मोजतबा खामेनेई का बड़ा दावा, ईरान डील के लिए ‘बेताब’ ट्रंप ने हर तरह के हथकंडे अपनाए

Mojtaba Khamenei: ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला मोजतबा खामेनेई ने एक खास पोस्ट के जरिए अमेरिका के साथ समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर करने की पुष्टि की। उन्होंने कहा कि यह समझौता ईरान की इच्छा से नहीं, बल्कि अमेरिका की मजबूरी की वजह से हुआ है। खामेनेई ने अपने पोस्ट में लिखा, “जैसा कि आपको बताया गया है, ईरान और अमेरिका के राष्ट्रपतियों के बीच एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए।”

उन्होंने कहा कि हालांकि ईरानी अधिकारियों ने इस समझौते तक पहुंचने के लिए ईमानदारी से काम किया था, लेकिन अमेरिकी पक्ष ने ही इसके लिए सबसे ज्यादा जोर डाला था। खामेनेई के मुताबिक, “अमेरिकी राष्ट्रपति ने ही मजबूरी में आकर इसे अंजाम देने के लिए हर तरह के दबाव और साधनों का इस्तेमाल किया।”

बता दें कि समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों द्वारा वर्साय पैलेस में आयोजित डिनर के दौरान किए गए। यह कार्यक्रम G7 शिखर सम्मेलन के समापन के बाद हुआ था। मैक्रों ने X पर इस घटनाक्रम की जानकारी देते हुए कहा कि यह समझौता “स्थायी शांति का रास्ता बनाता है और होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने की अनुमति देता है।”

औपचारिक हस्ताक्षर समारोह पहले शुक्रवार को स्विट्जरलैंड में आयोजित होने वाला था। हालांकि, तेहरान ने पुष्टि की है कि जिनेवा में प्रस्तावित बैठक अपने तय कार्यक्रम के अनुसार होगी।

अमेरिका-ईरान समझौते में क्या कहा गया है?

इस दस्तावेज का औपचारिक नाम “संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के इस्लामी गणराज्य के बीच इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन” है। इसमें लेबनान सहित सभी मोर्चों पर सैन्य अभियानों को तुरंत और स्थायी रूप से समाप्त करने की बात कही गई है।

इसकी शर्तों के तहत, अमेरिका ने 30 दिनों के भीतर ईरान की नौसैनिक नाकेबंदी हटाने का वादा किया है। उम्मीद है कि इस दौरान जहाजों की आवाजाही युद्ध से पहले के स्तर पर लौट आएगी। अमेरिका अंतिम समझौता होने के 30 दिनों के भीतर ईरान के आस-पास से अपनी सेना हटाने पर भी सहमत हो गया है।

वहीं, ईरान ने भी कमर्शियल जहाजों को 60 दिनों तक बिना किसी शुल्क के सुरक्षित आवागमन सुनिश्चित करने के लिए हर संभव प्रयास करने पर सहमति जताई है।

बता दें कि संधि पर हस्ताक्षर हो जाने के बाद, दोनों पक्षों के पास व्यापक अंतिम समझौते की शर्तों पर बातचीत करने के लिए 60 दिन का समय है।

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US-ईरान शांति समझौते से क्या भारत में सस्ता होगा पेट्रोल-डीजल? जानिए अब आपकी जेब पर कितना पड़ेगा असर

अमेरिका और ईरान के बीच लंबे संघर्ष के बाद शांति समझौते की घोषणा हुई है। इसके बाद भारत में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या अब पेट्रोल-डीजल के दाम कम होंगे?

दरअसल, युद्ध के दौरान दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक स्ट्रेट ऑफ होर्मूज पर संकट गहरा गया था। इस वजह से कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की कीमतों में तेज उछाल आया और दुनिया भर में महंगाई बढ़ने की चिंता पैदा हो गई थी।

अब शांति समझौते और होर्मुज जलडमरूमध्य के फिर से खुलने की संभावना के बाद तेल बाजारों में राहत देखने को मिल रही है।

भारत के लिए क्यों अहम था यह युद्ध?

भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। ऐसे में जब युद्ध के कारण होर्मुज स्ट्रेट से तेल की सप्लाई प्रभावित होने की आशंका बढ़ी, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें चढ़ गईं।

दुनिया के लगभग 20% तेल व्यापार का रास्ता इसी जलमार्ग से होकर गुजरता है। अगर यह लंबे समय तक बाधित रहता, तो भारत में पेट्रोल-डीजल, एलपीजी, हवाई किराए और माल ढुलाई की लागत बढ़ सकती थी। इससे महंगाई और सरकार का आयात बिल भी बढ़ता।

शांति समझौते के बाद क्या बदला?

अमेरिका और ईरान के बीच हुए अंतरिम समझौते में होर्मुज को फिर से पूरी तरह खोलने और ईरानी तेल निर्यात पर कुछ प्रतिबंधों में राहत देने की बात शामिल है।

इस खबर के बाद बाजार को उम्मीद है कि वैश्विक आपूर्ति बढ़ेगी और तेल की कमी का खतरा कम होगा। इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड की कीमत घटकर लगभग 77-78 डॉलर प्रति बैरल तक आ गई है, जो पिछले तीन महीनों का निचला स्तर माना जा रहा है।

भारत को क्या फायदा होगा?

  1. आयात बिल घटेगा: सस्ता कच्चा तेल खरीदने से भारत का विदेशी मुद्रा खर्च कम होगा और सरकार पर वित्तीय दबाव घटेगा।
  2. महंगाई पर लगाम: तेल सस्ता होने से परिवहन लागत कम रहने की संभावना बढ़ती है, जिससे वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर दबाव घट सकता है।
  3. ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी: होर्मुज मार्ग सामान्य होने से भारत को पश्चिम एशिया से तेल की नियमित आपूर्ति मिलती रहेगी और आपूर्ति बाधित होने का खतरा कम होगा।

क्या पेट्रोल-डीजल के दाम तुरंत घट जाएंगे?

फिलहाल इसका जवाब “नहीं” है।

भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें सिर्फ कच्चे तेल पर निर्भर नहीं करतीं। इनमें रिफाइनिंग लागत, परिवहन खर्च, केंद्र और राज्य सरकारों के टैक्स, एक्साइज ड्यूटी और रुपये-डॉलर की विनिमय दर भी शामिल होती है।

आमतौर पर तेल कंपनियां कुछ दिनों या हफ्तों तक यह देखती हैं कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में गिरावट स्थायी है या नहीं। उसके बाद ही कीमतों में बदलाव पर फैसला लिया जाता है।

अभी भी क्यों बनी हुई है अनिश्चितता?

विशेषज्ञों का कहना है कि यह फिलहाल एक अंतरिम समझौता है, जिसके तहत दोनों देशों के पास स्थायी समझौते के लिए 60 दिनों का समय है।

ईरान के परमाणु कार्यक्रम और प्रतिबंधों में स्थायी राहत जैसे कई बड़े मुद्दे अभी भी सुलझने बाकी हैं। यदि बातचीत विफल होती है या तनाव फिर बढ़ता है, तो तेल की कीमतें दोबारा चढ़ सकती हैं।

इसके अलावा ईरान ने संकेत दिया है कि भविष्य में होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले व्यावसायिक जहाजों से शुल्क वसूला जा सकता है, जिससे तेल परिवहन की लागत प्रभावित हो सकती है।

आम लोगों के लिए क्या मतलब है?

फिलहाल यह खबर भारत के लिए राहत देने वाली है। तेल की कीमतों में गिरावट से पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने का खतरा कम हुआ है और महंगाई पर भी दबाव घट सकता है।

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं कि अगले ही दिन पेट्रोल पंपों पर कीमतें कम हो जाएंगी। लेकिन अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल लंबे समय तक सस्ता बना रहता है, तो आने वाले समय में उपभोक्ताओं को राहत मिलने की संभावना जरूर बढ़ जाएगी।

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