रांका, सौरव को नहीं मिली जमानत

नई दिल्ली। कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के मुख्य प्रवक्ता सौरव दास और आशुतोष रांका की विजयादशमी तिहाड़ जेल में ही मनेगी। दोनों को सोमवार को जमानत नहीं मिली। सौरव और रांका को सोमवार को मंदिर मार्ग पुलिस स्टेशन में स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट, एसईएम के सामने पेश किया गया। वहां पुलिस ने दोनों की न्यायिक हिरासत बढ़ाने की मांग की। पुलिस की मांग पर मजिस्ट्रेट ने दोनों को दो दिन और जेल में रखने का आदेश दिया। अब उन्हें बुधवार को फिर पेश किया जाएगा।

गौरतलब है कि दोनों को 13 अक्टूबर को जंतर मंतर पर प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिया गया था। एसईएम कोर्ट ने उन्हें 14 अक्टूबर को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेजा था। दोनों को रविवार, 18 अक्टूबर को अदालत में पेश किया जाना था। लेकिन उससे पहले मजिस्ट्रेट ने कहा कि इन दोनों की रिहाई के लिए उनको धमकी भरे मैसेज मिल रहे हैं। सोमवार को भी सुनवाई में ज्यादा समय धमकी भरे मैसेज पर ही चर्चा हुई।

कॉकरोच जनता पार्टी ने आरोप लगाया कि सौरव दास और आशुतोष रांका की रिहाई में जान बूझकर देरी की जा रही है। सीजेपी की कानूनी मामलों की प्रमुख रत्ना सिंह ने कहा, ‘रविवार को जमानत पर सुनवाई के लिए मजिस्ट्रेट और सरकारी वकील दोपहर 12 बजे से इंतजार के बाद शाम करीब साढ़े पांच बजे पहुंचे’। उनका आरोप है कि दोनों नेताओं की रिहाई पर सुनवाई करने की बजाय मजिस्ट्रेट को मिले धमकी भरे संदेश पर चर्चा की गई।

रत्ना सिंह ने सवाल उठाया कि इस तरह के मैसेज का दोनों नेताओं की जमानत से क्या संबंध है? उन्होंने कहा कि सीजेपी ने मैसेज भेजने वाले की पहचान कर उसके खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की, लेकिन उनकी बात नहीं सुनी गई। सीजेपी का यह भी आरोप है कि दोनों नेताओं के जमानतदारों के दस्तावेजों की जांच में देरी की गई। उनके मुताबिक, चार जमानतदारों को साफ वजह बताए बिना खारिज कर दिया गया। जमानत के लिए बैंक की मुहर वाली फिक्स्ड डिपॉजिट रसीद को दोबारा मंजूरी के लिए पेश करने पर भी पार्टी ने सवाल उठाए। उधर सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने सोशल मीडिया पर आरोप लगाया कि दोनों नेताओं को जेल में रखने के लिए जमानत की प्रक्रिया में देरी की जा रही है। पार्टी ने कहा कि वह दोनों की रिहाई के लिए आगे भी कानूनी लड़ाई लड़ेगी।

अराजकता फैलाना चाहता है विपक्ष

प्रशांत भूषण ने ‘रिजीम चेंज’ की बात कही। वे वकील हैं और राजनीति में भी खूब सक्रिय रहे हैं। वे पहले आम आदमी पार्टी में थे, जहां से अरविंद केजरीवाल ने उनको निकाल दिया। उन्होंने जब ‘रिजीम चेंज’ की बात कही तो उसका एक खास संदर्भ होता है। लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार को रिजीम नहीं कहा जाता है। रिजीम का मतलब होता है तानाशाहों का शासन, जिसको जन विद्रोह के जरिए या विदेशी ताकतों के समर्थन से बदला जाता है।

विपक्ष के चेहरे पर लोकतंत्र, संविधान, संसदीय प्रणाली, गांधी मार्ग आदि का जो झीना सा परदा था वह परदा भी गिर गया है। उसकी असलियत खुल कर सामने आ गई है। देश और दुनिया को यह पता चल गया है कि भारत का विपक्ष बांग्लादेश के कट्टरपंथी जमात के लोगों के आंदोलन से प्रभावित है और उसी मॉडल पर देश में ‘रिजीम चेंज’ यानी सत्ता बदलने की मंशा से काम कर रहा है। निष्कर्ष अनजाने में दिए गए किसी प्रदर्शनकारी के बयान या किसी की जुबान से अनायास निकल गए किसी जुमले पर आधारित नहीं है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा मांगने के लिए प्रदर्शन कर रहे दो अलग अलग लोगों ने इस तरह के बयान दिए है। इसलिए यह सिर्फ संयोग नहीं हो सकता है। सीपीआई एमएल के छात्र संगठन आइसा की अध्यक्ष नेहा बोरा ने कहा कि वे बांग्लादेश के आंदोलन और वहां के आंदोलनकारियों से प्रभावित हैं तो सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण ने कॉकरोच जनता पार्टी और आइसा नेताओं की मौजूदगी में कहा कि इस प्रदर्शन का उद्देश्य ‘रिजीम चेंज’ करना यानी सत्ता बदलना है।

देश के सामान्य नागरिकों को यह समझना चाहिए कि ये दोनों बातें कितनी खतरनाक हैं। एक तो बांग्लादेश के आंदोलन से प्रेरणा और दूसरी उसी मॉडल से ‘रिजीम चेंज’ की बात, दोनों के गहरे निहितार्थ हैं। सबसे पहले यह समझने की जरुरत है कि बांग्लादेश में क्या हुआ था। बांग्लादेश में कट्टरपंथी इस्लामी संगठन ‘जमात ए इस्लामी’ ने तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना के खिलाफ आंदोलन किया था। बाद में जब आरक्षण के नियमों में बदलाव किए गए तो कुछ युवा भी उस आंदोलन में जुड़े। लेकिन चाहे जमात के लोग हों या युवाओं की ‘नेशनल सिटीजंस पार्टी’ के लोग हैं, सबने आंदोलन के दौरान जितना सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया उससे ज्यादा हमला वहां के अल्पसंख्यकों यानी हिंदुओं पर किया। बांग्लादेश के ‘जेन जी’ का पूरा आंदोलन वहां के हिंदुओं के खिलाफ था। किस तरह के जघन्य कांड हुए, वह पूरी दुनिया ने देखा। हिंदुओं के घरों को चारों तरफ से घेर कर उनमें आग लगाई गई। हिंदुओं की हत्या करके उनके शव पेड़ से लटकाए गए। क्या भारत में ऐसे हालात बनाना चाहते हैं प्रदर्शनकारी?

उस आंदोलन के बाद भी बांग्लादेश में क्या बदला? हिंसक आंदोलन के जरिए एक चुनी हुई सरकार को हटा दिया गया और एक कठपुतली के रूप में मोहम्मद यूनुस को बैठाया गया। यूनुस के शासन में बांग्लादेश के हिंदुओं पर जितने अत्याचार हुआ उनकी मिसाल नहीं है। उसके बाद भी जब चुनाव हुए तो उसका नतीजा यह निकला कि युवा देखते रह गए और सैनिक तानाशाह रहे जिया उर रहमान व खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान देश के प्रधानमंत्री बन गए। क्या ऐसा ही आंदोलन नेहा बोरा भारत में करना चाहती हैं कि एक चुनी हुई सरकार को अराजकता के जरिए हटाने का प्रयास किया जाए, उसके बाद कोई कठपुतली बैठे और फिर पुराने राज परिवार के किसी व्यक्ति को सत्ता मिल जाए? भारत के विकास और मजबूती से ईर्ष्या कर रहे बहुत से देश भारत की जनता द्वारा लगातार तीसरी बार चुनी हुई सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अस्थिर करना चाह रहे हैं। क्या यह आंदोलन उन विदेशी ताकतों की मंशा पूरी करने के लिए चलाया जा रहा है?

इन बयानों को इस संदर्भ में देखने का कारण यह भी है कि प्रशांत भूषण ने ‘रिजीम चेंज’ की बात कही। वे वकील हैं और राजनीति में भी खूब सक्रिय रहे हैं। वे पहले आम आदमी पार्टी में थे, जहां से अरविंद केजरीवाल ने उनको निकाल दिया। उन्होंने जब ‘रिजीम चेंज’ की बात कही तो उसका एक खास संदर्भ होता है। लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार को रिजीम नहीं कहा जाता है। रिजीम का मतलब होता है तानाशाहों का शासन, जिसको जन विद्रोह के जरिए या विदेशी ताकतों के समर्थन से बदला जाता है। रिजीम सीरिया में असद था, इराक में सद्दाम का था और लीबिया में गद्दाफी का था। भारत में रिजीम नहीं होता है। भारत में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार होती है, जिसे लोकतांत्रिक तरीके से ही बदला जाता है। इंदिरा गांधी की तानाशाही और इमरजेंसी का जवाब भी इस देश की जनता ने लोकतांत्रिक तरीके से ही दिया था। उनको वोट के जरिए हराया गया था। नरेंद्र मोदी को देश की जनता ने लगातार तीसरी बार वोट देकर प्रधानमंत्री चुना है। इस जनादेश के बाद नरेंद्र मोदी सबसे ज्यादा समय तक निर्वाचित प्रधानमंत्री रहने का रिकॉर्ड बना चुके हैं। देश की जनता न सिर्फ उनको बार बार देश की सत्ता सौंप रही है, बल्कि उनकी अपील पर बंगाल, असम जैसे पूर्वी व पूर्वोत्तर के राज्यों से लेकर पश्चिम में गुजरात और महाराष्ट्र तक भाजपा की सरकार बनवाती है। इतने लोकप्रिय नेता के शासन को ‘रिजीम’ कहना अपने आप में विपक्ष के लोगों की मंशा दिखाने वाला है।

असल में चाहे कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल हों या कॉकरोच जनता पार्टी जैसे सोशल मीडिया हैंडल्स हों या आइसा जैसे छात्र संगठन हों या प्रशांत भूषण जैसे कथित सिविल सोसायटी के लोग हों, इनका प्रदर्शन एक खास राजनीतिक मंशा से प्रेरित है। वह राजनीतिक मंशा है सरकार बदलने की। दूसरी बात यह है कि इनके प्रदर्शन से आम आदमी का कोई लेना देना नहीं है। जंतर मंतर पर सीजेपी का पहला प्रदर्शन पीड़ित पक्ष यानी पेपर लीक से प्रभावित हुए छात्रों, युवाओं और उनके परिजनों का था। लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जो प्रदर्शन हो रहा है वह मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में नाम कटने से प्रभावित मतदाताओं का नहीं है। ऐसे लोग तो सामने आ ही नहीं रहे हैं। क्योंकि ऐसे वास्तविक मतदाता बहुत कम हैं, जिनके नाम कटे हैं और अगर कट गए हैं तो वे उसे जुड़वाने की कोशिश कर रहे हैं। तभी किसी प्रदर्शन में ऐसे लोग नहीं दिख रहे हैं, जिनके नाम कटे हैं। प्रदर्शन के दौरान, जिससे भी पूछा जाता है, वह कहता है कि उसका नाम मतदाता सूची में है। जब प्रभावित पक्ष आंदोलन में नहीं शामिल है तो इसका क्या मतलब है?

जाहिर है इसका मकसद अराजकता फैलाना है। लोगों की भावनाओं को उभार कर सरकार के खिलाफ नाराजगी पैदा करना है। इसमें भी कोई बुराई नहीं है। विपक्ष का यही काम है कि वह सरकार के खिलाफ आम आदमी के मन में नाराजगी बढ़ाने की कोशिश करे। लेकिन इसके लिए पहले आम आदमी के मन में नाराजगी होनी भी तो चाहिए? जिस मामले में आम आदमी प्रभावित था वहां जुड़ा और सरकार ने भी उसे समझते हुए तत्काल केंद्रीय मंत्री का इस्तीफा कराया। लेकिन मौजूदा प्रदर्शन तो आम आदमी का है ही नहीं। यह राजनीतिक दलों का विरोध है और इसका मकसद संवैधानिक या लोकतांत्रिक तरीके से कोई मुद्दा उठाना नहीं, बल्कि अराजकता फैलाना है। अगर अराजकता फैलाना मकसद नहीं होता है तो क्या कोई समझदार नेता या राजनीतिक दल सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च करता है? आपने सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया और राष्ट्रपति को ज्ञापन दिया यहां तक तो बात समझ में आती है। लेकिन विपक्ष ने सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च किया। कांग्रेस की एक प्रदेश कमेटी की ओर से चीफ जस्टिस के लिए असम्मानजनक संबोधन वाला पोस्ट किया गया, जिसे बाद में डिलीट किया गया। प्रदर्शन में शामिल नेताओं ने चीफ जस्टिस के खिलाफ अपमानजनक बातें कहीं। यह इससे पहले कभी नहीं हुआ था।

विपक्ष के सबसे बड़े नेता राहुल गांधी प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों को कोहनी मार रहे थे। प्रदर्शनकारी महिला पुलिसकर्मियों की वर्दी पर हाथ डाल रहे थे और उनके नाम सोशल मीडिया में उजागर करके उनको शर्मिंदा करने की कोशिश कर रहे थे। यह सब पहले कभी नहीं हुआ। पूरे आंदोलन के दौरान पुलिस को उकसाने का प्रयास किया गया ताकि पुलिस पलट कर कार्रवाई करे तो उसका मुद्दा बनाया जाए। यह सोची समझी रणनीति के तहत किया जा रहा था। पूरे प्रदर्शन का मकसद चुनाव आयोग की साख और देश के स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव की विश्वसनीयता पर सवाल उठाना है। इसके जरिए विपक्ष यह दिखाना चाहता है कि वह अपनी कमजोरी से नहीं हार रहा है, बल्कि उसको हराया जा रहा है। लेकिन इसकी हकीकत देश की जनता से बेहतर और कौन जानता है! आखिर जनता ही वोट देकर भाजपा को जीता रही है और कांग्रेस व अन्य विपक्षी पार्टियों को हरवा रही है। विपक्ष को जनता के जनादेश को अराजक आंदोलनों के जरिए चुनौती देने की बजाय राजनीतिक रूप से अपने को मजबूत करके आगे की लड़ाई की तैयारी करनी चाहिए।

(लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)

जुलाई हिंसा की जांच का दायरा बढ़ेगा

नई दिल्ली। इस साल जुलाई में दिल्ली के जंतर मंतर और देश के अन्य हिस्सों में हुई हिंसा की जांच का दायरा बढ़ेगा। सुप्रीम कोर्ट ने पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ी के खिलाफ हुए आंदोलन के दौरान अलग अलग हिस्सों में हुई हिंसा की जांच के लिए एक हाई पावर्ड इन्क्वायरी कमेटी यानी एचपीईसी का गठन किया था। रिटायर जज जस्टिस आर सुभाष रेड्डी की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यों की कमेटी ने एक पोर्टल लॉन्च किया है। इस पर जुलाई में हुई हिंसा से प्रभावित लोग अपनी शिकायतें दर्ज करा सकते हैं।

समिति का गठन तीन महीने पहले अगस्त में हुआ था। तीन महीने के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने यह पोर्टल तैयार किया है, जिसे शनिवार को लॉन्च किया गया। hpec.nic.in नाम से तैयार इस पोर्टल पर प्रभावित आम लोगों के साथ साथ पुलिसकर्मी भी अपने साथ हुई हिंसा की शिकायत दर्ज कर सकेंगे। गौरतलब है कि 20 जुलाई की घटना के बाद दिल्ली पुलिस के कई अधिकारियों और जवानों के परिजनों से प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। उसके बाद अक्टूबर के घटनाक्रम में भी दिल्ली पुलिस के जवानों को पीड़ित दिखाते हुए वीडियो बनाया गया है।

इस मामले में पहले दिन से ऐसा लग रहा है कि सरकार किसी तरह से प्रदर्शनकारियों को कठघरे में खड़ा करना चाहती है। पुलिस की बर्बर कार्रवाई के ऊपर प्रदर्शनकारियों के कथित हमले को मुद्दा बनाने की कोशिश की जा रही है। इस पोर्टल को इस तरह के तैयार किया गया है कि संवेदनशील मामलों में प्रभावित लोगों की पहचान गोपनीय रखी जा सके और उनकी इच्छा के अनुसार पहचान सार्वजनिक न हो।

हिंसा से प्रभावित लोगों और अन्य संबंधित पक्षों से अपील की गई है कि वे पोर्टल पर जाकर तय फॉर्मेट के अनुसार अपनी शिकायतें या प्रतिनिधित्व अपलोड करें। कहा गया है कि यह कमेटी जुलाई में हुई हिंसा खास कर पैलेट गन के इस्तेमाल की शिकायतों की विस्तार से जांच करेगी। यह भी कहा गया है कि कमेटी दोनों पक्षों की ओर से की गई हिंसा की जांच करेगी। महिला प्रदर्शनकारियों पर हुई कार्रवाई की भी जांच की जाएगी। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शनकारियों के ऊपर दर्ज सारे मुकदमे रद्द करा चुकी है। लेकिन इस जांच के बाद क्या होगा, यह नहीं कहा जा सकता है।

रामलीला मैदान में कांग्रेस करेगी रैली

नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में हुई कथित गड़बड़ियों के खिलाफ कई दिन तक प्रदर्शन के बाद अब कांग्रेस पार्टी ने बड़ी रैली का ऐलान किया है। एक नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में इसे लेकर एक महारैली का आय़ोजन किया जाएगा। कांग्रेस पार्टी ने इस रैली के लिए दिल्ली पुलिस की अनुमति हासिल कर ली है।

शनिवार को दिल्ली पुलिस ने कांग्रेस पार्टी को रामलीला मैदान में एक नवंबर को होने वाली रैली के लिए अनापत्ति प्रमाणपत्र यानी एनओसी जारी कर दिया। सेंट्रल दिल्ली के डीसीपी रोहित राजबीर सिंह ने बताया कि पार्टी ने मैदान की बुकिंग के लिए 25 अक्टूबर से तीन नवंबर तक की तारीखें मांगी थी। उसे एक नवंबर को रैली करने की इजाजत मिल गई है। इससे पहले कांग्रेस पार्टी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे को लेकर छह अक्टूबर से लेकर 12 अक्टूबर तक लगातार प्रदर्शन किया।

गौरतलब है कि पिछले दिनों गृह मंत्रालय ने जंतर मंतर पर प्रदर्शनों पर रोक लगाते हुए रामलीला मैदान सहित तीन जगहों को प्रदर्शन स्थल घोषित किया। इन तीन जगहों में रामलीला मैदान एक है, जहां 50 हजार लोगों तक की रैली हो सकती है। अभी यह तय नहीं है कि रैली सिर्फ कांग्रेस पार्टी की होगी या उसमें विपक्षी पार्टियों के नेताओं को भी बुलाया जाएगा। गौरतलब है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और एसआईआर के खिलाफ कांग्रेस के आंदोलन में ‘इंडिया’ ब्लॉक की सभी पार्टियां शामिल रही हैं।

सीजेपी संस्थापक अभिजीत दिपके को मिली जमानत

कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) संस्थापक अभिजीत दिपके को शनिवार शाम विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने कुछ शर्तों पर जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया।

उन्हें यहां कनॉट प्लेस में आयोजित ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च के आह्वान के दौरान शुक्रवार को निवारक धाराओं के तहत गिरफ्तार किया गया था। इस मार्च से पहले हिरासत में लिए गए श्री दीपके के खिलाफ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 126/170 के तहत कार्रवाई शुरू की गई थी। श्री दिपके के अलावा ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) की अध्यक्ष नेहा बोरा को भी शनिवार तड़के रिहा कर दिया गया।

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पुलिस के अनुसार सुश्री बोरा को दिल्ली पुलिस अधिनियम की धारा 65 के तहत औपचारिक प्रक्रियाओं के बाद रिहा किया गया। इससे पहले शुक्रवार को सीजेपी ने दावा किया था कि श्री दीपके को किसी अज्ञात स्थान पर ले जाया गया था। संगठन के राष्ट्रीय संगठन प्रभारी अजिंक्य शिंदे ने शुक्रवार देर रात कहा था कि उन्हें हिरासत में लिए जाने के आठ घंटे से अधिक समय बाद भी उनके ठिकाने की जानकारी नहीं दी गई और उन्हें वकील या पार्टी टीम से बात करने की अनुमति नहीं दी जा रही थी। पुलिस ने बताया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने और यातायात का सुचारू संचालन सुनिश्चित करने के लिए शुक्रवार को लगभग 150 लोगों को हिरासत में लिया गया था।

सीजेपी के सह-संयोजक सौरभ दास और आशुतोष रांका पहले से पांच दिन की न्यायिक हिरासत में हैं। सर्वश्री दास, रांका और 12 अन्य लोगों को मंगलवार (13 अक्टूबर) की सुबह जंतर-मंतर के बंद द्वार पर चढ़कर परिसर में प्रवेश करने के बाद हिरासत में लिया गया था। जंतर मंतर को हाल ही में विरोध प्रदर्शन स्थल के रूप में अधिसूचित स्थल सूची से बाहर कर दिया गया था। बाद में सीजेपी के अजिंक्य शिंदे और 11 अन्य लोगों को रिहा कर दिया गया था।

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दीपके, नेहा पुलिस हिरासत में

नई दिल्ली। दिल्ली पुलिस ने कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके को हिरासत में लेकर उनका तिरंगा मार्च रोक दिया। दीपके अपने समर्थकों के साथ शाम पांच बजे के करीब कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में तिरंगा मार्च निकालने जा रहे थे। लेकिन पुलिस ने वहां पहुंचने से पहले ही उनको हिरासत में ले लिया गया। हालांकि उनके कुछ समर्थक तिरंगा लेकर सेंट्रल पार्क पहुंच गए थे और वहां तिरंगा फहराया। सीपीआई माले के छात्र संगठन आइसा की अध्यक्ष नेहा बोरा को भी पुलिस ने हिरासत में लिया है। सीजेपी ने देर शाम कहा कि दीपके को दिल्ली पुलिस किसी अज्ञात जगह ले गई है।

दिल्ली पुलिस ने डेढ़ सौ अन्य लोगों को भी हिरासत में लिया है। दीपके को छह दिन में दूसरी बार दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया। इससे पहले 10 अक्टूबर को जंतर मंतर पर प्रदर्शन करने के लिए आए दीपके को इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे पर ही हिरासत में ले लिया गया था। एक दिन बाद 11 अक्टूबर को दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका एक बॉन्ड भर कर रिहा हुए थे। पांच दिन बाद उनको फिर से हिरासत में लिया गया। दीपके को हिरासत में लिए जाने के बाद तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी ने इसे अघोषित आपातकाल बताया।

गौरतलब है कि सीजेपी का तिरंगा मार्च रोकने के लिए एनडीएमसी ने सेंट्रल पार्क को दिन के लिए बंद कर दिया था और पुलिस ने नई दिल्ली जिले में बीएनएसएस की धारा 163 लागू कर दी है। इसके तहत चार या उससे ज्यादा लोगों के इकट्ठा होने पर रोक है। बहरहाल, दीपके को हिरासत में लेने से पहले दिल्ली पुलिस झंडेवालान स्थित उस घर पर पहुंची थी, जहां वे ठहरे हुए थे। पुलिस ने उन्हें प्रदर्शन नहीं करने का नोटिस दिया था। यह घर शरद पवार की एनसीपी के एक नेता का है।

पुलिस जब उनको नोटिस देने गई तो इस दौरान दीपके की पुलिस से बहस हो गई थी। दीपके ने पुलिस से कहा कि यह कोई रैली या प्रोटेस्ट नहीं है। उन्होंने कहा, ‘हम सिर्फ सेंट्रल पार्क तक जाकर तिरंगा फहराना चाहते हैं’। गौरतलब है कि कॉकरोच जनता पार्टी ने शुक्रवार, 16 अक्टूबर को शाम पांच बजे ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च का ऐलान किया था। सीजेपी ने प्रदर्शनकारियों को शाम पांच बजे कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में आने के लिए कहा था।

दूसरी ओर इस मार्च को रोकने के लिए दिल्ली में 28 हजार से ज्यादा सुरक्षा बलों को तैनात किया गया था। अर्धसैनिक बलों के साथ साथ दिल्ली पुलिस के जवानों ने पूरे कनॉट प्लेस को घेर लिया था। सात लेयर की बैरिकेडिंग की गई थी। ऐसी की बैरिकेडिंग और सुरक्षा बंदोबस्त करके 10 अक्टूबर का जंतर मंतर का प्रदर्शन भी रोका गया था। उस दिन सात हजार के करीब लोग हिरासत में लिए गए थे।

ये मोदी की पुलिस है!

जी हां, ये मोदी और अमित शाह की पुलिस है, जो प्रदर्शनकारियों पर लाठी चलाती है और उसके बाद खुद को विक्टिम बताती है, रोते-कलपते वीडियो बनाती है, अपने परिजनों से अपील करवाती है और अगर उसके ऊपर महिलाओं से बदसलूकी का आरोप लगे तो आरोप लगाने वालों पर एससी, एसटी एक्ट में केस कर देती है। इससे पहले कभी और कहीं की पुलिस ने ऐसा काम नहीं किया होगा। दिल्ली के एक एसीपी स्तर के वरिष्ठ अधिकारी विवेक भगत ने तीन पत्रकारों के ऊपर एससी, एसटी एक्ट में केस दर्ज करा दिया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि जंतर मंतर पर प्रदर्शन के दौरान पत्रकारों ने उनके लिए जातिसूचक शब्द कहे और उनको अपमानित किया है। गौरतलब है कि डीसीपी विवेक भगत तीन अक्टूबर को हुए प्रदर्शन के दौरान एक दूसरे विवाद में फंसे थे। एक महिला पत्रकार ने उनके ऊपर आरोप लगाया था कि भगत ने उनके ऊपर यौन हमला किया। महिला पत्रकार ने आरोप लगाया कि भगत ने उनके सीने पर हाथ मारा। इस विवाद के बाद विवेक भगत ने डीसीपी का अतिरिक्त चार्ज लेने से मना कर दिया था।

अब उस घटना के 11 दिन के बाद विवेक भगत ने तीन महिला पत्रकारों के ऊपर एससी, एसटी कानून के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया है। यानी जिन महिला पत्रकारों ने अपने ऊपर यौन हमले का आरोप लगाया उनके ऊपर दिल्ली पुलिस के एसीपी ने एससी, एसटी एक्ट में केस कर दिया है। इस तरह के मामले पहले भारत के दूरदराज के गांवों से आते थे। जहां महिलाओं के यौन उत्पीड़न या एससी, एसटी एक्ट के तहत लोगों को फंसाने या इन कानूनों के दुरुपयोग के मुकदमे होते थे। अब दिल्ली में पुलिस के बड़े अधिकारी पत्रकारों के खिलाफ एससी, एसटी एक्ट में मुकदमा दर्ज करा रहे हैं!

मामला इतना भर नहीं है। जंतर मंतर के प्रोटेस्ट के बाद दिल्ली पुलिस की महिला अधिकारियों का वीडियो बनवाया गया और एक बेहद मार्किक गीत लगा कर उसे जारी किया गया, जिसमें दिल्ली पुलिस को पीड़ित दिखाया जा रहा है। 20 जुलाई के प्रोटेस्ट के बाद भी पुलिस वालों के परिजनों से प्रेस कॉन्फ्रेंस करा कर पुलिस को पीड़ित दिखाया गया था। हालांकि इसकी एक व्याख्या यह भी है कि पुलिस की बर्बरता को जस्टिफाई करने के लिए यह सब हो रहा है।

आंदोलन की जीत के बाद नागरिक हार क्यों जाता है?

उस छात्र की स्थिति सोचिए जिसकी परीक्षा रद्द हुई। उसका भविष्य अधर में है। वह अगली परीक्षा की तैयारी करे या अदालत के फैसले का इंतजार? उसके परिवार ने कोचिंग पर जो पैसा खर्च किया, उसका क्या होगा? एक वर्ष की पढ़ाई, मेहनत और अवसर का हिसाब कौन देगा? कानून कहता है कि दोषी को पांच से दस वर्ष की सजा होगी। मगर दोषी कब पकड़ा जाएगा? मुकदमा कब पूरा होगा? और तब तक छात्र को क्या राहत मिलेगी?

भारत में परीक्षा सुधार का कानून इसी विरोधाभास का एक उदाहरण है। सरकार कानून बनाती है। सजा बढ़ाती है। समयसीमा तय करती है। घोषणा होती है कि अब परीक्षा में धांधली करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। मगर जिस नौजवान की परीक्षा रद्द हुई है, उसके जीवन का एक वर्ष कौन लौटाएगा?

2024 में सार्वजनिक परीक्षा में अनुचित साधनों के इस्तेमाल को रोकने के लिए कानून बना। यह 21 जून 2024 से लागू हुआ। इसमें दोषियों के लिए तीन से पांच वर्ष तक की कैद का प्रावधान था। मगर मई 2026 में नीट परीक्षा कथित प्रश्नपत्र लीक के बाद रद्द करनी पड़ी। परीक्षा दोबारा आयोजित हुई।

इसके बाद कानून में संशोधन किया गया। 31 जुलाई को मंजूरी मिले संशोधनों में सजा बढ़ाकर पांच से दस वर्ष कर दी गई। जांच पूरी करने के लिए दो महीने की समयसीमा भी तय हुई। मगर पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च ने एक महत्वपूर्ण कमी बताई। यदि दो महीने में जांच पूरी नहीं होती तो क्या होगा, इसका कानून में कोई अतिरिक्त प्रावधान नहीं है।

यानी समयसीमा है, मगर उसे तोड़ने का परिणाम तय नहीं है।

अब उस छात्र की स्थिति सोचिए जिसकी परीक्षा रद्द हुई। उसका भविष्य अधर में है। वह अगली परीक्षा की तैयारी करे या अदालत के फैसले का इंतजार? उसके परिवार ने कोचिंग पर जो पैसा खर्च किया, उसका क्या होगा? एक वर्ष की पढ़ाई, मेहनत और अवसर का हिसाब कौन देगा?

कानून कहता है कि दोषी को पांच से दस वर्ष की सजा होगी। मगर दोषी कब पकड़ा जाएगा? मुकदमा कब पूरा होगा? और तब तक छात्र को क्या राहत मिलेगी?

इन प्रश्नों का उत्तर सजा बढ़ाने से नहीं मिलता। 28 जुलाई को केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने लोकसभा में बताया कि राधाकृष्णन समिति की 46 प्रमुख सिफारिशों में से 35 लागू की जा चुकी हैं। विशेष फास्ट ट्रैक अदालतें स्थापित की जा रही हैं। नीट-यूजी प्रश्नपत्र लीक मामले के लिए एक विशेष अदालत पहले ही निर्धारित हो चुकी थी। मगर 27 जुलाई को उसकी पहली सुनवाई स्थगित करनी पड़ी।

क्यों?

क्योंकि सीबीआई की ओर से कोई उपस्थित नहीं हुआ। एक तरफ सरकार की घोषणा कि 46 में से 35 सिफारिशें लागू हो चुकी हैं। दूसरी तरफ विशेष अदालत की पहली सुनवाई में ही जांच एजेंसी अनुपस्थित।

यही घोषणा और क्रियान्वयन के बीच का अंतर है।

सरकार कानून बनाकर बता सकती है कि उसने क्या किया। मगर नागरिक जानना चाहता है कि उस कानून से उसके जीवन में क्या बदला। सजा बढ़ाना सरकार का फैसला है। समय पर न्याय दिलाना सरकार की जिम्मेदारी। दोनों को एक समझ लेना ही लोकतांत्रिक जवाबदेही की सबसे बड़ी भूलों में एक है। इस पूरे मामले में समय और सार्वजनिक ध्यान की अपनी राजनीति है।

इस्तीफा एक घटना है। नया कानून एक घटना है। सजा बढ़ाना एक घटना है। ये सब तत्काल दिखाई देते हैं। इनकी तारीख होती है, घोषणा होती है और खबर बनती है।

मगर कानून का लागू होना एक प्रक्रिया है। वह अलग-अलग दफ्तरों, अदालतों, जांच एजेंसियों और अधिकारियों के बीच महीनों तक चलती है।

घटना का श्रेय किसी एक मंत्री या सरकार को मिल सकता है। प्रक्रिया की जिम्मेदारी अनेक अधिकारियों में बंट जाती है। मीडिया के लिए भी घटना आसान है। मंत्री ने इस्तीफा दिया, खबर बन गई। सरकार ने मांग स्वीकार की, खबर बन गई। अदालत ने आदेश दिया, खबर बन गई।

उसके बाद मीडिया दूसरे मुद्दे की ओर बढ़ जाता है। पाठक और दर्शक भी मान लेते हैं कि मामला समाप्त हो गया। जबकि नागरिक के लिए असली काम तब शुरू होता है।

मुआवजे का आदेश हुआ, मगर पैसा कब मिला? मुकदमा दर्ज हुआ, मगर जांच कब पूरी हुई? परीक्षा सुधार की घोषणा हुई, मगर अगली परीक्षा में क्या बदला? मतदाता सूची में सुधार का आश्वासन मिला, मगर मतदान से पहले कितने नाम वापस जुड़े?

इन प्रश्नों पर लगातार निगरानी रखने वाला कौन है? हर नई विफलता को एक नया घोटाला या नया विवाद मान लिया जाता है। उसे पहले किए गए वादे की अधूरी जिम्मेदारी से नहीं जोड़ा जाता। इस तरह सरकार बार-बार जवाब देने का दावा कर सकती है, जबकि उसके पुराने जवाबों का परिणाम सामने नहीं आया होता।

जॉर्ज ऑरवेल ने अपने प्रसिद्ध निबंध ‘पॉलिटिक्स एंड द इंग्लिश लैंग्वेज’ में राजनीतिक भाषा की इसी प्रवृत्ति की आलोचना की थी। उनके अनुसार राजनीतिक भाषा का इस्तेमाल अक्सर ऐसी चीजों को ठोस और वास्तविक दिखाने के लिए होता है जिनमें वास्तविकता बहुत कम होती है।

ऑरवेल की यह कसौटी आज भी उपयोगी है।

सरकारी घोषणाएं हमेशा झूठी नहीं होतीं। मंत्री और अधिकारी अपने आश्वासनों के प्रति ईमानदार भी हो सकते हैं। मगर ईमानदार आश्वासन भी तब तक नागरिक के लिए उपयोगी नहीं है जब तक उसे जांचा और लागू न कराया जा सके। सीजेपी की मुआवजे की मांग स्वीकार करते समय संबंधित मंत्री ने परिवारों को लागू नियमों के अंतर्गत अधिकतम संभव सहायता देने का वादा किया था। शब्दों पर गौर कीजिए।

अधिकतम। संभव। लागू नियमों के अंतर्गत।

हर शब्द उचित लग सकता है। मगर इन्हें जोड़ने पर भी यह पता नहीं चलता कि किस परिवार को कितनी रकम मिलेगी, किस तारीख तक मिलेगी और किस अधिकारी की जिम्मेदारी होगी। इसी तरह सरकारी भाषा में कुछ शब्द बार-बार आते हैं। प्रक्रिया शुरू हो गई है। योजना लागू है। मामला विचाराधीन है। सिफारिशें स्वीकार कर ली गई हैं। कार्यान्वयन जारी है।

इनका वास्तविक अर्थ क्या है?

नागरिक किस दफ्तर में जाकर जांच कर सकता है कि काम हुआ या नहीं? किस रजिस्टर में जिम्मेदार अधिकारी का नाम दर्ज है? किस समयसीमा को पार करने पर कार्रवाई होगी?

अदालत बना देना पर्याप्त नहीं है। उसमें न्यायाधीश भी होना चाहिए। सुनवाई होनी चाहिए। फैसला होना चाहिए।

कानून में समयसीमा लिख देना पर्याप्त नहीं है। उसे तोड़ने पर परिणाम भी होना चाहिए।

और अधिकार घोषित कर देना पर्याप्त नहीं है। नागरिक को उसका इस्तेमाल करने का व्यावहारिक रास्ता भी मिलना चाहिए।

इसी बिंदु पर फिर जंतर मंतर और कॉकरोच जनता पार्टी की कहानी सामने आती है।

इस पार्टी की शुरुआत एक मजाक से हुई थी। 15 मई को भारत के मुख्य न्यायाधीश ने बेरोजगार युवाओं की तुलना कॉकरोच से की थी। बाद में उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणी फर्जी डिग्रियों वाले लोगों के संदर्भ में थी।

मगर टिप्पणी ने बेरोजगार युवाओं के बीच तीखी प्रतिक्रिया पैदा की। अगले दिन पूर्व राजनीतिक रणनीतिकार अभिजीत दीपके ने इसी अपमानजनक शब्द को अपनाकर कॉकरोच जनता पार्टी बना दी।

कुछ ही दिनों में संगठन ने लाखों लोगों के जुड़ने का दावा किया। जिस शब्द से अपमान का बोध हुआ था, वही विरोध की पहचान बन गया। ऑरवेल ने अपने एक अन्य निबंध ‘फनी, बट नॉट वल्गर’ में लिखा था कि हर मजाक एक छोटी क्रांति होता है।

इस अर्थ में कॉकरोच जनता पार्टी की शुरुआत दिलचस्प थी। सत्ता और प्रतिष्ठान की भाषा में जो शब्द तिरस्कार का प्रतीक था, युवाओं ने उसी को अपने संगठन का नाम बना लिया।

यह सत्ता के प्रति सम्मान दिखाने की अनिवार्यता को अस्वीकार करने का तरीका था।

ऐसा व्यंग्य लोगों को तेजी से जोड़ सकता है। वह अपमान को सामूहिक प्रतिरोध में बदल सकता है। मगर मजाक और आंदोलन की सीमाएं अलग हैं।

मजाक माचिस की तीली है। वह एक क्षण में अंधेरा दूर कर सकती है। मगर तीली बुझ जाने के बाद रोशनी बनाए रखने के लिए स्थायी व्यवस्था चाहिए।

सीजेपी के सामने भी यही चुनौती है। संगठन ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी बनाई है। अगस्त से उसकी राष्ट्रीय टीम भी काम कर रही है। अभिजीत दीपके राष्ट्रीय संयोजक हैं।अब तक संगठन की कार्यशैली में कुछ महत्वपूर्ण बातें दिखाई देती हैं।

वह सरकार के वादों की निगरानी करता है। समयसीमा तय करता है। जरूरत पड़ने पर फिर आंदोलन की चेतावनी देता है। सर्वोच्च न्यायालय में मामले उठाता है। 12 अगस्त को संगठन की संरचना और आगे की कार्ययोजना पर विचार करने के लिए स्वयंसेवकों की बैठक बुलाई गई थी। मगर दो स्थानों से बैठक हटानी पड़ी। दीपके ने आरोप लगाया कि इसके पीछे सत्तारूढ़ पार्टी का दबाव था।

यह घटनाक्रम बताता है कि सड़क पर भीड़ जुटा लेना और उस भीड़ को स्थायी संगठन में बदलना अलग-अलग काम हैं। किसी आंदोलन के सामने सफलता के बाद कई रास्ते होते हैं।

वह राजनीतिक पार्टी बनकर चुनाव लड़ सकता है, जैसा नेपाल में आंदोलन की ऊर्जा चुनावी राजनीति में पहुंची।

वह सूचना अधिकार आंदोलन की तरह स्थायी नागरिक अभियान बना सकता है। वह अदालतों, जनसुनवाई और सरकारी फैसलों की लगातार निगरानी करने वाला संगठन बन सकता है। या फिर कुछ दिनों की सुर्खियों और भीड़ के बाद समाप्त हो सकता है।

आखिरी रास्ता सत्ता के लिए सबसे सुविधाजनक है।

समय बीतने के साथ आंदोलनकारी अपने जीवन में लौट जाते हैं। छात्र पढ़ाई में लग जाते हैं। मजदूर काम पर लौट जाते हैं। परिवार अपनी जिम्मेदारियों में व्यस्त हो जाते हैं।

सरकार वहीं रहती है। दफ्तर वहीं रहते हैं। फाइलें चलती रहती हैं। और आंदोलन का दबाव धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है।

सीजेपी ने अब तक दबाव, निगरानी और न्यायालय का रास्ता चुना है। मगर वह अभी ऐसी स्थायी प्रक्रिया नहीं बना सकी है जिसका उपयोग उससे असंबद्ध कोई भी नागरिक अपने अधिकार के लिए कर सके। सूचना अधिकार आंदोलन की सबसे बड़ी सीख यही है।

केवल समर्थक जुटाना पर्याप्त नहीं है। सबूत संभालने होंगे। मांगों को स्पष्ट करना होगा। कानून के प्रस्तावित प्रावधानों की जांच करनी होगी। सरकारी निर्णयों का लगातार पीछा करना होगा।

और एक प्रश्न का उत्तर भी देना होगा। आंदोलन की ओर से फैसला कौन करेगा? 25 जुलाई को सीजेपी का समझौता उसके संस्थापक और दो प्रवक्ताओं ने किया था। संगठन से लाखों लोगों के जुड़ने का दावा था। मगर उन लाखों लोगों ने अपने प्रतिनिधियों को औपचारिक रूप से नहीं चुना था।

समझौता हुआ और उसी दोपहर आंदोलन समाप्त कर दिया गया। यह अपने आप में कोई आरोप नहीं है। हर आंदोलन में किसी को बातचीत करनी होती है। किसी को सरकार का प्रस्ताव स्वीकार या अस्वीकार करना होता है। किसी को समझौते पर सहमति देनी होती है।

मगर प्रश्न यह है कि उसे यह अधिकार किसने दिया और उसकी सीमा क्या है?

अगली बार जब सरकार कोई समझौता पेश करेगी तो संगठन की ओर से कौन निर्णय करेगा? किन मांगों पर समझौता किया जा सकता है? किन मांगों पर नहीं? और यदि आंदोलनकारी अपने प्रतिनिधियों के फैसले से असहमत हों तो क्या व्यवस्था होगी?

सोशल मीडिया पर लाखों फॉलोअर होना लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का प्रमाण नहीं है।

सड़क पर हजारों लोगों का मौजूद होना भी अपने आप में संगठन के नेतृत्व को हर निर्णय का अधिकार नहीं देता।

किसी भीड़ को राजनीतिक समुदाय बनने के लिए असहमति व्यक्त करने का अधिकार और उसका व्यावहारिक तरीका चाहिए।

यही संगठन और भीड़ का अंतर है। इसका एक दूसरा पहलू भी है। आंदोलन में लंबे समय तक कौन रह सकता है? अखिल भारतीय छात्र संघ की अध्यक्ष नेहा बोरा ने जंतर मंतर पर 23 दिन का अनशन किया।

मगर हर छात्र ऐसा नहीं कर सकता।

किसी को परीक्षा देनी है। किसी को नौकरी तलाशनी है। किसी को परिवार चलाना है। किसी की रोज की कमाई बंद हो जाएगी। किसी के घर में उसकी देखभाल पर निर्भर लोग हैं।

इसलिए आंदोलन में लंबे समय तक उपस्थित रहने की क्षमता भी सबकी बराबर नहीं होती।

जो लगातार धरने पर रह सकते हैं, संगठन के निर्णयों में उनका प्रभाव बढ़ सकता है। मगर जो घर लौटने के लिए मजबूर हैं, उनकी जरूरतें और राय भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।

लोकतांत्रिक आंदोलन को यह असमानता समझनी होगी।

आंदोलन की असली परीक्षा उसके समझौते से लाभ पाने वाले नागरिक के जीवन में होती है।

मान लीजिए किसी छात्र की परीक्षा रद्द हुई है। उसे यह जानने से क्या राहत मिलेगी कि प्रश्नपत्र लीक करने वालों के खिलाफ मुकदमा चल रहा है और पांच वर्ष बाद उन्हें सजा हो सकती है?

उसकी जरूरत तत्काल है। उसे अगली परीक्षा की तारीख चाहिए। दोबारा परीक्षा देने की फीस और खर्च के बारे में स्पष्ट निर्णय चाहिए। विवादित परिणाम के खिलाफ अपील का अधिकार चाहिए। और ऐसा प्रशासनिक तंत्र चाहिए जो उसके आवेदन पर समय रहते फैसला कर सके।

परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था को ये व्यवस्थाएं सार्वजनिक करनी चाहिए।

मंत्रालय को इनके लिए धन उपलब्ध कराना चाहिए।

परीक्षा रद्द होने की पूरी कीमत छात्र और उसके परिवार पर नहीं डाली जा सकती। इसी तरह प्रश्नपत्र लीक रोकने के लिए केवल महंगी तकनीक खरीद लेना पर्याप्त नहीं है। पहले यह पता चलना चाहिए कि प्रश्नपत्र तक अनधिकृत पहुंच कहां से मिली। निगरानी कहां विफल हुई। किस अधिकारी या ठेकेदार की जिम्मेदारी थी।

प्रश्नपत्रों के हस्तांतरण का रिकॉर्ड होना चाहिए। संवेदनशील सामग्री तक किसकी पहुंच थी, इसका हिसाब होना चाहिए। अनुबंधों में जिम्मेदारी स्पष्ट होनी चाहिए। और जांच करने वाली संस्था को संबंधित सबूतों तक पहुंच मिलनी चाहिए।

यह तकनीक से अधिक प्रशासनिक जवाबदेही का प्रश्न है। संसाधन कहां खर्च किए जाएं, किसे अधिकार मिले और गलती होने पर किसे जवाब देना पड़े, यही असली फैसले हैं।

अब मतदाता का उदाहरण लीजिए। जिस नागरिक का नाम मतदाता सूची से कट गया है, उसके लिए समयसीमा मतदान का दिन है। यदि चुनाव हो जाने के बाद उसका नाम वापस जुड़ता है तो वह अधिकार किस काम का?

उसे यह जानने का अधिकार चाहिए कि नाम क्यों काटा गया। किस आधार पर काटा गया। किस अधिकारी ने निर्णय लिया। उसे व्यक्तिगत रूप से सहायता मिलनी चाहिए। आपत्ति दर्ज कराने की सुलभ व्यवस्था होनी चाहिए। और विवादित मामलों के निपटारे के लिए पर्याप्त कर्मचारी होने चाहिए।

सबसे महत्वपूर्ण यह कि फैसला मतदान से पहले हो। मौजूदा अपील व्यवस्था को इसी कसौटी पर परखना चाहिए। क्या वह चुनाव से पहले गलती सुधार सकती है?

यदि नहीं, तो किसी अतिरिक्त समीक्षा व्यवस्था के लिए कानूनी अधिकार, पर्याप्त धन और फैसलों को लागू कराने की क्षमता सुनिश्चित करनी होगी। क्योंकि मतदान के बाद मिला अनुकूल फैसला नागरिक को उसका खोया हुआ वोट वापस नहीं दिला सकता।

यहां फिर तोकविल की बात याद आती है। उनके अनुसार स्वतंत्र समाज की रक्षा केवल संविधान के शब्द नहीं करते। नागरिकों की आदतें करती हैं। बैठक का विवरण रखना। सरकारी रिकॉर्ड पढ़ना। फैसलों का हिसाब मांगना। एक ही दफ्तर में दूसरी और तीसरी बार जाना। अपने अधिकार के लिए दूसरों के साथ संगठित रहना।

ये काम आकर्षक नहीं हैं। इनमें आंदोलन की उत्तेजना नहीं है। नारे नहीं हैं। मंच नहीं हैं। तत्काल प्रसिद्धि नहीं है। मगर लोकतंत्र की वास्तविक जवाबदेही इन्हीं कामों से बनती है।

भारत जैसे विशाल युवा आबादी वाले लोकतंत्र में खतरा केवल दमन का नहीं है।

एक दूसरा, कहीं अधिक सूक्ष्म खतरा भी है। युवाओं की आवाज बहुत जोर से सुनी जाए, मगर उनके सवालों का जवाब बहुत धीरे दिया जाए। वे यह मान बैठें कि सरकार ने उनकी बात सुन ली, इसलिए उनकी मांग पूरी हो गई।

जबकि सुन लेना और समाधान करना एक ही बात नहीं है। सड़क पर आंदोलन खतरे की घंटी बजा सकता है। मगर जवाबदेही की स्थायी व्यवस्था सड़क पर लगातार भीड़ जुटाकर नहीं चलाई जा सकती। उसके लिए संस्थाओं के भीतर ऐसे नियम और प्रक्रियाएं चाहिए जो बिना आंदोलन के भी काम करें।

राजस्थान की जनसुनवाइयों में मजदूर सरकारी कागज पर दर्ज मजदूरी का हिसाब अपने वास्तविक काम से मिलाते थे। कागज कहता था कि भुगतान हो गया। मजदूर कहता था कि पैसा नहीं मिला।

इस टकराव से एक सिद्धांत निकला था। सरकारी रिकॉर्ड नागरिक की पहुंच में होना चाहिए ताकि वह सरकार के दावे को चुनौती दे सके। आज वही सिद्धांत परीक्षा और मतदाता सूची के मामलों में लागू होना चाहिए।

छात्र परीक्षा का फैसला चुनौती दे सके। उसे कारण बताया जाए। अपील का रास्ता मिले। और फैसला उस समय आए जब उसका भविष्य बचाया जा सकता हो। मतदाता अपना नाम कटने का कारण जान सके। आपत्ति दर्ज करा सके। और चुनाव से पहले गलती सुधरवा सके।

लोकतंत्र की असली परीक्षा यही है।

नागरिक को केवल अधिकार दिया गया है या उस अधिकार को समय रहते इस्तेमाल करने की शक्ति भी दी गई है? क्योंकि अधिकार का अर्थ केवल सरकार की स्वीकृति नहीं है। अधिकार का अर्थ है कि नागरिक सरकार को अपनी जिम्मेदारी पूरी करने के लिए बाध्य कर सके।

और वह भी तब, जब उस जिम्मेदारी का निर्वाह उसके लिए उपयोगी हो। राजस्थान के मजदूरों ने यही रास्ता खोला था। आज के छात्रों और मतदाताओं के सामने भी मूल प्रश्न वही है। क्या वे सरकारी फैसले का कारण जान सकते हैं? क्या वे उस फैसले को चुनौती दे सकते हैं? क्या वे सरकार को उसकी कानूनी जिम्मेदारी याद दिलाकर समय पर राहत हासिल कर सकते हैं?

यदि इसका उत्तर सुनिश्चित नहीं है तो आंदोलन समाप्त हो जाने से कुछ साबित नहीं होता।

जंतर मंतर खाली हो सकता है। प्रदर्शनकारी घर लौट सकते हैं। सरकार घोषणा कर सकती है कि मांगें मान ली गई हैं।

मगर जिस नागरिक की परीक्षा रद्द हुई, जिसकी मजदूरी रुकी है या जिसका वोट कट गया है, उसके लिए आंदोलन की सफलता का फैसला अभी बाकी है। सड़क खाली हो जाने का अर्थ यह नहीं कि काम पूरा हो गया। (समाप्त)

नेहा बोरा को सीजेपी से अलग किया गया

राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी की उनकी टीम कामयाब हो गई। सीपीआई माले के छात्र संगठन आइसा की अध्यक्ष नेहा बोरा को आखिरकार कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी से अलग कर दिया गया। बताया जा रहा है कि इसके लिए सीपीआई एमएल के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य से बात हुई। गौरतलब है कि पिछले कुछ समय से दीपांकर भट्टाचार्य से राहुल गांधी की अच्छी बन रही है। सीताराम येचुरी के बाद दीपांकर ही सामाजिक मुद्दों पर राहुल को सलाह दे रहे हैं। सो, उन्होंने अपनी पार्टी की नेता नेहा बोरा को समझाया और खुद भी यह फैसला किया कि मुख्यधारा के विपक्ष के साथ ही रहना चाहिए। तभी सुप्रीम कोर्ट मार्च के दौरान नेहा बोरा उस ट्रक पर सवार हुईं, जिस पर राहुल के साथ विपक्ष के तमाम नेता थे। वे अगले दिन राहुल के घर पर चाय पार्टी में भी शामिल हुईं और वहां बड़े नेताओं के साथ मीडिया को भी संबोधित किया। दीपांकर भट्टाचार्य ने इस मौके पर अपने को पीछे रखा।

गौरतलब है कि इससे पहले जंतर मंतर पर हर प्रोटेस्ट में नेहा बोरा का चेहरा होता था। पेपर लीक के मसले पर भी सोनम वांगचुक के साथ नेहा बोरा ने 20 दिन तक भूख ह़ड़ताल की थी। वे बहुत अच्छा भाषण करती हैं और राजनीति का अंदाज भी बहुत आक्रामक है। उनके साथ आइसा और लेफ्ट इकोसिस्टम के बहुत सारे युवा प्रोटेस्ट में शामिल होते थे, जिससे सीजेपी के प्रदर्शन को ज्यादा तवज्जो मिलती थी। अब राहुल गांधी उनको अपने खेमे में लाने में कामयाब हो गए हैं। राहुल गांधी ने 12 अक्टूबर को ‘चलो दिल्ली मार्च’ आह्वान किया था और विपक्षी नेताओं के साथ वे सुप्रीम कोर्ट तक गए थे। उस प्रदर्शन में नेहा बोरा उनके साथ थीं। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा दोनों के साथ नेहा का बहुत अच्छा तालमेल दिखा। एक तस्वीर तो ऐसी वायरल हुई है, जिसमें राहुल गांधी अपनी बहन प्रियंका और नेहा के कंधे पर हाथ रख कर चल रहे हैं। महात्मा गांधी की एक ऐतिहासिक तस्वीर से इसकी तुलना की जा रही है।

सत्ता बदलती है, पर व्यवस्था वही रहती है!

कॉकरोच जनता पार्टी के पिछले आंदोलन को देखे। 25 जुलाई को समझौता हुआ। 1 सितंबर को एफआईआर रद्द करने का न्यायिक आदेश आया। बीच में 38 दिन लगे। लिखित गारंटी का इंतजार हुआ। फिर आंदोलन की चेतावनी देनी पड़ी। सर्वोच्च न्यायालय में बार-बार मामला उठा। तब जाकर सरकारी आश्वासन एक लागू होने वाले आदेश में बदला। मगर मुआवजा नीति?वह अभी भी वादा है। … आंदोलन चलाना एक काम है। आंदोलन की जीत को लागू करवाना उससे भी लंबा काम।

श्रीलंका में 2022 का आर्थिक संकट केवल महंगाई या विदेशी मुद्रा की कमी का संकट नहीं था। वह उस शासन व्यवस्था के प्रति जनता के भरोसे के टूटने का क्षण था। महंगाई लगभग सत्तर प्रतिशत तक पहुंच गई थी। श्रीलंकाई मुद्रा का मूल्य करीब आधा रह गया था। आम आदमी के लिए ईंधन, भोजन और रोजमर्रा की जरूरतें जुटाना कठिन हो गया था।

इसी संकट से अरगलया आंदोलन पैदा हुआ। सिंहली भाषा में अरगलया का अर्थ है संघर्ष। मगर आंदोलन केवल राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे को हटाने के लिए नहीं था। उसका नारा था, व्यवस्था बदलो। पुराने चेहरों और पुरानी राजनीति से मुक्ति पाओ। सड़क पर जनता उतरी। राष्ट्रपति भवन तक पहुंची। गोटबाया राजपक्षे देश छोड़कर भागे और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।

आंदोलन जीत गया। मगर उसके बाद क्या हुआ?

राष्ट्रपति को चुनने का अधिकार उसी पुरानी संसद के पास था जिसके राजनीतिक ढांचे के खिलाफ जनता उठी थी। संसद ने रानिल विक्रमसिंघे को राष्ट्रपति चुन लिया। वे श्रीलंका की उसी पुरानी राजनीति के अनुभवी नेता थे जिसे आंदोलनकारियों ने अस्वीकार किया था। जनता ने राष्ट्रपति को हटाया था। मगर नए राष्ट्रपति का चुनाव पुरानी व्यवस्था ने किया।

यही जनक्रांति का पहला विरोधाभास है। सड़क सत्ता को खाली करा सकती है। मगर खाली हुई सत्ता पर अधिकार किसका होगा, यह उस समय मौजूद संगठित राजनीतिक शक्तियां तय करती हैं।

श्रीलंका में आंदोलन की व्यवस्था परिवर्तन की मांग को चुनावी रास्ता मिलने में दो वर्ष लग गए। सितंबर 2024 में अनुरा कुमारा दिसानायके राष्ट्रपति बने। वे नेशनल पीपुल्स पावर के नेता थे। 2019 के राष्ट्रपति चुनाव में उन्हें केवल तीन प्रतिशत वोट मिले थे। पांच वर्ष बाद वे लगभग 42 प्रतिशत वोट लेकर राष्ट्रपति बने। उसके बाद उनकी पार्टी को संसद में दो-तिहाई से भी अधिक बहुमत मिला।

तब जाकर आंदोलन की व्यवस्था परिवर्तन की मांग को एक राजनीतिक माध्यम मिला।

मगर यहां भी विरोधाभास समाप्त नहीं हुआ। जिस आर्थिक व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की शर्तों के खिलाफ जनता में असंतोष था, नई सरकार ने उसी आईएमएफ कार्यक्रम को जारी रखा।

तो आंदोलन ने क्या बदला?

उसने पहले दौर में राष्ट्रपति को हटाया। दूसरे दौर में, दो वर्ष बाद, मतदाताओं ने सत्ता के नए दावेदार को चुना। मगर आर्थिक और प्रशासनिक नीतियों की निरंतरता बनी रही। इसका अर्थ यह नहीं कि आंदोलन व्यर्थ था। बल्कि यह कि सत्ता परिवर्तन और व्यवस्था परिवर्तन की गति अलग-अलग होती है।

जनता एक दिन में राष्ट्रपति को हटा सकती है। मगर राज्य की आर्थिक निर्भरताओं, प्रशासनिक संस्थाओं और शासन की आदतों को एक दिन में नहीं बदल सकती।

अब बांग्लादेश को देखिए।

अगस्त 2024 में छात्रों के नेतृत्व वाले जनविद्रोह ने शेख हसीना की सत्ता समाप्त कर दी। वर्षों से जमा असंतोष, राजनीतिक दमन और चुनावी विश्वसनीयता के संकट के बीच छात्रों का आंदोलन देशव्यापी विद्रोह बन गया।

हसीना चली गईं। मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी। फिर संवैधानिक सुधारों का एक दस्तावेज तैयार हुआ जिसे जुलाई चार्टर कहा गया। इसमें प्रधानमंत्री के कार्यकाल की सीमा, दो सदनों वाली संसद और आनुपातिक प्रतिनिधित्व जैसे महत्वपूर्ण सुधार शामिल थे।

यानी बांग्लादेश में आंदोलन केवल प्रधानमंत्री को हटाकर नहीं रुका। उसने नई राजनीतिक व्यवस्था का खाका भी तैयार किया। फरवरी 2026 में चुनाव हुए। कार्नेगी के विश्लेषक अविनाश पालीवाल ने इन्हें लगभग दो दशकों में बांग्लादेश का पहला विश्वसनीय चुनाव बताया।

परिणाम में तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी, यानी बीएनपी, ने संसद की 300 में से 209 सीटें जीतीं। जमात-ए-इस्लामी को 68 सीटें मिलीं। जबकि छात्र आंदोलन से निकली नेशनल सिटिजन पार्टी को केवल छह सीटें मिलीं।

जरा इस परिणाम का अर्थ समझिए।

जिन छात्रों ने आंदोलन खड़ा किया, जिनके संघर्ष से पुरानी सत्ता गिरी, जिनकी नैतिक शक्ति पर राजनीतिक परिवर्तन संभव हुआ, चुनाव में उन्हें केवल छह सीटें मिलीं। आंदोलन की नैतिक विजय और चुनावी राजनीति की शक्ति एक जैसी नहीं होती। जनता किसी आंदोलन का समर्थन कर सकती है, मगर चुनाव में किसी दूसरी पार्टी को सत्ता सौंप सकती है।

बांग्लादेश में यही हुआ।

फिर भी छात्रों के आंदोलन की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। चुनाव के दिन ही मतदाताओं ने जुलाई चार्टर को भी लगभग दो-तिहाई समर्थन से मंजूरी दी। इसका अर्थ था कि मतदाता नई सरकार चाहते थे, मगर संवैधानिक सुधार भी चाहते थे।

अब असली परीक्षा शुरू हुई।

अविनाश पालीवाल के अनुसार बीएनपी ने चुनाव से पहले ही जुलाई चार्टर के कुछ प्रावधानों पर आपत्ति जताई थी। विशेषकर ऊपरी सदन की संरचना और कार्यवाहक सरकार के प्रमुख के चयन की प्रक्रिया पर। सत्ता में आने के बाद उसने सर्वोच्च न्यायालय के लिए अलग सचिवालय बनाने का प्रस्ताव भी ठंडे बस्ते में डाल दिया, जबकि पहले उसका समर्थन किया था।

यानी जनता ने जिस सुधार दस्तावेज को मंजूरी दी, उसे लागू करने वाली सरकार के अपने राजनीतिक हित थे। वह कुछ प्रावधानों को बदलना या कमजोर करना चाहती थी।

बांग्लादेश आज उसी मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है जहां भारत का सूचना अधिकार आंदोलन 2004 में पहुंचा था। मसौदा तैयार है। जनसमर्थन मौजूद है। राजनीतिक स्वीकृति भी मिल चुकी है। मगर कानून को अंतिम रूप देने और लागू करने का अधिकार उन लोगों के पास है जिनके लिए उसके कुछ प्रावधान असुविधाजनक हो सकते हैं।

आंदोलन के सामने अब प्रश्न है कि वह इस प्रक्रिया पर कितना दबाव बनाए रख सकता है। क्योंकि संविधान में सुधार लिख देना और सत्ता को उन सुधारों के अनुसार चलने के लिए बाध्य करना दो अलग काम हैं।

बांग्लादेश के छात्रों ने प्रधानमंत्री को हटा दिया। मगर वे उस पुरानी राजनीति को समाप्त नहीं कर सके जिसने चुनाव जीतकर फिर सत्ता संभाल ली। सड़क पर जनविद्रोह का नेतृत्व करने वाले चुनाव में सत्ता के स्वाभाविक उत्तराधिकारी नहीं बन जाते।

तीसरा उदाहरण नेपाल का है।

सितंबर 2025 में नेपाल सरकार ने 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगाया। इसके विरोध में शुरू हुआ आंदोलन तेजी से व्यापक राजनीतिक विद्रोह में बदल गया। रॉयटर्स के अनुसार दो दिनों की हिंसा में 76 लोग मारे गए। पहले ही दिन पुलिस की गोलीबारी में कम से कम 19 प्रदर्शनकारियों की मौत हुई। 9 सितंबर को प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली ने इस्तीफा दे दिया।

सरकार गिर गई।

पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी। संसद भंग हुई और 5 मार्च 2026 को चुनाव हुए। इन चुनावों में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को अधिकांश सीटें मिलीं। 27 मार्च को बालेंद्र शाह प्रधानमंत्री बने। नेपाल ने तीनों पड़ोसी देशों में सबसे तेजी से सड़क के आंदोलन को राष्ट्रीय चुनाव में बदला।

श्रीलंका में लगभग 26 महीने लगे। बांग्लादेश में करीब अठारह महीने। नेपाल में लगभग छह महीने। मगर जवाबदेही की गति यहां भी धीमी रही। 28 मार्च को पुलिस ने पूर्व प्रधानमंत्री ओली और उनके गृह मंत्री रमेश लेखक को गिरफ्तार किया। यह कार्रवाई उस जांच आयोग की सिफारिश पर हुई जिसने पहले दिन प्रदर्शनकारियों पर हुई गोलीबारी रोकने में विफल रहने के लिए ओली को जिम्मेदार माना था।

8 सितंबर को अल जजीरा की रिपोर्ट के अनुसार दोनों के खिलाफ जांच जारी थी और औपचारिक आरोप तय नहीं हुए थे। हालांकि दूसरी रिपोर्टों में आपराधिक लापरवाही के आरोपों का उल्लेख था। यानी सरकार गिर गई। चुनाव हो गए। नया प्रधानमंत्री आ गया। मगर जिन परिवारों ने अपने बच्चों को खोया, उनके लिए न्याय की प्रक्रिया अभी चल रही थी।

सत्ता परिवर्तन की घड़ी तेज चलती है। न्याय की घड़ी धीमी। श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल के इन तीन अनुभवों में कुछ समानताएं हैं। मगर इनके कारण और परिस्थितियां एक जैसी नहीं थीं।

पहली समानता यह कि सत्ता का खाली स्थान अधिक देर खाली नहीं रहता। उसे वही राजनीतिक शक्ति भरती है जो पहले से संगठित है या जल्दी संगठन खड़ा कर सकती है।

श्रीलंका में पुरानी राजनीतिक परंपरा वाली पार्टी ने आंदोलन की मांग को चुनावी रास्ता दिया। बांग्लादेश में स्थापित बीएनपी ने सत्ता हासिल की। नेपाल में अपेक्षाकृत नई पार्टी चुनाव जीतकर सरकार में आई। तीनों में सड़क का आंदोलन स्वयं सरकार नहीं बना।

आंदोलन की स्थायी शक्ति इस बात में थी कि वह सत्ता में आने वालों को चुनने और उनसे जवाब मांगने की नागरिक क्षमता पैदा कर सके। दूसरी समानता यह कि किसी दस्तावेज को जनता की मंजूरी मिल जाना उसके लागू होने की गारंटी नहीं है।

बांग्लादेश में मतदाताओं ने संवैधानिक सुधारों का समर्थन किया। मगर उसके बाद संघर्ष कानून के प्रावधानों, उनके कमजोर किए जाने और लागू होने की प्रक्रिया में पहुंच गया।

भारत में सूचना अधिकार आंदोलन को भी यही लड़ाई लड़नी पड़ी थी। तीसरी समानता यह कि समझौता, न्याय और जवाबदेही की घड़ियां अलग-अलग चलती हैं।

सोशल मीडिया के सहारे लाखों लोग कुछ घंटों में जुट सकते हैं। सरकार को कुछ दिनों में गिराया जा सकता है। मगर समझौते के लिए ऐसे प्रतिनिधि चाहिए जो आंदोलन की ओर से निर्णय ले सकें। और न्याय के लिए संस्थाएं चाहिए जो अपने निर्णयों को लागू भी कर सकें।

इस पूरी प्रक्रिया में सबसे लंबा इंतजार अक्सर उन परिवारों को करना पड़ता है जिन्होंने आंदोलन में अपने लोगों को खोया होता है। मगर क्या इन तीनों देशों में सरकारें इसलिए गिरीं क्योंकि उनके राज्य कमजोर थे? और क्या भारत में ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि भारतीय राज्य मजबूत है?

यह तुलना इतनी सरल नहीं है। इन घटनाओं को समझने के लिए चार बातों पर गौर करना होगा।

पहली है आर्थिक स्थिति। श्रीलंका में आर्थिक संकट असाधारण था। देश भुगतान संकट से जूझ रहा था। बांग्लादेश में भी विदेशी मुद्रा भंडार लगभग तीन महीने के आयात के बराबर रह गया था।

दूसरी है सुरक्षा बलों की भूमिका। बांग्लादेश में सेना ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने से इनकार किया। नेपाल में पुलिस की गोलीबारी में पहले ही दिन कम से कम 19 लोग मारे गए।

तीसरी है सरकार की वैधता पर जनता का भरोसा। बांग्लादेश में जनवरी 2024 के विवादास्पद चुनाव के बाद शासन की विश्वसनीयता गंभीर रूप से प्रभावित हुई थी। नेपाल में घातक विरोध प्रदर्शनों के एक दिन के भीतर सरकार गिर गई।

चौथी और सबसे महत्वपूर्ण बात है प्रशासनिक मशीनरी की निरंतरता। यही वह पहलू है जिस पर तोकविल सबसे अधिक ध्यान देते। सरकारें गिर गईं। मगर उनके साथ प्रशासन समाप्त नहीं हुआ। बांग्लादेश के बारे में पालीवाल का निष्कर्ष है कि जिस क्रांति ने नई व्यवस्था स्थापित की, उसके बाद भी पुरानी व्यवस्था का बड़ा हिस्सा बना रहा। यही राज्य की वास्तविक शक्ति है। राजनीतिक सत्ता बदल सकती है। मगर नौकरशाही, संस्थागत हित, प्रशासनिक नियम और शासन की परंपराएं बनी रह सकती हैं।

भारत की स्थिति इन देशों से अलग है। मगर अंतर केवल इतना नहीं कि वहां कमजोर राज्य हैं और यहां मजबूत राज्य।

भारत में श्रीलंका जैसा दिवालियापन नहीं है। सुरक्षा बलों की निष्ठा डगमगाने का कोई संकेत नहीं है। न्यायालय, मंत्रालय और संघीय व्यवस्था काम कर रहे हैं। 10 अक्टूबर के आंदोलन की मांग भी इन देशों के आंदोलनों से छोटी है। यहां सरकार गिराने की मांग नहीं है। मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग है।

ऐसी परिस्थिति में सरकार के लिए किसी व्यक्ति का इस्तीफा स्वीकार करना, पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया बदलने की अपेक्षा कहीं आसान हो सकता है। यहीं भारत के लिए तोकविल की चेतावनी महत्वपूर्ण हो जाती है।

यहां खतरा सरकार के गिर जाने का नहीं, बल्कि आंदोलन को व्यवस्था के भीतर समाहित कर लेने का है। सरकार किसी मांग को स्वीकार कर सकती है। समिति बना सकती है। इस्तीफा ले सकती है। नया कानून घोषित कर सकती है। आंदोलन समाप्त हो सकता है। मगर जिस प्रक्रिया के खिलाफ आंदोलन हुआ था, वह जस की तस बनी रह सकती है।

श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल बताते हैं कि सरकार गिर जाने के बाद क्या होता है।

भारत के अपने आंदोलन बताते हैं कि सरकार के बने रहने और आंदोलन की मांग स्वीकार कर लेने के बाद क्या होता है। और इसका सबसे ताजा उदाहरण स्वयं कॉकरोच जनता पार्टी का पिछला आंदोलन है। 25 जुलाई को जंतर मंतर पर पांच सप्ताह से अधिक चले आंदोलन के बाद शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दिया।

सीजेपी ने आंदोलन समाप्त करने की घोषणा की। संगठन ने कहा कि सरकार ने उसकी सभी मांगें स्वीकार कर ली हैं। इनमें प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर वापस लेना, कुछ दिनों के भीतर इसकी लिखित गारंटी देना, नीट-यूजी प्रश्नपत्र लीक के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को मुआवजा देना और परीक्षा सुधार के पांच सूत्री मांगपत्र पर विचार करना शामिल था।

सीजेपी ने कहा कि वह सद्भावना के आधार पर आंदोलन वापस ले रही है। उसे भरोसा है कि तय शर्तें तय समयसीमा में पूरी होंगी। मंत्री का इस्तीफा हो गया। समझौता हो गया। आंदोलन समाप्त हो गया।

मगर दो दिन बाद, 27 जुलाई को संगठन लिखित गारंटी का इंतजार कर रहा था। उसने सरकार को मंगलवार तक का समय दिया। 25 अगस्त को सीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने कहा कि सरकार ने अपनी प्रतिबद्धताएं पूरी नहीं की हैं। संगठन के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय केंद्र सरकार से तीन बार एफआईआर की समेकित सूची मांग चुका था।

सीजेपी ने 5 सितंबर को फिर मार्च करने की घोषणा की। फिर 1 सितंबर को सर्वोच्च न्यायालय ने एफआईआर रद्द कर दीं। सरकार ने अदालत को बताया कि वह तीन महीने के भीतर पूरे देश के लिए मुआवजा नीति तैयार करेगी। इसके बाद सीजेपी ने अपना प्रस्तावित मार्च रद्द कर दिया।

जरा इस घटनाक्रम को देखिए। 25 जुलाई को समझौता हुआ। 1 सितंबर को एफआईआर रद्द करने का न्यायिक आदेश आया। बीच में 38 दिन लगे। लिखित गारंटी का इंतजार हुआ। फिर आंदोलन की चेतावनी देनी पड़ी। सर्वोच्च न्यायालय में बार-बार मामला उठा। तब जाकर सरकारी आश्वासन एक लागू होने वाले आदेश में बदला। मगर मुआवजा नीति?

वह अभी भी वादा है। दिसंबर की शुरुआत तक उसे तैयार करने की बात कही गई है। यानी आंदोलन की एक मांग पूरी हुई। दूसरी मांग के लिए नई समयसीमा मिल गई।

और यही पूरी कहानी का सार है।

सरकार के लिए घोषणा करना एक घटना है। नागरिक के लिए उस घोषणा का लागू होना एक लंबी प्रक्रिया। मंत्री के इस्तीफे की खबर तुरंत बनती है। कानून में सजा बढ़ाने की घोषणा सुर्खियां बनती है। अदालत का आदेश खबर बनता है।

मगर उसके बाद फाइल कहां पहुंची, किस अधिकारी ने क्या निर्णय लिया, किस परिवार को कितना मुआवजा मिला और किस छात्र को कब राहत मिली, इसकी खबर कौन रखता है?

यह काम महीनों और अनेक दफ्तरों में बंट जाता है। सरकार को घोषणा करने का श्रेय मिल जाता है। मीडिया को एक बड़ी खबर मिल जाती है। जनता को लगता है कि मामला समाप्त हो गया। जबकि काम अधूरा रहता है।

इसके लिए जरूरी नहीं कि हर अधिकारी की नीयत खराब हो। समस्या व्यवस्था की बनावट में भी है। एक सार्वजनिक घोषणा कहानी को समाप्त कर सकती है, जबकि उसका वास्तविक काम अभी शुरू भी नहीं हुआ होता। फिर जब महीनों बाद वादा पूरा नहीं होता तो उसे पुराने समझौते की अधूरी जिम्मेदारी के बजाय एक नया विवाद मान लिया जाता है।

इस तरह सत्ता की जवाबदेही लगातार टुकड़ों में बंटती रहती है। सीजेपी ने समयसीमाएं तय करके, सरकार के वादों की निगरानी करके और सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाकर इस सिलसिले को टूटने नहीं दिया।

मगर यह भी समझना होगा कि हर प्रदर्शनकारी ऐसा नहीं कर सकता। जिस नौजवान की परीक्षा सिर पर है, वह कितने महीने धरने पर बैठेगा? जिस मजदूर को रोज कमाना है, वह कितने दिन अदालत और सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाएगा?

आंदोलन चलाना एक काम है। आंदोलन की जीत को लागू करवाना उससे भी लंबा काम। और नागरिक के लिए सबसे महंगी चीज वही है जो सरकार के पास सबसे अधिक है। (जारी)