दिल्ली के एक एक्सिडेंट में पैर गंवाने वाली 26 साल की रीना को मिलेगा 2.55 करोड़ का मुआवजा! ट्रिब्यूनल ने सुनाया गजब का फैसला

दिल्ली में एक मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल ने 2024 में हुई दुर्घटना में पैर गंवाने वाले महिला उद्यमी के हक में बड़ा फैसला सुनाया है। इस दुर्घटना में 26 साल की एंटरप्रेन्योर रीना के स्कूटर को एक ट्रक ने टक्कर मार दी थी, जिसके बाद घुटने के नीचे उसका बायां पैर कट गया था। दिल्ली की ट्रिबयूनल ने इस मामले में 2.55 करोड़ रुपये का मुआवजा देने का फैसला किया है।

पीठासीन अधिकारी गुंजन गुप्ता रीना की दावा याचिका पर सुनवाई कर रही थी। उन्होंने ट्रक की बीमा कंपनी नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को 22 फरवरी, 2025 से 30 दिनों के अंदर 9% सालाना ब्याज के साथ 2.55 करोड़ रुपये देने का निर्देश दिया। 15 अक्टूबर के अपने आदेश में, ट्रिब्यूनल ने कहा, “इस फैसले के पहले के हिस्से में याचिकाकर्ता की फंक्शनल डिसेबिलिटी को 100% माना गया है। बताई गई डिसेबिलिटी और उससे होने वाली दिक्कतों के साथ, सुधार की कोई संभावना नहीं होने पर, याचिकाकर्ता वैसी जिंदगी नहीं जी पाएगी जैसी वह एक्सीडेंट से पहले जीती थी।”

यह एक्सीडेंट 5 नवंबर, 2024 को पीरागढ़ी चौक पर हुआ था। रीना अपने दो साल के बेटे के साथ पीछे बैठी थी, तभी ट्रक ने स्कूटर को टक्कर मार दी। ट्रक का एक पहिया उसके बाएं पैर पर चढ़ गया, जिसे बाद में काटना पड़ा। उसकी तीन सर्जरी हुईं। बीमा कंपनी ने स्कूटर चलाने वाले को दोषी ठहराया और कहा कि महिला ने हेलमेट नहीं पहना था। ट्रिब्यूनल ने इन बातों को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि रैश ड्राइविंग पर रीना की गवाही का कोई जवाब नहीं था। ट्रक का ड्राइवर-कम-मालिक, महिंदर सिंह, ट्रिब्यूनल के सामने पेश नहीं हुआ और उसके खिलाफ एक उल्टा नतीजा निकाला गया।

ट्रिब्यूनल ने भविष्य में कमाने की क्षमता के नुकसान के लिए याचिकाकर्ता रीना को 1.68 करोड़ रुपये का बड़ा हिस्सा अवॉर्ड किया। हालांकि बाएं निचले अंग के लिए विकलांगता 80% सर्टिफाइड थी, ट्रिब्यूनल ने फंक्शनल विकलांगता को 100% माना क्योंकि रीना को अपना कारोबार बंद करना पड़ा। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले का हवाला दिया गया।

घटना के समय याचिकाकर्ता परिवार की महीने की इनकम 58,915 रुपये थी, जिसमें एक होममेकर के तौर पर उसके योगदान के 6,000 रुपये शामिल थे। उसके दो से चार साल के तीन बच्चे हैं। ट्रिब्यूनल ने कहा कि बिल न होने की वजह से मेडिकल खर्च से मना नहीं किया जा सकता और गलत काम करने वाले को पीड़ित की मेडिक्लेम पॉलिसी का फायदा नहीं मिल सकता। ट्रिब्यूनल ने पीड़ित को अलग-अलग मदों में कुल 2.55 करोड़ रुपये दिए।

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5 बकरियों से खड़ा किया ₹18 लाख का स्टार्टअप! बकरी के दूध से साबुन-घी भी बनाते हैं युवा किसान संदीप

Goat Milk Startup: अक्सर लोग पढ़-लिखकर नौकरी करना या अपनी पढ़ाई की स्किल से अपने लिए काम की तलाश करते हैं लेकिन जब जीवन में संकट का दौर आता है तो पढ़ाई लिखाई और स्किल भी धुंधली पड़ जाती हैं लेकिन संकट के बीच से निकलकर लोग अपने लिए नए रास्ता निकालते हैं।

कुछ ऐसी ही कहानी जयपुर के युवा किसान और एंटरप्रेन्योर संदीप मीणा की है जिन्होंने अपने घर के बाड़े से 5 बकरियों से दूध और दूध से बने प्रोडक्ट्स के स्टार्टअप GoatVeda की शुरुआत की और आज इनकी कंपनी का टर्नओवर 18 लाख रुपए है। जयपुर के नजदीक जोबनेर कस्बे के डूंगरीकलां गांव के रहने वाले संदीप कुमार मीणा ने खेती और बकरी पालन के साथ अपने स्टार्टअप की ऐसी जर्नी शुरू की जो अब अन्य युवाओं को प्रेरित कर रही है।

संदीप एक सामान्य परिवार से आते हैं उनके जीवन में सबकुछ ठीक चल रहा होता लेकिन कोरोनाकाल में पिता का निधन और प्राइवेट नौकरी पर गहराए संकट ने संदीप कुमार मीणा के जीवन को अलग दिशा में मोड़ दिया जो आज युवाओं के लिए मिसाल है। संदीप मीणा के पिता राम मीणा पत्थर का काम करते थे और सिलिकोसिस बीमारी से पीड़ित थे। कोरोना काल में 2021 में उनका निधन हो गया।

पिता की असामयिक मृत्यु के बाद घर की जिम्मेदारी संदीप के कंधे पर आ गई। परिवार की आर्थिक स्थिति और प्राइवेट नौकरी को छोड़कर संदीप ने अपनी मां कमला देवी के साथ 2022 में वर्क फ्रॉम होम के साथ अपने स्टार्टअप की शुरुआत की।

संदीप ने 5 बकरियों से शुरू किया था ‘गोटवेदा’ स्टार्टअप

वेटरनरी में दो साल का डिप्लोमा और कुछ महीनों की नौकरी के बाद संदीप कुमार मीणा एक समय एग्रीकल्चर में बीएससी करना चाहते थे। लेकिन 4 साल का लंबा समय और परिवार की स्थिति को देखते हुए उन्होंने अपने घर के बाड़े से ही ‘गोटवेदा’ स्टार्टअप की शुरुआत की, कोरोनाकाल में लगातार दूध की डिमांड को देखते हुए संदीप को इस स्टार्टअप का आइडिया आया। जिसके बाद उन्होंने कुछ समय तक इस स्टार्टअप के वर्क और मार्केट को समझा और फिर बिल्कुल छोटे रूप में शुरुआत की।

आज संदीप के पास जयपुर की रजिस्टर्ड ब्रीड गुर्जर और सिरोही नस्ल की कई बकरियां हैं। बकरी पालन में अक्सर किसान और पशुपालक बकरियों को दो तरीकों से पालते हैं, एक बकरियों को फार्म में बांधकर ब्रीडिंग और मांस के लिए जिसके पालन में खर्च ज्यादा आता है, जबकि ग्रेजिंग में कम खर्च आता है।

संदीप ने ग्रेजिंग के अनुसार बकरियों के पालन की शुरुआत की जिसमें बकरियों के भोजन/चारे के लिए संदीप ने 100 अरडू के पौधे लगाए, जिनकी पत्तियों को बकरियां बड़े चाव से खाती हैं। इससे बकरियों में दूध भी बढ़ता है। इस प्रकार संदीप ने बकरी पालन के साथ पेड़ों से भी अतिरिक्त इनकम बनाना शुरू किया।

संदीप के इस स्टार्टअप का मुख्य आकर्षण यह है कि बकरी का दूध खास तौर पर उन बच्चों के लिए लिया जाता है, जिन्हें गाय, भैंस के दूध से एलर्जी होती है। इसलिए बकरी का दूध पचने में हल्का होता है और यह शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक होता है इसलिए डेंगू जैसी बीमारियों में डॉक्टर भी बकरी का दूध पीने की सलाह देते हैं। इसी के चलते संदीप ने दूध के साथ दूध से ही कई प्रोडक्ट्स बनाए जिनकी अब मार्केट में खूब डिमांड रहती है।

ऑनलाइन मार्केट से ग्राहकों को जोड़ खड़ा किया लाखों का स्टार्टअप

संदीप कुमार मीणा ने अपने स्टार्टअप की शुरुआत भले ही छोटे रूप में की हो लेकिन दूध और दूध से बने प्रोडक्ट्स को मार्केट तक पहुंचाने के लिए संदीप ने अपनी शुरुआत जयपुर में चित्रकूट स्टेडियम के पास लगने वाले ऑर्गेनिक मार्केट में दूध की स्टॉल लगाकर की और यहां संदीप ने 250 रुपए लीटर के हिसाब से अपना दूध बेचा।

ऐसे धीरे-धीरे संदीप को शुरुआती दौर में ग्राहक मिले और उन्हें बाजार का अनुभव मिला। वैसे दूध महंगा होने के चलते शुरुआत में उनके दूध की डिमांड कम रही लेकिन संदीप ने अपने स्टार्टअप पर लगातार फोकस किया और धीरे-धीरे किसानों को अपने साथ जोड़ा और ऑनलाइन मार्केट तक पहुंचे।

आज संदीप एक बकरी से रोजाना करीब एक से डेढ़ लीटर दूध प्राप्त करते हैं तो हर दिन उनके पास लगभग 70 से 80 किलो दूध का उत्पादन होता है। साथ ही संदीप के इस स्टार्टअप से अब कई किसान और जुड़ गए हैं। संदीप अब अपने स्टार्टअप में दूध उत्पादन और प्रोडक्ट्स बनाने के अलावा गांवों में पशुपालन करने वाले किसानों को पशु चिकित्सा सेवाएं और बकरियों-भेड़ों के लिए खरीद/बिक्री, किसानों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम और सहायता, ऋण, बीमा और एआई सेवाओं तक गोटवेदा सिर्फ एक ब्रांड नहीं है बल्कि एक सफल स्टार्टअप बन चुका है।

5 बकरियों से खड़ा किया ₹18 लाख का स्टार्टअप!

बकरियों के दूध से संदीप तैयार करते हैं ये खास प्रोडक्ट्स

संदीप अपने प्रोसेसिंग यूनिट में दूध से कई बेहतरीन प्रोडक्ट्स तैयार करते हैं, जिनकी ई-कॉमर्स मार्केट में भारी डिमांड रहती है:

पाउडर: 500 लीटर दूध से बल्क में पाउडर बनवाया जाता है, जिसकी रोजाना 25 से 30 लीटर बिक्री होती है।

साबुन: हर महीने करीब 300 साबुन बनाए जाते हैं, जिसकी कीमत 30 रुपए है।

पनीर: 2 लीटर दूध से 300 ग्राम पनीर तैयार किया जाता है, जिसकी डिलीवरी ऑर्डर्स के हिसाब से की जाती है।

अन्य प्रोडक्ट्स: दूध और घी की भी ग्राहकों के बीच खूब मांग रहती है।

रिपोर्ट: अंकित राजपूत

गुजरात में 30 लाख महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की तैयारी, 136 बस स्टेशनों पर खुलेंगे ग्राम हाट

गुजरात में 30 लाख महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की तैयारी, 136 बस स्टेशनों पर खुलेंगे ग्राम हाट

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गुजरात सरकार ने सखी मंडल से जुड़ी महिलाओं को आर्थिक रूप से मज़बूत बनाने और उनके प्रोडक्ट्स के लिए मार्केट देने के लिए कई पहल शुरू की हैं। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल की लीडरशिप में राजकोट में हुए एक प्रोग्राम में ग्राम हाट, अमूल मिल्क पार्लर और महिलाओं को एंटरप्रेन्योरशिप की ओर बढ़ावा देने वाली स्कीम्स पर ज़ोर दिया गया। इन पहलों का मकसद महिलाओं को रोज़गार के मौके देना और उन्हें आर्थिक गतिविधियों में ज़्यादा शामिल करना है।

 

सखी मंडल की महिलाओं द्वारा तैयार किए गए हैंडीक्राफ्ट, घरेलू प्रोडक्ट्स और खाने-पीने की चीज़ों के लिए मार्केट देने के लिए राज्य के करीब 136 बस स्टेशनों पर ग्राम हाट शुरू करने की पहल की गई है। इस सिस्टम के ज़रिए, महिलाएं अपने प्रोडक्ट्स सीधे कंज्यूमर्स तक पहुंचा पाएंगी और बिक्री के नए मौके बना पाएंगी।

 

इस पहल से लोकल प्रोडक्ट्स को बढ़ावा मिल सकता है और ‘वोकल फॉर लोकल’ अप्रोच को भी बढ़ावा मिल सकता है।

 

महिलाओं को सिर्फ़ प्रोडक्शन तक सीमित रखने के बजाय सफल एंटरप्रेन्योर बनाने के लिए ट्रेनिंग और गाइडेंस पर भी ध्यान दिया जा रहा है। इसके लिए MICA, NIFT और EDII जैसे संस्थानों के साथ मिलकर महिलाओं को बिज़नेस मैनेजमेंट, मार्केटिंग, ब्रांडिंग और डिजिटल बिज़नेस पर गाइडेंस देने का प्लान है।

इसके अलावा, बैंक, रेलवे और गुजरात स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन (GSRTC) समेत कई संस्थानों के साथ MoU के ज़रिए महिलाओं के लिए नए मार्केट और बिज़नेस के मौके बनाने की कोशिश की जा रही है।

ग्रामीण इलाकों में पशुपालन और दूध प्रोडक्शन से जुड़ी महिलाओं को ज़्यादा इनकम के मौके देने के लिए राज्य के 18,000 गांवों में महिलाओं द्वारा चलाए जाने वाले अमूल मिल्क पार्लर शुरू करने का ऐलान किया गया है।

इस पहल से महिलाओं को दूध और दूध से बने प्रोडक्ट्स की बिक्री से जुड़ने का मौका मिलेगा। साथ ही, लोकल लेवल पर रोज़गार और इनकम के नए रास्ते बन सकेंगे।
 

गुजरात महिलाओं की इनकम बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार के ‘लखपति दीदी’ कैंपेन से भी जुड़ा है। दी गई जानकारी के मुताबिक, राज्य में अब तक 8.5 लाख महिलाएं लखपति दीदी बन चुकी हैं। साल 2029 तक देश में 6 करोड़ लखपति दीदी बनाने का टारगेट रखा गया है।
 

महिलाओं को अपना बिज़नेस शुरू करने में मदद करने के लिए कैश क्रेडिट की सुविधा और ई-कॉमर्स को बढ़ावा देने जैसे कदम भी उठाए जा रहे हैं। बताया गया है कि पिछले पांच सालों में हुए 236 सरसा मेलों में 8,500 सेल्फ-हेल्प ग्रुप्स ने मिलकर करीब 40 करोड़ रुपये की बिक्री की है।
 

बताया गया है कि गुजरात में 3 लाख से ज़्यादा सखी मंडलों से 30 लाख से ज़्यादा महिलाएं जुड़ी हुई हैं। इन ग्रुप्स के ज़रिए महिलाएं घर से चलने वाले उद्योगों, हैंडीक्राफ्ट्स, खाने-पीने की चीज़ों और दूसरी बिज़नेस एक्टिविटीज़ में शामिल हो रही हैं।
 

अगर महिलाओं को सही मार्केट, ट्रेनिंग, फाइनेंशियल मदद और बिक्री के लिए एक स्ट्रक्चर मिले, तो वे अपनी इनकम बढ़ा सकती हैं और परिवार की आर्थिक हालत में मदद कर सकती हैं। महिलाओं को मज़बूत बनाने के साथ-साथ सामाजिक रूप से पिछड़े तबकों को मदद देने के हिस्से के तौर पर, राजकोट ज़िले की घुमंतू-मुक्त जातियों के 139 परिवारों को रहने के मकसद से मुफ़्त प्लॉट देने की भी पहल की गई है।

यह कदम परिवारों को घर की सुविधा देने के मकसद से उठाया गया है। गुजरात सरकार की इन कोशिशों का मुख्य मकसद सखी मंडल से जुड़ी महिलाओं को आर्थिक गतिविधियों में ज़्यादा मौके देना है। ग्राम हाट, अमूल पार्लर, स्किल डेवलपमेंट और मार्केट लिंकेज के ज़रिए महिलाओं की इनकम बढ़ाने और उन्हें सेल्फ-एम्प्लॉयमेंट की ओर ले जाने की कोशिश की जा रही है।

यूपी इंटरनेशनल ट्रेड शो: 5 एकड़ के पॉलीहाउस से ₹29 लाख की कमाई! जानिए मेरठ के किसान रवींद्र की कामयाबी की कहानी

इंडिया एक्सपो मार्ट में इस समय उत्तर प्रदेश इंटरनेशनल ट्रेड शो चल रहा है। इस ट्रेड शो में मेरठ के किसान किसान रवींद्र कुमार चर्चा में हैं। रवींद्र का खेती और उससे जुड़े नए कारोबारी प्रयोग लोगों को काफी पसंद आ रहा हैं। ट्रेड शो में पॉलीहाउस तकनीक से तैयार की गई ताजी सब्जियां, रंग-बिरंगे फूल और शहद खास तौर पर लोगों को आकर्षित कर रहे हैं। इन उत्पादों को देखने और खरीदने में देश-विदेश से आए कारोबारी और दर्शक भी दिलचस्पी दिखा रहे हैं। ट्रेड शो में किसानों की आधुनिक खेती और उससे होने वाले कारोबार को भी दिखाया गया है। आइए जानते हैं क्या है रवींद्र की कहानी

बयान के मुताबिक, इंडिया एक्सपो मार्ट में हॉर्टिकल्चर डिपार्टमेंट के आउटलेट पर मेरठ के किसान और एग्री-एंटरप्रेन्योर अपने अलग-अलग कृषि उत्पादों को प्रदर्शित कर रहे हैं। इनमें जरबेरा और गुलाब के फूल, कमल का तना, शिमला मिर्च, बैंगन और शहद जैसे उत्पाद शामिल हैं।

शिमला मिर्च की करते हैं खेती

मेरठ के सरधना क्षेत्र के खेड़ा गांव के किसान रवींद्र कुमार ने बागवानी विभाग की योजनाओं का लाभ उठाकर आधुनिक खेती की ओर कदम बढ़ाया है। उन्होंने करीब पांच एकड़ जमीन में पॉलीहाउस लगाकर खेती शुरू की। रवींद्र कुमार अपने पॉलीहाउस में अलग-अलग रंगों की शिमला मिर्च उगा रहे हैं, जिनका वजन करीब 300 से 400 ग्राम तक होता है। उनकी पीली, हरी और लाल शिमला मिर्च की दिल्ली की आजादपुर मंडी में अच्छी मांग है। रवींद्र कुमार के मुताबिक, इस खेती से उनका सालाना कारोबार 29 लाख रुपये से अधिक तक पहुंच गया है।

बढ़ गई फूलों की मांग

कुमार इससे पहले भी ट्रेड शो में हिस्सा ले चुके हैं और उनका मुताबिक कि ऐसे आयोजनों से उनके उत्पादों को नए खरीदार मिले और बाजार में उनकी पहचान बढ़ी। इस साल रवींद्र कुमार के जरबेरा और गुलाब के फूलों की मांग बढ़ी है। कई इवेंट मैनेजमेंट कंपनियां फूल खरीदने के लिए उनसे संपर्क कर रही हैं, वहीं कुछ कंपनियों के साथ कारोबार को लेकर समझौता करने की बातचीत भी चल रही है। कुमार के मुताबिक, सरकारी योजनाओं की मदद से किसानों को खेती के नए तरीके अपनाने और बाजार की जरूरत के हिसाब से फसल तैयार करने का मौका मिल रहा है, जिससे उनकी आमदनी बढ़ाने में मदद मिल रही है।

शहद भी बना आकर्षण का केंद्र

उत्तर प्रदेश के बागवानी राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार दिनेश प्रताप सिंह ने ट्रेड शो में विभाग के स्टॉल का दौरा कर किसानों के उत्पादों की जानकारी ली और उनका उत्साह बढ़ाया। वहीं, मेरठ की रैंट्रोव नेचुरल कंपनी का शहद भी लोगों के बीच आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। कंपनी चलाने वाले युवा भाई-बहन राखी अघेरा और भरत अघेरा ने बताया कि पिछले साल उनकी कंपनी को इंडोनेशिया, मलेशिया और वियतनाम से कुल 46 टन शहद का ऑर्डर मिला था।

Viral Post: ‘पिज्जा शॉप में करता था काम….आज खुद के हैं 3 आउटलेट’, सोशल मीडिया पर वायरल हो रही भारत से ऑस्ट्रेलिया गए युवक की कहानी

ऑस्ट्रेलिया में एक भारतीय शख्स की मेहनत और सफलता की कहानी सोशल मीडिया पर चर्चा में है। शख्स ने 11 सालों तक मेहनत करके धीरे-धीरे ऑस्ट्रेलिया में अपना खुद का कारोबार खड़ा कर लिया। करीब 11 साल पहले वह शख्स आगे की पढ़ाई के लिए ऑस्ट्रेलिया गया था। पढ़ाई पूरी करने के बाद उसे अपने क्षेत्र में नौकरी पाने में काफी परेशानी हुई। इसके बाद उसने एक पिज्जा शॉप में फुल-टाइम काम शुरू कर दिया। यहां पर वह ग्राहकों के लिए पिज्जा तैयार करने और उनकी डिलीवरी करने का काम करता था। उनकी इस पूरी यात्रा के बारे में उनके साले और एंटरप्रेन्योर विनीत के ने X पर पोस्ट शेयर कर जानकारी दी। सोशल मीडिया पर ये कहानी तेजी से वायरल हो रही है।

पिज्जा शॉप की खोली तीन आउटलेट

अपनी जर्नी की शुरुआत में उनको कई मुश्किलों के बावजूद उसने हार नहीं मानी। करीब तीन साल तक पिज्जा शॉप में काम करने के बाद उसने पार्टनर के साथ मिलकर अपना पैसा लगाया और एक पिज्जा फ्रेंचाइजी खरीद ली। यहीं से उसकी नौकरी की जिंदगी धीरे-धीरे अपने कारोबार में बदलने लगी और उसने बिजनेस की दिशा में कदम बढ़ाया। समय के साथ उसका कारोबार लगातार बढ़ता गया और उसने दो और पिज्जा फ्रेंचाइजी खरीद लीं, जिससे उसके कुल तीन आउटलेट हो गए।

कोरोना में वह भारत आए

इसी दौरान उसकी निजी जिंदगी में भी कई बदलाव आए। कोरोना महामारी के समय वह भारत आया, जहां उसकी शादी हुई और बाद में वह अपनी पत्नी को ऑस्ट्रेलिया ले गया। कुछ समय बाद उनके दो बच्चे भी हुए। बताया जाता है कि आगे चलकर उसने ऑस्ट्रेलिया में अपना घर और एक BMW कार भी खरीदी। पोस्ट के अनुसार, शख्स ने हैदराबाद में अपना घर बनवाया और अपने माता-पिता को भी ऑस्ट्रेलिया बुला लिया। उनकी जिंदगी में एक और बड़ी उपलब्धि तब जुड़ी, जब उन्हें और उनके परिवार को ऑस्ट्रेलिया की नागरिकता मिल गई। उनके साले विनीत ने बताया कि पिज्जा डिलीवरी से शुरू हुआ उनका सफर आज एक सफल कारोबारी जिंदगी तक पहुंच चुका है।

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लोगों ने किया कमेंट

इस पोस्ट पर कई लोगों ने रिएक्शन दिया है। एक यूजर ने ऑस्ट्रेलिया में उसकी नौकरी को लेकर सवाल उठाते हुए लिखा, “स्टूडेंट वीजा पर पढ़ाई पूरी करने के बाद ऑस्ट्रेलिया में पिज्जा शॉप में फुल टाइम नौकरी कैसे मिली, जबकि उसकी पढ़ाई का इस काम से कोई संबंध नहीं था? इसमें कुछ तो गलत लगता है।” वहीं, एक और यूजर ने कहा, “अगर वह अब ऑस्ट्रेलिया का नागरिक है और वहीं स्थायी रूप से रह रहा है, तो उसे भारत में घर की जरूरत क्यों है? और ‘एक्सटेंडेड ब्रदर-इन-लॉ’ का मतलब क्या होता है?”

एक और यूजर ने कहा, “ऐसी कहानियां भारत में काम कर रहे युवाओं के लिए उम्मीद बढ़ाती हैं। खासकर पंजाब जैसे राज्यों में, जहां बर्गर किंग का एक कर्मचारी दिन में 9 घंटे काम करता है। उसे पता है कि कनाडा में इतने ही 9 घंटे काम करने पर उसे कम से कम 5 गुना ज्यादा कमाई हो सकती है।”

डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट सोशल मीडिया पर यूज़र द्वारा शेयर किए गए कंटेंट पर आधारित है। मनीकंट्रोल इन दावों की न तो स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है और न ही इनका समर्थन करता है।

बिजनेस का B भी नहीं आता है फिर भी 36 साल की महिला ने एक लाख रुपये से खड़ी कर दी कंपनी, अब महीने की कमाई ₹35 लाख!

8 साल की IPS सेवा के बाद कॉर्पोरेट की दुनिया में कदम, राजन सिंह ने ऐसे रची सफलता की नई कहानी!

एक नौकरी से शुरू हुआ सफर, जिसने राजन सिंह को पहुंचाया अलग-अलग करियर तक

राजन सिंह का करियर किसी एक तय रास्ते पर नहीं चला। IIT कानपुर से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग करने के बाद उन्होंने सिविल सर्विस का रास्ता चुना और IPS में शामिल हुए। करीब आठ साल पुलिस सेवा में रहने के बाद उन्होंने MBA के लिए अमेरिका का रुख किया। इसके बाद कंसल्टिंग, प्राइवेट इक्विटी और फिर अपना बिजनेस शुरू करने तक उनका सफर पहुंचा। इस दौरान उन्होंने कई बार अपना करियर बदला और हर नए पड़ाव पर एक अलग तरह का अनुभव हासिल किया।

IIT के बाद चुनी पुलिस की राह

इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद राजन सिंह ने सामान्य इंजीनियरिंग करियर में जाने के बजाय सिविल सेवा परीक्षा दी। सितंबर 1997 में उन्होंने IPS जॉइन किया और केरल के करुणागप्पल्ली में ASP के तौर पर पहली पोस्टिंग मिली। कुछ ही सालों में उनकी जिम्मेदारियां बढ़ीं और 2001 तक वह तिरुवनंतपुरम के पुलिस कमिश्नर बन गए। उस समय वह इस पद पर पहुंचने वाले कम उम्र के अधिकारियों में शामिल थे।

पुलिस सेवा छोड़कर पहुंचे Wharton

2004 में पुलिस कमिश्नर रहते हुए उनके करियर ने एक नया मोड़ लिया। एक पुलिस ऑपरेशन के दौरान उन्हें अपने साथी IPS अधिकारी के Wharton MBA में एडमिशन की जानकारी मिली। इस घटना ने उन्हें अपने आगे के करियर के बारे में सोचने पर मजबूर किया। करीब आठ साल पुलिस सेवा में बिताने के बाद उन्होंने जुलाई 2005 में IPS छोड़ दिया और Wharton के MBA प्रोग्राम में दाखिला लिया। 2007 में MBA पूरा करने के बाद उन्होंने न्यूयॉर्क में McKinsey & Company के साथ कंसल्टेंट के तौर पर काम शुरू किया।

कंसल्टिंग के बाद इन्वेस्टमेंट की दुनिया

McKinsey में काम करते हुए राजन ने इंश्योरेंस, फार्मा, बायोटेक्नोलॉजी और बैंकिंग जैसे अलग-अलग सेक्टर की कंपनियों के साथ काम किया। इसके बाद उन्होंने प्राइवेट इक्विटी फर्म New Silk Route का रुख किया। यहां उन्हें कंपनियों और कारोबार को एक इन्वेस्टर की नजर से समझने का मौका मिला। इसी दौरान उन्होंने यह भी करीब से देखा कि कोई व्यक्ति सुरक्षित प्रोफेशनल करियर चुनने के बजाय अपना नया बिजनेस शुरू करने का जोखिम क्यों लेता है।

पहला स्टार्टअप नहीं चला, फिर भी नहीं रुके

2012 में राजन ने Course Brew नाम से ऑनलाइन लर्निंग प्लेटफॉर्म शुरू किया। यह उनका एंटरप्रेन्योर के तौर पर शुरुआती बड़ा प्रयोग था, लेकिन यह बिजनेस ज्यादा समय तक नहीं चल पाया। इसके बाद उन्होंने दोबारा कोशिश की और ConceptOwl शुरू किया। इसका मकसद छोटे शहरों के छात्रों को अच्छी साइंस और मैथ्स की पढ़ाई उनके अपने शहरों के करीब उपलब्ध कराना था। कंपनी ने ऑनलाइन पढ़ाई के साथ क्लासरूम प्रोग्राम पर भी काम किया। एक समय शिक्षकों की कमी हुई तो राजन ने खुद फिजिक्स पढ़ाना शुरू कर दिया। कंपनी ने आगे चलकर निवेश भी जुटाया और एजुकेशन सेक्टर में अपना मॉडल आगे बढ़ाया।

ConceptOwl से HabitStrong तक पहुंचा सफर

कोरोना महामारी के दौरान राजन और उनकी टीम ने रूटीन, आदतों और प्रोडक्टिविटी से जुड़े कार्यक्रमों पर काम करना शुरू किया। इसी प्रयोग से HabitStrong का आइडिया सामने आया। शुरुआत सुबह जल्दी उठने वाले एक साधारण YouTube प्रोग्राम से हुई, जिसे करीब 100 दिनों तक आजमाया गया। लोगों से मिले अनुभवों के बाद इसे एक स्ट्रक्चर्ड प्रोग्राम का रूप दिया गया। 2020 में शुरू हुए HabitStrong का फोकस बेहतर रूटीन बनाने, कंसंट्रेशन बढ़ाने और डिजिटल डिस्ट्रक्शन कम करने जैसी चीजों पर रहा। इस तरह उनका सफर शिक्षा से आगे बढ़कर हैबिट्स और प्रोडक्टिविटी के क्षेत्र तक पहुंच गया।

राजन सिंह की कहानी की खास बात सिर्फ यह नहीं है कि उन्होंने कई अलग-अलग क्षेत्रों में काम किया, बल्कि यह है कि हर बदलाव के बाद उन्होंने खुद को नए काम के लिए तैयार किया। इंजीनियरिंग से पुलिस सेवा, फिर MBA, कंसल्टिंग, निवेश और आखिर में स्टार्टअप तक का यह सफर दिखाता है कि करियर हमेशा एक ही दिशा में आगे बढ़े, यह जरूरी नहीं। कई बार अलग-अलग अनुभव मिलकर आगे के काम के लिए नई सोच और नए मौके तैयार करते हैं।

Bhuvan Bam: अभी तो तेरा करियर शुरू हुआ है…., समय रैना के शो पर रेखा-अमिताभ बच्चन के जोक करने पर मुकेश छाबड़ा ने भुवन को लताड़ा

Bhuvan Bam: ‘इंडियाज गॉट लेटेंट 2’ के हालिया एपिसोड में मुकेश छाबड़ा, भुवन बाम और नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी पैनल में समय रैना के साथ शामिल हुए। एपिसोड के दौरान कास्टिंग डायरेक्टर छाबड़ा ने भुवन को तब चेतावनी दी जब उन्होंने बॉलीवुड सुपरस्टार अमिताभ बच्चन और रेखा के साथ उनके रोमांस की अफवाहों पर मजाक करने की कोशिश की।

यह सब तब शुरू हुआ जब प्रतीक भारद्वाज नाम के एक कंटेस्टेंट ने स्टेज पर बिग बी की मिमिक्री की। उनकी एक्टिंग स्किल्स से प्रभावित होकर भुवन ने पूछा, “आपके टैलेंट की कोई रेखा है?” उनका इशारा एक्ट्रेस रेखा की ओर था। हालांकि इस बात पर सभी जोर-जोर से चीयर करने लगे, लेकिन मुकेश छाबड़ा ने तुरंत भुवन पर आपत्ति जताई और उन्हें चेतावनी देते हुए कहा, “बेटा, तेरा अभी तो फिल्म करियर शुरू हुआ है मेरी जान।” इस पर कंटेंट क्रिएटर-एक्टर ने भी कहा, “मैं इंडिपेंडेंट भी ठीक हूं।”

अमिताभ बच्चन और रेखा का रोमांस

अमिताभ बच्चन और रेखा ने 1976 और 1981 के बीच नौ बड़ी फिल्मों में साथ काम किया, जिनमें ‘सिलसिला’ और ‘मुकद्दर का सिकंदर’ शामिल हैं। दोनों स्क्रीन पर सबसे मशहूर जोड़ियों में से एक बन गए। जब रेखा 2001 में सिमी गरेवाल के शो ‘रेंडेजवस’ में आईं तो उनसे सीधे पूछा गया कि क्या उन्हें कभी अमिताभ बच्चन से प्यार हुआ था। हालांकि उस समय रेखा ने इस सवाल को “बेवकूफी भरा” बताया और घुमा-फिराकर जवाब देते हुए कहा कि देश में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो बिग बी से प्यार न करता हो।

रेखा ने कहा था कि “बिल्कुल। अरे यह तो बेवकूफी भरा सवाल है। मुझे अभी तक ऐसा कोई भी आदमी, औरत या बच्चा नहीं मिला है जो उनसे पूरी तरह, जुनून के साथ, पागलपन की हद तक, बेतहाशा और शिद्दत से प्यार न करने से खुद को रोक सके। तो मुझे ही क्यों अलग किया जाए? मैं किस बात से इनकार करूं? मुझे उनसे प्यार नहीं है? बेशक है। दुनिया भर का प्यार ले लीजिए और उसमें थोड़ा और जोड़ लीजिए – मैं उस व्यक्ति के लिए ऐसा ही महसूस करती हूं। बस यही बात है,।

बता दें कि अमिताभ बच्चन की शादी जया बच्चन से हुई है। वे पहली बार ऋषिकेश मुखर्जी की 1971 की फिल्म ‘गुड्डी’ के सेट पर मिले थे। दोनों ने 3 जून 1973 को शादी की थी और उनका रिश्ता आज भी मजबूत है। अमिताभ बच्चन और जया बच्चन, एंटरप्रेन्योर और लेखिका श्वेता बच्चन और एक्टर अभिषेक बच्चन के माता-पिता हैं। अगस्त्य नंदा, नव्या नंदा और आराध्या बच्चन उनके पोता-पोती हैं।

भारत की सड़कों पर मर्दानगी से जूझती महिलाएं

भारत की सड़कों पर मर्दानगी से जूझती महिलाएं

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साहिबा खान

अगर आप एक पुरुष हैं और मोटरसाइकिल चलाते हैं तो मुमकिन है कि जब आप घर से बाहर निकलते होंगे तो जेहन में सिर्फ काम या बाहर जाने की वजह, हेलमेट, वॉलेट और घर की चाबी साथ होती होगी। आप एक निक्कर या हाफ पेंट पहन सकते हैं। सुकून भरा मौसम हो तो बिना बांह की शर्ट या टी शर्ट पहन सकते हैं। लेकिन अगर आप दोपहिया पर सफर करने वाली एक महिला हैं तो आपको कपड़ों से लेकर कई किस्म के अदृश्य भयों के बारे में भी सोचना पड़ता है। ALSO READ: भारत सस्ते पैकेटबंद खाने पर इतना निर्भर कैसे हुआ

 

भारत के जम्मू शहर की सोनाली डब चंडीगढ़ में एक ग्राफिक डिजाइनर और इलस्ट्रेटर के तौर पर काम करती हैं। उन्हें अपनी मोटरसाइकिल से देश को जानना पंसद है। डीडब्ल्यू से बात करते हुए उन्होंने बताया, “निकलने से पहले मैं किसी परिजन को अपनी लोकेशन भेजती हूं, उनसे अपना रूट साझा करती हूं और यह सुनिश्चित करती हूं कि रात में भी वह जगह आने जाने के लिए सुरक्षित है या नहीं।”

 

इतनी तैयारी के बावजूद कई महिलाओं को खासकर भारत की सड़कों पर अभद्र भाषा, आक्रामक ओवरटेक करने और यौन हिंसा व उत्पीड़न जैसे खतरनाक व्यवहार का सामना करना पड़ता है।

 

हाल ही में राजधानी नई दिल्ली से सटे गुरुग्राम की एक घटना सामने आई, जहां एक महिला राइडर को एक कार ड्राइवर ने ओवरटेक करके ऐसी टक्कर मारी कि वे मोटरसाइकिल से ही गिर गईं और भीड़ भाड़ से भरे ट्रैकिफ के बीच बाल बाल बचीं। इस घटना का वीडियो भी वायरल हुआ।

 

इस घटना में एक तरफ सड़क पर गुस्सा, आक्रामक ड्राइविंग और ट्रैफिक उल्लंघनों का मुद्दा है और दूसरी तरफ महिलाओं का सार्वजनिक स्थानों पर उत्पीड़न, असुरक्षा और उनकी आवाजाही का सवाल है। क्या सड़कें, रुतबा, मर्दानगी और हैसियत दिखाने का मैदान बन गई हैं? ALSO READ: कैसा है 2027 यूपी चुनाव से पहले अखिलेश यादव का ‘नीला दांव’

 

सड़क पर गुस्सा केवल पुरुषों की समस्या नहीं है

इंटरनेशनल जर्नल और सोशल साइकेट्री ने ‘रोड रेज’ नाम का अध्ययन पब्लिश किया है। 2013 के इस शोध में शोधकर्ताओं ने पाया कि दिल्ली में हॉर्न बजाना, गलत दिशा से ओवरटेक करना, तेज संगीत बजाना ड्राइविंग से जुड़े गुस्से को बढ़ाने वाले कारकों में शामिल था। दिल्ली के 200 वाहन चालकों पर किए गए इस अध्ययन में गर्म और उमस भरे मौसम के साथ ही इन कारणों को अहमियत दी गई। ज्यादा गुस्सा महसूस करने वाले ड्राइवरों में आक्रामक तरीके से ओवरटेक करने, गाली देने, चिल्लाने, दूसरे ड्राइवरों को रास्ता न देने और यहां तक कि दूसरे वाहन चालकों से लड़ने या उन्हें टक्कर मारने जैसा व्यवहार ज्यादा दिखाई पड़ा।

 

हालांकि, पुरुषों को स्वाभाविक रूप से ज्यादा आक्रामक ड्राइवर मान लेना शोध से पूरी तरह साबित नहीं हुआ। भारत में रोड रेज पर प्रवीण जैन और उनके सहयोगियों ने भी 2022 में एक शोध किया। 282 प्रतिभागियों पर आधारित यह शोध यूरोपियन साइकेट्री में भी प्रकाशित हुआ। इसके शोधकर्ताओं को पुरुषों और महिलाओं के रोड रेज स्कोर में कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं मिला। इसके बजाय कम उम्र के प्रतिभागियों में ड्राइविंग के दौरान गुस्से का स्तर अधिक पाया गया।

 

लेकिन इससे एक दूसरा सवाल खत्म नहीं होता। अगर भारत की सड़कों पर गुस्सा इतना आम हो चुका है तो क्या उसका इजहार महिलाओं के खिलाफ अलग तरीके से किया जाता है?

 

सड़क किसकी? 

कल्पना विश्वनाथ भारत में एक सोशल एंटरप्रेन्योर हैं और ‘सेफ्टीपिन’ नाम की ऐप की को-फाउंडर और सीईओ हैं। सेफ्टीपिन शहरों के सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा का आकलन करता है जैसे रोशनी, दृश्यता, सार्वजनिक परिवहन, सुरक्षा और पैदल चलने की सुविधाएं। यह आकलन डाटा के आधार पर किया जाता है। विश्वनाथ को जेंडर-समावेशी शहरीकरण पर अच्छी पकड़ हासिल है। डीडब्ल्यू से बात करते हुए उन्होंने बताया “सड़क पुरुषों के लिए उनका अपना मैदान होता है जहां वो शोहरत, गाड़ी और रफ्तार की नुमाइश करते हैं। अब उसमें एक दोपहिया सवार महिला उनकी पितृसत्ता पर चोट करती है। वो सोचते हैं कि एक महिला कैसे इस रफ्तार से मोटरसाइकिल चला कर निकली?” विश्वनाथ कहती हैं कि यह गुस्सा, महिलाओं को उनकी जगह बताने पर आमादा हो जाता है।

 

प्रियंका ठाकुर कुल्लू से हैं और चंडीगढ़ में पत्रकारिता करती हैं। वे भी सोनाली की तरह ही मोटरसाइकिल चलाती हैं। उन्होंने बताया कि एक बार उन्हें भी एक ऐसे व्यक्ति का सामना करना पड़ा जो उनकी मोटरसाइकिल स्टार्ट ना होने पर हॉर्न पर हॉर्न मारता रहा ताकि वो डर जाएं। उनका कहना है कि उनकी मोटरबाइक अचानक रुक गई थी क्योंकि वह व्यक्ति बहुत करीब आ गया था और उन्हें अचानक ब्रेक लगाने पड़े थे। ऐसी कई घटनाएं कई महिलाओं के साथ सड़कों पर हर रोज होती हैं।

 

सार्वजनिक जगह में महिलाओं की मौजूदगी

दिल्ली में युवा महिलाओं के अनुभवों पर 2014 में प्रकाशित एक अध्ययन में 18 से 30 वर्ष की 20 महिलाओं का इंटरव्यू किया गया। महिलाओं ने सड़क पर होने वाले उत्पीड़न के अलग-अलग रूपों और उसके कारण अपने जीवन में लगने वाली बंदिशों के बारे में बताया। अध्ययन में महिलाओं ने उत्पीड़न को महिलाओं के प्रति सामाजिक रवैये और कानूनों के कमजोर क्रियान्वयन से भी जोड़ा।

 

इससे यह समझने में मदद मिलती है कि सड़क पर किसी महिला का अनुभव सिर्फ यह नहीं है कि वह कितने सुरक्षित तरीके से वाहन चला रही है। उसके भीतर यह बेचैनी भी रहती है कि दूसरे लोग उसके साथ कैसा व्यवहार कर सकते हैं।

 

भूगोल और जनसांख्यिकी का असर

शहरीकरण के संदर्भ में कल्पना विश्वनाथ बताती हैं कि जिस रोड पर गुरुग्राम हादसा हुआ, वह सिर्फ तेज चलने वाली गाड़ियों के लिए ही बनी है। उसके इर्द गिर्द न ज्यादा खाने पीने की जगहें हैं, और सभी ट्रैफिक लाइट्स भी हटा दी गई हैं। उन्होंने मानना है कि यह इलाका उत्तरी भारत के हरियाणा राज्य में आता है, जहां ज्यादातर पुरुष पितृसत्ता और सामंती मानसिकता से आते हैं। उन्होंने आगे कहा, “इन जगहों पर इमारतें तो बन गईं लेकिन शहरीकरण के साथ चलने वाले मानदंडों को ठीक से व्यक्तिगत व्यवहार में नहीं अपनाया जा सका है।”

 

उत्तर भारत, खासकर दिल्ली और आसपास के शहरों में, सड़क पर होने वाली रोड रेज और महिलाओं की सार्वजनिक जगहों पर सुरक्षा को लेकर काफी चर्चा और शोध हुए हैं। लेकिन सिर्फ दर्ज किए गए मामलों की संख्या अधिक होने के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि उत्तर भारत में रोड रेज या महिलाओं के खिलाफ सड़क पर होने वाली लैंगिक हिंसा देश के दक्षिणी हिस्से से अलग है। अब तक ऐसा कोई भी अध्ययन सामने नहीं आया है जो क्षेत्रीय व्यवहार से जुड़े आंकड़े सटीकता से सामने रख सके। ALSO READ: क्या वाकई रोकी जा सकती है एआई के विकास की रफ्तार?

 

सड़कें हैं या मर्दानगी का मंच

यहीं पर शहरी नियोजन और जेंडर के बीच का संबंध महत्वपूर्ण हो जाता है। सड़क पर वाहन चलाना सिर्फ तकनीकी काम नहीं है। ड्राइविंग, सड़क इस्तेमाल कर रहे बाकी लोगों के साथ एक तरह का सामंजस्य भी है। इसे प्रतिस्पर्धा या किसी किस्म की रेस बना लेना, दूसरों को हॉर्न बजा बजाकर बाध्य करना, पदयात्रियों को कुछ ना समझना या फिर सब्र और संयम के साथ दूसरों का सम्मान करते हुए सही मौके का इंतजार करना, इस पूरी प्रक्रिया में एक तरह की सामाजिक बातचीत जैसे हैं।

 

दिल्ली में सार्वजनिक जगहों पर यौन उत्पीड़न के हॉटस्पॉट को मैप करने वाले 2026 के एक अध्ययन ने भी यह दिखाया कि पर्यावरण और जगह की विशेषताएं रोड रेज के पैटर्न को समझने में महत्वपूर्ण हो सकती हैं। और शायद यही वह जगह है जहां सड़क का सवाल शहरी नियोजन और जेंडर के सवाल में बदल जाता है।

यूपी का मतलब अल्टीमेट पोटेंशियल, टेक्सटाइल सेक्टर बनेगा नई औद्योगिक ताकत : CM योगी

यूपी का मतलब अल्टीमेट पोटेंशियल, टेक्सटाइल सेक्टर बनेगा नई औद्योगिक ताकत : CM योगी

UP Textiles Conclave 2026

UP Textiles Conclave 2026: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि यूपी का मतलब अप यानी ‘अल्टीमेट पोटेंशियल’ है। उत्तर प्रदेश के पास विरासत, हुनर, मानव संसाधन, उद्योग, उद्यमिता और देश का सबसे बड़ा बाजार है। दुनिया की सबसे युवा वर्कफोर्स भी हमारे पास है। अब इसी ताकत के सहारे उत्तर प्रदेश को ग्लोबल टेक्सटाइल हब बनाना है। हमारा लक्ष्य फाइबर से यार्न, यार्न से फैब्रिक, फैब्रिक से गारमेंट और गारमेंट से ब्रांड होते हुए ग्लोबल मार्केट तक पूरी वैल्यू चेन प्रदेश में विकसित करने का है।

 

मुख्यमंत्री योगी मंगलवार को दो दिवसीय यूपी टेक्सटाइल्स कॉन्क्लेव-2026 के उद्घाटन समारोह को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने यूपी टेक मित्र पोर्टल लॉन्च करने के साथ हथकरघा बुनकर समृद्धि योजना का शुभारंभ किया। कार्यक्रम में टेक्सटाइल सेक्टर में 5,196 करोड़ रुपये के नए निवेश प्रस्तावों के एमओयू किए गए। साथ ही 163 करोड़ रुपये के लेटर ऑफ कम्फर्ट और 60 करोड़ रुपये की सब्सिडी का वितरण किया गया। मुख्यमंत्री ने देशभर से आए टेक्सटाइल सेक्टर के प्रतिष्ठित उद्यमियों, निवेशकों, निर्यातकों, प्रदेश के परंपरागत बुनकरों, हथकरघा संचालकों और इस क्षेत्र में भविष्य तलाश रहे युवाओं का स्वागत और अभिनंदन किया।

फैब्रिक सेक्टर में यूपी चौथा सबसे बड़ा निर्यातक राज्य

मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि उत्तर प्रदेश की टेक्सटाइल पहचान हजारों वर्षों पुरानी है। वैदिक साहित्य से लेकर रामायण और महाभारत तक में काशी के रेशमी वस्त्रों का उल्लेख मिलता है। वाराणसी की सिल्क साड़ी, भदोही का कारपेट, लखनऊ की चिकनकारी, बरेली की जरी, कानपुर का टेक्सटाइल इकोसिस्टम और मेरठ में टेक्निकल टेक्सटाइल की संभावनाएं प्रदेश की विरासत और औद्योगिक क्षमता का प्रमाण हैं।

 

प्रदेश में दो लाख हैंडलूम और पांच लाख से अधिक पावरलूम बुनकर इस सेक्टर की असली ताकत हैं। कृषि के बाद सर्वाधिक रोजगार का सृजन वस्त्र उद्योग करता है। उत्तर प्रदेश फैब्रिक मैन्युफैक्चरिंग में देश में तीसरे स्थान पर है और कुल फैब्रिक उत्पादन में उसकी हिस्सेदारी 13 से 14 प्रतिशत है। पिछले छह वर्षों में प्रदेश के वस्त्र, परिधान और हस्तशिल्प निर्यात में करीब 56 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यूपी इस सेक्टर में देश का चौथा सबसे बड़ा निर्यातक राज्य बन गया है। वर्ष 2025-26 में 21 हजार करोड़ रुपये से अधिक के निर्यात के साथ गौतमबुद्ध नगर देश के प्रमुख निर्यातक जिलों में दूसरे स्थान पर पहुंचा है।

यूपी के 17 टेक्सटाइल उत्पादों को जीआई टैग

मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने 2030 तक 350 बिलियन अमेरिकी डॉलर की टेक्सटाइल एवं अपैरल इकोनॉमी और 100 बिलियन डॉलर के निर्यात का लक्ष्य रखा है। इस राष्ट्रीय संकल्प में उत्तर प्रदेश अपनी पूरी क्षमता से भागीदारी करेगा। ओडीओपी के माध्यम से प्रदेश के 35 से अधिक जिलों के वस्त्र और हैंडलूम उत्पादों को नई पहचान मिली है। प्रदेश के 17 टेक्सटाइल उत्पादों को जीआई टैग मिल चुका है। स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से लाखों महिलाएं भी इस सेक्टर से जुड़कर आत्मनिर्भर हो रही हैं। दुनिया की सबसे युवा वर्कफोर्स प्रदेश में उपलब्ध है, जो टेक्सटाइल सेक्टर को नई ऊंचाइयों तक ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

2017 से पहले वसूली की पर्ची लेकर लौट जाते थे निवेशक

मुख्यमंत्री ने पिछली सरकारों पर हमला करते हुए कहा कि 2017 से पहले प्रदेश की पहचान ‘वन डिस्ट्रिक्ट-वन माफिया’ की बन गई थी। हर जनपद में माफिया की समानांतर सरकार चलती थी। कानून व्यवस्था चौपट थी। माफिया जहां हाथ रख देता, वह जमीन उसकी हो जाती और तत्कालीन सरकार मौन बनी रहती थी। निवेशक व्यापार का सपना लेकर आता था और वसूली की पर्ची लेकर लौट जाता था। दंगे, कर्फ्यू, गुंडा टैक्स और माफिया के कारण उद्योग लगाना मुश्किल था। बिजली और विकास एक परिवार तक सीमित था। आज यूपी कर्फ्यू, दंगा, माफिया और उपद्रव से मुक्त है। अब किसी ने बेटी, व्यापारी या निवेशक की सुरक्षा में सेंध लगाने का दुस्साहस किया तो उसके लिए दो ही जगह होंगी- जेल या जहन्नुम। अब कोई यूपी में खुलेआम पिस्टल लहरा कर नहीं चल सकता।

यूपी का नाम सुनकर दूरी बना लेते थे लोग

सीएम ने कहा कि 2017 से पहले प्रदेश के नागरिकों के सामने पहचान का संकट पैदा हो गया था। यूपी का नाम सुनकर प्रदेश के बाहर लोग यहां के नागरिकों को किराये पर मकान देने और होटल में कमरा देने तक से कतराते थे। किसी समाज और नागरिक के लिए इससे बड़ी त्रासदी क्या हो सकती है। यूपी का परिचय देने पर व्यक्ति को कई बार सामाजिक रूप से दूरी का सामना करना पड़ता था। यहां कोई पर्व और त्योहार शांतिपूर्ण तरीके से नहीं गुजरता था। उत्सव से पहले ही उपद्रव शुरू हो जाता था। पूरे प्रदेश में लोग दंगों की आग में झुलसते थे। बरेली, मथुरा के कोसीकलां, मुजफ्फरनगर और सहारनपुर जैसे स्थानों पर बड़े दंगे हुए। व्यापक पैमाने पर पलायन हुआ और महीनों तक कर्फ्यू लगा रहा।

अराजकता का शिकार बनीं कानपुर की ऐतिहासिक कपड़ा मिलें

मुख्यमंत्री ने कहा कि कानपुर की ऐतिहासिक कपड़ा मिलें भी इसी अराजक व्यवस्था की शिकार बनीं। मगहर की कताई मिल 1977 में बनी और 1997 में बंद हो गई। बुनकरों और छोटे टेक्सटाइल उद्यमियों को बैंक से ऋण मिलने में भी कठिनाई होती थी। डीबीटी की व्यवस्था के अभाव में सरकारी योजनाओं का लाभ न तो नागरिकों तक पहुंचता था और न ही उद्यमियों तक। 2017 के बाद उत्तर प्रदेश में बड़ा बदलाव आया है। अब यहां कानून का राज है।

यूपी के पास हैं 36 सेक्टोरल पॉलिसी

सीएम ने कहा कि कानून व्यवस्था में बदलाव और निवेश अनुकूल नीतियों का परिणाम है कि आज प्रदेश के पास 36 सेक्टोरल पॉलिसी हैं। देश के 55 प्रतिशत मोबाइल और 60 प्रतिशत इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट का उत्पादन यूपी में हो रहा है। यूपी डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर के 6 स्ट्रेटेजिक नोड में 35 हजार करोड़ रुपये से अधिक के निवेश प्रस्ताव मिले हैं। प्रदेश में एमएसएमई के 12 प्लेज पार्क भी तैयार हो रहे हैं।

 

पिछले 9 वर्ष में यूपी पर कैपिटा इनकम तीन गुना करने और वूमेन वर्कफोर्स की भागीदारी भी तीन गुना बढ़ाने में सफल रहा है। यूपी पिछले 6 वर्षों से रेवेन्यू सरप्लस स्टेट है। यह निवेशकों का भरोसा है कि हमें पिछले 9 वर्षों में 50 लाख करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए, जिसमें 15 लाख करोड़ रुपये के प्रस्ताव धरातल पर उतर चुके हैं। 65 लाख से अधिक युवाओं को रोजगार दिलाने में सफलता मिली है। हमने हर एमएसएमई को 5 लाख रुपये की सोशल सिक्योरिटी गारंटी दी है। आज यूपी में सर्वाधिक 96 लाख एमएसएमई यूनिट हैं।

नोएडा बन रहा है अपैरल सिटी

उन्होंने कहा कि टेक्सटाइल इंडस्ट्री अब केवल धागे, कपड़े और फैशन तक सीमित नहीं है। डिफेंस, हेल्थकेयर, कृषि और स्पोर्ट्स जैसे क्षेत्रों में टेक्निकल टेक्सटाइल तेजी से उभर रहा है। इसलिए उत्तर प्रदेश को ट्रेडिशनल टेक्सटाइल से आगे बढ़कर टेक्निकल टेक्सटाइल में भी अपनी ताकत बढ़ानी होगी। पीएम मित्र पार्क और संत कबीर टेक्सटाइल पार्क जैसी पहल इसी दिशा में आगे बढ़ रही हैं। वाराणसी, अमरोहा, बरेली, संतकबीरनगर और बिजनौर में परियोजनाओं के लिए भूमि आरक्षित की गई है। सीतापुर, मऊ, कानपुर, झांसी और रायबरेली में टेक्सटाइल एवं अपैरल पार्क के लिए भूमि चिन्हित करने की प्रक्रिया शुरू की गई है। नोएडा को अपैरल सिटी के रूप में विकसित किया जा रहा है।

ग्लोबल वैल्यू चेन पार्टनर बनें एमएसएमई

मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार चाहती है कि एमएसएमई केवल सब-कॉन्ट्रैक्टर नहीं, ग्लोबल वैल्यू चेन के पार्टनर बनें। युवा केवल जॉब सीकर नहीं, टेक्सटाइल एंटरप्रेन्योर और इनोवेटर बनें तथा कारीगर केवल सप्लायर नहीं, अपने ब्रांड के मालिक बनें। ‘डिजाइन इन यूपी, मेड इन यूपी और एक्सपोर्टेड फ्रॉम यूपी’ के मंत्र से प्रदेश के हुनर को वैश्विक पहचान मिले। निफ्ट रायबरेली और उत्तर प्रदेश टेक्सटाइल टेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट कानपुर युवाओं को आधुनिक जरूरतों के अनुरूप तैयार कर रहे हैं। यूपी आज पॉलिसी, इन्फ्रास्ट्रक्चर, टैलेंट और मार्केट हर स्तर पर तैयार है। अब प्रदेश की सांस्कृतिक पूंजी को आर्थिक पूंजी में बदलना है। बुनकर का हुनर, उद्यमी का कारोबार, युवाओं का रोजगार, महिलाओं की भागीदारी, निवेश और निर्यात बढ़ाकर उत्तर प्रदेश को दुनिया के प्रमुख टेक्सटाइल केंद्रों में स्थापित किया जाएगा।

 

कार्यक्रम में खादी एवं ग्रामोद्योग, रेशम, हथकरघा एवं वस्त्र उद्योग मंत्री राकेश सचान, उत्तर प्रदेश ट्रांसफॉर्मेशन कमीशन के सीईओ मनोज कुमार सिंह, प्रमुख सचिव वस्त्र उद्योग अनिल कुमार सागर सहित देशभर के प्रमुख उद्यमी, निवेशक, निर्यातक और टेक्सटाइल सेक्टर के प्रतिनिधि मौजूद रहे।

Bhuvam Bam: समय रैना के शो में भुवन बाम करेंगे एंट्री, यूट्यूबर ने बीटीएस फोटोज को शेयर किया

Bhuvam Bam: क्या भुवन बाम, समय रैना के शो ‘इंडियाज़ गॉट लेटेंट’ (India’s Got Latent) में अगले पैनलिस्ट होंगे? भुवन बाम के हालिया इंस्टाग्राम पोस्ट ने सबका ध्यान खींचा क्योंकि इसमें समय रैना के शो की शूटिंग की एक फोटो थी। उनके कैप्शन में यह भी लिखा था: “6. वुड यू रैदर? (आप क्या चुनेंगे?)” हालांकि, यह अभी पता नहीं चला है कि भुवन अगले एपिसोड में दिखेंगे या बाद के किसी एपिसोड में।

‘इंडियाज गॉट लेटेंट’ पर भुवन बाम

शो में भुवन के शामिल होने की काफी उम्मीद की जा रही थी। उन्होंने पहले भी एक कंटेस्टेंट से वीडियो कॉल पर बात की है, और कई फैंस ने उनसे समय के शो में आने के लिए कहा है। भुवन के कन्फर्मेशन ने फैंस को ‘इंडियाज़ गॉट लेटेंट’ के आने वाले एपिसोड्स के लिए उत्साहित कर दिया है।

X (ट्विटर) पर एक वायरल वीडियो में यह भी दावा किया गया है कि पैनल में भुवन के साथ एहसास चन्ना, राहुल दुआ और बलराज घई भी होंगे। भुवन ब्राउन जैकेट, जींस और सनग्लासेस में काफी अच्छे लग रहे थे। एहसास क्रॉप व्हाइट शर्ट और मैचिंग स्कर्ट में शानदार लग रही थीं। वीडियो का कैप्शन था, “IGL के लिए एक और ज़बरदस्त पैनल। समय अपने कुकिंग वाले दौर में वापस आ गए हैं।” हालांकि, कुछ लोगों का दावा था कि यह सीजन 1 का वीडियो था।

राखी सावंत और अश्नीर ग्रोवर की बातचीत वायरल

इस बीच, समय के शो के लेटेस्ट एपिसोड ने काफी चर्चा बटोरी है। लेटेस्ट एपिसोड में राखी सावंत, अश्नीर ग्रोवर, कुशाग्र श्रीवास्तव और बलराज घई, समय के साथ पैनलिस्ट के तौर पर शामिल हुए। कॉमेडियन ने वादा किया था कि यह एपिसोड “OG” (असली) लेटेंट जैसा लगेगा, और सच में इसने काफी चर्चा छेड़ दी है।

राखी सावंत और अश्नीर ग्रोवर की बातचीत ने इंटरनेट को दो हिस्सों में बांट दिया है। जहां कुछ लोगों का दावा है कि राखी की बातें और सेक्सुअल इशारे गलत थे क्योंकि अश्नीर असहज लग रहे थे, वहीं दूसरों ने शो के आखिर में हुई उनकी बातचीत का हवाला देते हुए कहा कि एंटरप्रेन्योर ठीक लग रहे थे।

अश्नीर ने अभी तक किसी भी दावे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। राखी सावंत ने इंस्टाग्राम पर कई स्टोरीज़ शेयर की हैं, जिनमें से एक में कहा गया है कि अगर उनके जेंडर (लिंग) अलग होते, तो बातचीत कुछ और ही होती। उन्होंने एक मीम भी शेयर किया जिसमें कहा गया था कि समय रैना छुट्टियां मनाने चले गए हैं क्योंकि उन्हें पता था कि राखी सावंत का एपिसोड हंगामा मचा देगा।