Asian Market Today: अमेरिकी AI कंपनियों की शानदार कमाई से एशियाई बाजारों में तेजी,Kospi 3.6% तक उछला

Asian Market Today: एशियाई बाजारों में तेजी देखने को मिली। अमेरिकी इक्विटी-इंडेक्स फ्यूचर्स में आई बढ़त का असर एशियाई बाजारों पर दिखा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के दौर से सबसे ज्यादा फायदा उठाने वाली कुछ बड़ी कंपनियों की शानदार कमाई ने निवेशकों का टेक्नोलॉजी शेयरों के प्रति उत्साह फिर से जगा दिया है।

MSCI एशिया पैसिफिक इंडेक्स 0.6% ऊपर चढ़ा, जिसमें दक्षिण कोरिया और जापान सबसे आगे रहे। दक्षिण कोरिया का कोस्पी (Kospi) इंडेक्स 3.62% उछल गया। इससे पहले, दक्षिण कोरिया के बाजार में हाल ही में एक IPO की शुरुआत बेहद खराब रही थी, जिससे अब बाजार ने जोरदार वापसी की है। जापान में, निक्केई 225 (Nikkei 225) में 1.76% और व्यापक टॉपिक्स (Topix) इंडेक्स में 1.12% की बढ़त दर्ज की गई। हैंग सेंग फ्यूचर्स भी 0.5% ऊपर रहा।

भारत में, GIFT निफ्टी (जो यह संकेत देता है कि दिन की शुरुआत में शेयर बाजार कैसा रहेगा) ने सूचकांकों के लिए एक सकारात्मक (हरे निशान में) शुरुआत का अनुमान जताया है।

इसके अलावा, बुधवार को जियो प्लेटफॉर्म्स (Jio Platforms) के इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग (IPO) के लिए सब्सक्रिप्शन भी शुरू होने जा रहा है। बाजार के जानकारों ने इसे ‘सभी IPO की जननी’ (Mother of all IPOs) करार दिया है, क्योंकि उम्मीद है कि यह देश के इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा IPO होगा। करेंसी मार्केट में, जापानी येन 158.29 प्रति डॉलर के स्तर पर लगभग स्थिर रहा, जबकि ऑफशोर युआन 6.6746 प्रति डॉलर पर बना रहा।

अमेरिकी स्टॉक फ्यूचर्स में भी तेजी दिखी। नैस्डैक 100 (Nasdaq 100) फ्यूचर्स 0.7% ऊपर चढ़े। वहीं, स्पेसएक्स (SpaceX) के शेयरों में एक्सटेंडेड ट्रेडिंग के दौरान करीब 7% की उछाल आई, क्योंकि कंपनी ने अपने तीसरी तिमाही के नतीजे जारी किए हैं।

सुपर माइक्रो कंप्यूटर (Super Micro Computer) ने भी उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया और पोस्ट-मार्केट ट्रेडिंग में 15% की तेजी दर्ज की, जिससे AI-इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े शेयरों को बढ़ावा मिला। दूसरी ओर, नेटफ्लिक्स (Netflix) के शेयरों में गिरावट आई, क्योंकि कंपनी ने भविष्य के लिए निराशाजनक अनुमान (forecast) जारी किया है।

स्पेसएक्स (SpaceX) की इस तेजी के पीछे एलन मस्क की सैटेलाइट, रॉकेट और AI कंपनी का शानदार प्रदर्शन रहा। सितंबर में समाप्त तिमाही के लिए कंपनी ने 4.4 अरब डॉलर की नेट इनकम दर्ज की, जबकि इसका रेवेन्यू एक साल पहले की तुलना में 161% बढ़ गया है।

इसके अलावा, मस्क ने बताया कि स्पेसएक्स और टेस्ला ने संभावित विलय (merger) की संभावना तलाशने के लिए विशेष कमेटियां बनाई हैं। यह कदम अब तक के सबसे बड़े कॉर्पोरेट गठबंधन की दिशा में एक शुरुआती पहल है।

पिछले हफ्ते AI वैल्यूएशन और फाइनेंसिंग को लेकर चिंताओं के कारण टेक्नोलॉजी शेयरों में काफी उतार-चढ़ाव आया था, लेकिन हालिया नतीजों ने निवेशकों को कुछ राहत दी है। अब निवेशकों की नज़र कंपनियों के आने वाले नतीजों पर है। वे यह देखना चाहेंगे कि क्या विकास के आंकड़े AI इंफ्रास्ट्रक्चर में लगाए जा रहे अरबों डॉलर के निवेश को सही ठहराते हैं।

इस बीच, मंगलवार को उतार-चढ़ाव भरे सत्र के बाद, एशियाई बाज़ार की शुरुआती ट्रेडिंग में तेल की कीमतों में आई तेज़ी बनी रही। मंगलवार को ट्रेडर्स अमेरिका-ईरान युद्ध को खत्म करने की कोशिशों से जुड़ी अलग-अलग खबरों का आकलन कर रहे थे। एशियाई बाज़ार की शुरुआत में ब्रेंट क्रूड 109.52 डॉलर पर कारोबार कर रहा था, जबकि US वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) 0.7% की बढ़त के साथ 98.48 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया।

बॉन्ड बाजार में, न्यूयॉर्क सत्र के दौरान लॉन्ग-टर्म US ट्रेज़री का प्रदर्शन बेहतर रहा, जिसका असर डॉलर पर पड़ा। इस साल अब तक US ट्रेज़री यील्ड पर तेल की कीमतों का काफी असर रहा है, लेकिन पिछले हफ्ते बॉन्ड निवेशकों ने कच्चे तेल की कीमतों पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया, क्योंकि AI निवेश से जुड़े शेयरों में भारी बिकवाली देखने को मिली।

(डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सार्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

दुनिया बना रही बुद्धि, भारत बनेगा पालतू?

बुद्धि के ब्रह्म ने मानो मशीन में, एआई में अपना निवास बना लिया हो। तभी अब मशीनें मनुष्य से लाखों गुना विशाल दिमाग दिखलाते हुए हैं। हर दिन, हर सप्ताह इतनी खबरें, ऐसी-ऐसी कवर स्टोरीज आ रही हैं कि अब एआई का न ओर है और न छोर। इस सप्ताह पत्रिका द इकोनॉमिस्ट का कवर देखा, यूरेका एआई! यदि विज्ञान की खोजों का जिम्मा मशीनों ने अपने हाथ में ले लिया तो? देख पढ़ने की तुक समझ नहीं आई। लगा पढ़ने की जरूरत ही नहीं है! आखिर मनुष्य यानी पाठक पढ़े भी तो उसमें एआई के असीम को समझने, विचारने का सामर्थ्य कितना है? उसके करने के लिए अब है क्या? बेचारा मनुष्य। जहाँ वह असंख्य दिमागी सीमाओं में बँधा हुआ है, वहीं एआई स्वतंत्र है, स्वच्छंद है, बेफिक्र है और अपने ही पुर्जों, भाषा के अनंत में उड़ता हुआ।

बात केवल लिखने-पढ़ने की ही नहीं है। द इकोनॉमिस्ट की 15 अक्टूबर की कवर स्टोरी के अनुसार, छह अक्टूबर 2026 का दिन गणित के इतिहास का सबसे बड़ा दिन साबित हो सकता है। कैसे? इस दिन अमेरिकी कंपनी ओपनएआई ने एक ही दिन में 719 शोधपत्र जारी किए। दावा किया कि उसके एआई मॉडल ने गणित की कम से कम 372 ऐसी समस्याओं के समाधान खोज लिए हैं जिनमें बड़े-बड़े गणितज्ञ दशकों से उलझे हुए थे। उससे पहले सितंबर में एआई ने तरल पदार्थों की गति से जुड़ी एक ऐसी गणितीय समस्या को महज 88 घंटों में हल करने का दावा किया जिस पर गणितज्ञ एक सदी से माथापच्ची कर रहे थे।

नतीजतन गणितज्ञ हैरान-परेशान हैं। कुछ तो विरोध में उतर आए हैं। आखिर मनुष्य के वर्षों के अध्ययन, चिंतन और शोध का अर्थ क्या बचेगा यदि मशीन चंद घंटों में उत्तर निकाल दे? और वह भी ऐसे उत्तर जिन्हें सही मानने से पहले मनुष्य को समझने में ही महीनों लग जाएँ! ध्यान रहे, ये एआई कंपनियों के घोषित समाधान हैं, जिनकी स्वतंत्र वैज्ञानिक जाँच और पुष्टि अलग प्रश्न है।

पर गणित मात्र एक विषय है। मौसम की भविष्यवाणी, परमाणु संलयन के प्रयोग, नई धातुओं और पदार्थों की खोज, प्रोटीन की संरचना, दवाइयों का निर्माण आदि सभी में तो एआई घुस चुकी है। जीव विज्ञान में भी छलाँगें हैं। मशीनें डीएनए की भाषा पढ़ रही हैं। उसमें फेरबदल सुझा रही हैं। सूखे और गर्मी को झेलने वाली फसलें तैयार करने की कोशिश हो रही है। प्रयोगशालाओं में जीवित कोशिकाओं के कंप्यूटर मॉडल बनाने की तैयारी है। मतलब कल को वैज्ञानिक किसी दवा का असर पहले कंप्यूटर की आभासी कोशिका पर जाँचेंगे। और आगे? बिल्कुल नए जीवों की रचना भी संभव होगी! द इकोनॉमिस्ट ने बताया है कि एआई की मदद से प्राकृतिक वायरसों से अलग सोलह प्रयोगात्मक वायरस बनाए जा चुके हैं, जो बैक्टीरिया पर हमला करते हैं। सोचें, जिस जीव-जगत को समझने में मनुष्य को सदियाँ लगीं, अब उसकी जैविक संरचना में परिवर्तन और नए जीव बनाने की संभावनाएँ मशीनों से लगातार खुल रही हैं और खुलती जाएँगी।

असली बात इससे भी आगे की है। गूगल डीपमाइंड, ओपनएआई और एंथ्रोपिक जैसी कंपनियाँ एआई को केवल वैज्ञानिकों की सहायता करने वाला औजार नहीं बनाए रखना चाहतीं। वे स्वयं वैज्ञानिक खोजों के मैदान में उतर रही हैं। क्यों? इसलिए भी कि विज्ञान की कठिन समस्याएँ हल करते हुए उनके एआई मॉडल और अधिक बुद्धिमान बन सकते हैं। यानी मशीन विज्ञान की समस्याएँ सुलझाएगी, उससे अपनी बुद्धि बढ़ाएगी और फिर उसी बढ़ी हुई बुद्धि से अपने से भी बेहतर मशीन बनाने की कोशिश करेगी।

तब मनुष्य कहाँ होगा? वैज्ञानिक खोज का मालिक, उसका निरीक्षक या मशीन द्वारा निकाले गए निष्कर्षों को समझने में लगा एक विद्यार्थी, शोधकर्ता? द इकोनॉमिस्ट की संपादकीय चिंता यही है कि विज्ञान में मनुष्य की समझ और नियंत्रण बना रहना चाहिए। अन्यथा वह स्थिति भी संभव है जिसमें मशीनें खोजें करती रहें और मनुष्य केवल उनसे पूछता रहे कि अब क्या करना है। पत्रिका ने तो यहाँ तक लिखा है कि ऐसा समाज मनुष्यों को मशीनों के पालतू प्राणियों जैसी स्थिति में पहुँचा सकता है!

इस नई दुनिया का बाजार तेजी से सभी ओर बन रहा है। एआई की बुद्धि अब टोकन के हिसाब से बिक रही है। जिस तरह कभी अनाज, नमक या पशुओं से मूल्य का हिसाब होता था, वैसे अब मशीन की भाषा पढ़ने, लिखने और सोचने की कीमत टोकन में तय हो रही है। एक कंपनी का एआई दूसरी कंपनी से चालीस गुना सस्ता हो सकता है। सस्ते और महँगे एआई मॉडलों के बीच ग्राहक को चुनाव कराने वाली ओपनराउटर जैसी कंपनी को खरीदने के लिए भुगतान कंपनी स्ट्राइप ने कथित तौर पर 7.5 अरब डॉलर का सौदा किया है।

यानी बुद्धि का नया बाजार! किस काम के लिए सस्ती मशीन का दिमाग लगाना है और किस काम के लिए महँगी मशीन का, यह कारोबार का नया हिसाब, नया मॉडल है। जाहिर है औद्योगिक उत्पादनों, सेवाओं में जैसे सस्ते विकल्प देकर बाजार पर कब्जा करता है वैसे ही एआई बाजार में भी चीन की डीपसीक जैसी कंपनियाँ सस्ते एआई मॉडल बेचकर अमेरिकी कंपनियों को चुनौती दे रही हैं।

और अब जरा कल्पना करें, दिमाग में भारत पर सोचें तो क्या मिलेगा? खाली खोखा! दुनिया में जब अमेरिका और चीन की कंपनियाँ मशीनों से गणित की अनसुलझी समस्याएँ हल कराने, नई दवाएँ और जीव बनाने तथा एआई से एआई की बुद्धि बढ़ाने में लगी हैं, तब भारत इस वैज्ञानिक क्रांति में कहाँ खड़ा है? बकौल विश्व बौद्धिक संपदा संगठन के ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स 2026 के, भारत इनोवेशन में 139 अर्थव्यवस्थाओं की लिस्ट में 38वें स्थान पर है। स्विट्जरलैंड पहले, स्वीडन दूसरे, अमेरिका तीसरे, दक्षिण कोरिया चौथे और सिंगापुर पाँचवें स्थान पर हैं। चीन दसवें स्थान पर पहुँच चुका है।

मतलब दुनिया में नवाचार की दौड़ का हिसाब देखें तो भारत अभी पहले तीस देशों में भी नहीं है। जबकि भारत दुनिया की सबसे बड़ी आबादी और अर्थव्यवस्थाओं में एक है। उसके नौजवान वैश्विक तकनीकी कंपनियों में काम कर रहे हैं। कहने को भारत सूचना प्रौद्योगिकी सेवाओं के निर्यात में दुनिया में पहले स्थान पर है। ऐसे ही विकसित चरण के स्टार्टअप उद्यमों में वेंचर कैपिटल सौदों के मामले में चौथे स्थान पर है। नवाचार से प्राप्त परिणामों में 25वें स्थान पर है। लेकिन मार कहाँ खा रहा है? नवाचार के लिए आबोहवा याकि जरूरी संसाधनों और व्यवस्थाओं में 49वें स्थान पर होने के कारण! मतलब दुनिया की तकनीक को चलाने, उसके लिए सेवाएँ देने और उसका बाजार बनने के जुगाड़ों में भारत आगे है, लेकिन मौलिक वैज्ञानिक अनुसंधान और नई तकनीक बनाने की बुनियादी क्षमता में पीछे।

जबकि चीन की छलाँगें क्या हैं? वह सॉफ्टवेयर और मोबाइल एप्लीकेशन से आगे सेमीकंडक्टर, उन्नत विनिर्माण और गहन वैज्ञानिक अनुसंधान की दुनिया में अपनी ताकत बढ़ा रहा है। द इकोनॉमिस्ट के अनुसार, अमेरिका में गहन विज्ञान और भौतिक तकनीक पर आधारित 12,752 स्टार्टअप हैं। चीन में ऐसी कंपनियों की संख्या 2025 में 3,466 हो गई। पाँच वर्षों में दोगुने से अधिक! और ये कंपनियाँ केवल मोबाइल एप्लीकेशन बनाने या ऑनलाइन सामान बेचने वाली नहीं हैं। ये भौतिक दुनिया की नई तकनीकों पर काम करने वाली कंपनियाँ हैं।

यानी चीन की तैयारी उस दुनिया के लिए है जिसमें मशीनें विज्ञान की खोज करेंगी और उनसे नई मशीनें, नई दवाएँ, नए पदार्थ और नई उत्पादन प्रणालियाँ बनेंगी। तब सवाल है कि भारत क्या करेगा? दुनिया की तकनीक का सेवा प्रदाता और उपभोक्ता बना रहेगा? या अपनी खोज, अपने आविष्कार और अपनी वैज्ञानिक क्षमता से उस दुनिया के निर्माण में भी हिस्सा लेगा?

सवाल केवल विज्ञान की प्रयोगशालाओं का नहीं है। मनुष्य के जीवन का भी है। आखिर विज्ञान, तकनीक, नवाचार और आर्थिक विकास किसलिए हैं? नागरिक के बेहतर जीवन के लिए ही न? पर भारत और भारत के नागरिक याकि भीड़ बेहतर जीवन की जिद कहाँ करते हैं? लोगों की जिंदगी खैराती बनने, प्रदूषणों, झुग्गी झोपड़ियों, कॉकरोचपने में ही विकसित भारत के सपनों की है। कोई आश्चर्य नहीं कि 2026 में भारत का एक भी शहर दुनिया के सौ सबसे रहने योग्य शहरों में नहीं है! इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट की 173 शहरों की ग्लोबल लिवेबिलिटी रैंकिंग में नई दिल्ली 120वें, मुंबई 121वें, चेन्नई 123वें और बेंगलुरु 127वें स्थान पर हैं। दुनिया में कोपेनहेगन पहले, वियना दूसरे और मेलबर्न तीसरे स्थान पर हैं।

भारत की राजधानी दिल्ली को स्वास्थ्य सेवाओं में महज 41.7 और संस्कृति तथा पर्यावरण में 35.4 अंक मिले। सोचें, देश की राजधानी की यह स्थिति! और वह भी तब जब दिल्ली में चमचमाते एयरपोर्ट हैं, मेट्रो है, एक्सप्रेसवे हैं, गगनचुंबी इमारतें हैं। खरबों रुपये निर्माण पर खर्च हुए हैं। बावजूद इसके नागरिक के लिए साफ हवा, अच्छी स्वास्थ्य सेवाएँ, सुरक्षित परिवेश और सुविधाजनक रोजमर्रा का जीवन उपलब्ध कराना चुनौती है। जबकि चीन के सभी सर्वेक्षित शहरों में स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार लगातार दर्ज होता हुआ है।

तो तस्वीर में एक मशीनें मनुष्य से आगे निकलने की तैयारी में हैं, वहीं दूसरी तरफ भारत में मनुष्य अभी रहने योग्य शहर की बुनियादी सुविधाओं के लिए भी तरस रहा है। वहाँ चिंता है कि एआई कहीं विज्ञान पर अधिकार न कर ले। यहाँ चिंता है कि प्रदूषण से साँस कैसे बचे, बीमारी में अस्पताल कैसा मिले, सड़क पर चलना कितना सुरक्षित हो और रोजमर्रा की जिंदगी कैसे कटे। दुनिया की वैज्ञानिक छलाँग और भारत के नागरिक की वास्तविकता का अंतर दिन-रात का है! कुछ भी हो सारे विकास की कसौटी तो अंततः मनुष्य जीवन के अपने बदलाव ही तो हैं!

और घूम फिर कर सवाल बुद्धि (मनुष्य की) पर लौटता है। अब तक मनुष्य स्वयं ज्ञान अर्जित करता था। उसे समझने, परखने, उस पर संदेह करने और आगे बढ़ाने में पीढ़ियाँ खपती थीं। अब मशीनें ज्ञान के ऐसे परिणाम सामने रख सकती हैं जिन तक पहुँचने का रास्ता स्वयं वैज्ञानिकों को समझ न आए। तब ज्ञान बढ़ेगा, लेकिन क्या मनुष्य की समझ उसी अनुपात में बढ़ेगी? खासकर भारत जैसे देशों में? दुनिया निश्चित ही आगे अधिक बुद्धिमान मशीनों और उन पर अधिक निर्भर मनुष्यों की बनेगी। उसके जो स्वामी मनुष्य होंगे, मालिक होंगे वे क्या हैसियत इसलिए हुए होंगे, इसकी कल्पना ही दहलाने वाली है!

Rakhi Sawant: यूपी की अदालत में राखी सावंत नहीं हुईं पेश, एक्ट्रेस के खिलाफ गैर-जमानती गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया

Rakhi Sawant: उत्तर प्रदेश के झांसी की एक अदालत ने अभिनेत्री राखी सावंत के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया है। यह मामला 2010 में हुई एक आत्महत्या से जुड़ा है, जिसमें आरोप है कि राखी ने अपने टीवी शो के दौरान एक स्थानीय निवासी के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी की थी। सरकारी वकील ने शनिवार को यह जानकारी दी।

जिला सरकारी वकील (अपराध) मृदुल कांत श्रीवास्तव ने बताया कि सिविल जज (जूनियर डिवीजन) अंजलि ने शुक्रवार को यह वारंट जारी किया है। क्योंकि राखी कई बार बुलाए जाने के बावजूद अदालत में पेश नहीं हुईं।

राखी सावंत से जुड़ा मामला

पीटीआई के अनुसार यह मामला झांसी के हंसारी प्रेम नगर इलाके के रहने वाले लक्ष्मण अहिरवार से जुड़ा है। वकील ने बताया कि 10 नवंबर 2010 को लक्ष्मण ने आत्महत्या कर ली थी। आरोप है कि राखी ने अपने टीवी शो ‘राखी का इंसाफ’ में कुछ ऐसी टिप्पणियां की थीं, जिनसे लक्ष्मण को अपमानित महसूस हुआ।

लक्ष्मण की मां सावित्री ने प्रेम नगर पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि अक्टूबर 2010 में प्रसारित शो के एक एपिसोड के दौरान राखी ने उनके बेटे के खिलाफ अपमानजनक और आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया था। अभियोजन पक्ष के अनुसार लक्ष्मण और उनकी पत्नी अनीता (जो राजगढ़ की रहने वाली थीं) को उनके वैवाहिक विवाद के चलते शो में बुलाया गया था। पति-पत्नी के बीच झगड़े के बाद अनीता अपने मायके लौट गई थीं। श्रीवास्तव ने बताया कि इस मामले की अगली सुनवाई 1 दिसंबर को तय की गई है।

राखी सावंत चर्चा में

हाल ही में राखी सावंत, गोविंदा और सुनीता आहूजा की शादी को लेकर की गई अपनी टिप्पणियों की वजह से चर्चा में थीं। उन्होंने गोविंदा के अपनी को-स्टार कोमल रानी स्वर्णकार के साथ कथित संबंधों पर भी प्रतिक्रिया दी। इस महीने की शुरुआत में पैपराजी से बात करते हुए राखी ने कहा कि वह गोविंदा से इसलिए नाराज हैं क्योंकि उन्होंने अपनी पत्नी को नजरअंदाज किया है। उन्होंने कहा- “गोविंदा जी पूरा देश आपसे नाराज है। जिस महिला ने आपसे शादी की आपके दो बच्चों को जन्म दिया और जो 40 सालों से आपके साथ रही आपने उसे छोड़ दिया। यह कोमल कौन है?”

इसके बाद राखी ने दावा किया कि कोमल उनके बारे में बुरा-भला कह रही हैं और उन्होंने कोमल को चेतावनी दी कि वह उनके सामने न आएं। उन्होंने हिंदी में कहा- “वह मेरी बुराई कर रही है और बाकी सेलिब्रिटीज के बारे में भी बकवास कर रही है। चिची भैया ने ही उसे इतनी छूट दी है। सुन लो मुझसे पंगा मत लेना। मैं सुनीता नहीं हूं, मैं तुम्हारी धज्जियां उड़ा दूंगी।” राखी ने कोमल को “पति चोर” भी कहा।

इससे पहले राखी के साथ फोन पर बातचीत के दौरान सुनीता ने आरोप लगाया था कि गोविंदा और कोमल शादी करने की योजना बना रहे हैं। सुनीता का दावा था कि इसी वजह से उन्होंने कोर्ट जाकर अपनी तलाक की अर्जी वापस ले ली थी। हालांकि बाद में गोविंदा के मैनेजर शशि सिन्हा ने दूसरी शादी के इन दावों को पूरी तरह से गलत बताते हुए खारिज कर दिया।

‘मुझे ऐसा लगता है जैसे मैंने अपनी कंपनी से 4.7 करोड़ चुराए हैं’, टेक कर्मचारी ने 2 साल तक कुछ काम न करने पर कही बड़ी बात

एक टेक कर्मचारी ने यह दावा करके इंटरनेट यूजर्स को हैरान कर दिया है कि उसने लगभग दो साल तक काम पर लगभग कुछ भी न करते हुए 275,000 डॉलर (करीब 2.6 करोड़ रुपये) की सालाना सैलरी कमाई। कर्मचारी का अनुमान है कि इस दौरान उसे 500,000 डॉलर (लगभग 4.7 करोड़ रुपये) से ज्यादा का भुगतान किया गया, जबकि उसके पास लगभग कोई जिम्मेदारी नहीं थी।

रेडिट पोस्ट वायरल

रेडिट (Reddit) पर एक पोस्ट में उसने बताया कि दुनिया की सबसे बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों में से एक में एक बड़ा प्रमोशन कैसे एक अप्रत्याशित मोड़ पर आ गया। कंपनी में अचानक हुए पुनर्गठन (restructuring) के कारण उसके पास न तो कोई सार्थक काम बचा और न ही उसे मैनेजमेंट से कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश मिले।

रेडिट के ‘r/corporate’ सबरेडिट पर अपना अनुभव साझा करते हुए कर्मचारी ने कहा- “मुझे ऐसा लगता है जैसे मैंने अपनी कंपनी से 500,000 डॉलर से ज्यादा चुरा लिए हैं।” उसने बताया कि उसने कंपनी में लगभग एक दशक बिताया और इस दौरान पांच अलग-अलग भूमिकाएं निभाईं। हालांकि 2025 की शुरुआत में जो उसके करियर का एक अहम पड़ाव होना चाहिए था, वह अनिश्चितता के एक लंबे दौर में बदल गया।

रेडिट यूजर के अनुसार- उसे एक नई टीम में शामिल होने का ऑफर मिला, जो उसके करियर में एक बड़ा कदम था। लेकिन जिस दिन उसने नई टीम जॉइन की उसी दिन कंपनी में बड़े पैमाने पर पुनर्गठन हुआ, जिसके चलते वे मैनेजर और डायरेक्टर दोनों ही कंपनी छोड़कर चले गए, जिन्होंने उसे काम पर रखा था।

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इस मौके के लिए अपने परिवार को वेस्ट कोस्ट से न्यूयॉर्क शहर ले जाने के बाद उन्होंने एक-दो सप्ताह इंतजार करने का फैसला किया कि नई लीडरशिप के तहत टीम कैसे काम करेगी। हालांकि हालात वैसे नहीं सुधरे जैसी उन्होंने उम्मीद की थी। उन्होंने लिखा- “तो वहां मैं था। साल के लगभग 275,000 डॉलर कमा रहा था एक ऐसी टीम में जहां कोई जिम्मेदारी या मैनेजमेंट का कोई दिशा-निर्देश नहीं था। बस कुछ नहीं कर रहा था।”

ऑफिस के कैफे में बैठकर यूट्यूब और नेटफ्लिक्स देखते थे

कर्मचारी ने बताया कि उनका अनुभव सिर्फ कम काम या कभी-कभार होने वाली मीटिंग्स से कहीं बढ़कर था। उन्होंने बताया कि वे अपने काम के घंटों में ऑफिस के कैफे में बैठकर यूट्यूब और नेटफ्लिक्स देखते थे। न्यूयॉर्क शहर के मशहूर रेस्तरां ढूंढ़ते थे और मैनहट्टन में घूमते-फिरते थे। भले ही यह सुनने में एक बहुत ही शानदार स्थिति लगे, लेकिन उन्होंने कहा कि किसी उद्देश्य का न होना धीरे-धीरे उनके लिए निराशा का कारण बन गया।

रेडिट यूजर ने यह भी बताया कि शुरुआत में उन्होंने सार्थक काम पाने और बिजनेस को बेहतर ढंग से समझने के लिए कई कोशिशें कीं। हालांकि उनका कहना है कि नए मैनेजर की तरफ से कोई खास दिशा-निर्देश नहीं मिले, जिसकी वजह से वे अपने काम से पूरी तरह अलग-थलग महसूस करने लगे।

आखिरकार उसने काम खोजने की नियमित कोशिशें बंद कर दीं और ज्यादातर दिन घर पर ही रहने लगा। उसने बताया कि वह अपने अपार्टमेंट के जिम में समय बिताता था, तरह-तरह के नाश्ते तैयार करता था, बालकनी में बैठकर शहर के नजारे देखते हुए कॉफी पीता था और कॉर्पोरेट जीवन की बेतुकी बातों के बारे में सोचता रहता था।

इस अनुभव ने टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री के प्रति उसके नजरिए को भी बदल दिया। उसने कहा कि उसे इस बात से काफी हैरानी हुई कि कोई कर्मचारी इतने लंबे समय तक बिना किसी काम (बिना किसी असाइनमेंट) के रह सकता है और फिर भी उसे अच्छी-खासी सैलरी मिलती रहती है।

टेक कर्मचारी का कहना है कि आखिरकार उसे एक बेहतर रोल मिल गया

इन अजीब हालात के बावजूद कर्मचारी ने तय किया कि वह इस अनचाहे ब्रेक का अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करेगा। कई महीनों तक इंटरव्यू देने के बाद उसे हाल ही में उसी कंपनी में एक और पद मिल गया, जिसे उसने अपने करियर में एक बड़ी तरक्की बताया। हालांकि वह इस नए मौके को लेकर उत्साहित था, लेकिन लगभग दो साल तक बिना किसी काम के रहने के बाद फिर से एक चुनौतीपूर्ण रोल में लौटना काफी मुश्किल साबित हुआ।

उन्होंने लिखा, “मुझे यहां आए अभी सिर्फ डेढ़ हफ्ता ही हुआ है और मुझे लगभग 2 साल तक कोई काम न करने का असर अभी से महसूस होने लगा है। मुझे लग रहा है कि मैं काफी पीछे छूट गया हूं और मेरी कार्यक्षमता भी काफी कम हो गई है।” फिर भी उन्होंने कहा कि वे खुश हैं कि उन्हें एक ऐसी भूमिका मिल गई है, जहां वे सार्थक योगदान दे सकते हैं और फिर से कुछ नया सीख सकते हैं।

जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें बिना ज्यादा काम किए सैलरी लेने पर कोई गिल्ट महसूस हुआ तो उन्होंने माना कि शुरुआत में उन्हें लगा जैसे वे कंपनी पर एक ‘बेवजह का खर्च’ बन गए हैं। ऐसा इसलिए था क्योंकि इससे पहले एक सेल्सपर्सन के तौर पर वे कंपनी के लिए काफी रेवेन्यू (कमाई) लाते थे।

हालांकि समय के साथ उनका यह अपराधबोध गुस्से में बदल गया और फिर उन्होंने स्थिति को स्वीकार कर लिया। आखिरकार उन्होंने इस समय का भरपूर फायदा उठाने का फैसला किया—अपनी पत्नी के साथ अच्छा समय बिताया, न्यूयॉर्क के अलग-अलग रेस्तरां में खाना चखा और खुद को एक बहुत जरूरी मानसिक ब्रेक दिया।

उन्होंने आगे कहा कि इस अनुभव ने उन्हें कॉर्पोरेट टेक्नोलॉजी नौकरियों के बारे में एक अलग नजरिया दिया है। यहां कर्मचारी कभी-कभी कंपनी की व्यवस्था की कमियों के बीच ऐसे छिप सकते हैं कि किसी को पता ही नहीं चलता कि उनकी जिम्मेदारियां क्या हैं।

पोस्ट के अंत में उन्होंने पाठकों को अपने सवाल पूछने के लिए इनवाइट किया। बाद में एक एडिट में उन्होंने अपने जैसे अनुभव साझा करने वाले लोगों को धन्यवाद दिया और कहा कि उनकी कहानियां सुनकर उन्हें अपनी स्थिति के बारे में बेहतर महसूस हुआ।

रेडिट यूजर्स ने अपने मिलते-जुलते अनुभव साझा किए

इस कर्मचारी की कहानी पढ़ने के बाद कई रेडिट यूजर्स ने अपने विचार साझा किए। कुछ लोगों को इस स्थिति से जलन हुई तो कुछ ने इस बात पर चिंता जताई कि कोई सार्थक काम न होने से मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ सकता है। एक यूजर ने कहा, “न्यूयॉर्क में इधर-उधर घूमना किसी सपने जैसा लगता है, लेकिन अगर मेरे हफ्ते में 2 दिन से ज्यादा समय खाली निकल जाए तो मैं पागल होने लगता हूं।”

एक दूसरे यूजर ने कहा, “मैं खुद टेक इंडस्ट्री में काम करता हूं और पूरे दिन व्यस्त रहता हूं, इसलिए आप मेरी ‘ड्रीम जॉब’ जी रहे हैं! बस फर्क इतना है कि अगर मैं आपकी जगह होता तो उस खाली समय का इस्तेमाल अपनी स्किल्स को बेहतर बनाने और नए सर्टिफिकेशन लेने में करता।”

एक तीसरे यूजर ने कहा, “मैं यहां कुछ पूछने नहीं आया हूं, बस इतना कहना चाहता हूं कि ‘मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ है!’ कुछ समय तक तो मजा आता है, लेकिन फिर यह निराशाजनक लगने लगता है। मुझे अभी एक प्रमोशन मिला है और मैं थोड़ा घबराया हुआ हूं क्योंकि अब मुझे सच में काम करना पड़ेगा, लेकिन साथ ही मुझे कुछ नया सीखने और असली काम करने का मौका भी मिलेगा! और हां, अब यह पूरी तरह से रिमोट (घर से काम) नहीं है, बल्कि हाइब्रिड है, जिसे लेकर मैं काफी उत्साहित हूं! और सबसे अच्छी बात यह है कि मैं यूरोप जा रहा हूं।”

जिस सिस्टम में हो उससे सवाल पूछना कभी मत छोड़ा, अभिनव बिंद्रा की खिलाड़ियों को सलाह

भारत के महान निशानेबाज अभिनव बिंद्रा ने शुक्रवार को कहा कि देश को ऐसे खिलाड़ियों की जरूरत है जो अपने ही काम पर, उन्हें बताई गई प्रक्रिया पर और उस ढांचे पर सवाल उठाये जिसमें वह काम करते हैं।बीजिंग ओलंपिक 2008 में व्यक्तिगत स्पर्धा का ओलंपिक स्वर्ण जीतने वाले पहले भारतीय बिंद्रा ने कहा कि उन्हें सफलता इसीलिये मिली क्योंकि वह सवाल पूछने का सामर्थ्य रखते थे।

उन्होंने संदर्भ का जिक्र नहीं करते हुए खिलाड़ियों को एक्स पर सलाह देते हुए कहा ,‘‘ मेरे पूरे खेल कैरियर में मैने कोचों से सवाल पूछे, सुझावों को चुनौती दी और उत्सुकता नहीं छोड़ी। इसलिये नहीं कि मैं सम्मान नहीं करता था बल्कि इसलिये कि मैं समझकर सीखना चाहता था।’’

उन्होंने कहा ,‘‘ मुझे चिंता है कि जब खिलाड़ियों को लगता है कि वे खुलकर अपनी बात नहीं कह सकते, तो समय के साथ कुछ कहीं ज्यादा चिंताजनक स्थिति पैदा हो जाती है। वे धीरे-धीरे अपने मन में भी सवाल पूछना बंद कर देते हैं। और जब ऐसा होता है, तो हम खेल में बेहतरीन प्रदर्शन के लिए जरूरी एक अहम चीज खो देते हैं।’’

बिंद्रा ने कहा ,‘‘ हमें ऐसे खिलाड़ी चाहिये जो अपने काम, अपने कोचों और उन्हें बताई गई प्रक्रिया पर सवाल उठा सकें। विद्रोह के लिये नहीं बल्कि बेहतर प्रदर्शन की वास्तविक इच्छा के लिये। कुछ को यह अनुशासनहीनता लग सकती है लेकिन विकास के लिये जरूरी है।’’उन्होंने कहा ,‘‘ सीखने की इच्छा छोड़ देने वाले खिलाड़ी और सवाल पूछना बंद करने वाले खिलाड़ी में फर्क है। यह अंतर समझना जरूरी है।’’

अब 43 साल के हो चुके बिंद्रा ने 2008 बीजिंग ओलंपिक में 10 मीटर एयर राइफल में स्वर्ण पदक जीता था। वह ओलिंपिक खेलों में व्यक्तिगत स्वर्ण पदक जीतने वाले भारत के पहले खिलाड़ी हैं।

वह 2010 से 2020 तक अंतरराष्ट्रीय निशानेबाजी खेल महासंघ (International Shooting Sport Federation ISSF) की एथलीट समिति के सदस्य थे जिसमें वह 2014 से इसके अध्यक्ष रहे। वह 2018 से आईओसी एथलीट आयोग के सदस्य हैं।

शेयर बाजार में हेरफेर मामले में ED की बड़ी कार्रवाई, 6 शहरों में 29 ठिकानों पर की छापेमारी

केंद्रीय जांच एजेंसी ईडी यानी प्रवर्तन निदेशालय (ED) के मुंबई जोनल ऑफिस-I ने शेयर बाजार में कथित हेरफेर और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में बड़ी कार्रवाई की है। ED ने 16 अक्टूबर 2026 को महाराष्ट्र, गुजरात समेत 6 शहरों में 29 ठिकानों पर छापेमारी की। यह कार्रवाई मुंबई, नासिक, अहमदाबाद, गांधीनगर, सूरत और भावनगर में की गई।

ED के इस जांच का संबंध लिस्टेड कंपनियों M/s R M Drip and Sprinklers Systems Ltd और M/s R&B Denims Ltd के शेयरों में कथित हेरफेर से है। ED ने प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA), 2002 के तहत यह कार्रवाई की है।

शेयरों के आवंटन से लेकर कीमत बढ़ाने तक की जांच

प्रवर्तन निदेशालय की जांच में सामने आया कि अप्रैल 2023 से मार्च 2024 के बीच दोनों कंपनियों ने चुनिंदा व्यक्तियों और संस्थाओं को 3.5 करोड़ से अधिक शेयर और कन्वर्टिबल वारंट जारी किए। जांच एजेंसी के मुताबिक, इन शेयरों के भुगतान में बड़ी रकम कुछ सीमित और आपस में जुड़े लोगों, कंपनियों और कर्जदाताओं के समूह से आई थी। इसके साथ ही आरोप है कि इसके बाद आने वाले महीनों में दोनों कंपनियों के शेयरों की कीमत लगातार बढ़ाई गई, जबकि अधिकांश शेयर उन्हीं लोगों के पास बने रहे।

‘Multibagger Stocks’ जैसे व्हाट्सऐप ग्रुप से निवेशकों को लुभाया

ED की जांच में यह भी सामने आया कि दिसंबर 2025 के अंत से फरवरी 2026 के बीच ‘Multibagger Stocks’ जैसे नामों वाले व्हाट्सऐप कम्युनिटी ग्रुप के जरिए इन दोनों शेयरों को खरीदने के लिए रोजाना टिप्स भेजे जा रहे थे। जांच एजेंसी के अनुसार, इन ग्रुपों के जरिए छोटे और खुदरा निवेशकों को शेयर खरीदने के लिए आकर्षित किया गया। इन ग्रुपों को चलाने के लिए हरियाणा और मुंबई में दूसरे लोगों के नाम पर लिए गए सिम कार्ड का इस्तेमाल किया गया, जबकि इनका संचालन गुजरात के भावनगर से किया जा रहा था।

ED के मुताबिक, इन संदेशों के बाद दोनों शेयरों में खरीदारों की संख्या करीब 3,400 से बढ़कर एक लाख से अधिक हो गई।

व्हाट्सऐप ग्रुप डिलीट होते ही शेयरों में भारी गिरावट

जांच के अनुसार, 25 फरवरी 2026 को इन व्हाट्सऐप ग्रुपों को अचानक डिलीट कर दिया गया। इसके बाद दोनों कंपनियों के शेयर लोअर सर्किट पर आ गए और कुछ ही दिनों में उनकी कीमत करीब 70 प्रतिशत तक गिर गई। इस घटनाक्रम के कारण एक लाख से अधिक छोटे निवेशकों को भारी नुकसान हुआ। कई निवेशक ऐसे शेयरों के साथ फंस गए, जिन्हें वे गिरती कीमतों के बीच बेच नहीं पा रहे थे।

कंपनियों के दफ्तर, प्रमोटरों के घर और ब्रोकिंग फर्मों पर छापे

ED ने जिन ठिकानों की तलाशी ली, उनमें दोनों कंपनियों के कार्यालय, उनके प्रमोटरों के आवास, कम कीमत पर शेयर पाने वाले लोगों के ठिकाने, स्टॉक-ब्रोकिंग और फाइनेंस कंपनियों के कार्यालय तथा कथित तौर पर प्रचार के लिए इस्तेमाल किए गए व्हाट्सऐप ग्रुपों के संचालन से जुड़े लोगों के परिसर शामिल हैं। छापेमारी के दौरान जांच एजेंसी ने कई आपत्तिजनक दस्तावेज, डिजिटल डिवाइस, शेयर लेनदेन से जुड़े रिकॉर्ड और संपत्तियों के दस्तावेज बरामद कर जब्त किए हैं।

ED मामले में मनी लॉन्ड्रिंग और शेयर बाजार में कथित हेरफेर से जुड़े वित्तीय लेनदेन की जांच कर रही है। मामले में आगे की जांच जारी है।

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चारधाम यात्रा: अटूट आस्था, VIP संस्कृति और व्यवस्थाओं की अग्निपरीक्षा

चारधाम यात्रा: अटूट आस्था, VIP संस्कृति और व्यवस्थाओं की अग्निपरीक्षा

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यात्राएँ केवल पर्यटन नहीं, बल्कि स्वयं को जानने, जन-आस्था को अनुभव करने और प्रकृति के निकट पहुँचने का अवसर होती हैं। धार्मिक यात्रा मनुष्य को सांसारिक भागदौड़ से दूर कर आत्मचिंतन और ईश्वर के सान्निध्य में जाने का मार्ग दिखाती है। इसी भावना के साथ 26 सितंबर को मध्य प्रदेश के देवास से उत्तराखंड की चारधाम यात्रा प्रारंभ हुई। 15 दिनों के इस सफर ने मुझे आध्यात्मिक संतोष तो दिया, लेकिन धार्मिक स्थलों की व्यवस्थाओं और श्रद्धालुओं की कठिनाइयों ने कई गंभीर प्रश्न भी खड़े किए।

 

माँ गंगा की आरती से हिमालय की दिव्यता तक

हरिद्वार में माँ गंगा की भव्य आरती, मंत्रोच्चार और दीपों से जगमगाती जलधारा ने मन को भावविभोर कर दिया। ऋषिकेश के आध्यात्मिक वातावरण से होते हुए यात्रा माँ यमुनोत्री पहुँची। लगभग छह से सात किलोमीटर के दुर्गम पहाड़ी मार्ग पर पैदल चढ़ाई, थकान और हल्की बारिश के बीच माँ यमुना के दर्शन हुए। इसके बाद उत्तरकाशी में श्री काशी विश्वनाथ महादेव और गंगोत्री में माँ गंगा के दर्शन किए। हिमालय की विशालता ने अनुभव कराया कि प्रकृति के सामने मनुष्य का अहंकार कितना छोटा है।

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केदारनाथ: आस्था अटूट, लेकिन व्यवस्था पर सवाल

यात्रा का सबसे कठिन पड़ाव बाबा केदारनाथ धाम रहा। लगभग 20 से 22 किलोमीटर के दुर्गम मार्ग पर चढ़ाई, घोड़े-खच्चरों की आवाजाही और यात्रियों की भीड़ के बीच आगे बढ़ना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था। लगभग 12 घंटे की मशक्कत के बाद रात करीब दो बजे धाम पहुँचना संभव हुआ, जबकि दर्शन का सौभाग्य अगले दिन शाम लगभग छह बजे मिला। बाबा केदारनाथ के सम्मुख पहुँचते ही मन श्रद्धा से भर गया और सारी थकान मानो क्षणभर में मिट गई।

 

लेकिन घंटों की प्रतीक्षा ने सवाल भी खड़ा किया कि क्या श्रद्धालुओं को सुगम दर्शन उपलब्ध कराना सरकार और प्रशासन की प्राथमिकता नहीं होनी चाहिए?

 

देश के कोने-कोने से लोग धन, समय और शारीरिक सामर्थ्य खर्च करके अपने आराध्य तक पहुँचते हैं। इनमें बुजुर्ग, महिलाएँ और अस्वस्थ लोग भी होते हैं। कठिन यात्रा के बाद घंटों कतार में खड़े रहना और अंततः कुछ सेकंड के दर्शन पाना उनकी पीड़ा को बढ़ाता है। इस समस्या के बीच VIP संस्कृति भी चिंता का विषय है। विशेष व्यक्तियों को प्राथमिकता देने से यदि आम श्रद्धालुओं को अतिरिक्त प्रतीक्षा करनी पड़े, तो यह व्यवस्था उनकी आस्था और सम्मान दोनों को ठेस पहुँचाती है।

 

ईश्वर के दरबार में हर भक्त बराबर है; किसी की विशेष सुविधा आम श्रद्धालु की परेशानी का कारण नहीं बननी चाहिए। हिमालय की कठिन भौगोलिक परिस्थितियाँ सरकार और प्रशासन के सामने चुनौती अवश्य हैं, लेकिन बेहतर योजना और जवाबदेही की आवश्यकता को नकारा नहीं जा सकता। श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ना उपलब्धि हो सकती है, पर उनकी परेशानियाँ बढ़ना व्यवस्था की सफलता नहीं है।

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त्रियुगीनारायण से बद्रीनाथ तक

केदारनाथ के बाद त्रियुगीनारायण मंदिर में दर्शन का अवसर मिला। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी स्थल पर भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। मंदिर की अखंड धूनी तथा भगवान विष्णु की उपस्थिति इस स्थान की आध्यात्मिक महत्ता बढ़ाती है। इसके बाद बद्रीनाथ धाम में भगवान बद्रीविशाल के दर्शन के साथ यात्रा पूर्ण हुई। इन पवित्र स्थलों ने श्रद्धा, समर्पण और भारतीय संस्कृति की गहराई का अनुभव कराया।

 

आस्था या सोशल मीडिया का प्रदर्शन?

यात्रा के दौरान धार्मिक स्थलों पर तस्वीरें लेने और रील बनाने की बढ़ती प्रवृत्ति भी दिखाई दी। अनुभव साझा करना गलत नहीं है, लेकिन जब कैमरा श्रद्धा पर हावी हो जाए, तो तीर्थयात्रा का वास्तविक उद्देश्य पीछे छूटने लगता है। प्रश्न यह है कि हम ईश्वर के दर्शन करने जाते हैं या दुनिया को यह दिखाने कि हम दर्शन करने गए थे? भक्ति का वास्तविक आनंद लाइक और कमेंट में नहीं, बल्कि उस क्षण में है जब मन बिना किसी दिखावे के अपने आराध्य के सामने झुकता है।

 

सरकार और प्रशासन के लिए स्पष्ट संदेश

चारधाम यात्रा में उमड़ती भीड़ सरकार और प्रशासन के लिए अवसर से अधिक जिम्मेदारी है। दर्शन व्यवस्था, यातायात, पार्किंग, पेयजल, स्वच्छता, चिकित्सा और आपातकालीन सहायता को मजबूत करना अनिवार्य है। बुजुर्गों और दिव्यांगों के लिए विशेष सुविधाएँ सुनिश्चित की जानी चाहिए तथा VIP व्यवस्था के कारण आम श्रद्धालुओं का आवागमन और दर्शन बाधित नहीं होने चाहिए।

 

श्रद्धालुओं की सुरक्षा और सम्मान कोई सरकारी एहसान नहीं, बल्कि प्रशासन की बुनियादी जिम्मेदारी है। सरकार को घोषणाओं से आगे बढ़कर धरातल पर सुधार दिखाना होगा। समय रहते व्यवस्थाएँ नहीं सुधारी गईं, तो बढ़ती भीड़ भविष्य में गंभीर कठिनाइयाँ पैदा कर सकती है। विकास के साथ हिमालय के नाजुक पर्यावरण की रक्षा भी उतनी ही आवश्यक है।

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आस्था का सम्मान, व्यवस्था की जवाबदेही

10 अक्टूबर को लौटते समय मन में चारधाम के दर्शन का संतोष था, लेकिन व्यवस्थाओं में सुधार की आवश्यकता भी स्पष्ट थी। सरकार को जवाबदेही निभानी होगी, प्रशासन को संवेदनशील बनना होगा और यात्रियों को अनुशासन तथा पर्यावरण संरक्षण का पालन करना होगा।

 

आस्था अटूट है, लेकिन श्रद्धालुओं की सहनशीलता को व्यवस्था की कमजोरियों का विकल्प नहीं बनाया जा सकता। ईश्वर के दरबार में समानता तभी सार्थक होगी, जब प्रत्येक भक्त को समान सम्मान और यथासंभव सुविधाजनक दर्शन मिलें। क्योंकि चारधाम की यात्रा पैरों से जितनी पूरी होती है, उससे कहीं अधिक हृदय और आत्मा से पूरी होती है।

 

हर हर महादेव! जय बद्रीविशाल! जय माँ गंगे! जय माँ यमुना!

पटना से पूर्वांचल एक्सप्रेसवे का सफर होगा आसान, 6500 करोड़ से जेपी गंगापथ के विस्तार को मिली हरी झंडी, कुछ ऐसा रहेगा रूट

राजधानी पटना में रहने वाले लोगों को अगर बिहटा या कोईलवर जाना हो, तो अक्सर जाम और लंबी दूरी की परेशानी से गुजरना पड़ता है। उस दिशा में जाने का नाम सुनते ही लोग गहरी चिंता में चले जाते हैं। कोई न कोई बहाना ढूंढ़ने लग जाते हैं लेकिन आने वाले समय में इसी रूट पर लोग लॉन्ग ड्राइव पर जाएंगे। ऐसा इसीलिए, क्योंकि पटना के दीघा से कोईलवर तक जेपी गंगा पथ का विस्तार होने वाला है। अभी जो दूरी डेढ़ से दो घंटे में तय होती है, वही आने वाले समय में महज 30-35 मिनट में पूरा हो सकेगी। इस सड़क के विस्तार से पटना और पश्चिमी क्षेत्र के बीच मजबूत कनेक्टिविटी स्थापित होगी।

पूरा पटना जिला हो जाएगा कवर

अब तक दीघा से दीदारगंज तक फैला जेपी गंगापथ पटना के पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों के बीच आवागमन का एक अहम ऑप्शन बन चुका है। अब इसे पश्चिम दिशा में कोईलवर तक ले जाने की तैयारी है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत दीघा से कोईलवर तक 35.65 किमी यानी लगभग 36 किलोमीटर लंबी फोरलेन सड़क बनाई जानी है। इसका निर्माण हैदराबाद की कंपनी विश्व समुद्रा करेगी।

दो हिस्सों में बनेगी सड़क, बांध पर भी सड़क

जेपी गंगापथ के इस विस्तार में सबसे खास बात इसकी बनावट होगी। पूरी सड़क को दो हिस्सों में विकसित किया जाएगा। परियोजना के तहत दीघा से शेरपुर तक करीब 18 किलोमीटर लंबी एलिवेटेड फोरलेन सड़क बनाई जाएगी। इसके बाद शेरपुर से कोईलवर तक लगभग 18 किलोमीटर सड़क बांध पर बनेगी। इस तरह शहर से निकलने के बाद वाहनों को लंबे समय तक ट्रैफिक और संकरी सड़कों की समस्या से जूझने की जरूरत नहीं पड़ेगी। यह सड़क दीघा जेपी सेतु से शुरू होकर दानापुर, शाहपुर, शेरपुर और बिहटा होते हुए कोईलवर के नए पुल से जुड़ेगी।

6500 करोड़ रुपये की परियोजना, चार साल में पूरा करने का लक्ष्य

जेपी गंगापथ का विस्तार सिर्फ एक सड़क परियोजना नहीं, बल्कि पटना की भविष्य की यातायात व्यवस्था को ध्यान में रखकर तैयार किया जा रहा बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट है। इसके निर्माण पर 6495.78 करोड़ यानी करीब 6500 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। इसका निर्माण हाइब्रिड एनुइटी मॉडल (HAM) के तहत किया जाएगा। इस मॉडल में निर्माण एजेंसी और सरकार दोनों की वित्तीय भागीदारी होगी।

पूर्वांचल एक्सप्रेसवे तक पहुंचेगा पटना का रास्ता

इस परियोजना का असर केवल पटना और कोईलवर के बीच यात्रा तक सीमित नहीं रहेगा। इसके पूरा होने से राजधानी की पश्चिमी दिशा में कनेक्टिविटी मजबूत होगी और आगे पूर्वांचल एक्सप्रेसवे तक पहुंचने का रास्ता भी अधिक सुविधाजनक बन सकता है। इसके जरिए पटना से बक्सर और फिर उत्तर प्रदेश की ओर यात्रा करने वाले लोगों को फायदा मिलने की उम्मीद है। बक्सर के रास्ते गंगा नदी पार कर उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल एक्सप्रेसवे तक पहुंचने से अयोध्या और दिल्ली की दिशा में सफर भी आसान हो सकता है।

पटना से सच्चिदानंद की रिपोर्ट

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आंदोलन की जीत के बाद नागरिक हार क्यों जाता है?

उस छात्र की स्थिति सोचिए जिसकी परीक्षा रद्द हुई। उसका भविष्य अधर में है। वह अगली परीक्षा की तैयारी करे या अदालत के फैसले का इंतजार? उसके परिवार ने कोचिंग पर जो पैसा खर्च किया, उसका क्या होगा? एक वर्ष की पढ़ाई, मेहनत और अवसर का हिसाब कौन देगा? कानून कहता है कि दोषी को पांच से दस वर्ष की सजा होगी। मगर दोषी कब पकड़ा जाएगा? मुकदमा कब पूरा होगा? और तब तक छात्र को क्या राहत मिलेगी?

भारत में परीक्षा सुधार का कानून इसी विरोधाभास का एक उदाहरण है। सरकार कानून बनाती है। सजा बढ़ाती है। समयसीमा तय करती है। घोषणा होती है कि अब परीक्षा में धांधली करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। मगर जिस नौजवान की परीक्षा रद्द हुई है, उसके जीवन का एक वर्ष कौन लौटाएगा?

2024 में सार्वजनिक परीक्षा में अनुचित साधनों के इस्तेमाल को रोकने के लिए कानून बना। यह 21 जून 2024 से लागू हुआ। इसमें दोषियों के लिए तीन से पांच वर्ष तक की कैद का प्रावधान था। मगर मई 2026 में नीट परीक्षा कथित प्रश्नपत्र लीक के बाद रद्द करनी पड़ी। परीक्षा दोबारा आयोजित हुई।

इसके बाद कानून में संशोधन किया गया। 31 जुलाई को मंजूरी मिले संशोधनों में सजा बढ़ाकर पांच से दस वर्ष कर दी गई। जांच पूरी करने के लिए दो महीने की समयसीमा भी तय हुई। मगर पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च ने एक महत्वपूर्ण कमी बताई। यदि दो महीने में जांच पूरी नहीं होती तो क्या होगा, इसका कानून में कोई अतिरिक्त प्रावधान नहीं है।

यानी समयसीमा है, मगर उसे तोड़ने का परिणाम तय नहीं है।

अब उस छात्र की स्थिति सोचिए जिसकी परीक्षा रद्द हुई। उसका भविष्य अधर में है। वह अगली परीक्षा की तैयारी करे या अदालत के फैसले का इंतजार? उसके परिवार ने कोचिंग पर जो पैसा खर्च किया, उसका क्या होगा? एक वर्ष की पढ़ाई, मेहनत और अवसर का हिसाब कौन देगा?

कानून कहता है कि दोषी को पांच से दस वर्ष की सजा होगी। मगर दोषी कब पकड़ा जाएगा? मुकदमा कब पूरा होगा? और तब तक छात्र को क्या राहत मिलेगी?

इन प्रश्नों का उत्तर सजा बढ़ाने से नहीं मिलता। 28 जुलाई को केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने लोकसभा में बताया कि राधाकृष्णन समिति की 46 प्रमुख सिफारिशों में से 35 लागू की जा चुकी हैं। विशेष फास्ट ट्रैक अदालतें स्थापित की जा रही हैं। नीट-यूजी प्रश्नपत्र लीक मामले के लिए एक विशेष अदालत पहले ही निर्धारित हो चुकी थी। मगर 27 जुलाई को उसकी पहली सुनवाई स्थगित करनी पड़ी।

क्यों?

क्योंकि सीबीआई की ओर से कोई उपस्थित नहीं हुआ। एक तरफ सरकार की घोषणा कि 46 में से 35 सिफारिशें लागू हो चुकी हैं। दूसरी तरफ विशेष अदालत की पहली सुनवाई में ही जांच एजेंसी अनुपस्थित।

यही घोषणा और क्रियान्वयन के बीच का अंतर है।

सरकार कानून बनाकर बता सकती है कि उसने क्या किया। मगर नागरिक जानना चाहता है कि उस कानून से उसके जीवन में क्या बदला। सजा बढ़ाना सरकार का फैसला है। समय पर न्याय दिलाना सरकार की जिम्मेदारी। दोनों को एक समझ लेना ही लोकतांत्रिक जवाबदेही की सबसे बड़ी भूलों में एक है। इस पूरे मामले में समय और सार्वजनिक ध्यान की अपनी राजनीति है।

इस्तीफा एक घटना है। नया कानून एक घटना है। सजा बढ़ाना एक घटना है। ये सब तत्काल दिखाई देते हैं। इनकी तारीख होती है, घोषणा होती है और खबर बनती है।

मगर कानून का लागू होना एक प्रक्रिया है। वह अलग-अलग दफ्तरों, अदालतों, जांच एजेंसियों और अधिकारियों के बीच महीनों तक चलती है।

घटना का श्रेय किसी एक मंत्री या सरकार को मिल सकता है। प्रक्रिया की जिम्मेदारी अनेक अधिकारियों में बंट जाती है। मीडिया के लिए भी घटना आसान है। मंत्री ने इस्तीफा दिया, खबर बन गई। सरकार ने मांग स्वीकार की, खबर बन गई। अदालत ने आदेश दिया, खबर बन गई।

उसके बाद मीडिया दूसरे मुद्दे की ओर बढ़ जाता है। पाठक और दर्शक भी मान लेते हैं कि मामला समाप्त हो गया। जबकि नागरिक के लिए असली काम तब शुरू होता है।

मुआवजे का आदेश हुआ, मगर पैसा कब मिला? मुकदमा दर्ज हुआ, मगर जांच कब पूरी हुई? परीक्षा सुधार की घोषणा हुई, मगर अगली परीक्षा में क्या बदला? मतदाता सूची में सुधार का आश्वासन मिला, मगर मतदान से पहले कितने नाम वापस जुड़े?

इन प्रश्नों पर लगातार निगरानी रखने वाला कौन है? हर नई विफलता को एक नया घोटाला या नया विवाद मान लिया जाता है। उसे पहले किए गए वादे की अधूरी जिम्मेदारी से नहीं जोड़ा जाता। इस तरह सरकार बार-बार जवाब देने का दावा कर सकती है, जबकि उसके पुराने जवाबों का परिणाम सामने नहीं आया होता।

जॉर्ज ऑरवेल ने अपने प्रसिद्ध निबंध ‘पॉलिटिक्स एंड द इंग्लिश लैंग्वेज’ में राजनीतिक भाषा की इसी प्रवृत्ति की आलोचना की थी। उनके अनुसार राजनीतिक भाषा का इस्तेमाल अक्सर ऐसी चीजों को ठोस और वास्तविक दिखाने के लिए होता है जिनमें वास्तविकता बहुत कम होती है।

ऑरवेल की यह कसौटी आज भी उपयोगी है।

सरकारी घोषणाएं हमेशा झूठी नहीं होतीं। मंत्री और अधिकारी अपने आश्वासनों के प्रति ईमानदार भी हो सकते हैं। मगर ईमानदार आश्वासन भी तब तक नागरिक के लिए उपयोगी नहीं है जब तक उसे जांचा और लागू न कराया जा सके। सीजेपी की मुआवजे की मांग स्वीकार करते समय संबंधित मंत्री ने परिवारों को लागू नियमों के अंतर्गत अधिकतम संभव सहायता देने का वादा किया था। शब्दों पर गौर कीजिए।

अधिकतम। संभव। लागू नियमों के अंतर्गत।

हर शब्द उचित लग सकता है। मगर इन्हें जोड़ने पर भी यह पता नहीं चलता कि किस परिवार को कितनी रकम मिलेगी, किस तारीख तक मिलेगी और किस अधिकारी की जिम्मेदारी होगी। इसी तरह सरकारी भाषा में कुछ शब्द बार-बार आते हैं। प्रक्रिया शुरू हो गई है। योजना लागू है। मामला विचाराधीन है। सिफारिशें स्वीकार कर ली गई हैं। कार्यान्वयन जारी है।

इनका वास्तविक अर्थ क्या है?

नागरिक किस दफ्तर में जाकर जांच कर सकता है कि काम हुआ या नहीं? किस रजिस्टर में जिम्मेदार अधिकारी का नाम दर्ज है? किस समयसीमा को पार करने पर कार्रवाई होगी?

अदालत बना देना पर्याप्त नहीं है। उसमें न्यायाधीश भी होना चाहिए। सुनवाई होनी चाहिए। फैसला होना चाहिए।

कानून में समयसीमा लिख देना पर्याप्त नहीं है। उसे तोड़ने पर परिणाम भी होना चाहिए।

और अधिकार घोषित कर देना पर्याप्त नहीं है। नागरिक को उसका इस्तेमाल करने का व्यावहारिक रास्ता भी मिलना चाहिए।

इसी बिंदु पर फिर जंतर मंतर और कॉकरोच जनता पार्टी की कहानी सामने आती है।

इस पार्टी की शुरुआत एक मजाक से हुई थी। 15 मई को भारत के मुख्य न्यायाधीश ने बेरोजगार युवाओं की तुलना कॉकरोच से की थी। बाद में उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणी फर्जी डिग्रियों वाले लोगों के संदर्भ में थी।

मगर टिप्पणी ने बेरोजगार युवाओं के बीच तीखी प्रतिक्रिया पैदा की। अगले दिन पूर्व राजनीतिक रणनीतिकार अभिजीत दीपके ने इसी अपमानजनक शब्द को अपनाकर कॉकरोच जनता पार्टी बना दी।

कुछ ही दिनों में संगठन ने लाखों लोगों के जुड़ने का दावा किया। जिस शब्द से अपमान का बोध हुआ था, वही विरोध की पहचान बन गया। ऑरवेल ने अपने एक अन्य निबंध ‘फनी, बट नॉट वल्गर’ में लिखा था कि हर मजाक एक छोटी क्रांति होता है।

इस अर्थ में कॉकरोच जनता पार्टी की शुरुआत दिलचस्प थी। सत्ता और प्रतिष्ठान की भाषा में जो शब्द तिरस्कार का प्रतीक था, युवाओं ने उसी को अपने संगठन का नाम बना लिया।

यह सत्ता के प्रति सम्मान दिखाने की अनिवार्यता को अस्वीकार करने का तरीका था।

ऐसा व्यंग्य लोगों को तेजी से जोड़ सकता है। वह अपमान को सामूहिक प्रतिरोध में बदल सकता है। मगर मजाक और आंदोलन की सीमाएं अलग हैं।

मजाक माचिस की तीली है। वह एक क्षण में अंधेरा दूर कर सकती है। मगर तीली बुझ जाने के बाद रोशनी बनाए रखने के लिए स्थायी व्यवस्था चाहिए।

सीजेपी के सामने भी यही चुनौती है। संगठन ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी बनाई है। अगस्त से उसकी राष्ट्रीय टीम भी काम कर रही है। अभिजीत दीपके राष्ट्रीय संयोजक हैं।अब तक संगठन की कार्यशैली में कुछ महत्वपूर्ण बातें दिखाई देती हैं।

वह सरकार के वादों की निगरानी करता है। समयसीमा तय करता है। जरूरत पड़ने पर फिर आंदोलन की चेतावनी देता है। सर्वोच्च न्यायालय में मामले उठाता है। 12 अगस्त को संगठन की संरचना और आगे की कार्ययोजना पर विचार करने के लिए स्वयंसेवकों की बैठक बुलाई गई थी। मगर दो स्थानों से बैठक हटानी पड़ी। दीपके ने आरोप लगाया कि इसके पीछे सत्तारूढ़ पार्टी का दबाव था।

यह घटनाक्रम बताता है कि सड़क पर भीड़ जुटा लेना और उस भीड़ को स्थायी संगठन में बदलना अलग-अलग काम हैं। किसी आंदोलन के सामने सफलता के बाद कई रास्ते होते हैं।

वह राजनीतिक पार्टी बनकर चुनाव लड़ सकता है, जैसा नेपाल में आंदोलन की ऊर्जा चुनावी राजनीति में पहुंची।

वह सूचना अधिकार आंदोलन की तरह स्थायी नागरिक अभियान बना सकता है। वह अदालतों, जनसुनवाई और सरकारी फैसलों की लगातार निगरानी करने वाला संगठन बन सकता है। या फिर कुछ दिनों की सुर्खियों और भीड़ के बाद समाप्त हो सकता है।

आखिरी रास्ता सत्ता के लिए सबसे सुविधाजनक है।

समय बीतने के साथ आंदोलनकारी अपने जीवन में लौट जाते हैं। छात्र पढ़ाई में लग जाते हैं। मजदूर काम पर लौट जाते हैं। परिवार अपनी जिम्मेदारियों में व्यस्त हो जाते हैं।

सरकार वहीं रहती है। दफ्तर वहीं रहते हैं। फाइलें चलती रहती हैं। और आंदोलन का दबाव धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है।

सीजेपी ने अब तक दबाव, निगरानी और न्यायालय का रास्ता चुना है। मगर वह अभी ऐसी स्थायी प्रक्रिया नहीं बना सकी है जिसका उपयोग उससे असंबद्ध कोई भी नागरिक अपने अधिकार के लिए कर सके। सूचना अधिकार आंदोलन की सबसे बड़ी सीख यही है।

केवल समर्थक जुटाना पर्याप्त नहीं है। सबूत संभालने होंगे। मांगों को स्पष्ट करना होगा। कानून के प्रस्तावित प्रावधानों की जांच करनी होगी। सरकारी निर्णयों का लगातार पीछा करना होगा।

और एक प्रश्न का उत्तर भी देना होगा। आंदोलन की ओर से फैसला कौन करेगा? 25 जुलाई को सीजेपी का समझौता उसके संस्थापक और दो प्रवक्ताओं ने किया था। संगठन से लाखों लोगों के जुड़ने का दावा था। मगर उन लाखों लोगों ने अपने प्रतिनिधियों को औपचारिक रूप से नहीं चुना था।

समझौता हुआ और उसी दोपहर आंदोलन समाप्त कर दिया गया। यह अपने आप में कोई आरोप नहीं है। हर आंदोलन में किसी को बातचीत करनी होती है। किसी को सरकार का प्रस्ताव स्वीकार या अस्वीकार करना होता है। किसी को समझौते पर सहमति देनी होती है।

मगर प्रश्न यह है कि उसे यह अधिकार किसने दिया और उसकी सीमा क्या है?

अगली बार जब सरकार कोई समझौता पेश करेगी तो संगठन की ओर से कौन निर्णय करेगा? किन मांगों पर समझौता किया जा सकता है? किन मांगों पर नहीं? और यदि आंदोलनकारी अपने प्रतिनिधियों के फैसले से असहमत हों तो क्या व्यवस्था होगी?

सोशल मीडिया पर लाखों फॉलोअर होना लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का प्रमाण नहीं है।

सड़क पर हजारों लोगों का मौजूद होना भी अपने आप में संगठन के नेतृत्व को हर निर्णय का अधिकार नहीं देता।

किसी भीड़ को राजनीतिक समुदाय बनने के लिए असहमति व्यक्त करने का अधिकार और उसका व्यावहारिक तरीका चाहिए।

यही संगठन और भीड़ का अंतर है। इसका एक दूसरा पहलू भी है। आंदोलन में लंबे समय तक कौन रह सकता है? अखिल भारतीय छात्र संघ की अध्यक्ष नेहा बोरा ने जंतर मंतर पर 23 दिन का अनशन किया।

मगर हर छात्र ऐसा नहीं कर सकता।

किसी को परीक्षा देनी है। किसी को नौकरी तलाशनी है। किसी को परिवार चलाना है। किसी की रोज की कमाई बंद हो जाएगी। किसी के घर में उसकी देखभाल पर निर्भर लोग हैं।

इसलिए आंदोलन में लंबे समय तक उपस्थित रहने की क्षमता भी सबकी बराबर नहीं होती।

जो लगातार धरने पर रह सकते हैं, संगठन के निर्णयों में उनका प्रभाव बढ़ सकता है। मगर जो घर लौटने के लिए मजबूर हैं, उनकी जरूरतें और राय भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।

लोकतांत्रिक आंदोलन को यह असमानता समझनी होगी।

आंदोलन की असली परीक्षा उसके समझौते से लाभ पाने वाले नागरिक के जीवन में होती है।

मान लीजिए किसी छात्र की परीक्षा रद्द हुई है। उसे यह जानने से क्या राहत मिलेगी कि प्रश्नपत्र लीक करने वालों के खिलाफ मुकदमा चल रहा है और पांच वर्ष बाद उन्हें सजा हो सकती है?

उसकी जरूरत तत्काल है। उसे अगली परीक्षा की तारीख चाहिए। दोबारा परीक्षा देने की फीस और खर्च के बारे में स्पष्ट निर्णय चाहिए। विवादित परिणाम के खिलाफ अपील का अधिकार चाहिए। और ऐसा प्रशासनिक तंत्र चाहिए जो उसके आवेदन पर समय रहते फैसला कर सके।

परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था को ये व्यवस्थाएं सार्वजनिक करनी चाहिए।

मंत्रालय को इनके लिए धन उपलब्ध कराना चाहिए।

परीक्षा रद्द होने की पूरी कीमत छात्र और उसके परिवार पर नहीं डाली जा सकती। इसी तरह प्रश्नपत्र लीक रोकने के लिए केवल महंगी तकनीक खरीद लेना पर्याप्त नहीं है। पहले यह पता चलना चाहिए कि प्रश्नपत्र तक अनधिकृत पहुंच कहां से मिली। निगरानी कहां विफल हुई। किस अधिकारी या ठेकेदार की जिम्मेदारी थी।

प्रश्नपत्रों के हस्तांतरण का रिकॉर्ड होना चाहिए। संवेदनशील सामग्री तक किसकी पहुंच थी, इसका हिसाब होना चाहिए। अनुबंधों में जिम्मेदारी स्पष्ट होनी चाहिए। और जांच करने वाली संस्था को संबंधित सबूतों तक पहुंच मिलनी चाहिए।

यह तकनीक से अधिक प्रशासनिक जवाबदेही का प्रश्न है। संसाधन कहां खर्च किए जाएं, किसे अधिकार मिले और गलती होने पर किसे जवाब देना पड़े, यही असली फैसले हैं।

अब मतदाता का उदाहरण लीजिए। जिस नागरिक का नाम मतदाता सूची से कट गया है, उसके लिए समयसीमा मतदान का दिन है। यदि चुनाव हो जाने के बाद उसका नाम वापस जुड़ता है तो वह अधिकार किस काम का?

उसे यह जानने का अधिकार चाहिए कि नाम क्यों काटा गया। किस आधार पर काटा गया। किस अधिकारी ने निर्णय लिया। उसे व्यक्तिगत रूप से सहायता मिलनी चाहिए। आपत्ति दर्ज कराने की सुलभ व्यवस्था होनी चाहिए। और विवादित मामलों के निपटारे के लिए पर्याप्त कर्मचारी होने चाहिए।

सबसे महत्वपूर्ण यह कि फैसला मतदान से पहले हो। मौजूदा अपील व्यवस्था को इसी कसौटी पर परखना चाहिए। क्या वह चुनाव से पहले गलती सुधार सकती है?

यदि नहीं, तो किसी अतिरिक्त समीक्षा व्यवस्था के लिए कानूनी अधिकार, पर्याप्त धन और फैसलों को लागू कराने की क्षमता सुनिश्चित करनी होगी। क्योंकि मतदान के बाद मिला अनुकूल फैसला नागरिक को उसका खोया हुआ वोट वापस नहीं दिला सकता।

यहां फिर तोकविल की बात याद आती है। उनके अनुसार स्वतंत्र समाज की रक्षा केवल संविधान के शब्द नहीं करते। नागरिकों की आदतें करती हैं। बैठक का विवरण रखना। सरकारी रिकॉर्ड पढ़ना। फैसलों का हिसाब मांगना। एक ही दफ्तर में दूसरी और तीसरी बार जाना। अपने अधिकार के लिए दूसरों के साथ संगठित रहना।

ये काम आकर्षक नहीं हैं। इनमें आंदोलन की उत्तेजना नहीं है। नारे नहीं हैं। मंच नहीं हैं। तत्काल प्रसिद्धि नहीं है। मगर लोकतंत्र की वास्तविक जवाबदेही इन्हीं कामों से बनती है।

भारत जैसे विशाल युवा आबादी वाले लोकतंत्र में खतरा केवल दमन का नहीं है।

एक दूसरा, कहीं अधिक सूक्ष्म खतरा भी है। युवाओं की आवाज बहुत जोर से सुनी जाए, मगर उनके सवालों का जवाब बहुत धीरे दिया जाए। वे यह मान बैठें कि सरकार ने उनकी बात सुन ली, इसलिए उनकी मांग पूरी हो गई।

जबकि सुन लेना और समाधान करना एक ही बात नहीं है। सड़क पर आंदोलन खतरे की घंटी बजा सकता है। मगर जवाबदेही की स्थायी व्यवस्था सड़क पर लगातार भीड़ जुटाकर नहीं चलाई जा सकती। उसके लिए संस्थाओं के भीतर ऐसे नियम और प्रक्रियाएं चाहिए जो बिना आंदोलन के भी काम करें।

राजस्थान की जनसुनवाइयों में मजदूर सरकारी कागज पर दर्ज मजदूरी का हिसाब अपने वास्तविक काम से मिलाते थे। कागज कहता था कि भुगतान हो गया। मजदूर कहता था कि पैसा नहीं मिला।

इस टकराव से एक सिद्धांत निकला था। सरकारी रिकॉर्ड नागरिक की पहुंच में होना चाहिए ताकि वह सरकार के दावे को चुनौती दे सके। आज वही सिद्धांत परीक्षा और मतदाता सूची के मामलों में लागू होना चाहिए।

छात्र परीक्षा का फैसला चुनौती दे सके। उसे कारण बताया जाए। अपील का रास्ता मिले। और फैसला उस समय आए जब उसका भविष्य बचाया जा सकता हो। मतदाता अपना नाम कटने का कारण जान सके। आपत्ति दर्ज करा सके। और चुनाव से पहले गलती सुधरवा सके।

लोकतंत्र की असली परीक्षा यही है।

नागरिक को केवल अधिकार दिया गया है या उस अधिकार को समय रहते इस्तेमाल करने की शक्ति भी दी गई है? क्योंकि अधिकार का अर्थ केवल सरकार की स्वीकृति नहीं है। अधिकार का अर्थ है कि नागरिक सरकार को अपनी जिम्मेदारी पूरी करने के लिए बाध्य कर सके।

और वह भी तब, जब उस जिम्मेदारी का निर्वाह उसके लिए उपयोगी हो। राजस्थान के मजदूरों ने यही रास्ता खोला था। आज के छात्रों और मतदाताओं के सामने भी मूल प्रश्न वही है। क्या वे सरकारी फैसले का कारण जान सकते हैं? क्या वे उस फैसले को चुनौती दे सकते हैं? क्या वे सरकार को उसकी कानूनी जिम्मेदारी याद दिलाकर समय पर राहत हासिल कर सकते हैं?

यदि इसका उत्तर सुनिश्चित नहीं है तो आंदोलन समाप्त हो जाने से कुछ साबित नहीं होता।

जंतर मंतर खाली हो सकता है। प्रदर्शनकारी घर लौट सकते हैं। सरकार घोषणा कर सकती है कि मांगें मान ली गई हैं।

मगर जिस नागरिक की परीक्षा रद्द हुई, जिसकी मजदूरी रुकी है या जिसका वोट कट गया है, उसके लिए आंदोलन की सफलता का फैसला अभी बाकी है। सड़क खाली हो जाने का अर्थ यह नहीं कि काम पूरा हो गया। (समाप्त)

Henley Index में 84वें पायदान पर पहुंचा भारत, भारतीय पासपोर्ट धारक बिना अग्रिम वीजा के कर सकते हैं 55 देशों की यात्रा

अक्टूबर 2026 के लिए जारी हेनले पासपोर्ट इंडेक्स में इस साल भारत की रैंकिंग में एक पायदा का सुधार हुआ है। यह 85 से घटकर 84वें नंबर पर आ गया है। रैंकिंग में सुधार के बीच चिंताजनक बात यह है कि भारतीय पासपोर्ट धारक बिना पहले से वीजा लिए अब सिर्फ 55 देशों में जाने के योग्य हैं। पहले यह संख्या 57 देशों की थी। सिंगापुर इस सूची में टॉप पर बना हुआ है।

हेनले एंड पार्टनर्स की 9 अक्टूबर को जारी ताजा रैंकिंग के मुताबिक, अल्जीरिया और मॉरिटानिया के साथ भारत 84वें नंबर पर है। अक्टूबर 2025 के मुकाबले देश का स्कोर दो जगहों से कम हुआ है, जो इसकी रैंकिंग और इसके पासपोर्ट धारकों को मिलने वाले यात्रा विशेषाधिकार के बीच के अंतर को दिखाता है।

क्या है हेलने पासपोर्ट इंडेक्स?

Henley Passport Index दुनिया भर के पासपोर्टों की एक वैश्विक रैंकिंग प्रणाली है, जो यह बताती है कि किसी देश का पासपोर्ट कितना ताकतवर है। हेनले पासपोर्ट इंडेक्स 199 पासपोर्ट को उन जगहों की संख्या के हिसाब से रैंक करता है, जहां उनके धारक पहले से वीजा लिए बिना जा सकते हैं। यह 227 जगहों को कवर करता है और इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन (IATA) के आंकड़ों का इस्तेमाल करता है।

सिंगापुर का पासपोर्ट सबसे मजबूत

इस सूची में सिंगापुर ने दुनिया के सबसे मजबूत पासपोर्ट के तौर पर अपनी जगह टॉप पर बनाए रखी है। इसके पास बिना पहले वीजा के 193 जगहों पर यात्रा की सुविधा है। जापान, साउथ कोरिया और यूनाइटेड अरब अमीरात एक साथ दूसरे नंबर पर हैं, जिनमें से हर एक के पास 188 जगहों तक एक्सेस है। स्वीडन 187 जगहों के साथ तीसरे नंबर पर है, जबकि बेल्जियम, डेनमार्क, फिनलैंड, फ्रांस, जर्मनी, इटली और स्पेन उन देशों में शामिल हैं जो 186 जगहों तक एक्सेस के साथ चौथे नंबर पर हैं। यूनाइटेड किंगडम 184 स्कोर के साथ छठे नंबर पर है, जबकि यूनाइटेड स्टेट्स 180 जगहों तक एक्सेस देकर 10वें नंबर पर है।

भारतीय बिना पहले से वीजा लिए कहां घूम सकते हैं?

भारतीय पासपोर्ट धारक विदेश यात्रा से पहले पारंपरिक वीजा लिए बिना कई जगहों पर जा सकते हैं। इनमें भूटान, बारबाडोस, फिजी, मलेशिया, मॉरिशस, नेपाल, थाईलैंड, जमैका, कजाकिस्तान, रवांडा, सेनेगल, डोमिनिका, हैती, माइक्रोनेशिया और वानुअतु वगैरह शामिल हैं। हालांकि, डेस्टिनेशन के हिसाब से प्रवेश की सही जरूरतें अलग-अलग होती हैं। कुछ देशों में आगमन पर वीजा या इलेक्ट्रॉनिक ट्रैवल ऑथराइजेशन की जरूरत हो सकती है, जबकि रहने की मंजूर अवधि और दूसरी शर्तें अलग हो सकती हैं।

क्यों मायने रखती है भारत की पासपोर्ट रैंकिंग?

भारत का 85वें से 84वें स्थान पर आने का मतलब जरूरी नहीं कि अधिक यात्री आजादी हो। पासपोर्ट रैंकिंग किसी देश के नागरिकों के लिए पहुंच वाले गंतव्यों की संख्या और दूसरे देशों की वीजा पॉलिसी और रैंकिंग में बदलाव, दोनों को दिखाती है। नतीजतन, कोई देश इंडेक्स में ऊपर जा सकता है, भले ही उसका अपना एक्सेस स्कोर कम हो जाए।

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