सत्ता बदलती है, पर व्यवस्था वही रहती है!

कॉकरोच जनता पार्टी के पिछले आंदोलन को देखे। 25 जुलाई को समझौता हुआ। 1 सितंबर को एफआईआर रद्द करने का न्यायिक आदेश आया। बीच में 38 दिन लगे। लिखित गारंटी का इंतजार हुआ। फिर आंदोलन की चेतावनी देनी पड़ी। सर्वोच्च न्यायालय में बार-बार मामला उठा। तब जाकर सरकारी आश्वासन एक लागू होने वाले आदेश में बदला। मगर मुआवजा नीति?वह अभी भी वादा है। … आंदोलन चलाना एक काम है। आंदोलन की जीत को लागू करवाना उससे भी लंबा काम।

श्रीलंका में 2022 का आर्थिक संकट केवल महंगाई या विदेशी मुद्रा की कमी का संकट नहीं था। वह उस शासन व्यवस्था के प्रति जनता के भरोसे के टूटने का क्षण था। महंगाई लगभग सत्तर प्रतिशत तक पहुंच गई थी। श्रीलंकाई मुद्रा का मूल्य करीब आधा रह गया था। आम आदमी के लिए ईंधन, भोजन और रोजमर्रा की जरूरतें जुटाना कठिन हो गया था।

इसी संकट से अरगलया आंदोलन पैदा हुआ। सिंहली भाषा में अरगलया का अर्थ है संघर्ष। मगर आंदोलन केवल राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे को हटाने के लिए नहीं था। उसका नारा था, व्यवस्था बदलो। पुराने चेहरों और पुरानी राजनीति से मुक्ति पाओ। सड़क पर जनता उतरी। राष्ट्रपति भवन तक पहुंची। गोटबाया राजपक्षे देश छोड़कर भागे और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।

आंदोलन जीत गया। मगर उसके बाद क्या हुआ?

राष्ट्रपति को चुनने का अधिकार उसी पुरानी संसद के पास था जिसके राजनीतिक ढांचे के खिलाफ जनता उठी थी। संसद ने रानिल विक्रमसिंघे को राष्ट्रपति चुन लिया। वे श्रीलंका की उसी पुरानी राजनीति के अनुभवी नेता थे जिसे आंदोलनकारियों ने अस्वीकार किया था। जनता ने राष्ट्रपति को हटाया था। मगर नए राष्ट्रपति का चुनाव पुरानी व्यवस्था ने किया।

यही जनक्रांति का पहला विरोधाभास है। सड़क सत्ता को खाली करा सकती है। मगर खाली हुई सत्ता पर अधिकार किसका होगा, यह उस समय मौजूद संगठित राजनीतिक शक्तियां तय करती हैं।

श्रीलंका में आंदोलन की व्यवस्था परिवर्तन की मांग को चुनावी रास्ता मिलने में दो वर्ष लग गए। सितंबर 2024 में अनुरा कुमारा दिसानायके राष्ट्रपति बने। वे नेशनल पीपुल्स पावर के नेता थे। 2019 के राष्ट्रपति चुनाव में उन्हें केवल तीन प्रतिशत वोट मिले थे। पांच वर्ष बाद वे लगभग 42 प्रतिशत वोट लेकर राष्ट्रपति बने। उसके बाद उनकी पार्टी को संसद में दो-तिहाई से भी अधिक बहुमत मिला।

तब जाकर आंदोलन की व्यवस्था परिवर्तन की मांग को एक राजनीतिक माध्यम मिला।

मगर यहां भी विरोधाभास समाप्त नहीं हुआ। जिस आर्थिक व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की शर्तों के खिलाफ जनता में असंतोष था, नई सरकार ने उसी आईएमएफ कार्यक्रम को जारी रखा।

तो आंदोलन ने क्या बदला?

उसने पहले दौर में राष्ट्रपति को हटाया। दूसरे दौर में, दो वर्ष बाद, मतदाताओं ने सत्ता के नए दावेदार को चुना। मगर आर्थिक और प्रशासनिक नीतियों की निरंतरता बनी रही। इसका अर्थ यह नहीं कि आंदोलन व्यर्थ था। बल्कि यह कि सत्ता परिवर्तन और व्यवस्था परिवर्तन की गति अलग-अलग होती है।

जनता एक दिन में राष्ट्रपति को हटा सकती है। मगर राज्य की आर्थिक निर्भरताओं, प्रशासनिक संस्थाओं और शासन की आदतों को एक दिन में नहीं बदल सकती।

अब बांग्लादेश को देखिए।

अगस्त 2024 में छात्रों के नेतृत्व वाले जनविद्रोह ने शेख हसीना की सत्ता समाप्त कर दी। वर्षों से जमा असंतोष, राजनीतिक दमन और चुनावी विश्वसनीयता के संकट के बीच छात्रों का आंदोलन देशव्यापी विद्रोह बन गया।

हसीना चली गईं। मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी। फिर संवैधानिक सुधारों का एक दस्तावेज तैयार हुआ जिसे जुलाई चार्टर कहा गया। इसमें प्रधानमंत्री के कार्यकाल की सीमा, दो सदनों वाली संसद और आनुपातिक प्रतिनिधित्व जैसे महत्वपूर्ण सुधार शामिल थे।

यानी बांग्लादेश में आंदोलन केवल प्रधानमंत्री को हटाकर नहीं रुका। उसने नई राजनीतिक व्यवस्था का खाका भी तैयार किया। फरवरी 2026 में चुनाव हुए। कार्नेगी के विश्लेषक अविनाश पालीवाल ने इन्हें लगभग दो दशकों में बांग्लादेश का पहला विश्वसनीय चुनाव बताया।

परिणाम में तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी, यानी बीएनपी, ने संसद की 300 में से 209 सीटें जीतीं। जमात-ए-इस्लामी को 68 सीटें मिलीं। जबकि छात्र आंदोलन से निकली नेशनल सिटिजन पार्टी को केवल छह सीटें मिलीं।

जरा इस परिणाम का अर्थ समझिए।

जिन छात्रों ने आंदोलन खड़ा किया, जिनके संघर्ष से पुरानी सत्ता गिरी, जिनकी नैतिक शक्ति पर राजनीतिक परिवर्तन संभव हुआ, चुनाव में उन्हें केवल छह सीटें मिलीं। आंदोलन की नैतिक विजय और चुनावी राजनीति की शक्ति एक जैसी नहीं होती। जनता किसी आंदोलन का समर्थन कर सकती है, मगर चुनाव में किसी दूसरी पार्टी को सत्ता सौंप सकती है।

बांग्लादेश में यही हुआ।

फिर भी छात्रों के आंदोलन की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। चुनाव के दिन ही मतदाताओं ने जुलाई चार्टर को भी लगभग दो-तिहाई समर्थन से मंजूरी दी। इसका अर्थ था कि मतदाता नई सरकार चाहते थे, मगर संवैधानिक सुधार भी चाहते थे।

अब असली परीक्षा शुरू हुई।

अविनाश पालीवाल के अनुसार बीएनपी ने चुनाव से पहले ही जुलाई चार्टर के कुछ प्रावधानों पर आपत्ति जताई थी। विशेषकर ऊपरी सदन की संरचना और कार्यवाहक सरकार के प्रमुख के चयन की प्रक्रिया पर। सत्ता में आने के बाद उसने सर्वोच्च न्यायालय के लिए अलग सचिवालय बनाने का प्रस्ताव भी ठंडे बस्ते में डाल दिया, जबकि पहले उसका समर्थन किया था।

यानी जनता ने जिस सुधार दस्तावेज को मंजूरी दी, उसे लागू करने वाली सरकार के अपने राजनीतिक हित थे। वह कुछ प्रावधानों को बदलना या कमजोर करना चाहती थी।

बांग्लादेश आज उसी मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है जहां भारत का सूचना अधिकार आंदोलन 2004 में पहुंचा था। मसौदा तैयार है। जनसमर्थन मौजूद है। राजनीतिक स्वीकृति भी मिल चुकी है। मगर कानून को अंतिम रूप देने और लागू करने का अधिकार उन लोगों के पास है जिनके लिए उसके कुछ प्रावधान असुविधाजनक हो सकते हैं।

आंदोलन के सामने अब प्रश्न है कि वह इस प्रक्रिया पर कितना दबाव बनाए रख सकता है। क्योंकि संविधान में सुधार लिख देना और सत्ता को उन सुधारों के अनुसार चलने के लिए बाध्य करना दो अलग काम हैं।

बांग्लादेश के छात्रों ने प्रधानमंत्री को हटा दिया। मगर वे उस पुरानी राजनीति को समाप्त नहीं कर सके जिसने चुनाव जीतकर फिर सत्ता संभाल ली। सड़क पर जनविद्रोह का नेतृत्व करने वाले चुनाव में सत्ता के स्वाभाविक उत्तराधिकारी नहीं बन जाते।

तीसरा उदाहरण नेपाल का है।

सितंबर 2025 में नेपाल सरकार ने 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगाया। इसके विरोध में शुरू हुआ आंदोलन तेजी से व्यापक राजनीतिक विद्रोह में बदल गया। रॉयटर्स के अनुसार दो दिनों की हिंसा में 76 लोग मारे गए। पहले ही दिन पुलिस की गोलीबारी में कम से कम 19 प्रदर्शनकारियों की मौत हुई। 9 सितंबर को प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली ने इस्तीफा दे दिया।

सरकार गिर गई।

पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी। संसद भंग हुई और 5 मार्च 2026 को चुनाव हुए। इन चुनावों में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को अधिकांश सीटें मिलीं। 27 मार्च को बालेंद्र शाह प्रधानमंत्री बने। नेपाल ने तीनों पड़ोसी देशों में सबसे तेजी से सड़क के आंदोलन को राष्ट्रीय चुनाव में बदला।

श्रीलंका में लगभग 26 महीने लगे। बांग्लादेश में करीब अठारह महीने। नेपाल में लगभग छह महीने। मगर जवाबदेही की गति यहां भी धीमी रही। 28 मार्च को पुलिस ने पूर्व प्रधानमंत्री ओली और उनके गृह मंत्री रमेश लेखक को गिरफ्तार किया। यह कार्रवाई उस जांच आयोग की सिफारिश पर हुई जिसने पहले दिन प्रदर्शनकारियों पर हुई गोलीबारी रोकने में विफल रहने के लिए ओली को जिम्मेदार माना था।

8 सितंबर को अल जजीरा की रिपोर्ट के अनुसार दोनों के खिलाफ जांच जारी थी और औपचारिक आरोप तय नहीं हुए थे। हालांकि दूसरी रिपोर्टों में आपराधिक लापरवाही के आरोपों का उल्लेख था। यानी सरकार गिर गई। चुनाव हो गए। नया प्रधानमंत्री आ गया। मगर जिन परिवारों ने अपने बच्चों को खोया, उनके लिए न्याय की प्रक्रिया अभी चल रही थी।

सत्ता परिवर्तन की घड़ी तेज चलती है। न्याय की घड़ी धीमी। श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल के इन तीन अनुभवों में कुछ समानताएं हैं। मगर इनके कारण और परिस्थितियां एक जैसी नहीं थीं।

पहली समानता यह कि सत्ता का खाली स्थान अधिक देर खाली नहीं रहता। उसे वही राजनीतिक शक्ति भरती है जो पहले से संगठित है या जल्दी संगठन खड़ा कर सकती है।

श्रीलंका में पुरानी राजनीतिक परंपरा वाली पार्टी ने आंदोलन की मांग को चुनावी रास्ता दिया। बांग्लादेश में स्थापित बीएनपी ने सत्ता हासिल की। नेपाल में अपेक्षाकृत नई पार्टी चुनाव जीतकर सरकार में आई। तीनों में सड़क का आंदोलन स्वयं सरकार नहीं बना।

आंदोलन की स्थायी शक्ति इस बात में थी कि वह सत्ता में आने वालों को चुनने और उनसे जवाब मांगने की नागरिक क्षमता पैदा कर सके। दूसरी समानता यह कि किसी दस्तावेज को जनता की मंजूरी मिल जाना उसके लागू होने की गारंटी नहीं है।

बांग्लादेश में मतदाताओं ने संवैधानिक सुधारों का समर्थन किया। मगर उसके बाद संघर्ष कानून के प्रावधानों, उनके कमजोर किए जाने और लागू होने की प्रक्रिया में पहुंच गया।

भारत में सूचना अधिकार आंदोलन को भी यही लड़ाई लड़नी पड़ी थी। तीसरी समानता यह कि समझौता, न्याय और जवाबदेही की घड़ियां अलग-अलग चलती हैं।

सोशल मीडिया के सहारे लाखों लोग कुछ घंटों में जुट सकते हैं। सरकार को कुछ दिनों में गिराया जा सकता है। मगर समझौते के लिए ऐसे प्रतिनिधि चाहिए जो आंदोलन की ओर से निर्णय ले सकें। और न्याय के लिए संस्थाएं चाहिए जो अपने निर्णयों को लागू भी कर सकें।

इस पूरी प्रक्रिया में सबसे लंबा इंतजार अक्सर उन परिवारों को करना पड़ता है जिन्होंने आंदोलन में अपने लोगों को खोया होता है। मगर क्या इन तीनों देशों में सरकारें इसलिए गिरीं क्योंकि उनके राज्य कमजोर थे? और क्या भारत में ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि भारतीय राज्य मजबूत है?

यह तुलना इतनी सरल नहीं है। इन घटनाओं को समझने के लिए चार बातों पर गौर करना होगा।

पहली है आर्थिक स्थिति। श्रीलंका में आर्थिक संकट असाधारण था। देश भुगतान संकट से जूझ रहा था। बांग्लादेश में भी विदेशी मुद्रा भंडार लगभग तीन महीने के आयात के बराबर रह गया था।

दूसरी है सुरक्षा बलों की भूमिका। बांग्लादेश में सेना ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने से इनकार किया। नेपाल में पुलिस की गोलीबारी में पहले ही दिन कम से कम 19 लोग मारे गए।

तीसरी है सरकार की वैधता पर जनता का भरोसा। बांग्लादेश में जनवरी 2024 के विवादास्पद चुनाव के बाद शासन की विश्वसनीयता गंभीर रूप से प्रभावित हुई थी। नेपाल में घातक विरोध प्रदर्शनों के एक दिन के भीतर सरकार गिर गई।

चौथी और सबसे महत्वपूर्ण बात है प्रशासनिक मशीनरी की निरंतरता। यही वह पहलू है जिस पर तोकविल सबसे अधिक ध्यान देते। सरकारें गिर गईं। मगर उनके साथ प्रशासन समाप्त नहीं हुआ। बांग्लादेश के बारे में पालीवाल का निष्कर्ष है कि जिस क्रांति ने नई व्यवस्था स्थापित की, उसके बाद भी पुरानी व्यवस्था का बड़ा हिस्सा बना रहा। यही राज्य की वास्तविक शक्ति है। राजनीतिक सत्ता बदल सकती है। मगर नौकरशाही, संस्थागत हित, प्रशासनिक नियम और शासन की परंपराएं बनी रह सकती हैं।

भारत की स्थिति इन देशों से अलग है। मगर अंतर केवल इतना नहीं कि वहां कमजोर राज्य हैं और यहां मजबूत राज्य।

भारत में श्रीलंका जैसा दिवालियापन नहीं है। सुरक्षा बलों की निष्ठा डगमगाने का कोई संकेत नहीं है। न्यायालय, मंत्रालय और संघीय व्यवस्था काम कर रहे हैं। 10 अक्टूबर के आंदोलन की मांग भी इन देशों के आंदोलनों से छोटी है। यहां सरकार गिराने की मांग नहीं है। मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग है।

ऐसी परिस्थिति में सरकार के लिए किसी व्यक्ति का इस्तीफा स्वीकार करना, पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया बदलने की अपेक्षा कहीं आसान हो सकता है। यहीं भारत के लिए तोकविल की चेतावनी महत्वपूर्ण हो जाती है।

यहां खतरा सरकार के गिर जाने का नहीं, बल्कि आंदोलन को व्यवस्था के भीतर समाहित कर लेने का है। सरकार किसी मांग को स्वीकार कर सकती है। समिति बना सकती है। इस्तीफा ले सकती है। नया कानून घोषित कर सकती है। आंदोलन समाप्त हो सकता है। मगर जिस प्रक्रिया के खिलाफ आंदोलन हुआ था, वह जस की तस बनी रह सकती है।

श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल बताते हैं कि सरकार गिर जाने के बाद क्या होता है।

भारत के अपने आंदोलन बताते हैं कि सरकार के बने रहने और आंदोलन की मांग स्वीकार कर लेने के बाद क्या होता है। और इसका सबसे ताजा उदाहरण स्वयं कॉकरोच जनता पार्टी का पिछला आंदोलन है। 25 जुलाई को जंतर मंतर पर पांच सप्ताह से अधिक चले आंदोलन के बाद शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दिया।

सीजेपी ने आंदोलन समाप्त करने की घोषणा की। संगठन ने कहा कि सरकार ने उसकी सभी मांगें स्वीकार कर ली हैं। इनमें प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर वापस लेना, कुछ दिनों के भीतर इसकी लिखित गारंटी देना, नीट-यूजी प्रश्नपत्र लीक के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को मुआवजा देना और परीक्षा सुधार के पांच सूत्री मांगपत्र पर विचार करना शामिल था।

सीजेपी ने कहा कि वह सद्भावना के आधार पर आंदोलन वापस ले रही है। उसे भरोसा है कि तय शर्तें तय समयसीमा में पूरी होंगी। मंत्री का इस्तीफा हो गया। समझौता हो गया। आंदोलन समाप्त हो गया।

मगर दो दिन बाद, 27 जुलाई को संगठन लिखित गारंटी का इंतजार कर रहा था। उसने सरकार को मंगलवार तक का समय दिया। 25 अगस्त को सीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने कहा कि सरकार ने अपनी प्रतिबद्धताएं पूरी नहीं की हैं। संगठन के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय केंद्र सरकार से तीन बार एफआईआर की समेकित सूची मांग चुका था।

सीजेपी ने 5 सितंबर को फिर मार्च करने की घोषणा की। फिर 1 सितंबर को सर्वोच्च न्यायालय ने एफआईआर रद्द कर दीं। सरकार ने अदालत को बताया कि वह तीन महीने के भीतर पूरे देश के लिए मुआवजा नीति तैयार करेगी। इसके बाद सीजेपी ने अपना प्रस्तावित मार्च रद्द कर दिया।

जरा इस घटनाक्रम को देखिए। 25 जुलाई को समझौता हुआ। 1 सितंबर को एफआईआर रद्द करने का न्यायिक आदेश आया। बीच में 38 दिन लगे। लिखित गारंटी का इंतजार हुआ। फिर आंदोलन की चेतावनी देनी पड़ी। सर्वोच्च न्यायालय में बार-बार मामला उठा। तब जाकर सरकारी आश्वासन एक लागू होने वाले आदेश में बदला। मगर मुआवजा नीति?

वह अभी भी वादा है। दिसंबर की शुरुआत तक उसे तैयार करने की बात कही गई है। यानी आंदोलन की एक मांग पूरी हुई। दूसरी मांग के लिए नई समयसीमा मिल गई।

और यही पूरी कहानी का सार है।

सरकार के लिए घोषणा करना एक घटना है। नागरिक के लिए उस घोषणा का लागू होना एक लंबी प्रक्रिया। मंत्री के इस्तीफे की खबर तुरंत बनती है। कानून में सजा बढ़ाने की घोषणा सुर्खियां बनती है। अदालत का आदेश खबर बनता है।

मगर उसके बाद फाइल कहां पहुंची, किस अधिकारी ने क्या निर्णय लिया, किस परिवार को कितना मुआवजा मिला और किस छात्र को कब राहत मिली, इसकी खबर कौन रखता है?

यह काम महीनों और अनेक दफ्तरों में बंट जाता है। सरकार को घोषणा करने का श्रेय मिल जाता है। मीडिया को एक बड़ी खबर मिल जाती है। जनता को लगता है कि मामला समाप्त हो गया। जबकि काम अधूरा रहता है।

इसके लिए जरूरी नहीं कि हर अधिकारी की नीयत खराब हो। समस्या व्यवस्था की बनावट में भी है। एक सार्वजनिक घोषणा कहानी को समाप्त कर सकती है, जबकि उसका वास्तविक काम अभी शुरू भी नहीं हुआ होता। फिर जब महीनों बाद वादा पूरा नहीं होता तो उसे पुराने समझौते की अधूरी जिम्मेदारी के बजाय एक नया विवाद मान लिया जाता है।

इस तरह सत्ता की जवाबदेही लगातार टुकड़ों में बंटती रहती है। सीजेपी ने समयसीमाएं तय करके, सरकार के वादों की निगरानी करके और सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाकर इस सिलसिले को टूटने नहीं दिया।

मगर यह भी समझना होगा कि हर प्रदर्शनकारी ऐसा नहीं कर सकता। जिस नौजवान की परीक्षा सिर पर है, वह कितने महीने धरने पर बैठेगा? जिस मजदूर को रोज कमाना है, वह कितने दिन अदालत और सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाएगा?

आंदोलन चलाना एक काम है। आंदोलन की जीत को लागू करवाना उससे भी लंबा काम। और नागरिक के लिए सबसे महंगी चीज वही है जो सरकार के पास सबसे अधिक है। (जारी)

कौन हैं IAF के नए चीफ आशुतोष दीक्षित? जिन्होंने कारगिल और ऑपरेशन सिंदूर में निभाई अहम भूमिका

एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित को भारतीय वायुसेना का नया प्रमुख नियुक्त किया गया है। वह मौजूदा वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह की जगह लेंगे। बता दें कि एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह 31 अक्टूबर को रिटायर होंगे, जिसके बाद आशुतोष दीक्षित वायुसेना प्रमुख का पद संभालेंगे।

एयर मार्शल दीक्षित मुख्य रूप से वायु सेना में स्वदेशी LCA तेजस और अन्य स्वदेशी एयरक्राफ्ट प्रोजेक्ट्स को आगे बढ़ाने के लिए जाने जाते हैं। माना जा रहा है कि वह रक्षा क्षेत्र में सरकार की आत्मनिर्भर भारत पहल को आगे बढ़ाने पर भी जोर देंगे।

करीब 4 दशक का अनुभव

आशुतोष दीक्षित 6 दिसंबर 1986 को भारतीय वायु सेना की फाइटर स्ट्रीम में शामिल हुए थे। वे नेशनल डिफेंस एकेडमी, बांग्लादेश के डिफेंस स्टाफ सर्विस कॉलेज और नेशनल डिफेंस कॉलेज के पूर्व छात्र हैं। उन्हें कई तरह के एयरक्राफ्ट उड़ाने का 3,500 घंटे से ज्यादा का अनुभव है, जिनमें Mirage-2000, MiG के अलग-अलग वर्जन, Kiran, Jaguar, IL-78, HAWK और Tejas शामिल हैं। वे एक एक्सपेरिमेंटल टेस्ट पायलट और क्वालिफाइड फ्लाइंग इंस्ट्रक्टर हैं। लगभग चार दशक के अपने सर्विस करियर के दौरान, वे कई ऑपरेशन और एक्सरसाइज में सक्रिय रूप से शामिल रहे हैं, जिनमें ऑपरेशन सफेद सागर, ऑपरेशन रक्षक और ऑपरेशन सिंदूर शामिल हैं।

कौन हैं एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित?

एयर मार्शल दीक्षित (सर्विस नंबर 18558 F(P)) फाइटर स्ट्रीम से हैं और 138वें कोर्स के तहत कमीशन हुए थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन्हें 6 दिसंबर 1991 को फ्लाइट लेफ्टिनेंट, 5 मई 2003 को विंग कमांडर, 1 मार्च 2009 को ग्रुप कैप्टन और 17 जून 2013 को एयर कमोडोर के पद पर प्रमोट किया गया।

वे 11 जून 2019 को एयर वाइस मार्शल, 1 अक्टूबर 2022 को एयर मार्शल और 1 सितंबर 2024 को कमांडर-इन-चीफ बने। उनकी ट्रेनिंग में कैडेट के तौर पर 69वां नेशनल डिफेंस एकेडमी कोर्स और एयर कमोडोर के तौर पर 57वां नेशनल डिफेंस कॉलेज कोर्स शामिल है।

अपने शानदार करियर के दौरान, एयर मार्शल ने कई अहम फील्ड और स्टाफ पदों पर भी काम किया है। उन्होंने वेस्टर्न सेक्टर में एक फ्रंट-लाइन फाइटर एयर बेस और सदर्न सेक्टर में एक प्रमुख फाइटर ट्रेनिंग बेस की कमान संभाली है।

अहम ऑपरेशनल और प्रोजेक्ट पदों पर किया काम

दीक्षित ने 15 दिसंबर 2003 से 15 जनवरी 2006 के बीच ग्वालियर में नंबर 9 स्क्वाड्रन के कमांडिंग ऑफिसर के तौर पर काम किया। उन्होंने दिल्ली में एयर हेडक्वार्टर में प्रिंसिपल डायरेक्टर, एयर स्टाफ रिक्वायरमेंट्स के तौर पर भी काम किया। वह जनवरी 2018 से मई 2019 तक एयर फोर्स स्टेशन बीदर में एयर ऑफिसर कमांडिंग रहे और बाद में त्रिवेंद्रम में सदर्न एयर कमांड के साथ एयर डिफेंस कमांडर के तौर पर काम किया।

अक्टूबर 2020 से सितंबर 2021 तक, वह एयर हेडक्वार्टर में असिस्टेंट चीफ ऑफ एयर स्टाफ, प्रोजेक्ट्स थे। इसके बाद उन्होंने अक्टूबर 2021 से सितंबर 2022 तक असिस्टेंट चीफ ऑफ एयर स्टाफ, प्लांस के तौर पर काम किया।

एयर मार्शल के तौर पर, दीक्षित ने साउथ वेस्टर्न एयर कमांड में सीनियर एयर स्टाफ ऑफिसर, एयर हेडक्वार्टर में डिप्टी चीफ ऑफ एयर स्टाफ और इलाहाबाद में सेंट्रल एयर कमांड के एयर ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ के तौर पर काम किया।

बाद में उन्होंने मई 2025 से जून 2026 तक चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी के चेयरमैन के लिए चीफ ऑफ इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ के तौर पर काम किया। जुलाई 2026 से, वह दिल्ली में एयर हेडक्वार्टर में प्रिंसिपल स्टाफ ऑफिसर, ऑपरेशन्स और वाइस चीफ ऑफ एयर स्टाफ के तौर पर कार्यरत हैं।

सेना मेडल

रिपोर्ट्स के अनुसार, एयर मार्शल दीक्षित को तीन अवॉर्ड मिले हैं – वायु सेना मेडल, विशिष्ट सेवा मेडल और अति विशिष्ट सेवा मेडल। उन्हें 2006 में वायु सेना मेडल से सम्मानित किया गया था। यह सम्मान उन्हें कर्तव्य के प्रति समर्पण के लिए दिया गया। उस समय वह एक फाइटर स्क्वाड्रन के कमांडिंग ऑफिसर थे। उनकी कमान में स्क्वाड्रन को दोबारा तैयार किया गया और Mirage-2000 विमानों से लैस किया गया। उन्होंने फ्रांस से भारत तक 10 नए Mirage-2000 विमानों को लाने और उनकी स्वीकृति से जुड़ी उड़ानों में भी अहम भूमिका निभाई।

उन्हें 2011 में विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित किया गया। उन्होंने 20 से ज्यादा तरह के एयरक्राफ्ट में 3,200 घंटे उड़ान भरी है और क्वालिफाइड फ्लाइंग इंस्ट्रक्टर और एक्सपेरिमेंटल टेस्ट पायलट के तौर पर काम किया है। उन्होंने Jaguar और MiG-27 एयरक्राफ्ट के लिए स्वदेशी अपग्रेड प्रोजेक्ट्स पर भी काम किया है, साथ ही मीडियम मल्टी रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट प्रोग्राम के तहत एयरक्राफ्ट के टेक्निकल इवैल्यूएशन और फील्ड ट्रायल्स में भी भूमिका निभाई है।

उनकी सेवाओं को देखते हुए उन्हें 2023 में अति विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित किया गया।

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चीन के लिए जासूसी के शक में अमेरिकी महिला गिरफ्तार:छिपकर ताइवान राष्ट्रपति के परिवार का वीडियो बनाया, चीनी अधिकारी ने काम दिया था

अमेरिका की फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (FBI) ने लॉस एंजिल्स एयरपोर्ट से एक महिला को रविवार को गिरफ्तार किया। उस पर चीन सरकार के लिए काम करने का आरोप है। FBI के अनुसार महिला ने छिपकर ताइवान के राष्ट्रपति लाई चिंग-ते के परिवार का वाडियो बनाया। उसे ये काम एक चीनी अधिकारी ने दिया था। महिला की गिरफ्तारी उस समय हुई, जब वह लॉस एंजिल्स से शंघाई जाने वाली फ्लाइट में सवार होने वाली थी। कैलिफोर्निया में रियल एस्टेट एजेंट के तौर पर काम करती थी गिरफ्तार महिला की पहचान वैनयिंग हीदर झांग (34) के रूप में हुई है। वह कैलिफोर्निया के इरविन में रियल एस्टेट एजेंट है। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, झांग ने सितंबर 2025 में एक साथी के साथ सिएटल जाकर ताइवान के राष्ट्रपति लाई चिंग-ते के बेटे टिंग-यू लाई के घर की निगरानी की और वहां की तस्वीरें और वीडियो बनाए। चीनी अधिकारी को वीचैट पर मैसेज भेजकर जानकारी दी FBI की ओर से 3 अक्टूबर को दाखिल की गई शिकायत के मुताबिक, झांग और एक अन्य व्यक्ति 1 सितंबर 2025 को लास वेगास से सिएटल पहुंचे थे। उन्होंने वहां एक काली निसान रोग गाड़ी किराए पर ली और राष्ट्रपति के बेटे के घर के पास पहुंचे। पड़ोसी के सुरक्षा कैमरे की तस्वीरों में दोनों को वीडियो बनाते देखा गया। FBI के मुताबिक, झांग ने चीन के एक कथित सरकारी अधिकारी को वीचैट पर मैसेज भेजकर बताया था कि उसने टिंग-यू को देख लिया है। झांग के आईक्लाउड अकाउंट की तलाशी के लिए मिले वारंट के जरिए FBI ने ये मैसेज हासिल किए। उसने यह भी लिखा कि वह वीडियो रिकॉर्ड कर रही है और दो गाड़ियों के नंबर भेजे। FBI एजेंट केविन होल्ट ने शिकायत में लिखा कि झांग कम से कम दो ऐसे लोगों के संपर्क में थी, जो चीन सरकार के लिए काम करते हैं। जून में चीनी अधिकारी से मिलने चांगशा गई थी महिला FBI की शिकायत के अनुसार, झांग को जून 2025 में उसकी पुरानी यूनिवर्सिटी के एक क्लासमेट ने चीन के एक सरकारी अधिकारी से मिलवाया था। झांग ने जून में चीन के चांगशा शहर में एक निजी कमरा बुक किया था, जहां उसकी कथित तौर पर उस अधिकारी से मुलाकात हुई। शिकायत के मुताबिक, अधिकारी ने उसे निगरानी से जुड़ा काम दिया था। इसके बाद झांग ने मैसेज में कहा था कि वह यह काम संभाल लेगी। FBI ने बताया- राष्ट्रपति पर दबाव बनाने में इस्तेमाल हो सकती थीं तस्वीरें FBI एजेंट होल्ट ने शिकायत में कहा कि अगर चीन किसी संभावित संघर्ष के दौरान ताइवान के राष्ट्रपति पर दबाव बनाना चाहता है, तो उनके करीबी रिश्तेदारों की लोकेशन, घर और गाड़ियों की तस्वीरें उसके लिए उपयोगी हो सकती हैं। झांग के पति एड्रिक डिंग, जो उसी रियल एस्टेट कंपनी में काम करते हैं। उन्होंने मीडिया से कहा कि उन्हें अभी मामले के बारे में जानकारी नहीं है। ताइवान के राष्ट्रपति के बेटे डच कंपनी फिलिप्स में काम करते हैं टिंग-यू लाई इंजीनियर हैं और अमेरिका में पढ़ाई कर चुके हैं। उन्होंने 2012 में केस वेस्टर्न रिजर्व यूनिवर्सिटी से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में ग्रेजुएशन किया। इसके बाद जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी से बायोइंजीनियरिंग में मास्टर डिग्री और यूनिवर्सिटी ऑफ वॉशिंगटन से पीएचडी की। टिंग-यू अब नीदरलैंड की बहुराष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी फिलिप्स में काम करते हैं। ताइवान की मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, उनकी पत्नी भी ताइवानी हैं। दोनों की शादी 2018 में हुई थी और उनका बच्चा 2020 में अमेरिका में पैदा हुआ। अमेरिका में पहले भी चीन से जुड़े जासूसी के मामले सामने आ चुके हैं 2024: शुजुन वांग नाम के 75 वर्षीय व्यक्ति को चीन के लिए जासूसी करने का दोषी पाया गया था। उस पर न्यूयॉर्क में चीन समर्थक जानकारी जुटाकर 17 साल तक बीजिंग भेजने का आरोप था। 2023: न्यूयॉर्क में चल रहे एक कथित चीनी “पुलिस स्टेशन” से जुड़े दो लोगों को गिरफ्तार किया गया था। अमेरिकी अधिकारियों का कहना था कि इसका इस्तेमाल चीन के आलोचकों पर नजर रखने के लिए किया जाता था। 2026: कैलिफोर्निया की पूर्व मेयर ईलीन वांग पर चीन के लिए एजेंट की तरह काम करने का आरोप लगा। अधिकारियों के मुताबिक, उन्होंने चीन समर्थक प्रचार के बदले पैसे लिए थे। ताइवान को लेकर अमेरिका-चीन में तनाव क्यों है? ताइवान खुद को अलग और लोकतांत्रिक सरकार वाला क्षेत्र मानता है, जबकि चीन उसे अपना हिस्सा बताता है और जरूरत पड़ने पर बल प्रयोग से भी उसे अपने नियंत्रण में लेने की बात कह चुका है। इसी वजह से ताइवान को लेकर अमेरिका और चीन के बीच लंबे समय से तनाव बना हुआ है। ताइवान सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि तकनीक के लिहाज से भी बेहद अहम है। दुनिया के सबसे उन्नत कंप्यूटर और AI चिप्स का बड़ा हिस्सा ताइवान में बनता है। दुनिया की सबसे बड़ी चिप निर्माता कंपनी TSMC भी यहीं की है। कई अमेरिकी टेक कंपनियां ताइवान में बने चिप्स पर निर्भर हैं। ————————- यह खबर भी पढ़ें… सर्वे- ट्रम्प के कामकाज से 70% अमेरिकी संतुष्ट नहीं: मिडटर्म में हार का खतरा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के खिलाफ उनकी अपनी रिपब्लिकन पार्टी में बगावत के संकेत दिखने लगे हैं। ट्रम्प की लोकप्रियता घट रही है। पूरी खबर पढ़ें…

ईरान की अमेरिका को कड़ी चेतावनी! फिर हमला हुआ तो पहले से ज्यादा मजबूत जवाब देंगे, बातचीत का रास्ता भी खुला

Iran-US War Update: ईरान ने अमेरिका को चेतावनी देते हुए एक बार फिर साफ किया है कि वह अपनी रक्षा के साथ-साथ कूटनीतिक समाधान की कोशिश भी जारी रखेगा। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने रविवार (4 अक्टूबर) को चेतावनी दी कि अगर उनके देश के खिलाफ दोबारा सैन्य कार्रवाई की गई तो इसका जवाब पहले से ज्यादा ताकतवर होगा। हालांकि, उन्होंने साथ ही बातचीत के जरिए न्यायपूर्ण और सम्मानजनक समाधान की संभावना भी खुली रखी है।

तेहरान में विदेशी राजदूतों और राजनयिक मिशनों के प्रमुखों को संबोधित करते हुए अराघची ने कहा कि अगर दुश्मन फिर से सैन्य टकराव का रास्ता चुनते हैं तो उन्हें पहले से अधिक मजबूत प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि ईरान कूटनीति के जरिए समाधान तलाशने के लिए तैयार है।

ईरान-अमेरिका बातचीत पर फिर अड़चन

यह बयान ऐसे समय आया है जब युद्ध खत्म करने की कोशिशें फिलहाल गतिरोध में नजर आ रही हैं। अमेरिका और इजरायल की ओर से फरवरी के अंत में शुरू किए गए सैन्य अभियान के बाद भारी बमबारी हुई। लेकिन संघर्ष का निर्णायक अंत नहीं हो सका। हाल के हफ्तों में अमेरिका ने सैन्य अभियानों को कम करते हुए आर्थिक दबाव बढ़ाने पर जोर दिया है। जून में ईरान और अमेरिका ने स्थायी समाधान की दिशा में एक रूपरेखा तैयार करने के लिए समझौता ज्ञापन पर सहमति जताई थी। हालांकि, बाद में यह प्रक्रिया टूट गई। इसका एक प्रमुख विवादित मुद्दा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज रहा।

होर्मुज बना बड़ा मुद्दा

युद्ध शुरू होने के बाद से ईरान ने रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य पर कंट्रोल कायम करने की कोशिश की है। ईरान ने उन जहाजों पर भी हमले किए हैं जो उसकी अनुमति के बिना इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से गुजरने की कोशिश कर रहे थे। पिछले सप्ताह संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान ईरान और अमेरिका के अधिकारियों के बीच अप्रत्यक्ष बातचीत भी हुई। तेहरान के मुताबिक, उसने होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने के लिए सात शर्तें रखीं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इन प्रस्तावों को खारिज कर दिया। लेकिन आगे बातचीत की संभावना के साथ-साथ सैन्य कार्रवाई दोबारा शुरू करने का विकल्प भी खुला रखा।

अमेरिका ने 1 सितंबर के बाद नहीं किया हमला

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका ने 1 सितंबर के बाद ईरान पर कोई नया हमला नहीं किया है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों में यह भी बताया गया कि ट्रंप प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों ने शुक्रवार को ईरान में युद्ध और यमन के संघर्ष को लेकर बैठक की। इस बीच, ईरान समर्थित हूती संगठन यमन में सरकारी बलों के खिलाफ लड़ाई जारी रखे हुए है। हूती अब खुलकर सऊदी अरब को भी निशाना बना रहा है। ऐसे में ईरान-अमेरिका तनाव के साथ क्षेत्रीय संघर्ष को लेकर भी स्थिति पर नजर बनी हुई है।

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Windfall Gains Tax: सरकार ने डीजल और ATF के एक्सपोर्ट पर और घटाया विंडफॉल गेन्स टैक्स, पेट्रोल पर ड्यूटी जस की जस

सरकार ने 1 अक्टूबर से शुरू 15 दिनों की अवधि के लिए डीजल और ATF (एविएशन टर्बाइन फ्यूल) के एक्सपोर्ट पर विंडफॉल गेन्स टैक्स घटा दिया है। पेट्रोल के एक्सपोर्ट पर इस टैक्स में कोई बदलाव नहीं किया गया है। एक सरकारी आदेश के मुताबिक, डीजल के एक्सपोर्ट पर स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी (SAED) और रोड एंड इंफ्रास्ट्रक्चर सेस की दर अब 16 रुपये प्रति लीटर है, जो पहले 20 रुपये प्रति लीटर थी। ATF के एक्सपोर्ट पर ड्यूटी को 15 रुपये प्रति लीटर से घटाकर 10.5 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है। पेट्रोल के एक्सपोर्ट पर ड्यूटी को 0.5 रुपये प्रति लीटर पर बरकरार रखा गया है।

वित्त मंत्रालय ने एक नोटिफिकेशन में कहा कि ड्यूटी में ये बदलाव 1 अक्टूबर से लागू होंगे। यह भी कहा कि घरेलू खपत के लिए जारी पेट्रोल और डीजल पर मौजूदा ड्यूटी दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया है।

इससे पहले सरकार ने 16 सितंबर से शुरू 15 दिनों की अवधि के लिए भी पेट्रोल, डीजल और ATF (एविएशन टर्बाइन फ्यूल) के एक्सपोर्ट पर विंडफॉल गेन्स टैक्स घटाया था। उस वक्त डीजल के एक्सपोर्ट पर SAED और रोड एंड इंफ्रास्ट्रक्चर सेस की दर 20 रुपये प्रति लीटर, ATF के एक्सपोर्ट पर ड्यूटी 15 रुपये प्रति लीटर और पेट्रोल के एक्सपोर्ट पर ड्यूटी 0.5 रुपये प्रति लीटर की गई थी। 1 सितंबर को सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर विंडफॉल गेन्स टैक्स बढ़ाया था, जबकि ATF पर घटाया था।

क्या है विंडफॉल गेन्स टैक्स

अगर ऑयल कंपनियां 75 डॉलर प्रति बैरल से ज्यादा पर कच्चे तेल की बिक्री करती हैं, तो इससे हासिल होने वाले प्रॉफिट पर विंडफॉल गेन्स टैक्स लगता है। वहीं डीजल, ATF और पेट्रोल के निर्यात के लिए यह लेवी तब लागू होती है, जब मार्जिन 20 डॉलर प्रति बैरल से अधिक हो जाता है। पिछले दो सप्ताह में तेल की औसत कीमतों के आधार पर हर 15 दिनों पर विंडफॉल गेन्स टैक्स की रेट का रिव्यू किया जाता है। बता दें कि कच्चे तेल को जमीन और समुद्र से निकाल कर रिफाइन किया जाता और इसे पेट्रोल, डीजल और एयर टर्बाइन फ्यूल (ATF) में कनवर्ट किया जाता है।

Petrol-Diesel Price Today October 1: पेट्रोल-डीजल की नई कीमतें जारी, जानें- दिल्ली से मुंबई और लखनऊ से पटना तक बड़े शहरों के ताजा रेट

मार्च 2026 से फिर लगने लगा है यह टैक्स

भारत ने विंडफॉल गेन्स टैक्स सबसे पहले जुलाई 2022 में लागू किया था। फिर 2 साल बाद दिसंबर 2024 में इसे हटा दिया। लेकिन फिर फरवरी 2026 में ईरान के खिलाफ शुरू हुए अमेरिका-इजराइल युद्ध से तेल की कीमतों में तगड़ा उछाल आया। इसे देखते हुए मार्च 2026 में यह लेवी फिर से लागू की गई।

Petrol-Diesel Price Today October 1: पेट्रोल-डीजल की नई कीमतें जारी, जानें- दिल्ली से मुंबई और लखनऊ से बिहार तक बड़े शहरों के ताजा रेट

Petrol Diesel Price Today, 1 October 2026: देश के प्रमुख शहरों में गुरुवार, 1 अक्टूबर को पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है। राजधानी दिल्ली में पेट्रोल 102.12 रुपये प्रति लीटर और डीजल 95.20 रुपये प्रति लीटर की दर से बिक रहा है। वहीं, मुंबई में पेट्रोल 111.21 रुपये और डीजल 97.83 रुपये प्रति लीटर है। तेल कंपनियां भारत में लागू डायनेमिक फ्यूल प्राइसिंग सिस्टम के तहत पेट्रोल और डीजल की कीमतों की रोजाना समीक्षा करती हैं। नई कीमतें हर दिन सुबह 6 बजे लागू की जाती हैं। हालांकि, अलग-अलग राज्यों में टैक्स, वैट, परिवहन लागत और डीलर कमीशन के कारण ईंधन की कीमतों में अंतर रहता है।

देश के प्रमुश शहरों में आज पेट्रोल-डीजल का रेट

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उपलब्ध शहरवार दरों के मुताबिक, देश के ज्यादातर बड़े शहरों में पेट्रोल 100 रुपये प्रति लीटर से ऊपर बना हुआ है। कई बाजारों में डीजल की कीमत भी 95 रुपये प्रति लीटर से अधिक है। दिए गए प्रमुख शहरों में हैदराबाद में पेट्रोल ₹115.73 प्रति लीटर सबसे ज्यादा है। इसके बाद कोलकाता ₹113.51, पटना ₹113.37 और जयपुर ₹112.66 है।

अलग-अलग शहरों में क्यों बदलते हैं पेट्रोल-डीजल के दाम?

पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में राज्यों के बीच अंतर की सबसे बड़ी वजह राज्य सरकारों द्वारा लगाए जाने वाले टैक्स और VAT हैं। इसके अलावा परिवहन खर्च और डीलर कमीशन भी अंतिम कीमत को प्रभावित करते हैं। पेट्रोल और डीजल अभी GST के दायरे से बाहर हैं। इसलिए राज्य स्तर पर लगने वाला टैक्स इनके खुदरा दाम तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

कच्चे तेल और रुपये की कीमत का भी असर

भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बदलाव का असर घरेलू पेट्रोलियम उत्पादों की लागत पर पड़ता है। इसके अलावा डॉलर के मुकाबले रुपये की विनिमय दर भी ईंधन की कीमतों को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण कारक है। रुपये में कमजोरी से आयातित कच्चे तेल की लागत बढ़ सकती है।

सुबह 6 बजे बदलते हैं पेट्रोल-डीजल के रेट

भारत में जून 2017 से डायनेमिक फ्यूल प्राइसिंग सिस्टम लागू है। इसके तहत तेल कंपनियां रोजाना पेट्रोल और डीजल की कीमतों की समीक्षा करती हैं और संशोधित दरें सुबह 6 बजे लागू होती हैं। ग्राहक अपने शहर में पेट्रोल-डीजल की कीमत की जानकारी तेल कंपनी की SMS सेवा के जरिए भी हासिल कर सकते हैं। इंडियन ऑयल की सेवा के तहत ‘RSP’ लिखकर संबंधित नंबर पर SMS भेजकर स्थानीय कीमत की जानकारी ली जा सकती है।

डीजल और ATF के एक्सपोर्ट शुल्क में फिर कटौती

केंद्र सरकार ने डीजल और एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) के निर्यात शुल्क में लगातार दूसरी पखवाड़े कटौती की है। 1 अक्टूबर 2026 से डीजल पर एक्सपोर्ट लेवी घटाकर 16 रुपये प्रति लीटर और ATF पर 10.5 रुपये प्रति लीटर कर दी गई है। वहीं, पेट्रोल पर निर्यात शुल्क 0.5 रुपये प्रति लीटर पर पहले की तरह बरकरार रखा गया है।

वित्त मंत्रालय की ओर से जारी अधिसूचनाओं के मुताबिक, डीजल पर निर्यात शुल्क में 4 रुपये प्रति लीटर की कमी की गई है। इससे पहले 16 सितंबर से 30 सितंबर तक यह शुल्क 20 रुपये प्रति लीटर था। इसी तरह ATF पर लेवी 4.5 रुपये प्रति लीटर घटाकर 15 रुपये से 10.5 रुपये प्रति लीटर कर दी गई है।

सितंबर से अब तक डीजल पर 9 रुपये की कटौती

सरकार ने 1 सितंबर से डीजल और ATF पर एक्सपोर्ट लेवी में लगातार कटौती की है। 1 सितंबर को डीजल पर शुल्क 25 रुपये प्रति लीटर था, जिसे अब घटाकर 16 रुपये कर दिया गया है। यानी एक महीने में इसमें 9 रुपये प्रति लीटर की कमी हुई है। वहीं, ATF पर निर्यात शुल्क इस अवधि में 19 रुपये से घटकर 10.5 रुपये प्रति लीटर रह गया है। यानी ATF पर 8.5 रुपये प्रति लीटर की कटौती की गई है।

घरेलू पेट्रोल-डीजल की एक्साइज ड्यूटी में बदलाव नहीं

सरकार ने स्पष्ट किया है कि घरेलू खपत के लिए जारी किए जाने वाले पेट्रोल और डीजल पर मौजूदा एक्साइज ड्यूटी दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। यानी यह फैसला मुख्य रूप से पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात पर लगने वाली लेवी से जुड़ा है।

हर पखवाड़े होती है शुल्क की समीक्षा

पेट्रोल, डीजल और ATF पर निर्यात शुल्क 27 मार्च 2026 से लगाया गया था। पश्चिम एशिया में संकट के बीच पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात को हतोत्साहित करने और घरेलू बाजार में इनकी उपलब्धता बनाए रखने के उद्देश्य से यह व्यवस्था लागू की गई थी। सरकार इन निर्यात शुल्क दरों की हर 15 दिन में समीक्षा करती है। इसके लिए पिछली समीक्षा के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल, पेट्रोल, डीजल और ATF की औसत कीमतों को आधार बनाया जाता है।

1 अक्टूबर से लागू नई दरें भी इसी समीक्षा प्रक्रिया का परिणाम हैं। अगली समीक्षा में अंतरराष्ट्रीय कीमतों के आधार पर इन शुल्क दरों में फिर बदलाव किया जा सकता है। सरकार की ताजा अधिसूचना ने 26 मार्च को जारी उन अधिसूचनाओं में संशोधन किया है, जिनके तहत पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात पर लेवी लागू की गई थी।

₹6 करोड़ बना ₹433 करोड़! इस IPO ने आशीष कचोलिया और मुकुल अग्रवाल को किया मालामाल

ESDS Software Solution Multibagger Returns: शेयर बाजार में 4 सितंबर को ESDS Software Solution के शेयरों की लिस्टिंग हुई। लिस्टिंग के बाद इसमें आई आतिशी तेजी ने दलाल स्ट्रीट में तहलका मचा दिया है। ब्लॉकबस्टर लिस्टिंग और रिकॉर्ड रैली से बाजार के दो सबसे दिग्गज बिग-बुल निवेशकों आशीष कचोलिया और मुकुल अग्रवाल को मल्टीबैगर रिटर्न मिला है।

अक्टूबर 2024 में कंपनी में बेहद मामूली रकम लगाने वाले आशीष कचोलिया का निवेश महज दो साल से भी कम समय में 70 गुना से ज्यादा बढ़ चुका है, जबकि मुकुल अग्रवाल के होल्डिंग की वैल्यू भी ₹1,100 करोड़ के आंकड़े को पार कर गई है।

आशीष कचोलिया का ₹6.14 करोड़ का निवेश बना ₹433 करोड़

स्मॉलकैप और मिडकैप शेयरों के पारखी माने जाने वाले दिग्गज निवेशक आशीष कचोलिया ने ESDS Software Solution में प्री-आईपीओ चरण के दौरान ही दांव लगा लिया था। कचोलिया ने अक्टूबर 2024 में इस कंपनी में ₹164 प्रति शेयर के भाव पर ₹6.14 करोड़ का शुरुआती निवेश किया था। कंपनी के आईपीओ तक उनके पास करीब 24.6 लाख शेयर थे। ₹429 प्रति शेयर के इश्यू प्राइस पर उनकी इस हिस्सेदारी की वैल्यू करीब ₹103 करोड़ तय हुई थी।

लिस्टिंग के बाद शेयर में आई तूफानी तेजी के चलते कछोलिया के इसी पोर्टफोलियो की वैल्यू अब बढ़कर ₹433 करोड़ हो चुकी है। यानी उन्हें अपने मूल निवेश पर 70 गुना से अधिक का रिटर्न मिला है।

मुकुल अग्रवाल का ₹302 करोड़ का दांव अब ₹1,176 करोड़ के पार

बाजार के एक और दिग्गज निवेशक मुकुल अग्रवाल की होल्डिंग में भी इस आईपीओ की लिस्टिंग के बाद जबरदस्त इजाफा देखने को मिला है। ESDS के ऑफर डॉक्यूमेंट्स के अनुसार, आईपीओ से पहले मुकुल अग्रवाल के पास कंपनी के 70.3 लाख शेयर थे, जो कुल इक्विटी का लगभग 7% हिस्सा था।

आईपीओ के ₹429 के अपर प्राइस बैंड पर उनके इस 7% शेयर की कुल वैल्यू करीब ₹302 करोड़ थी। शेयर में लिस्टिंग के बाद आए 240% के उछाल के बाद, मुकुल अग्रवाल के इस स्टेक की वैल्यू बढ़कर ₹1,176 करोड़ के स्तर पर पहुंच चुकी है।

136 गुना सब्सक्रिप्शन और 240% की गदर रैली

ESDS Software Solution का ₹720 करोड़ का आईपीओ प्राइमरी मार्केट में 28 अगस्त से 1 सितंबर 2026 के बीच खुला था। कंपनी ने इसके लिए ₹408 से ₹429 प्रति शेयर का प्राइस बैंड तय किया था।

प्राइमरी मार्केट में बंपर मांग: निवेशकों की भारी मांग के चलते यह इश्यू ओवरऑल 136 गुना सब्सक्राइब हुआ था।

240% का रिटर्न: 4 सितंबर को धमाकेदार डेब्यू करने के बाद से यह शेयर अपने इश्यू प्राइस ₹429 से करीब 240% चढ़ चुका है।

₹20,000 करोड़ का मार्केट कैप: शेयर में आई इस ऐतिहासिक तेजी से कंपनी का कुल मार्केट कैपिटलाइजेशन (M-Cap) ₹20,000 करोड़ के बेहद करीब पहुंच गया है।

टाटा और केपीआईटी को पछाड़ा: बाजार पूंजीकरण के इस आंकड़े के साथ ESDS Software ने अपनी सेक्टर की कई बड़ी लिस्टेड कंपनियों जैसे- Tata Elxsi, Firstsource Solutions और KPIT Technologies को पीछे छोड़ दिया है।

क्या करती है ESDS Software Solution?

ESDS Software Solution देश की अग्रणी एआई-इनेबल्ड क्लाउड, मैनेज्ड सर्विसेज, डेटा सेंटर इंफ्रास्ट्रक्चर और सॉफ्टवेयर सॉल्यूशंस प्रोवाइडर कंपनी है। भारत में डेटा लोकलाइजेशन, क्लाउड अडॉप्शन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की बढ़ती मांग के बीच कंपनी का बिजनेस मॉडल बेहद मजबूत स्थिति में माना जा रहा है, यही वजह है कि दलाल स्ट्रीट के दिग्गज निवेशकों ने इसमें भारी दांव लगाया था।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Tata Motors की गाड़ियां हो सकती हैं और महंगी, कमोडिटी की बढ़ती लागत मार्जिन पर डाल रही दबाव

ऑटोमोबाइल कंपनी टाटा मोटर्स पैसेंजर व्हीकल्स (PV) की गाड़ियों की कीमतें और बढ़ सकती हैं। कच्चे माल की लागत में काफी बढ़ोतरी के कारण कंपनी के प्रॉफिट मार्जिन को और झटका लगने की आशंका है। लिहाजा हो सकता है कि कंपनी को कीमतें बढ़ानी पड़ें। अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण ऊर्जा, माल ढुलाई और कच्चे माल की लागत बढ़ गई है। इसके चलते कंपनियों को या तो बढ़ी हुई लागत का कुछ हिस्सा खुद सहना पड़ रहा है या बोझ ग्राहकों पर डालना पड़ रहा है।

न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, टाटा मोटर्स पीवी के मैनेजिंग डायरेक्टर और सीईओ शैलेश चंद्रा का कहना है कि कंपनी पैसेंजर व्हीकल्स की कीमतों में आगे चरणबद्ध ढंग से और बढ़ोतरी करने पर विचार कर रही है। कंपनी कमोडिटी की लागत में हुई बढ़ोतरी के एक बड़े हिस्से का बोझ अभी खुद ही उठा रही है और लागत घटाने की कोशिशें भी कर रही है।

उन्होंने कहा, ‘‘हम हर महीने इसकी समीक्षा कर रहे हैं कि गाड़ियों की कीमतों में एक निश्चित स्तर की बढ़ोतरी करने का अवसर कब मिलेगा। हालांकि, कीमतों में बढ़ोतरी छोटी-छोटी किश्तों में की जाएगी ताकि मांग पर तुरंत असर न पड़े।’’ चंद्रा के मुताबिक, “जिस तेजी से लागत बढ़ी है, उसी तेजी से इन बढ़ी हुई कीमतों का बोझ बाजार पर डालना संभव नहीं है…जिसके कारण मार्जिन पर भारी दबाव पड़ रहा है और लागत घटाने के प्रयासों पर अधिक ध्यान देना पड़ रहा है।”

पैसेंजर व्हीकल्स के बाद अब कमर्शियल व्हीकल्स भी होने वाले हैं महंगे

टाटा मोटर्स पैसेंजर व्हीकल्स लिमिटेड (TMPV) ने 1 सितंबर से अपनी सभी गाड़ियों की कीमतें 25,000 रुपये तक बढ़ा दी हैं। कंपनी ने बयान में कहा था कि बढ़ोतरी के तहत सभी सेगमेंट्स के इंटर्नल कंबंशन इंजन (ICE) व्हीकल्स और इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EVs) आएंगे। कीमतों में बढ़ोतरी मॉडल और वेरिएंट्स के आधार पर अलग-अलग होगी। इसके अलावा टाटा मोटर्स अपने कमर्शियल व्हीकल्स की कीमतें 1 अक्टूबर से 1 प्रतिशत तक बढ़ाने वाली है।

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सबसे बड़ी चिंता अनिश्चितता

रॉयटर्स के मुताबिक, चंद्रा का कहना है कि सबसे बड़ी चिंता अनिश्चितता है। लागत इतनी ही बढ़नी थी, या कमोडिटी के मामले में आगे और दबाव आना बाकी है, इसे लेकर अभी कुछ भी स्पष्ट नहीं है। चंद्रा का यह भी कहना है कि टाटा मोटर्स पीवी ने अपनी इलेक्ट्रिक कार उत्पादन क्षमता को दोगुना करके प्रति माह 16,000 यूनिट से अधिक कर दिया है। कंपनी बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए बढ़ोतरी जारी रखे हुए है। भारत में टाटा मोटर्स पीवी की कुल कार बिक्री में इलेक्ट्रिक कारों की हिस्सेदारी 21 प्रतिशत है।

असम में मुस्लिम शादियों के रजिस्ट्रेशन का नया नियम, कैबिनेट ने लिए कई अहम फैसले!

गुवाहाटी, 24 सितंबर (PTI), असम कैबिनेट की बैठक में गुरुवार को कई फैसलों को मंजूरी दी गई। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने बैठक के बाद बताया कि राज्य में मुस्लिम शादियों का रजिस्ट्रेशन अब अनिवार्य होगा। इसके लिए ‘असम मुस्लिम विवाह पंजीकरण (अनिवार्य) नियम, 2026’ को मंजूरी दी गई है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार ने पहले काजियों से मुस्लिम शादियों के रजिस्ट्रेशन पर रोक लगाई थी, लेकिन तब इसकी जगह दूसरी व्यवस्था नहीं हुई थी। अब इस कमी को दूर कर पूरे असम में रजिस्ट्रेशन की एक जैसी प्रोसेस बनाई है। ये नए नियम ‘असम मुस्लिम विवाह और तलाक अनिवार्य पंजीकरण अधिनियम, 2024’ की धारा 25 के तहत बनाए गए हैं।

कैबिनेट ने महिला स्वयं सहायता समूह (SHG) मेंबर को आधार बनवाने के लिए एक बार की छूट दी है। अब ये महिलाएं 31 मार्च 2027 तक आधार एनरोलमेंट करा सकेंगी।

ये लिए कैबिनेट ने 5 बड़े फैसले

1. महिला SHG को आधार में राहत: सरकार ने 16 साल से ऊपर के लोगों के नए आधार बनाने पर रोक लगाई थी, लेकिन SHG की कई महिलाओं का आधार नहीं होने से बैंक लोन अटक रहा था। इसलिए उन्हें 31 मार्च 2027 तक आधार बनवाने की वन-टाइम छूट दी गई है।

2. मछली पालन को बूस्ट: 796.88 करोड़ के SWIFT प्रोजेक्ट को मंजूरी। इसमें 637 करोड़ ADB देगा। इससे राज्य के 102 बील (तालाब) का विकास होगा और मछली पालकों को फायदा मिलेगा।

3. 11,000 करोड़ का निवेश: JK लक्ष्मी सीमेंट राज्य में क्लिंकर यूनिट और 4 ग्राइंडिंग यूनिट लगाएगी। इससे 2,000 लोगों को नौकरी मिलेगी।

4. चीनी सस्ती: अक्टूबर में NFSA लाभार्थियों को 30 रुपये किलो चीनी मिलेगी, जिससे 100 रुपये में दाल और चीनी दोनों मिल जाएंगे।

5. जमीन अलॉट: हाजो में 504 बीघा जमीन इंडस्ट्रियल एस्टेट के लिए और श्रीभूमि में एग्रीकल्चर कॉलेज के लिए 256 बीघा जमीन अलॉट की गई है।

कैबिनेट ने 1 सितंबर से 166 मस्टर रोल, कैजुअल और फिक्स्ड-पे इम्प्लॉई को फिक्स्ड पेमेंट देने की मंजूरी दी है। साथ ही नवंबर में दो ऑटोनॉमस काउंसिल के चुनाव कराने और UNNATI 2024 में एलिजिबल मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स को सब्सिडी देने का फैसला किया गया है।

फरीदाबाद के पास नया शहर बसाने की तैयारी में HSVP, 10 लाख लोगों के रहने का तैयार हो रहा मास्टर प्लान

हरियाणा सरकार ने ‘नमो सिटी’ को विकसित करने का काम शुरू कर दिया है। यह एक ‘ग्रीनफील्ड’ शहर होगा, जिसे कुंडली-मानेसर-पलवल (KMP) एक्सप्रेसवे और जल्द बनने वाले दिल्ली-कटरा एक्सप्रेसवे के आस-पास बसाने की योजना है। हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (HSVP) ने लगभग 9000 एकड़ की इस परियोजना के लिए झज्जर, सोनीपत और रोहतक जिलों के गांवों की पहचान की है। प्राधिकरण ने वहां के किसानों से कहा है कि वे 31 अक्टूबर तक ‘ई-भूमि’ पोर्टल पर अपनी सहमति दें।

नमो सिटी क्या है?

मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने सबसे पहले इस साल जून के आखिर में नमो सिटी का विचार पेश किया था। तब वे दिल्ली के व्यापार प्रतिनिधियों से मिले थे और राजधानी के भीड़-भाड़ वाले बाजारों से थोक व्यापारियों को बाहर लाने के लिए 5,000 एकड़ की कमर्शियल टाउनशिप का प्रस्ताव रखा था।

सैनी का था ये प्रस्ताव

प्रस्ताव में एक ऐसा शहर जिसमें चौड़ी सड़कें, आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर, सिंगल-विंडो और समय-सीमा के भीतर मंजूरी की व्यवस्था हो। निवेश व रोजगार से जुड़े प्रोत्साहन भी मिलें। हरियाणा सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी की जानकारी के मुताबिक नमो सिटी का कॉन्सेप्ट KMP बेल्ट के लिए पहले से मौजूद बड़े विचार का ही एक हिस्सा है।

साल 2018 में हरियाणा कैबिनेट ने ‘पंचग्राम विकास विधेयक’ को मंजूरी दी थी। इसमें 50,000 हेक्टेयर में पांच नए शहर बसाने की योजना थी, जो आठ जिलों – सोनीपत, रोहतक, झज्जर, गुरुग्राम, रेवाड़ी, मेवात (नूंह), फरीदाबाद और पलवल – में एक्सप्रेसवे के किनारे स्थित होंगे।

इसके अलावा नेशनल कैपिटल रीजन प्लानिंग बोर्ड (NCRPB) ने 16 जून को ‘नमो भारत रीजनल रैपिड ट्रांजिट सिस्टम’ (RRTS) कॉरिडोर के किनारे आत्मनिर्भर और पर्यावरण के अनुकूल शहरी केंद्र के तौर पर ‘नमो सिटी’ बसाने पर चर्चा की थी। यह उसी ब्रांडिंग से जुड़ा, लेकिन एक अलग हिस्सा है।

असल में नमो सिटी ब्रांडिंग का विचार भी उसी बैठक के एक फैसले से आया है। उस बैठक में बोर्ड ने नमो भारत (RRTS) कॉरिडोर के मौजूदा और आने वाले चुनिंदा स्टेशनों पर चार ‘सेमी-ग्रीनफील्ड’ शहरों को ‘मिक्स्ड-यूज’ और ‘ट्रांजिट-ओरिएंटेड डेवलपमेंट’ (यातायात-केंद्रित विकास) के तौर पर विकसित करने का प्रस्ताव दिया था। इनका नाम ‘नमो सिटी’ रखा जाएगा और इन्हें नेशनल कैपिटल रीजन में शामिल राज्यों के बीच एक कॉम्पिटिटिव प्रोसेस के जरिए चुना जाएगा।

इस योजना को आगे बढ़ाने के लिए बोर्ड ने ₹5,000 करोड़ के परफॉर्मेंस-लिंक्ड इंसेंटिव को मंज़ूरी दी। इसमें ग्रांट, लोन और गारंटी सपोर्ट का मिला-जुला रूप शामिल है, जिसमें ₹1,000 करोड़ की ग्रांट भी है। NCRPB की फंडिंग का मकसद इन नोड्स पर विकास को तेजी देना है।

अधिकारी ने बताया कि हरियाणा का KMP-लिंक्ड नमो सिटी दो चीजों से प्रेरित है

जून में व्यापारियों को दूसरी जगह बसाने की घोषणा और एक्सप्रेसवे के किनारे सुनियोजित सैटेलाइट शहर बनाने का पुराना सपना। HSVP के जमीन अधिग्रहण के विज्ञापन (जो 1 सितंबर को छपा था) में नमो सिटी को 64,000 एकड़ के बड़े प्रोजेक्ट के हिस्से के तौर पर 9,000 एकड़ में बनाने की बात कही गई थी। इस बड़े प्रोजेक्ट में सोनीपत, रोहतक और झज्जर जैसे कई कस्बों में आम रिहायशी-कमर्शियल-संस्थागत विस्तार और ट्रांसपोर्ट नगर योजनाएं भी शामिल हैं। ये वही तीन जिले हैं, जिन्हें नमो सिटी के लिए चुना गया है।

HSVP ने नमो सिटी के लिए खास तौर पर 10 रेवेन्यू गांवों की पहचान की है

रोहतक में हसनगढ़ (1,320 एकड़), झज्जर में निलोठी, खेड़ी जसौर, जसौर खेड़ी और लोहारहेड़ी ( 1,731, 2,269, 1,315 और 1,117 एकड़) और सोनीपत में पाई, बरौना, खुरमापुर, रोहना और किढोली ( 1,040, 174, 440, 516 और 30 एकड़)। इन सबको मिलाकर कुल जमीन लगभग 10,000 एकड़ होती है।

इन गांवों के किसानों से कहा गया है कि वे 31 अक्टूबर तक e-Bhoomi पोर्टल पर अपनी सहमति दर्ज करें। इसके बाद HSVP का कहना है कि वह पॉलिसी के मुताबिक जमीन खरीदने और विकास का काम शुरू करेगा।