Video: ₹60 हजार की नौकरी छोड़कर चुना कंटेंट क्रिएशन, 14K फॉलोअर्स के साथ कमाए ₹1.12 लाख; जानिए कैसे

हर महीने मिलने वाली तय सैलरी छोड़कर सोशल मीडिया पर करियर बनाना आसान फैसला नहीं होता। खासकर तब, जब कमाई का भरोसा ब्रांड डील्स, फॉलोअर्स और ऑडियंस की पसंद पर टिका हो। लेकिन दिल्ली की 23 साल की कंटेंट क्रिएटर उपासना ने इसी अनिश्चित रास्ते को अपना करियर बनाने का फैसला किया। अब उन्होंने अपनी एक महीने की कमाई का आंकड़ा साझा कर सोशल मीडिया यूजर्स का ध्यान खींचा है।

सितंबर बना अब तक का सबसे कमाऊ महीना

उपासना ने बताया कि उन्होंने ₹60,000 महीने की नौकरी छोड़कर कंटेंट क्रिएशन को फुल-टाइम करियर के तौर पर चुना। सितंबर उनके लिए खास रहा, क्योंकि इस एक महीने में उन्होंने छह ब्रांड कोलैबोरेशन से कुल ₹1.12 लाख कमाए। अपने इंस्टाग्राम वीडियो में कमाई का पूरा हिसाब बताते हुए उपासना ने कहा कि उस समय उनके करीब 14,000 फॉलोअर्स थे और सितंबर उनके कंटेंट क्रिएशन सफर का अब तक का सबसे बड़ा महीना रहा।

छह ब्रांड डील्स से कैसे जुटे ₹1.12 लाख?

उपासना की सितंबर की कमाई छह अलग-अलग ब्रांड कोलैबोरेशन से हुई। इनमें से एक डील UGC यानी User Generated Content की थी, जबकि बाकी पांच कोलैबोरेशन उनके अपने इंस्टाग्राम पेज पर पोस्ट किए जाने थे। उपासना के मुताबिक, UGC डील से उन्हें ₹15,000 मिले। बाकी पांच ब्रांड डील्स से कुल ₹97,000 की कमाई हुई। इस तरह सितंबर की कुल कमाई ₹1.12 लाख तक पहुंच गई। UGC में क्रिएटर किसी ब्रांड के लिए वीडियो, फोटो, रिव्यू या दूसरे तरह का कंटेंट तैयार करता है। खास बात यह है कि ऐसे कंटेंट को क्रिएटर के अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर पोस्ट करना जरूरी नहीं होता। ब्रांड इसे अपने मार्केटिंग कैंपेन में इस्तेमाल कर सकता है।

कमाई हुई, लेकिन पैसे अभी खाते में नहीं आए

यहां कहानी का एक दिलचस्प पहलू भी है। ₹1.12 लाख की डील्स हासिल करने के बावजूद उपासना को अभी पूरी रकम प्राप्त नहीं हुई है। उन्होंने बताया कि अलग-अलग ब्रांड्स के पेमेंट साइकल अलग होते हैं, इसलिए भुगतान मिलने में समय लग सकता है। यानी सोशल मीडिया से हुई कमाई सिर्फ डील साइन होने या कंटेंट बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि पेमेंट का इंतजार भी इस सफर का हिस्सा है।

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डेढ़ साल के सफर में पहली बार पार किया ₹1 लाख

उपासना पिछले करीब 1.5 साल से कंटेंट बना रही हैं। उनके लिए सितंबर इसलिए भी खास रहा क्योंकि यह पहला महीना था जब उनकी कमाई ने ₹1 लाख का आंकड़ा पार किया। उनकी इस उपलब्धि पर सोशल मीडिया यूजर्स ने भी प्रतिक्रिया दी। एक यूजर ने इसे कंटेंट क्रिएशन शुरू करने की प्रेरणा बताया, जबकि दूसरे ने सिर्फ 14 हजार फॉलोअर्स के बावजूद इतनी कमाई पर हैरानी जताई।

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DDU-GKY Success: सीवान के चंदन को सीधे मिली दुबई की नौकरी! इस ग्रामीण कौशल योजना ने बदली 12.35 लाख युवाओं की किस्मत

DDU-GKY Success: गांवों में आज भी कई परिवारों की कमाई खेती और फसल पर निर्भर करती है। लेकिन अगर फसल अच्छी न हो या खेती से कमाई कम हो जाए, तो परिवार के सामने आमदनी का दूसरा जरिया तलाशने की चुनौती खड़ी हो जाती है। ऐसे में किसी युवा के पास कोई काम की स्किल होना उसके लिए कमाई के नए रास्ते खोल सकता है। इसी सोच के साथ सरकार की दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना (DDU-GKY) ग्रामीण युवाओं को स्किल ट्रेनिंग देकर रोजगार के अवसरों से जोड़ने का काम करती है।

बता दें कि इस योजना की शुरुआत 25 सितंबर 2014 को राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM) के तहत की गई थी। यह योजना ग्रामीण इलाकों के गरीब और कमजोर परिवारों के युवाओं पर ध्यान देती है। इस योजना के तहत युवाओं को ऐसी स्किल की ट्रेनिंग दी जाती है, जिससे उन्हें नौकरी पाने और लंबे समय तक रोजगार से जुड़े रहने में मदद मिल सके। इसमें 15 से 35 साल की उम्र के युवाओं को ट्रेनिंग दी जाती है और उन्हें रोजगार के अवसरों से जोड़ा जाता है।

वहीं, बदलते समय और रोजगार की जरूरतों को देखते हुए DDU-GKY में भी बदलाव किए गए हैं। अब योजना के नए DDU-GKY 2.0 फ्रेमवर्क में ऐसी ट्रेनिंग पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है, जिसकी जरूरत कंपनियों और इंडस्ट्री को है। इसका मकसद युवाओं को सिर्फ ट्रेनिंग देना नहीं, बल्कि उन्हें टिकाऊ रोजगार से जोड़ना है।

इसके तहत नौकरी मिलने के बाद भी युवाओं को मदद देने, नई स्किल सीखने और पहले से सीखी स्किल को बेहतर करने पर ध्यान दिया जा रहा है। ट्रेनिंग, असेसमेंट, सर्टिफिकेट, निगरानी और रोजगार की जानकारी रखने की पूरी प्रक्रिया को भी डिजिटल सिस्टम से जोड़ा गया है।

मकसद साफ है: ट्रेनिंग से नौकरी मिलनी चाहिए, और नौकरी लंबे समय तक चलनी चाहिए। जून 2026 तक, DDU-GKY के तहत 18.45 लाख ग्रामीण युवाओं को ट्रेनिंग दी गई है, जबकि 12.35 लाख लोगों को नौकरी मिली है।

इन आंकड़ों के पीछे उन लोगों की कहानियां भी हैं, जिनकी जिंदगी तब बदल गई जब सीखने-सिखाने की प्रक्रिया ने उनके लिए नौकरी और रोजी-रोटी के रास्ते खोल दिए।

सपने को जिंदा रखना

नागालैंड की विमेथानो सखरी ने सालों तक अपनी मां को दस लोगों के परिवार का पेट पालने के लिए दिन-रात मेहनत करते देखा। हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद, विमेथानो आगे की पढ़ाई करना चाहती थीं, लेकिन पैसों की तंगी के कारण उनका यह सपना पूरा करना मुश्किल हो रहा था।

जब उन्हें DDU-GKY के बारे में पता चला, तो सब कुछ बदल गया। अपने सपनों को छोड़ने से इनकार करते हुए, उन्होंने DDU-GKY के टूरिज्म और हॉस्पिटैलिटी ट्रेनिंग प्रोग्राम में दाखिला लिया। कुछ महीनों बाद, विमेथानो ने ‘द डेन बेंगलुरु’ में फूड एंड बेवरेज सर्विस में अपनी पहली नौकरी शुरू की। यह सिर्फ एक नौकरी नहीं थी। यह उनके और उनके परिवार के लिए एक नए अध्याय की शुरुआत थी।

अपनी यात्रा को याद करते हुए विमेथानो कहती हैं, “मैं ग्रामीण विकास मंत्रालय और नागालैंड सरकार के NSRLM का शुक्रिया अदा करती हूं कि उन्होंने DDU-GKY को लागू किया, जिससे पूरे भारत में कई बेरोजगार युवाओं को मदद मिली है। यह मौका मेरे लिए एक वरदान था, और मुझे उम्मीद है कि और भी कई युवा इससे फायदा उठा सकेंगे, ठीक वैसे ही जैसे मैंने उठाया।”

विमेथानो के लिए, DDU-GKY ने बीच में छूटी हुई पढ़ाई को करियर के लिए एक लॉन्चपैड में बदल दिया।

लेकिन हर युवा की कहानी एक जैसी नहीं होती। चंदन शाह के लिए यह मौका उन्हें अपने घर से बहुत दूर ले गया।

छोटे-मोटे कामों से विदेश में करियर तक का सफर

एक समय ऐसा था जब चंदन शाह के परिवार के लिए बुनियादी जरूरतें पूरी करना भी मुश्किल था। बिहार के सिवान जिले के तेतहली गांव में रहने के कारण, उन्हें अपनी पढ़ाई जारी रखने की बहुत कम उम्मीद थी। हाई स्कूल के बाद उन्होंने खेतों में अपने पिता की मदद करने के लिए स्कूल छोड़ दिया। आस-पास ज्यादा मौके न होने की वजह से, चंदन ने गुजारा करने के लिए छोटे-मोटे काम शुरू किए। फिर भी, उस काम से इतनी कमाई नहीं हो पाती थी कि एक अच्छा जीवन जी सकें।

उनकी मां, जो ‘गेंदा जीविका स्वयं सहायता समूह’ (Genda JEEViKA Self Help Group) की सदस्य थीं, की वजह से उनके लिए एक नया मौका सामने आया। उन्होंने चंदन को DDU-GKY के बारे में जानने और उसे आजमाने के लिए प्रोत्साहित किया। चंदन ने काउंसलिंग करवाई और असिस्टेंट इलेक्ट्रीशियन के तौर पर ट्रेनिंग लेने का फैसला किया। इस ट्रेनिंग ने उन्हें करियर की ओर पहला कदम बढ़ाने के लिए जरूरी हुनर ​​सिखाए। कोर्स पूरा करने के बाद, उन्हें बद्दी में एक डिस्टिलरी में हेल्पर की पहली नौकरी मिली, जहां वे हर महीने ₹10,500 कमाते थे। इस शुरुआती अनुभव ने उन्हें आगे पेशेवर तरक्की के लिए एक मजबूत आधार दिया। इन्हीं हुनर ​​और अनुभव के दम पर, चंदन ने बाद में विदेश में काम करने का मौका तलाशा और दुबई चले गए, जहां वे ‘अल शफा जनरल कॉन्ट्रैक्टिंग’ (Al Shafa General Contracting) में इलेक्ट्रीशियन के तौर पर शामिल हुए।

तब तक, उनकी महीने की कमाई बढ़कर ₹35,000 हो गई थी। इसका असर सिर्फ उनके करियर तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि इससे उनके परिवार को भी बेहतर आर्थिक सुरक्षा मिली। चंदन अपने परिवार का खर्च उठाने और अपने भाई-बहनों की प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाई का खर्च उठाने में सक्षम हो गए। उनके इस सफर ने उन्हें गांव के युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बना दिया।

चंदन की कहानी दिखाती है कि कैसे नौकरी का पहला मौका लगातार तरक्की करने वाले करियर की नींव बन सकता है। DDU-GKY ने उन्हें वह पहला कदम उठाने के लिए जरूरी हुनर ​​सिखाया, जबकि उनके पक्के इरादे और अनुभव ने उन्हें आगे के मौकों को पाने में मदद की। इन सबके मेल से उन्हें अपने और अपने परिवार के लिए एक ज्यादा सुरक्षित भविष्य बनाने में मदद मिली।

हालांकि, DDU-GKY से जुड़ी हर कहानी घर से दूर जाने की नहीं है। कुछ युवाओं के लिए यह योजना उन्हें बेहतर अवसरों की तलाश में बाहर ले जाती है, तो कुछ के लिए यही मौका उन्हें अपने घर और गांव वापस लौटने का रास्ता देता है। ऐसी ही कहानी है रूपाली हांसदा की।

नौकरी को एक बिनेस में बदलना

आर्थिक तंगी के कारण असम के चराइदेव की रहने वाली रूपाली हासदा को 9वीं कक्षा के बाद स्कूल छोड़ना पड़ा। उनका परिवार खेती पर निर्भर था और उनके पिता ही घर में कमाने वाले अकेले व्यक्ति थे। उनकी मां, जो एक स्वयं-सहायता समूह (Self-Help Group) की सक्रिय सदस्य थीं, ने उनके सपनों को हमेशा बढ़ावा दिया। रूपाली को एक ‘जीविका सखी’ के जरिए DDU-GKY के बारे में पता चला और दिसंबर 2022 में उन्होंने ‘सिलाई मशीन ऑपरेटर’ ट्रेड में दाखिला लिया।

ट्रेनिंग पूरी करने के बाद, उन्हें तमिलनाडु के तिरुपुर में KPR अपैरल मिल्स में नौकरी मिल गई। 5 महीने तक उन्होंने एक अनजान शहर में काम किया और नए माहौल में खुद को ढाला। फिर भी, उनका मन घर पर ही लगा रहता था। नौकरी से हुई बचत के साथ वह हाथीबंधा लौट आईं और सिलाई और कटाई केंद्र (Sewing and Cutting Centre) में 50,000 रुपये का निवेश किया। जो काम शुरू में सिर्फ उनकी अपनी आजीविका का जरिया था, उसने जल्द ही किसी और के लिए भी रोजगार का मौका बना दिया। उन्होंने केंद्र में एक युवा लड़की को काम पर रखा और अपने समुदाय में एक बिजनेस खड़ा करना शुरू किया। सालाना लगभग 1.10 लाख रुपये की कमाई के साथ, रूपाली का सफर स्किलिंग (कौशल विकास) का एक अलग पहलू दिखाता है। नौकरी ने उन्हें एक शुरुआत दी, लेकिन उन्होंने उस अनुभव को अपने खुद के काम में बदलने का फैसला किया।

रूपाली ने घर के पास ही अपनी आजीविका बनाने का फैसला किया। वहीं, हीरालाल ने एक अलग रास्ता चुना—ऐसा रास्ता जो उन्हें अपने सामने आने वाली चुनौतियों का सामना करते हुए करियर बनाने में मदद करे।

अपना खुद का करियर

झारखंड के हीरालाल पंडित ने बचपन से ही देखा था कि कैसे हर फसल यह तय करती थी कि उनके परिवार का गुजारा कितने समय तक चलेगा। चार लोगों का उनका परिवार उनके पिता की मौसमी खेती पर निर्भर था, जिससे महीने में लगभग 5,000 रुपये की कमाई होती थी।

10वीं कक्षा पूरी करने के बाद, उन्होंने हर संभव तरीके से अपने पिता की मदद करना शुरू किया। दिव्यांग होने के कारण उनके लिए नौकरी पाना आसान नहीं था, लेकिन हीरालाल ने अपनी परिस्थितियों को अपने भविष्य पर हावी नहीं होने दिया।

वे अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने में योगदान देते हुए अपना खुद का करियर बनाना चाहते थे। विकल्पों की तलाश करते समय, हीरालाल को DDU-GKY के बारे में पता चला। इस प्रोग्राम की मुफ्त ट्रेनिंग और प्लेसमेंट सहायता ने उन्हें हुनर ​​सीखने और नौकरी पाने का मौका दिया। उन्होंने झारखंड के दुमका में एक ट्रेनिंग सेंटर में ‘हेल्थकेयर मल्टीपर्पज’ ट्रेड में दाखिला लिया।

यह ट्रेनिंग हीरालाल के सफर का एक अहम मोड़ साबित हुई। उन्हें एक ऐसे माहौल में नई स्किल्स सीखने को मिलीं जहां उनके साथ सम्मान और बराबरी का व्यवहार किया गया। कोर्स पूरा करने के बाद, उन्हें नासिक के SMBT हॉस्पिटल में ‘जनरल ड्यूटी असिस्टेंट’ के तौर पर नौकरी मिल गई। इस मौके ने उन्हें अपने परिवार की भलाई में योगदान देने के साथ-साथ खुद भी पैसे कमाने में मदद की। सबसे बड़ी बात यह है कि इस अनुभव ने उनका आत्मविश्वास बढ़ाया और उन्हें अपनी काबिलियत के बारे में नई सोच दी।

आज, हीरालाल दूसरे युवाओं को भी अपनी मुश्किल हालात से आगे देखने और मिले हुए मौकों का पूरा फायदा उठाने के लिए प्रेरित करते हैं। उनके लिए, यह सफर पहला कदम उठाने की हिम्मत से शुरू हुआ था। DDU-GKY ने उन्हें उस पहले कदम को एक करियर और ज्यादा सुरक्षित भविष्य की राह में बदलने में मदद की।

जब कोई हुनर ​​आजीविका का जरिया बन जाए

कोई हुनर ​​ग्रामीण परिवार की हर मुश्किल को दूर नहीं कर सकता, लेकिन यह बेहतर संभावनाओं के दरवाजे जरूर खोल सकता है। विमेथानो के लिए, इसने रोजगार का रास्ता तब बनाया जब आर्थिक तंगी की वजह से उसकी पढ़ाई रुक गई थी। चंदन के लिए, इसने एक ऐसे करियर की शुरुआत की जो उसे दुबई तक ले गया। रूपाली ने अपने हुनर ​​और अनुभव का इस्तेमाल करके अपना खुद का कारोबार शुरू किया, जबकि हीरालाल को रोजगार का जरिया और अपने परिवार की मदद करने का मौका मिला।

उनकी राहें अलग-अलग थीं, लेकिन उनमें एक बात समान थी: हुनर ​​सीखने, उसे आजमाने और आजीविका कमाने का मौका। DDU-GKY इसी पहले कदम को मुमकिन बनाना चाहता है, ताकि ग्रामीण युवा ट्रेनिंग से रोजगार की ओर और रोजगार से ज्यादा सुरक्षित और टिकाऊ आजीविका की ओर बढ़ सकें।

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Viral Post: ‘पिज्जा शॉप में करता था काम….आज खुद के हैं 3 आउटलेट’, सोशल मीडिया पर वायरल हो रही भारत से ऑस्ट्रेलिया गए युवक की कहानी

ऑस्ट्रेलिया में एक भारतीय शख्स की मेहनत और सफलता की कहानी सोशल मीडिया पर चर्चा में है। शख्स ने 11 सालों तक मेहनत करके धीरे-धीरे ऑस्ट्रेलिया में अपना खुद का कारोबार खड़ा कर लिया। करीब 11 साल पहले वह शख्स आगे की पढ़ाई के लिए ऑस्ट्रेलिया गया था। पढ़ाई पूरी करने के बाद उसे अपने क्षेत्र में नौकरी पाने में काफी परेशानी हुई। इसके बाद उसने एक पिज्जा शॉप में फुल-टाइम काम शुरू कर दिया। यहां पर वह ग्राहकों के लिए पिज्जा तैयार करने और उनकी डिलीवरी करने का काम करता था। उनकी इस पूरी यात्रा के बारे में उनके साले और एंटरप्रेन्योर विनीत के ने X पर पोस्ट शेयर कर जानकारी दी। सोशल मीडिया पर ये कहानी तेजी से वायरल हो रही है।

पिज्जा शॉप की खोली तीन आउटलेट

अपनी जर्नी की शुरुआत में उनको कई मुश्किलों के बावजूद उसने हार नहीं मानी। करीब तीन साल तक पिज्जा शॉप में काम करने के बाद उसने पार्टनर के साथ मिलकर अपना पैसा लगाया और एक पिज्जा फ्रेंचाइजी खरीद ली। यहीं से उसकी नौकरी की जिंदगी धीरे-धीरे अपने कारोबार में बदलने लगी और उसने बिजनेस की दिशा में कदम बढ़ाया। समय के साथ उसका कारोबार लगातार बढ़ता गया और उसने दो और पिज्जा फ्रेंचाइजी खरीद लीं, जिससे उसके कुल तीन आउटलेट हो गए।

कोरोना में वह भारत आए

इसी दौरान उसकी निजी जिंदगी में भी कई बदलाव आए। कोरोना महामारी के समय वह भारत आया, जहां उसकी शादी हुई और बाद में वह अपनी पत्नी को ऑस्ट्रेलिया ले गया। कुछ समय बाद उनके दो बच्चे भी हुए। बताया जाता है कि आगे चलकर उसने ऑस्ट्रेलिया में अपना घर और एक BMW कार भी खरीदी। पोस्ट के अनुसार, शख्स ने हैदराबाद में अपना घर बनवाया और अपने माता-पिता को भी ऑस्ट्रेलिया बुला लिया। उनकी जिंदगी में एक और बड़ी उपलब्धि तब जुड़ी, जब उन्हें और उनके परिवार को ऑस्ट्रेलिया की नागरिकता मिल गई। उनके साले विनीत ने बताया कि पिज्जा डिलीवरी से शुरू हुआ उनका सफर आज एक सफल कारोबारी जिंदगी तक पहुंच चुका है।

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लोगों ने किया कमेंट

इस पोस्ट पर कई लोगों ने रिएक्शन दिया है। एक यूजर ने ऑस्ट्रेलिया में उसकी नौकरी को लेकर सवाल उठाते हुए लिखा, “स्टूडेंट वीजा पर पढ़ाई पूरी करने के बाद ऑस्ट्रेलिया में पिज्जा शॉप में फुल टाइम नौकरी कैसे मिली, जबकि उसकी पढ़ाई का इस काम से कोई संबंध नहीं था? इसमें कुछ तो गलत लगता है।” वहीं, एक और यूजर ने कहा, “अगर वह अब ऑस्ट्रेलिया का नागरिक है और वहीं स्थायी रूप से रह रहा है, तो उसे भारत में घर की जरूरत क्यों है? और ‘एक्सटेंडेड ब्रदर-इन-लॉ’ का मतलब क्या होता है?”

एक और यूजर ने कहा, “ऐसी कहानियां भारत में काम कर रहे युवाओं के लिए उम्मीद बढ़ाती हैं। खासकर पंजाब जैसे राज्यों में, जहां बर्गर किंग का एक कर्मचारी दिन में 9 घंटे काम करता है। उसे पता है कि कनाडा में इतने ही 9 घंटे काम करने पर उसे कम से कम 5 गुना ज्यादा कमाई हो सकती है।”

डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट सोशल मीडिया पर यूज़र द्वारा शेयर किए गए कंटेंट पर आधारित है। मनीकंट्रोल इन दावों की न तो स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है और न ही इनका समर्थन करता है।

बिजनेस का B भी नहीं आता है फिर भी 36 साल की महिला ने एक लाख रुपये से खड़ी कर दी कंपनी, अब महीने की कमाई ₹35 लाख!

बिजनेस का B भी नहीं आता है फिर भी 36 साल की महिला ने एक लाख रुपये से खड़ी कर दी कंपनी, अब महीने की कमाई ₹35 लाख!

एक महिला की बिजनेस जर्नी इन दिनों चर्चा में है, जिसने महज ₹1 लाख से अपने सफर की शुरुआत की थी। न कोई कारोबारी विरासत, न बड़ा निवेश और न ही बिजनेस की कोई पारिवारिक समझ इसके बावजूद उन्होंने छोटे स्तर से शुरुआत कर अपनी अलग पहचान बनाई। 36 साल की उम्र में वह आज एक सफल कंपनी चला रही हैं और उनकी कहानी संघर्ष, आत्मविश्वास और लगातार मेहनत की मिसाल पेश करती है। शुरुआती दौर में उन्होंने एक छोटे बेसमेंट से काम शुरू किया था। सफर के दौरान आर्थिक परेशानियां भी आईं, लेकिन उन्होंने अपने कदम पीछे नहीं खींचे।

समय के साथ उनका छोटा-सा कारोबार बढ़ता गया और आज कंपनी करीब ₹3 करोड़ का मासिक कारोबार करती है। खास बात यह है कि इस बिजनेस से करीब 150 परिवारों की आजीविका जुड़ी हुई है। महिला के मुताबिक, वह आज भी अपनी यात्रा को पूरा नहीं मानतीं और आने वाले वर्षों में कंपनी को और आगे ले जाने की तैयारी में जुटी हैं।

पिता ने दिए थे ₹1 लाख

महिला के मुताबिक, करीब 10 साल पहले उनके पिता ने उन्हें ₹1 लाख दिए थे। इसी रकम से उन्होंने एक छोटा-सा बेसमेंट किराए पर लिया और एक मशीन खरीदकर काम शुरू किया। उनका परिवार बिजनेस से जुड़ा हुआ नहीं था। परिवार में किसी को कारोबार का अनुभव नहीं था। इसके बावजूद उनके माता-पिता और बाद में उनके पति ने उनके फैसले का लगातार समर्थन किया।

I’m 36, I’m a mother, and I make ₹35,00,000 a month. Sometimes I genuinely cannot believe this is my life.

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कभी लंच के पैसे भी नहीं होते थे

बिजनेस की शुरुआती राह आसान नहीं रही। महिला ने बताया कि एक समय ऐसा भी था जब उनकी जेब में लंच खरीदने तक के पैसे नहीं होते थे। ऐसे मुश्किल दौर में उनके दोस्तों ने उनकी मदद की और उन्हें आगे बढ़ते रहने का हौसला दिया। वित्तीय परेशानियों के बावजूद उन्होंने काम बंद नहीं किया। हर अगले दिन वह उसी ऊर्जा के साथ दोबारा काम शुरू करती थीं।

10 साल में ₹3 करोड़ का मासिक कारोबार

शुरुआत में जिस बिजनेस को आसपास के लोग एक सामान्य कोशिश के तौर पर देखते थे, वह आज एक स्थापित कंपनी में बदल चुका है। महिला के अनुसार, उनकी कंपनी फिलहाल हर महीने करीब ₹3 करोड़ का कारोबार करती है और कंपनी profitable है। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत मासिक कमाई करीब ₹35 लाख बताई है। कंपनी की ग्रोथ का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज इससे करीब 150 परिवारों की आय जुड़ी हुई है।

अब पांच साल आगे की तैयारी

महिला का कहना है कि इस साल पहली बार उनके पास एक पूरी टीम है, जो कंपनी को आगे बढ़ाने में उनकी मदद कर रही है। वह अगले पांच साल के लिए बिजनेस को लेकर एक स्पष्ट विजन के साथ काम कर रही हैं। दस साल के सफर के बाद भी वो खुद को अपनी मंजिल पर नहीं मानतीं। उनके मुताबिक, उन्हें अब भी लगता है कि उन्होंने अपने बिजनेस की शुरुआत भर की है। उनकी कहानी में सबसे खास बात सिर्फ ₹1 लाख से करोड़ों के कारोबार तक पहुंचना नहीं, बल्कि लगातार मुश्किलों के बावजूद काम करते रहना है। महिला ने अपने सफर को याद करते हुए कहा कि उन्हें शुरू से भरोसा था कि वह यह कर सकती हैं।

(डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट सोशल मीडिया पर यूज़र द्वारा शेयर किए गए कंटेंट पर आधारित है। मनीकंट्रोल इन दावों की न तो स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है और न ही इनका समर्थन करता है।)

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क्या अच्छी जिंदगी जीने के लिए काफी है 1.5 से 2 लाख रुपये तक की सैलरी? इस शख्स ने हाई सैलरी के पीछे छिपे ट्रैप के बारे में बताया

आज के दौर में ज्यादा कमाने की चाह शायद ही किसी से छिपी हो। नौकरी में प्रमोशन, बढ़ती सैलरी और बेहतर पैकेज को अक्सर सफलता की निशानी माना जाता है। लेकिन क्या जिंदगी भर ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाने की दौड़ जरूरी है? इसी सवाल ने सोशल मीडिया पर एक नई बहस छेड़ दी है। मोहित तलरेजा ने अपनी राय साझा करते हुए कहा कि भारत के शहरों में रहने वाले लोगों के लिए 1.5 लाख से 2 लाख रुपये महीने की कमाई एक ऐसा पड़ाव हो सकती है, जहां से जिंदगी को सिर्फ पैसे के पीछे दौड़ाने के बजाय दूसरी जरूरी चीजों पर भी ध्यान दिया जा सके।

‘एक सीमा तय करिए, फिर जिंदगी भी जीना सीखिए’

तलरेजा का मानना है कि हर व्यक्ति के लिए यह सीमा अलग हो सकती है और यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह किस उम्र में इस आय तक पहुंचता है। लेकिन एक बार यह स्तर हासिल हो जाए, तो लगातार ज्यादा कमाने की कोशिश के बजाय जीवन के दूसरे पहलुओं को समय देना ज्यादा अहम हो सकता है। उनके मुताबिक, शहर में एक परिवार को आरामदायक जीवन देने के लिए 1.5 से 2 लाख रुपये की मासिक आय पर्याप्त हो सकती है।

ज्यादा कमाई के साथ बढ़ सकता है दबाव

तलरेजा ने यह भी सवाल उठाया कि क्या हर बार बढ़ती सैलरी के पीछे भागना वाकई खुशहाल जिंदगी की गारंटी देता है। उनका कहना है कि जैसे-जैसे कोई व्यक्ति ज्यादा कमाई के लिए ऊपर बढ़ता है, वैसे-वैसे उसे अपनी जिंदगी के दूसरे हिस्सों से समझौता करना पड़ सकता है। काम का बढ़ता दबाव, कम होता खाली समय और परिवार से दूरी ये ऐसी कीमतें हैं, जिनका एहसास अक्सर बाद में होता है।

पैसा कमाइए, लेकिन खुद के लिए भी वक्त बचाइए

उनकी सलाह है कि करियर में एक तय आर्थिक मुकाम हासिल करने के बाद काम को सामान्य गति से आगे बढ़ने दिया जाए। इस दौरान व्यक्ति अपने स्वास्थ्य, परिवार, सीखने और निजी विकास पर भी ध्यान दे सकता है। तलरेजा का मानना है कि नौकरी के साथ कोई नया कौशल सीखना या अपनी कमाई का दूसरा जरिया तैयार करना भविष्य में ज्यादा संतोष दे सकता है।

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‘बहुत ज्यादा सैलरी भी बन सकती है जाल’

तलरेजा ने लगातार ज्यादा पैसे कमाने की मानसिकता पर सवाल उठाते हुए कहा कि सिर्फ दूसरों के लिए ज्यादा से ज्यादा काम करते रहना लंबे समय में संतुष्टि नहीं देता। उनके अनुसार, हर व्यक्ति को खुद तय करना चाहिए कि उसके लिए ‘कितना काफी है’। उनकी यह बात सोशल मीडिया यूजर्स के बीच भी चर्चा का विषय बन गई। कुछ लोगों ने इसे सही नजरिया बताया, तो कुछ ने माना कि ज्यादा सैलरी के साथ जिम्मेदारियां और दबाव भी बढ़ते हैं। वहीं कई यूजर्स ने कहा कि पैसों के साथ परिवार और खुद के लिए समय निकालना भी उतना ही जरूरी है।

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असम की बाढ़ से बचाई 6000+ बेजुबानों की जान | Manoj Gogoi | 6000+ Animals Rescued | Assam Kaziranga

असम की बाढ़ से बचाई  6000+ बेजुबानों की जान | Manoj Gogoi | 6000+ Animals Rescued | Assam Kaziranga

महीने की कमाई भले ही सिर्फ़ ₹1500 थी, लेकिन उनका दिल हर दिन बेजुबानों के लिए धड़कता था। Tip में मिले थोड़े-से पैसों से भी वो इन बेजुबानों का ख्याल रखते थे— क्योंकि उनके लिए हर जान अनमोल थी।
आज वही जुनून 6000+ जानें बचा चुका है। शायद इसी को कहते हैं—कम साधनों में भी बड़ा दिल रखना।
बेजुबानों के इस फ़रिश्ते की कहानी ज़रूर देखें और शेयर करें, ताकि इनकी इंसानियत की मिसाल और लोगों तक पहुँच सके।
@manojgogoiwildlife

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असम की बाढ़ से बचाई 6000+ बेजुबानों की जान | Manoj Gogoi | 6000+ Animals Rescued | Assam Kaziranga | Assam Flood

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12 साल की कॉरपोरेट नौकरी और फिर बड़ा फैसला, गुरजोत ने बताया क्यों छोड़ दी लाखों की सैलरी वाली जॉब

कॉरपोरेट नौकरी में 12 साल बिताने के बाद गुरजोत अहलूवालिया ने एक बड़ा फैसला लिया है। Accenture Strategy & Consulting में सीनियर मैनेजर के पद पर काम कर चुके गुरजोत ने अब अपनी नौकरी छोड़ दी है। खास बात यह है कि उन्होंने यह कदम किसी मजबूरी में नहीं, बल्कि अपनी पसंद के काम को पूरा समय देने के लिए उठाया है। लंबे समय से शेयर बाजार में दिलचस्पी रखने वाले गुरजोत ने आर्थिक स्वतंत्रता हासिल करने के बाद कॉरपोरेट करियर से बाहर निकलने का फैसला किया। उनका मानना है कि आर्थिक आजादी ने उन्हें यह तय करने की स्वतंत्रता दी कि वह आगे अपना समय और करियर किस तरह बिताना चाहते हैं।

अब वह शेयर बाजार में अपनी रुचि को पूर्णकालिक तौर पर आगे बढ़ाएंगे। हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि नियमित वेतन और अच्छे बोनस की निश्चितता उन्हें जरूर याद आएगी। गुरजोत के इस फैसले ने सोशल मीडिया पर आर्थिक आजादी, नौकरी और अपने जुनून को करियर बनाने को लेकर चर्चा छेड़ दी है।

40 की उम्र से पहले हासिल की Financial Independence

गुरजोत ने सोशल मीडिया पर अपनी नौकरी छोड़ने की जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि Accenture में काम करते हुए उन्होंने अपने सबसे बड़े लक्ष्यों में से एक Financial Independence हासिल की।

उनके लिए आर्थिक आजादी का मतलब सिर्फ पैसा जमा करना नहीं था, बल्कि अपनी जिंदगी और समय से जुड़े फैसले खुद लेने की आजादी भी थी। इसी वजह से उन्होंने 40 साल की उम्र से पहले कॉरपोरेट की ‘रेस’ से बाहर निकलने का फैसला किया।

सैलरी और बोनस जरूर याद आएंगे

नौकरी छोड़ते समय गुरजोत ने यह भी माना कि उन्हें नियमित सैलरी और अच्छे बोनस की कमी जरूर महसूस होगी। हालांकि, इसके बदले उन्हें अपने पसंदीदा काम को पूरा समय देने की आजादी मिल गई है। अब उनका फोकस शेयर बाजार में अपनी रुचि को आगे बढ़ाने पर रहेगा।

लंबा सफर, लंबी कम्यूट से मिली राहत

गुरजोत ने अपनी पोस्ट में कॉरपोरेट नौकरी की कुछ परेशानियों का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि रोजाना का लंबा काम, करीब 3 घंटे का कम्यूट, अचानक किसी ईमेल से पूरा हफ्ता तनावपूर्ण हो जाना और Performance Appraisal की चिंता जैसी चीजों से अब उन्हें राहत मिलेगी।

उन्होंने Accenture को अपने करियर और आर्थिक लक्ष्य हासिल करने में अहम भूमिका देने के लिए धन्यवाद भी कहा।

सोशल मीडिया पर लोगों ने दी बधाई

गुरजोत के इस फैसले पर सोशल मीडिया यूजर्स ने उन्हें नई शुरुआत के लिए शुभकामनाएं दीं। कई लोगों ने Financial Independence हासिल करने को बड़ी उपलब्धि बताया।

एक यूजर ने कहा कि आर्थिक आजादी सिर्फ पर्याप्त पैसा होने का नाम नहीं है, बल्कि यह तय करने की आजादी भी है कि जिंदगी में आगे क्या करना है।

अब शेयर बाजार में आजमाएंगे अपना जुनून

गुरजोत की कहानी ने सोशल मीडिया पर एक अहम सवाल भी खड़ा किया है क्या Financial Independence के बाद नौकरी छोड़कर अपने पसंदीदा काम को करियर बनाया जा सकता है?गुरजोत ने अपने मामले में इसका जवाब ‘हां’ में दिया है। हालांकि, उनकी पोस्ट के बाद लोगों की दिलचस्पी इस बात में भी बढ़ गई कि आखिर उन्होंने नौकरी छोड़ने से पहले कितनी संपत्ति जमा की और उनका FIRE नंबर कितना रहा। एक यूजर ने उनसे इसी को लेकर सवाल भी पूछा।

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कॉरपोरेट नौकरी में 12 साल बिताने के बाद गुरजोत अहलूवालिया ने एक बड़ा फैसला लिया है। Accenture Strategy & Consulting में सीनियर मैनेजर के पद पर काम कर चुके गुरजोत ने अब अपनी नौकरी छोड़ दी है। खास बात यह है कि उन्होंने यह कदम किसी मजबूरी में नहीं, बल्कि अपनी पसंद के काम को पूरा समय देने के लिए उठाया है। लंबे समय से शेयर बाजार में दिलचस्पी रखने वाले गुरजोत ने आर्थिक स्वतंत्रता हासिल करने के बाद कॉरपोरेट करियर से बाहर निकलने का फैसला किया। उनका मानना है कि आर्थिक आजादी ने उन्हें यह तय करने की स्वतंत्रता दी कि वह आगे अपना समय और करियर किस तरह बिताना चाहते हैं।

अब वह शेयर बाजार में अपनी रुचि को पूर्णकालिक तौर पर आगे बढ़ाएंगे। हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि नियमित वेतन और अच्छे बोनस की निश्चितता उन्हें जरूर याद आएगी। गुरजोत के इस फैसले ने सोशल मीडिया पर आर्थिक आजादी, नौकरी और अपने जुनून को करियर बनाने को लेकर चर्चा छेड़ दी है।

40 की उम्र से पहले हासिल की Financial Independence

गुरजोत ने सोशल मीडिया पर अपनी नौकरी छोड़ने की जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि Accenture में काम करते हुए उन्होंने अपने सबसे बड़े लक्ष्यों में से एक Financial Independence हासिल की।

उनके लिए आर्थिक आजादी का मतलब सिर्फ पैसा जमा करना नहीं था, बल्कि अपनी जिंदगी और समय से जुड़े फैसले खुद लेने की आजादी भी थी। इसी वजह से उन्होंने 40 साल की उम्र से पहले कॉरपोरेट की ‘रेस’ से बाहर निकलने का फैसला किया।

सैलरी और बोनस जरूर याद आएंगे

नौकरी छोड़ते समय गुरजोत ने यह भी माना कि उन्हें नियमित सैलरी और अच्छे बोनस की कमी जरूर महसूस होगी। हालांकि, इसके बदले उन्हें अपने पसंदीदा काम को पूरा समय देने की आजादी मिल गई है। अब उनका फोकस शेयर बाजार में अपनी रुचि को आगे बढ़ाने पर रहेगा।

लंबा सफर, लंबी कम्यूट से मिली राहत

गुरजोत ने अपनी पोस्ट में कॉरपोरेट नौकरी की कुछ परेशानियों का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि रोजाना का लंबा काम, करीब 3 घंटे का कम्यूट, अचानक किसी ईमेल से पूरा हफ्ता तनावपूर्ण हो जाना और Performance Appraisal की चिंता जैसी चीजों से अब उन्हें राहत मिलेगी।

उन्होंने Accenture को अपने करियर और आर्थिक लक्ष्य हासिल करने में अहम भूमिका देने के लिए धन्यवाद भी कहा।

सोशल मीडिया पर लोगों ने दी बधाई

गुरजोत के इस फैसले पर सोशल मीडिया यूजर्स ने उन्हें नई शुरुआत के लिए शुभकामनाएं दीं। कई लोगों ने Financial Independence हासिल करने को बड़ी उपलब्धि बताया।

एक यूजर ने कहा कि आर्थिक आजादी सिर्फ पर्याप्त पैसा होने का नाम नहीं है, बल्कि यह तय करने की आजादी भी है कि जिंदगी में आगे क्या करना है।

अब शेयर बाजार में आजमाएंगे अपना जुनून

गुरजोत की कहानी ने सोशल मीडिया पर एक अहम सवाल भी खड़ा किया है क्या Financial Independence के बाद नौकरी छोड़कर अपने पसंदीदा काम को करियर बनाया जा सकता है?गुरजोत ने अपने मामले में इसका जवाब ‘हां’ में दिया है। हालांकि, उनकी पोस्ट के बाद लोगों की दिलचस्पी इस बात में भी बढ़ गई कि आखिर उन्होंने नौकरी छोड़ने से पहले कितनी संपत्ति जमा की और उनका FIRE नंबर कितना रहा। एक यूजर ने उनसे इसी को लेकर सवाल भी पूछा।

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महाराष्ट्र के लोणी के रहने वाले धनंजय विखे पाटिल ने मशरूम की खेती का काम बेहद छोटे स्तर से शुरू किया था। 12वीं कक्षा में पढ़ाई के दौरान उन्हें मशरूम उगाने में दिलचस्पी हुई और उन्होंने पुणे में एक दिन की ट्रेनिंग ली। इसके लिए उन्होंने ₹15,000 खर्च कर ऑयस्टर मशरूम का किट खरीदा और घर के सिर्फ 100 वर्ग फुट हिस्से को खेती के लिए इस्तेमाल किया। हालांकि, शुरुआती ट्रेनिंग पर्याप्त नहीं थी और पहली कोशिश में उन्हें सफलता नहीं मिली। इसके बावजूद उन्होंने इस काम को छोड़ने के बजाय अपनी गलतियों को समझा और फिर से शुरुआत करने का फैसला किया। दूसरी कोशिश में उन्होंने कम खर्च में मशरूम स्पॉन खरीदा और करीब 50 बैग तैयार किए।

इस बार उन्हें उत्पादन मिला और मशरूम बेचकर ₹3,000 की कमाई हुई। रकम भले ही कम थी, लेकिन इस छोटी सफलता ने उन्हें भरोसा दिया। इसके बाद उन्होंने प्रैक्टिकल अनुभव जुटाया और धीरे-धीरे अपने छोटे प्रयोग को बड़े कारोबार में बदलने की दिशा में कदम बढ़ाया।

दूसरी कोशिश में कमाई हुई सिर्फ ₹3,000

दूसरी बार धनंजय ने ₹1,000 में 4 किलो मशरूम स्पॉन खरीदा और करीब 50 बैग तैयार किए। इस बार उन्होंने मशरूम उगाकर स्थानीय बाजार में बेचे और लगभग ₹3,000 कमाए।

रकम भले ही छोटी थी, लेकिन इससे उन्हें भरोसा हो गया कि वह मशरूम उगा भी सकते हैं और उसे बाजार में बेच भी सकते हैं।

इसके बाद उन्होंने गांव के दूसरे किसानों से सीखना शुरू किया। सोशल मीडिया, YouTube और दूसरे मशरूम उत्पादकों की मदद से उन्होंने खेती की बारीकियां समझीं।

पढ़ाई के साथ जारी रखा मशरूम का काम

धनंजय ने BSc Biotechnology में दाखिला लिया और पढ़ाई के दौरान भी मशरूम की खेती जारी रखी। उनकी पढ़ाई ने उन्हें मशरूम उत्पादन के पीछे की वैज्ञानिक प्रक्रिया और बाजार में मांग-सप्लाई को समझने में मदद की।

बाद में 2021 में उन्होंने MSc Biotechnology में भी दाखिला लिया। इसी दौरान उन्होंने महसूस किया कि सिर्फ उत्पादन बढ़ाने से कारोबार बहुत बड़ा नहीं होगा, बल्कि बाजार और बिक्री पर भी ध्यान देना जरूरी है।

100 वर्ग फुट से पहुंच गए 1,000 वर्ग फुट तक

शुरुआत में घर के 100 वर्ग फुट हिस्से में खेती करने वाले धनंजय ने धीरे-धीरे अपना काम बढ़ाया। कोविड के दौर में मशरूम की मांग बढ़ने के बाद उन्होंने अपनी जमीन पर 1,000 वर्ग फुट का शेड तैयार किया। बांस से तैयार इस यूनिट में शुरुआत में हर महीने करीब 300-400 किलो मशरूम का उत्पादन होने लगा। इससे उन्हें लगभग ₹40,000 महीने की आमदनी होने लगी।

समय के साथ उनका अनुभव और सोशल मीडिया पर मौजूदगी बढ़ी तो दूसरे लोग भी उनसे मशरूम की खेती सीखने के लिए संपर्क करने लगे।

सिर्फ अपनी फसल पर निर्भर नहीं रहे

धनंजय ने कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए एक बड़ा बदलाव किया। उन्होंने दूसरे किसानों से भी ऑयस्टर मशरूम खरीदकर थोक खरीदारों को बेचना शुरू किया। इससे उन्हें समझ आया कि बिजनेस बढ़ाने के लिए अपनी जमीन और उत्पादन बढ़ाना ही एकमात्र रास्ता नहीं है। उन्होंने किसानों और खरीदारों का नेटवर्क तैयार किया और मशरूम ट्रेडिंग को अपने कारोबार का दूसरा हिस्सा बना लिया।इससे किसानों को उनकी उपज के लिए बाजार मिला और खरीदारों को नियमित सप्लाई मिलने लगी।

अब हर महीने करीब 1,000 किलो मशरूम तैयार

आज उनकी 1,000 वर्ग फुट की यूनिट में करीब 900-1,000 बैग उत्पादन में रहते हैं। वह मुख्य रूप से ऑयस्टर मशरूम उगाते हैं, जबकि गर्मियों में मिल्की मशरूम की ओर भी रुख करते हैं। उनकी यूनिट से हर महीने लगभग 1,000 किलो मशरूम निकलता है। बाजार के हिसाब से वह इसे करीब ₹160-₹180 प्रति किलो तक बेचते हैं। अपनी खेती से उनकी मासिक कमाई करीब ₹1.8-2 लाख तक पहुंचती है।

मशरूम से पाउडर और कुकीज तक

धनंजय ने सिर्फ ताजा मशरूम बेचने तक अपना कारोबार सीमित नहीं रखा। उन्होंने सूखे मशरूम से पाउडर तैयार करना और मशरूम कुकीज बनाना भी शुरू किया।

वह किसानों से सूखे ऑयस्टर मशरूम करीब ₹800 प्रति किलो में खरीदते हैं और मशरूम पाउडर करीब ₹1,600 प्रति किलो तक बेचते हैं। वहीं, 200 ग्राम मशरूम कुकीज का पैक ₹120 में तैयार किया जाता है।

ट्रेडिंग और वैल्यू एडेड प्रोडक्ट्स से उन्हें हर महीने ₹2 लाख से ज्यादा की कमाई होने का दावा है।

खेती से ट्रेनिंग तक बना पूरा नेटवर्क

अब धनंजय दूसरे लोगों को भी मशरूम की खेती सिखाते हैं। वह ऑनलाइन क्लास के जरिए ऑयस्टर के अलावा शिटाके और गैनोडर्मा जैसी किस्मों की ट्रेनिंग देते हैं।

उनकी सामान्य बैच में चार-पांच छात्र होते हैं और ट्रेनिंग की फीस करीब ₹5,000 प्रति व्यक्ति है। इसमें यूनिट शुरू करने की जानकारी, खेती की ट्रेनिंग और स्टार्टर किट भी शामिल होती है।

इतना ही नहीं, ट्रेनिंग लेने वाले किसान जब मशरूम तैयार करते हैं तो धनंजय उनकी उपज खरीदने में भी मदद करते हैं।

₹3,000 से शुरू होकर ₹4 लाख महीने तक पहुंचा कारोबार

धनंजय के मुताबिक, उनका पूरा मशरूम कारोबार अब करीब ₹4 लाख प्रति माह का है। उनकी कहानी बताती है कि खेती में सिर्फ उत्पादन ही मायने नहीं रखता। सही मार्केटिंग, किसानों से नेटवर्क बनाना, ट्रेडिंग और प्रोडक्ट में वैल्यू जोड़ना भी कारोबार को कई गुना बढ़ा सकता है।

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Success Story: छत पर शुरू की ड्रैगन फ्रूट की खेती, ऐसे होने लगी लाखों की कमाई, महिला ने अपनाया ये तरीका

रिटायरमेंट के बाद आमतौर पर लोग आराम और परिवार के साथ समय बिताने की योजना बनाते हैं। लेकिन केरल की पूर्व हेडमिस्ट्रेस रेमाभाई एस की जिंदगी में रिटायरमेंट के बाद एक अलग ही अध्याय शुरू हुआ। अकेलेपन से निपटने के लिए घर में पौधे लगाने से शुरू हुआ उनका सफर धीरे-धीरे ऐसे बिजनेस में बदल गया, जिससे अब वह करीब ₹4 लाख महीने की कमाई कर रही हैं।

मां की मौत के बाद बढ़ गया था अकेलापन

रेमाभाई ने 31 मई 2022 को 30 साल से ज्यादा समय तक जूलॉजी पढ़ाने के बाद रिटायरमेंट लिया। उनके पति रिटायर्ड सीनियर बैंक मैनेजर हैं और उस समय भी एक इंजीनियरिंग कॉलेज में काम कर रहे थे। वहीं उनका बेटा और बहू दोनों डॉक्टर हैं और दिल्ली में रहते थे। उसी साल उनकी मां का निधन हो गया। रिटायरमेंट और मां की मौत के बाद घर में अकेलापन उन्हें ज्यादा महसूस होने लगा। इसी दौरान उन्होंने खुद को व्यस्त रखने के लिए घर में पौधे उगाने का फैसला किया।

52 विदेशी फलों पर की रिसर्च, फिर चुना ड्रैगन फ्रूट

रेमाभाई ने शुरुआत किसी जल्दबाजी में नहीं की। उन्होंने जर्नल, ऑनलाइन जानकारी और अलग-अलग फार्म की यात्राओं के जरिए करीब 52 विदेशी फलों के बारे में जानकारी जुटाई। काफी रिसर्च के बाद उन्होंने Malaysian King Red Dragon Fruit किस्म को चुना। सीमित जगह में ज्यादा पौधे लगाने के लिए उन्होंने हाई-डेंसिटी फार्मिंग का तरीका अपनाया।

1,750 वर्ग फुट में लगाए 360 पौधे

घर के करीब 1,750 वर्ग फुट के हिस्से में उन्होंने 360 ड्रैगन फ्रूट पौधे लगाए। इसके लिए 90 स्थानीय स्तर पर बने कंक्रीट पोल लगाए गए और हर पोल पर चार पौधों को सहारा दिया गया। उन्होंने खर्च कम रखने के लिए GI पाइप और पुराने टायरों का भी इस्तेमाल किया। शुरुआती दौर में एक पौधे की स्टेम करीब ₹100 में खरीदी गई थी। मेहनत का नतीजा जल्दी दिखा। करीब छह महीने में पौधों में फूल आने लगे और मार्च 2023 से उन्होंने फल की पहली फसल लेना शुरू कर दिया।

शुरुआत में ₹50 हजार, फिर बढ़कर ₹1.5 लाख महीना

पहले 360 पौधों से उन्हें हर महीने ₹50 हजार से ज्यादा की आमदनी हुई। पौधों के बड़े होने के साथ कमाई बढ़कर करीब ₹1.5 लाख महीने तक पहुंच गई। उत्पादन के चरम समय में वह लगभग 750 किलो ड्रैगन फ्रूट हर महीने तैयार करने लगीं। वह फल करीब ₹175 प्रति किलो की दर से बेचती थीं। खास बात यह रही कि थोक खरीदार और ऑर्गेनिक स्टोर उनके घर से ही फल उठा लेते थे।

नई जमीन नहीं खरीदी, छत को बनाया अगला फार्म

बिजनेस बढ़ाने के लिए रेमाभाई के सामने अगली चुनौती थी बिना जमीन खरीदे उत्पादन बढ़ाना। घर की छत पर बड़ी मात्रा में मिट्टी ले जाना उन्हें सही नहीं लगा। इसलिए उन्होंने सोइल-लेस यानी कम मिट्टी वाली खेती के विकल्प पर प्रयोग शुरू किया। उन्होंने सामान्य मिट्टी और घर में तैयार किए गए कंपोस्ट की तुलना की। कंपोस्ट में पौधों की ग्रोथ बेहतर दिखने के बाद उन्होंने इसी तरीके को आगे बढ़ाया।

बैरल में लगाए 100 और पौधे

रेमाबाई ने छत पर 50 बैरल लगाए। इनमें कंपोस्ट और गोबर की खाद का मिश्रण इस्तेमाल किया गया और हर बैरल में दो पौधे लगाए गए। इस तरह छत पर 100 और ड्रैगन फ्रूट पौधे तैयार हो गए। करीब पांच महीने में इन पौधों पर फल आने लगे। अक्टूबर 2023 तक छत की खेती भी उत्पादन देने लगी थी। एक पौधे पर एक समय में करीब 10 से 20 फल तक दिखाई देते थे।

घर के कचरे से तैयार करती हैं खाद और लिक्विड फर्टिलाइजर

रेमाबाई की खेती की खासियत सिर्फ ड्रैगन फ्रूट उगाना नहीं है। वह घर और बगीचे से निकलने वाले जैविक कचरे का इस्तेमाल भी खेती में करती हैं। किचन वेस्ट, पत्तियां, कटहल का बचा हिस्सा, प्याज और सब्जियों के अवशेष जैसी चीजों से वह कंपोस्ट तैयार करती हैं। उनके पास तीन कंपोस्टिंग यूनिट हैं और वह 15 से ज्यादा तरह के लिक्विड प्रिपरेशन भी तैयार करती हैं। मछली के कचरे से वह फिश अमीनो एसिड भी बनाती हैं। उनके मुताबिक, अब तक 5,000 लीटर से ज्यादा यह तैयारी तैयार की जा चुकी है।

साल में ज्यादा लंबे समय तक मिलता है फल

उनके खेती के तरीके का एक फायदा यह भी है कि ड्रैगन फ्रूट का उत्पादन लंबे समय तक चलता है। जहां आमतौर पर इसकी मुख्य फसल करीब पांच से छह महीने तक रहती है, वहीं रेमाबाई लगभग 10 महीने तक फल प्राप्त कर लेती हैं। जनवरी और फरवरी में उत्पादन में मुख्य अंतराल रहता है। उनके बगीचे में महीने में करीब तीन बार फसल होती है और हर बार लगभग 250 किलो फल निकलता है।

अब पौधों की कटिंग भी बन गई कमाई का जरिया

समय के साथ रेमाभाई के ड्रैगन फ्रूट पौधों की स्टेम कटिंग की मांग भी बढ़ने लगी। उन्होंने इसे अलग आय के स्रोत के रूप में विकसित कर लिया। वह एक कटिंग करीब ₹70 में बेचती हैं और अब तक भारत, मालदीव और श्रीलंका में उनके 2,500 से ज्यादा ग्राहक बताए जाते हैं। बड़े ऑर्डर कुरियर के जरिए भेजे जाते हैं। एक दिन में तेलंगाना के लिए 5,500 स्टेम कटिंग का ऑर्डर भी भेजा गया।

सिर्फ पौधे नहीं बेचतीं, तरीका भी सिखाती हैं

रेमाबाई अपने ग्राहकों को सिर्फ कटिंग देकर नहीं छोड़तीं। वह उन्हें पौधे लगाने और उनकी देखभाल के बारे में जानकारी देती हैं और आगे की ग्रोथ पर भी नजर रखती हैं। उनके मुताबिक, सही परिस्थितियों में स्टेम से करीब छह महीने में फल मिलना शुरू हो सकता है।

रिटायरमेंट का शौक बना पूरा बिजनेस

रेमाबाई की कहानी की खास बात यह है कि उन्होंने बिजनेस शुरू करने के लिए न बड़ी जमीन खरीदी और न ही भारी निवेश किया। घर के आंगन और छत जैसी सीमित जगह का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने पहले पौधे लगाए, फिर रिसर्च की, प्रयोग किए और धीरे-धीरे खेती को कमाई के मॉडल में बदल दिया।

आज ड्रैगन फ्रूट, छत पर खेती और स्टेम कटिंगइन अलग-अलग स्रोतों से उनकी कुल मासिक कमाई करीब ₹4 लाख बताई जाती है। रिटायरमेंट के बाद अकेलेपन से बचने के लिए शुरू हुआ पौधों का शौक अब उनकी आर्थिक आत्मनिर्भरता की कहानी बन चुका है।

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