाटा ट्रस्ट्स के सामाजिक प्रतिबद्धता को बचाकर रखना चाहिए।

शरद पवार ने 22 सितंबर को टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स के बीच चल रहे विवाद पर अपनी राय रखते हुए नोएल टाटा के रुख का समर्थन किया और महाराष्ट्र व भारत के विकास में टाटा ग्रुप की भूमिका की तारीफ की। उन्होंने जमशेदजी टाटा के विचारों का जिक्र करते हुए कहा कि टाटा परिवार ने इंडस्ट्री को समाज सेवा की दिशा दी है। उन्होंने लिखा कि इस सोच का मूल यह है कि इंडस्ट्री से पैदा हुई संपत्ति का इस्तेमाल समाज के हित के लिए किया जाना चाहिए।

उन्होंने आगे कहा कि टाटा संस में टाटा ट्रस्ट्स की लगभग 66 फीसदी हिस्सेदारी एक सोचा-समझा स्ट्रक्चर है। इस ओनरशिप स्ट्रक्चर की वजह से ही टाटा ग्रुप के बिज़नेस से मिलने वाले डिविडेंड का इस्तेमाल हेल्थ,एजुकेशन,रिसर्च और ग्रामीण इलाकों की रोज़ी-रोटी जैसे सामाजिक कल्याण के कामों के लिए किया जाता है।

टाटा ग्रुप की विरासत को बचाकर रखना आज की जरूरत

शरद पवार ने अपने एक्स पोस्ट में कहा है कि टाटा ग्रुप की लीडरशिप के बारे में फैसले लेते समय इंस्टीट्यूशनल प्रोसेस और टाटा ट्रस्ट की भूमिका का सम्मान किया जाना चाहिए। टाटा ग्रुप का देश और खासकर महाराष्ट्र के विकास से पुराना नाता रहा है। इसलिए, टाटा ग्रुप के अंदर के झगड़ों को बातचीत और सही कानूनी प्रक्रिया से सुलझाने की जरूरत है। इसके लिए शेयरहोल्डर्स के हितों की रक्षा करते हुए कंपनी के बायलॉज में बताए गए प्रोसेस का सम्मान करना जरूरी है।

बताते चलें कि 17 सितंबर को टाटा संस के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स ने एन.चंद्रशेखरन को फरवरी 2027 से अगले पांच साल के लिए एग्जीक्यूटिव चेयरमैन के तौर पर फिर से अपॉइंट करने का फैसला लिया था। यह फैसला 4 के मुकाबले 1 वोट से हुआ था। उसी मीटिंग में टाटा संस को स्टॉक एक्सचेंज में लिस्ट करने का भी फैसला किया गया।

टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने चंद्रशेखरन के दोबारा अपॉइंटमेंट का विरोध किया था। हालांकि,ट्रस्ट के दूसरे नॉमिनेटेड डायरेक्टर,वेणु श्रीनिवासन ने इस प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया। टाटा ट्रस्ट्स ने इस फैसले की वैधता पर सवाल उठाया है और कहा है कि ट्रस्ट के नॉमिनेटेड डायरेक्टर्स की भूमिका पर कंपनी के आर्टिकल्स ऑफ़ एसोसिएशन के मुताबिक ठीक से विचार किया जाना चाहिए।

टाटा ग्रुप की विरासत को संजोना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी

शरद पवार ने यह भी कहा कि अगर टाटा ट्रस्ट्स की सामाजिक और संस्थागत भूमिका कमजोर होती है तो इसका असर हेल्थ,एजुकेशन और रिसर्च सेक्टर के अलग-अलग संस्थाओं पर पड़ सकता है। उन्होंने इस बात का ज़िक्र किया कि टाटा ट्रस्ट्स ने टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल,TIFR और TISS जैसी प्रतिष्ठित संथाओं के ज़रिए लंबे समय तक सामाजिक क्षेत्र में काम किया है। इसलिए,यह सबकी ज़िम्मेदारी है कि हम इस ग्रुप के संस्थागत स्वरूप और मूल्य आधारित परंपरा को बचाकर रखें,जिसने खुद को भारत के विकास के लिए समर्पित कर दिया है।

कांग्रेस से गठबंधन खत्म होने के बाद तीसरा मोर्चा बनाने की तैयारी में DMK, कनिमोझी ने ममता बनर्जी से की मुलाकात

डीएमके ने कांग्रेस के साथ अपना गठबंधन टूटने के बाद अब INDIA bloc के प्रमुख घटक दलों के साथ मिलकर कांग्रेस-मुक्त तीसरा मोर्चा बनाने की संभावनाएं तलाशनी शुरू कर दी हैं। इसी सिलसिले में डीएमके की उप महासचिव व सांसद कनिमोझी करुणानिधि ने कोलकाता में ममता बनर्जी से उनके कालीघाट आवास पर मुलाकात की। इस दौरान दोनों नेताओं के बीच कई मुद्दों पर चर्चा हुई, हालांकि बैठक में किन मुद्दों पर बात हुई, इसकी जानकारी सामने नहीं आई है।

TMC के एक नेता ने बताया, “कनिमोझी ने ममता बनर्जी के आवास पर उनके साथ बंद कमरे में बैठक की। इस दौरान कई मुद्दों पर चर्चा हुई।”

बता दें कि यह बैठक कनिमोझी की मुंबई में शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे और दिल्ली में NCP (SP) प्रमुख शरद पवार के साथ बातचीत के कुछ दिनों बाद हो रही है।

गौरतलब है कि कनिमोझी की इन मुलाकातों ने ऐसे समय में ध्यान खींचा है, जब DMK और कांग्रेस के बीच रिश्तों में खिंचाव की खबरें हैं। वहीं, विपक्षी INDIA ब्लॉक में शामिल कई क्षेत्रीय दलों के बीच भी अलग-अलग मुद्दों पर मतभेद सामने आते रहे हैं।

TMC और कांग्रेस में टकराव

बता दें कि TMC और कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर INDIA गठबंधन का हिस्सा हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल में उनके रिश्ते तनावपूर्ण रहे हैं। हाल ही में 6 अक्टूबर को होने वाले उपचुनाव को लेकर भी दोनों पार्टियों के बीच टकराव देखने मिला है।

इस बीच, प्रदेश कांग्रेस ने दावा किया कि TMC ने अपने केंद्रीय नेतृत्व से संपर्क कर नंदीग्राम सीट कांग्रेस के लिए छोड़ने का प्रस्ताव दिया था। हालांकि, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले TMC गुट ने इस दावे को खारिज कर दिया है।

 

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जनता दल यू का मतलब नीतीश कुमार है

बिहार में इन दिनों नाम बदलने की चर्चा जोरों पर है। एनडीए के घटक दल हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा यानी हम के नेता व राज्य सरकार के मंत्री संतोष कुमार सुमन ने कहा कि बख्तियारपुर का नाम बदल कर नीतीश पुर रख देने चाहिए। ध्यान रहे सुमन केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी के बेटे हैं और सबको पता है कि मांझी को नीतीश कुमार ने नौ महीने के लिए मुख्यमंत्री बनवाया था। अब भी एनडीए में हम को नीतीश के करीब माना जाता है। सो, हम के नेता संतोष सुमन ने नीतीश के नाम से एक शहर का नाम रखने की मांग करके राज्य में एक नई बहस छेड़ दी है।

उधर जनता दल यू में यह बहस चल रही है कि क्या पार्टी का नाम बदल कर नीतीश के नाम पर किया जाए। पहले संजय झा ने यह बात कही। उसके बाद बहस चल निकली। कहा जा रहा है कि जनता दल यू का नाम बदल कर जनता दल नीतीश कर दिया जाए। गौरतलब है कि देश में बहुत सी पार्टियों के नाम नेताओं के नाम पर हैं। बिहार के पड़ोसी ओडिशा में बीजू जनता दल का नाम महान समाजवादी नेता बीजू पटनायक के नाम है। अब शरद पवार की एनसीपी और उद्धव ठाकरे की शिव सेना में भी दोनों का नाम है। एक समय कांग्रेस के नाम में इंदिरा गांधी का नाम था। सो, नेता का नाम पार्टी के नाम में शामिल करना कोई हैरानी की बात नहीं है। बिहार के नेता कह भी रहे हैं कि जनता दल यू का मतलब नीतीश कुमार है। माना जा रहा है कि पार्टी के ऊपर उनके बेटे निशांत कुमार का उत्तराधिकार संपूर्ण रूप से स्थापित करने के लिए यह प्रस्ताव चर्चा में लाया गया है। प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा अब इस चर्चा को आगे बढ़ा रहे हैं।

Photo: एक फ्रेम में अमित शाह और राहुल गांधी, तस्वीर ने खींचा सोशल मीडिया का ध्यान! पहली बार दिखा दुर्लभ राजनीतिक नजारा

Supriya Sule Daughter Reception Photo: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में सोमवार (10 अगस्त) रात आयोजित राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार) की सांसद सुप्रिया सुले की बेटी रेवती सुले की हाई-प्रोफाइल वेडिंग रिसेप्शन पार्टी में देश की राजनीति का एक बेहद दुर्लभ नजारा देखने को मिला। संसद में राजनीतिक मुद्दों पर अक्सर एक-दूसरे पर हमला करने वाले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी एक ही फ्रेम में नजर आए।

दोनों नेताओं की तस्वीर सामने आते ही यह सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गई। रिसेप्शन समारोह में अमित शाह और राहुल गांधी एक-दूसरे से कुछ ही दूरी पर खड़े दिखाई दिए। जैसे ही अमित शाह मंच की ओर बढ़े सुप्रिया सुले ने गृह मंत्री को आगे जाने का इशारा किया। हाथ जोड़कर नमस्ते करते हुए शाह का वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर शेयर किया जा रहा है।

अमित शाह ने नवविवाहित कपल को दिया आशीर्वाद

समारोह के दौरान अमित शाह जब मंच की ओर बढ़े तो सुप्रिया सुले ने उन्हें आगे जाने का इशारा किया। फिर अमित शाह ने हाथ जोड़कर नमस्ते किया और नवविवाहित जोड़े के पास पहुंचे। रेवती सुले और उनके पति ने अमित शाह के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लिया। इसके बाद गृह मंत्री ने नवविवाहित जोड़े को फूलों का गुलदस्ता भेंट किया। इस पूरे पल को वहां मौजूद फोटोग्राफरों ने कैमरों में कैद कर लिया। इसी दौरान राहुल गांधी भी अपनी मां सोनिया गांधी और बहन प्रियंका गांधी वाड्रा के साथ समारोह में पहुंचे। उनके साथ सुप्रिया सुले भी मौजूद थीं।

राहुल गांधी भी पहुंचे मंच पर

रिसेप्शन में मेहमानों का अभिवादन करने के लिए सोनिया गांधी अपने पूरे परिवार के साथ मंच पर पहुंचीं। इसी दौरान वह मंच के एक छोर की ओर चली गईं। सुप्रिया सुले उन्हें वापस नवविवाहित जोड़े के पास लेकर आईं। इस दौरान उन्होंने राहुल गांधी को भी जोड़े के बगल में खड़ा किया।

इसके बाद सुप्रिया सुले खुद एक तरफ हट गईं। फिर वहां मौजूद फोटोग्राफरों को ऐतिहासिक तस्वीरें लेने का मौका मिला। इस तरह समारोह में अमित शाह और राहुल गांधी दोनों एक ही कार्यक्रम और एक ही मंच के आसपास नजर आए। इस समारोह में सपा मुखिया अखिलेश यादव भी आकर्षण के केंद्र रहे।

Sule’s Daughter’s Reception_

एक समारोह में अलग-अलग दलों के बड़े नेता

दिल्ली के 6 जनपथ में आयोजित इस हाई-प्रोफाइल रिसेप्शन में अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों के कई बड़े नेता पहुंचे। कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव और NCP नेता प्रफुल्ल पटेल समेत कई प्रमुख राजनीतिक हस्तियां मौजूद रहीं।

Sule’s Daughter’s Reception

राजनीतिक मतभेदों के बावजूद इतने बड़े नेताओं का एक ही निजी समारोह में एक साथ पहुंचना चर्चा का विषय रहा। सोशल मीडिया पर चर्चा के दौरान खासतौर पर अमित शाह और राहुल गांधी की एक फ्रेम में मौजूदगी को इस आयोजन का सबसे खास ऐतिहासिक राजनीतिक क्षण माना गया।

जून में हुई थी रेवती सुले की शादी

सुप्रिया सुले की बेटी रेवती सुले ने जून में मुंबई में नागपुर के उद्योगपति सारंग लखानी के साथ शादी की थी। दिल्ली में आयोजित यह रिसेप्शन शादी के बाद आयोजित एक भव्य समारोह था। इस समारोह में राजनीति, उद्योग और सार्वजनिक जीवन से जुड़ी कई प्रमुख हस्तियों की मौजूदगी रही।

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