अराजकता फैलाना चाहता है विपक्ष

प्रशांत भूषण ने ‘रिजीम चेंज’ की बात कही। वे वकील हैं और राजनीति में भी खूब सक्रिय रहे हैं। वे पहले आम आदमी पार्टी में थे, जहां से अरविंद केजरीवाल ने उनको निकाल दिया। उन्होंने जब ‘रिजीम चेंज’ की बात कही तो उसका एक खास संदर्भ होता है। लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार को रिजीम नहीं कहा जाता है। रिजीम का मतलब होता है तानाशाहों का शासन, जिसको जन विद्रोह के जरिए या विदेशी ताकतों के समर्थन से बदला जाता है।

विपक्ष के चेहरे पर लोकतंत्र, संविधान, संसदीय प्रणाली, गांधी मार्ग आदि का जो झीना सा परदा था वह परदा भी गिर गया है। उसकी असलियत खुल कर सामने आ गई है। देश और दुनिया को यह पता चल गया है कि भारत का विपक्ष बांग्लादेश के कट्टरपंथी जमात के लोगों के आंदोलन से प्रभावित है और उसी मॉडल पर देश में ‘रिजीम चेंज’ यानी सत्ता बदलने की मंशा से काम कर रहा है। निष्कर्ष अनजाने में दिए गए किसी प्रदर्शनकारी के बयान या किसी की जुबान से अनायास निकल गए किसी जुमले पर आधारित नहीं है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा मांगने के लिए प्रदर्शन कर रहे दो अलग अलग लोगों ने इस तरह के बयान दिए है। इसलिए यह सिर्फ संयोग नहीं हो सकता है। सीपीआई एमएल के छात्र संगठन आइसा की अध्यक्ष नेहा बोरा ने कहा कि वे बांग्लादेश के आंदोलन और वहां के आंदोलनकारियों से प्रभावित हैं तो सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण ने कॉकरोच जनता पार्टी और आइसा नेताओं की मौजूदगी में कहा कि इस प्रदर्शन का उद्देश्य ‘रिजीम चेंज’ करना यानी सत्ता बदलना है।

देश के सामान्य नागरिकों को यह समझना चाहिए कि ये दोनों बातें कितनी खतरनाक हैं। एक तो बांग्लादेश के आंदोलन से प्रेरणा और दूसरी उसी मॉडल से ‘रिजीम चेंज’ की बात, दोनों के गहरे निहितार्थ हैं। सबसे पहले यह समझने की जरुरत है कि बांग्लादेश में क्या हुआ था। बांग्लादेश में कट्टरपंथी इस्लामी संगठन ‘जमात ए इस्लामी’ ने तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना के खिलाफ आंदोलन किया था। बाद में जब आरक्षण के नियमों में बदलाव किए गए तो कुछ युवा भी उस आंदोलन में जुड़े। लेकिन चाहे जमात के लोग हों या युवाओं की ‘नेशनल सिटीजंस पार्टी’ के लोग हैं, सबने आंदोलन के दौरान जितना सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया उससे ज्यादा हमला वहां के अल्पसंख्यकों यानी हिंदुओं पर किया। बांग्लादेश के ‘जेन जी’ का पूरा आंदोलन वहां के हिंदुओं के खिलाफ था। किस तरह के जघन्य कांड हुए, वह पूरी दुनिया ने देखा। हिंदुओं के घरों को चारों तरफ से घेर कर उनमें आग लगाई गई। हिंदुओं की हत्या करके उनके शव पेड़ से लटकाए गए। क्या भारत में ऐसे हालात बनाना चाहते हैं प्रदर्शनकारी?

उस आंदोलन के बाद भी बांग्लादेश में क्या बदला? हिंसक आंदोलन के जरिए एक चुनी हुई सरकार को हटा दिया गया और एक कठपुतली के रूप में मोहम्मद यूनुस को बैठाया गया। यूनुस के शासन में बांग्लादेश के हिंदुओं पर जितने अत्याचार हुआ उनकी मिसाल नहीं है। उसके बाद भी जब चुनाव हुए तो उसका नतीजा यह निकला कि युवा देखते रह गए और सैनिक तानाशाह रहे जिया उर रहमान व खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान देश के प्रधानमंत्री बन गए। क्या ऐसा ही आंदोलन नेहा बोरा भारत में करना चाहती हैं कि एक चुनी हुई सरकार को अराजकता के जरिए हटाने का प्रयास किया जाए, उसके बाद कोई कठपुतली बैठे और फिर पुराने राज परिवार के किसी व्यक्ति को सत्ता मिल जाए? भारत के विकास और मजबूती से ईर्ष्या कर रहे बहुत से देश भारत की जनता द्वारा लगातार तीसरी बार चुनी हुई सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अस्थिर करना चाह रहे हैं। क्या यह आंदोलन उन विदेशी ताकतों की मंशा पूरी करने के लिए चलाया जा रहा है?

इन बयानों को इस संदर्भ में देखने का कारण यह भी है कि प्रशांत भूषण ने ‘रिजीम चेंज’ की बात कही। वे वकील हैं और राजनीति में भी खूब सक्रिय रहे हैं। वे पहले आम आदमी पार्टी में थे, जहां से अरविंद केजरीवाल ने उनको निकाल दिया। उन्होंने जब ‘रिजीम चेंज’ की बात कही तो उसका एक खास संदर्भ होता है। लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार को रिजीम नहीं कहा जाता है। रिजीम का मतलब होता है तानाशाहों का शासन, जिसको जन विद्रोह के जरिए या विदेशी ताकतों के समर्थन से बदला जाता है। रिजीम सीरिया में असद था, इराक में सद्दाम का था और लीबिया में गद्दाफी का था। भारत में रिजीम नहीं होता है। भारत में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार होती है, जिसे लोकतांत्रिक तरीके से ही बदला जाता है। इंदिरा गांधी की तानाशाही और इमरजेंसी का जवाब भी इस देश की जनता ने लोकतांत्रिक तरीके से ही दिया था। उनको वोट के जरिए हराया गया था। नरेंद्र मोदी को देश की जनता ने लगातार तीसरी बार वोट देकर प्रधानमंत्री चुना है। इस जनादेश के बाद नरेंद्र मोदी सबसे ज्यादा समय तक निर्वाचित प्रधानमंत्री रहने का रिकॉर्ड बना चुके हैं। देश की जनता न सिर्फ उनको बार बार देश की सत्ता सौंप रही है, बल्कि उनकी अपील पर बंगाल, असम जैसे पूर्वी व पूर्वोत्तर के राज्यों से लेकर पश्चिम में गुजरात और महाराष्ट्र तक भाजपा की सरकार बनवाती है। इतने लोकप्रिय नेता के शासन को ‘रिजीम’ कहना अपने आप में विपक्ष के लोगों की मंशा दिखाने वाला है।

असल में चाहे कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल हों या कॉकरोच जनता पार्टी जैसे सोशल मीडिया हैंडल्स हों या आइसा जैसे छात्र संगठन हों या प्रशांत भूषण जैसे कथित सिविल सोसायटी के लोग हों, इनका प्रदर्शन एक खास राजनीतिक मंशा से प्रेरित है। वह राजनीतिक मंशा है सरकार बदलने की। दूसरी बात यह है कि इनके प्रदर्शन से आम आदमी का कोई लेना देना नहीं है। जंतर मंतर पर सीजेपी का पहला प्रदर्शन पीड़ित पक्ष यानी पेपर लीक से प्रभावित हुए छात्रों, युवाओं और उनके परिजनों का था। लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जो प्रदर्शन हो रहा है वह मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में नाम कटने से प्रभावित मतदाताओं का नहीं है। ऐसे लोग तो सामने आ ही नहीं रहे हैं। क्योंकि ऐसे वास्तविक मतदाता बहुत कम हैं, जिनके नाम कटे हैं और अगर कट गए हैं तो वे उसे जुड़वाने की कोशिश कर रहे हैं। तभी किसी प्रदर्शन में ऐसे लोग नहीं दिख रहे हैं, जिनके नाम कटे हैं। प्रदर्शन के दौरान, जिससे भी पूछा जाता है, वह कहता है कि उसका नाम मतदाता सूची में है। जब प्रभावित पक्ष आंदोलन में नहीं शामिल है तो इसका क्या मतलब है?

जाहिर है इसका मकसद अराजकता फैलाना है। लोगों की भावनाओं को उभार कर सरकार के खिलाफ नाराजगी पैदा करना है। इसमें भी कोई बुराई नहीं है। विपक्ष का यही काम है कि वह सरकार के खिलाफ आम आदमी के मन में नाराजगी बढ़ाने की कोशिश करे। लेकिन इसके लिए पहले आम आदमी के मन में नाराजगी होनी भी तो चाहिए? जिस मामले में आम आदमी प्रभावित था वहां जुड़ा और सरकार ने भी उसे समझते हुए तत्काल केंद्रीय मंत्री का इस्तीफा कराया। लेकिन मौजूदा प्रदर्शन तो आम आदमी का है ही नहीं। यह राजनीतिक दलों का विरोध है और इसका मकसद संवैधानिक या लोकतांत्रिक तरीके से कोई मुद्दा उठाना नहीं, बल्कि अराजकता फैलाना है। अगर अराजकता फैलाना मकसद नहीं होता है तो क्या कोई समझदार नेता या राजनीतिक दल सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च करता है? आपने सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया और राष्ट्रपति को ज्ञापन दिया यहां तक तो बात समझ में आती है। लेकिन विपक्ष ने सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च किया। कांग्रेस की एक प्रदेश कमेटी की ओर से चीफ जस्टिस के लिए असम्मानजनक संबोधन वाला पोस्ट किया गया, जिसे बाद में डिलीट किया गया। प्रदर्शन में शामिल नेताओं ने चीफ जस्टिस के खिलाफ अपमानजनक बातें कहीं। यह इससे पहले कभी नहीं हुआ था।

विपक्ष के सबसे बड़े नेता राहुल गांधी प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों को कोहनी मार रहे थे। प्रदर्शनकारी महिला पुलिसकर्मियों की वर्दी पर हाथ डाल रहे थे और उनके नाम सोशल मीडिया में उजागर करके उनको शर्मिंदा करने की कोशिश कर रहे थे। यह सब पहले कभी नहीं हुआ। पूरे आंदोलन के दौरान पुलिस को उकसाने का प्रयास किया गया ताकि पुलिस पलट कर कार्रवाई करे तो उसका मुद्दा बनाया जाए। यह सोची समझी रणनीति के तहत किया जा रहा था। पूरे प्रदर्शन का मकसद चुनाव आयोग की साख और देश के स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव की विश्वसनीयता पर सवाल उठाना है। इसके जरिए विपक्ष यह दिखाना चाहता है कि वह अपनी कमजोरी से नहीं हार रहा है, बल्कि उसको हराया जा रहा है। लेकिन इसकी हकीकत देश की जनता से बेहतर और कौन जानता है! आखिर जनता ही वोट देकर भाजपा को जीता रही है और कांग्रेस व अन्य विपक्षी पार्टियों को हरवा रही है। विपक्ष को जनता के जनादेश को अराजक आंदोलनों के जरिए चुनौती देने की बजाय राजनीतिक रूप से अपने को मजबूत करके आगे की लड़ाई की तैयारी करनी चाहिए।

(लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)

सुप्रीम कोर्ट का मार्च रोकने से इनकार

नई दिल्ली। शुक्रवार को लगातार दूसरे दिन सुप्रीम कोर्ट ने कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के तिरंगा मार्च को रोकने से इनकार किया। कनॉट प्लेस के व्यापारियों के कई समूहों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई थी और शुक्रवार की शाम को पांच बजे के तिरंगा मार्च को रोकने का आदेश देने की मांग की थी। लेकिन सर्वोच्च अदालत ने दिल्ली के व्यापारियों की याचिका पर तत्काल आदेश देने से इनकार कर दिया। एक दिन पहले गुरुवार को भी सुप्रीम कोर्ट ने मार्च रोकने का आदेश नहीं दिया था। लेकिन पुलिस को सुरक्षा के पर्याप्त बंदोबस्त करने का निर्देश दिया था।

दिल्ली के व्यापारियों की इस याचिका में कॉकरोच जनता पार्टी के सेंट्रल पार्क में प्रदर्शन से कारोबार प्रभावित होने की आशंका जताई गई थी। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने प्रदर्शन से जुड़ी अन्य याचिकाओं का जिक्र करते हुए कहा, ‘कोई प्रदर्शन करना चाहता है, कोई मूंगफली बेचना चाहता है, कोई कानून व्यवस्था चाहता है, ये सभी बातें आपस में जुड़ी हैं’। गौरतलब है कि प्रदर्शन के कारण एनडीएमसी ने पहले ही सेंट्रल पार्क को दिन तक बंद करने का आदेश दे दिया था।

बहरहाल, कनॉट प्लेस के व्यापारियों का दावा है प्रदर्शन और उसे रोकने के बंदोबस्तों से कनॉट प्लेस में हर दिन दो सौ करोड़ रुपए का कारोबार प्रभावित हो सकता है। व्यापारियों ने यह भी कहा है कि 10 अक्टूबर को प्रदर्शन शुरू होने के बाद से दो हजार करोड़ रुपए का नुकसान हो चुका है।शुक्रवार को जो याचिका सुप्रीम कोर्ट के सामने लाई थी वह दिल्ली किराना कमेटी और दिल्ली आयरन एंड हार्डवेयर मर्चेंट एसोसिएशन ने दायर की थी। शुक्रवार सुबह चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने इस पर सुनवाई की।

अदालत ने कहा, ‘हम उम्मीद करते हैं कि सभी लोग बेहतर समझदारी दिखाएंगे। हम जानते हैं कि सभी छोटे दुकानदार इन दिनों अपनी रोजी रोटी कमाते हैं। हम जानते हैं कि पूरे परिवारों को किन मुश्किलों और परेशानियों का सामना करना पड़ेगा’। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि सेंट्रल पार्क बंद होने से ठेले वालों और छोटे व्यापारियों का कारोबार भी प्रभावित हो सकता है। प्रदर्शन के कारण उन्हें नुकसान होने का खतरा है। व्यापारी संगठनों ने त्योहार और शादी के सीजन में मध्य दिल्ली में प्रदर्शन के कारण संभावित कारोबार नुकसान का मुद्दा उठाया है।

राहुल के मार्च से सुप्रीम कोर्ट नाराज

नई दिल्ली। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और विपक्ष के अन्य नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट तक मार्च करके अदालत को नाराज कर दिया है। अदालत ने राहुल सहित सभी नेताओं को नोटिस जारी किया है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने तीखी टिप्पणी भी की है। विपक्ष के नेताओं की ओर से 12 अक्टूबर को दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए गुरुवार को चीफ जस्टिस ने कहा कि कोई भी कोर्ट को डरा धमकाकर दबाव में नहीं ला सकता। ऐसी कोशिशें बेकार हैं। इन पर कोई ध्यान नहीं देता।

चीफ जस्टिस इतने पर नहीं रूके। उन्होंने आगे कहा, ‘हमें पता कि कोर्ट के बाहर क्या कहा जा रहा है और कोर्ट के अंदर क्या कहा जा रहा है। हम किसी काल्पनिक दुनिया में नहीं जी रहे हैं। हमें हर बात की जानकारी है’। चीफ जस्टिस ने किसी नेता का नाम नहीं लिया लेकिन जब उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ताओं में से एक के आचरण पर सवाल करेंगे और उसे सफाई देनी होगी तो उनका इशारा राहुल गांधी की ओर ही था।

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने 12 अक्टूबर को अदालत परिसर में विपक्षी नेताओं और उनके समर्थकों के जुटने से जुड़े मामले में राहुल गांधी, अखिलेश यादव और अन्य 14 नेताओं को नोटिस जारी किया है। वहीं, SIR प्रक्रिया और चुनाव आयोग के फैसलों के खिलाफ इन नेताओं की याचिका पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से जवाब मांगा। 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट परिसर में विपक्षी नेताओं और उनके समर्थकों के जुटने से जुड़े मामले में राहुल गांधी, अखिलेश यादव और अन्य 14 नेताओं को नोटिस जारी किया है।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले विपक्ष के प्रति सद्भाव दिखाया था। जब विपक्ष की ओर से उनसे मिलने का समय मांगा गया तो उन्होंने कई कारण बताते हुए मिलने से इनकार कर दिया था। लेकिन यह कहा था कि अगर विपक्षी नेता याचिका दायर करते हैं तो उस पर जल्दी सुनवाई की जाएगी। लेकिन उस समय उनको आइडिया नहीं था कि उनके इनकार के बाद विपक्ष के नेता सुप्रीम कोर्ट तक मार्च करेंगे और खुद परिसर में आकर याचिका दायर करेंगे। उनके इनकार के बाद विपक्षी नेता कनॉट प्लेस से मार्च करते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे और वहां याचिका दायर की थी। हालांकि याचिका में कई कमियां थीं, जिन्हें बाद में दुरुस्त किया गया और उस पर गुरुवार को सुनवाई हुई।

दिल्ली मेट्रो ने सुप्रीम कोर्ट से माफी मांगी

नई दिल्ली। दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन यानी डीएमआरसी ने सुप्रीम कोर्ट से बिना शर्त माफी मांगी है। लेकिन साथ ही यह भी कहा है कि 10 अक्टूबर को कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के दौरान दिल्ली मेट्रो को बंद नहीं किया गया था। डीएमआरसी ने कहा है कि प्रदर्शन के दौरान मेट्रो ट्रेन सेवाओं में न कटौती की गई नही सेवा रद्द की गई। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने नौ अक्टूबर को बहुत साफ निर्देश दिया था कि मेट्रो सेवा नहीं बंद की जाए। इसके बावजूद अगले दिन 45 मेट्रो स्टेशन बंद थे।

इस पर अदालत ने नोटिस जारी करके पूछा था कि क्यों नहीं डीएमआरसी के खिलाफ अवमानना का मुकदमा चलाया जाए। इसके जवाब में डीएमआरसी ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में हलफनामे देकर बताया कि 303 में से 45 स्टेशनों पर एंट्री और एग्जिट सीमित की गई थी। वहीं, 258 स्टेशन यानी मेट्रो नेटवर्क का 85 फीसदी से ज्यादा हिस्सा पूरी तरह चालू रहा। डीएमआरसी ने कहा कि 45 स्टेशनों पर एंट्री और एग्जिट सीमित करने का फैसला पुलिस के आकलन के आधार पर किया गया था।

गौरतलब है कि पहले खबर आई थी कि 57 मेट्रो स्टेशन बंद होंगे। इसके बाद नौ अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था कि दिल्ली की मेट्रो सेना और दिल्ली आने या दिल्ली से बाहर जाने वाली ट्रेनों की आवाजाही पर पूरी तरह रोक न लगे। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने डीएमआरसी और अन्य पक्षों को आदेश पालन हलफनामा दाखिल करने का भी निर्देश दिया था।

विपक्ष की याचिका पर नहीं हुई सुनवाई

नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को रद्द करने के लिए विपक्ष के 11 नेताओं की ओर से दायर याचिका पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई नहीं हो सकी। सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री ने इस याचिका में एक दर्जन से ज्यादा खामियां बताईं। उन्हें ठीक करने के बाद ही सुनवाई हो पाएगी। गौरतलब है कि चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने रविवार को कहा था कि विपक्ष सोमवार को याचिका दायर करता है तो उस पर मंगलवार को सुनवाई हो सकती है।

विपक्ष ने सोमवार को याचिका दायर भी की लेकिन एक रिपोर्ट के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री ने उसमें 14 खामियां बताई हैं। यह याचिका मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने और एसआईआर में बड़े पैमाने पर नाम हटाने और गड़बड़ियों के आरोपों से जुड़ी है। इस याचिका में खामियों के कारण मंगलवार को इस पर सुनवाई नहीं हो सकी। यह याचिका 10 पार्टियों के 11 नेताओं की ओर से दायर की गई है। कांग्रेस से राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम याचिकाकर्ता के रूप में है। इनके अलावा अखिलेश यादव, सुप्रिया सुले, संजय राउत, एमए बेबी, डी राजा आदि नेता भी याचिकाकर्ता हैं।

बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री की मुताबिक याचिका के साथ जमा किए गए दस्तावेजों में भी खामियां हैं। इसमें नौ याचिकाकर्ताओं की वकालतनामा नहीं है। मल्लिकार्जुन खड़गे की आईडी की तस्वीर साफ नहीं है। इतना ही नहीं कोर्ट फीस भी 220 रुपए कम जमा किए गए हैं। सोमवार, 12 अक्टूबर को दायर याचिका में भारत निर्वाचन आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और अन्य चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी को पक्षकार बनाया गया है। गौरतलब है कि राहुल गांधी और विपक्षी नेताओं ने चीफ जस्टिस से मुलाकात का समय मांगा था। लेकिन उन्होंने इनकार किया, जिसके बाद विपक्ष ने याचिका दायर करने का फैसला किया। सोमवार को विपक्षी नेता पैदल मार्च करते हुए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे थे।

CJI के खिलाफ विवादित पोस्ट को लेकर घिरी केरल कांग्रेस, आलोचना के बाद कर्मचारी को पद से हटाया, बीजेपी ने बताया शर्मनाक

Kerala Congress: कांग्रेस की केरल इकाई के आधिकारिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X अकाउंट से भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत के खिलाफ की गई एक विवादित पोस्ट सोमवार को व्यापक रूप से वायरल हुई। लेकिन सोशल मीडिया पर कड़ी आलोचना होने के बाद इसे हटा दिया गया। पार्टी ने पोस्ट करने के लिए जिम्मेदार व्यक्ति को भी पद से हटा दिया। केरलम प्रदेश कांग्रेस कमेटी (KPCC) के अध्यक्ष सनी जोसेफ ने एक बयान में कहा कि पार्टी के आधिकारिक X अकाउंट पर प्रधान न्यायाधीश के खिलाफ विवादित पोस्ट करने वाले जिम्मेदार व्यक्ति को पद से हटा दिया गया है।

जोसेफ ने कहा कि यह पोस्ट केपीसीसी नेतृत्व की जानकारी, सहमति या परामर्श के बिना की गई थी। उन्होंने कहा, “केपीसीसी इस बात की जांच करेगी कि ऐसी पोस्ट किन परिस्थितियों में की गई।” उन्होंने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका की निष्पक्षता को लेकर कांग्रेस पार्टी को कोई असहमति नहीं है। जोसेफ ने कहा कि सोशल मीडिया पर इस रुख के विपरीत व्यक्त किए गए विचार केपीसीसी नेतृत्व का आधिकारिक रुख नहीं है।

इससे पहले, केंद्रीय मंत्री किरेन रीजीजू ने हटाई जा चुकी पोस्ट का स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए कांग्रेस की आलोचना की। उन्होंने कहा कि उन्होंने पहले ही चेतावनी दी थी कि न्यायपालिका पार्टी का अगला निशाना होगी। रीजीजू ने X पर एक पोस्ट में कहा, “कांग्रेस भारत के सभी संवैधानिक और लोकतांत्रिक संस्थानों को नष्ट करना चाहती है। सभी भारत-विरोधी गिरोह एकजुट हो रहे हैं। सभी देशभक्त भारतीय भी एकजुट होंगे।”

BJP ने बताया शर्मनाक

भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने CJI के इस्तीफे की मांग को लेकर कांग्रेस पर तीखा हमला बोला। बीजेपी ने आरोप लगाया कि पार्टी अब हर संवैधानिक संस्था को ध्वस्त करके भारत में अराजकता पैदा करने की कोशिश में जुट गई है जो बेहद शर्मनाक है। BJP के प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने भी इस मुद्दे पर विपक्षी दल पर हमला बोला। उन्होंने कहा, “मुस्लिम लीग की माओवादी कांग्रेस में पूरी तरह बदल चुकी और चरम ‘दिमागी नक्सल’ मानसिकता अपना चुकी कांग्रेस अब हर संवैधानिक संस्था को ध्वस्त करके भारत में अराजकता पैदा करने की कोशिश में जुट गई है, जो शर्मनाक है।”

BJP प्रवक्ता सिद्धार्थ यादव ने भी कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि उसकी मानसिकता पूरी तरह अराजकतावादी हो गई है। यादव ने X पर एक पोस्ट में कहा, “अब कांग्रेस पार्टी के आधिकारिक हैंडल से CJI के इस्तीफे की मांग की जा रही है।” उन्होंने सवाल किया, “संवैधानिक संस्थाओं पर हमला करने और साथ ही संविधान की दुहाई देने से बड़ी राजनीतिक पाखंड की मिसाल क्या हो सकती है?”

उन्होंने कहा, “अगर चुनाव हारते हैं, तो निर्वाचन आयोग पर सवाल उठाते हैं। अगर फैसला उनके खिलाफ आता है, तो न्यायपालिका को निशाना बनाते हैं।” BJP सांसद निशिकांत दुबे ने भी केरल कांग्रेस की ओर से प्रधान न्यायाधीश के इस्तीफे की मांग को लेकर राहुल गांधी पर हमला बोला।

दुबे ने X पर कहा, “राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे की मांग करने के बाद ‘महाराजा’ राहुल गांधी ने अब उच्चतम न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश के इस्तीफे की भी मांग कर दी है।” BJP सांसद ने तंज कसते हुए कहा, “सूत्रों के अनुसार, इन इस्तीफों के बाद राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनेंगे, शरजील इमाम राष्ट्रपति बनेंगे, अभिजीत दीपके उपराष्ट्रपति बनेंगे, प्रियंका गांधी सुप्रीम कोर्ट की चीफ जस्टिस बनेंगी और खालिस्तानी पन्नून को मुख्य निर्वाचन आयुक्त नियुक्त किया जाएगा।”

उन्होंने कहा, “इस बीच, (जॉर्ज) सोरोस भारत के अमेरिका में राजदूत होंगे।” BJP के एक अन्य प्रवक्ता गौरव भाटिया ने कहा कि CJI द्वारा गांधी और विपक्षी नेताओं से मिलने से इनकार किए जाने से यह महत्वपूर्ण संदेश गया है कि न्यायपालिका को रोजमर्रा की राजनीतिक लड़ाइयों से ऊपर रहना चाहिए।

कब शुरू हुआ विवाद?

पिछले कुछ दिनों से दिल्ली में मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जारी प्रदर्शनों और उनसे जुड़ी पाबंदियों के मद्देनजर स्थिति के बारे में पूछे जाने पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा था, “ये कानून-व्यवस्था का मुद्दा है। ये मेरा विषय नहीं है।” CJI राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) की स्थापना की 33वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम से इतर पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा कि सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे हर किसी के लिए खुले हैं, चाहे वह आम नागरिक हो या कानून बनाने वाला कोई व्यक्ति। उनसे पूछा गया था कि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से मुलाकात करने से इनकार किए जाने के बाद विपक्षी नेता अपनी शिकायतें उनके सामने कैसे रख सकते हैं।

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CJI की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस की केरल इकाई ने C पर एक पोस्ट में कहा, “प्रिय सूर्यकांत, अगर कानून-व्यवस्था आपका विषय नहीं है, तो अभी इस्तीफा दे दीजिए। हम आपका स्थान लेने के लिए किसी ऐसे व्यक्ति को ढूंढ लेंगे जो इसे संभाल सके।” हालांकि, बाद में इस पोस्ट को हटा दिया गया।

चीफ जस्टिस की इनकार वाली चिट्ठी सामने आई

नई दिल्ली। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने विपक्ष की ओर से मिलने का समय मांगने की चिट्ठी के जवाब में जो चिट्ठी लिखी थी, वह कांग्रेस पार्टी ने जारी कर दी है। हालांकि इससे पहले सुबह में चीफ जस्टिस ने इसके कंटेंट के बारे में बताने से मना कर दिया था और कहा था कि पत्रकारों को विपक्ष से पूछना चाहिए। इस चिट्ठी में चीफ जस्टिस ने कहा कि एसआईआर और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का मामला अदालत में विचाराधीन है इसलिए उनका विपक्षी नेताओं से मिलना मर्यादा के अनुकूल नहीं होगा।

चीफ जस्टिस ने दिल्ली में प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई को लेकर कहा कि ये उनका मुद्दा नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे सभी के लिए खुले हैं और कोई भी आम नागरिक या निर्वाचित जनप्रतिनिधि याचिका दाखिल कर सकता है। विज्ञान भवन में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के स्थापना दिवस कार्यक्रम में चीफ जस्टिस पहुंचे थे, जहां उन्होंने मीडिया के कुछ सवालों का जवाब गिया।

इस बीच, उनकी वह चिट्ठी भी सामने आई, जो उन्होंने रविवार को ‘इंडिया’ ब्लॉक के नेताओं को मुलाकात से इनकार करने के लिए लिखा था। इसमें उन्होंने कहा कि विपक्ष जिन मुद्दों पर चर्चा करना चाहता है, वे पहले से सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं। ऐसे में इन पर मीटिंग करना न्यायिक मर्यादा और नैतिकता के खिलाफ होगा। चीफ जस्टिस ने लिखा कि सुप्रीम कोर्ट को इन मुद्दों पर प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई करने का अधिकार नहीं है। लंबित मामलों पर विचार करने के लिए न्यायिक प्रक्रिया अपनानी होगी।

चीफ जस्टिस ने अपनी चिट्ठी में लिखा कि संविधान के अनुच्छेद 32 और न्यायिक समीक्षा की शक्तियों के तहत सुप्रीम कोर्ट नागरिकों के अधिकारों से जुड़े मामलों पर सुनवाई करने के लिए बाध्य है। उन्होंने यह भी कहा कि विपक्ष अगर सोमवार को याचिका दाखिल करे तो उसे मंगलवार को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जा सकता है। चीफ जस्टिस ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट हर नागरिक के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। नागरिक कानून में तय प्रक्रिया के तहत अपने अधिकारों के संरक्षण के लिए किसी भी समय अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं।