‘टिपिंग प्वाइंट’ से बच पाएगा भारत?

वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने हाल में सार्वजनिक रूप से कहा कि उनका अदालती प्रक्रिया से विश्वास उठ गया है। ..सिब्बल ने उल्लेख किया कि अदालत को मतदाताओं के नाम कथित रूप से गलत तरीके से हटाने और जोड़ने के बारे में बार-बार सूचित किया गया, फिर भी उसने कोई राहत नहीं दी, जबकि बाद के ट्रिब्यूनल डेटा से पता चला कि बहुत से नामों को हटाना गलत था।

कई ओर से खिंचाव और दबाव की शिकार हो रही भारत की संवैधानिक व्यवस्था का अंतिम खंभा भी इस परिघटना के दायरे में आ गया है। 12 अक्टूबर इस मायने में एक असाधारण दिन था, जब विपक्षी दलों के आह्वान पर हजारों लोगों के हुजूम ने सर्वोच्च न्यायालय पर जाकर मोर्चा लगाया। इसके साथ ही इस आम मान्यता पर विराम लग गया कि राजनीतिक दलों के लिए,

  • विरोध दर्ज कराने या अपना पक्ष रखने का उचित मंच संसद और विधानसभाएं हैं
  • अपना विरोध जताने के लिए जन अभियान, जन सभाएं, प्रेस कॉन्फ्रेंस, अधिकारियों के घेराव आदि जैसे वैध माध्यम उन्हें उपलब्ध हैं।
  • राजनीतिक दल या संगठन अगर अदालत तक जुलूस निकालते हैं, तो इससे संदेश जाता है कि वे न्यायिक प्रक्रिया को सड़क के दबाव से प्रभावित करना चाहते हैं। न्यायपालिका को ऐसे विवादों से ऊपर समझा जाता रहा है।
  • इसीलिए अदालत तक जुलूस निकालना अब तक नाजुक और विवादास्पद मामला माना जाता था।
  • खुद सुप्रीम कोर्ट ने कई बार कहा है कि न्यायालय पर दबाव डालने वाले विरोध प्रदर्शन स्वीकार्य नहीं हैं।

लेकिन 12 अक्टूबर को ऐसा ही विरोध प्रदर्शन आयोजित हुआ। लोगों के हुजूम के साथ सुप्रीम कोर्ट पहुंच कर विपक्ष के 11 नेताओं ने निर्वाचन आयोग के खिलाफ अपनी याचिका दायर कराई। याचिका दायर कराना एक वैधानिक प्रक्रिया है। लेकिन जिस रूप में उस रोज यह कराया गया, निर्विवाद रूप से उसे एक राजनीतिक वक्तव्य और सियासी कदम अधिक समझा जाएगा। कहा जा सकता है कि यह तरीका अपना कर विपक्ष ने खुद न्यायपालिका को ही कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की है।

विचारणीय यह है कि आखिर ये नौबत क्यों आई? संवैधानिक मर्यादा के तहत राजनीतिक एवं तमाम विवादों से ऊपर मानी जाने वाली न्यायपालिका को लेकर ऐसी धारणा क्यों बनी कि उससे “इंसाफ पाने के लिए” यह जरूरी है कि राजनीतिक तरीके से उस पर दबाव डाला जाए? इस सवाल पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। इसलिए कि इस घटना ने यह साफ कर दिया है कि न्यायपालिका को अब राजनीतिक विवादों से ऊपर नहीं समझा जा रहा है। यानी यह मान्यता कमजोर पड़ी कि अदालतें अपने फैसले विशुद्ध कानूनी आधार पर और संवैधानिक दायरों के अंदर रहते हुए देती हैं। अगर यह धारणा टूटती है, तो उसका मतलब यह भी होगा कि न्यायपालिका के निर्णयों का आदर के साथ स्वेच्छा से अनुपालन करने का चलन कमजोर हो जाएगा।

यह स्थिति क्यों आई? इस बात को समझने के लिए हाल के वर्षों में बनी पृष्ठभूमि पर गौर करना चाहिए। कुछ वरिष्ठ अधिवक्ताओं की टिप्पणियों से इस पृष्ठभूमि को बेहतर समझा जा सकता हैः

  • वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने हाल में सार्वजनिक रूप से कहा कि उनका अदालती प्रक्रिया से विश्वास उठ गया है। उन्होंने कहा कि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए कोर्ट के पास जाने का उन्हें कोई खास औचित्य नजर नहीं आता।
  • सिब्बल ने कहा- मैं सुप्रीम कोर्ट बार-बार जाकर थक चुका हूं। मुझे नहीं लगता कि वहां जाने का कोई फायदा है। मुझे भारत के सुप्रीम कोर्ट से ज्यादा उम्मीद नहीं बची है।
  • सिब्बल ने उल्लेख किया कि अदालत को मतदाताओं के नाम कथित रूप से गलत तरीके से हटाने और जोड़ने के बारे में बार-बार सूचित किया गया, फिर भी उसने कोई राहत नहीं दी, जबकि बाद के ट्रिब्यूनल डेटा से पता चला कि बहुत से नामों को हटाना गलत था। उन्होंने कहा कि हालांकि अभी भी संविधान को बचाने वाली एकमात्र संस्था सुप्रीम कोर्ट ही है, लेकिन कुछ मामलों में व्यक्तिगत रूप से उन्हें अब उससे बहुत उम्मीद नजर नहीं आती।

कपिल सिब्बल के अलावा कई अन्य वकीलों ने भी हाल में न्यायपालिका की सार्वजनिक रूप से कड़ी आलोचना की हैं। इनमें उनका आशय रहा है कि सुप्रीम कोर्ट लोगों के मौलिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा करने में विफल या अप्रभावी साबित हो रहा है। मसलन,

  • मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे को लेकर अक्टूबर के पहले हफ्ते में शुरू हुए कॉकरोच आंदोलन के क्रम दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शनों और प्रदर्शनकारियों/ वकीलों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई के बीच वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने चेतावनी दी कि अगर सुप्रीम कोर्ट शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों और वकीलों के खिलाफ हिंसा को रोकने के लिए हस्तक्षेप नहीं करता, तो “यह ना केवल अपनी प्रासंगिकता खो देगा, बल्कि देश और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपहास का पात्र भी बन जाएगा।”
  • इसके पहले भूषण ने न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा में सुप्रीम कोर्ट के नाकाम रहने का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था कि लगभग आधे जज सरकार की कठपुतलियों की तरह काम कर रहे हैं। उन जजों के महत्त्वपूर्ण मामलों में सरकार के खिलाफ फैसला सुनाने की संभावना बहुत कम होती है।
  • वरिष्ठ अधिवक्ता और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष दुष्यंत दवे अदालत पर मौलिक अधिकारों की रक्षा करने में विफल रहने, इंसाफ देने से बचने, और नागरिकों को निराश करने का आरोप लगा चुके हैं। उन्होंने ऐसे सवालों से सुप्रीम कोर्ट को कठघरे में खड़ा किया है कि क्या वह नागरिक अधिकारों के संरक्षक के रूप में अपने संवैधानिक कर्त्तव्य को निभा रहा है?
  • मिहिर देसाई और गोपाल नारायण जैसे वरिष्ठ वकील भी इससे मिलती-जुलती बातें कह चुके हैं।
  • ये विचार आम तौर पर चुनावी मुद्दों, विरोध प्रदर्शनों, नागरिक स्वतंत्रता के मामलों, कड़े कानूनों के तहत जमानत ना मिलने, और वर्तमान सरकार के प्रति अत्यधिक नरमी के संदर्भ में जताए गए हैं।

भारत की संवैधानिक व्यवस्था के भविष्य के लिए ये बातें बेहद अहम हैं। इसलिए कि भारत में सरकार (कार्यपालिका) और विधायिका को लेकर आम जन में पहले ही भरोसा काफी घट चुका है। इसकी वजह आम जन से किए गए वादों को पूरा ना किया जाना है। सरकारें लोगों को बेहतर जीवन स्तर देने में विफल रही हैं और विधायिकाएं उनकी प्रभावशाली ढंग से जवाबदेही तय करने की अपनी भूमिका नहीं निभा पा रही हैं। इस कारण लोगों का सब्र टूट रहा है।

इसके बीच न्यायपालिका एकमात्र संस्था है, जिससे लोगों को इंसाफ पाने तथा सरकार के अतिरेक कदमों को रोकने की आशा बची थी। लेकिन गुजरे वर्षों में जनमत का एक बड़ा हिस्सा यह देखकर निराश होता चला गया है कि खास कर जिन मामलों में नरेंद्र मोदी सरकार के राजनीतिक हित जुड़े थे, उनमें न्यायपालिका संवैधानिक अपेक्षाओं के अनुरूप अवरोध एवं संतुलन की अपनी भूमिका निभाने में नाकाम रही। इस भावना की अभिव्यक्ति ही हालिया प्रतिक्रियाओं और विपक्ष की राजनीतिक गतिविधियों के जरिए हुई है।

यह संवैधानिक व्यवस्था के लिए बढ़ती चुनौतियों के एक नए मुकाम पर पहुंच जाने का संकेत है। राजनीतिक अर्थशास्त्री राहुल मुखर्जी ने भारत में आर्थिक सुधारों को समझाने के लिए एक मॉडल विकसित किया था, जिसे ‘टिपिंग-प्वाइंट मॉडल’ (Tipping-Point Model) कहा जाता है। यह मॉडल भारत की संवैधानिक व्यवस्था के प्रति हो रही प्रतिक्रियाओं को समझने के लिहाज से भी सहायक हो सकता है। इसके मुताबिक किसी व्यवस्था के भीतर चुनौतियां इकट्ठी हो रही हों, तब भी वह व्यवस्था वर्षों तक दबाव को सहन कर सकती है। लेकिन जब ये चुनौतियां एक निश्चित सीमा को पार जाती हैं, तो एक छोटा-सा झटका भी बहुत बड़े बदलाव की राह खोल सकता है।

राजनीतिक अर्थव्यवस्था के संदर्भ में मुखर्जी ने इस बात तो दो उदाहरणों से समझाने का प्रयास किया था। इसके मुताबिक किसी पुल पर वाहनों का बोझ बढ़ता चला जाए, तब भी पुल टिका रहता है। लेकिन एक हद के बात कोई आखिरी मोटर साइकिल आती है, तो पुल अपने ऊपर जमा हुए बोझ को सह पाने में नाकाम हो जाता है। वही क्षण टिपिंग प्वाइंट कहा जाता है। लेकिन टिपिंग प्वाइंट पुल ढहने का असल कारण नहीं होता। इसी तरह कोई भूकंप लंबे समय से धरती के नीचे टेक्टोनिक परतों की स्थिति में जारी अस्थिरता का परिणाम होता है। मगर किसी एक रोज कोई आखिरी परत खिसकती है, जिससे भूकंप आ जाता है।

भारतीय राजनीति भी शायद ऐसे ही किसी मोड़ की ओर बढ़ रही है। शिक्षा से जुड़े विरोध प्रदर्शनों ने दिखाया कि लगातार जारी लामबंदी (प्रदर्शन) सरकारों को झुकने पर मजबूर कर सकती है। निर्वाचन आयोग से जुड़े विवाद ने अब इस दबाव को चुनावी राजनीति तक पहुंचा दिया है।

तो इस समय हमारे सामने यह महत्त्वपूर्ण सवाल उपस्थित है कि क्या देश किसी बड़ी उथल-पुथल की ओर बढ़ रहा है?

अथवा, फिलहाल देश में बिखरा हुआ गुस्सा किसी टिकाऊ राजनीतिक संगठन का रूप ले सकता है?

पहली सूरत भयावह है। इसलिए कि सिर्फ उथल-पुथल से कभी कुछ नहीं बनता। उलटे बहुसंख्यक जनता को इसकी पीड़ा से गुजरना पड़ता है, जबकि उससे हासिल कुछ नहीं होता। लेकिन, जैसे पुल के ढहने या भूकंप के आने का पूर्वानुमान संभव नहीं है, वैसे ही अगर स्थितियां बन रही हों, तो सामाजिक या राजनीतिक उथल-पुथल से बचना अक्सर मुमकिन नहीं रह जाता है।

असल बात है ऐसी स्थितियों का बनना। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि नतीजों की बिना चिंता किए भारत में राजनीतिक ताकतों ने ऐसी स्थिति बनने दी है। वे यह समझने में नाकाम रहीं कि लोकतांत्रिक व्यवस्था एक सेफ्टी वॉल्व की तरह काम करती है, जिसमें लोगों का गुस्सा विस्फोट की स्थिति आने के पहले ही संस्थागत माध्यमों के जरिए निकल जाता है। अपनी बात कहने और प्रतिरोध जताने की इजाजत, विधि-सम्मत न्याय व्यवस्था और अंततः चुनाव के जरिए जवाबदेही तय करने का सिस्टम- इसी तरह के सेफ्टी वॉल्व समझे जाते हैं। भले इनसे असल में कुछ ना बदलता हो- लोगों की जिंदगी बेहतर ना होती हो, लेकिन इस सिस्टम के जरिए ऐसा होने का भ्रम बना रहता है, जिससे व्यवस्था सुरक्षित रहती है। यह साफ है, आज भारत की संवैधानिक व्यवस्था के बारे में ऐसा भरोसा रखना कठिन हो गया है।

वैसे, एक और सूरत होती है, जिससे टिपिंग प्वाइंट किसी नए निर्माण का बिंदु बन सकती है। ऐसा तब होता है, अगर ऐसी नई ताकतें उभरें, जो पुरानी व्यवस्था को चुनौती भर देने से आगे बढ़ें और अगली व्यवस्था का निर्माण करें। क्या भारत में इसकी संभावना है? फिलहाल, ये उम्मीद नहीं दिखती। इसलिए कि नई ताकतों का उदय नए विमर्श के साथ होता है। फिलहाल, राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे किसी विमर्श का संकेत तक मौजूद नहीं है।

फिलहाल सूरत यह है कि एक तरफ सत्ता पक्ष है, जो अपने समर्थन आधार और चुनाव प्रबंधन की क्षमता के बूते अपनी सत्ता कायम रखने को लेकर आश्वस्त है। इसलिए उसे दूसरी तरफ उबल रहे “गुस्से” की कोई परवाह नहीं है। उसे वह पराजित एवं विफल ताकतों की निष्प्रभावी प्रतिक्रिया मानता है। उसे यकीन है कि राज्य के दमनकारी तंत्र के जरिए विरोधी ताकतों को वह नियंत्रित रखा जा सकता है।

दूसरी तरफ विपक्ष एवं वे समूह हैं, जो सही या गलत, लेकिन धीरे-धीरे यह मानने लगे हैं कि सत्ता पक्ष इसलिए सत्ता में नहीं है कि उसके साथ लोगों की बहुसंख्या है। बल्कि वह सत्ता में इसलिए बना हुआ है, क्योंकि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के धरातल को अनुचित तरीकों से अपनी तरफ झुका कर वह जनादेश गढ़ रहा है। इस स्थिति में निर्वाचित सरकार की वैधता (legitimacy) का सवाल खड़ा होता है, जिसे असल में इस समय उठाया जा रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे दावा कर चुके हैं कि 2024 से हुए सभी चुनावों में धांधली हुई और इस कारण उनसे चुनी गई सरकारें अवैध हैं। विपक्षी दलों और सिविल सोसायटी मे ऐसे बहुत से लोग हैं, जो खड़गे की राय से सहमत नजर आते हैं।

इन हालात ने भारत के राजनीतिक क्षितिज पर एक गतिरोध निर्मित कर दिया है। अगर न्यायपालिका से न्याय पाने की संभावना सभी पक्षों में बनी रहती, तो इस गतिरोध का समाधान संभव था। दुर्भाग्यपूर्ण है कि अब खुद न्यायपालिका की भूमिका पर सवाल गहरा गए हैं। इसी से उपजे विवाद की झलक 12 अक्टूबर को देखने को मिली। उस रोज जो हुआ, वह कई वर्षों से बनती स्थिति का परिणाम था। इस नई सूरत का क्या नतीजा होगा, उस बारे में सोचना भयभीत करता है, हालांकि उसका सही अनुमान लगाना फिलहाल संभव नहीं है।

खड़गे ने पीएम को चेताया

कांग्रेस

नई दिल्ली। संसद का विशेष सत्र बुला पर नारी शक्ति वंदन कानून में संशोधन करने और परिसीमन बिल पास कराने की खबरों के बीच कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिख कर चेतावनी दी है। उन्होंने 13 अगस्त को खत्म हुए मानसून सत्र का सत्रावसान नहीं करने पर सवाल उठाए हैं और कहा है कि सरकार किसी भी विधेयक को जोर जबरदस्ती पास कराने का प्रयास न करे।

खड़गे ने प्रधानमंत्री को लिखी चिट्ठी में सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग भी की है। खड़गे ने परिसीमन को लेकर भी केंद्र सरकार को आगाह किया है। उन्होंने इस मामले पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग करते हुए प्रधानमंत्री से कहा है कि संसद में परिसीमन प्रस्तावों को अंतिम रूप देने से पहले सभी पार्टियों से विचार विमर्श करने की सख्त आवश्यकता है। उन्होंने कहा है कि विपक्ष परिसीमन के प्रस्ताव पर हर तरह से चर्चा करना चाहता है।

कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष खड़गे ने प्रधानमंत्री को चेतावनी दी है सरकार किसी भी संविधान संशोधन विधेयक को जबरन पास न कराए। खड़गे ने प्रधानमंत्री मोदी को लिखे पत्र में कहा है कि कहा कि मानसून सत्र 13 अगस्त को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हुआ था। इसके बाद से 64 दिन बीत चुके हैं, लेकिन संसद के दोनों सदनों का अभी तक सत्रावसान नहीं किया गया है। कांग्रेस महासचिव औऱ संचार विभाग के प्रमुख जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कांग्रेस अध्यक्ष का पत्र साझा करते हुए लिखा है कि खड़गे जी ने अभी प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर संसद के मानसून सत्र के सत्रावसान में हुई अभूतपूर्व देरी और मोदी सरकार की संभावित योजनाओं के बारे में बात की है।

वोटर लिस्ट पर चुनाव आयोग का बड़ा फैसला, यूपी-पंजाब समेत 17 राज्यों में होगा SSR

Voter List Revision: वोटर लिस्ट में अपना नाम जुड़वाने या उसमें किसी तरह का बदलाव कराने की तैयारी कर रहे लोगों के लिए अहम खबर है। भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूची को अपडेट करने की प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया है। गुरुवार को जारी नोटिस के मुताबिक, इन जगहों पर स्पेशल समरी रिवीजन (SSR) किया जाएगा। यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब देशभर में वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर विवाद चल रहा है।

इस प्रक्रिया के दायरे में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर और गोवा समेत 17 राज्य शामिल हैं। चुनाव आयोग ने इन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21 के तहत मतदाता सूची की जांच और उसे अपडेट करने का निर्देश दिया है।

आयोग ने इस प्रक्रिया के लिए 1 जनवरी 2027 को पात्रता की तारीख तय किया है।

इस पुनरीक्षण (रिवीजन) में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, केरल, लक्षद्वीप, मध्य प्रदेश, मणिपुर, पुडुचेरी, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल शामिल होंगे।

यह अधिसूचना तब आई है, जब सुप्रीम कोर्ट ने विपक्ष के नेता राहुल गांधी और ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन के नौ अन्य नेताओं द्वारा दायर एक याचिका पर ECI (चुनाव आयोग), CEC ज्ञानेश कुमार, और चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी को नोटिस जारी किया है। इस याचिका में मतदाता सूचियों के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) को चुनौती दी गई है।

आयोग ने कहा है कि जिन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) चल रहा है या हाल ही में पूरा हुआ है, वहां SSR (स्पेशल समरी रिवीजन) का कार्यक्रम बाद में घोषित किया जाएगा।

बता दें कि यह याचिका 12 अक्टूबर को गांधी के नेतृत्व में विपक्ष द्वारा सुप्रीम कोर्ट की ओर निकाले गए मार्च के बाद दायर की गई है, जो SIR (विशेष पुनरीक्षण) प्रक्रिया के खिलाफ था।

खड़गे, अखिलेश और तेजस्वी समेत कई विपक्षी नेताओं ने दायर की याचिका

इस याचिका को गांधी के साथ-साथ कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, तृणमूल कांग्रेस नेता सौगत रॉय, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव, RJD नेता तेजस्वी प्रसाद यादव, शिवसेना (UBT) नेता संजय राउत, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के नेता एम.ए. बेबी, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के नेता डी. राजा, झारखंड मुक्ति मोर्चा की महुआ माजी, नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार गुट) की सुप्रिया सुले, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) के नेता मोहम्मद बशीर, विदुथलाई चिरुथैगल काची (VCK) के अध्यक्ष थोल. थिरुमावलवन और जम्मू-कश्मीर के पूर्व मंत्री सज्जाद अहमद किचलू ने दायर किया है।

इसमें SIR प्रक्रिया की वैधता को चुनौती दी गई है। साथ ही, चुनाव आयोग के रिकॉर्ड को सार्वजनिक करने, हटाए गए मतदाताओं का विवरण जारी करने, मनमाने ढंग से नाम हटाए जाने के खिलाफ सुरक्षा उपाय करने और नाम वापस जोड़ने के लिए एक व्यवस्था बनाने की मांग की गई है।

नेताओं ने वोटर लिस्ट ने संशोधन प्रक्रिया के न्यायिक ऑडिट की भी मांग की और यह भी कहा कि जब तक इस मामले पर कोई फैसला नहीं आ जाता, तब तक सभी राज्यों में यह प्रक्रिया रोक दी जानी चाहिए।

इससे पहले, विपक्षी नेताओं ने SIR प्रक्रिया को लेकर अपनी चिंताएं जताने और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करने के लिए CJI सूर्य कांत से मिलने का समय मांगा था। लेकिन CJI ने इसे अस्वीकार कर दिया और कहा कि ये मुद्दे पहले से ही कोर्ट के सामने लंबित हैं, इसलिए नेता न्यायिक कार्यवाही के जरिए राहत मांग सकते हैं।

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कर्नाटक में एसआईआर के खिलाफ अभियान तेज करेगा इंडिया गठबंधन

इंडिया गठबंधन कर्नाटक में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के खिलाफ अभियान तेज करेगा और इस सिलसिले में विपक्षी दल शुक्रवार को बेंगलुरु में बैठक कर पात्र मतदाताओं के नाम कथित तौर पर सूची से हटाए जाने, मतदान के अधिकारों की रक्षा और संयुक्त राजनीतिक एवं कानूनी कार्रवाई की रणनीति पर विचार करेंगे।

कर्नाटक कांग्रेस की ओर से बुलाई गई बैठक प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बी.के. हरिप्रसाद के नेतृत्व में होगी। इसमें मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा), भाकपा (माले) लिबरेशन, ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक और समाजवादी पार्टी सहित अन्य विपक्षी दलों के प्रतिनिधि शामिल होंगे।

कांग्रेस ने गुरुवार को जारी विज्ञप्ति में बताया कि बैठक में पात्र मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने के आरोपों और निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली से जुड़ी चिंताओं पर चर्चा की जाएगी। विपक्षी दल इन मुद्दों को राजनीतिक अभियान, कानूनी हस्तक्षेप और जनजागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से उठाने के उपायों पर विचार करेंगे।

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बैठक में राज्य, जिला और जमीनी स्तर पर विपक्षी दलों के बीच समन्वय मजबूत करने, शिकायतों का दस्तावेजीकरण करने तथा कथित अनियमितताओं के मामलों को संबंधित अधिकारियों के समक्ष उठाने की रणनीति भी बनाई जाएगी। इसके अलावा मतदाताओं को अपने पंजीकरण की स्थिति जांचने और मतदाता सूची में किसी विसंगति की सूचना निर्धारित प्रक्रिया के तहत देने के लिए जागरूक करने पर भी चर्चा होगी।

विपक्षी दलों ने मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता और पात्र नागरिकों के मतदान के अधिकार की सुरक्षा सुनिश्चित करने की आवश्यकता जताई है। शुक्रवार की बैठक में इस संबंध में गठबंधन के आगे के अभियान की रूपरेखा तय की जाएगी। कर्नाटक कांग्रेस ने कहा है कि बैठक में मतदान के अधिकारों की रक्षा करने और चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने पर ध्यान दिया जाएगा।

यह बैठक मतदाता सूची में संशोधन और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने में चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर चल रही व्यापक राजनीतिक बहस के बीच हो रही है। विपक्ष ने जहां पात्र मतदाताओं के सूची से बाहर रह जाने की आशंका जताई है, वहीं गलत तरीके से नाम हटाए जाने के विशिष्ट आरोपों की पुष्टि आधिकारिक चुनावी रिकॉर्ड से करनी होगी।

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एसआईआर के खिलाफ विपक्षी दलों की याचिका पर चुनाव आयोग को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस

उच्चतम न्यायालय ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के विरुद्ध लोक सभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और इंडिया गठबंधन के अन्य घटक दलों के नेताओं की ओर से दायर याचिका पर गुरुवार को चुनाव आयोग को नोटिस जारी किये।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने चुनाव आयोग के साथ-साथ मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी को नोटिस जारी किये । मुख्य न्यायाधीश ने याचिका पर सुनवाई के दौरान मौखिक रूप से टिप्पणी की, ” हम याचिकाकर्ताओं में से एक से उनके आचरण के बारे में भी पूछेंगे।” गौरतलब है कि 12 अक्टूबर को श्री गांधी, कांग्रेस और विपक्षी दलों के कुछ अन्य विपक्षी नेताओं ने उच्चतम न्यायालय तक एक मार्च निकाला था और उसके वे उच्चतम न्यायालय में याचिका दाखिल करने गये थे। इससे न्यायालय परिसर में भारी भीड़ जमा हो गई और हंगामा के स्थिति बन गयी थी।

याचिकाकर्ताओं में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, ममता तृणमूल कांग्रेस के सौगत राय, समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव, राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी प्रसाद यादव, शिवसेना (यूबीटी) के संजय राउत, मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी के एम ए बेबी, भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के डी. राजा, झारखंड मुक्ति मोर्चा की महुआ माजी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एसपी) की सुप्रिया सुले और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के ईटी. मुहम्मद बशीर शामिल हैं। विदुथलाई चिरुथाइगल काची के अध्यक्ष थोल. थिरुमावलवन और नेशनल कॉन्फ्रेंस के सज्जाद अहमद किचलू भी याचिकाकर्ताओं में शामिल हैं।

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कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल एसआईआर प्रक्रिया का शुरू से ही विरोध कर रहे हैं। उनका आरोप है कि चुनाव आयोग ने भारतीय जनता पार्टी के दबाव में मतदाता सूची में बड़ी संख्या में नाम काट दिये हैं। वे इसको लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे है। न्यायालय ने अल हिंद मुस्लिम इत्तेहाहुल मुसलमीन के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और कांग्रेस के दिग्विजय सिंह ने भी एसआईआर के विरुद्ध न्यायालय में अलग अलग याचिकाएं दायर की हैं।

याचिकाकर्ताओं ने एसआईआर कराने के संबंध में चुनाव आयोग के 24 जून, 2025 के फैसले के रिकॉर्ड को तलब किये जाने और यह तय करने का अनुरोध किया है कि इस प्रक्रिया में नियम कायदे का पालन हुआ है या नहीं । याचिका में यह भी अनुरोध किया गया है कि इस मामले में यह न्यायिक समीक्षा भी की जाए कि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 के तहत आयोग की निर्णय प्रक्रिया में सामूहिक दायित्व और दस्तावेजी निर्णय लेने की व्यवस्था का अनुपालन हुआ या नहीं।

याचिकाकर्ताओं ने मतदाता सूची से नाम हटाने तथा मतदाता सूची डेटाबेस का ऑडिट करने के लिए उच्चतम न्यायालय के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक समिति बनाने की भी मांग की है। याचिकाकर्ताओं ने एसआईआर प्रक्रिया के तहत मतदाता सूचियों से हटाए गए नामों और उन्हें हटाने के कारणों की बूथ-वार जानकारी दिये जाने, नाम हटाने से पहले नोटिस और सुनवाई , नाम वापस जोड़ने की व्यवस्था किये जाने, चुनाव वाले राज्यों में पंजीकरण की समय-सीमा बढ़ाये जाने और जब तक यह मामला चल रहा है, तब तक पूरे देश में एसआईआर प्रक्रिया पर रोक लगाने की भी मांग की है।

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इंडिया गेट पर धरने पर बैठे अंकिता भंडारी के माता-पिता हिरासत में

अंकिता भंडारी को न्याय दिलाने की मांग को लेकर यहां इंडिया गेट पर धरने पर बैठे उनके माता-पिता को पुलिस ने गुरुवार तड़के चार बजे हिरासत में ले लिया, हालांकि बाद में उन्हें छोड़ दिया। उनके साथ धरने पर बैठे कांग्रेस के कुछ अन्य नेताओं को भी पुलिस ने हिरासत में लिया था लेकिन उन्हें भी बाद में छोड़ दिया गया।

अंकिता के माता-पिता बुधवार को उत्तराखंड के अपने गांव से दिल्ली आए थे और बेटी को न्याय दिलाने की मांग करते हुए इंडिया गेट पर धरने पर बैठ गए। वे अपनी बेटी की हत्या के लिए जिम्मेदार माने जा रहे ‘वीआईपी’ को राज्यपाल बनाये जाने के विरोध में धरने पर बैठे। देर रात कांग्रेस नेता राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा और अन्य उनसे मिलने धरना स्थल पर पहुंचे थे। पुलिस ने आज सुबह करीब चार बजे अंकिता के माता-पिता और कुछ अन्य कांग्रेस नेताओं को हिरासत में ले लिया। बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया।

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने अंकिता भंडारी के माता-पिता को यहां इंडिया गेट से हिरासत में लिये जाने की आलोचना करते हुए उन्हें न्याय दिलाने की मांग की है।

श्री खरगे ने कहा “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सुबह चार बजे पुलिस भेजकर अंकिता के माता-पिता को गिरफ्तार करवा दिया। ‘वीआईपी’ दुष्यंत गौतम को बचाने के लिए प्रधानमंत्री ने हद पार कर दी है। न्याय की गुहार लगा रहे अंकिता के माता-पिता को हिरासत में लिया जा रहा है, जबकि भाजपा के ‘वीआईपी’ को राज्यपाल बनाया जा रहा है।

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उन्होंने इसे सत्ता के दमन और सवालों से भागने का प्रमाण बताते हुए कहा है कि एक बेटी को खो चुके माता-पिता के साथ ऐसा व्यवहार शर्मनाक और निंदनीय है। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी अंकिता को न्याय दिलाने के लिए संघर्ष करती रहेगी।

श्री गांधी ने कहा कि चार साल से अंकिता के परिवार को न्याय नहीं मिला लेकिन एक ‘वीआईपी’ आरोपी को संरक्षण और संवैधानिक पद का इनाम जरूर मिला। उन्होंने भाजपा पर महिला-विरोधी होने का आरोप लगाते हुए कहा कि अंकिता के माता-पिता अपनी बेटी के लिए न्याय की गुहार लेकर घर से मीलों दूर इंडिया गेट पर बैठने को मज़बूर हुई है लेकिन वहां से उन्हें सुबह चार बजे हटा दिया गया है।

इस बीच पार्टी ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया पेज एक्स पर लिखा कि अंकिता के माता-पिता इंडिया गेट पर शांतिपूर्वक प्रदर्शन करते हुए अपनी बेटी के लिए न्याय मांग रहे थे लेकिन उन्हें रात के अंधेरे में हिरासत में ले लिया गया। पार्टी ने इसके लिए गृह मंत्री अमित शाह की पुलिस को जिम्मेदार ठहराया और श्री मोदी तथा श्री शाह से सवाल किया कि क्या अपनी बेटी की हत्या के मामले में न्याय मांगना अपराध है और बुजुर्ग माता-पिता को आधी रात में हिरासत में लेने की जरूरत क्यों पड़ी।

पार्टी ने यह भी सवाल किया कि दुष्यंत गौतम भाजपा के लिए इतने महत्वपूर्ण क्यों हैं कि उन्हें बचाने के लिए दुखी माता-पिता को अपमानित किया जा रहा है। कांग्रेस ने कहा कि अंकिता को न्याय मिलना चाहिए, उनके माता-पिता को जवाब मिलना चाहिए और देश की सरकार को बेटियों के साथ खड़ा होना चाहिए, न कि उनके खिलाफ।

गौरतलब है कि अंकिता भंडारी की 18 सितंबर 2022 को ऋषिकेश में हत्या कर दी गई थी । वह वनंतरा रिज़ॉर्ट में रिसेप्शनिस्ट के रूप में काम करती थीं। इस मामले में रिज़ॉर्ट के मालिक पुलकित आर्य, सहायक प्रबंधक अंकित गुप्ता और प्रबंधक सौरभ भास्कर को पुलिस ने हिरासत में लिया था।इन आरोपियों ने अपना अपराध कबूल किया था और मई 2025 में अदालत द्वारा उन्हें दोषी ठहराए जाने के बाद वे उम्रकैद की सज़ा काट रहे हैं।

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राहुल ने कहा, सभी विरोध एक हैं

नई दिल्ली। पहली बार ऐसा हुआ कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के प्रदर्शनकारियों के समर्थन में बयान दिया। हालांकि उन्होंने सीजेपी का नाम नहीं लिया लेकिन कहा कि तिरंगा लहराने को इस देश में अपराध बनाया जा रहा है। गौरतलब है कि सीजेपी के लोग कह रहे हैं कि उनको जंतर मंतर पर तिरंगा लहराने के कारण गिरफ्तार किया गया। हालांकि असल में उनको जंतर मंतर पर जबरदस्ती प्रदर्शन करने और जमानत की शर्तों का उल्लंघन करने के लिए गिरफ्तार किया गया।

बहरहाल, राहुल ने बुधवार को कहा, ‘जंतर मंतर पर शांतिपूर्ण विरोध में तिरंगा लहराना जुर्म नहीं है। इसके लिए युवाओं को जेल भेजना कायरता है। स्टूडेंट्स, युवा, पत्रकार, इंडिया ब्लॉक। अलग अलग बैनर, एक मकसद। सभी विरोध एक हैं। जंतर मंतर भारत के लोगों का है। हम इसे वापस लेंगे’। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने अमित शाह पर निशाना साधते हुए कहा, ‘गृह मंत्री द्वारा एसआईआर में बाहर किए गए 13.3 करोड़ भारतीयों को घुसपैठिया घोषित करना भारतीयता का अपमान है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद, जंतर मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल से हटाक पहले वोट चोरी फिर विरोध करने के अधिकार की चोरी भाजपाई तानाशाही का प्रमाण है’।

विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने थामा कांग्रेस का दामन

उत्तराखण्ड प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में बुधवार विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने अपने समर्थकों के साथ पार्टी की सदस्यता ग्रहण की।

प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल, चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष प्रीतम सिंह और चुनाव प्रबंधन समिति के अध्यक्ष हरक सिंह रावत की मौजूदगी में चकराता, सहसपुर, विकास नगर से कई लोगों ने कांग्रेस पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण करने वालों में पूर्व प्रत्याशी विधानसभा चकराता दर्शन लाल डोभाल, सेवानिवृत्त आईजी पुलिस अनन्तराम चौहान, कैप्टन ताजवर सिंह नेगी, कैप्टन नारायण सिंह रावत, कैप्टन गंगा सिंह, कैप्टन हीरा बल्लभ पांडे, कैप्टन सोबन सिंह, जितेंद्र सिंह, शशांक भट्ट आदि प्रमुख हैं।

श्री गोदियाल ने इस अवसर पर कहा कि आज देश एवं प्रदेश की जनता भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की जनविरोधी नीतियों, बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार तथा बिगड़ती कानून व्यवस्था से त्रस्त है। उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड में भाजपा सरकार के शासनकाल में बेरोजगार नौजवान रोजगार के लिए दर-दर भटक रहे हैं, प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाओं ने युवाओं के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है, महिलाओं के विरुद्ध बढ़ते अपराधों से प्रदेश की मातृशक्ति स्वयं को असुरक्षित महसूस कर रही है तथा किसान, मजदूर और छोटे व्यापारी सरकार की नीतियों से परेशान हैं।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि भाजपा सरकार की कथनी और करनी में भारी अन्तर है। प्रदेश की जनता ने जिस विश्वास और उम्मीद के साथ भाजपा को सत्ता सौंपी थी, सरकार उन अपेक्षाओं पर खरी उतरने में पूरी तरह विफल रही है। विकास के नाम पर केवल घोषणाएं की जा रही हैं, जबकि प्रदेश में बेरोजगारी, पलायन, महंगाई और भ्रष्टाचार जैसी समस्याएं लगातार विकराल रूप धारण करती जा रही हैं। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की जनता भाजपा सरकार के कुशासन से मुक्ति चाहती है। प्रदेश में विकास कार्य ठप पड़े हैं तथा सरकार जनसमस्याओं के समाधान के बजाय प्रचार-प्रसार और राजनीतिक बयानबाजी में व्यस्त है। उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार की नाकामियों से जनता में भारी आक्रोश है और आने वाले विधानसभा चुनावों में प्रदेश की जनता भाजपा को सत्ता से बेदखल कर कांग्रेस की सरकार बनाने का मन बना चुकी है।

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चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष सिंह ने कहा कि कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे एवं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी देशभर में लोकतंत्र, संविधान और आम जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए निरन्तर संघर्ष कर रहे हैं। उनके नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी की विचारधारा और जनहित के मुद्दों के प्रति लोगों का विश्वास लगातार मजबूत हो रहा है। इसी का परिणाम है कि विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता कांग्रेस की नीतियों से प्रभावित होकर पार्टी में शामिल हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी में शामिल होने वाले सभी नेताओं को संगठन में पूरा सम्मान दिया जाएगा तथा उनके राजनीतिक एवं सामाजिक अनुभवों का लाभ पार्टी संगठन को मजबूत बनाने में लिया जाएगा।

प्रदेश चुनाव प्रबंधन समिति के अध्यक्ष डॉ. हरक सिंह रावत ने कहा कि राज्य की भाजपा सरकार हर मोर्चे पर विफल साबित हुई है। प्रदेश में बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, महिला सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा तथा पलायन जैसे ज्वलन्त मुद्दों पर सरकार के पास कोई ठोस कार्ययोजना नहीं है। उन्होंने कहा कि राज्य की जनता अब भाजपा के खोखले वादों और झूठी घोषणाओं से ऊब चुकी है तथा कांग्रेस की ओर आशा भरी निगाहों से देख रही है। उन्होंने कहा कि आगामी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी पूरी एकजुटता एवं मजबूती के साथ चुनाव मैदान में उतरेगी। उन्होंने कहा कि कांग्रेस परिवार में नए नेताओं के शामिल होने से पार्टी का जनाधार और अधिक मजबूत होगा तथा भाजपा सरकार के विरुद्ध चल रहे जनसंघर्ष को नई गति मिलेगी।

इस अवसर पर विधायक लखपत सिंह बुटोला, प्रदेश उपाध्यक्ष लालचन्द शर्मा, अभिषेक सिंह, राजेन्द शाह, नवीन जोशी, विनोद चौहान, प्रदेश प्रवक्ता डॉ. प्रतिमा सिंह, अमेन्द्र बिष्ट, अखिलेश उनियाल, प्रशांत खंडूरी, नरेशानन्द नौटियाल आदि पार्टी नेता उपस्थित रहे।

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ज्ञानेश का इस्तीफा लेकर रहेंगे

नई दिल्ली। राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं ने मंगलवार को यह लाइन दोहराई। उन्होंने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा लेकर रहेंगे, चाहे इसमें जितना समय लगे और जितना आंदोलन करना पड़े। लगातार कई दिन के प्रदर्शन के बाद मंगलवार को विपक्ष की एक दर्जन पार्टियों के नेता राहुल गांधी के घर पर इकट्ठा हुए। वहां ‘इंडिया’ ब्लॉक की बैठक हुई। करीब दो घंटे की इस बैठक के बाद सभी नेताओं ने बाहर आकर साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस की। सभी नेताओं ने अपनी बात रखी।

बैठक के बाद मीडिया से बात करते हुए राहुल गांधी ने कहा, ‘मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा लेना हमारा मिशन है। इसमें जितना भी समय लगे, एक दिन, एक साल या दो साल, हमारा आंदोलन जारी रहेगा’। राहुल ने आगे कहा, ‘विपक्ष लोकतांत्रिक प्रक्रिया बहाल करने के लिए अंत तक संघर्ष करेगा’। जंतर मंतर को प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थानों की सूची से हटाने के मुद्दे पर राहुल ने कहा, ‘सरकार ने तय कर लिया है कि जंतर मंतर का इस्तेमाल लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने के लिए नहीं किया जा सकता। हम सरकार की इस सोच को चुनौती देंगे’।

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष ने कहा, ‘नरेंद्र मोदी, अमित शाह, ज्ञानेश कुमार और अन्य लोगों को समझना होगा कि संविधान को नुकसान पहुंचा कर बच निकलना इतना आसान नहीं होगा। ऐसे लोगों को न्याय के कटघरे में लाया जाएगा देश में लोकतंत्र को नष्ट कर दिया गया है। चुनावी व्यवस्था को तहस-नहस कर दिया गया है और संविधान को फाड़कर फेंक दिया गया है’।

राहुल ने मीडिया से कहा, ‘यह लड़ाई हमारे लिए नहीं, भारत के लोगों और उनके भविष्य के लिए है। हम सभी मिलकर देश में लोकतांत्रिक प्रक्रिया बहाल करने के लिए अंत तक लड़ेंगे। कोई भी संस्था अपनी भूमिका निभाए या न निभाए, राजनीतिक विरोध जारी रहेगा, जनता का संघर्ष जारी रहेगा और अंत में उसकी जीत होगी’। उन्होंने आगे कहा, ‘विपक्ष का संघर्ष जारी रहेगा और वह अपने लक्ष्य तक पहुंचकर रहेगा। इसमें कल, परसों या दो साल भी लग जाएं, हमारी टीम रुकने वाली नहीं है’।

पिछले आठ दिन में विपक्षी नेताओं की यह छठी बैठक थी। इसमें राहुल के अलावा कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, शरद पवार की एनसीपी की नेता सुप्रिया सुले, सीबीआई महासचिव डी राजा, राजद के तेजस्वी यादव, उद्धव ठाकरे की शिव सेना के संजय राउत और अन्य नेता शामिल हुए। सीपीआई एमएल के छात्र संगठन आईसा की नेता नेहा बोरा भी बैठक में शामिल हुईं।  बाद में उन्होंने भी मीडिया के सामने अपनी बात रखी। गौरतलब है कि एक दिन पहले सोमवार को विपक्ष ने ‘चलो दिल्ली मार्च’ किया था और सुप्रीम कोर्ट जाकर मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने और एसआईआर रद्द करने की याचिका दी थी।

CJI के खिलाफ विवादित पोस्ट को लेकर घिरी केरल कांग्रेस, आलोचना के बाद कर्मचारी को पद से हटाया, बीजेपी ने बताया शर्मनाक

Kerala Congress: कांग्रेस की केरल इकाई के आधिकारिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X अकाउंट से भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत के खिलाफ की गई एक विवादित पोस्ट सोमवार को व्यापक रूप से वायरल हुई। लेकिन सोशल मीडिया पर कड़ी आलोचना होने के बाद इसे हटा दिया गया। पार्टी ने पोस्ट करने के लिए जिम्मेदार व्यक्ति को भी पद से हटा दिया। केरलम प्रदेश कांग्रेस कमेटी (KPCC) के अध्यक्ष सनी जोसेफ ने एक बयान में कहा कि पार्टी के आधिकारिक X अकाउंट पर प्रधान न्यायाधीश के खिलाफ विवादित पोस्ट करने वाले जिम्मेदार व्यक्ति को पद से हटा दिया गया है।

जोसेफ ने कहा कि यह पोस्ट केपीसीसी नेतृत्व की जानकारी, सहमति या परामर्श के बिना की गई थी। उन्होंने कहा, “केपीसीसी इस बात की जांच करेगी कि ऐसी पोस्ट किन परिस्थितियों में की गई।” उन्होंने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका की निष्पक्षता को लेकर कांग्रेस पार्टी को कोई असहमति नहीं है। जोसेफ ने कहा कि सोशल मीडिया पर इस रुख के विपरीत व्यक्त किए गए विचार केपीसीसी नेतृत्व का आधिकारिक रुख नहीं है।

इससे पहले, केंद्रीय मंत्री किरेन रीजीजू ने हटाई जा चुकी पोस्ट का स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए कांग्रेस की आलोचना की। उन्होंने कहा कि उन्होंने पहले ही चेतावनी दी थी कि न्यायपालिका पार्टी का अगला निशाना होगी। रीजीजू ने X पर एक पोस्ट में कहा, “कांग्रेस भारत के सभी संवैधानिक और लोकतांत्रिक संस्थानों को नष्ट करना चाहती है। सभी भारत-विरोधी गिरोह एकजुट हो रहे हैं। सभी देशभक्त भारतीय भी एकजुट होंगे।”

BJP ने बताया शर्मनाक

भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने CJI के इस्तीफे की मांग को लेकर कांग्रेस पर तीखा हमला बोला। बीजेपी ने आरोप लगाया कि पार्टी अब हर संवैधानिक संस्था को ध्वस्त करके भारत में अराजकता पैदा करने की कोशिश में जुट गई है जो बेहद शर्मनाक है। BJP के प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने भी इस मुद्दे पर विपक्षी दल पर हमला बोला। उन्होंने कहा, “मुस्लिम लीग की माओवादी कांग्रेस में पूरी तरह बदल चुकी और चरम ‘दिमागी नक्सल’ मानसिकता अपना चुकी कांग्रेस अब हर संवैधानिक संस्था को ध्वस्त करके भारत में अराजकता पैदा करने की कोशिश में जुट गई है, जो शर्मनाक है।”

BJP प्रवक्ता सिद्धार्थ यादव ने भी कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि उसकी मानसिकता पूरी तरह अराजकतावादी हो गई है। यादव ने X पर एक पोस्ट में कहा, “अब कांग्रेस पार्टी के आधिकारिक हैंडल से CJI के इस्तीफे की मांग की जा रही है।” उन्होंने सवाल किया, “संवैधानिक संस्थाओं पर हमला करने और साथ ही संविधान की दुहाई देने से बड़ी राजनीतिक पाखंड की मिसाल क्या हो सकती है?”

उन्होंने कहा, “अगर चुनाव हारते हैं, तो निर्वाचन आयोग पर सवाल उठाते हैं। अगर फैसला उनके खिलाफ आता है, तो न्यायपालिका को निशाना बनाते हैं।” BJP सांसद निशिकांत दुबे ने भी केरल कांग्रेस की ओर से प्रधान न्यायाधीश के इस्तीफे की मांग को लेकर राहुल गांधी पर हमला बोला।

दुबे ने X पर कहा, “राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे की मांग करने के बाद ‘महाराजा’ राहुल गांधी ने अब उच्चतम न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश के इस्तीफे की भी मांग कर दी है।” BJP सांसद ने तंज कसते हुए कहा, “सूत्रों के अनुसार, इन इस्तीफों के बाद राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनेंगे, शरजील इमाम राष्ट्रपति बनेंगे, अभिजीत दीपके उपराष्ट्रपति बनेंगे, प्रियंका गांधी सुप्रीम कोर्ट की चीफ जस्टिस बनेंगी और खालिस्तानी पन्नून को मुख्य निर्वाचन आयुक्त नियुक्त किया जाएगा।”

उन्होंने कहा, “इस बीच, (जॉर्ज) सोरोस भारत के अमेरिका में राजदूत होंगे।” BJP के एक अन्य प्रवक्ता गौरव भाटिया ने कहा कि CJI द्वारा गांधी और विपक्षी नेताओं से मिलने से इनकार किए जाने से यह महत्वपूर्ण संदेश गया है कि न्यायपालिका को रोजमर्रा की राजनीतिक लड़ाइयों से ऊपर रहना चाहिए।

कब शुरू हुआ विवाद?

पिछले कुछ दिनों से दिल्ली में मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जारी प्रदर्शनों और उनसे जुड़ी पाबंदियों के मद्देनजर स्थिति के बारे में पूछे जाने पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा था, “ये कानून-व्यवस्था का मुद्दा है। ये मेरा विषय नहीं है।” CJI राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) की स्थापना की 33वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम से इतर पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा कि सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे हर किसी के लिए खुले हैं, चाहे वह आम नागरिक हो या कानून बनाने वाला कोई व्यक्ति। उनसे पूछा गया था कि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से मुलाकात करने से इनकार किए जाने के बाद विपक्षी नेता अपनी शिकायतें उनके सामने कैसे रख सकते हैं।

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CJI की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस की केरल इकाई ने C पर एक पोस्ट में कहा, “प्रिय सूर्यकांत, अगर कानून-व्यवस्था आपका विषय नहीं है, तो अभी इस्तीफा दे दीजिए। हम आपका स्थान लेने के लिए किसी ऐसे व्यक्ति को ढूंढ लेंगे जो इसे संभाल सके।” हालांकि, बाद में इस पोस्ट को हटा दिया गया।