अल्बानिया में प्रदर्शनकारियों ने सुप्रीम कोर्ट के साथ क्या किया? जानिए ऐसा वहां क्या हुआ कि बवाल इस हद तक पहुंच गया

Albania Supreme Court Fire: भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और शिक्षा व्यवस्था की बदहाली से सुलग रहे अल्बानिया में अब गृहयुद्ध जैसे हालात हो गए है। राजधानी तिराना में पिछले कई दिनों से चल रहे सरकार विरोधी प्रदर्शन इतने हिंसक हो गए कि गुस्साई भीड़ ने सीधे देश के सुप्रीम कोर्ट के दफ्तरों को ही आग के हवाले कर दिया। आखिर क्यों भड़का है यूरोप के इस छोटे से देश में ऐसा जनसैलाब कि पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच जंग छिड़ गई है? आइए आपको बताते हैं इसकी असली वजह।

क्यों भड़का इतना बड़ा बवाल?

अल्बानिया में यह प्रदर्शन ‘फ्लेमिंगो’ नामक नागरिक और छात्र आंदोलन के बैनर तले हो रहा है। हाई स्कूल और यूनिवर्सिटी के छात्र सोशलिस्ट प्रधानमंत्री एडी रामा (Edi Rama) के इस्तीफे की मांग को लेकर लगातार सड़कों पर हैं।

यह पूरा विवाद तब और भड़क उठा जब सरकार ने एक ऐसे क्षेत्र में बड़े लक्जरी पर्यटन विकास की अनुमति दे दी, जो फ्लेमिंगो का प्राकृतिक आवास माना जाता है। इस प्रोजेक्ट के तार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दामाद जारेड कुशनर से जुड़े होने के कारण मामला और संवेदनशील हो गया।

भ्रष्टाचार, शिक्षा और महंगाई की मार

अल्बानिया के युवा देश में बढ़ती बेरोजगारी, चरम पर पहुंच चुके भ्रष्टाचार, और जर्जर होती सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था से निराश हैं। जनता का आरोप है कि सरकार आम नागरिकों की बुनियादी जरूरतों को नजरअंदाज कर रही है।

वैसे प्रधानमंत्री एडी रामा ने इन हिंसक प्रदर्शनों की कड़ी निंदा करते हुए कहा है कि प्रदर्शनकारियों को बाहरी तत्वों और वामपंथी उग्रवादी समूहों (एंटीफा) द्वारा वैचारिक रूप से कट्टर बनाया गया है।

लगातार छठे दिन भी जारी इस हिंसक संघर्ष ने अल्बानिया की सरकार के सामने गंभीर राजनीतिक संकट खड़ा कर दिया है, और सुरक्षा एजेंसियों के लिए इस जन-आक्रोश को संभालना बड़ी चुनौती बन गया है।

फ्रांस, इटली और स्पेन में भी भारी हिंसा और आगजनी

वैसे सिर्फ अल्बानिया ही नहीं है जो विरोध प्रदर्शनों की आग में झुलस रहा है। फ्रांस, इटली, स्पेन और पुर्तगाल की सड़कों पर भी जनसैलाब उमड़ पड़ा है, जिसने कई प्रमुख यूरोपीय शहरों को रणक्षेत्र में बदल दिया है।

फ्रांस में पिछले तीन हफ्तों से हाई स्कूल के छात्र शिक्षा संसाधनों की कमी के खिलाफ नाकाबंदी कर रहे थे, जो अब व्यापक महंगाई विरोधी आंदोलन बन चुका है। पेरिस, मार्सेली, ल्यों और लिमोगेस में भारी लूटपाट और हिंसा हुई। लिमोगेस में 19वीं सदी के सिटी हॉल में आग लगा दी गई।

राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने हिंसा की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि ‘जिन्होंने लूटपाट की है और गणतंत्र को गिराने की कोशिश की है, उन्हें जवाबदेह ठहराया जाएगा।’ अब तक 2,400 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है।

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस हिंसा के लिए प्रवासियों को जिम्मेदार ठहराते हुए लिखा, ‘माइग्रेंट्स ने फ्रांस पर कब्जा कर लिया है, उन्हें तुरंत सीमाएं बंद करनी चाहिए!’ वैसे फ्रांसीसी अधिकारियों ने इस हिंसा में प्रवासियों की भूमिका से इनकार किया है।

स्पेन की राजधानी मैड्रिड के ‘पुएर्ता डेल सोल’ स्क्वायर पर हफ्तों से सैकड़ों तंबू गड़े हुए हैं, जो घरों के आसमान छूते किरायों और बेदखली के खिलाफ विरोध जता रहे हैं। यह विरोध 87 वर्षीय मैरीकार्मेन की बेदखली के बाद अस्पताल में हुई मौत के बाद शुरू हुआ।

स्पेन में न्यूनतम वेतन 1,221 यूरो (~$1,370) है, जबकि 80 वर्ग मीटर के अपार्टमेंट का औसत किराया 1,130 यूरो (~$1,270) है। यानी युवा अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा केवल रहने पर खर्च कर रहे हैं। जनता के दबाव के कारण संसद में हाउसिंग बिल पास न होने पर प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज ने नवंबर में मध्यावधि चुनाव कराने की घोषणा की है।

इटली में महंगाई दर बढ़कर 4.2% पर पहुंच गई है। मिलान, ट्यूरिन और बोलोग्ना में हिंसक झड़पें हुईं। मिलान में पुलिस गाड़ियों पर वॉटर कैनन चलाए गए और 271 लोगों को गिरफ्तार किया गया जिनमें अधिकांश नाबालिग है। अब ’17 अक्टूबर आंदोलन’ ने हर शनिवार स्थायी प्रदर्शन का आह्वान किया है।

वहीं बाल्कन देश सर्बिया में पिछले दो सालों से भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन चला रहे छात्र आगामी चुनावों में पूर्व सत्तावादी नेता अलेक्जेंडर वुसिक की वापसी को चुनौती दे रहे हैं।

ट्रम्प बोले- पेरिस जल्द मुस्लिम शहर बन जाएगा:मैक्रों को 8 साल पहले चेताया था; फ्रांस में हिंसा के लिए इमिग्रेशन नीति को जिम्मेदार ठहराया

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सोमवार को कहा कि पेरिस जल्द मुस्लिम शहर बन जाएगा। उन्होंने फ्रांस में जारी हिंसा के लिए राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की इमिग्रेशन नीति को जिम्मेदार ठहराया। ट्रम्प लंबे समय से इमिग्रेशन पर सख्ती करने की वकालत करते रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि फ्रांस सरकार ने दूसरे देशों से आने वाले लोगों पर रोक लगाने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए। ट्रम्प ने दावा किया कि उन्होंने करीब 8 साल पहले मैक्रों को चेतावनी दी थी कि दूसरे देशों से आने वाले लोगों को इतनी बड़ी संख्या में फ्रांस में आने देना बड़ी गलती है। फ्रांस में महंगाई के खिलाफ प्रदर्शन में हिंसा और तोड़फोड़ फ्रांस के कई शहरों में 17 अक्टूबर को प्रदर्शन के दौरान हिंसक झड़पें हुई। इन घटनाओं में सरकारी इमारतों में आग लगाने, दुकानों में लूटपाट करने और ऐतिहासिक इमारतों को निशाना बनाने जैसी घटनाएं सामने आई हैं। फ्रांस की पुलिस ने 2400 से ज्यादा लोगों को हिरासत में लिया है। वहीं, हिंसा रोकने की कोशिश में करीब 1000 पुलिसकर्मी और सैना के जवान घायल हुए हैं। इसके बाद प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू ने सोमवार को सरकार की इमरजेंसी मीटिंग बुलाई। उन्होंने सोमवार शाम से पेरिस, लिली, नीस समेत कई शहरों में कर्फ्यू लगाने को कहा है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर जरूरत पड़ी तो देश में आपातकाल भी लगाया जा सकता है। एक्सपर्ट- हिंसा के पीछे सिर्फ इमिग्रेशन को वजह मानना सही नहीं ट्रम्प ने फ्रांस में हो रही हिंसा को दूसरे देशों से लोगों को आने देने की नीति से जोड़ा है। हालांकि, एक्सपर्ट्स के मुताबिक फ्रांस के हालात के पीछे महंगाई, रोजमर्रा की चीजों के बढ़ते दाम, आर्थिक परेशानियां, सरकारी सुविधाओं पर बढ़ता दबाव और युवाओं की नाराजगी जैसे मुद्दे भी हैं। फर्स्टपोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, दक्षिणपंथी नेता और कुछ टिप्पणीकार इमिग्रेशन पर सख्ती करने की मांग कर रहे हैं। हालांकि, हिंसा के लिए इमिग्रेशन कितना जिम्मेदार है, यह अलग सवाल है। मैक्रों बोले- तोड़फोड़ करने वालों को कीमत चुकानी होगी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने हिंसक प्रदर्शन के बाद रविवार को सख्त कार्रवाई का वादा किया। उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने तोड़फोड़ और लूटपाट की है, उन्हें इसकी कीमत चुकानी होगी। मैक्रों ने माना कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले लोगों की कुछ मांगें जायज हो सकती हैं। हालांकि, उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों की मांगों को हिंसा और तोड़फोड़ करने वालों की हरकतों के साथ नहीं जोड़ना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि फ्रांस के नागरिक अपने ही देश के खिलाफ ऐसी हरकतें कैसे कर सकते हैं। मैक्रों को देश का सबसे कमजोर राष्ट्रपति माना जा रहा फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों अपने राजनीतिक करियर के सबसे मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं। उनके विरोधी उन्हें अब तक का सबसे कमजोर राष्ट्रपति करार दे रहे हैं। हाल ही में हुए एक सर्वे में सिर्फ 15% लोगों ने उनके प्रति सकारात्मक राय जताई, जबकि 82% लोगों ने उनके कामकाज पर नाराजगी जताई। महंगाई, कमजोर अर्थव्यवस्था, बढ़ता सरकारी कर्ज और शिक्षा व दूसरी सरकारी सेवाओं को लेकर लोगों का गुस्सा बढ़ रहा है। गूगल पर ट्रेंड कर रहा फ्रांस प्रोटेस्ट ———————— यह खबर भी पढ़ें… फ्रांस में बार-बार क्यों भड़कते हैं प्रदर्शन: पेंशन से लेकर महंगाई तक, आंदोलन के पीछे 5 बड़ी वजहें समझिए फ्रांस दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। यहां आधुनिक शहर हैं और शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी सरकारी सुविधाओं का बड़ा तंत्र है। इसके बावजूद, सरकार के फैसलों को लेकर यहां बार-बार बड़े आंदोलन होते हैं। पूरी खबर पढ़ें…

ऑस्ट्रेलिया की महिला सांसद हेलेन को कार से कुचला:ऑफिस के बाहर मारी टक्कर, हालत गंभीर; 43 साल का आरोपी ड्राइवर गिरफ्तार

ऑस्ट्रेलिया में निर्दलीय महिला सांसद हेलेन हेन्स को सोमवार को उनकी ऑफिस के बाहर कार से कुचल दिया गया। 65 साल की हेन्स की हालत गंभीर है। उन्हें एयरलिफ्ट कर अस्पताल पहुंचाया गया। घटना विक्टोरिया राज्य के वांगाराटा शहर में हुई। यह मेलबर्न से करीब तीन घंटे की दूरी पर है। पुलिस के मुताबिक, हेन्स अपने चुनाव क्षेत्र की ऑफिस के बाहर थीं, तभी टोयोटा लैंड क्रूजर SUV ने उन्हें टक्कर मार दी। पुलिस ने 43 साल के आरोपी ड्राइवर को गिरफ्तार किया है। पुलिस को शक है कि सांसद को जानबूझकर निशाना बनाया गया। मामले की जांच की जा रही है। आरोपी की कार के अंदर से एक चाकू भी बरामद किया गया है। PM अल्बनीज बोले- हमले की वजह अभी साफ नहीं प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने कहा कि अभी हमले के पीछे की वजह बताना जल्दबाजी होगी। उन्होंने बताया कि गिरफ्तार आरोपी की जांच में आतंकवाद निरोधक टीम भी शामिल होगी। विक्टोरिया पुलिस के कार्यवाहक सुपरिटेंडेंट एश्ले मेसन ने कहा कि फिलहाल आम लोगों के लिए कोई अतिरिक्त खतरा नहीं है। हेलेन पर बात करते हुए भावुक हुए PM अल्बनीज PM अल्बनीज हेलेन के बारे में बात करते हुए भावुक भी हो गए। ABC के लाइव टीवी कार्यक्रम ‘730’ में इंटरव्यू के दौरान उनकी आंखें नम हो गईं। उनसे पूछा गया था कि क्या वह और उनके साथी सांसद आपस में मिलने वाली धमकियों और सुरक्षा से जुड़े खतरों पर चर्चा करते हैं। इस पर अल्बनीज ने कहा कि फिलहाल उन्हें अपने एक साथी की चिंता है। अल्बनीज ने हेलेन को ईमानदार और अपने समुदाय के लिए समर्पित बताया। उन्होंने कहा कि हेलेन अपने क्षेत्र के लोगों की जरूरतों को लेकर खुलकर अपनी राय रखती हैं। अल्बनीज ने कहा कि वह ऐसा राजनीतिक माहौल नहीं देखना चाहते, जिसमें जनप्रतिनिधि सुपरमार्केट, सड़कों या सार्वजनिक बैठकों में लोगों से बातचीत करने से डरें। परिवार ने हेलेन की मदद करने वालों का आभार जताया हेलेन हेन्स के परिवार ने उनके फेसबुक पेज पर जारी बयान में राहगीरों, स्वास्थ्यकर्मियों और पुलिस का आभार जताया। परिवार ने कहा कि लोगों ने तुरंत मदद की और स्वास्थ्यकर्मियों ने सांसद को बचाने के लिए प्रयास किए। हेलेन हेन्स 2019 में पहली बार ऑस्ट्रेलिया की संसद के लिए चुनी गई थीं। वह निर्दलीय सांसद हैं। ——————— ये खबर भी पढ़ें… फ्रांसीसी राष्ट्रपति बोले- तोड़फोड़ करने वालों को कीमत चुकानी होगी:गृहमंत्री का इस्तीफा मंजूर नहीं किया, PM लेकोर्नू ने इमरजेंसी मीटिंग बुलाई फ्रांस में 17 अक्टूबर को हुई हिंसा और लूटपाट को लेकर राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने रविवार को सख्त कार्रवाई का वादा किया। उन्होंने रविवार रात अपने संबोधन में कहा कि जिन लोगों ने तोड़फोड़ और लूटपाट की है, उन्हें इसकी कीमत चुकानी होगी। पूरी खबर यहां पढ़ें…

फ्रांसीसी राष्ट्रपति बोले- तोड़फोड़ करने वालों को कीमत चुकानी होगी:गृहमंत्री का इस्तीफा मंजूर नहीं किया, PM लेकोर्नू ने इमरजेंसी मीटिंग बुलाई

फ्रांस में 17 अक्टूबर को हुई हिंसा और लूटपाट को लेकर राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने रविवार को सख्त कार्रवाई का वादा किया। उन्होंने रविवार रात अपने संबोधन में कहा कि जिन लोगों ने तोड़फोड़ और लूटपाट की है, उन्हें इसकी कीमत चुकानी होगी। मैक्रों ने गृहमंत्री लॉरेंट नुनेज का इस्तीफा भी नामंजूर कर दिया। मैक्रों ने नुनेज से कहा कि वे सड़कों को सुरक्षित बनाने के लिए कदम उठाएं। इस बीच प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू ने सोमवार को सरकार की इमरजेंसी मीटिंग बुलाई है। इसमें हिंसा की घटनाओं और उनसे निपटने के तरीकों पर चर्चा होगी। 1500 दुकानों में लूटपाट, 1000 पुलिकर्मी घायल महंगाई और सरकारी सुविधाओं में कमी के खिलाफ शनिवार को 8 लाख से ज्यादा लोग सड़कों पर उतरे थे। शुरुआत में हालात शांतिपूर्ण थे लेकिन बाद में काले कपड़े पहने और चेहरे ढके कुछ लोगों ने तोड़फोड़ और लूटपाट शुरू कर दी। अनुमान है कि करीब 1,500 दुकानों और कारोबारों में लूटपाट की गई या उन्हें नुकसान पहुंचाया गया। हालात संभालने के लिए पुलिस ने आंसू गैस छोड़ी और भीड़ पर पानी की बौछारें कीं। गृह मंत्रालय के मुताबिक, शनिवार को करीब 1000 पुलिसकर्मी घायल हुए। इनमें सात की हालत गंभीर थी। गृह मंत्री नुनेज पर आरोप लग रहे हैं कि वे पहले से तय प्रदर्शनों के लिए पर्याप्त तैयारी नहीं कर पाए। मैक्रों को देश का सबसे कमजोर राष्ट्रपति माना जा रहा हिंसा के बाद खबरें सामने आई कि मैक्रों कुछ इलाकों में कर्फ्यू लगा सकते हैं या आपातकाल घोषित कर सकते हैं। लेकिन उन्होंने रविवार को टीवी पर देश को संबोधित किया। उन्होंने हिंसा के लिए कट्टर वामपंथी समूहों और उपद्रवियों को जिम्मेदार ठहराया। मैक्रों ने लोगों से एकजुट रहने की अपील की और भरोसा दिलाया कि हिंसा करने वालों को सजा मिलेगी। हालांकि, फ्रांस के मीडिया ने उनके भाषण की आलोचना की। उनका कहना है कि मैक्रों ने यह साफ नहीं किया कि सरकार आगे क्या कदम उठाएगी। लूटपाट और तोड़फोड़ करने वालों पर कार्रवाई कैसे होगी, शहरों को दोबारा ऐसी घटनाओं से कैसे बचाया जाएगा, जिन दुकानदारों का नुकसान हुआ है, उन्हें मुआवजा कैसे मिलेगा। संसद तीन गुटों में बंटी, कोई भी फैसला लेना आसान नहीं फ्रांस की संसद तीन बड़े राजनीतिक गुटों में बंटी हुई है। इनके बीच इतने मतभेद हैं कि संसद का कामकाज प्रभावित हो रहा है। ऐसे माहौल में सरकार के लिए कोई बड़ा फैसला लेना आसान नहीं है। राष्ट्रपति मैक्रों का कार्यकाल खत्म होने वाला है। अप्रैल 2027 में राष्ट्रपति चुनाव होना है। ऐसे में देश में राजनीतिक खींचतान भी बढ़ गई है। राष्ट्रपति पद के लिए मुकाबले की तैयारी कर रहे नेताओं में दक्षिणपंथी नेता मरीन ले पेन और वामपंथी नेता जीन-ल्यूक मेलांशों भी शामिल हैं। ले पेन प्रवासियों के खिलाफ सख्त रुख के लिए जानी जाती हैं, जबकि मेलांशों पूंजीवाद के विरोधी हैं। दोनों नेता मौजूदा हालात में अपनी बात लोगों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। फ्रांस पर कर्ज का दबाव भी बढ़ रहा फ्रांस की सरकार के सामने आर्थिक मुश्किलें भी हैं। देश पर बढ़ते सरकारी कर्ज को काबू में करने के लिए निवेशक सरकार पर दबाव डाल रहे हैं। लेकिन सरकार को डर है कि अगर उसने सरकारी सुविधाओं या कल्याणकारी योजनाओं में कटौती की, तो और ज्यादा लोग नाराज होकर सड़कों पर उतर सकते हैं। देश में लोग पूछ रहे हैं कि अब आगे क्या होगा और क्या फ्रांस की व्यवस्था टूटने की कगार पर पहुंच गई है। शनिवार को हुई हिंसा ने लोगों को डरा दिया है। ————————— यह खबर भी पढ़ें… फ्रांस में बार-बार क्यों भड़कते हैं प्रदर्शन:पेंशन से लेकर महंगाई तक, आंदोलन के पीछे 5 बड़ी वजहें समझिए फ्रांस दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। यहां आधुनिक शहर हैं और शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी सरकारी सुविधाओं का बड़ा तंत्र है। इसके बावजूद, सरकार के फैसलों को लेकर यहां बार-बार बड़े आंदोलन होते हैं। पूरी खबर पढ़ें…

फ्रांस में महंगाई पर भड़की हिंसा : राष्ट्रपति मैक्रों ने शांति की अपील की

फ्रांस में बढ़ती महंगाई, शिक्षा बजट में कटौती और चरमराती सार्वजनिक सेवाओं के खिलाफ जारी देशव्यापी प्रदर्शनों के दाैरान हिंसक दंगों, लूटपाट की घटनाओं को रोकने के लिए राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने ‘शांति और व्यवस्था’ बनाए रखने की अपील की है।

राष्ट्रपति कार्यालय (एलिसी पैलेस) से राष्ट्र के नाम दिए टीवी संबोधन में श्री मैक्रों ने प्रदर्शनकारियों से स्थिति को और न बिगड़ने देने का आग्रह किया। उन्होंने कहा, “हम सभी गुस्सा और शर्मिंदगी महसूस कर रहे हैं।” उन्होंने जोर देकर कहा कि प्रदर्शनकारियों की ‘जायज मांगों’ और तोड़फोड़ व लूटपाट के जिम्मेदार उपद्रवियों के बीच स्पष्ट फर्क किया जाना चाहिए।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, शनिवार को पूरे फ्रांस में 5,50,000 से अधिक लोग सड़कों पर उतरे। अधिकतर प्रदर्शन हालांकि शांतिपूर्ण रहे, लेकिन रात ढलते ही कई शहरों में हिंसा भड़क उठी। सप्ताहांत के दौरान पुलिस ने 2,000 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया। वहीं गृह मंत्रालय ने यह संख्या लगभग 2,400 बताई है।

पेरिस, मार्सिले, ल्योन और लिमोगेस में नकाबपोश समूहों ने दुकानों में तोड़फोड़ की, गाड़ियों में आग लगा दी और सरकारी इमारतों को नुकसान पहुंचाया। लिमोगेस में आग लगने के कारण 143 वर्ष पुराने टाउन हॉल का गुंबद ढह गया। रविवार को भी पेरिस के कुछ हिस्सों में झड़पें जारी रहने पर भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े।

श्री मैक्रों ने इस हिंसा की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि ऐसी तबाही को ‘किसी भी सूरत में जायज नहीं ठहराया जा सकता’। उन्होंने वादा किया कि उपद्रवियों को सख्त सजा दी जाएगी। इसके साथ ही उन्होंने जनता की शिकायतों के समाधान के लिए इस सप्ताह ठोस उपायों पर बैठकों की प्रतिबद्धता जताई।

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यह विरोध प्रदर्शन सितंबर में पेरिस के उपनगरीय इलाकों के विद्यालयों में शिक्षकों और छात्रों की हड़ताल से शुरू हुआ था, जो कर्मी बढ़ाने और बेहतर संसाधनों की मांग कर रहे थे। बाद में कक्षाओं में भीड़, कर्मचारियों की कमी, महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक असमानता को लेकर यह आंदोलन पूरे देश में फैल गया।

वायरल वीडियो में एक पुलिसकर्मी द्वारा छात्रा को प्रतिबंधित तरीके से गर्दन से दबोचने की घटना सामने आते ही जन आक्रोश और भड़क गया। पुलिस पर बेतहाशा बल प्रयोग का आरोप लगाते हुए बड़ी संख्या में लोग प्रदर्शन में कूद पड़े। इस अशांति ने मैक्रों सरकार को भारी राजनीतिक दबाव में ला खड़ा किया है। विरोधी सवाल उठा रहे हैं कि क्या प्रशासन प्रदर्शन के इतने बड़े पैमाने का अंदाजा लगाने में पूरी तरह नाकाम रहा। स्थिति पर चर्चा के लिए प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू सोमवार को कैबिनेट की आपात बैठक करने वाले थे।

घटनाक्रम पर राजनीतिक नेताओं की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आई हैं। दक्षिणपंथी नेता मरीन ले पेन ने वामपंथियों पर जन आक्रोश का फायदा उठाने का आरोप लगाया, वहीं वामपंथी नेता ज्यां-ल्यूक मेलेनचोन ने छात्रों के विरोध प्रदर्शन के अधिकार का बचाव किया। आगे उपद्रव की आशंका के मद्देनजर मार्सिले प्रशासन ने सभाओं पर पाबंदी लगा दी है।

फ्रांस का यह आंदोलन बढ़ती महंगाई, मकानों की किल्लत और बदहाल सार्वजनिक सेवाओं को लेकर पूरे यूरोप में पनप रहे असंतोष का हिस्सा है। बेल्जियम, पुर्तगाल, इटली और अल्बानिया में भी ऐसे ही आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर विरोध प्रदर्शन दर्ज किए गए हैं।

इस स्थिति ने फ्रांस सरकार के लिए कानून-व्यवस्था बहाल करने के साथ-साथ प्रदर्शनों के पीछे की बुनियादी आर्थिक और सामाजिक समस्याओं को सुलझाने की बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।

Pic Credit : UNI

यूरोप के 6 देशों में शिक्षा-महंगाई पर प्रदर्शन:फ्रांस में 1800 लोग गिरफ्तार, स्पेन में घर खरीदना मुश्किल, ग्रीस में 10 साल में किराया 3 गुना

यूरोप के 6 देशों में पढ़ाई का बढ़ता खर्च, महंगाई, बेरोजगारी और महंगे घरों के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं। फ्रांस में स्कूलों की खराब हालत और शिक्षकों की कमी के हिंसक विरोध में अब तक 1800 लोग गिरफ्तार हुए हैं। स्पेन में घर खरीदना तो दूर, किराया चुकाना भी मुश्किल हो गया है। वहीं, ग्रीस में 10 साल में किराया 3 गुना बढ़ चुका है। बेल्जियम, इटली और अल्बानिया में भी छात्र शिक्षा पर खर्च बढ़ाने, रोजगार और बेहतर सुविधाओं की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे हैं। फ्रांस: 140 शहरों में 8 लाख लोग सड़कों पर उतरे फ्रांस में स्कूलों की खराब हालत, शिक्षकों की कमी और बढ़ती महंगाई के विरोध में 17 अक्टूबर को 140 शहरों में प्रदर्शन हुए। करीब 8 लाख लोग सड़कों पर उतरे। इसमें छात्र संगठनों के साथ ट्रेड यूनियन और कर्मचारी भी शामिल थे। पेरिस, मार्सेई और बोर्डो समेत कई शहरों में तोड़फोड़ और लूटपाट हुई। लीमोज में 143 साल पुराने ऐतिहासिक सिटी हॉल में आग लगा दी गई और कई गाड़ियों को जला दिया गया। 18 अक्टूबर तक करीब 1800 लोगों को गिरफ्तार किया गया। वहीं, 500 से ज्यादा पुलिसकर्मियों, सुरक्षाकर्मियों और दमकलकर्मियों के घायल होने की खबर है। प्रधानमंत्री सेबास्टियन लेकोर्नू और राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने हिंसा की निंदा की है। सरकार का कहना है कि कुछ हिंसक समूहों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन का फायदा उठाया। इटली: स्कूलों की हालत पर 30 अक्टूबर को हड़ताल का ऐलान इटली में छात्र शिक्षा पर कम सरकारी खर्च, जर्जर स्कूलों और पढ़ाई के बढ़ते खर्च के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। रोम और ट्यूरिन समेत कई शहरों में छात्रों ने स्कूलों पर कब्जा कर लिया। 16 अक्टूबर को रोम में हजारों छात्र शिक्षा मंत्रालय की ओर मार्च करते हुए पहुंचे। उन्होंने शिक्षा मंत्री ग्यूसेपे वाल्दितारा के फैसलों का विरोध किया। इससे पहले हुए प्रदर्शनों में पुलिस के साथ झड़प और पथराव की घटनाएं भी हुई थीं। अब छात्र संगठन इस आंदोलन से कर्मचारियों को भी जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों ने 30 अक्टूबर को देशव्यापी हड़ताल का ऐलान किया है। छात्रों की मांग है कि शिक्षा पर सरकारी खर्च बढ़ाया जाए, स्कूलों की हालत सुधारी जाए और सस्ते हॉस्टल उपलब्ध कराए जाएं। स्पेन: बढ़ते किराए के खिलाफ प्रदर्शन स्पेन में महंगे घरों और बढ़ते किराए के खिलाफ आंदोलन कई शहरों में फैल गया है। राजधानी मैड्रिड के सोल चौक पर प्रदर्शनकारी कई दिनों से टेंट लगाकर बैठे हैं। सितंबर के आखिर में 87 साल की एक बुजुर्ग महिला को किराया बढ़ने के कारण घर से निकाल दिया गया था। इसके बाद आंदोलन तेज हो गया। प्रदर्शनकारी किराए पर नियंत्रण लगाने, लोगों को घरों से निकालने पर रोक लगाने और सस्ते सरकारी मकान बनाने की मांग कर रहे हैं। किराएदारों के संगठन और आवास अधिकारों के लिए काम करने वाले समूह आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं। मैड्रिड के अलावा दूसरे शहरों में भी रैलियां निकाली गई हैं। प्रधानमंत्री पेद्रो सांचेज की सरकार ने आवास संकट दूर करने के लिए कदम उठाने की बात कही है, लेकिन प्रस्तावित उपायों पर राजनीतिक सहमति नहीं बन पाई है। इस बीच, 29 नवंबर को समय से पहले चुनाव कराने का ऐलान भी किया गया है। ग्रीस: हॉस्टल की कमी के खिलाफ टेंट लगाकर प्रदर्शन ग्रीस की राजधानी एथेंस में छात्रों ने संसद के सामने टेंट लगाकर प्रदर्शन किया। छात्र हॉस्टल की कमी, महंगे किराए और पढ़ाई के बढ़ते खर्च से परेशान हैं। छात्र संगठनों के मुताबिक, देश में बहुत कम छात्रों को हॉस्टल मिल पाते हैं। करीब 96% छात्रों को हॉस्टल की सुविधा नहीं मिलती, जबकि पिछले 10 साल में कमरों का किराया तीन गुना हो गया है। कुछ छोटे कमरों का मासिक किराया 600 यूरो तक पहुंच गया है। प्रदर्शनकारी किराए की सीमा तय करने, सरकारी हॉस्टल बनाने, स्कॉलरशिप बढ़ाने और यूनिवर्सिटीज का बजट बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। आंदोलन का नेतृत्व छात्र संगठन कर रहे हैं। बेल्जियम: शिक्षा बजट में कटौती के खिलाफ गुस्सा बेल्जियम की राजधानी ब्रुसेल्स में शिक्षा बजट में कटौती और सुधारों के विरोध में छात्रों ने मार्च निकाला। इस दौरान कुछ प्रदर्शनकारियों ने तोड़फोड़ की और पुलिस पर चीजें फेंकीं। जवाब में पुलिस ने आंसू गैस छोड़ी और पानी की बौछारों का इस्तेमाल किया। 18 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदर्शन के दौरान 150 लोगों को गिरफ्तार किया गया। पांच पुलिसकर्मियों को मामूली चोटें आईं। प्रदर्शन का नेतृत्व छात्र संगठन कर रहे हैं। सरकार ने हिंसा की निंदा की है और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की बात कही है। अल्बानिया: प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग अल्बानिया की राजधानी तिराना में महंगी पढ़ाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और यूनिवर्सिटीज की खराब हालत के खिलाफ छात्रों का आंदोलन तेज हो गया है। हजारों युवा 15 अक्टूबर को शिक्षा मंत्रालय के बाहर जुटे और प्रधानमंत्री एदी रामा के इस्तीफे की मांग की। प्रदर्शन के दौरान कुछ लोगों ने पुलिस पर पथराव किया। सरकारी इमारतों और बैंकों में भी आग लगा दी गई। पांच दिन से चल रहे आंदोलन में 167 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इस दौरान कई पुलिसकर्मी और प्रदर्शनकारी घायल हुए है। आंदोलन में छात्र संगठनों के अलावा सरकार से नाराज दूसरे लोग भी शामिल हैं। प्रधानमंत्री रामा ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया है। उन्होंने छात्रों से बातचीत की पेशकश की, लेकिन तोड़फोड़ करने वालों पर कार्रवाई की बात भी कही। उनका कहना है कि हिंसा से अल्बानिया के यूरोपीय संघ में शामिल होने की कोशिश को नुकसान पहुंच सकता है। ———————— यह खबर भी पढ़ें… फ्रांस में बार-बार क्यों भड़कते हैं प्रदर्शन: पेंशन से लेकर महंगाई तक, सरकार के फैसलों पर सड़कों पर उतर आते हैं लोग फ्रांस में स्कूलों की खराब हालत को लेकर शुरू हुआ छात्र आंदोलन अब महंगाई और ईंधन की बढ़ती कीमतों के खिलाफ बड़े विरोध में बदल गया है। पूरी खबर पढ़ें…

फ्रांस में महंगाई के खिलाफ येलो वेस्ट आंदोलन शुरू:प्रदर्शनकारियों और पुलिस में हिंसक झड़प; राजधानी पेरिस में 25 मेट्रो स्टेशन बंद किए गए

फ्रांस में बढ़ती महंगाई और छात्रों पर पुलिस कार्रवाई के विरोध में शनिवार को हजारों लोग सड़कों पर उतर आए हैं। आंदोलन में छात्र, शिक्षक, मजदूर, किसान और बुजुर्ग शामिल हैं। कुछ जगहों पर प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हिंसक झड़पें हुई हैं। देशभर में सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार किया गया है। अधिकारियों ने हिंसा के लिए वामपंथी समूहों को जिम्मेदार ठहराया है। पुलिस ने राजधानी पेरिस में करीब 25 मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए हैं। इनमें राष्ट्रपति भवन, संसद व सरकारी कार्यालयों के आसपास के स्टेशन शामिल हैं। फ्रांस में प्रदर्शन से जुड़ीं 10 फोटोज… पुलिस से टकराव की 4 तस्वीरें आगजनी की 4 तस्वीरें… प्रतीकात्मक विरोध की 2 तस्वीरें स्कूलों से शुरू हुआ आंदोलन देशभर में फैला इस आंदोलन की शुरुआत पिछले महीने पेरिस के उत्तरी बाहरी इलाकों के स्कूलों में हुई थी। वहां शिक्षकों की गैरमौजूदगी और स्कूलों की खराब हालत को लेकर छात्रों में नाराजगी थी। धीरे-धीरे यह विरोध पूरे देश में फैल गया। अब इसमें सामाजिक असमानता, सरकारी खर्च में कमी और सार्वजनिक सेवाओं की खराब स्थिति जैसे मुद्दे भी शामिल हो गए हैं। फ्रांस की प्रमुख मजदूर यूनियनों में शामिल सीजीटी ने भी प्रदर्शन का समर्थन किया। यूनियन ने ज्यादा वेतन और पेंशन, कम कीमतों और लोगों की जरूरतें पूरी करने वाली सार्वजनिक सेवाओं की सुरक्षा की मांग की। प्रदर्शनकारियों की 4 अहम मांगें… 2018 के ‘येलो वेस्ट’ आंदोलन को दोहराने की अपील प्रदर्शन से पहले सोशल मीडिया पर लोगों से 2018 के ‘येलो वेस्ट’ आंदोलन को दोबारा शुरू करने की अपील की गई थी। इस आंदोलन में लोग पीले रंग की चमकदार जैकेट पहनकर सड़कों पर उतरते थे। फ्रांस में गाड़ियों के ड्राइवरों के लिए ऐसी जैकेट रखना जरूरी होता है, ताकि सड़क पर गाड़ी खराब होने या किसी आपात स्थिति में वे दूर से दिखाई दे सकें। प्रदर्शनकारियों ने इसी जैकेट को विरोध का प्रतीक बना लिया। इसलिए इस आंदोलन को फ्रेंच भाषा में ‘गिले जॉन’ और हिंदी में ‘येलो वेस्ट’ यानी ‘पीली जैकेट वाला आंदोलन’ कहा जाने लगा। मैक्रों ने शांति बनाए रखने की अपील की राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने शुक्रवार को लोगों से शांति बनाए रखने और सार्वजनिक व निजी संपत्ति का सम्मान करने की अपील की थी। उन्होंने कहा कि प्रदर्शन करना और अपनी बात रखना संवैधानिक अधिकार है, लेकिन इसके साथ दूसरों का सम्मान करना भी जरूरी है।

यूरोप में युवाओं पर बुजुर्ग भारी पड़ रहे:पेंशन पर सरकारी खजाना खर्च; Gen Z नौकरी-घर और अच्छी शिक्षा मांग रहे

पिछले कुछ सालों में Gen Z यानी युवा पीढ़ी एक बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर उभरी है। बांग्लादेश, नेपाल, पेरू और मेडागास्कर में युवाओं के प्रदर्शनों ने सरकारें गिरा दीं। भारत में भी कई प्रदर्शनों में युवाओं की अहम भूमिका रही है। अब यूरोप में भी युवा अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतर रहे हैं। फ्रांस में स्कूलों की बदहाली, स्पेन में बेरोजगारी और ब्रिटेन में पेंशन नीतियों को लेकर नाराजगी है। युवाओं के लिए नौकरी पाना, अच्छी शिक्षा हासिल करना और सस्ता घर खरीदना मुश्किल होता जा रहा है। यूरोप में इस मुश्किल ने युवाओं और बुजुर्गों के बीच आर्थिक और राजनीतिक टकराव बढ़ा दिया है। बुजुर्गों की आबादी बढ़ने के साथ राजनीति में उनका प्रभाव भी मजबूत हुआ है। वहीं, युवाओं की संख्या घट रही है। ऐसे में उनके लिए अपनी मांगों को लेकर सरकार पर दबाव बनाना और मुश्किल हो रहा है। फ्रांस: युवाओं को स्कूलों के लिए पैसा चाहिए, बुजुर्गों को पेंशन फ्रांस में युवाओं के सामने नौकरी की कमी है। बेरोजगारी 20% पहुंच चुकी है। इस साल दूसरी तिमाही में अर्थव्यवस्था की ग्रोथ शून्य रही। दूसरी तरफ, सरकार के कुल खर्च का करीब 25% पेंशन पर जाता है। यानी बजट का बड़ा हिस्सा बुजुर्गों की पेंशन में खर्च हो रहा है। कुछ साल पहले राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने रिटायरमेंट की उम्र 62 से बढ़ाकर 64 साल करने का फैसला किया था। इसके खिलाफ देशभर में प्रदर्शन हुए और सरकार को फैसला निलंबित करना पड़ा। अब पक्ष हो या विपक्ष कोई भी पेंशन में कटौती को लेकर चर्चा भी नहीं करता। युवा चाहते हैं कि स्कूलों की हालत सुधरे और शिक्षा पर ज्यादा पैसा खर्च हो। वामपंथी नेताओं का तर्क है कि पेंशन बचाते हुए शिक्षा का बजट भी बढ़ाया जा सकता है। लेकिन सवाल है कि पैसा आएगा कहां से? फ्रांस पर पहले से भारी कर्ज है, और अमीरों पर ज्यादा टैक्स लगाने से भी सरकार को खास कमाई नहीं हुई है। ऐसे में दोनों वर्गों की मांगें पूरी करना सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। स्पेन: युवाओं के लिए घर खरीदना मुश्किल स्पेन में भी यही समस्या दिख रही है। वहां घरों की कमी और बढ़ते किराए को लेकर हाल में प्रदर्शन हुए। स्पेन में युवाओं की बेरोजगारी 22% से ज्यादा है और घरों की कीमतें वेतन के मुकाबले कहीं तेजी से बढ़ी हैं। नतीजा यह है कि कई युवा 30 साल की उम्र पार करने के बाद भी माता-पिता के साथ रहने को मजबूर हैं। जो अलग रहते हैं, उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा किराए में चला जाता है। ऐसे में बचत करना और अपना घर खरीदना मुश्किल है। दूसरी ओर, जिन बुजुर्गों के पास पहले से घर हैं, उन्हें बढ़ती कीमतों का फायदा मिल सकता है। उनकी संपत्ति की कीमत बढ़ रही है, जबकि युवाओं के लिए घर खरीदना और मुश्किल होता जा रहा है। यही अंतर दोनों पीढ़ियों के बीच तनाव बढ़ा रहा है। ब्रिटेन में पेंशन पर खर्च को लेकर बहस ब्रिटेन में भी युवा बेरोजगारी और महंगे मकानों से परेशान हैं। युवाओं में बेरोजगारी करीब 16% है। खासकर लंदन और उसके आसपास घरों का किराया बहुत ज्यादा है। मुश्किल यह है कि रोजगार के नए मौके भी ज्यादातर इन्हीं इलाकों में पैदा होते हैं। ऐसे में युवाओं के लिए नौकरी मिलने के बाद भी घर का खर्च उठाना आसान नहीं है। ब्रिटेन में बुजुर्गों की पेंशन बढ़ाने के लिए ‘ट्रिपल लॉक’ नाम की व्यवस्था है। इसके तहत पेंशन हर साल महंगाई, औसत वेतन में बढ़ोतरी या 2.5% में से जो भी ज्यादा हो, उतनी बढ़ाई जाती है। इससे बुजुर्गों की पेंशन घटने के बजाय बढ़ती रहती है। सरकार अगर पेंशन पर खर्च कम करने की कोशिश करती है, तो उसे राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ सकता है।प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ने एक लोकल चुनाव से पहले इस व्यवस्था में बदलाव करने की बात कही थी। हालांकि विरोधी नेताओं ने इसे महज चुनावी जुमला बताया। उनका कहना है कि अगर वे ऐसा करते हैं तो ये उनके लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। युवाओं पर बुजुर्गों का पलड़ा भारी क्यों? राजनीतिक पकड़ मजबूत होना: बुजुर्गों की राजनीतिक दलों और ट्रेड यूनियनों में अच्छी पकड़ है। वे चुनाव में भी अहम भूमिका निभाते हैं। इसलिए नेताओं के लिए उनकी मांगों को नजरअंदाज करना मुश्किल होता है। पेंशन का फायदा पूरे परिवार को मिलना: कई युवा नौकरी या कमाई के बावजूद अपने माता-पिता के साथ रहते हैं। ऐसे परिवारों में बुजुर्गों की पेंशन घर का खर्च चलाने में मदद करती है। अगर सरकार पेंशन घटाती है, तो इसका असर पूरे परिवार पर पड़ सकता है। कामकाजी लोगों को यह चिंता भी रहती है कि पेंशन कम होने पर माता-पिता के खर्च की जिम्मेदारी उन पर बढ़ जाएगी। पेंशन को अपने भविष्य से जोड़कर देखना: युवाओं को लगता है कि आज बुजुर्गों को पेंशन मिलेगी, तो भविष्य में उन्हें भी इसका फायदा मिल सकता है। इसलिए वे पेंशन व्यवस्था के खिलाफ खुलकर नहीं बोलते हैं। इसके उलट, बुजुर्गों को शिक्षा पर ज्यादा सरकारी पैसा खर्च करने के लिए मनाना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि इसका सीधा फायदा उन्हें नहीं मिलता। यही वजह है कि पेंशन पर खर्च घटाने और शिक्षा जैसी सेवाओं पर खर्च बढ़ाने के बीच सहमति बनाना आसान नहीं है। ——————————— ये खबर भी पढ़ें…. इजराइल हूती विद्रोहियों के खिलाफ क्यों लड़ना चाहता है:अमेरिका के जरिए नेतन्याहू ने मदद का मैसेज भेजा, सऊदी ने इनकार किया इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सऊदी अरब से हूतियों के खिलाफ लड़ाई में इजराइल को शामिल करने की इजाजत मांगी है। इजराइली अखबार हारेत्ज की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नेतन्याहू ने यह प्रस्ताव अमेरिका के जरिए सऊदी अरब को भेजा है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

यूरोप में युवाओं पर बुजुर्ग भारी पड़ रहे:पेंशन पर सरकारी खजाना खर्च; Gen Z नौकरी-घर और अच्छी शिक्षा मांग रहे

पिछले कुछ सालों में Gen Z यानी युवा पीढ़ी एक बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर उभरी है। बांग्लादेश, नेपाल, पेरू और मेडागास्कर में युवाओं के प्रदर्शनों ने सरकारें गिरा दीं। भारत में भी कई प्रदर्शनों में युवाओं की अहम भूमिका रही है। अब यूरोप में भी युवा अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतर रहे हैं। फ्रांस में स्कूलों की बदहाली, स्पेन में बेरोजगारी और ब्रिटेन में पेंशन नीतियों को लेकर नाराजगी है। युवाओं के लिए नौकरी पाना, अच्छी शिक्षा हासिल करना और सस्ता घर खरीदना मुश्किल होता जा रहा है। यूरोप में इस मुश्किल ने युवाओं और बुजुर्गों के बीच आर्थिक और राजनीतिक टकराव बढ़ा दिया है। बुजुर्गों की आबादी बढ़ने के साथ राजनीति में उनका प्रभाव भी मजबूत हुआ है। वहीं, युवाओं की संख्या घट रही है। ऐसे में उनके लिए अपनी मांगों को लेकर सरकार पर दबाव बनाना और मुश्किल हो रहा है। फ्रांस: युवाओं को स्कूलों के लिए पैसा चाहिए, बुजुर्गों को पेंशन फ्रांस में युवाओं के सामने नौकरी की कमी है। बेरोजगारी 20% पहुंच चुकी है। इस साल दूसरी तिमाही में अर्थव्यवस्था की ग्रोथ शून्य रही। दूसरी तरफ, सरकार के कुल खर्च का करीब 25% पेंशन पर जाता है। यानी बजट का बड़ा हिस्सा बुजुर्गों की पेंशन में खर्च हो रहा है। कुछ साल पहले राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने रिटायरमेंट की उम्र 62 से बढ़ाकर 64 साल करने का फैसला किया था। इसके खिलाफ देशभर में प्रदर्शन हुए और सरकार को फैसला निलंबित करना पड़ा। अब पक्ष हो या विपक्ष कोई भी पेंशन में कटौती को लेकर चर्चा भी नहीं करता। युवा चाहते हैं कि स्कूलों की हालत सुधरे और शिक्षा पर ज्यादा पैसा खर्च हो। वामपंथी नेताओं का तर्क है कि पेंशन बचाते हुए शिक्षा का बजट भी बढ़ाया जा सकता है। लेकिन सवाल है कि पैसा आएगा कहां से? फ्रांस पर पहले से भारी कर्ज है, और अमीरों पर ज्यादा टैक्स लगाने से भी सरकार को खास कमाई नहीं हुई है। ऐसे में दोनों वर्गों की मांगें पूरी करना सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। स्पेन: युवाओं के लिए घर खरीदना मुश्किल स्पेन में भी यही समस्या दिख रही है। वहां घरों की कमी और बढ़ते किराए को लेकर हाल में प्रदर्शन हुए। स्पेन में युवाओं की बेरोजगारी 22% से ज्यादा है और घरों की कीमतें वेतन के मुकाबले कहीं तेजी से बढ़ी हैं। नतीजा यह है कि कई युवा 30 साल की उम्र पार करने के बाद भी माता-पिता के साथ रहने को मजबूर हैं। जो अलग रहते हैं, उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा किराए में चला जाता है। ऐसे में बचत करना और अपना घर खरीदना मुश्किल है। दूसरी ओर, जिन बुजुर्गों के पास पहले से घर हैं, उन्हें बढ़ती कीमतों का फायदा मिल सकता है। उनकी संपत्ति की कीमत बढ़ रही है, जबकि युवाओं के लिए घर खरीदना और मुश्किल होता जा रहा है। यही अंतर दोनों पीढ़ियों के बीच तनाव बढ़ा रहा है। ब्रिटेन में पेंशन पर खर्च को लेकर बहस ब्रिटेन में भी युवा बेरोजगारी और महंगे मकानों से परेशान हैं। युवाओं में बेरोजगारी करीब 16% है। खासकर लंदन और उसके आसपास घरों का किराया बहुत ज्यादा है। मुश्किल यह है कि रोजगार के नए मौके भी ज्यादातर इन्हीं इलाकों में पैदा होते हैं। ऐसे में युवाओं के लिए नौकरी मिलने के बाद भी घर का खर्च उठाना आसान नहीं है। ब्रिटेन में बुजुर्गों की पेंशन बढ़ाने के लिए ‘ट्रिपल लॉक’ नाम की व्यवस्था है। इसके तहत पेंशन हर साल महंगाई, औसत वेतन में बढ़ोतरी या 2.5% में से जो भी ज्यादा हो, उतनी बढ़ाई जाती है। इससे बुजुर्गों की पेंशन घटने के बजाय बढ़ती रहती है। सरकार अगर पेंशन पर खर्च कम करने की कोशिश करती है, तो उसे राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ सकता है।प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ने एक लोकल चुनाव से पहले इस व्यवस्था में बदलाव करने की बात कही थी। हालांकि विरोधी नेताओं ने इसे महज चुनावी जुमला बताया। उनका कहना है कि अगर वे ऐसा करते हैं तो ये उनके लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। युवाओं पर बुजुर्गों का पलड़ा भारी क्यों? राजनीतिक पकड़ मजबूत होना: बुजुर्गों की राजनीतिक दलों और ट्रेड यूनियनों में अच्छी पकड़ है। वे चुनाव में भी अहम भूमिका निभाते हैं। इसलिए नेताओं के लिए उनकी मांगों को नजरअंदाज करना मुश्किल होता है। पेंशन का फायदा पूरे परिवार को मिलना: कई युवा नौकरी या कमाई के बावजूद अपने माता-पिता के साथ रहते हैं। ऐसे परिवारों में बुजुर्गों की पेंशन घर का खर्च चलाने में मदद करती है। अगर सरकार पेंशन घटाती है, तो इसका असर पूरे परिवार पर पड़ सकता है। कामकाजी लोगों को यह चिंता भी रहती है कि पेंशन कम होने पर माता-पिता के खर्च की जिम्मेदारी उन पर बढ़ जाएगी। पेंशन को अपने भविष्य से जोड़कर देखना: युवाओं को लगता है कि आज बुजुर्गों को पेंशन मिलेगी, तो भविष्य में उन्हें भी इसका फायदा मिल सकता है। इसलिए वे पेंशन व्यवस्था के खिलाफ खुलकर नहीं बोलते हैं। इसके उलट, बुजुर्गों को शिक्षा पर ज्यादा सरकारी पैसा खर्च करने के लिए मनाना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि इसका सीधा फायदा उन्हें नहीं मिलता। यही वजह है कि पेंशन पर खर्च घटाने और शिक्षा जैसी सेवाओं पर खर्च बढ़ाने के बीच सहमति बनाना आसान नहीं है। ——————————— ये खबर भी पढ़ें…. इजराइल हूती विद्रोहियों के खिलाफ क्यों लड़ना चाहता है:अमेरिका के जरिए नेतन्याहू ने मदद का मैसेज भेजा, सऊदी ने इनकार किया इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सऊदी अरब से हूतियों के खिलाफ लड़ाई में इजराइल को शामिल करने की इजाजत मांगी है। इजराइली अखबार हारेत्ज की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नेतन्याहू ने यह प्रस्ताव अमेरिका के जरिए सऊदी अरब को भेजा है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

मैक्रों बोले-गाजा के हालात दुनिया के लिए शर्म की बात:लोग पानी-दवाइयों के लिए जूझ रहे, ट्रम्प के जंग खत्म होने के दावे पर सवाल उठाया

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने गाजा में शांति को लेकर किए जा रहे दावों पर सवाल उठाए हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में अपने भाषण में उन्होंने कहा कि गाजा की मौजूदा स्थिति पूरी दुनिया के लिए शर्म की बात है। मैक्रों ने कहा कि वहां के लोग अब भी पानी, दवाइयों और राहत सामग्री के लिए जूझ रहे हैं, इसलिए सिर्फ शांति का दावा करने से हालात नहीं बदलते। उनकी यह टिप्पणी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के उस दावे के कुछ घंटे बाद आई, जिसमें कहा गया था कि गाजा का युद्ध खत्म हो चुका है और उनकी 20 सूत्रीय शांति योजना सफल रही है। मैक्रों बोले- सिर्फ मान्यता देने से बात नहीं बनेगी मैक्रों ने कहा कि इसी UN महासभा में कई देशों ने फिलिस्तीन को मान्यता दी थी। उस समय भी कुछ लोगों ने कहा था कि सिर्फ मान्यता देने से जमीन पर हालात नहीं बदलेंगे। उन्होंने कहा कि अगर आज भी गाजा के लोगों की मुश्किलें कम नहीं हुईं और दुनिया कुछ नहीं कर रही, तो फिर फिलिस्तीन को मान्यता देने का मतलब क्या रह जाता है। व्हाइट हाउस ने ट्रम्प का बचाव किया मैक्रों के बयान के बाद व्हाइट हाउस ने ट्रम्प का बचाव किया। व्हाइट हाउस की प्रवक्ता अन्ना केली ने कहा कि ट्रम्प ने इजराइल और हमास के बीच युद्ध रुकवाने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि सभी जीवित बंधकों को रिहा कराया गया और मारे गए बंधकों के शव भी उनके परिवारों तक पहुंचाए गए। उनके मुताबिक, ट्रम्प अब गाजा में अपनी 20 सूत्री शांति योजना को आगे बढ़ाने पर काम कर रहे हैं। व्हाइट हाउस ने कहा कि कई लोग सिर्फ बयान दे रहे हैं, जबकि ट्रम्प इस मुद्दे पर काम कर रहे हैं। मैक्रों ने वेस्ट बैंक का मुद्दा भी उठाया मैक्रों ने अपने भाषण में वेस्ट बैंक में फिलिस्तीनियों के खिलाफ बढ़ती हिंसा का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि वहां लगभग हर दिन नई घटनाएं सामने आ रही हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि वेस्ट बैंक की हर घटना के लिए हमास को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। दबाव और ताकत से समस्या का हल नहीं निकलेगा मैक्रों ने कहा कि कुछ लोगों को लगता है कि पड़ोसी देशों पर दबाव डालने या उनकी सीमाओं का सम्मान न करने से इजराइल ज्यादा सुरक्षित हो जाएगा, लेकिन यह सोच सही नहीं है। उनके मुताबिक, ऐसी नीतियां लंबे समय में इजराइल की सुरक्षा को और मुश्किल बना सकती हैं। पिछले एक साल में फ्रांस और इजराइल के रिश्तों में भी तनाव बढ़ा है। फ्रांस ने वेस्ट बैंक में इजराइली बस्तियों को लेकर अपना रुख सख्त किया है। उसने कुछ लोगों पर प्रतिबंध लगाए हैं और वहां बनी बस्तियों से आने वाले सामान पर रोक लगाने की प्रक्रिया शुरू की है। वेस्ट बैंक और गाजा क्यों अहम हैं? 1967 के युद्ध में इजराइल ने वेस्ट बैंक, पूर्वी यरुशलम और गाजा पट्टी पर कब्जा किया था। फिलिस्तीनियों की मांग है कि ये तीनों क्षेत्र भविष्य में उनके देश का हिस्सा होने चाहिए। इजराइल की मौजूदा सरकार फिलिस्तीनी देश के बनने का विरोध करती है और वेस्ट बैंक के ज्यादा से ज्यादा हिस्से को अपने में मिलाना चाहती है। मैक्रों बोले- दुनिया को नियमों से चलना होगा अपने भाषण में मैक्रों ने संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय सहयोग का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि दुनिया को ऐसी दिशा में नहीं जाना चाहिए, जहां सिर्फ ताकतवर देश अपनी ताकत के दम पर फैसले करें। उन्होंने कहा कि देशों के सामने दो रास्ते हैं- एक, जहां ताकत ही सब कुछ तय करे और दूसरा, जहां देश मिलकर नियमों के आधार पर काम करें। ———————- यह खबर भी पढ़ें… ट्रम्प की ईरान को धमकी-समझौता करो, वरना तबाह कर देंगे: 7 महीने में 10 से ज्यादा धमकियां दीं अमेरिका-ईरान जंग शुरू होने के बाद से ट्रम्प पिछले 7 महीने में 10 से ज्यादा बार ईरान को तबाह करने की धमकी दे चुके हैं, लेकिन हर बार उन्हें पलटकर बातचीत का रास्ता अपनाना पड़ा। पूरी खबर पढ़ें…