ट्रम्प मिडटर्म चुनाव हार सकते हैं:महंगाई और ईरान जंग से लोकप्रियता घटी, अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार दूरी बना रहे

अमेरिका में 3 नवंबर को होने वाले मिडटर्म चुनाव राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की पार्टी के लिए मुश्किल खड़ी कर सकते हैं। महंगाई, ईरान के साथ जंग और ट्रम्प की घटती लोकप्रियता के बीच रिपब्लिकन पार्टी के लिए कांग्रेस में अपना बहुमत बचाना चुनौती बन गया है। 10 प्रमुख जनमत सर्वेक्षणों में से सिर्फ 1 में रिपब्लिकन पार्टी आगे है। मिडटर्म चुनाव में राष्ट्रपति नहीं चुना जाता। इसमें अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस के दोनों सदनों- हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट की सीटों के लिए वोटिंग होती है। फिलहाल दोनों सदनों में रिपब्लिकन पार्टी को मामूली बहुमत है। अगर डेमोक्रेट्स जरूरी सीटें जीत लेते हैं, तो वे एक या दोनों सदनों में बहुमत हासिल कर सकते हैं। इससे ट्रम्प के लिए अपने एजेंडे को लागू करना मुश्किल हो सकता है। 1. ट्रम्प की लोकप्रियता में गिरावट, 30% तक रेटिंग पहुंची अमेरिका में ट्रम्प के कामकाज से खुश लोगों की संख्या घट रही है। अलग-अलग सर्वे में सिर्फ 30 से 36% लोग ही उनके काम से खुश हैं। NBC न्यूज के सर्वे में 34% लोगों ने ट्रम्प के कामकाज को सही बताया। वॉशिंगटन पोस्ट-ABC न्यूज के सर्वे में 33% और फॉक्स न्यूज के सर्वे में 36% लोगों ने उनका समर्थन किया। प्यू रिसर्च सेंटर के सर्वे में ट्रम्प को सबसे कम, यानी 30% लोगों का समर्थन मिला। ये ट्रम्प के पहले कार्यकाल से भी कम हैं। पहले कार्यकाल में ट्रम्प की अप्रूवल रेटिंग सबसे कम जनवरी 2021 में संसद में दंगाईयों के घुसने वाली घटना के बाद हुई थी। तब उनकी रेटिंग 34% पहुंच गई थी। 2. अमेरिकी जनता महंगाई से परेशान 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रम्प ने वादा किया था कि वे महंगाई कम करेंगे और लोगों का खर्च घटाएंगे। लेकिन अब बढ़ती कीमतें उनकी पार्टी के लिए परेशानी बन रही हैं। अमेरिका में अंडे, दूध, ब्रेड, मांस और सब्जियां जैसी बुनियादी चीजों के दाम 20% से 30% तक महंगे हो चुके हैं। घर का किराया औसतन 1.60 लाख रुपए पहुंच गया है जो अब तक सबसे ऊंचा स्तर है। तेल-गैस की कीमतों में करीब 20% का इजाफा हुआ है। हालांकि लोगों की तनख्वाह में थोड़ी बढ़ोतरी हुई है, लेकिन महंगाई की वजह से उन्हें इसका फायदा नहीं मिला। रॉयटर्स-इप्सोस के सर्वे में 78% लोगों ने कहा कि चीजों के दाम उनकी कमाई से ज्यादा तेजी से बढ़ रहे हैं। AP की रिपोर्ट के मुताबिक, 65% अमेरिकी मानते हैं कि महंगाई के लिए ट्रम्प की नीतियां जिम्मेदार हैं। राष्ट्रीय सर्वेक्षणों के मुताबिक लगभग 37% से अधिक अमेरिकी महंगाई और बढ़ती कीमतों को देश की सबसे बड़ी और गंभीर समस्या मानते हैं। ऐसे में महंगाई कम करना राष्ट्रपति ट्रम्प के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। 3. ईरान जंग से बढ़ी मुश्किल, विदेश नीति से भी नाराज लोग ईरान के साथ जंग ट्रम्प के लिए एक और परेशानी बन गई है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, जंग के कारण पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर दबाव बढ़ा है। इससे अमेरिकी लोगों का रोजमर्रा का खर्च बढ़ सकता है। NBC न्यूज के सर्वे में सिर्फ 29% लोगों ने ईरान जंग को संभालने के ट्रम्प के तरीके को सही माना। वहीं, फॉक्स न्यूज के सर्वे में 64% लोगों ने उनकी विदेश नीति को गलत बताया। हालांकि, ट्रम्प की अपनी पार्टी रिपब्लिकन के समर्थकों में उन्हें अब भी समर्थन मिल रहा है। AP के सर्वे में 69% रिपब्लिकन मतदाताओं ने उनकी विदेश नीति को सही माना। ईरान जंग का चुनाव पर कितना असर पड़ेगा, यह अभी साफ नहीं है। लेकिन अगर जंग के कारण पेट्रोल-डीजल महंगा होता है और लोग ट्रम्प की नीतियों से नाराज रहते हैं, तो इसका नुकसान उनकी रिपब्लिकन पार्टी को हो सकता है। 4. अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार ट्रम्प से दूरी बनाने लगे ट्रम्प की लोकप्रियता घटने का असर उनकी अपनी पार्टी पर भी दिख रहा है। रॉयटर्स की अक्टूबर में आई रिपोर्ट के मुताबिक, मुकाबले वाली 62 सीटों में से 41 सीटों पर रिपब्लिकन उम्मीदवार ट्रम्प की कुछ नीतियों से असहमति जता रहे हैं या उनसे दूरी बनाकर चल रहे हैं। ये उम्मीदवार ट्रम्प की सभी नीतियों का विरोध नहीं कर रहे। वे कुछ मुद्दों पर उनसे अलग राय रखकर उन लोगों का समर्थन हासिल करना चाहते हैं, जो किसी पार्टी के पक्के समर्थक नहीं हैं। इन उम्मीदवारों के सामने मुश्किल यह है कि ट्रम्प के करीब रहने पर उनकी गिरती लोकप्रियता का नुकसान उठाना पड़ सकता है। वहीं, उनसे ज्यादा दूरी बनाने पर ट्रम्प के वफादार समर्थक नाराज हो सकते हैं। संसद में बहुमत खोने पर ट्रम्प को क्या नुकसान होगा अगर डेमोक्रेटिक पार्टी कांग्रेस के एक या दोनों सदनों में बहुमत हासिल कर लेती है, तो ट्रम्प के लिए अपने फैसलों को लागू करना मुश्किल हो सकता है। कांग्रेस में बजट, सरकारी खर्च और नए कानूनों से जुड़े अहम फैसले लिए जाते हैं। ऐसे में डेमोक्रेट्स के पास बहुमत होने पर वे ट्रम्प के प्रस्तावों को रोक सकते हैं और उनके प्रशासन के कामकाज की जांच भी बढ़ा सकते हैं। हालांकि, रिपब्लिकन पार्टी के पास कुछ फायदे भी हैं। रॉयटर्स के मुताबिक, पार्टी के पास चुनाव प्रचार पर खर्च करने के लिए मजबूत संसाधन हैं। इसके अलावा, डेमोक्रेटिक पार्टी के कुछ उम्मीदवारों को लेकर मध्यमार्गी मतदाताओं की चिंता भी रिपब्लिकन के पक्ष में जा सकती है। ——————– ये खबर भी पढ़ें… ट्रम्प ने इजराइलियों से कहा- नेतन्याहू को दोबारा प्रधानमंत्री बनाएं:किसी और को चुना तो ईरान के खिलाफ अमेरिका को अकेले लड़ना पड़ेगा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इजराइल के लोगों से प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को दोबारा प्रधानमंत्री चुनने की अपील की है। उन्होंने कहा कि बीबी नेतन्याहू आपको कभी निराश नहीं करेंगे। पूरी खबर यहां पढ़ें…

फ्रांसीसी राष्ट्रपति बोले- तोड़फोड़ करने वालों को कीमत चुकानी होगी:गृहमंत्री का इस्तीफा मंजूर नहीं किया, PM लेकोर्नू ने इमरजेंसी मीटिंग बुलाई

फ्रांस में 17 अक्टूबर को हुई हिंसा और लूटपाट को लेकर राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने रविवार को सख्त कार्रवाई का वादा किया। उन्होंने रविवार रात अपने संबोधन में कहा कि जिन लोगों ने तोड़फोड़ और लूटपाट की है, उन्हें इसकी कीमत चुकानी होगी। मैक्रों ने गृहमंत्री लॉरेंट नुनेज का इस्तीफा भी नामंजूर कर दिया। मैक्रों ने नुनेज से कहा कि वे सड़कों को सुरक्षित बनाने के लिए कदम उठाएं। इस बीच प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू ने सोमवार को सरकार की इमरजेंसी मीटिंग बुलाई है। इसमें हिंसा की घटनाओं और उनसे निपटने के तरीकों पर चर्चा होगी। 1500 दुकानों में लूटपाट, 1000 पुलिकर्मी घायल महंगाई और सरकारी सुविधाओं में कमी के खिलाफ शनिवार को 8 लाख से ज्यादा लोग सड़कों पर उतरे थे। शुरुआत में हालात शांतिपूर्ण थे लेकिन बाद में काले कपड़े पहने और चेहरे ढके कुछ लोगों ने तोड़फोड़ और लूटपाट शुरू कर दी। अनुमान है कि करीब 1,500 दुकानों और कारोबारों में लूटपाट की गई या उन्हें नुकसान पहुंचाया गया। हालात संभालने के लिए पुलिस ने आंसू गैस छोड़ी और भीड़ पर पानी की बौछारें कीं। गृह मंत्रालय के मुताबिक, शनिवार को करीब 1000 पुलिसकर्मी घायल हुए। इनमें सात की हालत गंभीर थी। गृह मंत्री नुनेज पर आरोप लग रहे हैं कि वे पहले से तय प्रदर्शनों के लिए पर्याप्त तैयारी नहीं कर पाए। मैक्रों को देश का सबसे कमजोर राष्ट्रपति माना जा रहा हिंसा के बाद खबरें सामने आई कि मैक्रों कुछ इलाकों में कर्फ्यू लगा सकते हैं या आपातकाल घोषित कर सकते हैं। लेकिन उन्होंने रविवार को टीवी पर देश को संबोधित किया। उन्होंने हिंसा के लिए कट्टर वामपंथी समूहों और उपद्रवियों को जिम्मेदार ठहराया। मैक्रों ने लोगों से एकजुट रहने की अपील की और भरोसा दिलाया कि हिंसा करने वालों को सजा मिलेगी। हालांकि, फ्रांस के मीडिया ने उनके भाषण की आलोचना की। उनका कहना है कि मैक्रों ने यह साफ नहीं किया कि सरकार आगे क्या कदम उठाएगी। लूटपाट और तोड़फोड़ करने वालों पर कार्रवाई कैसे होगी, शहरों को दोबारा ऐसी घटनाओं से कैसे बचाया जाएगा, जिन दुकानदारों का नुकसान हुआ है, उन्हें मुआवजा कैसे मिलेगा। संसद तीन गुटों में बंटी, कोई भी फैसला लेना आसान नहीं फ्रांस की संसद तीन बड़े राजनीतिक गुटों में बंटी हुई है। इनके बीच इतने मतभेद हैं कि संसद का कामकाज प्रभावित हो रहा है। ऐसे माहौल में सरकार के लिए कोई बड़ा फैसला लेना आसान नहीं है। राष्ट्रपति मैक्रों का कार्यकाल खत्म होने वाला है। अप्रैल 2027 में राष्ट्रपति चुनाव होना है। ऐसे में देश में राजनीतिक खींचतान भी बढ़ गई है। राष्ट्रपति पद के लिए मुकाबले की तैयारी कर रहे नेताओं में दक्षिणपंथी नेता मरीन ले पेन और वामपंथी नेता जीन-ल्यूक मेलांशों भी शामिल हैं। ले पेन प्रवासियों के खिलाफ सख्त रुख के लिए जानी जाती हैं, जबकि मेलांशों पूंजीवाद के विरोधी हैं। दोनों नेता मौजूदा हालात में अपनी बात लोगों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। फ्रांस पर कर्ज का दबाव भी बढ़ रहा फ्रांस की सरकार के सामने आर्थिक मुश्किलें भी हैं। देश पर बढ़ते सरकारी कर्ज को काबू में करने के लिए निवेशक सरकार पर दबाव डाल रहे हैं। लेकिन सरकार को डर है कि अगर उसने सरकारी सुविधाओं या कल्याणकारी योजनाओं में कटौती की, तो और ज्यादा लोग नाराज होकर सड़कों पर उतर सकते हैं। देश में लोग पूछ रहे हैं कि अब आगे क्या होगा और क्या फ्रांस की व्यवस्था टूटने की कगार पर पहुंच गई है। शनिवार को हुई हिंसा ने लोगों को डरा दिया है। ————————— यह खबर भी पढ़ें… फ्रांस में बार-बार क्यों भड़कते हैं प्रदर्शन:पेंशन से लेकर महंगाई तक, आंदोलन के पीछे 5 बड़ी वजहें समझिए फ्रांस दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। यहां आधुनिक शहर हैं और शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी सरकारी सुविधाओं का बड़ा तंत्र है। इसके बावजूद, सरकार के फैसलों को लेकर यहां बार-बार बड़े आंदोलन होते हैं। पूरी खबर पढ़ें…

सत्ता बदलती है, पर व्यवस्था वही रहती है!

कॉकरोच जनता पार्टी के पिछले आंदोलन को देखे। 25 जुलाई को समझौता हुआ। 1 सितंबर को एफआईआर रद्द करने का न्यायिक आदेश आया। बीच में 38 दिन लगे। लिखित गारंटी का इंतजार हुआ। फिर आंदोलन की चेतावनी देनी पड़ी। सर्वोच्च न्यायालय में बार-बार मामला उठा। तब जाकर सरकारी आश्वासन एक लागू होने वाले आदेश में बदला। मगर मुआवजा नीति?वह अभी भी वादा है। … आंदोलन चलाना एक काम है। आंदोलन की जीत को लागू करवाना उससे भी लंबा काम।

श्रीलंका में 2022 का आर्थिक संकट केवल महंगाई या विदेशी मुद्रा की कमी का संकट नहीं था। वह उस शासन व्यवस्था के प्रति जनता के भरोसे के टूटने का क्षण था। महंगाई लगभग सत्तर प्रतिशत तक पहुंच गई थी। श्रीलंकाई मुद्रा का मूल्य करीब आधा रह गया था। आम आदमी के लिए ईंधन, भोजन और रोजमर्रा की जरूरतें जुटाना कठिन हो गया था।

इसी संकट से अरगलया आंदोलन पैदा हुआ। सिंहली भाषा में अरगलया का अर्थ है संघर्ष। मगर आंदोलन केवल राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे को हटाने के लिए नहीं था। उसका नारा था, व्यवस्था बदलो। पुराने चेहरों और पुरानी राजनीति से मुक्ति पाओ। सड़क पर जनता उतरी। राष्ट्रपति भवन तक पहुंची। गोटबाया राजपक्षे देश छोड़कर भागे और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।

आंदोलन जीत गया। मगर उसके बाद क्या हुआ?

राष्ट्रपति को चुनने का अधिकार उसी पुरानी संसद के पास था जिसके राजनीतिक ढांचे के खिलाफ जनता उठी थी। संसद ने रानिल विक्रमसिंघे को राष्ट्रपति चुन लिया। वे श्रीलंका की उसी पुरानी राजनीति के अनुभवी नेता थे जिसे आंदोलनकारियों ने अस्वीकार किया था। जनता ने राष्ट्रपति को हटाया था। मगर नए राष्ट्रपति का चुनाव पुरानी व्यवस्था ने किया।

यही जनक्रांति का पहला विरोधाभास है। सड़क सत्ता को खाली करा सकती है। मगर खाली हुई सत्ता पर अधिकार किसका होगा, यह उस समय मौजूद संगठित राजनीतिक शक्तियां तय करती हैं।

श्रीलंका में आंदोलन की व्यवस्था परिवर्तन की मांग को चुनावी रास्ता मिलने में दो वर्ष लग गए। सितंबर 2024 में अनुरा कुमारा दिसानायके राष्ट्रपति बने। वे नेशनल पीपुल्स पावर के नेता थे। 2019 के राष्ट्रपति चुनाव में उन्हें केवल तीन प्रतिशत वोट मिले थे। पांच वर्ष बाद वे लगभग 42 प्रतिशत वोट लेकर राष्ट्रपति बने। उसके बाद उनकी पार्टी को संसद में दो-तिहाई से भी अधिक बहुमत मिला।

तब जाकर आंदोलन की व्यवस्था परिवर्तन की मांग को एक राजनीतिक माध्यम मिला।

मगर यहां भी विरोधाभास समाप्त नहीं हुआ। जिस आर्थिक व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की शर्तों के खिलाफ जनता में असंतोष था, नई सरकार ने उसी आईएमएफ कार्यक्रम को जारी रखा।

तो आंदोलन ने क्या बदला?

उसने पहले दौर में राष्ट्रपति को हटाया। दूसरे दौर में, दो वर्ष बाद, मतदाताओं ने सत्ता के नए दावेदार को चुना। मगर आर्थिक और प्रशासनिक नीतियों की निरंतरता बनी रही। इसका अर्थ यह नहीं कि आंदोलन व्यर्थ था। बल्कि यह कि सत्ता परिवर्तन और व्यवस्था परिवर्तन की गति अलग-अलग होती है।

जनता एक दिन में राष्ट्रपति को हटा सकती है। मगर राज्य की आर्थिक निर्भरताओं, प्रशासनिक संस्थाओं और शासन की आदतों को एक दिन में नहीं बदल सकती।

अब बांग्लादेश को देखिए।

अगस्त 2024 में छात्रों के नेतृत्व वाले जनविद्रोह ने शेख हसीना की सत्ता समाप्त कर दी। वर्षों से जमा असंतोष, राजनीतिक दमन और चुनावी विश्वसनीयता के संकट के बीच छात्रों का आंदोलन देशव्यापी विद्रोह बन गया।

हसीना चली गईं। मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी। फिर संवैधानिक सुधारों का एक दस्तावेज तैयार हुआ जिसे जुलाई चार्टर कहा गया। इसमें प्रधानमंत्री के कार्यकाल की सीमा, दो सदनों वाली संसद और आनुपातिक प्रतिनिधित्व जैसे महत्वपूर्ण सुधार शामिल थे।

यानी बांग्लादेश में आंदोलन केवल प्रधानमंत्री को हटाकर नहीं रुका। उसने नई राजनीतिक व्यवस्था का खाका भी तैयार किया। फरवरी 2026 में चुनाव हुए। कार्नेगी के विश्लेषक अविनाश पालीवाल ने इन्हें लगभग दो दशकों में बांग्लादेश का पहला विश्वसनीय चुनाव बताया।

परिणाम में तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी, यानी बीएनपी, ने संसद की 300 में से 209 सीटें जीतीं। जमात-ए-इस्लामी को 68 सीटें मिलीं। जबकि छात्र आंदोलन से निकली नेशनल सिटिजन पार्टी को केवल छह सीटें मिलीं।

जरा इस परिणाम का अर्थ समझिए।

जिन छात्रों ने आंदोलन खड़ा किया, जिनके संघर्ष से पुरानी सत्ता गिरी, जिनकी नैतिक शक्ति पर राजनीतिक परिवर्तन संभव हुआ, चुनाव में उन्हें केवल छह सीटें मिलीं। आंदोलन की नैतिक विजय और चुनावी राजनीति की शक्ति एक जैसी नहीं होती। जनता किसी आंदोलन का समर्थन कर सकती है, मगर चुनाव में किसी दूसरी पार्टी को सत्ता सौंप सकती है।

बांग्लादेश में यही हुआ।

फिर भी छात्रों के आंदोलन की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। चुनाव के दिन ही मतदाताओं ने जुलाई चार्टर को भी लगभग दो-तिहाई समर्थन से मंजूरी दी। इसका अर्थ था कि मतदाता नई सरकार चाहते थे, मगर संवैधानिक सुधार भी चाहते थे।

अब असली परीक्षा शुरू हुई।

अविनाश पालीवाल के अनुसार बीएनपी ने चुनाव से पहले ही जुलाई चार्टर के कुछ प्रावधानों पर आपत्ति जताई थी। विशेषकर ऊपरी सदन की संरचना और कार्यवाहक सरकार के प्रमुख के चयन की प्रक्रिया पर। सत्ता में आने के बाद उसने सर्वोच्च न्यायालय के लिए अलग सचिवालय बनाने का प्रस्ताव भी ठंडे बस्ते में डाल दिया, जबकि पहले उसका समर्थन किया था।

यानी जनता ने जिस सुधार दस्तावेज को मंजूरी दी, उसे लागू करने वाली सरकार के अपने राजनीतिक हित थे। वह कुछ प्रावधानों को बदलना या कमजोर करना चाहती थी।

बांग्लादेश आज उसी मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है जहां भारत का सूचना अधिकार आंदोलन 2004 में पहुंचा था। मसौदा तैयार है। जनसमर्थन मौजूद है। राजनीतिक स्वीकृति भी मिल चुकी है। मगर कानून को अंतिम रूप देने और लागू करने का अधिकार उन लोगों के पास है जिनके लिए उसके कुछ प्रावधान असुविधाजनक हो सकते हैं।

आंदोलन के सामने अब प्रश्न है कि वह इस प्रक्रिया पर कितना दबाव बनाए रख सकता है। क्योंकि संविधान में सुधार लिख देना और सत्ता को उन सुधारों के अनुसार चलने के लिए बाध्य करना दो अलग काम हैं।

बांग्लादेश के छात्रों ने प्रधानमंत्री को हटा दिया। मगर वे उस पुरानी राजनीति को समाप्त नहीं कर सके जिसने चुनाव जीतकर फिर सत्ता संभाल ली। सड़क पर जनविद्रोह का नेतृत्व करने वाले चुनाव में सत्ता के स्वाभाविक उत्तराधिकारी नहीं बन जाते।

तीसरा उदाहरण नेपाल का है।

सितंबर 2025 में नेपाल सरकार ने 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगाया। इसके विरोध में शुरू हुआ आंदोलन तेजी से व्यापक राजनीतिक विद्रोह में बदल गया। रॉयटर्स के अनुसार दो दिनों की हिंसा में 76 लोग मारे गए। पहले ही दिन पुलिस की गोलीबारी में कम से कम 19 प्रदर्शनकारियों की मौत हुई। 9 सितंबर को प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली ने इस्तीफा दे दिया।

सरकार गिर गई।

पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी। संसद भंग हुई और 5 मार्च 2026 को चुनाव हुए। इन चुनावों में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को अधिकांश सीटें मिलीं। 27 मार्च को बालेंद्र शाह प्रधानमंत्री बने। नेपाल ने तीनों पड़ोसी देशों में सबसे तेजी से सड़क के आंदोलन को राष्ट्रीय चुनाव में बदला।

श्रीलंका में लगभग 26 महीने लगे। बांग्लादेश में करीब अठारह महीने। नेपाल में लगभग छह महीने। मगर जवाबदेही की गति यहां भी धीमी रही। 28 मार्च को पुलिस ने पूर्व प्रधानमंत्री ओली और उनके गृह मंत्री रमेश लेखक को गिरफ्तार किया। यह कार्रवाई उस जांच आयोग की सिफारिश पर हुई जिसने पहले दिन प्रदर्शनकारियों पर हुई गोलीबारी रोकने में विफल रहने के लिए ओली को जिम्मेदार माना था।

8 सितंबर को अल जजीरा की रिपोर्ट के अनुसार दोनों के खिलाफ जांच जारी थी और औपचारिक आरोप तय नहीं हुए थे। हालांकि दूसरी रिपोर्टों में आपराधिक लापरवाही के आरोपों का उल्लेख था। यानी सरकार गिर गई। चुनाव हो गए। नया प्रधानमंत्री आ गया। मगर जिन परिवारों ने अपने बच्चों को खोया, उनके लिए न्याय की प्रक्रिया अभी चल रही थी।

सत्ता परिवर्तन की घड़ी तेज चलती है। न्याय की घड़ी धीमी। श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल के इन तीन अनुभवों में कुछ समानताएं हैं। मगर इनके कारण और परिस्थितियां एक जैसी नहीं थीं।

पहली समानता यह कि सत्ता का खाली स्थान अधिक देर खाली नहीं रहता। उसे वही राजनीतिक शक्ति भरती है जो पहले से संगठित है या जल्दी संगठन खड़ा कर सकती है।

श्रीलंका में पुरानी राजनीतिक परंपरा वाली पार्टी ने आंदोलन की मांग को चुनावी रास्ता दिया। बांग्लादेश में स्थापित बीएनपी ने सत्ता हासिल की। नेपाल में अपेक्षाकृत नई पार्टी चुनाव जीतकर सरकार में आई। तीनों में सड़क का आंदोलन स्वयं सरकार नहीं बना।

आंदोलन की स्थायी शक्ति इस बात में थी कि वह सत्ता में आने वालों को चुनने और उनसे जवाब मांगने की नागरिक क्षमता पैदा कर सके। दूसरी समानता यह कि किसी दस्तावेज को जनता की मंजूरी मिल जाना उसके लागू होने की गारंटी नहीं है।

बांग्लादेश में मतदाताओं ने संवैधानिक सुधारों का समर्थन किया। मगर उसके बाद संघर्ष कानून के प्रावधानों, उनके कमजोर किए जाने और लागू होने की प्रक्रिया में पहुंच गया।

भारत में सूचना अधिकार आंदोलन को भी यही लड़ाई लड़नी पड़ी थी। तीसरी समानता यह कि समझौता, न्याय और जवाबदेही की घड़ियां अलग-अलग चलती हैं।

सोशल मीडिया के सहारे लाखों लोग कुछ घंटों में जुट सकते हैं। सरकार को कुछ दिनों में गिराया जा सकता है। मगर समझौते के लिए ऐसे प्रतिनिधि चाहिए जो आंदोलन की ओर से निर्णय ले सकें। और न्याय के लिए संस्थाएं चाहिए जो अपने निर्णयों को लागू भी कर सकें।

इस पूरी प्रक्रिया में सबसे लंबा इंतजार अक्सर उन परिवारों को करना पड़ता है जिन्होंने आंदोलन में अपने लोगों को खोया होता है। मगर क्या इन तीनों देशों में सरकारें इसलिए गिरीं क्योंकि उनके राज्य कमजोर थे? और क्या भारत में ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि भारतीय राज्य मजबूत है?

यह तुलना इतनी सरल नहीं है। इन घटनाओं को समझने के लिए चार बातों पर गौर करना होगा।

पहली है आर्थिक स्थिति। श्रीलंका में आर्थिक संकट असाधारण था। देश भुगतान संकट से जूझ रहा था। बांग्लादेश में भी विदेशी मुद्रा भंडार लगभग तीन महीने के आयात के बराबर रह गया था।

दूसरी है सुरक्षा बलों की भूमिका। बांग्लादेश में सेना ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने से इनकार किया। नेपाल में पुलिस की गोलीबारी में पहले ही दिन कम से कम 19 लोग मारे गए।

तीसरी है सरकार की वैधता पर जनता का भरोसा। बांग्लादेश में जनवरी 2024 के विवादास्पद चुनाव के बाद शासन की विश्वसनीयता गंभीर रूप से प्रभावित हुई थी। नेपाल में घातक विरोध प्रदर्शनों के एक दिन के भीतर सरकार गिर गई।

चौथी और सबसे महत्वपूर्ण बात है प्रशासनिक मशीनरी की निरंतरता। यही वह पहलू है जिस पर तोकविल सबसे अधिक ध्यान देते। सरकारें गिर गईं। मगर उनके साथ प्रशासन समाप्त नहीं हुआ। बांग्लादेश के बारे में पालीवाल का निष्कर्ष है कि जिस क्रांति ने नई व्यवस्था स्थापित की, उसके बाद भी पुरानी व्यवस्था का बड़ा हिस्सा बना रहा। यही राज्य की वास्तविक शक्ति है। राजनीतिक सत्ता बदल सकती है। मगर नौकरशाही, संस्थागत हित, प्रशासनिक नियम और शासन की परंपराएं बनी रह सकती हैं।

भारत की स्थिति इन देशों से अलग है। मगर अंतर केवल इतना नहीं कि वहां कमजोर राज्य हैं और यहां मजबूत राज्य।

भारत में श्रीलंका जैसा दिवालियापन नहीं है। सुरक्षा बलों की निष्ठा डगमगाने का कोई संकेत नहीं है। न्यायालय, मंत्रालय और संघीय व्यवस्था काम कर रहे हैं। 10 अक्टूबर के आंदोलन की मांग भी इन देशों के आंदोलनों से छोटी है। यहां सरकार गिराने की मांग नहीं है। मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग है।

ऐसी परिस्थिति में सरकार के लिए किसी व्यक्ति का इस्तीफा स्वीकार करना, पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया बदलने की अपेक्षा कहीं आसान हो सकता है। यहीं भारत के लिए तोकविल की चेतावनी महत्वपूर्ण हो जाती है।

यहां खतरा सरकार के गिर जाने का नहीं, बल्कि आंदोलन को व्यवस्था के भीतर समाहित कर लेने का है। सरकार किसी मांग को स्वीकार कर सकती है। समिति बना सकती है। इस्तीफा ले सकती है। नया कानून घोषित कर सकती है। आंदोलन समाप्त हो सकता है। मगर जिस प्रक्रिया के खिलाफ आंदोलन हुआ था, वह जस की तस बनी रह सकती है।

श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल बताते हैं कि सरकार गिर जाने के बाद क्या होता है।

भारत के अपने आंदोलन बताते हैं कि सरकार के बने रहने और आंदोलन की मांग स्वीकार कर लेने के बाद क्या होता है। और इसका सबसे ताजा उदाहरण स्वयं कॉकरोच जनता पार्टी का पिछला आंदोलन है। 25 जुलाई को जंतर मंतर पर पांच सप्ताह से अधिक चले आंदोलन के बाद शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दिया।

सीजेपी ने आंदोलन समाप्त करने की घोषणा की। संगठन ने कहा कि सरकार ने उसकी सभी मांगें स्वीकार कर ली हैं। इनमें प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर वापस लेना, कुछ दिनों के भीतर इसकी लिखित गारंटी देना, नीट-यूजी प्रश्नपत्र लीक के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को मुआवजा देना और परीक्षा सुधार के पांच सूत्री मांगपत्र पर विचार करना शामिल था।

सीजेपी ने कहा कि वह सद्भावना के आधार पर आंदोलन वापस ले रही है। उसे भरोसा है कि तय शर्तें तय समयसीमा में पूरी होंगी। मंत्री का इस्तीफा हो गया। समझौता हो गया। आंदोलन समाप्त हो गया।

मगर दो दिन बाद, 27 जुलाई को संगठन लिखित गारंटी का इंतजार कर रहा था। उसने सरकार को मंगलवार तक का समय दिया। 25 अगस्त को सीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने कहा कि सरकार ने अपनी प्रतिबद्धताएं पूरी नहीं की हैं। संगठन के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय केंद्र सरकार से तीन बार एफआईआर की समेकित सूची मांग चुका था।

सीजेपी ने 5 सितंबर को फिर मार्च करने की घोषणा की। फिर 1 सितंबर को सर्वोच्च न्यायालय ने एफआईआर रद्द कर दीं। सरकार ने अदालत को बताया कि वह तीन महीने के भीतर पूरे देश के लिए मुआवजा नीति तैयार करेगी। इसके बाद सीजेपी ने अपना प्रस्तावित मार्च रद्द कर दिया।

जरा इस घटनाक्रम को देखिए। 25 जुलाई को समझौता हुआ। 1 सितंबर को एफआईआर रद्द करने का न्यायिक आदेश आया। बीच में 38 दिन लगे। लिखित गारंटी का इंतजार हुआ। फिर आंदोलन की चेतावनी देनी पड़ी। सर्वोच्च न्यायालय में बार-बार मामला उठा। तब जाकर सरकारी आश्वासन एक लागू होने वाले आदेश में बदला। मगर मुआवजा नीति?

वह अभी भी वादा है। दिसंबर की शुरुआत तक उसे तैयार करने की बात कही गई है। यानी आंदोलन की एक मांग पूरी हुई। दूसरी मांग के लिए नई समयसीमा मिल गई।

और यही पूरी कहानी का सार है।

सरकार के लिए घोषणा करना एक घटना है। नागरिक के लिए उस घोषणा का लागू होना एक लंबी प्रक्रिया। मंत्री के इस्तीफे की खबर तुरंत बनती है। कानून में सजा बढ़ाने की घोषणा सुर्खियां बनती है। अदालत का आदेश खबर बनता है।

मगर उसके बाद फाइल कहां पहुंची, किस अधिकारी ने क्या निर्णय लिया, किस परिवार को कितना मुआवजा मिला और किस छात्र को कब राहत मिली, इसकी खबर कौन रखता है?

यह काम महीनों और अनेक दफ्तरों में बंट जाता है। सरकार को घोषणा करने का श्रेय मिल जाता है। मीडिया को एक बड़ी खबर मिल जाती है। जनता को लगता है कि मामला समाप्त हो गया। जबकि काम अधूरा रहता है।

इसके लिए जरूरी नहीं कि हर अधिकारी की नीयत खराब हो। समस्या व्यवस्था की बनावट में भी है। एक सार्वजनिक घोषणा कहानी को समाप्त कर सकती है, जबकि उसका वास्तविक काम अभी शुरू भी नहीं हुआ होता। फिर जब महीनों बाद वादा पूरा नहीं होता तो उसे पुराने समझौते की अधूरी जिम्मेदारी के बजाय एक नया विवाद मान लिया जाता है।

इस तरह सत्ता की जवाबदेही लगातार टुकड़ों में बंटती रहती है। सीजेपी ने समयसीमाएं तय करके, सरकार के वादों की निगरानी करके और सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाकर इस सिलसिले को टूटने नहीं दिया।

मगर यह भी समझना होगा कि हर प्रदर्शनकारी ऐसा नहीं कर सकता। जिस नौजवान की परीक्षा सिर पर है, वह कितने महीने धरने पर बैठेगा? जिस मजदूर को रोज कमाना है, वह कितने दिन अदालत और सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाएगा?

आंदोलन चलाना एक काम है। आंदोलन की जीत को लागू करवाना उससे भी लंबा काम। और नागरिक के लिए सबसे महंगी चीज वही है जो सरकार के पास सबसे अधिक है। (जारी)

रूस के प्रति ट्रंप की नरमी से रिपब्लिकन पर बढ़ा दबाव

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ संपर्क बढ़ाते हुए रूस को कई रियायतें दी हैं। उनके इन कदमों की अमेरिका में दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के नेताओं ने आलोचना की है, जिससे मध्यावधि चुनाव से पहले रिपब्लिकन पार्टी को मुश्किल सवालों का सामना करना पड़ रहा है।

मतदान में करीब तीन सप्ताह शेष रहने के बीच ट्रंप के हाल के फैसलों ने पुतिन के साथ उनके एक दशक पुराने संबंधों को फिर चर्चा में ला दिया है। शुक्रवार को पुतिन से बातचीत के बाद ट्रंप ने ऐसे कई कदम उठाए, जिनकी आलोचकों के अनुसार रूस को बिना किसी ठोस रियायत के फायदा हुआ है।

श्री ट्रंप ने शुक्रवार को वैश्विक बाजार में लाखों टन रूसी डीजल की आपूर्ति की अनुमति देने संबंधी समझौते की घोषणा की। आलोचकों का कहना है कि इससे रूस के युद्ध से होने वाली आय सीमित करने के उद्देश्य से लगाए गए प्रतिबंधों में ढील मिली है। उन्होंने शनिवार को यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की की रूसी तेल रिफाइनरियों को निशाना बनाने के लिए आलोचना की और यूक्रेन से अपना नेता बदलने की मांग की।

इसके अगले दिन श्री ट्रंप ने तत्काल ‘ऊर्जा संघर्षविराम’ की घोषणा की। रूस ने हालांकि यूक्रेन की ऊर्जा अवसंरचना पर हमले जारी रखे और अमेरिका की ओर से इसका कोई स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया।

श्री ट्रंप ने सोमवार को उन खुफिया आकलनों पर आधारित खबरों को खारिज कर दिया, जिनमें कहा गया था कि रूस ईरान को अमेरिकी सैन्य ठिकानों की जानकारी देकर उसके युद्ध प्रयासों में मदद कर रहा है।

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उन्होंने मंगलवार को डीजल समझौते का बचाव करते हुए इस आशंका को भी खारिज किया कि इससे होने वाली आय रूस के युद्ध को वित्तपोषित करने में मदद कर सकती है। रिपब्लिकन सांसदों ने हालांकि इस समझौते को ‘विश्वासघात’ और ‘दुश्मन को दिया गया उपहार’ बताया।

ऊर्जा विश्लेषकों ने सवाल उठाया है कि क्या डीजल समझौते से ईरान से जुड़े युद्ध के कारण बढ़ी ईंधन कीमतों में उल्लेखनीय कमी आएगी। यूरोप में अमेरिकी रुख को लेकर नाटो के भीतर मतभेद बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। रूस पर तोड़फोड़, साइबर हमलों और ड्रोन घुसपैठ की घटनाओं को तेज करने के आरोप भी हैं।

राजनीतिक रूप से श्री ट्रंप ऐसे रूसी नेता के साथ नजदीकी बढ़ा रहे हैं, जो अमेरिकी मतदाताओं के बीच अलोकप्रिय हैं। जनवरी में यूगोव के एक सर्वेक्षण में श्री ट्रंप को 2024 में वोट देने वाले 81 प्रतिशत लोगों ने श्री पुतिन के प्रति प्रतिकूल राय व्यक्त की थी।

रूसी राष्ट्रपति के साथ श्री ट्रंप के संबंध 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के बाद से विवादों में रहे हैं। श्री ट्रंप ने सोमवार को फिर कहा कि श्री पुतिन, श्री जेलेंस्की की तुलना में युद्ध समाप्त करने के लिए अधिक इच्छुक हैं। उन्होंने पत्रकारों से कहा, “मुझे वास्तव में लगता है कि पुतिन, जेलेंस्की से अधिक समझौता करना चाहते हैं।

मध्यावधि चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी के कांग्रेस में अपना नियंत्रण खोने की आशंका है। ऐसा होने पर श्री ट्रंप का विधायी एजेंडा प्रभावित हो सकता है और उनके प्रशासन को कांग्रेस की बढ़ती जांच तथा समन का सामना करना पड़ सकता है।

श्री ट्रंप ने चुनावी नतीजों से अपने संबंध को अलग रखने की कोशिश की है। उन्होंने मंगलवार को अपने सोशल मीडिया मंच ‘ट्रुथ सोशल’ पर लिखा मैं चुनाव नहीं लड़ रहा हूं, मैं पहले ही भारी बहुमत से जीत चुका हूं।

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ट्रम्प को जिताने पिछले चुनाव से ज्यादा खर्च रहे मस्क:रिपब्लिकन पार्टी को ₹2,600 करोड़ चंदा दिया, यह मिडटर्म इलेक्शन के इतिहास में सबसे ज्यादा

दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति इलॉन मस्क ने जुलाई से अब तक रिपब्लिकन पार्टी को 276 मिलियन डॉलर यानी करीब 2,600 करोड़ रुपए से ज्यादा चंदा दिया है। मस्क यह पैसा अमेरिका के मिडटर्म चुनाव में रिपब्लिकन उम्मीदवारों की मदद के लिए खर्च कर रहे हैं। इतना पैसा अब तक किसी शख्स ने मिडटर्म चुनाव में खर्च नहीं किया। यह रकम इतनी बड़ी है कि डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थन वाले संगठन ने उस तिमाही में अपने सभी चंदा देने वालों से मिलकर भी इससे कम पैसा जुटाया। 2024 के चुनाव से भी ज्यादा पैसा खर्च कर रहे मस्क मस्क ने 2025-26 में अब तक रिपब्लिकन पार्टी को करीब 366 मिलियन डॉलर (करीब 3500 करोड़ रुपए) दिए हैं। यह रकम 2024 के चुनाव में दिए गए उनके करीब 290 मिलियन डॉलर (करीब 2800 करोड़ रुपए) से काफी ज्यादा है। हालांकि, मस्क ने दोनों चुनावों के दौरान कुछ ऐसे चंदे भी दिए हैं, जिनकी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई। मस्क के नए खर्च से मिडटर्म चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी को आर्थिक बढ़त मिली है। इसके मुकाबले डेमोक्रेटिक पार्टी का कोई भी अरबपति चंदा देने वाला व्यक्ति मस्क जितना पैसा खर्च नहीं कर रहा है। मस्क के चंदे से यह भी साफ हुआ है कि वे अमेरिकी राजनीति में लंबे समय तक सक्रिय रहना चाहते हैं। मई 2025 में उन्होंने कहा था कि भविष्य में वे राजनीतिक खर्च काफी कम कर देंगे। ट्रम्प की मस्क से फिर नजदीकी बढ़ी मस्क के पास कई बड़ी कंपनियां हैं, जिनमें से कुछ को अमेरिकी सरकार से बड़े ठेके भी मिले हैं। पिछले साल ट्रम्प के साथ विवाद के बाद से मस्क ने अपने राजनीतिक कामकाज को लेकर काफी कम सार्वजनिक बयान दिए थे। हालांकि, अब दोनों के रिश्ते फिर सुधरते दिख रहे हैं। पिछले दो हफ्तों में दोनों तीन कार्यक्रमों में साथ दिखाई दिए और एक-दूसरे की तारीफ भी की। मस्क के इतना पैसा खर्च करने से जाहिर है कि वे दक्षिणपंथी राजनीति के साथ अपनी भागीदारी बनाए रखना चाहते हैं। 3,000 लोगों की टीम घर-घर जाकर वोट मांग रही रिपब्लिकन पार्टी को ज्यादातर चंदा मस्क के बनाए राजनीतिक संगठन अमेरिका PAC के जरिए मिलता है। यह संगठन रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवारों के समर्थन में प्रचार करता है। अमेरिका PAC के प्रवक्ता एंड्रयू रोमियो ने कहा कि अगर नवंबर में डेमोक्रेटिक पार्टी चुनाव जीत जाती है, तो अमेरिका के कम्युनिष्ट, वोक और बिना सीमा वाला देश बनने का खतरा है। उन्होंने कहा कि मस्क के बड़े निवेश से रिपब्लिकन पार्टी को अपना पक्ष लोगों तक पहुंचाने का मौका मिला है, ताकि वह चुनाव में इतिहास के रुझान को बदलने की कोशिश कर सके। मस्क सिर्फ बेहिसाब पैसा खर्च नहीं, बल्कि उनकी टीम के 3000 लोग घर-घर जाकर मतदाताओं से संपर्क कर रहे हैं। वे उन मतदाताओं को वोट डालने के लिए तैयार कर रहे हैं, जो आमतौर पर चुनाव में कम हिस्सा लेते हैं। टेक्सास में सबसे बड़ा दांव, एक उम्मीदवार पर ₹1500 करोड़ खर्च मस्क के चुनावी अभियान का सबसे दिलचस्प हिस्सा टेक्सास का सीनेट चुनाव है। यहां रिपब्लिकन उम्मीदवार केन पैक्सटन के समर्थन में करीब 1500 करोड़ रुपए के विज्ञापन अभियान की शुरुआत हुई है। मस्क के लिए टेक्सास का चुनाव इसलिए भी अहम है, क्योंकि वे राज्य की राजधानी ऑस्टिन में रहते हैं और यहां उनका बड़ा कारोबारी निवेश है। उनकी टीम सिर्फ टीवी विज्ञापनों के जरिए प्रचार नहीं कर रही, बल्कि घर-घर जाकर मतदाताओं से संपर्क भी कर रही है। प्रचारक लोगों के दरवाजों पर पर्चे लगा रहे हैं। इन पर्चों में दावा किया जा रहा है कि डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता पूरे अमेरिका में चुनाव जीत रहे हैं और टेक्सास में भी ऐसा हो सकता है। ट्रांसजेंडर और समाजवाद के खिलाफ टार्गेटेड विज्ञापन मस्क का चुनावी संगठन ट्रांसजेंडर और समाजवाद के मुद्दों पर ज्यादा जोर दे रहा है। मस्क की अपनी ट्रांसजेंडर बेटी के साथ अनबन रही है। मस्क ने कहा था कि बेटी के साथ हुए मतभेदों का असर उनकी राजनीति में बढ़ती दिलचस्पी पर भी पड़ा। अब उनका संगठन इसी मुद्दे पर डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवारों को घेर रहा है। एक विज्ञापन में मेकअप लगाए एक व्यक्ति को दिखाया गया है। इसमें कहा गया है- उन्होंने तो वोटिंग करने की ठान ली है। क्या आप वोट डालने जा रहे हैं? इस विज्ञापन के जरिए लोगों से कहा जाता है कि वे घर पर न बैठें और कट्टरपंथियों को चुनाव जीतने का मौका न दें। एक और वीडियो में डेमोक्रेटिक नेताओं को मुस्कुराते हुए दिखाया है। इसमें यह कहा जा रहा है कि वे इसलिए खुश हैं क्योंकि ‘क्रिस्टोफर’ ने वोट डालने का कोई प्लान अभी तक नहीं बनाया है। इसमें भी यही मैसेज है कि अगर रिपब्लिकन समर्थक वोट डालने नहीं गए, तो डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों को इसका फायदा मिल सकता है। मस्क के प्रचार का तरीका बदला 2024 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में मस्क ट्रम्प के समर्थन में खुलकर प्रचार कर रहे थे। वे चुनावी रैलियों में शामिल होते थे, सोशल मीडिया पर लगातार पोस्ट करते थे और वोटरों को अपने पक्ष में करने के लिए 10 लाख डॉलर देने जैसी योजना भी चलाते थे। 2026 के मिडटर्म चुनाव में उनका तरीका बदल गया है। इस बार वे खुद सामने आकर प्रचार करने के बजाय पर्दे के पीछे रहकर काम कर रहे हैं। अब उन्होंने प्रचार की जिम्मेदारी अपने संगठन और सलाहकारों को सौंप दी है। सोशल मीडिया पर भी उनकी सक्रियता पहले के मुकाबले काफी कम है।

अमेरिका में 2 लाख भारतवंशी वोटर्स के नाम कटे:मिडटर्म चुनाव में ट्रम्प को हार का डर; 2024 में 65% ने विपक्ष को वोट दिया था

अमेरिका की वोटर लिस्ट से 2 लाख भारतीय मूल के वोटर्स का नाम कट गया है। इन लोगों के नाम उन 26 राज्यों में काटे गए हैं, जहां ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी की सरकार है। अमेरिका में करीब 21 लाख भारतवंशी वोटर्स हैं। 3 नवंबर को मिडटर्म चुनाव होने हैं। इन चुनावों में ट्रम्प की पार्टी को हार का डर सता रहा है। इसकी एक वजह भारतीय मूल के वोटरों का रुझान है, जो हमेशा से उनकी विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर रहा है। 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में करीब 65% भारतीय मूल के लोगों ने डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार कमला हैरिस को वोट दिया था। वोटर लिस्ट की जांच क्यों हो रही? अमेरिका में ट्रम्प प्रशासन वोटर लिस्ट की जांच कर रहा है, ताकि वोट देने के अयोग्य लोगों के नाम हटाए जा सकें। सरकार का कहना है कि इससे चुनाव में गड़बड़ी रोकने और वोटिंग प्रक्रिया को ज्यादा सुरक्षित बनाने में मदद मिलेगी। इसी मकसद से ट्रम्प ‘सेव अमेरिका एक्ट’ का समर्थन कर रहे हैं। फरवरी में अमेरिकी संसद के निचले सदन ने इस बिल को मंजूरी दी थी। इसके तहत वोटर के तौर पर रजिस्ट्रेशन कराने वालों को अमेरिकी नागरिकता साबित करने के लिए जन्म प्रमाण पत्र या पासपोर्ट जैसे दस्तावेज देने होंगे। वोट डालने के लिए पहचान पत्र दिखाने के नियम भी सख्त किए जाएंगे। ये नियम मतदान केंद्र पर और डाक से वोट डालने, दोनों पर लागू होंगे। ट्रम्प चुनाव में बड़े पैमाने पर धांधली होने के दावे करते रहे हैं, लेकिन इन दावों के समर्थन में ठोस सबूत नहीं मिले हैं। ब्रेनन सेंटर फॉर जस्टिस की एक रिसर्च में भी जांच किए गए चुनावों में धांधली के मामले बेहद कम पाए गए। वहीं, बिल के विरोधियों का कहना है कि सख्त दस्तावेजी नियमों के कारण उन योग्य नागरिकों को भी वोट देने में परेशानी हो सकती है, जिनके पास जन्म प्रमाण पत्र या पासपोर्ट नहीं है। मोक्रेटिक पार्टी के नेताओं का आरोप है कि ट्रम्प प्रशासन इन कदमों से मिडटर्म चुनावों को प्रभावित करना चाहता है। ट्रम्प के कामकाज से 70% अमेरिकी संतुष्ट नहीं ट्रम्प के खिलाफ उनकी अपनी रिपब्लिकन पार्टी में बगावत के संकेत दिखने लगे हैं। ट्रम्प की लोकप्रियता घट रही है। पार्टी नेताओं को डर है कि मिडटर्म चुनाव में ट्रम्प का साथ उन्हें नुकसान पहुंचा सकता है। नवंबर में होने वाले चुनाव से पहले कई रिपब्लिकन उम्मीदवार ट्रम्प से दूरी बना रहे हैं। कुछ ने अपनी चुनावी वेबसाइट से ट्रम्प और उनके ‘अमेरिका फर्स्ट’ एजेंडे का जिक्र हटा दिया है। कुछ नेता उनके साथ मंच साझा करने से भी बच रहे हैं। AP-NORC सर्वे के मुताबिक, सिर्फ 30% अमेरिकी ट्रम्प के कामकाज से खुश हैं। अर्थव्यवस्था पर उनकी अप्रूवल रेटिंग 26% है। महंगाई से निपटने के मामले में यह सिर्फ 17% है। 65% से ज्यादा अमेरिकी बढ़ती कीमतों के लिए ट्रम्प की नीतियों को जिम्मेदार मानते हैं। संसद में ट्रम्प के लिए बहुमत बचाना जरूरी है ——————– यह खबर भी पढ़ें… ट्रम्प ने टाटा-विप्रो को ग्रीन कार्ड प्रोग्राम से सस्पेंड किया अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के प्रशासन ने गुरुवार को 8 बड़ी आईटी कंपनियों को ग्रीन कार्ड प्रोग्राम से सस्पेंड कर दिया है। इनमें भारत की चार कंपनियां टाटा, इंफोसिस, विप्रो और HCL हैं। इनके अलावा माइक्रोसॉफ्ट, एडोबी, कॉग्निजेंट और कैपजेमिनी पर भी यह रोक लगाई गई है। पूरी खबर पढ़ें…

ट्रम्प की नौकरी छोड़कर अब फॉक्स न्यूज जॉइन करेंगी लेविट:बच्चों के चलते व्हाइट हाउस में पद छोड़ा था; ट्रम्प का यह पसंदीदा चैनल

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की पूर्व प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिना लेविट अब फॉक्स न्यूज से जुड़ने जा रही हैं। लेविट ने अगस्त में अपने दो बच्चों के साथ ज्यादा समय बिताने के लिए व्हाइट हाउस का पद छोड़ा था। अब वह वंबर से फॉक्स न्यूज में ऑन-एयर कंट्रीब्यूटर के तौर पर काम करेंगी। फॉक्स न्यूज को ट्रम्प का पसंदीदा चैनल माना जाता है, हालांकि हाल के दिनों में ट्रम्प ने इसकी कवरेज को लेकर नाराजगी भी जताई है। ट्रम्प ने कहा था- लेविट को मुझसे ज्यादा अपने बच्चे पसंद लेविट 27 साल की उम्र में अमेरिका की सबसे कम उम्र की व्हाइट हाउस प्रेस सेक्रेटरी बनी थीं। उन्होंने 12 अगस्त यह पद छोड़ने का ऐलान किया था। उस समय ट्रम्प ने उन्हें अपने सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में से एक बताया था। ट्रम्प ने उनके पद छोड़ने के बाद मजाक में कहा था, मुझे पता चला है कि कैरोलिना लेविट मुझे पसंद करने से ज्यादा अपने बच्चों को पसंद करती हैं। मैं इसे लेकर बहुत चिंतित हूं। लेकिन लेविट की जगह लेना आसान नहीं होगा लेविट ने 1 मई 2026 को अपने दूसरे बच्चे को जन्म दिया था। इसके बाद वह मातृत्व अवकाश पर गई थीं और 16 जुलाई को प्रेस ब्रीफिंग में वापस लौटी थीं। उनका एक दो साल का बेटा भी है। 1 नवंबर से फॉक्स न्यूज पर दिखेंगी व्हाइट हाउस प्रेस सेक्रेटरी बनने से पहले लेविट ट्रम्प के 2024 के राष्ट्रपति चुनाव अभियान की प्रेस सेक्रेटरी थीं। इससे पहले 25 साल की उम्र में उन्होंने 2022 में अपने गृह राज्य न्यू हैम्पशायर से अमेरिकी कांग्रेस का चुनाव लड़ा था। हालांकि, इस चुनाव में उन्हें हार मिली थी। फॉक्स न्यूज ने सोमवार को बताया कि लेविट 1 नवंबर से नेटवर्क में ऑन-एयर कंट्रीब्यूटर के तौर पर काम करेंगी। नेटवर्क की CEO सुजैन स्कॉट ने कहा कि व्हाइट हाउस और राष्ट्रपति चुनाव अभियान में लेविट के सीधे अनुभव से उन्हें आज की राजनीति को समझने में खास मदद मिलती है। लेविट ने भी कहा कि वह व्हाइट हाउस प्रेस सेक्रेटरी के अपने अनुभव से मिली सोच को फॉक्स न्यूज के करोड़ों दर्शकों तक पहुंचाने को लेकर उत्साहित हैं। उन्होंने बताया कि वह फॉक्स के अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर काम करेंगी। ट्रम्प की दूसरी प्रेस सेक्रेटरी भी फॉक्स में लेविट ट्रम्प की पहली प्रेस सेक्रेटरी नहीं हैं, जो फॉक्स न्यूज से जुड़ी हैं। उनकी पूर्व प्रेस सेक्रेटरी कायले मैकएनैनी 2021 में फॉक्स न्यूज से जुड़ी थीं और अब भी नेटवर्क के साथ हैं। इसके अलावा पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश की प्रेस सेक्रेटरी रह चुकीं डाना पेरिनो भी फॉक्स न्यूज में राजनीतिक कमेंटेटर हैं। ट्रम्प ने भी फॉक्स न्यूज के कई चेहरों को अपनी सरकार में बड़े पद दिए हैं। इनमें सबसे प्रमुख नाम रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ का है। ट्रम्प ने फॉक्स न्यूज को हाल ही में पक्षपाती बताया ट्रम्प और फॉक्स न्यूज के रिश्ते इन दिनों पूरी तरह सहज नहीं हैं। ट्रम्प ने हाल ही में नेटवर्क की कवरेज को लेकर नाराजगी जताई है। ट्रम्प ने रविवार को फॉक्स न्यूज के कार्यक्रम ‘फॉक्स एंड फ्रेंड्स’ पर उनकी रैलियों को पर्याप्त कवरेज नहीं देने का आरोप लगाया। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि उन्हें यह देखकर दुख हुआ कि शनिवार रात ओहायो में हुई उनकी बड़ी रैली की कवरेज नहीं की गई। ट्रम्प ने फॉक्स को चेतावनी देते हुए कहा कि नेटवर्क ने पहले भी ऐसा किया था और तब वह लगभग कारोबार से बाहर हो गया था। चुनाव से ठीक पहले ऐसा दोबारा हो सकता है। मीडिया से ट्रम्प का टकराव बढ़ा ट्रम्प का इन दिनों कई अमेरिकी मीडिया संस्थानो से टकराव बढ़ गया है। हाल में उन्होंने CNN, MS NOW और Politico को व्हाइट हाउस परिसर में आने से रोकने की कोशिश की। उन्होंने CNN को व्हाइट हाउस के ब्रॉडकास्ट पूल से भी बाहर रखने की कोशिश की। हालांकि, अमेरिकी फेडरल कोर्ट के जज टिमोथी जे. केली ने 24 सितंबर को इस आदेश के खिलाफ अस्थायी रोक जारी की थी। मीडिया संस्थानों ने अंतिम फैसला आने तक राहत की मांग की है। —————– यह खबर भी पढ़ें… अमेरिकी उपराष्ट्रपति बोले- हमलावर पायलट मुसीबत था:मालूम होने पर भी प्लेन क्यों उड़ाने दिया; ओमान बोला- किसी देश ने हमामी की जानकारी नहीं मांगी अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने सोमवार को कहा कि फ्लाईदुबई का को-पायलट हमाम अल-हमामी पहले से मुसीबत था। इसके बावजूद उसे पैसेंजर विमान उड़ाने की अनुमति कैसे मिली, यह सवाल उठता है। पूरी खबर पढ़ें…

फ्रांस में शिक्षकों की कमी को लेकर आंदोलन हिंसक हुआ:धमाके में 15 साल के छात्र का हाथ उड़ा; 5 हजार गिरफ्तार, 87% गिरफ्तार नाबालिग

फ्रांस में छात्र शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर सड़कों पर उतर गए हैं। सितंबर में शुरू हुआ यह आंदोलन अब पूरे देश में फैल गया है। छात्र स्कूलों में बढ़ती भीड़, जर्जर इमारतों और शिक्षकों की कमी का विरोध कर रहे हैं। पिछले एक हफ्ते में छात्रों ने सैकड़ों स्कूलों को बंद कराया है। आंदोलन के दौरान कई जगह छात्रों और पुलिस के बीच झड़प भी हुई है। लेंस शहर में एक स्कूल के पास हुए धमाके में 15 साल के एक छात्र का हाथ उड़ गया। उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया। इससे पहले पिछले हफ्ते 14 साल के ईडन नाम के छात्र के सिर पर आंसू गैस का गोला लगने की खबर सामने आई थी। उसके जबड़े में दो जगह फ्रैक्चर हुआ था और उसे बड़ी सर्जरी करानी पड़ी। प्रदर्शन के दौरान कम से कम 190 छात्र घायल हुए हैं, जबकि 5,060 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इनमें 87% नाबालिग हैं। मंगलवार को देशभर में सबसे बड़े प्रदर्शन का ऐलान यह आंदोलन सितंबर में पेरिस से शुरू हुआ था। शुरुआत हाई स्कूल के छात्रों ने की थी। बाद में विश्वविद्यालयों के छात्र भी इसमें शामिल हो गए। छात्रों की मुख्य शिकायतें स्कूलों की खराब व्यवस्था को लेकर हैं। उनका कहना है कि कई कक्षाओं में जरूरत से ज्यादा छात्र हैं, स्कूल की इमारतें जर्जर हैं और शिक्षकों की कमी है। इसी मांग को लेकर अब मंगलवार को देशभर में प्रदर्शन की तैयारी है। प्रमुख छात्र संगठन यूनियन सिंडिकेल लिसेन ने लोगों से आंदोलन में शामिल होने की अपील की है। शिक्षकों के संगठनों ने भी अपने सदस्यों से मंगलवार के प्रदर्शन में शामिल होने की अपील की है। 24 स्कूल जलाए, PM बोले- नरमी नहीं बरतेंगे फ्रांस के प्रधानमंत्री सेबास्तियन लेकोर्नू ने रविवार को छात्रों और शिक्षा कर्मचारियों की समस्याओं को दूर करने के लिए कई कदमों की घोषणा की थी। उन्होंने स्कूलों में बदलाव लाने का वादा किया। हालांकि, उन्होंने हिंसा के मामले में किसी तरह की नरमी से इनकार किया। उनका कहना था कि सरकार घायल छात्रों, स्कूल कर्मचारियों और पुलिसकर्मियों के साथ खड़ी है। प्रदर्शन के दौरान स्कूलों की नाकेबंदी के अलावा कई जगह कूड़ेदानों में आग लगाने की घटनाएं भी हुईं। शिक्षा मंत्री एडुआर जॉफ्रे के मुताबिक आंदोलन शुरू होने के बाद से 24 स्कूलों को जला दिया गया या उनमें तोड़फोड़ की गई। 21 सितंबर को छोटे से स्कूल से प्रदर्शन शुरू, देशभर में फैला आंदोलन की शुरुआत 21 सितंबर को पेरिस के स्कूल से शुरू हुआ था। उनकी मांग स्टाफ और संसाधनों की कमी दूर करने की थी। स्कूल में अतिरिक्त स्टाफ भेजे जाने के बाद हड़ताल खत्म हो गई। लेकिन तब तक आंदोलन फैल चुका था। छात्र नेता मानेस नडेल ने कहा, जब तक हड़ताल खत्म हुई तब तक बाकी जगहों पर आंदोलन शुरू हो गया था। इतनी बड़ी संख्या में स्कूल पहले कभी आंदोलन में शामिल नहीं हुए। शिक्षा मंत्रालय इस संकट से पूरी तरह घिर गया है।
स्कूलों में छात्र बढ़े, शिक्षक घटे राष्ट्रपति चुनाव पर भी असर इस आंदोलन ने राष्ट्रपति पद के लिए दक्षिणपंथ और वामपंथ के बीच होने वाली कड़ी लड़ाई की शुरुआत कर दी है। जनमत सर्वेक्षणों में मध्यमार्गी खेमे को नुकसान होता दिख रहा है। फ्रांस में छात्र आंदोलनों का इतिहास सरकारों के लिए अच्छा नहीं रहा है। मई 1968 का छात्र आंदोलन देश के इतिहास की सबसे बड़ी हड़ताल में बदल गया था।

‘रात 10 बजे भी हर महिला खुद को सुरक्षित महसूस करे’, दिल्ली-NCR में रेप की घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, पुलिस को दिए ये निर्देश

Supreme Court on rape case: दिल्ली-NCR में महिलाओं और नाबालिग बच्चियों के खिलाफ बढ़ते यौन अपराधों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (5 अक्तूबर) को सख्त रुख अपनाया। कोर्ट ने कहा कि उसका प्रयास यह सुनिश्चित करना है कि दिल्ली में हर महिला रात 10 बजे भी सड़क पर पैदल चलने, मेट्रो या सड़क के रास्ते सफर करने में खुद को सुरक्षित महसूस करे। शीर्ष अदालत ने साफ कहा कि महिला सुरक्षा सिर्फ कागजों पर बनाए गए नियमों और इंतजामों तक सीमित नहीं रह सकती, बल्कि इसका असर जमीन पर दिखाई देना चाहिए। दिल्ली-एनसीआर में दुष्कर्म की घटनाओं पर उच्चतम न्यायालय ने कहा कि ऐसा लगता है कि कुछ संवेदनशील इलाकों में महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह सुनिश्चित करना होगा कि हर महिला खुद को सुरक्षित महसूस करे। अदालत ने कहा कि अपराध होने के बाद कार्रवाई से ज्यादा जरूरी पहले अपराध को होने से रोकना है। साथ ही यह भी कहा कि खामियां अपराध को अंजाम देने में मददगार नहीं बननी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अपराध करने की प्रवृत्ति वाले असामाजिक तत्वों के मन में कानून का डर पैदा करना जरूरी है। अदालत ने दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में हाल में हुई दुष्कर्म की घटनाओं के संबंध में स्वत: संज्ञान वाले एक मामले की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की।

‘महिला रात 10 बजे भी खुद को सुरक्षित महसूस करे’

लाइव लॉ के मुताबिक, जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा, “हमें मिलकर काम करना होगा। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि दिल्ली-एनसीआर में हर महिला रात 10 बजे भी खुद को सुरक्षित महसूस करे, चाहे वह सड़क पर यात्रा कर रही हो या मेट्रो से।” पीठ ने कहा, “महत्वपूर्ण यह है कि अपराध को होने से रोका जाए, न कि अपराध हो जाने के बाद आप क्या कार्रवाई करते हैं।”

पीठ ने कहा कि पुलिस को उन गुंडों और असामाजिक तत्वों के मन में कानून का डर पैदा करना होगा, जिनमें इस तरह के अपराध करने की प्रवृत्ति है। ‘दिल्ली-एनसीआर में हाल में दुष्कर्म की घटनाएं’ नामक स्वत: संज्ञान वाले मामले की सुनवाई कर रही पीठ ने कहा, “दुष्कर्म ऐसा अपराध है, जिसे कोई भी समाज बिल्कुल स्वीकार नहीं कर सकता।”

सुप्रीम कोर्ट ने लिया स्वत: संज्ञान

सुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर को दिल्ली-एनसीआर में नाबालिग लड़कियों और महिलाओं के खिलाफ अपराधों से संबंधित खबरों का स्वत: संज्ञान लिया था। शीर्ष अदालत ने कहा था कि इस तरह के मामले कानून प्रवर्तन एजेंसियों की ओर से व्यवस्था की विफलता को दर्शाते हैं। शीर्ष अदालत ने दिल्ली के आस्था कुंज पार्क में 17 वर्षीय लड़की से कथित गैंगरेप, दिल्ली के स्वरूप नगर इलाके में एक किशोरी से सामूहिक दुष्कर्म और उसकी हत्या तथा चलती स्लीपर बस में एक नाबालिग लड़की के यौन उत्पीड़न के मामले का संज्ञान लिया था। स्लीपर बस ग्रेटर नोएडा से दिल्ली के बीच 47 किलोमीटर से अधिक की दूरी तय करती रही। लेकिन कानून लागू करने वाली एजेंसियां उसे रोकने में विफल रहीं।

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ब्राजील में राष्ट्रपति लूला हार सकते हैं चुनाव:पहले दौर में फ्लावियो बोल्सोनारो आगे; पिता जायर बोल्सोनारो 27 साल जेल की सजा काट रहे हैं

ब्राजील के राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा चुनाव हार सकते हैं। पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो के बेटे फ्लावियो बोल्सोनारो वोटिंग में उनसे आगे निकल गए हैं। किसी भी उम्मीदवार को 50% से ज्यादा वोट नहीं मिले, इसलिए अब ब्राजील में 25 अक्टूबर को दूसरे दौर की वोटिंग होगी। 2022 का चुनाव हारने के बाद तख्तापलट की साजिश के मामले में जायर बोल्सोनारो को करीब 27 साल की जेल की सजा मिली है। लूला को फ्लावियो से 2% कम वोट मिले पहले दौर में फ्लावियो बोल्सोनारो को करीब 47% वोट मिले, जबकि लूला को करीब 45% वोट मिले। चुनाव से पहले आए ज्यादातर सर्वे लूला को बढ़त दिखा रहे थे, लेकिन नतीजों ने तस्वीर बदल दी। अब दूसरे दौर में दोनों उम्मीदवार उन मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की कोशिश करेंगे, जिन्होंने पहले दौर में किसी दूसरे उम्मीदवार को वोट दिया था। फ्लावियो 2002 से राजनीति में सक्रिय हैं 45 वर्षीय फ्लावियो बोल्सोनारो ब्राजील के पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो के बड़े बेटे हैं। वह रियो डी जेनेरियो से सीनेटर हैं और 2002 से राजनीति में सक्रिय हैं। राजनीति में आने से पहले वह वकील और कारोबारी रहे हैं। 2026 के राष्ट्रपति चुनाव में वह बोल्सोनारो परिवार का चेहरा बनकर मैदान में उतरे हैं। उनके पिता जायर बोल्सोनारो जेल की सजा के कारण चुनाव नहीं लड़ सकते, इसलिए समर्थक फ्लावियो को उनका राजनीतिक उत्तराधिकारी मानते हैं। फ्लावियो बोल्सोनारो के पिता ट्रम्प के करीबी हैं फ्लावियो के पिता जायर बोल्सोनारो को ‘ब्राजील का ट्रम्प’ कहा जाता है। इसकी वजह दोनों नेताओं की राजनीति में कई समानताएं हैं। दोनों राष्ट्रवाद, सख्त कानून-व्यवस्था और पारंपरिक सामाजिक मूल्यों की बात करते हैं। दोनों ने सोशल मीडिया के जरिए बड़ी लोकप्रियता हासिल की है। 2020 में पहले ट्रम्प और फिर 2022 में जायर बोल्सोनारो ने चुनावी नतीजों पर सवाल उठाए थे। 2022 का राष्ट्रपति चुनाव हारने के बाद जायर बोल्सोनारो पर सत्ता में बने रहने की साजिश रचने का आरोप लगा था। ब्राजील की सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करने और तख्तापलट की कोशिश से जुड़े मामले में दोषी माना था। चौथी बार राष्ट्रपति बनने की कोशिश में 80 साल के लूला 80 वर्षीय लूला चौथी बार राष्ट्रपति बनने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने चुनाव प्रचार में अपने सामाजिक कल्याण और गरीबों के लिए किए गए काम को प्रमुख मुद्दा बनाया। हालांकि महंगाई, रोजमर्रा की चीजों की बढ़ती कीमतें और अपराध जैसे मुद्दों पर सरकार को आलोचना का सामना करना पड़ा है। विश्लेषकों का मानना है कि यही कारण है कि इस बार मुकाबला उम्मीद से ज्यादा कड़ा हो गया। संसद में भी मजबूत हुआ बोल्सोनारो खेमा राष्ट्रपति चुनाव के साथ हुए संसदीय चुनावों में भी दक्षिणपंथी दलों का प्रदर्शन मजबूत रहा। फ्लावियो की लिबरल पार्टी निचले सदन में सबसे बड़ी ताकत बनकर उभर रही है। पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो की पत्नी मिशेल बोल्सोनारो सीनेट पहुंच गई हैं। उनके बेटे कार्लोस बोल्सोनारो ने भी जीत दर्ज की है। इससे साफ है कि जायर बोल्सोनारो के चुनावी राजनीति से बाहर होने के बावजूद उनका राजनीतिक प्रभाव बरकरार है। ब्राजील में चुनाव पर अमेरिका और चीन की नजर ब्राजील लैटिन अमेरिका की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। साथ ही BRICS का संस्थापक सदस्य भी है। इसलिए इस चुनाव पर दुनिया की नजर है। लूला की जीत होने पर चीन और BRICS देशों के साथ मौजूदा साझेदारी जारी रहने की संभावना है। वहीं फ्लावियो बोल्सोनारो को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का करीबी माना जाता है। उनकी जीत की स्थिति में अमेरिका के साथ रिश्ते और मजबूत हो सकते हैं। ———————– यह खबर भी पढ़ें… अल-कायदा ने फ्लाईदुबई हमले के आरोपी की तारीफ की: कहा- जंग अभी खत्म नहीं हुई, अमेरिकी-इजराइली विमानों पर 9/11 जैसे हमले करो आतंकी संगठन अल-कायदा ने फ्लाईदुबई की फ्लाइट में भारतीय पायलट स्मित मच्छर पर हमला करने वाले ओमानी को-पायलट हमाम अल-हमामी की तारीफ की। पूरी खबर पढ़ें…